आप रेडियो हैं

Posted Star News Agency Monday, February 13, 2017 , ,

एफ़. शहरयार
जब नील नदी की लहरों की कलकल सी गुनगुनाती ध्वनि ‘’मुझे छूती है, तुम्हें छूती है’’ तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे मधुर स्वरों में कोई कैरॉल गा रहा हो, ऐसे ही रेडियो की ध्वनि श्रोताओं के मन को स्पर्श करती है. दुर्गम भौगोलिक विभाजनों की सीमा से परे रेडियो अनगिनत ज़िन्दगियों को छूता है और इसके बावजूद भी परदे के पीछे बना रहता है. एक ऐसे अच्छे मित्र की तरह जो बुरे दिनों में सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहता है लेकिन उसका प्रतिफल कभी नहीं चाहता. जैसे प्राकृतिक आपदाओं के आने पर दुनिया बार-बार इसे महसूस करती है. जब प्रकृति के इस रोष का सामना करने में सभी नये मीडिया माध्यम असफल हो जाते हैं तो ऐसे में एकमात्र रेडियो ही है जो लोगों से, ज़िन्दगियों से और आशाओं से जोड़ता है.
 रेडियो के लिए ये गौरव का विषय था जब संयुक्त राष्ट्र ने, रेडियो कैसे हमारे जीवन को एक नया आयाम देने में मदद कर सकता है, इस परिकल्पना के साथ वर्ष 2011 में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा की.
 यूनेस्को वेबसाइट से उद्धरण के अनुसार, ‘’अपने श्रोताओं को सुनते हुए और उनकी जरूरतों पर प्रतिक्रिया देने के लिए, रेडियो हम सबके सामने आने वाली चुनौतियों के आवश्यक समाधान की दिशा में विचारों और आवाज़ों की विविधता प्रदान करता है.‘’
 यह उन विकासशील समाजों के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक है जो नवीनतम सूचना प्रौद्योगिकियों की पहुंच से वं‍िचत हैं. वैश्विक स्तर पर अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का बदलाव ग़रीबों की तुलना में अमीर राष्ट्रों को अनुचित लाभ पहुंचायेगा, इससे महसूस होता है कि तीसरी दुनिया का आधार रेडियो ही है. रेडियो का प्रसारण एकाकीपन और निरक्षरता की बाधाओं को पार करता है और यह प्रसारण एवं आदान करने का सबसे सस्ता इलैक्ट्रॉनिक माध्यम भी है. हालांकि विश्व रेडियो दिवस के शुभारंभ को मात्र छह वर्ष ही हुए हैं, लेकिन 1927 में बॉम्बे में इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग कंपनी के पहले रेडियो स्टेशन की स्थापना के साथ भारत में रेडियो की अपनी एक लंबी कहानी है, जो वास्तव में 90 वर्ष पुरानी है.
 रेडियो भारत में 1.25 अरब की आबादी के साथ जातीय-सामाजिक-भाषाई विविधता, साक्षरता स्तर, आर्थिक असमानता, लिंग असमानता, संसाधनों के वितरण में असमानता, ग्रामीण-शहरी अंतर और डिजिटल अंतर जैसी सर्वाधिक असंभव चुनौतियों का सामना करता है.
लोक सेवा रेडियो प्रसारक के रूप में, ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) ने एक प्रज्ञता समाज/ज्ञानवान समुदाय के विकास सहित वैज्ञानिक विकास, महिलाओं के सशक्तीकरण, वंचितों को लाभ, अभिभावकता और कृषि नवाचार का प्रचार, ग्रामीण उत्थान, जन सांख्यिकीय लाभांश के लाभों को प्राप्त करने के लिए कौशल विकास, भारत की सांस्कृतिक, भाषीय और जातीय विविधता को मज़बूत बनाने और संरक्षण देने के साथ-साथ भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष परंपराओं एवं मूल्यों के विकास पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करते हुए इस चुनौती का सराहनीय रूप से सामना करते हुए आगे कदम बढ़ाया है.
यही कारण है कि प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के जनक एम.एस. स्वामीनाथन ने रेडियो के विकास की पहल की सराहना इन शब्दों में की है:
‘’ यहां तक की वे लोग जिन्हें प्रौद्योगिकीय परिवर्तन से बाहर रखा गया उन्हें इसमें इसलिए शामिल किया जा सका क्योंकि उन्होंने रेडियो के माध्यम से नई प्रौद्योगिकियों के बारे में सुना. वास्तव में मुझे 1967-68 की बात याद है जब उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से किसानों ने चावल, गेंहू और अन्य फसलों की नई किस्मों का शुभारंभ किया जिसके बारे में उन्होंने रेडियो पर सुना था. यही कारण है कि मैं ऑल इंडिया रेडियो को हरित क्रांति के गुमनाम नायकों में से एक के तौर पर अपना सम्मान देना चाहूंगा.‘’
दुनिया के सबसे बड़े तेज़ी से बदलते मध्यम वर्ग समाज के लिए रेडियो के क्या मायने हैं?  नवीन रेडियो में इस खंड और परिवेश का निर्माण महसूस होता है.
स्मार्ट शहरों की अवधारणा के अनुरूप वैश्विक मध्यम वर्ग के नागरिकों के इनमें बसने के लिए तत्कालिक आवश्यकताएं क्या हैं, इनमें सर्वथा असंगतता से बचना, सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय मूल्यों और संस्कृति के साथ आधुनिकता का परिवेश, (सिर्फ कुछ चयनित वर्ग के लिए) न होकर सभी के लिए समग्रता सुनिश्चित करना शामिल है और यही विशेषताएं राष्ट्रीय लोक प्रसारक, आकाशवाणी की भूमिका और महत्व के मामले में भी रेखांकित होती हैं. अपने आदर्श वाक्य  (बहुजन हिताय बहुजन सुखाय) और अपनी परिपाटी एवं नेटवर्कसे सुसज्जित, आकाशवाणी ही संभवत: एकमात्र ऐसा राष्ट्रीय मीडिया संस्थान है जिसने समाज के असंख्य वर्गों को संबोधित करने की दिशा में एक निष्पक्ष और संवेदनशील माध्यम के रूप में भूमिका निभाई है.
 भारत के दिग्भ्रमित और पथ से भटके युवाओं को सही दिशा दिखाने के मामले में आकाशवाणी ही एकमात्र ऐसा माध्यम रहा है जिसने युवाओं और भाषाई जुड़ाव के लिए वैचारिक संपन्नता का मंच प्रदान किया. देश के किसी भी शहर/ग्रामीण क्षेत्र में किए गए एक यादृच्छिक ऑडियो सर्वेक्षण में यह उजागर होगा कि भाषाई दिवालियापन के रूप में हमारे युवाओं को आंशिक रूप से इसमें शामिल किया जा रहा है. सार्वजनिक बोलचाल की भाषा हमारे निजी विद्यालयों के पाठ्यक्रमों का हिस्सा नहीं है. आकाशवाणी में अपने विशाल एएम नेटवर्क के साथ उन्हें आत्मविकास की मुख्यधारा में वापस लाने और इस प्रकार से सामूहिक रूप से राष्ट्र निर्माण में शामिल करने की क्षमता है.
आलोचकों का यह तर्क हो सकता है कि इस प्रकार के प्रयास से बहुत कम दूरी को धीरे- धीरे ही तय किया जा सकेगा, लेकिन वे इस बात को समझना नहीं चाहते कि राष्ट्र निर्माण का कार्य रेडियो पर विज्ञापन या उदघोषकों का कोई कार्यक्रम नहीं है जिसमें येन केन प्रकारेण दो या तीन कमरों के मकानों की बिक्री के प्रयास के लिये किया जाता है अपितु यह सभी घरों के भीतर मानवीय घटकों के सृजन और संरक्षण का कार्य है.

