स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. पिछले जनवरी माह में 4.91 लाख विदेशी पर्यटक भारत आए, जबकि जनवरी, 2009 और जनवरी, 2008 में क्रमश: 4.22 लाख और 5.12 लाख विदेशी पर्यटक आए थे। इस प्रकार जनवरी, 2008 की तुलना में जनवरी, 2009 मे पर्यटकों की संख्या 17.6 फीसदी घट गई, जबकि जनवरी, 2009 की तुलना में जनवरी 2010 में 16.4 फीसदी अधिक पर्यटकों का आगमन हुआ। विदेशी पर्यटकों की संख्या में दिसम्बर, 2009 से जनवरी 2010 तक वृध्दि जारी रही और जनवरी 2010 में दिसम्बर, 2009 से की तुलना में 16.4 फीसदी अधिक पर्यटक आए।

गौरतलब है कि पर्यटन मंत्रालय प्रमुख हवाई अड्डों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर हर महीने देश में पधारने वाले पर्यटकों की संख्या तथा उनसे होने वाली विदेशी मुद्रा विनिमय आय (एफईई) का अनुमान तैयार करता है। जनवरी, 2010 में विदेशी पर्यटकों के आगमन से 5593 करोड़ रुपये एफईई मिली जबकि जनवरी, 2009 और जनवरी 2008 में क्रमश: 4598 करोड़ रुपये एफईई एवं 5438 करोड़ रुपये एफईई मिली। एफईई में जनवरी, 2010 में जनवरी, 2009 की तुलना में 21.6 फीसदी की वृध्दि हुई, जबकि जनवरी, 2009 में जनवरी 2008 की तुलना में 15.4 फीसदी की कमी हुई थी। अमरीकी डॉलर की दृष्टि से पर्यटकों के आगमन से जनवरी, 2010 में 12150 लाख डॉलर का राजस्व प्राप्त हुआ, जबकि जनवरी, 2009 एवं जनवरी, 2008 में क्रमश: 9410 लाख डॉलर और 13820 लाख डॉलर राजस्व मिले थे। इस प्रकार अमरीकी डॉलर की दृष्टि से विदेशी मुद्रा राजस्व में जनवरी, 2010 में जनवरी 2009 की तुलना में 29.1 फीसदी की वृध्दि और जनवरी, 2009 में जनवरी, 2008 की तुलना में 31.9 फीसदी की कमी आई।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने चार राज्यों - आंध्र प्रदेश, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लिए संबंधित जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों को स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (एसजीएसवाई) के अधीन वर्ष 2009-2010 के दौरान केन्द्र सरकार के हिस्से के रूप में 59,79,38,000 रुपये की अनुदान सहायता जारी की है।

मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान एसजीएसवाई के अधीन दूसरी किस्त के रूप में आंध्र प्रदेश के अनंतपुर, गुंटूर, खम्माम, कृष्णा, कुरनूल, मेडक, नालगोंडा, नेल्लूर, प्रकासम, वारंगल और पश्चिम गोदावरी जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों को 25,99,39,000 रुपये दिए गए हैं। मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान एसजीएसवाई के अधीन केन्द्र सरकार के हिस्से की पहली किस्त के रूप में मणिपुर, के चुड़ाचांदपुर और तमेंगलोंग जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों को 5,33,000 रुपये प्राप्त होंगे।

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर, बरेली, बस्ती, भदोही, जौनपुर, खेरी, मौनाथभंजन, मिर्जापुर, पडरौना, रायबरेली और सोनभद्र जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों को मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान एसजीएसवाई के लिए केन्द्र सरकार के हिस्से की दूसरी किस्त के रूप में 23,14,58,000 रुपये की केन्द्रीय सहायता दी जा रही है। उसी प्रकार, मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान योजना के अधीन केन्द्र सरकार के हिस्से की दूसरी किस्त के रूप में पश्चिम बंगाल के 24 परगना, उत्तरी, बर्धवान और पश्चिम मेदिनापुर जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों को 10,60,08,000 रुपये प्राप्त होंगे। आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल राज्यों के लिए वित्त पोषण प्रणाली केन्द्र और राज्य के बीच 75:25 अनुपात में है, जबकि मणिपुर के मामले में यह अनुपात 90:10 है।

एसजीएसवाई का उद्देश्य सहायता प्राप्त गरीब परिवारों के लिए एक समयावधि में समुचित और टिकाऊ आय सुनिश्चित करके उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर उठाना है। इन उद्देश्यों की पूर्ति ग्रामीण निर्धनों को स्व-सहायता समूहों में शामिल करके, सामाजिक जागरूकता और प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण और आय सृजन करने वाले संसाधनों के माध्यम से हो सकती है।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. 'जलवायु परितर्वन का समाज पर प्रभाव' जैसे ज्वलंत विषय पर आज यहां प्रधानमंत्री के विशेष दूत तथा मुख्य अतिथि श्याम सरन ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा आयोजित अठारहवीं वैज्ञानिक हिन्दी संगोष्ठी का उदघाटन किया। इस विषय की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जलवायु में निरंतर हो रहे बदलावों को संपूर्ण विश्व के जनसमुदाय द्वारा महसूस किया जा रहा है।

