जावेद अनीस 
पूर्वोत्तर भारत के तीनों राज्यों , मेघालय और नागालैण्ड के विधानसभा चुनाव में जीत के साथ ही  भाजपा को उत्तरी-पूर्वी राज्यों में निर्णायक बढ़त हासिल हो गयी है. पिछले कुछ सालों के दौरान  भाजपा ने एक के बाद राज्यों को जीतकर या गठबंधन में भागीदारी करके भारतीय राजनीति में वो मुकाम हासिल कर लिया है जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था. लेकिन इन सब में भगवा खेमे के लिये सबसे खास त्रिपुरा की जीत है जहाँ उसने अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी वाममोर्चे के सबसे मजबूत माने जाने वाले गढ़ को भेद दिया है. त्रिपुरा भले ही एक छोटा राज्य हो लेकिन इस जीत का बड़ा प्रतीकात्मक महत्त्व है, एक तरफ जहाँ भारत का लेफ्ट, लिबरल और सेक्यूलर खेमा भगवा खेमे की इस अभूतपूर्व बढ़त से हतप्रभ है वहीँ भगवा खेमा अपनी इस उपलब्धि से संतुलन खोता नजर आया जिसकी परिणीति त्रिपुरा में हिंसा और लेनिन की मूर्ति टूटने में नजर आयी. यह जीत भाजपा के लिए बहुत मायने रखने वाली है और इसमें दोनों वैचारिक खेमों के लिये गहरे सन्देश छिपे हैं .
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने त्रिपुरा में भाजपा की जीत को विचारधारा की जीत बताया है, नतीजे आने के बाद  भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह से वास्तुशास्त्र में घर का उत्तर-पूर्वी कोना सबसे महत्वपूर्ण होता है, भाजपा के लिए भी वहां के राज्यों में मिल रही जीत काफी मायने रखती है. यह जीत इस लिये भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा के सामने मोर्चे पर मानिक सरकार जैसा मुख्यमंत्री था जिसकी इमानदारी और सादगी के सामने विरोधी भी नतमस्तक हो जाते हैं वे भारतीय राजनीति में विलुप्त होते जा रहे सादगी और नैतिकता की ऐसी दुर्लभ मिसाल हैं जो आज के दौर की राजनीति में अब देखने को नहीं मिलती है.
त्रिपुरा में भाजपा को मिली जीत जादुई है, जीरो से सत्ता हासिल करने के उसके इस सफ़र की मिसालें भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक दी जाती रहेंगीं. त्रिपुरा के  पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को कोई भी सीट नहीं मिली थी और उसे मात्र केवल डेढ़ प्रतिशत वोट हासिल हुये थे यहां तक कि उसके ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी. लेकिन इसके बाद के सालों में उसका सफर असाधारण है अब 2018 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है जहां भाजपा को दो तिहाई बहुमत के साथ जीत हासिल हुयी है.

दरअसल पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाजपा ने पूर्वोत्तर में बहुत ही सधी हुयी रणनीति के तहत काम किया है संघ का पहले से ही वहां काम था ही साल 2014 में संघ प्रचारक सुनील देवधर को त्रिपुरा की जिम्मेदारी दी गयी जो 25 सालों से त्रिपुरा के आंचलिक इलाकों में काम कर रहे थे, फिर राम माधव को उत्तरपूर्व भेजा गया, लेकिन हेमंत सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होना  भाजपा के लिये पूर्वोत्तर में गेमचेंजर साबित हुआ, इसी वजह से 2016 में भाजपा को असम में सरकार बनाने में कामयाब होती है और अब तीन राज्य और उसके खाते में जुड़ चुके हैं .
तीन राज्यों के मतगणना के समय कांग्रेस मुखिया राहुल गांधी विदेश में थे और चुनाव नतीजे पर भी उनका बयान दो दिनों के बाद आता है इसपर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने राहुल को निशाने पर लेते हुये कहा कि कोई भी जिम्मेदार नेता अपने कार्यकर्ताओं को इस तरह से छोड़कर नहीं भाग सकता है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी चुटकी लेते हुये कहा कि, ‘वॉट्सएप पर मैसेज आया है कि इटली में भी चुनाव है.’ जाहिर है पार्टी अध्यक्ष बनने के बावजूद अभी भी उनकी टायमिंग नहीं सुधरी है और अहम मौकों पर उनके गैर-मौजूद रहने का सिलसिला बना हुआ है.कांग्रेस पार्टी को अपना नया अध्यक्ष मिलने के बाद भी उसके सिमटने का सिलसिला बना ही हुआ है पहले गुजरात, हिमाचल प्रदेश और अब पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के नतीजों ने कांग्रेस एक बार फिर से सदमा दे दिया है हालांकि इस दौरान कांग्रेस पार्टी को कुछ उपचुनावों भले ही सफलता मिली हो लेकिन उसमें राहुल गाँधी का योग्यदान नहीं माना जाएगा. जाहिर है राहुल के लिये मोदी को चुनौती देने से पहले अपनी  पार्टी को पटरी पर लाने की चुनौती बनी हुयी है .
इधर लेफ्ट के लिये त्रिपुरा गवाने के बाद  अब केरल ही इकलौता ऐसा राज्य रह गया है जहां उनकी सरकार है. त्रिपुरा में वाम दलों लगातार पच्चीस सालों से सत्ता में थे बंगाल हारने के बाद एक तरह से त्रिपुरा वामपंथी दलों का बचा हुआ आखिरी किला था. चूंकि केरल में हर पांच साल बाद सरकार बदल जाने का रिवाज है इसलिये वहां के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है. आज अगर भारत का संसदीय वामपंथ अपने आप को सबसे कमजोर स्थिति में पा रहा है तो इसमें खुद उसका भी कम योग्यदान नहीं है सच्चाई तो यह है कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में इतने लम्बे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद देश के सामने वे अपना कोई  मॉडल पेश करने में विफल रहे.

