फ़िरदौस ख़ान 
ख़रीफ़ फ़सल का मौसम आने वाला है. ख़रीफ़ की फ़सलों में धान, बाजरा, मक्की, ग्वार, गन्ना, मूंग, उड़द, लोबिया, अरहर, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, अरंड आदि शामिल हैं. जून-जुलाई में ख़रीफ़ फ़सलों की बुआई शुरू हो जाती है. खेतों में फ़सल बोने से पहले किसानों को बहुत-सी तैयारियां करनी होती हैं. जहां थोड़ी-सी भी लापरवाही से किसानों को नुक़सान हो सकता है, वहीं समझदारी से काम लेने पर किसान अच्छी फ़सल हासिल कर सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले किसानों को अपनी भूमि की जांच करानी चाहिए. अगर उसमें कोई कमी है, तो सबसे पहले भूमि का सुधार करना चाहिए. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक़ सुधार के नज़रिये से मोटे तौर पर भूमि को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है, लवणीय और क्षारीय भूमि. लवणीय भूमि में कैल्शियम, मैगनीशियम, सोडियम क्लोराइड और सल्फ़ेट से बने नमक की मात्रा ज़्यादा होती है. क्षारीय भूमि में सोडियम कार्बोनेट की मात्रा ज़्यादा होती है. इसके सुधार के लिए खेत को समतल कर लें. फिर एक एकड़ के खेत को आठ बराबर हिस्सों में बांट लें. भूमि के हर प्लाट के चारों तरफ़ 30 सेंटीमीटर ऊंची मेढ़ बना लें. इन प्लाटों में दो बार मेढ़ तक यानी 30 सेंटीमीटर पानी भर लें. इससे भूमि की 30 सेंटीमीटर तक की तह में पहले के मुक़ाबले 10 फ़ीसद लवण रह जाएंगे. ऐसे खेतों में नमक के प्रति सहनशील फ़सलें उगानी चाहिए. क्षारीय भूमि में जिप्सम आदि का इस्तेमाल कर इसे सुधारा जा सकता है.   
 
देश में विभिन्न हिस्सों में खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है. हरियाणा को ही लीजिए. यहां का एक चौथाई हिस्से में किसानों को सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर ही निर्भर रहना पड़ता है. इस लिहाज़ से प्रदेश को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. दक्षिण-पश्चिम शुष्क क्षेत्र और उत्तर-पूर्व क्षेत्र. दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र मुख्य बारानी इलाक़ा है. यह प्रदेश का तक़रीबन 87 फ़ीसद है. इसमें राजस्थान के साथ लगते हिसार, सिरसा, फ़तेहाबाद, जींद, भिवानी, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, झज्जर, मेवात और गुड़गांव ज़िलों के कुछ हिस्से आते हैं. इस हिस्से में बारिश कम होती है. यहां 250 से 500 मिलीमीटर बारिश होती है. इसमें 80 से 85 फ़ीसद बारिश मानसून यानी जुलाई से सितंबर माह के बीच होती है. यहां सालाना वाष्पीकरण की दर 1500 से 1800 मिलीमीटर है. इसलिए यहां की ज़्यादातर भूमि रेतीली और दोमट है. कई जगह भूमि की निचली सतह पथरीली है. रेतीली होने की वजह से ज़मीन में पानी सोखने की क्षमता बहुत कम है. भूमि की उपजाऊ शक्ति बहुत कम है. कम बारिश और उपजाऊ शक्ति कम होने की वजह से यहां के किसान साल में एक ही फ़सल ले पाते हैं. यहां की प्रमुख फ़सलों में बाजरा, ग्वार, मूंग, लोबिया और अरहर आदि शामिल हैं. उत्तर-पूर्वी हिस्से में अम्बाला, यमुनानगर, पंचकूला, सोनीपत, फ़रीदाबाद और रोहतक के कुछ हिस्से आते हैं. यहां 500 से 1000 मिलीमीटर बारिश होती है. इसमें 75 से 80 फ़ीसद बारिश मानसून में होती है. वाष्पीकरण की सालाना दर 1400 से 1600 मिलीमीटर है. यहां की भूमि रेतीली और दोमट है. मिट्टी ही गहराई कम है. मिट्टी में देर तक नमी बनाए रखने की क्षमता बहुत कम है. तेज़ बारिश और पानी के बहाव की वजह से भूमि की ऊपरी परत बह जाती है. यहां की मुख्य फ़सलों में मक्का, बाजरा, ग्वार, लोबिया, अरहर, उड़द और मूंगफली शामिल है.

बारानी इलाक़ों में खेती करना आसान नहीं है. यहां के किसानों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. मिट्टी में नमी की कमी से फ़सलों को नुक़सान होता है. कभी-कभार लगातार बारिश होने से वक़्त पर बुआई नहीं हो पाती. अकसर बारिश की अनिश्चितता की वजह से किसान अपने खेतों में खाद नहीं डालते. पहाड़ी इलाक़ों में बारिश की वजह से भूमि के पोषक तत्व बह जाते हैं, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए भूमि को समतल करना चाहिए. जल के संरक्षण के लिए खेत के चारों तरफ़ मेढ़ बनानी चाहिए. बारिश से पहले खेतों की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए, ताकि बारिश का पानी खेतों में बहुत गहरे तक पहुंच सके. इस तरह मिट्टी में देर तक नमी बनी रहेगी. ख़रीफ़ फ़सलों की बिजाई जून या जुलाई में बारिश होते ही कर देनी चाहिए. बिजाई के लिए उन्नत बिजाई मशीन का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि बिजाई जल होने के साथ-साथ मिट्टी की पपड़ी बनने की समस्या से भी निजात मिल सके. फ़सलों को ढलाव की विपरीत दिशा में बोना चाहिए. इससे जल बहाव और मिट्टी के कटाव को रोका जा सकेगा. खरपतवारों को समय-समय पर निकालने रहना चाहिए. खरपतवार ज़्यादा होने की वजह से फ़सलों पर बुरा असर पड़ता है.