लोक सेवा रेडियो सर्वाधिक लोकतांत्रिक माध्यम से जानकारी का प्रसार करता है. यह आम जन की भाषा बोलता है और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है. रेडियो किसी भी क्षेत्र को न छोड़ते हुए अपने विभिन्न स्वरूपों में नाटकों, समाचारों, टॉक शो, संगीत, रनिंग कमेंट्री और विशेष श्रोताओं के लिए विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण करता है.
 रेडियो कल्पना का संसार है. रेडियो नेत्रहीनों के लिए थियेटर है. रेडियो अंतरंग कथा वाचन का एक माध्यम है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का नागरिकों से अपने मन की बात कहने के लिए अन्य माध्यमों की अपेक्षा आकाशवाणी को चुना जाना एक आश्चर्य से कम नहीं है. किसी ने इस पर चुटकी भी ली है कि जब वे रेडियो पर आते हैं, तो सब लोग सुनने श्रोता उन्हें सुनने को उत्सुक हो उठते हैं! इससे बेहतर हमारे पास कोई उद्धरण नहीं हो सकता, जब प्रधानमंत्री स्वयं कहते हैं :‘जब हम उन सवालों को छूते हैं (सवाल जो कि हमारे दिलों को छूते हैं) तो हम आम आदमी तक पहुंचने में सक्षम हो जाएंगे.’ इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि ‘मन की बात’ को त्वरित सफलता मिली, और यह यथार्थता के साथ एक विस्तृत घरेलू और वैश्विक दायरे तक पहुंचने का माध्यम भी बन चुका है.

आकाशवाणी देशभर में फैले अपने 422 स्टेशनों के साथ, यकीनन दुनिया के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्कों में से एक है, जो आबादी के विभिन्न हिस्सों की सेवा करता है. देश के प्रधानमंत्री और लोगों के बीच विचारों के आदान-प्रदान के लिए आकाशवाणी से ज्यादा सक्षम माध्यम आपको नहीं मिल सकता. निश्चय ही, सार्वजनिक सेवा प्रसारण में मन की बात सभी के लिए सर्वश्रेष्ठ मिसाल बन गया है.

रेडियो अनवरत चलने वाला एक गीत है, जो समय के साथ अपनी ताल बदलता है. वह 21वीं सदी के परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढाल कर परस्पर संवाद और भागीदारी के नए तरीकों को पेश कर रहा है. और ज्यादा-से-ज्यादा परस्पर संवादी बन रहा है. यह बखूबी बयान करता है कि विश्व रेडियो दिवस 2017 का विषय ‘’रेडियो आप है!’’ रेडियो प्रसारण की नीति और योजना में दर्शकों और समुदायों की विशाल भागीदारी के लिए आह्वान’’ क्यों है.

यूनेस्को का उद्धरण एक बार पुन: देते हुए, ‘जहां सोशल मीडिया श्रोताओं में बिखराव का कार्य कर रहा हैं, ऐसे में रेडियो समुदायों को एकसूत्र में पिरोने और बदलाव के लिए सकारात्मक चर्चा को आगे बढ़ाने की दिशा में विशिष्ट रूप से कार्यरत है.
 (लेखक आकाशवाणी में महानिदेशक हैं)

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