मानव
पिछले 7 जून को विश्व बैंक ने विश्व अर्थव्यवस्था के अपने नये मूल्यांकन में इसकी वृद्धि दर को फिर घटा दिया है. विश्व बैंक ने जनवरी में किये अपने पहले अनुमान 2.9% से कम करके वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर 2016 में 2.4% रहने का अनुमान लगाया है. विश्व बैंक के अर्थशास्त्री ऐहान कोजे़ ने कहा, “विश्व अर्थव्यवस्था की हालत नाज़ुक है. वृद्धि दर कमज़ोर स्थिति में है.” विश्व बैंक का यह ताज़ा अनुमान अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय कोष (आई.एम.एफ़.) की ओर से अप्रैल में किये गये 3.2% के अनुमान से भी कम है.
मार्क्सवादी दायरों में तो इस बात की सम्भावना पहले ही ज़ाहिर की जा रही थी कि वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नये और गहरे आर्थिक संकट के दहाने पर खड़ी है लेकिन बुर्जुआ अर्थशास्त्री हकीकत से मुँह फेरकर हालत सुधरने के दावे किये जा रहे थे. जब कभी एक-आध महीने के लिए कुछ आँकड़े सकारात्मक नज़र आने लगते तो पूरी तस्वीर के एक छोटे से पहलू के रूप में इसे देखने के बजाय वे फ़ौरन आर्थिक संकट के अन्त की भविष्यवाणी करने लगते. लेकिन मौजूदा समय में जो सच्चाई एकदम सामने है उसे किसी भी तरह नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि बात सिर्फ अमेरिका या किसी एक-आध देश की नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था की है जिसको आधार बनाकर ऐसे निराशावादी रुझान अब पेश किये जा रहे हैं. चाहे अमेरिका हो या लातिनी अमेरिका, यूरोपीय यूनियन हो या फिर जापान, चीन या अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएँ, सबकी हालत इस समय पतली है.
और इस सिकुड़ते वैश्विक व्यापार के बीच, वैश्विक स्तर पर पैदा हो रहे अधिशेष मूल्य में से अपना हिस्सा बरकरार रखने के लिए या उसको बढ़ाने के लिए विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी खींचतान भी तीखी होती जा रही है. अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए सभी देश नये व्यापारिक गँठजोड़ क़ायम कर रहे हैं, अपने लिए वक्ती तौर पर नये सहयोगी ढूँढ़ रहे हैं. नये पैदा हुए इस भू-राजनीतिक तनाव के केन्द्र में विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ, अमेरिका और चीन हैं और बाकी देश इनके इर्द-गिर्द अपने-आप को व्यवस्थित कर रहे हैं.
अमेरिका और चीन के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा का सबसे नया इज़हार मई के आखिरी हफ्ते में अमेरिकी अन्तरराष्ट्रीय व्यापार कमीशन की ओर से चीनी इस्पात कम्पनियों के ख़िलाफ़ शुरू की गयी जाँच-पड़ताल है जिसके तहत अमेरिकी इस्पात उद्योग की ओर से यह इल्ज़ाम लगाया गया है कि चीनी इस्पात कम्पनियों ने उनकी गुप्त जानकारियों को चुराया है और चीनी कम्पनियाँ अमेरिकी इस्पात कम्पनियों को नुकसान पहुँचाने के लिए जान-बूझकर अपनी क़ीमतें कम कर रही हैं. जहाँ तक गुप्त जानकारी चोरी करने की बात है, तो सभी बड़ी कम्पनियाँ इस काम में लगी ही रहती हैं, मगर अमेरिका के दूसरे दावे में सच्चाई है. इस समय चीन में इस्पात की अतिरिक्त पैदावार है. एक साल में जितना इस्पात पूरा यूरोप पैदा करता है, उससे ज़्यादा चीन पैदा करता है. सस्ती श्रम-शक्ति के आधार पर चीन ने विशालकाय इस्पात उद्योग खड़ा किया है और यह इस्पात वह अमेरिका में सस्ते दाम पर बेच रहा है. इससे उन अमेरिकी कम्पनियों के लिए मुकाबले में टिके रहने का संकट पैदा हो गया है जो स्थानीय महँगे श्रम पर निर्भर हैं. कई अमेरिकी इस्पात कम्पनियाँ बन्द भी हो चुकी हैं जिसके चलते हजारों अमेरिकियों का रोज़गार छिन गया है. इसी को आधार बनाकर अनेक ”राष्ट्रवादी” ताक़तें और उनके प्रतिनिधि अमेरिका में चुनावों के मौसम को देखते हुए दावा कर रहे हैं कि इन खोये रोज़गारों की वजह पूँजीवादी ढाँचा नहीं बल्कि चीन है. इस सबका एक दूसरा पहलू यह भी है की चीन के इस बड़े इस्पात उद्योग ने पिछले कुछ समय से वैश्विक अर्थव्यवस्था के गहरे आर्थिक संकट में कुछ राहत भी दे रखी थी और साथ ही कई अमेरिकी कम्पनियाँ चीन से आने वाले सस्ते इस्पात पर निर्भर भी हैं.
अमेरिकी कम्पनियों के इस आरोप पर चीनी कम्पनियों ने तीखा जवाब देते हुए कहा है कि अमेरिका विश्व व्यापार संगठन के मुक्त व्यापार के नियमों के ख़िलाफ़ जा रहा है. पूँजी का तर्क यही है कि यह ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफे़ वाले क्षेत्रों की ओर भागती है और सस्ती श्रम-शक्ति अधिक मुनाफे़ की गारंटी है. अमेरिकी कम्पनियाँ और विश्व की सारी कम्पनियाँ यही करती हैं कि जहाँ सस्ते से सस्ता श्रम उपलब्ध हो सकता है वहाँ अपने कारख़ाने स्थानांतरित करके अधिक मुनाफ़ा कमाने की फ़िराक में रहती हैं. अमेरिका की परेशानी का सबब सिर्फ यह है कि उसके वैश्विक प्रभुत्व को अब चीन से चुनौती मिल रही है, अधिशेष मूल्य में उसका हिस्सा चीन हथिया रहा है, इसीलिए अमेरिका चीन के ऊपर इस तरह का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिका के इस विरोध का दूसरा कारण यह है कि चीन पिछले लम्बे समय से विश्व व्यापर संगठन में बाज़ार अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल करने की कोशिश कर रहा है. यह दर्जा मिलने से चीन बिना किसी रोक-टोक के अपने सस्ते माल को अमेरिका समेत दूसरे देशों में भेज सकेगा (जिसको अर्थशास्त्री ‘डम्पिंग’ भी कहते हैं). अमेरिका चीन को यह दर्जा दिये जाने के ख़िलाफ़ है क्योंकि यह दर्जा मिलने के बाद अमेरिका चीन की इस हरकत के बदले उसके ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई करने की माँग नहीं कर सकेगा. दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के परम्परागत सहयोगी इंग्लैण्ड ने भी चीन की इस दावेदारी का समर्थन किया है. इंग्लैण्ड देख रहा है कि बिगड़ती आर्थिक हालत के मद्देनज़र चीन से उम्मीद रखना अधिक फायदेमन्द है. लन्दन पूरे विश्व की वित्तीय गतिविधियों का केन्द्र है और चीनी निवेशक इस समय भारी मात्रा में विदेशी बांडों और कम्पनियों में निवेश कर रहे हैं. इंग्लैण्ड भी इस मौके का भरपूर फ़ायदा उठाना चाहता है.
व्यापार युद्ध का बढ़ता ख़तरा
वैश्विक स्तर पर अतिउत्पादन के हालात, सिकुड़ रहा व्यापार, गिर रही उत्पादकता और अपनी मन्द अर्थव्यवस्थाओं के चलते वैश्विक स्तर पर अधिशेष मूल्य के बँटवारे को लेकर पूँजीवादी देशों के बीच होड़ तीखी होती जा रही है. अपने देशों के पूँजीपतियों के हितों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न देशों की पूँजीवादी सरकारें संरक्षणवादी नीतियों पर चल रही हैं जिसके चलते वैश्विक पैमाने पर व्यापार युद्ध छिड़ने का ख़तरा बढ़ गया है. बिलकुल उसी तरह का जिस तरह का 1929 की महामन्दी के बाद पैदा हुआ था जिसका अन्त दूसरे विश्व युद्ध के महाविनाश के रूप में हुआ. इस व्यापार युद्ध में आज केवल अमेरिका और चीन ही अगुआ नहीं हैं. यदि हम विश्व के बड़े पूँजीवादी देशों की पिछले दो साल की विदेश नीति और कूटनीति को देखें तो पता चलता है कि किस तरह एक व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से सभी साम्राज्यवादी देशों की इन नीतियों में बदलाव आया है. चाहे वह अमेरिका की ओर से चीन को घेरने के लिए ट्रांस-पैसिफिक सहकारिता (टीपीपी) के तहत बनाया जाने वाला गँठजोड़ और बदले में चीन की ओर से लातिनी अमेरिका, एशिया और मध्य-पूर्व में विभिन्न सन्धियों के ज़रिए अपना एक अलग गँठजोड़ क़ायम करना हो, चाहे वह इंग्लैण्ड के अन्दर आर्थिक राष्ट्रवाद का फैलाया जा रहा प्रचार हो (जिसकी तीखी अभिव्यक्ति अब इंग्लैण्ड के यूरोपीय यूनियन में रहने या ना रहने को लेकर होने वाले मतदान के रूप में सामने आ रही है). चाहे वह जर्मनी द्वारा पिछले दो साल से लगातार अपने सैन्य खर्चे में बढ़ोत्तरी करना और इसके राजनीतिज्ञों द्वारा लगातार जर्मनी को वैश्विक पटल पर उसकी आर्थिक हैसियत के अनुसार भूमिका निभाने की वकालत करना हो और चाहे जापान द्वारा दूसरे विश्व-युद्ध के बाद अपने संविधान में दर्ज की गयी शान्तिवादी धारा को ख़त्म करना और सैन्य खर्चों में लगातार वृद्धि करना हो. ये सभी घटनाक्रम बड़ी पूँजीवादी शक्तियों के बीच तीखी होती होड़ के नतीजे हैं.
इतिहास का तथ्य यही है कि पूँजीपति वर्ग अपने मुनाफ़े के लिए युद्ध जैसे अपराधों को लगातार अंजाम देता रहा है. आज इसके मुकाबले के लिए और इसे रोकने के लिए गाँधीवादी, शान्तिवादी कार्यक्रमों और अपीलों की नहीं बल्कि एक रैडिकल, जुझारू अमन-पसन्द आन्दोलन की ज़रूरत है जिसकी धुरी में मज़दूर वर्ग के वर्ग-संघर्ष के नये संस्करण होंगे.

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