इस अवसर पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के सचिव बी.आर.परशीरा ने उपस्थित वैज्ञानिकों और जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि जलवायु परितर्वन जैसे सामयिक विषय पर हिन्दी में आयोजित इस संगोष्ठी से आम आदमी लाभान्वित होगा तथा राजभाषा हिन्दी का भी प्रचार-प्रसार हो सकेगा।

इस अवसर पर पिछले वर्ष 27 जनवरी को आयोजित की गई संगोष्ठी की कार्यवाही पर पुस्तक 'जलवायु परिवर्तन' का लोकार्पण भी किया गया।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव, डॉ. शैलेश नायक ने मुख्य अतिथि और सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय मौलिक पुस्तक लेख योजना, 2009 के विजेताओं को बधाई दी। इस योजना में प्रेमचंद श्रीवास्तव को उनकी पुस्तक 'हिन्द महासागर की समुद्री खनिज सम्पदा' के लिए 50000- रुपये का प्रथम पुरस्कार, डॉ. तारा देवी सिंह को उनकी पुस्तक 'हिन्द महासागर एवं राष्ट्र-एक भू-आर्थिक एवं भू-सामरिक अध्ययन' के लिए 40000- रुपये का द्वितीय पुरस्कार और प्रोफेसर मधुसूदन त्रिपाठी को उनकी पुस्तक 'सागर सम्पदा-महत्त्व एवं प्रबंधन' के लिए 30000- रुपये का तृतीय पुरस्कार प्रदान किया गया। नकद पुरस्कार राशि के साथ-साथ इन तीनों विजेताओं को प्रमाण-पत्र एवं शील्ड भी प्रदान की गई।

इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न वैज्ञानिक एवं अनुसंधान संगठनों के कुल 14 वैज्ञानिकोंप्रोफेसरों ने भाग लिया और हिन्दी में लेख प्रस्तुत किए। उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए 5000-, 4000- एवं 3000- रुपये के नकद पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए गए।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत पेय जल आपूर्ति और स्वच्छता विभाग ने राज्यों और उनकी एजेंसियों को उनकी आईईसी रणनीति विकसित करने और विभिन्न हितधारकों के क्षमता निर्माण में मदद करने के लिए राष्ट्रीय संसाधन केन्द्रों के रूप में 20 संस्थानों की पहचान की है। इन संस्थानों से जिन गतिविधियों की आशा है, वे हैं -
  • राज्य स्तर पर महत्त्वपूर्ण संसाधन व्यक्तियों की क्षमता का निर्माण करना
  • प्रत्येक जिले के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम प्रबंधकों और महत्त्वपूर्ण संसाधन व्यक्तियों की क्षमता निर्माण करना
  • संचार एवं क्षमता विकास इकाईयों (सीसीडीयू) की स्थापना और उचित संचालन के लिए राज्यों को तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करना
  • उनको आबंटित किए गए विभिन्न जिलों में सुधार के लिए पहलों को क्रियान्वित करने के लिए तकनीकी दिशा निर्देश का विस्तार करना
  • अनुकूलन कार्यशाला, बैठक, राज्य स्तर पर मुख्य हितधारकों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करना
पेयजल आपूर्ति विभाग ने वर्ष 2010-11 के लिए 15 मार्च, 2010 तक एक कार्ययोजना तैयार करने के लिए चिन्हित संस्थानों से कहा है कि वे राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम दिशानिर्देशों में तय किए गए लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण संसाधन केन्द्रों द्वारा की जाने वाली प्रस्तावित गतविधियों की विस्तृत जानकारी इस कार्ययोजना में दें।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
कोयंबटूर/राजपलायम (तमिलनाडु) . केन्द्रीय कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन ने आज कोयंबटूर और राजपलायम में दो कपास विक्रय विक्रय केन्द्रों का उदघाटन किया। विक्रय केन्द्र विक्रय योजना के अधीन भारतीय कपास निगम लिमिटेड (सीसीआई) की ओर से इन्हें स्थापित किया गया है। इस अवसर पर कोयंबटूर में अपने भाषण में उन्होंने कहा कि ये विक्रय केन्द्र गुजरात और महाराष्ट्र जैसे कपास उत्पादक राज्यों से गट्ठरों का संग्रह करके स्थानीय मिलों के लिए उनकी बिक्री करेंगे। इन विक्रय केन्द्रों से कपड़ा मिलें, अपने निकटवर्ती स्थान से ही गुणवत्ता आधारित कपास खरीदने में सक्षम होगी और कपड़ा मिल की धागे पर आने वाली लागत में 2.00 रूपये प्रति किलो की कमी होगी। उन्होंने कहा कि छोटी कपड़ा मिलों की मदद के लिए ये विक्रय केन्द्र उन्हें कपास के कम से कम 50 गट्ठरों की बिक्री कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि इस प्रयास के माध्यम से तमिलनाडु की कपड़ा मिलों की प्रमुख समस्याओं का हल हो सकेगा।

इस कार्यक्रम में तमिलनाडु सरकार के ग्रामीण उद्योग और पशुपालन मंत्री पोंगालुर एन पालनीसामी, राजमार्ग और लघु बंदरगाह मंत्री वेल्लाकोयल सामीनाथन, कोयंबटूर के सांसद पीआर नटराजन और भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय में सचिव सुश्री रीता मेनन आदि भी मौजूद थे।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. भारतीय रेल को अप्रैल 2009 से जनवरी 2010 के दौरान 70501.65 करोड़ रुपए की आय हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान 64943.32 करोड़ रुपए की आय हुई थी। इस प्रकार पिछले वर्ष की तुलना में 8.56 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

एक अप्रैल 2009 से 31 जनवरी 2010 के दौरान माल भाड़े से 47763.29 करोड़ की आमदनी हुई, जबकि अप्रैल 2008 से 31 जनवरी 2009 की अवधि में 44035.66 करोड़ रुपए की आमदनी हुई थी। इस प्रकार पिछले वर्ष की तुलना में आय में 8.47 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वित्तीय वर्ष 2009-10 के पहले 10 महीनों के दौरान कुल यात्री राजस्व 19393.26 करोड़ रुपए रहा, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान यह 18057.41 करोड़ रुपए था। इस प्रकार यात्री राजस्व में 7.40 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज की गई।

अन्य कोचों से अर्जित राशि पिछले वर्ष की इसी अवधि के दौरान 1666.54 रुपए की तुलना में 1903.31 करोड़ रुपए रही। इसमें 14.21 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज की गई। अप्रैल 2009 से जनवरी 2010 के दौरान कुल यात्रियों की संख्या पिछले साल की इसी अवधि के दौरान 5917.13 मिलियन की तुलना में 6188.78 मिलियन रही, जिसमें 4.59 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज की गई। उपनगरीय और गैर उपनगरीय क्षेत्रों से अप्रैल 2009 से जनवरी 2010 के दौरान कुल यात्रियों की संख्या पिछले वर्ष की इसी अवधि में क्रमश: 3164.05 मिलियन और 2501.45 मिलियन की तुलना में 3210.93 मिलियन और 2977.85 मिलियन रही, जिसमें क्रमश: 1.48 प्रतिशत तथा 8.16 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज हुई।

मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया !
भूखे वोटर को, भोजन का, वादा कोई दिया गया ??

"सुरक्षा-ख़तरों से निपटा जाए !"
हर ख़तरे का नियम बना दें, बिना सूचना के ना आए !!

अंधाधुंध वाहनों की पैदावार !
कुछ दिन बाद सड़क पर पैदल, चलना भी होगा दुश्वार !!

महंगाई से लड़ने की तैयारी !
पूछें लोग अगर कैसी है, भाषण में दिखला दें सारी ??

"लक्ष्यों की पूर्ति करें !"
अफ़सर अपनी जेब भरें ??

समझौता-वार्ता !
उसमें से आधा हमको दो, जो भी रक़म डकारता !!

आत्मदाह !
रोज-रोज सांसें लेने का, ख़त्म हुआ पूरा उत्साह !!

धांधली !
जांच कराने जिसको भेजा, उसने कितनी रक़म बांध ली ??

गुणगान !
नेता के अवगुण भी सारे, बतला ईश्वर के वरदान !!

सांसद-निधि !
काग़ज़ में निर्माण-ख़र्च हों, समझा दें ऐसी कोई विधि !!

बाल ठाकरे !
मक्खी भी उस पर ना बैठे, रखो बचाकर नाक, रे !!
-अतुल मिश्र

इक नई खुशबू कहां से पास मेरे आ गई
सोच की धारा बदलकर जिन्दगी में छा गई

रोज मिलते जो हजारों लोग कितने याद हैं
आँख से उतरा हृदय में प्रीत मुझको भा गई

फिर मेरी मुस्कान लौटे था यकीं ऐसा कहां
स्निग्ध सी मुस्कान जैसे भ्रम के गम को खा गई

कुछ न कुछ तो शेष रहतीं जिन्दगी में चाहतें
जिन्दगी कहती कि मानो सारी खुशियां पा गई

बात करते कम सुमन की प्यार लेकिन खास है
याद उस एहसास की दिल से अभी तक ना गई
-श्यामल सुमन

वेदप्रताप वैदिक
भारत और पाकिस्तान के बीच बात हो या न हो, यह दुविधा अब खत्म हो गई है। बात जरूर होगी, क्योंकि दोनों पक्ष जरा नरम पड़ गए हैं। भारत यह नहीं कह रहा है कि हम सिर्फ आतंकवाद पर बात करेंगे और पाकिस्तान यह नहीं कह रहा है कि हम बात तभी करेंगे, जबकि ‘समग्र संवाद’ होगा, यानी हमारे लिए आतंकवाद के मुकाबले कश्मीर आदि ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

वास्तव में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अपने ताजातरीन बयान में कहा है कि बात नहीं करने का मतलब आतंकवादियों के जाल में फंसना है। कुरैशी के कथन पर हमें इसलिए विश्वास करना चाहिए कि आज पाकिस्तान अपने ही आतंकवादियों से जितना त्रस्त है, क्या वह त्रस्तता भारत के मुकाबले कम है? पिछले तीन-चार वर्षो में इस्लामी आतंकवादियों ने जितनी नृशंस वारदातें पाकिस्तान और अफगानिस्तान में की हैं, उन्होंने पाकिस्तान सरकार को मजबूर कर दिया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ दे। जैसा आक्रामक अभियान उसने वजीरिस्तान में चलाया, वैसा क्या हमें अपने देश के किसी क्षेत्र में चलाना पड़ा? जाहिर है कि पाकिस्तानी अभियान के पीछे अमेरिका का जबर्दस्त दबाव है, लेकिन अगर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी यह सोचते हैं कि भारत भी उसी दबाव में आकर उनसे बात करना चाहता है तो उनकी सोच सही नहीं है। भारत ने 1998 में जब समग्र संवाद की पहल की थी तो उसके पीछे प्रधानमंत्री वाजपेयी का वह विराट स्वप्न था, जिसके तहत वह संपूर्ण दक्षिण एशिया को 21वीं सदी के लिए तैयार कर रहे थे, लेकिन पाकिस्तान ने कभी करगिल युद्ध, कभी संसद पर हमला और कभी मुंबई रेल बम कांड के द्वारा उस पहल में रोड़े अटका दिए।

डॉ. मनमोहन सिंह उसी सूत्र को बड़े जोर-शोर से आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन नवंबर 2008 में मुंबई के ताज होटल कांड ने सारी तैयारी पर पानी फेर दिया। फिर भी जुलाई 2009 में अपने देश और पार्टी का गुस्सा झेलते हुए उन्होंने शर्म अल शेख में शिखर बैठक की सहमति दी। उसके बावजूद कई माह बीत गए और पाकिस्तान ने मुंबई कांड के अपराधियों के विरुद्ध कोई उल्लेखनीय कार्रवाई नहीं की। अब जबकि उसने कार्रवाई शुरू कर दी है तो भारत खुले दिल से बात करने को राजी हुआ है। पाकिस्तान को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि यह बातचीत अमेरिका के कारण नहीं, पाकिस्तान के कारण शुरू हो रही है। यदि इस मुद्दे पर उसकी समझ उलटी होगी तो यह बातचीत भी उलट जाएगी। इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा। इसमें शक नहीं है कि इस बातचीत के लिए अमेरिका दोनों पक्षों को निरंतर ‘प्रोत्साहित’ करता रहा है और अब उसने प्रसन्नता भी जाहिर की है, लेकिन जब तक दोनों पक्ष पूर्ण स्वायत्त होकर अपने मामले नहीं सुलझाएंगे, यह संवाद भी बांझ ही साबित होगा।

यह संवाद बहुत ही पतली डोरी पर होने वाला नट नृत्य है। वह डोरी कब टूट जाएगी, कुछ पता नहीं। ताज होटल जैसा कोई छोटा-मोटा हादसा भी दुबारा हुआ नहीं कि पूरा भारत इस तरह के संवाद के विरुद्ध उबल पड़ेगा। लोकतांत्रिक सरकार फिर ठिठक जाएगी। ऐसे में दोनों पक्षों को आतंकवाद के विरुद्ध शक्तिशाली संयुक्त मोर्चे का निर्माण करना होगा। दोनों को घोषणा करनी होगी कि आतंकवाद दोनों का साझा शत्रु है। एक पर हुआ हमला दूसरे पर हुआ हमला माना जाएगा और जरूरत पड़ी तो इस जन-शत्रु के विरुद्ध दोनों राष्ट्रों की फौजें साझा अभियान चलाएंगी। इस समझ को हमें अफगानिस्तान तक फैलाना होगा और यदि भारत, पाक और अफगान, ये तीनों सेनाएं मिलकर काम करें तो 10 हजार तालिबान का मूलोच्छेद करने में कितना समय लगेगा? यदि पाकिस्तान मेरे इस सुझाव पर अमल करने को तैयार हो जाए तो उसे इतने फायदे होंगे कि उन्हें शब्दों में गिनाना कठिन हो जाएगा।

पहला फायदा तो यही है कि सारी दुनिया बिना समझाए ही यह बात मान लेगी कि पाकिस्तान सचमुच तालिबान के विरुद्ध है। अभी तक लोग यह मानते हैं कि पाकिस्तान की सरकार सिर्फ उन तालिबान के विरुद्ध है, जो उसे तंग करते हैं। वह उन तालिबान के विरुद्ध नहीं है, जो भारत और अफगानिस्तान के दुश्मन हैं। इस छवि के साफ होते ही पाकिस्तान सरकार का रुतबा अपने ही देश में बहुत ऊंचा हो जाएगा। अभी माना जाता है कि पाकिस्तान की राजनीतिक सरकार में कोई दम नहीं है। उसकी बात पर क्या भरोसा किया जाए। असली ताकत तो फौज और आईएसआई के पास है। वे दोनों भारत और अफगान विरोधी तालिबान के सरपरस्त हैं। यदि भारत-पाक-अफगान संयुक्त मोर्चा बन जाए तो फौज और आईएसआई को या तो राजनीतिक सरकार के आगे झुकना पड़ेगा या उसका खुलकर विरोध करना होगा। यानी पर्दा हट जाएगा। राजनीतिक चिलमन चीर-चीर हो जाएगा।

