फ़िरदौस ख़ान
देश में हज़ारों-लाखों ऐसी महिलाएं होंगी, जो अकेले दम पर अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं. इनमें से बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जिनके पति की मौत हो चुकी है. बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जिनका तलाक़ हो गया है और बहुत सी ऐसी महिलाएं भी हैं, जिनके पति उन्हें छोड़कर चले गए हैं. ऐसी हालत में बच्चों की अच्छी परवरिश करना, उन्हें शिक्षा दिलाना आसान काम नहीं है. आसान काम इसलिए नहीं है, क्योंकि भारत जैसे पितृ सत्तामक समाज में महिलाओं जो हर क़दम पर पुरुष के नाम की ज़रूरत पड़ती है. शादी से पहले उसे पिता के नाम की ज़रूरत होती है और शादी के बाद पति का नाम उसके लिए अनिवार्य कर दिया जाता है. लेकिन जिनके पिता नहीं हैं, पति नहीं हैं, वे महिलाएं कहां जाएं. क्या महिला का अपना वजूद ही उसके लिए काफ़ी नहीं है. जो महिला जननी है, जो पुरुष को जन्म देकर इस दुनिया में लाती है, समाज ने उसे इतना बेबस और मजबूर क्यों बना दिया है. शायद इसलिए कि पुरुष महिलाओं की शक्ति को जानता है, पहचानता है. उसे डर है कि जिस दिन महिला अपने अस्तित्व को, अपनी शक्ति को जान जाएगी, पहचान जाएगी, उस दिन वह उसकी ग़ुलामी से निकल जाएगी. महिलाओं को बांधने के लिए उसने तरह-तरह के नियम-क़ायदे गढ़े और महिलाओं को उन्हें मानने पर मजबूर किया. इसके लिए उसने महिलाओं का भी सहारा लिया. मगर अब वक़्त बदल रहा है. महिलाओं ने ख़ुद को समझनी शुरू कर दिया है. वे अपने अस्तित्व को जानने लगी हैं, अपनी शक्ति को पहचानने लगी हैं. नतीतजन, समाज में बदलाव की हवा चलने लगी है,  देश की सरकारें महिलाओं के हक़ में फ़ैसले करने लगी हैं. इसकी ताज़ा मिसाल है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)  द्वारा डिग्री पर पिता का नाम वैकल्पिक बनाने की दिशा में काम करना.

ग़ौरतलब है कि पिछले महीने महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर छात्रों के डिग्री प्रमाण पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता संबंधी नियम में बदलाव का आग्रह किया था. अपने पत्र में उन्होंने लिखा था, मेरी मुलाक़ात ऐसी कई महिलाओं से हुई, जो अपने पति को छोड़ चुकी हैं. ऐसी महिलाएं भारी कठिनाइयों का सामना कर रही हैं. उन्हें बच्चों का डिग्री प्रमाण पत्र लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. पिता के नाम के बग़ैर प्रमाण पत्र नहीं मिलता है. उन्होंने यह भी लिखा था कि शादी का टूटना अथवा पति से अलग रहना आज के दौर की कटु सच्चाई है. लिहाजा हमें अकेली मां के दर्द को समझना होगा. उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए नियमों में बदलाव करना वक़्त की मांग है. मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि छात्र अपनी इच्छा से माता या पिता के नाम का उल्लेख कर सकते हैं. हम इस विचार को पसंद करते हैं और हमें कोई आपत्ति नहीं है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मश्विरे पर मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की सैद्धांतिक सहमति के बाद यूजीसी यह क़दम उठाएगा.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि पिछले साल मेनका गांधी की पहल पर विदेश मंत्रालय ने अपना पासपोर्ट आवेदन नियम बदल दिया था. मेनका गांधी ने अकेली मां प्रियंका गुप्ता की उस ऑनलाइन याचिका का संज्ञान लिया था, जिसमें पासपोर्ट आवेदन पत्र से पिता के नाम की अनिवार्यता ख़त्म करने का अनुरोध किया गया था. इस संबंध में मेनका गांधी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखकर पासपोर्ट आवेदन पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता ख़त्म करने का आग्रह किया था. इसके बाद विदेश मंत्रालय ने ऐलान किया था कि पासपोर्ट आवेदन पत्र में माता या पिता में से किसी एक का नाम होना चाहिए. दोनों के नाम की ज़रूरत नहीं है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश में महिलाओं की हालत अच्छी नहीं है. अच्छी इसलिए नहीं है, क्योंकि आज भी उन्हें पुरुष से कमतर माना जाता है. उनके जन्म पर घर मातम पसर जाता है, जबकि लड़के के जन्म पर लड्डू बांटे जाते हैं. मंगल गीत गाए जाते हैं, उत्सव मनाए जाते हैं. यह बात अलग है कि उन्हें देवी मानकर पूजा जाता है. यही वह समाज है, जो एक तरफ़ मंदिर में रखी देवी की प्रतिमा की पूजा भी करता है, वहीं दूसरी तरफ़ महिलाओं की कोख में क्न्या भ्रूण की हत्या करता है. कभी कन्या भ्रूण की हत्या की जाती है, तो कभी जन्म के बाद उसकी हत्या कर दी जाती है. कभी ससुराल में घर की लक्ष्मी मानी जाने वाली बहू को दहेज के लिए ज़िन्दा जला दिया जाता है. इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अब महिलाओं ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी है. हालात बदलने लगे हैं. महिलाएं घर की चहारदीवारे से बाहर आकर पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं. सरकार भी महिलाओं के हक़ में लगातार अच्छे फ़ैसले ले रही है, जिससे उनकी ज़िन्दगी की मुश्किलें कम हो सकें.

हाल ही में सरकार ने नई राष्ट्रीय महिला नीति बनाने की भी बात कही है, जिसमें उन्हें कई अधिकार मिल जाएंगे. बहरहाल, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के फ़ैसले से उन महिलाओं को बहुत राहत मिलेगी, जो अकेले अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं. इससे उन बच्चों को भी फ़ायदा होगा, जिनके पिता उनके साथ नहीं हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार आगे भी महिलाओं के अच्छे फ़ैसले करती रहेगी. वैसे अकेली महिलाओं को अधिकार दिए जाने से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम उनका सम्मान करना सीखें. अगर समाज में महिलाओं के साथ होने वाले बुरे बर्ताव को ख़त्म कर दिया जाए और हमारी कथनी-करनी में कोई अंतर न रहे, तो किसी भी महिला को अपने पिता या पति से अलग रहना ही नहीं पड़ेगा. इसके लिए ज़रूरी है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएं. देश में महिलाओं के सम्मान से रहने लाय़क माहौल बनाएं.

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

Loading...

ई-अख़बार

Like On Facebook

Blog

  • ईद तो हो चुकी - एक शनासा ने पूछा- ईद कब है? हमने कहा- ईद तो हो चुकी... उन्होंने हैरत से देखते हुए कहा- अभी तो रमज़ान चल रहे हैं... हमने कहा- ओह... आप उस ईद की बात कर रहे हैं...
  • या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है... - *फ़िरदौस ख़ान* *मरहबा सद मरहबा आमदे-रमज़ान है* *खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा हुआ ईमान है* *हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है* *या ख़ुदा तूने अता फिर कर ...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

एक झलक

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं