सूर्यकांत द्विवेदी
औलाद से बढ़कर कुछ नहीं होता। औलाद के लिए आदमी अपना सब कुछ न्योछावर कर देता है। अपनी पूरी जिंदगी होम कर देता है। यदि किसी को अपनी औलाद को ही कुर्बान करने को कह दिया जाए, तो फिर? निश्चित रूप से ही कदम ठिठकेंगे। इस्लाम के इतिहास की एक अजीम-ओ-शान तारीख ऐसी है, जो इन तमाम सवालों के जवाब देती है। कहने को एक ही शब्द है- कुर्बानी। लेकिन इसका विस्तृत आकार है। जब बात राहे-खुदा की हो, तो ईद-ए-कुर्बां यानी ईद-उल-अजहा से जुड़ा वाकया याद आ जाता है।
ईद के मायने खुशी है। ईदुल फितर अल्लाह की तरफ से रोजों का तोहफा है, तो ईद-उल-अजहा राहे खुदा में बंदे का कुर्बानी का जज्बा। जज्बा दोनों ईद से जुड़ा है। इम्तिहान दोनों में है। दोनों में ही बंदे की आजमाइश है। दोनों में इनाम के बतौर अल्लाह-ताला खुशी अता फरमाते हैं। लेकिन कुछ नसीहतों के साथ। अल्लाह फरमाते हैं कि तेरा जज्बा ही मेरे पास पहुंचेगा। जानवरों का गोश्त या खून नहीं। आमतौर पर हम कहते भी हैं कि भावना से ही भक्ति बनी। अकीदे से ही अकीदत बना। अकीदा और जज्बा ही तुम्हारे साथ जाएगा, और कुछ नहीं। ईद-उल-अजहा का सबक भी यही है।
ईद-उल-अजहा दो खुशियां एक साथ देती है। अल्लाह के घर की जियारत यानी हज। और दूसरी कुर्बानी करके राहे खुदा में अपने जज्बे की आजमाइश। सुन्नते इब्राहीम ही कुर्बानी की रस्म है। इस्लाम के पांचों अरकान वास्तव में जज्बे की ही तर्जुमानी करते हैं। कलमा, नमाज और रोजा में कोई छूट नहीं है। यह फर्ज सभी पर आयद है। जकात और हज केवल सक्षम लोगों के लिए है। इस्लामिक मान्यता के मुताबिक, दुनिया में एक लाख 24 हजार नबी आए। हजरत इब्राहीम (अ) इसी में एक थे। एक बार अल्लाह ने हजरत इब्राहीम को ख्वाब में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया। उस वक्त उनकी उम्र 80 पार थी। एक बाप के लिए तो सबसे प्यारी चीज उसकी औलाद होती है। इब्राहीम ने अपने बेटे ईस्माइल को ख्वाब के बारे में बताया। ईस्माइल ने जवाब दिया कि आप को जो अल्लाह ने हुक्म दिया है, उसको पूरा करिए। अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएंगे। ईस्माइल ने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने उनको चुना। इब्राहीम घर से ईस्माइल को साथ लेकर चले। आंखों पर बांधने के लिए पट्टी और एक छुरी ली। एक मैदान में पहुंचे। बेटे की गर्दन पर छुरी चलाना चाहते थे, तभी अल्लाह ने फरिश्तों को हुक्म दिया कि जाओ और जाकर ईस्माइल की जगह दुंबा पेश कर दो। इब्राहीम ने छुरी चलाई, लेकिन ईस्माइल बच गए। दुंबा जिबह हो गया। तभी से कुर्बानी की रस्म चली आ रही है। इस पूरे वाकये में पिता-पुत्र, दोनों का इम्तिहान है। दोनों ही इसमें खरे उतरे।
इस ईद के बाद शुरू होगा मोहर्रम का महीना। यानी राहे हक और राहे खुदा में शोहदा-ए-कर्बला की अजीम दास्तान। सबब एक-सबक एक। अल्लाह एक है। वह सभी का पालनहार है। उससे लौ लगाओ। दिखावा न करो (कुर्बानी में भी)। अल्लाह दिखावा पसंद नहीं करता। लेकिन हाल-फिलहाल की विसंगतियां भी कम नहीं हैं। बकरों की कीमतों में बेतहाशा उछाल आ गया है। मोटा मुनाफा लेने के लिए बकरों को बेजा तरीके से मोटा किया जाता है। कई बार तो जानवरों ने दम भी तोड़ दिया। यह सब, इस्लामी उसूलों के खिलाफ है। यह भी नसीहत है कि हलाल के पैसों (सही रास्ते से हुई कमाई) को ही इसमें लगाया जाए। इस्लाम बेजा मुनाफे व दिखावा करने से परहेज की सलाह देता है, मगर यह सब आज आम है।
हालांकि एक बड़ा तबका सामाजिक तरक्की की दिशा में आगे आया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी जकात का पैसा लगने लगा है। उलेमा भी अपील करने लगे हैं कि कुर्बानी के पैसे का इस्तेमाल शिक्षा के क्षेत्र में करो। इदारे कायम करो। आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दो। दीन के साथ दुनियावी तालीम के रास्ते पर कुर्बानी देने की अपील का ही असर है कि अब बहुत नहीं, मगर कुछ शिक्षण संस्थाएं वक्त के साथ-साथ चल रही हैं। गरीब बच्चों की मदद के लिए भी लोग आगे आने लगे हैं। तमाम निजी संस्थाएं गरीब लोगों के इलाज में मदद करती हैं। यही कुर्बानी का मकसद है- अपने अजीजों और मोहताज लोगों की मदद।

(लेखक मुरादाबाद में दैनिक हिन्दुस्तान के स्थानीय संपादक हैं)

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