आतंकवाद विरोध के बहाने दोनों राष्ट्र इतने नजदीक आ जाएंगे कि फिर ‘समग्र संवाद’ अपने आप चलेगा और दोनों तरफ से चलेगा। कश्मीर, सियाचिन, पानी के बंटवारे, परमाणु-सावधानियां और आर्थिक-सांस्कृतिक सहयोग के अनेक नए आयाम अपने आप खुलेंगे। जनरल कयानी अफगानिस्तान में अब भी ‘सामरिक पिछवाड़े’ की जो रट लगाए हुए हैं, वह निर्थक हो जाएगी। इधर, भारत-पाक सहयोग बढ़ा नहीं कि अफगानिस्तान अपने आप शांत होने लगेगा। उस स्थिति में पाकिस्तान को ‘सामरिक पिछवाड़े’ की जगह नए-नए ‘आर्थिक सीमांतों’ की खोज करनी होगी और ये नए सीमांत फिर अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेंगे। ये ईरान और तुर्की और उनके उत्तर में बसे पांचों मध्य एशियाई गणतंत्रों तक फैलेंगे। जाहिर है कि इनका लाभ उठाने की पूर्ण क्षमता पाकिस्तान में तभी विकसित होगी, जब वह भारत को अपने साथ लेगा। भारत और पाकिस्तान मिलकर पूरे एशिया का नक्शा बदल सकते हैं।

भारत और पाकिस्तान को साथ आने का इससे बढ़िया मौका पहले कभी नहीं मिला था। अगले डेढ़ साल में अमेरिका अफगानिस्तान को खाली करेगा। एक बार उसने काबुल छोड़ा तो अफगानिस्तान उसकी बला से! उसके शून्य को कोई भी भरे, उसे क्या चिंता है? यदि भारत और पाकिस्तान काबुल में नया अखाड़ा खोल लें तो अमेरिका का क्या बिगड़ रहा है? दोनों लड़ेंगे, दोनों का नुकसान होगा। शायद चीन और रूस भी इस फटे में अपने पांव फंसा लें। यदि पाकिस्तान इस कीचड़ में नहीं उलझना चाहता है, तो यही सही वक्त है जबकि उसे भारत से हाथ मिलाना चाहिए। भारत को भी पाकिस्तान के दिल में यह बात जमानी होगी कि वह उसका जरा-भी नुकसान नहीं होने देना चाहता है और अफगानिस्तान आदि क्षेत्रों में उसके जो भी वैध और उचित हित हैं, उन्हें वह मान्यता देता रहेगा। यदि हमारे विदेश सचिवों की बैठक में तात्कालिक मुद्दों के अलावा इस दूरगामी संभावना पर भी काम हो, तो दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे मालदार और सबसे सुरक्षित क्षेत्रों में बदलने लगेगा।

इक न इक दिन मरना है
हर पल फिर क्यों डरना है

अर्थ निकलता तब जीवन का
सृजन हमेशा करना है

सुख तो सबको प्यारे लगते
दुख में नहीं बिखरना है

चहुं ओर नदियों सी बाधा
हमको पार उतरना है

गलती का मानव कठपुतला
नित नित हमें सुधरना है

क्षणिक चमक हो भले झूठ में
सच से नहीं मुकरना है

अगर आपको सुमन चाहिए
कांटों बीच गुजरना है
-श्यामल सुमन

लेखक : प्रो. बी. एन पाण्डेय इतिहासकार, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन
जब में इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मंदिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे।

मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोडने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैसे बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मंदिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी। इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया। डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के पिभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें।

अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर, चित्रकूट के बालाजी मंदिर, गौहाटी के उमानन्द मंदिर, शत्रुन्जाई के जैन मंदिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मंदिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मंदिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रुख सामने लाया गया है। भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढ़ंग से खोजबीन की जाए तो मुझे विश्वास है कि और बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाऐंगे जिनसे औरंगज़ेब का गै़र-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा। औरंगज़ेब के फरमानों की जांच-पड़ताल के सिलसिले में मेरा सम्पर्क श्री ज्ञानचंद और पटना म्यूजियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डा. पी एल. गुप्ता से हुआ। ये महानुभाव भी औरंगज़ेब के विषय में ऐतिहासिक दृस्टि से अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे। मुझे खुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और काफ़ी बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर को साफ़ करने में अपना योगदान दे रहे हैं। औरंगज़ेब, जिसे पक्षपाती इतिहासकारों ने भारत में मुस्लिम हकूमत का प्रतीक मान रखा है। उसके बारें में वे क्या विचार रखते हैं इसके विषय में यहां तक कि ‘शिबली’ जैसे इतिहास गवेषी कवि को कहना पड़ा-
तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था

