प्रियदर्शी दत्ता
करीब 100 साल पहले जून 1916 में गुजरात के अहमदाबाद क्लब में पहली बार आए एक बेहद स्टाइलिश मेहमान के काठीवारी ड्रेस को लेकर गुजरात के ही एक बैरिस्टर ने मज़ाक उड़ाया. नए आए मेहमान ने क्लब के लॉन में मौज़ूद थोड़े-बहुत लोगों को संबोधित किया, लेकिन बैरिस्टर अपने दोस्तों के साथ पत्ते खेलते रहे. बैरिस्टर को पता था कि संबोधित कर रहा शख्स कोई और नहीं बल्कि मोहनदास करमचंद गांधी हैं, जो कि हाल ही में दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटकर अहमदाबाद में ही सत्याग्रह आश्रम की नींव रख चुके हैं. एक बेहद सफल वकील बन चुके बैरिस्टर को गांधी के कार्यों से कोई मतलब नहीं था. लेकिन गांधी जब अहमदाबाद पहुंचे तो बैरिस्टर से बातचीत के लिए जोर दिया. बैरिस्टर ने भी बिना मन से ही सही, गांधी से मिलने का फैसला कर लिया.

दोनों मिले तो उम्मीद थी की राजनीति पर गरम बहस होगी, लेकिन यहां तो धर्म-कर्म पर काफी देर तक चर्चा होती रही. पर 41 साल के बेहद सख़्त मिज़ाज के बैरिस्टर में उस मुलाकात के बाद कुछ बेहद स्थायी बदलाव आए. गांधी के शब्द उनके कानों में तब तक गुंजते रहे, जब तक वो सत्याग्रह आंदोलन में खुद शामिल नहीं हो गए. हालांकि बेहद व्यावहारिक इंसान होने की वजह से वो अपने झुकाव के बावजूद खुलकर आंदोलन में 1917 में जाकर शामिल हुए. उसी साल चंपारण आंदोलन के बाद गांधी देश के राजनीतिक मसीहा बन चुके थे. बैरिस्टर उसके बाद गांधी के विश्वासपात्र बन गए और आगे चलकर धीरे-धीरे गांधी के दायां हाथ हो गए. जो भी गांधी सोचते या रणनीति बनाते, बैरिस्टर उसको हुबहू पूरा करते. बैरिस्टर ने अपना यूरोपीय सूट-बूट जलाकर खादी का धोती-कुर्ता पहनने लगे. उस बैरिस्टर का नाम था सरदार बल्लभभाई झावेरीभाई पटेल (1875-1950), भारत के लौहपुरुष.

सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को सूरत से करीब 200 किलोमीटर दूर नाडियाड (जिला खेड़ा, गुजरात) में हुआ था. वे लेवा पटेल समुदाय से थे. माना जाता है कि उनके पूर्वज लड़ाके थे, लेकिन फिलहाल ये समुदाय के कार्य में लगे थे. इस समुदाय की शौर्यता और कठिन परिश्रम का इतिहास रहा है. किसान परिवार के पटेल का बचपन भी खेतीबाड़ी के माहौल में बीता. कानूनी और राजनीतिक क्षेत्र में शीर्ष मुकाम तक पहुंचने के बावजूद वे खुद को हमेशा  किसान/खेतिहर बताते. पटेल के परिवार में उनके तीन भाई और एक बहन थी. जिनमें से एक भाई विट्ठलभाई जावेरीभाई पटेल (1873-1933), लॉ बार, सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली के पहले भारतीय प्रेसिडेंट (स्पीकर) बने.
अहमदाबाद नगर निगम का चुनाव जीतने (1917-1928) के बाद से ही सरदार पटेल में एक कुशल राजनेता की छवि नजर आने लगी. वे अपनी प्रतिभा से ना सिर्फ ब्रिटिश नौकरशाही को धराशाई कर रहे थे, बल्कि उन्हों ने शहर के आम नागरिकों की जरूरतों के हिसाब से कई रचनात्मक कार्यों की भी पहल की. निगम के प्रेसिडेंट रहते हुए (1924-1928) एकबार 'स्वच्छ भारत' का भी एक अनोखा उदाहरण पेश किया था. स्वयंसेवकों के साथ मिलकर पटेल ने अहमदाबाद की गलियों में झाड़ू लगाए और कूड़ा फैंका, जिसकी शुरुआत वहां की हरिजन बस्ती से हुई. 1917 में जब अहमदाबाद में प्लेग फैला तो स्वयंसेवकों के साथ पटेल 24 घंटे लगे रहे. पीड़ितों के घर जाकर उनसे और उनके परिजनों से बात करते. लोकमान्य तिलक ने जैसे 1896 में प्लेग के दौरान किया था वैसे ही पटेल संक्रमण का खतरा उठाते हुए कार्य करते रहे.

