भेदभाव की शिकार लड़कियां

Posted Star News Agency Thursday, February 22, 2018

प्रसून लतांत
देश और दुनिया में पुरुष जाति के अलावा हमारे बीच मां, बहन, पत्नी, बेटी और दोस्त, सहयोगी बनकर जो स्त्री जाति मौजूद रहती है, उसकी उपेक्षा का दौर खत्म होना चाहिए। संविधान में समान महत्व पाने के बावजूद स्त्रियों के साथ भेदभाव के कारण घर और समाज के अंतरतम तहों तक जो कमजोरियां आ रही हैं, जो असंतुलन पैदा हो रहा है, इनके कारण पुरुषों के ही सामने नई—नई तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं। दुल्हन के लिए लड़कियां नहीं मिल रही है, लड़कियों की तस्करी और खरीद—फरोख्त होने लगी है।
अपना देश टेक्नोलॉजी के साथ आगे बढ़कर विश्वगुरु होने का दावा कर रहा है लेकिन यह सोच बहुत कम गति में स्वीकार्य हो रहा है कि स्त्रियों को भी पुरुषों के समान महत्व मिलना चाहिए। देश का कोई भी राज्य हो, सभी जगह यही सोच स्थापित है कि स्त्रियां पुरुषों से एक सीढ़ी नीचे होती हैं। जब तक अधिकतम लोग नहीं मानेंगे कि स्त्री—पुरुश बराबर है तब तक स्त्रियों की तरक्की के रास्ते में बाधाएं आती रहेंगी। स्त्रियों को कुप्रथाओं और परिस्थितियों से मुक्त करने का प्रयास नहीं होगा तो भारत आगे नहीं बढ़ेगा और यह लड़कियों को लड़कों के समान दर्जा देकर विकसित करने से होगा।
स्त्री—पुरुष बराबरी की बात आजादी की लड़ाई के दिनों से की जा रही है लेकिन संसद और विधानसभाओं में बराबर की हिस्सेदारी नहीं दी जा रही है। बराबर की हिस्सेदारी मिली होती तो इसका संदेश देश के कोने—कोने में जाता और लड़कियों के बारे में सोचने के तरीकों में बदलाव आता। अपने देश में स्त्री नाम की प्राणि, जो भले भिन्न है लेकिन घर परिवार और समाज में उनके निर्णयों की भागीदारी नहीं बढ़ रही है। स्त्रियां केवल आदेशों के पालन के लिए विवश हैं। सार्वजनिक पदों पर निर्वाचित होकर भी सार्वजनिक निर्णय नहीं ले पाती हैं। आलम यह है कि हम महिलाओं—लड़कियों को लेकर जो भी दिक्कतें आती हैं उनका कोई समाधान खोजने—करने की तत्परता दिखाने के बजाय कोख में ही उसकी भू्रण हत्या यकी संख्या बढ़ाने में लग गए हैं। अब ज्यादा भ्रूण हत्या के मामले में अकेले हरियाणा कलंकित नहीं है, जहां से केंद्र ने ट्टबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की योजना की शुरूआत की है। हरियाणा की तरह कन्या भ्रूण हत्या मामले में गुजरात और महाराष्ट्र भी आगे बढ़ गया है। इस मामले में कानूनी रोक के बाद डॉक्टर भी बढ़—चढ़कर भागीदार बन रहे हैं। पिछले तीस सालों में भारत में 15 करोड़ लड़कियों की हत्या की जा चुकी है, बावजूद हत्या का दौर रूक नहीं रहा है बल्कि दूसरे विकसित राज्यों में भी यह चलन बढ़ रहा है। हम बेटी बचा नहीं रहे और जो बच रही है उनके लिए भी गंभीर नहीं हैं।
गांधी स्मृति और दर्शन समिति, नई दिल्ली के मार्गदर्शन पर युवा स्वास्थ्य समाजकर्मी और स्वस्थ भारत ट्रस्ट के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ट्टस्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ का संदेश लेकर पूरे भारत की यात्रा पर निकले हैं। आशुतोष देशभर की लड़कियों से संवाद कर उनके बीच स्वस्थ होने की चेतना फैला रहे हैं। इस स्वस्थ भारत यात्रा केक दौरान मुझे महाराष्ट्र और गोवा के साथ दक्षिण के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के शहरी क्षेत्रों के स्कूल, कॉलेजों की हजारों छात्राओं से संवाद करने का मौका मिला। संवाद के दौरान अनेक सवालों के जवाबों का निचोड़ यही है कि स्त्रियों के साथ भेदभाव