प्रसून लतांत
महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी मोहनदास गांधी से छह महीने बड़ी थी और यह बात गांधी जी को हजम नहीं होती थी। दोनों जब तक माता—पिता नहीं बने थे तो उम्र के सवाल पर झगड़ भी जाते थे। गांधीजी के दाम्पत्य जीवन की ऐसी बातें हैं, जो आज भी परदे में ही छिपी हुई है।
महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी जीवन पर 'पहला गिरमिटिया’ नाम से एक महत्वपूर्ण उपन्यास लिखने वाले गिरिराज किशोर ने अब 'कस्तूरबा’ के जीवन और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में उनके योगदान पर 'बा’ उपन्यास लिखा है। इस उपन्यास में कस्तूरबा और गांधी जी के दाम्पत्य जीवन के कई अनछुए प्रसंगों को शामिल किया गया है।
गिरिराज किशोर बताते हैं कि बा के बारे में अनेक भ्रम हैं। वे गांधी जी की अनुगामिनी थीं। मैंने 'बा’ उपन्यास का आरंभ कस्तूरबा गांधी की स्वतंत्र प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए किया है। बालपन मोनिया (महात्मा गांधी) और कस्तूर साथ—साथ खेलते थे। मोनिया यह बात मानने के लिए तैयार ही नहीं था कि कस्तूर मोनिया से छह महीने बड़ी है। कस्तूर इस बात पर अड़ी रहती थी कि मोनिया उससे छह महीने छोटा है। इस बात पर आपस में खेल तक बंद हो जाता था।
कस्तूरबा गांधी का जन्म 11 अप्रैल 1862 में महात्मा गांधी की तरह काठियावाड़ के पोरबंदर नगर में हुआ था। कस्तूरबा महात्मा गांधी जी से छह महीने बड़ी थीं। कस्तूरबा के पिता गोकुलदास मकनजी साधारण व्यापारी थे। कस्तूरबा उनकी तीसरी संतान थीं। उस जमाने में कोई लड़कियों को पढ़ाता नहीं था और शादी भी कम आयु में कर दी जाती थी। इसलिए कस्तूरबा भी बचपन में निरक्षर थीं और सात साल की अवस्था में छह साल के मोहनदास के साथ सगाई कर दी गई। तेरह साल की आयु में इन दोनों का विवाह हो गया। महात्मा गांधी ने उन पर शुरू से ही अंकुश रखने का प्रयास किया और चाहा कि कस्तूरबा बिना उनसे अनुमति लिए कहीं न जाएं, लेकिन वे उन्हें जितना दबाते उतना ही वे आजादी लेतीं और जहां चाहतीं चली जातीं।
महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी शादी के बाद 1888 तक लगभग साथ साथ ही रहे लेकिन गांधी जी के इंग्लैंड प्रवास के बाद से लगभग अगले बारह वर्ष तक दोनों प्रायः अलग—अलग से रहे। इंग्लैंड से लौटने के तुरंत बाद गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका चला जाना पड़ा। जब 1896 में वे भारत आए तब कस्तूरबा को अपने साथ ले गए। तब से कस्तूरबा गांधी जी का अनुगमन करती रहीं। उन्होंने गांधी जी की तरह अपना जीवन भी सादा बना लिया था। वे गांधीजी के देश सेवा के महाव्रतों में सदैव उनके साथ रहीं। गांधी जी के अनेक उपवासों में कस्तूरबा प्रायः उनके साथ रहीं और उनकी सार संभाल करती रहीं। जब 1932 में हरिजनों के मुद्दे पर गांधी जी ने यरवदा जेल में आमरण उपवास शुरू किया, उस समय कस्तूरबा साबरमती जेल में थी। उस समय वह बहुत बेचैन हो उठीं और उन्हें तभी चैन मिला जब वे यरवदा जेल भेजी गईं।