 लगातार कार्य की वजह से पटेल के स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर पड़ा. लेकिन इस दौरान आम जनता के नेता की उनकी छवि और मजबूत हो गई. लगभग उसी दौरान खेड़ा सत्याग्रह (1918) से पटेल की नेतृत्व क्षमता और मजबूत हुई और ये सत्याग्रह आगे जाकर बारदोली सत्याग्रह (1928) में बदल गया. हालांकि खेड़ा (गुजरात) आंदोलन में कर रियायत की जो मांगे थी वो पूरी तो नहीं हुई लेकिन इसके दो बेहद अहम प्रभाव पड़े. पहला, जमीन का कर तय करने में किसानों को भी एक पक्ष के रूप में स्वीकारा गया और इस विषय पर गांधी और पटेल एकसाथ आए.

 एक दशक बाद गुजरात 23 जुलाई 1927 को मुसलाधार बारिश की वजह से भयंकर बाढ़ से जूझने लगा. पटेल ने बाढ़ पीड़ितों को बचाने और उनके पुनर्वास के लिए जोरदार अभियान चलाया, इसी अभियान से राष्ट्रीय स्तर पर उनकी एक मजबूत नेतृत्वकर्ता की पहचान बनी. बॉम्बे सरकार (गुजरात तब बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा था) ने अवॉर्ड के लिए उनके नाम का प्रस्ताव भेजा, लेकिन पटेल ने विनम्रता से उसे ठुकरा दिया.

 बारदोली (1928) में विशाल जीत के बावजूद ऐसी विनम्रता पटेल की पहचान थी. वे दिसंबर 1928 में कलकत्ता कांग्रेस के चुनाव में खड़ा नहीं होना चाहते थे. बार-बार आग्रह किए जाने के बाद वे गुजरात से आए लोगों के बीच खड़े हुए, लेकिन उसके बाद भी संबोधित करने मंच पर आने के लिए उन्हें धक्का देना पड़ा. बारदोली (जिला-सूरत) पटेल का कुरुक्षेत्र रहा है. उनके नेतृत्व में चलाया गया सफल कर विरोधी अभियान का नतीजा यह हुआ कि ब्रिटिश हुकूमत तीन महीने के भीतर फैसले को वापस लेने पर मजबूर हुई. सांगठनिक कुशलता के आधार पर इस आंदोलन की तुलना सिर्फ महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक के चलाए अकाल राहत आंदोलन (1896) से ही की जा सकती है. पटेल ने सैन्य तैयारी की तर्ज पर इस सत्याग्रह आंदोलन को खड़ा किया, लेकिन ये पूरी तरह से अहिंसक आंदोलन था.

 पटेल खुद आंदोलन के सेनापति थे, उनके बाद विभाग पति आते जो कि सैनिकों का कामकाज देखते थे. इस आंदोलन की रणभूमि में 92 गांवों के 87,000 किसान शामिल थे. घुड़सवार संदेशवाहकों, भजन गायकों और छपाखानों की मदद से उन्होंने एक वृहद सूचना तंत्र तैयार किया. बारदोली में उनकी सफलता ने पूरे ब्रिटेश साम्राज्या का ध्यान खींचा. लेकिन सबसे बड़ा सम्मान तो उन्हें बारदोल तालुका के नानीफलोद के एक किसान ने दिया. कुवेरजी दुर्लभ पटेल ने भरी सभा में कहा कि'पटेल आप हमारे सरदार हैं'. उसके बाद से सरदार की ये उपाधि पटेल को हमेशा के लिए मिल गई.

