पंकज चतुर्वेदी
समुद्र के विस्तार की समस्या कर्नाटक या अन्य दक्षिणी राज्यों तक सीमित नहीं है, इसका असर मुंबई, कोलकाता, पुरी और द्वीप-समूहों में भी देखा जा रहा है. वैसे ही बढ़ती आबादी के चलते जमीन की कमी विस्फोटक हालात पैदा कर रही है. ऐसे में बेशकीमती जमीन को समुद्र का शिकार होने से बचाने के लिए केंद्र सरकार को ही सोचना होगा.
देश के दक्षिणी राज्यों कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में समुद्र तट पर हजारों गांवों पर इन दिनों सागर की अथाह लहरों का आतंक मंडरा रहा है. समुद्र की तेज लहरें तट को काट देती हैं और देखते ही देखते आबादी के स्थान पर नीले समुद्र का कब्जा हो जाता है. किनारे की बस्तियों में रहने वाले मछुआरे अपनी झोपड़ियां और पीछे कर लेते हैं. कुछ ही महीनों में वे कई किलोमीटर पीछे खिसक आए हैं. अब आगे समुद्र है और पीछे जाने को जगह नहीं बची है. कई जगह तो समुद्र में मिलने वाली छोटी-बड़ी नदियों को सागर का खारा पानी हड़प कर गया है, सो इलाके में पीने, खेती और अन्य उपयोग के लिए पानी का टोटा हो गया है.
कर्नाटक में उल्लाल के पास स्थित मछुआरों का गांव काटेपुरा पिछले तीन-चार साल में कोई एक किलोमीटर पीछे खिसक चुका है. वहां बहने वाली नेत्रवती नदी से सागर की दूरी बमुश्किल सौ मीटर बची है. मरावंथे गांव किसी भी दिन समुद्र के उदरस्थ हो जाएगा. यहां उमड़ते समुद्र और नदी के बीच महज एक पतली-सी सड़क बची है.
समुद्र की जल-सीमा में हो रहे फैलाव का अभी तक कोई ठोस कारण नहीं खोजा जा सका है. कर्नाटक के सिंचाई विभाग द्वारा तैयार की गई ‘राष्ट्रीय समुद्र तट संरक्षण रिपोर्ट’ में कहा गया है कि सागर-लहरों की दिशा बदलना कई बातों पर निर्भर करता है. लेकिन इसका सबसे बड़ा कारण समुद्र के किनारों पर बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण से तटों पर हरियाली का गायब होना है. इसके अलावा हवा का रुख, ज्वार-भाटे और नदियों के बहाव में आ रहे बदलाव भी समुद्र को प्रभावित कर रहे हैं. कई भौगोलिक परिस्थितियां, जैसे बहुत सारी नदियों के समुद्र में मिलन-स्थल पर बनीं अलग-अलग कई खाड़ियों की मौजूदगी और नदी-मुख की स्थिति में लगातार बदलाव भी समुद्र के अस्थिर व्यवहार के लिए जिम्मेदार है. ओजोन पट्टी के नष्ट होने और वायुमंडल में कार्बन मोनो आक्साइड की मात्रा बढ़ने से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है. इससे समुद्री जल का स्तर बढ़ना भी इस तबाही का एक कारक हो सकता है.
राष्ट्रीय समुद्र तट संरक्षण रिपोर्ट में भी चिंता जताई गई है कि समस्या को एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर मोड़ देने से टिकाऊ समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती है. समुद्र के विस्तार की समस्या कर्नाटक या अन्य दक्षिणी राज्यों तक सीमित नहीं है, इसका असर मुंबई, कोलकाता, पुरी और द्वीप-समूहों में भी देखा जा रहा है. वैसे ही बढ़ती आबादी के चलते जमीन की कमी विस्फोटक हालात पैदा कर रही है. ऐसे में बेशकीमती जमीन को समुद्र का शिकार होने से बचाने के लिए केंद्र सरकार को ही सोचना होगा.
पुरी के समुद्र तट को देश के सबसे खूबसूरत समुद्र तटों में गिना जाता था. आज वहां की हरियाली गायब है, सारे कायदे-कानून तोड़ कर तट से सट कर बने होटलों व शहर की बढ़ती आबादी की नालियां सीधे समुद्र में गिर रही हैं. सरकार ने पानी के करीब सुलभ शौचालय बना दिया है तो कुछ आगे चल कर आंध्र प्रदेश से विस्थापित हुए हजारों मछुआरों ने अपनी बस्ती बना ली है. कुल मिलाकर अब यहां बैठना मुश्किल होता जा रहा है. यह दुर्दशा अकेले पुरी की नहीं है, गोवा चले जाएं या फिर दक्षिणी राज्यों के किसी तट पर या फिर बंगाल में गंगासागर- अनियोजित विकास, अंधाधुंध पर्यटन और समुद्र तट संरक्षण कानूनों के प्रति उदासीनता के चलते देश के समुद्र तटों पर गंभीर पर्यावरणीय खतरा मंडरा रहा है. गोवा तो पूरी तरह समुद्र के तट पर ही बसा है और यहां कई जगह समुद्र की लहरें जमीन काट कर बस्ती में घुसती दिखती हैं.
