अंबरीश कुमार
यह यमुना है .इस यमुना के किनारे जब गए तो बिसलरी की खाली हो रही बोतल निकाली और उसे भर लिया .फिर खुद पिया और अरविंद को भी पिलाया .हम सोच रहे थे कि यही यमुना जब दिल्ली पहुंचती है तो कोई इसका पानी पी सकता है क्या? कांदिखाल से करीब चालीस मिनट में हम यमुना पुल तक पहुंच गये .आगे चकराता के रास्ते पर जाना था .कुछ दूरी के बाद ही हिमाचल की सीमा आ जाती है .यमुना पुल से पहले यमुना का विहंगम दृश्य देखने वाला था .यहां यमुना एक नदी सी लगती है .पहाड़ों को लांघती हुई ,घेरती हुई आती है और उसका प्रवाह देखने वाला होता है .

जाते समय पुल के पहले बंगाली रेस्तरां वाले को बता दिया था कि करीब बारह लोग लौट कर खाना यही खायेंगे .वह मछली रोटी और चावल की थाली सत्तर रूपये में देता है .शाकाहारी लोगों के लिए सब्जी दही भी रखता है .यह बंगाली परिवार कई साल पहले चौबीस परगना से आया था और अब यमुना के पानी से गुजारा कर रहा है .सुबह यमुना से जो मछली पकड़ी जाती है वह खरीद लेता है और दिन रात ट्रक वालों के साथ कुछ सैलानियों को मछली भात परोसता है .साथ में जो पानी होता है वह भी यमुना का .हम लोग यमुना नदी के तट तक गये पर उसका प्रवाह देख कर आगे नहीं बढे .फिर जौनसार बाबर मंदिर की तरफ जाना था इसलिए आगे बढ़ गये .यमुना साथ साथ थी और एक बड़े पहाड़ की परिक्रमा करती नजर आ रही थी .यह बहुत ही हरा भरा इलाका है .एक तरफ खेत तो दूसरी तरफ पहाड़ .खेतों की तरफ ही कुछ हजार फुट नीचे यमुना .पर फल के पेड़ बहुत कम दिखे .हां एक ट्रक दिखा तो जबर सिंह ने बताया कि ये हिमाचल का सेब लेकर नीचे जा रहा है .

.इस रास्ते पर चकराता करीब चालीस किलोमीटर दूरी पर है .करीब बीस साल पहले सविता के साथ गया था और वहा के एकमात्र डाक बंगले में तीन दिन रहा था .वह बहुत ही रोमांचक यात्रा थी और एक बड़े हादसे से सविता बच कर आ गई थी .वहा से शिमला का भी शार्ट कट है .यह सब याद कर रहा था तभी जौनसार आ गया .यह अद्भुत क्षेत्र है .यह समूचा क्षेत्र जनजाति के लिए आरक्षित है .यह काम साठ सत्तर के दशक के बीच हुआ था .जिसके चलते यहां के बाभन और ठाकुर बिरादरी को आरक्षण का लाभ मिलता है और जो दलित है उनसे ज्यादा फायदे में अगड़ी जातियां रहती है .यहां दलित किसी की जमीन इसलिए नही ले सकता क्योंकि वह जनजाति वाले की होती है भले ही वह ठाकुर हो .जो महासू देवता का मंदिर है उसपर भी ठाकुर बिरादरी का दबदबा है .कोई दलित यहां प्रवेश नहीं कर सकता .इसपर लिख रहा हूँ .मंदिर परिसर में कई मोटे बकरे नजर आये जो मंदिर की संपति होते है और वे चढ़ावे में आते है इनके लिए एक बाड़ा भी बना है .मंदिर में अपने साथ कई दलित नौजवान इस मंदिर में पहली बार गये .पुजारी ने प्रबंधको को इशारा किया कि सबका ब्यौरा ले और इनसे बासद में निपटा जायेगा .खैर यह मुद्दा अलग है और इसपर खबर भी लिखना है इसलिए मूल मुद्दे पर आता हूं .नदी और पानी के मुद्दे पर .पर्यावरण के मुद्दे पर .यमुना को दिल्ली में देखता रहा हूं .कभी नहाने की हिम्मत तक नहीं हुई उसी यमुना का बोतल भर पानी पिया तो मिनरल वाटर से बेहतर लगा .यमुना का हरा रंग और तलहटी तक दिखाई देने वाला पानी जिसे हमने दिल्ली तक पहुंचाते पहुंचाते जहरीला बना दिया .असली यमुना तो यहां दिखी .एक हरे भरे पहाड़ की परक्रमा कर रही यमुना की फोटो ली तो कुछ देर खड़ा रहा गया .ऐसा दृश्य बहुत कम दिखता है .फिर चले तो उसी यमुना पुल के बंगाली रेस्तरां या ढाबा पर रुके .अरविंद की इच्छा थी और झारखंड बंगाल के भी कुछ लोग मछली खाना चाहते थे .यह छोटी मछली थी जिसे उसने सही शब्दों में मछली की दाल बनाकर दे दिया था .सिर्फ नमक हल्दी मिर्च वाले पानी में उबली हुई .पर यमुना से सुबह ही पकड़ी गई मछली बहुत ताज़ी थी इसलिए स्वादिष्ट लगी .साथ में यमुना का पानी भी . फोटो वही की है .

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