फ़िरदौस ख़ान
कश का विनाश इतालवी लेखक की पुस्तक द रुइन ऑफ कश का हिंदी अनुवाद है. यह एक अच्छी बात है कि विदेशी भाषाओं की श्रेष्ठ पुस्तकों का हिंदी अनुवाद आसानी से मिल जाता है. इस पुस्तक का अनुवाद बृजभूषण पालीवाल ने किया है. हक़ीक़त में यह किताब पश्चिमी संस्कृति, साहित्य, क्रांति और प्रबोधन की गाथा है. पैनोरामा मेस में इटालो काल्विनो लिखते हैं-द रुइन ऑफ कश, दो विषय लेती है. प्रथम है टैलीरॉ और दूसरा है बाकी सब चीजें. और बाकी सब चीजों में वे सब चीजें शामिल हैं, जो मानव इतिहास में घटित हुई हैं, सभ्यता की शुरुआत से लेकर आज तक. यह एक ऐसी पुस्तक है जो अपने आपको एक भटकन और आवारापन में उजागर करती है, अपनी कल्पना, मनमर्जी और कभी न तृप्त होने वाली जिज्ञासा से मार्गदर्शन प्राप्त करती है, और बनी हुई है टुकड़ों से, इधर-उधर भटकने से, कहानियों, लघुकथाओं और कहावतों से. यह सब इसलिए कि इसे एक अविरल आनंद के साथ पढ़ा जा सके.

सिविलिजेशन में जे टॉल्सन लिखते हैं-ऐसा लगता है कलासो ने मांग करती और कुरेदने वाली पुस्तक को बनाने में कम से कम एक राष्ट्रीय पुस्तकालय को खंगाला होगा. इसकी विषय वस्तु आधुनिक मस्तिष्क का छिछलापन है और आधुनिक संस्कृति की कार्यविधि के कारण ही जिसका कलासो ऐसी बारीकी से विश्लेषण करते हैं. मैं उस विश्लेषण का प्रयोग करने में हिचक रहा हूं ,जिसके योग्य यह पुस्तक सर्वथा है. मास्टर पीस सभी महान पुस्तकों की भांति यह पुस्तक हमें अधिक पढ़ती है और हम इसे कम पढ़ते हैं और कला या चिंतन की महान रचनाओं के समान ही यह आपको अपना जीवन बदलने के लिए विवश कर सकती है.

रॉबर्तो कलासो लिखते हैं- सबसे सहज और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहिए, क्या वैदिक संबंध सच्चे हैं. उनका अध्ययन करते समय हम धीरे-धीरे उनके अद्भुत पेचीदा जाल को, हर चीज़ पर फैला हुआ है, दोबारा बना लेते हैं. और जिस क्षण से हम संसार में प्रवेश करते हैं, हम यह देखने पर विवश हैं कि यह माचिस की तीलियों का विशाल गिरजाघर है, श्रेष्ठ और निरर्थक. हम जानते हैं कि जीवन स्वयं को किसी न कियी तरीके से, इनकी सहायता के बिना भी पुन उत्पन्न कर लेता है. फिर भी हम गुंजन की उन परतों की ओर, जो हर चीज़ को अपने अंदर लपेटे हुए है, अदम्य रूप से आकृष्ट होते हैं. और हम चाहें जो कुछ सोचें एक बिंदु पर हम यह अनुभव करते है. कि न चाहते हुए भी हम उस अधडूबे लबादे के एक कोने का प्रयोग करते हैं. वैदिक संबंधों को पूरी तरह अस्वीकार करने में सफ़ल होने वाला जीवन का एकमात्र स्वरूप बैन्थम का है, हमारा फ़राओ आज लंदन में एक ममी है. एक अनजान जीवन. वैदिक संबंध भव्य रूप में निरर्थक हैं तो बैन्थम भव्य रूप से अपर्याप्त. हम अधर में लटके रहे हैं, भटकते हुए.
किसी ऐसे व्यक्ति के होठों पर बलिदान की भाषा सर्वाधिक घिनौनी या काल्पनिक लगती है, जो उसके आधार वाक्य को नहीं जानता. किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों बलिदान का कर्म अत्यंत विध्वंस भरा लगता है जो इसके आधार वाक्य तक को नहीं जानता. किसी ऐसे व्यक्ति से बलिदान संबंधी शब्द सुनने और इसके हाव-भावों को देखने से अधिक बुरा कुछ नहीं जो इसके आधार वाक्य तक को नहीं जानता. वरुण वह उद्गम है जो जीवन को रोकता है और जिसके बिना जीवन असंभव है. जीना शुरू करने के लिए वरुण के फंदे कटने चाहिए और जीते रहने के लिए हमें आदिकालीन द्रव से गीला होने, इससे जुड़ने की ज़रूरत है.

वर्षों के शोध के पश्चात दो बडे़ विद्वान वैदिक ऋषियों के विषय में यह कहते हैं- लिलियन सिल्बर्न के अनुसार, वैदिक ऋषि की दृष्टि में तात्कालिक, आदिकालीन के अनंत, अनेक रूपाकार वाले, जटिल पहलू हैं. दिन के बाद दिन आने की कोई गारंटी नहीं है और ब्रह्मांड की स्थिरता निरंतर ही पुन स्थापित की जानी है. वैदिक ब्रह्मांड, व्यवहार में क्षोभ, संकुचन और दबाव का दुख भरा ब्रह्मांड है, जो उद्गम के गहरे अंधेरे सागर की सी छवि लिए हुए है. वैदिक ऋषि के लिए कुछ भी निश्चित नहीं है. मानव जीवन या नहीं, सूर्योदय, या पानी का गिरना भी नहीं.  इस प्रकार ऋग्वेद की अधिकांश ऋचाएं एकाकी योजना के अनुरूप हैं. जिस ईश्वर का आह्वान किया जाता है उसे फिर बतलाया जाता है कि वह उसी कल्याणकारी, सहायक कार्य को करे, जो उसने बहुत पहले किसी ब्रह्मांडीय अथवा श्रेष्ठ बलिदानी व्यक्ति के लिए किया था और अंतिम ऋचाओं में उससे विनय की गई है कि वह उसी कार्य को अगले सूर्योदय के समय पुन करे, क्योंकि लोग सामान्यत उस क्षोभ से बचना, रक्षित होना चाहते हैं, जो रात्रि में किसी सहारे के अभाव में उन्हें घेर लेता है.

जेसी हीस्टरमैन के मुताबि़क, वैदिक चिंतन के लिए समूचा विश्व निरंतर दो ध्रुवों के बीच घूमता रहता था. जन्म और मृत्यु समग्रीकरण और विखंडन, आरोहण और अवरोहण के धु्र्वों के बीच जो अपनी अंतर्क्रिया द्वारा ब्रह्मांड में एक चक्रीय लय उत्पन्न करते हैं.
अंत में, यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि इस पुस्तक के बिना आपकी लाइब्रेरी अधूरी है.

समीक्ष्य कृति : कश का विनाश
लेखक : रॉबर्तो कलासो
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 432
मूल्य : 600 रुपये

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