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक़ किसानों को सही कृषि यंत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए. धान की फ़सल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और उसके बाद में देसी हल से जुताई करनी चाहिए. पौधारोपण से पहले खेत में पानी भर दें और खड़े पानी में एक-दो जुताइयां करके सुहागा लगाएं. अगेती और समय की फ़सल में धान की रोपाई के 15 दिन बाद धान निराई यंत्र पेडीवीडर से निराई करनी चाहिए. देर से रोपी और ज़्यादा उपज देने वाली बौनी क़िस्मों में हाथ से निराई-गुड़ाई करनी चाहिए. बाजरे की फ़सल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और बाद में एक या दो जुताइयां देसी हल से करनी चाहिए. बिजाई ट्रैक्टर चालित रीजर-सीडर से या देसी हल से करनी चाहिए. बिजाई के 20 से 25 दिन बाद बैलों द्वारा चालित व्हील हो और व्हील हैंड हो से निराई-गुड़ाई करनी चाहिए. गन्ने की फ़सल के लिए बिजाई के सात से दस दिन बाद सुहागा लगा दें. खरपतवारों के नाश के लिए दो-तीन गुड़ाई करनी चाहिए. मई के महीने में हल्की मिट्टी और मानसून शुरू होने से पहले जून के महीने में रीजर की मदद से भारी मात्रा में मिट्टी चढ़नी चाहिए. कपास की बिजाई, बीज व खाद ड्रिल/प्लांटर से करें. इसके अलावा किसान एक कतारी ड्रिल का इस्तेमाल कर सकते हैं. पहली सिंचाई से पहले पहली गुड़ाई करें. मक्की के लिए खेत की 12 से 15 सेंटीमीटर की गहराई तक जुताई करें. इसके लिए मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई करनी चाहिए. इसके बाद चार जुताइयां और करनी चाहिए और छह बार सुहागा लगाना चाहिए. बिजाई के लिए प्लांटर का इस्तेमाल करना चाहिए. खेत की निराई कल्टीवेटर, व्हील-हैंड-हो या खुरपे से करनी चाहिए.

अच्छी उपज के लिए बिजाई की सही विधि अपनानी बहुत ज़रूरी है. बिजाई पंक्तियों में पूर्व से पश्चिम दिशा में करनी चाहिए. इससे बीजों के अच्छे जमाव और खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है. जहां वायु क्षरण की समस्या हो, वहां जुताई कम करनी चाहिए. बिजाई वायु दिशा से आड़ी दिशा में करनी चाहिए और पिछली फ़सल के अवशेषों को भी वहीं रहने देना चाहिए. मिट्टी की पपड़ी बनने की परेशानी से बचने के लिए रीजर सीडर से बिजाई करनी चाहिए. बिजाई के बाद पंक्तियों में देसी खाद या सरसों का भूसा डालने से जमाव अच्छा होता है.

बिजाई के बाद बारी आती है सिंचाई की. किसानों को सिंचाई जल की कमी का सामना करना पड़ता है. इसलिए यह ज़रूरी है कि पानी की हर बूंद का सदुपयोग किया जाए.  किसान सिंचाई नालियों को पक्का करके ज़मीन में रिसने वाले 20 से 30 फ़ीसद पानी को बचा सकते हैं. ट्यूबवेल का पानी काफ़ी महंगा पड़ता है. इसलिए सही माप के पाईप का इस्तेमाल करना चाहिए. रेतीली, दोमट और बलुई दोमट मिट्टी में पानी बहुत जल्द नीचे चला जाता है. इसलिए ऊपरी सतह को सघन बनाने के लिए सिंचाई या बारिश के बाद भारी रोलर को कई बार चलाना चाहिए. इससे भूमि 30 से 40 सेंटीमीटर गहराई तल सघन हो जाएगी. जब खेत की जुताई होगी, तो मिट्टी की ऊपरी सतह हल्की हो जाएगी. ऐसा करने से के सिंचाई जल की ज़रूरत होगी. इससे किसानों का काफ़ी ख़र्च बच जाएगा. 

प्रगतिशील किसान कुशलपाल सिरोही कहते हैं कि बिजाई से पहले खेत को अच्छी तरह समतल कर लेना चाहिए. इससे जहां खेत की जुताई, निराई-गुड़ाई में आसानी रहती है, वहीं पानी की भी बचत होती है. इससे बिजली या डीज़ल का ख़र्च बचता है. बिजाई से पहले हैरो या कल्टीवेटर की मदद से खेत में एक या दो बार जुताई करनी चाहिए.

अच्छी उपज पाने के लिए किसानों को उत्तम बीजों का ही इस्तेमाल करना चाहिए. इसके अलावा खाद और कीटनाशकों का सही इस्तेमाल भी बेहद ज़रूरी है. कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर जागरूकता शिविरों का आयोजन कर किसानों को मौसमी खेती और उससे संबंधित कृषि कार्यों, कृषि यंत्रों आदि की जानकारी दी जाती है.   

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