देश के हरेक क्षेत्र में होता है। उन्हें अस्तित्व के लिए अनेक प्रताड़नाओं को झेलना पड़ता है। उन्हें आज भी आसानी से इंसाफ नहीं मिलता। यौन हमले आम बात है। ऐसे में लड़कियां कैसे स्वस्थ बनाएं। उनकी सुरक्षा पर ज्यादा चिंता होती है पढ़ाने पर कम ध्यान दिया जाता है। यह स्थिति शहरी इलाकों की है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी कोई सीमा नहीं है। वहां तो कुप्रथाओं और अंधविश्वासों के चलते उसे सामाजिक महत्व की प्राणि भी नहीं समझा जाता है।
तमिलनाडु के विभिन्न शहरों के स्लम्स इलाके में महिलाएं एकदम सुरक्षित नहीं है। प्रशासन भी उनके हित में कुछ नहीं कर पा रहा है। पुलिस महिलाओं पर अत्याचार करने वालों पर कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही चुप रहकर सहने कहती है। कुछ महिलाएं विद्रोह कर रही हैं लेकिन ऐसा करना सभी के लिए संभव नहीं है क्योंकि उनमें जागरूकता का अभाव है। राज्य की राजधानी चेन्नई में बसंत नगर, सैदापेट सीमेंचरी, कैसीमडू, रामापुरम और व्यासर पाड़ी की बस्तियों में हर दूसरी औरत यौन हिंसा झेलती हैं, लेकिन दस फीसद महिलाएं ही यह सब किसी से साझा करती हैं। रामेश्वरम और कन्या कुमारी आदि क्षेत्रों में तमिल की अश्लील फिल्मों के कारण मां—बाप लड़कियों की शादी कम उम्र में कर रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार इन क्षेत्रों में 15 साल की उम्र में ही शादी कर दी जाती है, भले ही दुल्हा उससे कई साल बड़ा क्यों न हो। 40 फीसद महिलाएं प्राइमरी तक ही पढ़ पाती हैं। बहुतों को स्कूल इसलिए छोड़ देना पड़ता है कि उनके पास पीरियड्स के दिनों के लिए सैनिटरी नैपकीन नहीं थे। पढ़ी—लिखी ग्रेजुएट लड़की के लिए जीना आसान नहीं है। महिलाओं को वर्कप्लेस पर लैंगिक भेदभाव और यौन पड़ताड़ना की धमकी दी जाती है। बहुत सी पढ़ी—लिखी महिलाएं ठेला लगा कर आजीविका पर उतर रही हैं। सरकारी स्तर पर उनके सशक्तीकरण के कोई उपाय नहीं हैं। शराब के नशे के कारण आम महिलाओं का जीवन जीना दूभर हो गया है पर शराब बंदी नहीं हो रही है। राज्य सरकार ने पांच सौ सरकारी दुकानें बंद कर दी हैं पर इससे क्या सैकड़ों शराब की दुकानें सत्तारूढ़ दल चला ही रहे हैं और राजनेताओं में नीतीश कुमार की तरह राजनीतिक दृढ़शक्ति नहीं है। रामेश्वरम में लड़कियों के पढ़ने के लिए कोई कॉलेज नहीं है और गरीब मां—बाप के लिए साठ किलोमीटर रामनाथपुरम आने—जाने के लिए खर्चे लायक पैसे नहीं हैं। इस इलाके में लड़कियों में कुपोषण की समस्या है। वे सिर्फ समुद्री मछली और भात खाती हैं। इसके अलावा और कुछ नहीं खाती हैं। डेंगू, मलेरिया की चपेट में भी आती हैं।
आन्ध्र प्रदेश के हैदराबाद के एक पब्लिक स्कूल में लड़कियों में काफी उत्साह दिखा, आपसी सद्भाव भी दिखा और आगे बढ़ने की ललक भी दिखी पर यह तो शहर के स्कूल का हाल था पर इन लड़कियों ने माना कि उनके साथ भी भेदभाव होता है। हालांकि वे खुद आगे बढ़कर मुकाबला करना चाहती हैं पर इस राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों की हालत अत्यंत दयनीय है। आंध्र प्रदेश में रोजगार के प्रभाव में गरीब महिलाओं को सेक्स वर्कर बनने पर मजबूर होना पड़ता है। दलाल उन्हें तीन हजार महीना तनख्वाह देता है और उस पर दिल्ली जाने का दबाव भी डाला जाता है और जब वह तैयार होती है तो उसे बेच दिया जाता है। शराब के कारण आंध्र की महिलाएं भी तबाह हो गई हैं और यही हाल तेलंगाना का भी है। आर्थिक नुकसान के साथ महिलाएं शराबी पति और अन्य की यौन हिंसा की शिकार भी होती हैं।