इस सबसे अलग भाजपा दिल्ली, बिहार और पंजाब जैसे झटकों के बावजूद बहुत ही गंभीरता और शिद्दत के साथ पूरे देश में अपने विस्तार के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है. भगवा खेमे के लिये इससे पहले 2014 और फिर 2017 का साल बहुत खास साबित हुआ था जिसमें उसे  उत्तरप्रदेश जैसे सूबे में भारी  जीत मिली थी जिसके बाद अपने विवादित बयानों के लिये कुख्यात योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे का सीएम बना दिया गया था .
लेकिन यह महज चुवानी विस्तार और सत्ता की लड़ाई तक सीमित नहीं है नहीं है बल्कि यह विचार और नजरिये की लड़ाई है जिसे विपक्ष को समझना होगा. 2014 के बाद से बहुत ही सजग तरीके से इस देश, समाज और राज्य को पुनर्परिभाषित करने की कोशिशें की गयी हैं. आज देश की राजनीति और समाज में दक्षिणपंथी विचारधारा का दबदबा है और इस मामले में वो अपने स्वाभाविक प्रतिद्वंदी वामपंथी खेमे से बहुत आगे निकल चुके हैं. जानना दिलचस्प होगा कि भारत में में इन दोनों ही विचारधाराओं का उद्भव लगभग एक ही समय पर हुआ था आज हम देखते हैं कि वामपंथी अपने  सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ संघ परिवार अपने इतिहास के सबसे सुनहरे वक्त में दाखिल हो चूका है.सत्ता और बदलाव की राजनीति में वही ताकतें कामयाब हो पाती है जो समय रहते जनता की नब्ज और बदलाव को लेकर उसकी आकांक्षाओं को समझ पाती हैं और बदलाव का वाहक बनने के लिये तैयार होती हैं, आज संघ परिवार” के बरअक्स देश और समाज में कोई विकल्प दिखाई नहीं पड़ता है.
भारतीय राजनीति के इतिहास में विपक्ष शायद ही कभी इतना हताश और दिशाहीन दिखाई पड़ा हो. पिछले चार सालों के दौरान विपक्ष एकजुट होना और काउंटर नैरेटिव पेश करना तो दूर की बात है वे अभी तक अपने अंदरूनी विरोधाभाषों को भी दूर नहीं कर पाये हैं. भारत की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएम अभी तक इस पहेली को ही हल करने में उलझी पड़ी है कि उसके लिए भाजपा बड़ी दुश्मन है या कांग्रेस ?. खुद कांग्रेस भी अपने आपको नेहरु के धर्मनिरपेक्ष विरासत और नरम हिन्दुतत्व के दोराहे पर खड़ा पा रही है.
विपक्ष को समझना होगा कि उनका सामना  हमेशा चुनावी मूड में रहने वाली मोदी-शाह की भाजपा से है जिसके पीछे संघ पूरे ताकत से खड़ा है. भाजपा की शीर्ष जोड़ी चौबीसों घंटे की राजनीति करती है और बहुत ही  निर्ममता के साथ अपने विरोधियों का सफाया करने के प्रति प्रतिबद्ध है आने वाले महीनों में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है जहाँ भाजपा लम्बे समय से सत्ता में है और इन सभी राज्यों में भाजपा का मुख्य मुकाबला कांग्रेस से है. कांग्रेस के लिए इन चार राज्यों के चुनाव आखिरी मौके की तरह है अगर वो दूसरी छोटी पार्टियों को एकजुट करते हुए सही रणनीति के साथ चुनाव नहीं लड़ती है तो फिर उसे कोई दूसरा मौका शायद ही मिले .
त्रिपुरा की  हार सभी पार्टियों के लिये एक यह  संदेश है कि अगर वे एकजुट नहीं होती हैं तो उनके सामने आस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा. इसलिये 2019  से पहले उन्हें  साझा कार्यक्रम पेश करते हुए साथ आना होगा. यह ना केवल उनके  बल्कि भारतीय लोकतंत्र के हित में भी होगा .

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