      पटेल का बेहद अनुशासित होकर कार्य करने का तरीका विलक्षण था. स्व-अनुशासन का मंत्र गांधी ने दिया था, लेकिन आंदोलन के लिए बेहद जरूरी सांगठनिक अनुशासन और एकजुटता को पटेल लेकर आए. पटेल का राजनीतिक सफर ठीक उसी समय शुरू हुआ, जब भारतीय राजनीति आंदोलन का रूप ले चुकी थी. 1930 में एशियाई राजनीति पर काफी सर्वे कर चुके अमेरिकी पत्रकार जॉन गुंथर ने पटेल को'पार्टी का सर्वोत्कृष्ट' नेता करार दिया था. उसके मुताबिक पटेल फैसले लेने वाले,व्यावहारिक और किसी भी मिशन को पूरा करने वाले शख्स थे.
 कई बार पटेल की सांगठनिक क्षमता को इम्तहान से गुजरना पड़ा. एक समय भारत पर विभाजन का खतरा मंडरा रहा था. करीब 565 रियासतें बंटवारे के समय भारत में शामिल होने को तैयार नहीं थी. त्रावणकोर जैसी कुछ रियासतें स्वतंत्र रहना चाहती थी जबकि भोपाल और हैदराबाद जैसी कुछ रियासतें पाकिस्तानी सीमा से दूर होने के बावजूद उसके साथ जाने के षड्यंत्र में शामिल थी. रणनीतिक कुशलता और दबाव का प्रयोग कर पटेल ने रियासतों को भारत के साथ लाने की लड़ाई आखिरकार जीत ली. हैदराबाद में जब बातचीत से मामला नहीं सुलक्षा और छोटे-छोटे गुटों में प्रदर्शनकारी आतंकी गतिविधियों में शामिल होने लगे तो सेना का भी इस्तेमाल करना पड़ा.
स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री के तौर पर पाकिस्तान से विस्थापित हुए हिंदू और सिख शरणार्थियों के पुनर्वास कार्य कराने के साथ ही देश में सिविल सेवा की शुरुआत का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. आईसीएस फिलिप मैसन ने एक बार कहा था कि पटेल एक जन्मजात प्रशासक हैं और उन्हें कोई कार्य करने के लिए पुराने अनुभव की जरूरत नहीं है. गांधी जी के बेहद करीबी काका कालेलकर ने कहा था कि पटेल उसी प्रतिष्ठित जमात के हिस्सा हैं जिसके शिवाजी और तिलक हैं. हालांकि इसके बावजूद  गांधी के प्रति उनकी निष्ठा पर कभी कोई सवाल नहीं था.
 सरदार पटेल 1950 में 75 साल के हुए लेकिन तब तक ज्यादा तनाव की वजह से उनका शरीर जवाब देने लगा था. 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में उनका निधन हो गया. मृत्यूशय्या पर भी उन्हें अपने परिवार व रिश्तेदारों की नहीं बल्कि देश की स्थिति की चिंता थी.

 हमारे लिए शर्मनाक है कि सरदार पटेल की विरासत की किसी ने परवाह नहीं है. वर्तमान सरकार ने पिछली सरकारों की गलतियों को सुधारते हुए और देश के निर्माण में पटेल के अहम योगदान पर रोशनी डालने का सराहनीय कार्य किया है.
 (लेखक दिल्ली में रहने वाले एक शोधकर्ता और समीक्षक हैं)


एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

Loading...

ई-अख़बार

Blog

  • आलमे-अरवाह - मेरे महबूब ! हम आलमे-अरवाह के बिछड़े हैं दहर में नहीं तो रोज़े-मेहशर में मिलेंगे... *-फ़िरदौस ख़ान* शब्दार्थ : आलमे-अरवाह- जन्म से पहले जहां रूहें रहती हैं दहर...
  • अल्लाह और रोज़ेदार - एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ? अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ म...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

Like On Facebook

एक झलक

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं