फ़िरदौस ख़ान
सियासत का मौसम कब बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. ये सियासत की ही ज़मीन है, जो सावन में भी ख़ुश्क रह जाए और सूखे में भी बिन बादल भीग जाए. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को ही लें. कर्नाटक में पहली बार उन्होंने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर सबको चौंका दिया है. चौंका इसलिए दिया है, क्योंकि सियासी गलियारे में अभी तक यही माना जा रहा था कि अगर 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस जीत हासिल करती है, तो वे अपने किसी क़रीबी और विश्वसनीय व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे. वे ख़ुद अपनी मां सोनिया गांधी की तरह पार्टी संगठन का ही काम देखेंगे और सरकार पर नज़र रखेंगे.  लेकिन राहुल गांधी के एक बयान ने सियासी माहौल को गरमा दिया है.

प्रधानमंत्री बनने के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, मैं क्यों पीएम नहीं बनूंगा, अगर 2019 का चुनाव जीते तो ज़रूर पीएम बन सकता हूं. अपने इस बयान से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली चुनौती दी है कि वे मुक़ाबले के लिए तैयार हैं. ये राहुल गांधी का हौसला और आत्मविश्वास ही है कि पिछले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में हारने और सत्ता गंवाने के बाद फिर से संघर्ष के लिए खड़े हो जाते हैं. वे जानते हैं कि सियासत में कभी मौसम एक जैसा नहीं रहता. यहां कुछ भी स्थाई नहीं है. सत्ता कब किसके हाथ में आ जाए, कब किसके हाथ से फिसल जाए, कोई नहीं जानता.  वे जानते हैं कि जीत और हार, धूप और छांव की तरह हैं. और वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. ये हर पल बदलता रहता है. वक़्त कभी उनके साथ रहा है, तो आज उनके विरोधियों के साथ है. कांग्रेस आज भले ही गर्दिश में है, लेकिन उसने कभी अपनी विचारधारा से अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया. इसीलिए कांग्रेस आज भी इस देश की माटी में रची-बसी है. अवाम का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जिसे हर कोई अपनी पार्टी मानता है. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस ने हमेशा इस देश की आत्मा और अपनी अनमोल व समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व किया है. महात्मा गांधी ने कांग्रेस के बारे में कहा है, "कांग्रेस इस देश में रहने वाले सभी भारतीयों की है, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, ईसाई, सिख या पारसी हों." कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है." यही कांग्रेस की ख़ासियत है.

कांग्रेस हमेशा जनमानस का सहारा बनी और मुश्किल वक़्त में अवाम को हिम्मत दी. किसी भी देश की तरक़्क़ी के लिए, अवाम की ख़ुशहाली के लिए चैन-अमन सबसे ज़रूरी है. पिछले कुछ बरसों में देश में जो नफ़रत और ग़ैर यक़ीनी का माहौल बना है, उस ख़ौफ़ के माहौल में राहुल गांधी ने अवाम को यक़ीन दिलाया है कि वे उसकी हिफ़ाज़त करेंगे. वे उन लोगों की हिफ़ाज़त करने का भी वादा करते हैं, जो हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं. ऐसा राहुल गांधी ही कर सकते हैं, क्योंकि वे उस विरासत से ताल्लुक़ रखते हैं, जिसने देश की गरिमा को बढ़ाया. बेशक, कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. वे कांग्रेस के नेताओं ने इस देश के लिए अपना जान तक क़ुर्बान कर दी. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुल पाएगा. उन्होंने अपनी सारी ज़िन्दगी देश के नाम कर दी.  देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रणी रहे हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत को विश्व पटल पर चमकाया. श्री राजीव गांधी ने देश को, देश के युवाओं को नई राह दी, जिसकी बदौलत आज देश उन्नति के शिखर तक पहुंचा है. श्रीमती सोनिया गांधी ने भी देश के लिए बहुत कुछ किया है और आज भी कर रही हैं. जब भी देश और पार्टी पर कोई संकट आया, श्रीमती सोनिया गांधी आगे आईं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद श्रीमती सोनिया गांधी ने ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी कि वे अब आराम करना चाहती हैं. माना जा रहा था कि वे अब सियासत से दूरी बना लेंगी. उन्होंने ऐसा किया भी. उन्होंने कुछ अरसे के लिए सियासी सरगर्मियों से फ़ासला रखा, लेकिन कांग्रेस को संकट में देख उन्होंने सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. कर्नाटक में उन्होंने चुनावी रैलियां करते हुए केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार से चार साल का हिसाब मांगा. उन्होंने  बीजापुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज़ करते हुए कहा कि मोदी जी अच्छा भाषण देते हैं, एक अभिनेता की तरह भाषण देते हैं. लेकिन केवल भाषण से लोगों का पेट नहीं भर सकता, लोगों का कल्याण नहीं हो सकता है. अगर भाषण से पेट भरता, तो मेरी प्रार्थना है कि वह और भी अच्छा भाषण दें.

सोनिया गांधी चुनावी मुहिम में इसीलिए उतरी हैं, ताकि कांग्रेस को मज़बूत बना सकें. एक वक़्त वह था, जब वे न तो खुद सियासत में आना चाहती थीं और न ही अपने बच्चों को इसमें शामिल होने देना चाहती थीं. लेकिन वक़्त जो न कराए, कम है. राहुल गांधी की भी सियासत में इतनी गहरी दिलचस्पी नहीं थी. वह सत्ता के पीछे भी नहीं भागे. एक वह वक़्त था, जब देश में उनकी पार्टी की सरकार थी, तब उनके समर्थक चाहते थे कि वह सरकार में कोई अहम ओहदा लें, कोई मंत्रालय संभालें, लेकिन उन्होंने बता दिया कि वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

मगर आज हालात जुदा हैं. राहुल गांधी ने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार, तो बता दिया है. क्या उनके सहयोगी दल इस पर राज़ी होंगे? उनके सहयोगी दलों के कई नेता न जाने कब से प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये बैठे हैं.
क्या राहुल गांधी ने बहुत-सोच-समझकर ये ऐलान किया है? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब आने वाले वक़्त की तह में छुपे हैं. बहरहाल, कांग्रेसी ख़ासकर राहुल गांधी के चाहने वाले उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में ही देखना चाहते हैं.

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