दक्षिण अफ्रीका में जब गैर ईसाई शादियों को एक कानून पास कर रद्द कर दिया गया तो गांधी जी ने इसके खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया और स्त्रियों से भी इसमें शामिल होने की अपील की लेकिन इसके लिए कस्तूरबा से नहीं कहा तो वे दुखी हुईं और उन्होंने गांधीजी को ताने मारे। फिर स्वयं इच्छा से सत्याग्रह में शामिल हुईं और जेल भी गईं। जेल में जो खाना मिलता था ठीक नहीं था तो कस्तूरबा ने जेल में उपवास किया। उनके उपवास के कारण अधिकारी झुके। दक्षिण अफ्रीका के मुकाबले कस्तूरबा भारत में स्वाधीनता आंदोलन के हरेक मोर्चे पर गांधी जी के साथ रहीं। चम्पारण सत्याग्रह के दौरान भी कस्तूरबा महिलाओं के बीच शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए काम करती रहीं।
गिरिराज किशोर कहते हैं कि विवाह के बाद कस्तूरबा ने अपने सभी दायित्व को बखूबी निभाया लेकिन बिना कुछ बोले अपने आत्मसम्मान की रक्षा की। जब गांधी जी ने अपने मित्र शेख की सलाह पर बा को बच्चे के साथ पीहर भेज दिया तो उन्होंने वहां जाकर अपने माता—पिता से यही कहा कि बेटे को नाना—नानी से मिलाने लाई हूं। ससुराल में भी जिक्र नहीं किया। कस्तूरबा पारिवारिक संबंधों को सर्वोपरि रखती थीं। वे व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों पर पुनर्विचार करती थीं। जब हरिजन परिवार आश्रम में आकर रहने लगा तो औरों के साथ वे भी इस बात से नाराज थीं। बापू को सब छोड़कर आश्रम से चले गए लेकिन कस्तूरबा अपने निर्णय पर विचार करती रहीं। एक दिन हरिजन परिवार की बच्ची को खेलते देखकर उनका मन नहीं माना और बच्ची को गोद में उठा लिया। कस्तूरबा का मन उस बच्ची के कारण बदल गया था। जातीय और धर्म की गांठ खुल गई थी। वे बापू के पीछे आश्रम की देखभाल का दायित्व निभाती थीं। यही नहीं गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन के समय एक दिन पहले गिरफ्तार हो गए थे। अगले दिन बापू को जनसभा को संबोधित करना था। बैठक हुई। उसमें सवाल था कि मुंबई में जनसभा को अब कौन संबोधित करेगा। कस्तूरबा ने कहा कि मैं करूंगी। उन्होंने किया और सुशीला नैयर के साथ गिरफ्तार हो गईं। बाद में आगा खां महल में 22 फरवरी, 1944 को 74 साल की उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया। वे वीरांगना थीं।
कस्तूरबा आजीवन महात्मा गांधी के हर निर्णयों में साथ रहीं लेकिन आज लोग केवल महात्मा गांधी के योगदान के बारे में ही ज्यादा जानते हैं और कस्तूरबा का परिचय उनकी पत्नी तक सीमित रहा। लेकिन वह केवल किसी की पत्नी नहीं थीं बल्कि राष्ट्र के निर्माण में और स्वाधीनता आंदोलन में भी उनका अतुलनीय योगदान रहा था। गांधी जी पर देश—दुनिया में हजारों किताबें लिखी गईं लेकिन कस्तूरबा पर आज भी चार—पांच किताबें ही लिखी गईं। गिरिराज किशोर कहते हैं कि जेल में कस्तूरबा पर शोध करने लगे तो उन पर उन्हें मात्र दो ही पुस्तकें मिलीं।
गनीमत है कि गांधी जी की डेढ़ सौवीं जयंती मनाने की तैयारी में जुटे गांधीजन और उनकी संस्थाएं अब कस्तूरबा की डेढ़ सौवीं जयंती साथ—साथ मनाएंगे। कार्यक्रमों में कस्तूरबा गांधी के योगदानों को विशेष तवज्जो दिया जा रहा है।

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