केरल जहां लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है और देश के पैमाने पर वे शिक्षित भी ज्यादा संख्या में हैं और पढ़—लिखकर वे अपने पैरों पर खड़ी भी हो जाती हैं, फिर भी वे आत्महत्या के लिए मजबूर होती हैं। केरल में आए दिन विषाद ग्रस्त होने के कारण महिलाएं आत्महत्या कर लेती हैं। इसके पीछे शराब के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक और लैंगिक कारण भी हैं। विवाह की विफलता, घरेलू हिंसा और छेड़छाड़ व बलात्कार के कारणों से भी केरण महिलाओं द्वारा अधिक संख्या में आत्महया करने वाले राज्य के रूप में शूमार किया जाने लगा है। केरल में बाकी समुदायों की लड़कियां आगे बढ़ रही हैं पर वहां के आदिवासी समुदाय की लड़कियां आज भी बहुत पिछड़ी हैं और सरकार और राजनैतिक दलों का उनकी ओर ध्यान भी नहीं जाता।
यात्रा के क्रम में पाया कि महाराष्ट्र और गोवा में भी बेटियों को लेकर वैसे ही भेदभाव होते हैं जैसे उत्तर भारत में। गरीब बेटियों का ख्याल करते हैं पर मध्यमवर्गी समुदायों में बेटियों के साथ भेदभाव होते हैं। महाराष्ट्र में तो लोग अब कन्या भ्रूण हत्या मामले आगे बढ़ने की कोशिश में हैं। बहुत अधिक पैसे खर्च कर डॉक्टर बनने वाले लोग भी इन मामले में निर्ममता की हद पार कर रहे हैं। पुणे में तो डॉ. गणेश राख मुलगी बचाओ अभियान में जुटे हैं। उनकी राय में आमतौर पर ज्यादातर लोग बेटियों के जन्म पर उदास हो जाते हैं और उसकी सेहत की भी परवाह नहीं करते। बेटे के जन्म पर बड़े उत्साहित होते हैं और उसके लिए सब कुछ करने में पीछे नहीं होते। डॉ. राख बच्ची का जन्म देने वाली महिलाओं से कोई फीस नहीं लेते और ऐसा करने के लिए दूसरे डॉक्टर और हॉस्पिटल से भी अपील करते हैं, लोग तैयार हो रहे हैं। वे महाराष्ट्र में बढ़ती कन्या भ्रूण हत्या, लड़की के जन्म लेने के अधिकार और लड़कों की तरह लड़कियों को समान महत्व देने के लिए खुद से शुरू किए आंदोलन को जनांदोलन बनाने में जुटे हैं। महाराष्ट्र में मां को रसोईघर में बेटियां ही मदद करती हैं बेटे नहीं। इसे हजारों लड़कियों ने बताया। महाराष्ट्र में लड़कियां किसानी करने वाले लड़के से शादी नहीं करने और अब्बल कि कोई लड़का भी किसानी नहीं करना चाहते पर लाखों की संख्या में आत्महत्या करने वाले किसान अपनी पत्नी को विधवा बनाकर छोड़ जाते हें— उन विधवाओं के हित में कितना कुछ सरकार या समाज से हो पा रहा है, वह जग जाहिर है।
स्वस्थ यात्रा के दौरान विभिन्न राज्यों में लड़कियों ने विभिन्न संवादों के दौरान बताया कि दवाओं का इस्तेमाल जरूर करती हैं लेकिन उनके बारे में जानती नहीं। एकाध ही लड़की मिली जिसने बताया कि 15 साल की उम्र तक में उसने कोई दवा इस्तेमाल नहीं किया। नहीं तो बालिकाओं का स्वास्थ्य डिब्बाबंद और फास्ट फूड जैसी बस्तुएं इस्तेमाल के कारण दयनीय हो रहा है। स्वास्थ्य सेवओं का इतना बुरा हाल है कि देशभर में हर साल 77000 से अधिक महिलाएं केवल गर्भवती होने के कारण मौत के मुंह में चली जाती हैं। हालांकि केंद्र और राज्य द्वारा विभिन्न स्वास्थ्य और चिकित्सा की योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं पर इन योजनाओं का लाभ कहां सभी को मिल पाता है। स्वस्थ रहने की देश के लोगों के पास जो जानकारियां थीं, वे सब लुप्त हो गई हैं। जीवनशैली, खान—पान और रहन—सहन के साथ बदलते पर्यावरण के कारण लड़कियों के लिए स्वस्थ रहना मुश्किल हो रहा है। बेटियों को बचाने, पढ़ाने और उन्हें आगे बढ़ाने की दिशा में अभी बहुत कुछ करना बाकी है।


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