समुद्र किनारे रहने वालों को ही नहीं, वहां के स्थानीय प्रशासन के बहुत कम अफसरान को यह जानकारी है कि 1991 में एक समुद्रतट बंदोबस्त क्षेत्र (कोस्टल रेगुलेशन जोन यानी सीआरजेड) कानून लागू किया गया था. तटों पर लगातार हो रहे निर्माण-कार्यों के चलते वहां का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, इसी को ध्यान में रख कर इस कानून में प्रावधान रखा गया था कि समुद्र तट के पांच सौ मीटर के भीतर किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा दी गई थी. साथ ही समुद्र में शहरी या औद्योगिक कचरा फेंकने पर पाबंदी का भी इसमें प्रावधान था. शायद ही कहीं इसका पालन हो रहा है.
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 में बनाए गए सीआरजेड में समुद्र में आए ज्वार की अधिकतम सीमा से पांच सौ मीटर और भाटे के बीच के क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया गया है. इसमें समुद्र, खाड़ी, उसमें मिलने आ रहे नदी के प्रवाह को भी शामिल किया गया है. ज्वार यानी समुद्र की लहरों की अधिकतम सीमा के पांच सौ मीटर क्षेत्र को पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील घोषित कर इसे एनडीजेड यानी नो डेवलपमेंट जोन (किसी भी निर्माण के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र) घोषित किया गया. इसे सीआरजेड-1 भी कहा गया. सीआरजेड-2 के तहत ऐसे नगरपालिका क्षेत्रों को रखा गया है, जो कि पहले से ही विकसित हैं. सीआरजेड-3 किस्म के क्षेत्र में वह समुद्र तट आता है जो कि सीआरजेड-1 या 2 के तहत नहीं आता है. यहां किसी भी तरह के निर्माण के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति आवश्यक है. सीआरजेड-4 में अंडमान, निकोबार और लक्षद्वीप की पट्टी को रखा गया है. सन 1998 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय समुद्र तट क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण और इसकी राज्य इकाइयों का भी गठन किया, ताकि सीआरजेड कानून को लागू किया जा सके.
सीआरजेड कानून लागू होने के बाद भी समुद्र तटों के गांवों में नए मकान बनना और जमीन की खरीद-बिक्री जारी है. कर्नाटक और केरल में कुछ जगहों पर गांववालों व प्राधिकरण के अधिकारियों के बीच टकराव भी हुए. गांववालों ने जब मकान बनाए तो उन्हें रोका गया. लोगों ने पंचायत से मिली अनुमति व उस पर चुकाए जाने वाले टैक्स की रसीदें दिखा दीं. पंचायत का कहना है कि निर्माण-कार्य नया नहीं है, वह तो पुराने मकानों की मरम्मत है. अधिकारियों के पास सैटेलाइट से तैयार नक्शे हैं. इस पर लोगों का कहना है कि सैटेलाइट से नारियल के पेड़ तो आ जाते हैं, लेकिन उनके बीच बने छोटे झोपड़ों की फोटो बनाना संभव नहीं होता है.
लेकिन विडंबना यह है कि समुद्र संरक्षण कानून की मार अकेले गांववालों पर ही पड़ रही है. पर्यटन या व्यावसायिक दृष्टि से महंगे इलाकों में लोग धड़ल्ले से कानून तोड़ रहे हैं. पुरी में समुद्र तट संरक्षण समिति तो हाइकोर्ट तक गई. अदालत ने समुद्र तट के करीब निर्माण करने वालों के खिलाफ आदेश भी सुनाए, लेकिन उनको लागू करवाने के लिए जिम्मेदार स्थानीय प्रशासन का रवैया निहायत संवेदनहीन रहा. ऐसा ही मुंबई और गोवा के समुद्र तटों का पर्यावरण सुरक्षित रखने के लिए संघर्षरत गैरसरकारी संगठनों के साथ भी हुआ.
कनार्टक में एक स्वयंसेवी संस्था नागरिक सेवा ट्रस्ट ने दक्षिण कन्नड़ा, उडुपी और उत्तरी कन्नड़ा जिले के 320 किलोमीटर के समुद्र तट पर सीआरजेड क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन किया. पाया गया कि राज्य सरकार ने ही इस कानून की खूब धज्जियां उड़ाई हैं. दरअसल, पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर सीआरजेड कानून में इतनी गुंजाइश जरूर छोड़ी गई है जिसका दुरुपयोग रुतबेदार लोगों के लिए किया जा सके. यदि शहरी क्षेत्रों में सीआरजेड कानून को कड़ाई से लागू नहीं किया गया तो स्वच्छ निर्मल समुद्रों के तट भी कानपुर में गंगा या दिल्ली में यमुना की ही तरह हो जाएंगे.

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