औरंगज़ेब पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के संबंध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है। 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। एसे पहली बार ‘एसियाटिक- सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मंदिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से आझल रह जाता है। यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानीय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राहम्ण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राहमण एक मंदिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे।

फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को अढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मंदिरों को तबाह और बरबाद नहीं किया जाय, बलबत्ता नए मंदिर न बनए जाएँ। हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मंदिरों के ब्राहम्णों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मंदिर उन्हीं की देख-रेख में हैं। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहम्णों को इनके पुराने पदों से हटा दें।

यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है। इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राहम्णों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।’’ इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मंदिरों के निर्माण के विरूद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया। पहले से मौजूद मंदिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था। यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है। बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शांति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें।

यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की हैं कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरु भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामलें में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फरमान पर तुरं अमल गिया जाए।’’ (तीरीख-17 बबी उस्सानी 1091 हिजरी) जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि औरंगज़ैब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान। वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था।

इन फरमानों में एक जंगम लोंगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से एक मुसलमान नागरिक के दरबार में लाया गया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है। उन्हें हुक्द दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदा की मिल्कियत का अधिकार प्रमानिण हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल न होने दया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिएए हमारे दरबार में ने आना पडे। इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई.) की तारीख़ दर्ज है। इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली नबीउल-अव्वल 1078 हि. की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दया गया। फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई। पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है। अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई।

ख़रीफ की फसल के प्रारंभ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसीप्रकार की दखलंदाज़ी न होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग(शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपने देख-रेख कर सकें।’’ इस फ़रमान से केवल यही ता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभा नहीं बरता था। जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने प्रान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है। औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक-दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी-माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले। ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है।

हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर बाहम्णें एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दूआ और प्रार्थना कने में लग जाएं। हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों के अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही मे रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जसए और न उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए।’’ लगता है औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था। हमारे पास औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राहम्ण के नाम है। असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके। जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया।

हिन्दुओं और उनके धर्म के साथ औरंगज़ेब की सहिष्ण्ता और उदारता का एक और सबूत उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के पुजारियों से मिलता है। यह शिवजी के प्रमुख मंदिरों में से एक है, जहां दिन-रात दीप प्रज्वलित रहता है। इसके लिए काफ़ी दिनों से पतिदिन चार सेर घी वहां की सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाथा था और पुजारी कहते हैं कि यह सिलसिला मुगल काल में भी जारी रहा। औरंगजेब ने भी इस परम्परा का सम्मान किया। इस सिलसिले में पुजारियों के पास दुर्भाग्य से कोई फ़रमान तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक आदेश की नक़ल ज़रूर है जो औरंगज़ब के काल में शहज़ादा मुराद बख़्श की तरफ से जारी किया गया था। (5 शव्वाल 1061 हि. को यह आदेश शहंशाह की ओर से शहज़ादा ने मन्दिर के पुजारी देव नारायण के एक आवेदन पर जारी किया था।

वास्तविकता की पुष्टि के बाद इस आदेश में कहा गया हैं कि मन्दिर के दीप के लिए चबूतरा कोतवाल के तहसीलदार चार सेर (अकबरी घी प्रतिदिन के हिसाब से उपल्ब्ध कराएं। इसकी नक़ल मूल आदेश के जारी होने के 93 साल बाद (1153 हिजरी) में मुहम्मद सअदुल्लाह ने पुनः जारी की। साधारण्तः इतिहासकार इसका बहुत उल्लेख करते हैं कि अहमदाबाद में नागर सेठ के बनवाए हुए चिन्तामणि मन्दिर को ध्वस्त किया गया, परन्तु इस वास्तविकता पर पर्दा डाल देते हैं कि उसी औरंगज़ेब ने उसी नागर सेठ के बनवाए हुए शत्रुन्जया और आबू मंदिरों को काफ़ी बड़ी जागीरें प्रदान कीं। निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाण्ति होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मंदिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढहा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मंदिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहां क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा दनी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मंदिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएंगी।

औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बडी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देख तो तहखाने की सीढी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई कने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है।

अतः विश्नाथ जी की मूर्ति को कहीं और लेजा कर स्थापित कर दिया जाए और मंदिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाए और महंत को मिरफतर कर लिया जाए। डाक्टर पट्ठाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है। गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालुगज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह न यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए। अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों मकें ख़र्च किया गया। ये दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मंदिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था।

‘‘दर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और पनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी सांप्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
लंदन (ब्रिटेन). भारत और ब्रिटेन के बीच संयुक्त आर्थिक और व्यापार आयोग (जेईटीसीओ) के छठे अधिवेशन के दौरान आज लंदन में दोनों देशों ने व्यापार और निवेश प्रवाहों को प्रभावित करने वाले पर्यावरण विनियमन में और सुधार की जरूरत के बारे में सहमति हुई। जींसों और सेवाओं, दोनों के लिए बाजार पहुंच के मुद्दे पर दोनों पक्षों ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाहों को बढ़ाने की अपनी प्रतिबध्दता की फिर से पुष्टि की। केन्द्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री आनंद शर्मा और ब्रिटेन सरकार के ब्यापार, नवसृजन एवं कौशल मंत्री लॉर्ड पीटर मांडेलसन ने इस अधिवेशन में भाग लिया। ब्रिटेन भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में से एक है और ब्रिटेन के साथ वर्ष 2008-09 में द्विपक्षीय व्यापार में 12 अरब अमरीकी डालर की वृध्दि दर्ज की गई है।

इस अवसर पर आनंद शर्मा ने कहा कि भारत में चलाए जा रहे व्यापक आधारभूत विकास कार्यक्रम के बल पर वहां विदेशी निवेश के काफी अवसर बने हैं। उन्होंने कहा कि भारत सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से आधारभूत विकास के क्षेत्र में ब्रिटेन के अनुभवों को महत्त्व देता है, जो भारत के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की स्थापना के संदर्भ में लाभदायक हो सकता है। जेईटीसीओ की अगली बैठक एक वर्ष के बाद नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. राजस्थान के लोक जीवन पर पत्रकार पृथ्वी परिहार की पुस्तक थार की ढाणी का लोकार्पण आज 19वें नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में आयोजित एक समारोह में हुआ। मुख्य अतिथि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य के प्रोफेसर राम बक्ष ने प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से प्रकाशित इस पुस्तक का औपचारिक लोकार्पण किया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रो. राम बक्ष ने प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के इस प्रयास की सराहना की और कहा कि विलुप्त होती जा रही सांस्कृतिक और लोक ज्ञान की धरोहर को संभालने और अभिलेखित करने की सख्त जरूरत है। राजस्थान में फैले थार के रेगिस्तान में खेतों में बसे घरों को ढाणी कहते हैं जो इस सामाजिक संरचना की सबसे छोटी इकाई है। पुस्तक में ढाणियों के बहाने रेगिस्तान के कठिन इलाके में जीवन और संस्कृति के फलने-फूलने का रोचक ब्यौरा है। करीब 95 पृष्ठों की पुस्तक की कीमत 70 रूपए है। हाल के तकनीकी बदलावों से इस मरूस्थल में लोगों के जीवन में जो महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, उन्हें भी इस पुस्तक में महत्वपूर्ण ढंग से दर्ज किया गया है।

इस अवसर पर लोक संस्कृति और वैश्वीकरण विषय पर एक संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया जिसमें वरिष्ठ लेखक पत्रकार और सामाजिक चिंतक राजकिशोर तथा लेखक और राजस्थान के जानकार भुवनेश जैन प्रमुख वक्ता थे।

कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रकाशन विभाग की अपर महानिदेशक (प्रभारी) ने बताया कि विभाग ने देश के विभिन्न भागों की विविध लोक कलाओं और संस्कृतियों पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। बच्चों के लोक साहित्य पर इसकी पुस्तकों की श्रृंखला के रूप में प्रकाशन विभाग ने आने वाली पीढ़ियों के लिए जैसे एक धरोहर को संभाल कर रखा है।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. ऑस्ट्रेलिया के संसाधन, ऊर्जा और पर्यटन मंत्री मार्टिन फरगुसन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने आज यहां कोयला राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल (स्वतंत्र प्रभार) से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल में आस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त पीटर वर्गीज भी शामिल थे। प्रतनिधिमंडल स्तर की बैठक में दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिकारियों ने शिरकत की।

दोनों देशों के मंत्रियों ने खासतौर पर कोयला खनन के क्षेत्र में व्यापार और निवेश में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया। आस्ट्रेलिया के मंत्री ने बताया कि अगले चार-पांच वर्षों में आस्ट्रेलिया में रेल, सड़क और बंदरगाह जैसे आधारभूत ढांचों के उन्नयन के लिए बड़े स्तर पर निवेश की योजना है। इससे कोयला और अन्य संसाधनों के अधिक निर्यात को बल मिलेगा।

फेरगुसन ने आगामी मई के दौरान पर्थ में आयोजित होने वाले ऊर्जा और खनन मंच में शामिल होने के लिए श्रीप्रकाश जायसवाल को आमंत्रित किया। जायसवाल ने दोनों देशों के बीच कोयला क्षेत्र में संयुक्त कार्य योजना के कार्यान्वयन में की गई प्रगति पर संतोष जताया।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित चिकित्सकों की जरूरत को महत्त्व नहीं देना और उन क्षेत्रों में जन स्वास्थ्य की समस्या के समाधान के प्रति अनिच्छा होना इस स्थिति में मददगार नहीं होगा। अंतर-स्नातक चिकित्सा शिक्षा के वैकल्पिक प्रारूप विषय पर चर्चा के लिए आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तावित ग्रामीण औषधि और शल्य चिकित्सा स्नातक (बीआरएमएस) पाठयक्रम में ग्रामीण क्षेत्रों में जन स्वास्थ्य के लिए एक समुदाय आधारित समाधान के बारे में पहली बार चर्चा की जा रही है।

उन्होंने इस आशंका को दूर करते हुए कहा कि यह पाठयक्रम ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि हम एमबीबीएस अथवा विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्थान पर इन्हें नहीं ला रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस प्रस्ताव में मेधाविता के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया गया है, ताकि उन्हें प्राथमिक रूप से 1,45,000 उपकेन्द्रों में अथवा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में काम करने के लिए तैयार किया जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये प्रशिक्षित लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में एमबीबीएस चिकित्सकों के अतिरिक्त होंगे। फिलहाल आशा के बाद सहायक दाई (एएनएम) की देखरेख में जन स्वास्थ्य प्रणाली की सबसे आधारभूत इकाई उप केन्द्र काम कर रहे हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रस्तावित योजना के दुरुपयोग को रोकने के लिए उपाय भी होना चाहिए। उन्होंने भारतीय चिकित्सा परिषद से इस पर कड़ी नजर रखते हुए इसके लिए वार्षिक लाइसेंस प्रक्रिया स्थापित करने को कहा।

स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. वर्ष 2005 के दौरान देश में 1,46,800 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हुआ। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2012 तक यह बढ़कर 8 लाख टन हो जाएगा। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि मुम्बई, दिल्ली, बंगलुरू, कोलकाता, चेन्नई, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, सूरत और नागपुर इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने वाले दस शीर्ष नगर हैं।

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इलेक्ट्रॉनिक कचरा सहित नुकसानदायक कचरे के समुचित प्रबंधन और आवाजाही के लिए नुकसानदायक कचरा (प्रबंधन, आवाजाही और सीमा-पार आवाजाही) नियमावली, 2008 अधिसूचित किया है। नियमानुसार इलेक्ट्रॉनिक कचरे की आवाजाही से जुड़ी सभी इकाइयों के लिए केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पंजीकरण कराना जरूरी है और नुकसानदायक कचरे को पंजीकृत अथवा अधिकृत पुनर्चक्रण करने वाले अथवा पुन: प्रसंस्कृत करने वाले अथवा पुन: उपयोग करने वाले के पास बेचा जाएगा। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन के लिए मार्ग निर्देश जारी किए गए हैं।

मौसम

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

आज का दिन

आज का दिन
आज का दिन : 23 सफ़र उल-मुज़फ्फर हिजरी सन् 1431, 9 फरवरी 2010 मंगलवार. तिथि संवत : फाल्गुन कृष्ण एकादशी, संवत् 2066, शाके- 1931, रवि उत्तरायने, शिशिर ऋतु. सूर्योदय कालीन नक्षत्र : मूल नक्षत्र दूसरे दिन प्रात: 6.56 तक, हर्षण योग तथा बवकरण. ग्रह विचार : सूर्य, बुध- मकर, गुरु, शुक्र- कुंभ, केतु- मिथुन, मंगल- कर्क, शनि - कन्या तथा चंद्र, राहु- धनु राशि में. चौघड़िया मुहूर्त : प्रात: 09.51 से 11.16 तक चंचल, प्रात: 11.16 से 12.41 तक लाभ, दोपहर. 12.41 से 02.05 तक अमृत, सायं 7.55 से 9.30 तक लाभ. राहुकाल : अपराह्न् 3.30 बजे से 4.55 बजे तक. शुभ अंक- 4, शुभ रंग-पीला

कैमरे की नज़र से...

इरफ़ान का कार्टून कोना

इरफ़ान का कार्टून कोना
To visit more irfan's cartoons click on the cartoon

ई-अख़बार

Blog

  • सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी - *फ़िरदौस ख़ान* सुप्रीम कोर्ट की उस ऐतिहासिक टिप्पणी से मुस्लिम महिलाओं को काफ़ी राहत मिलेगी, जिसमें कोर्ट ने कहा है कि पहली पत्नी के रहते कोई भी सरकारी कर्मच...
  • इंतज़ार - मेरे महबूब तुम्हारे इंतज़ार ने उम्र के उस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां से शुरू होने वाला एक सफ़र सांसों के टूटने पर ख़त्म हो जाता है लेकिन- फिर यहीं से शुरू...
  • ਸਜਣ ਬਿਨ ਰਾਤੀਂ ਹੋਇਯਾਂ ਵੱਡੀਆਂ - ਸਜਣ ਬਿਨ ਰਾਤੀਂ ਹੋਇਯਾਂ ਵੱਡੀਆਂ ਰਾਂਝਾ ਜੋਗੀ ਮੈਂ ਜੁਗਿਆਣੀ ਕਮਲੀ ਕਹਿ-ਕਹਿ ਛਡੀਆਂ ਮਾਸ ਝੜੇ ਝੜੀ ਪਿੰਜਰ ਹੋਇਯਾਂ ਕਰਕਨ ਲਗੀਆਂ ਹਡੀਆਂ ਮੈਂ ਇਆਣੀ ਨੇਹੁੰ ਕੀ ਜਾਣਾ ਬਿਰਹੁ ਤਣਾਵਾਂ ਕੀ ਗਡੀਆਂ...

किस तरह की ख़बरें चाहते हैं

Search