मेरा महबूब
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नाम : बहारों का मौसम
तअरुफ़ : मेरा महबूब
ज़बान : शहद से शीरी
लहजा : झड़ते फूल
पता : फूलों की वादियां
महिलाओं को आरक्षण मिलने पर देश भर में खुशियां मनाई गईं. होली पर बचा हुआ रंग लगाकर पिछली तमाम होलियों को रिजेक्ट किया गया और दोबारा से होली मनाई गई. कई जगहों पर दीवाली पर बचे कान-फोडू पटाखे भी छोड़े गए. कुल मिलाकर, वह सब किया गया, जिससे यह पता चल सके कि वे वाक़ई बहुत खुश हैं. पुरुषों को भी लगा कि हो ना हो, एक दिन उनको भी आरक्षण मिलेगा. ऐसा अगर नहीं हुआ तो बराबरी के हक़ वाली कहानी अधूरी रह जायेगी. कई जगह, जब गाने-बाजे के साथ महिलाओं के जुलूस निकले तो पुरुषों ने अपनी दुकानें समेटनी शुरू कर दीं कि अब फिर से कोई नई मुसीबत आने वाली है. कुछ लोगों ने अपने गल्ले में से रुपये निकालकर अपने हाथों में ले लिए कि किसी नेता के जन्मदिन के नाम पर कहीं कुछ चंदा-वंदा ना देना पड़ जाए.
इधर, पार्लियामेंट यह सोच कर दुखी थी कि कोई ढंग का काम करो तो भी उसे शोर-शराबा करने के 'प्वाइंट ऑफ व्यू' से नकार दिया जाता है कि यह जो काम हमारी सरकार नहीं कर पाई, इस सरकार ने कैसे कर दिया और यह शराफत के ख़िलाफ है. ढंग का काम ना करो तब तो मुसीबत है ही कि यह काम उस ढंग से क्यों नहीं किया गया, जिस ढंग से हमारी पार्टी और उसके नेता चाहते थे कि हो. या इतनी बात ही हंगामे काटने के लिए काफी होती है कि ढंग का काम करते वक़्त उन्हें विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? हम पर विश्वास करके अगर विश्वास में ले लेते तो क्या घिस जाता?
जब तक सदन की कार्यवाही कई मर्तबा स्थगित ना हो, लगता नहीं कि वहां किसी किस्म की कोई कार्यवाही हो रही है. ऐसा लगता है जैसे अपना वक़्त काटने को कई सारे लोग एक जगह इकट्ठे होकर यह विचार करने को बैठे हों कि अब किस पर और क्या विचार करना है? किसी ने अपना कोई विचार रख दिया तो इसी बात पर हंगामा कि यह विचार रखने की ज़रुरत ही क्या थी, जब कि इस पर पहले ही कई मर्तबा विचार हो चुका है. या किसी ने देश की तरक्की को लेकर अपना कोई सर्वथा मौलिक विचार रख दिया तो विपक्षियों की ओर से इसे लोकतंत्र के ख़िलाफ एक सोची-समझी साज़िश करार देते हुए इसी बात पर हंगामा कि यह विचार उनके मन में आया ही कैसे कि वे इसे विचारेंगे और हम उसे ज्यों का त्यों मान लेंगे?
'महिला-आरक्षण बिल' को पास करने से पहले इतने बवाल नहीं हुए, जितने उसके पास होने के बाद अब रोज़ाना सदन में हो रहे हैं. सरकार को किसी वजह से बाहर से समर्थन दे रहे कुछ दलों के नेता इस बात से नाराज़ हैं कि हमारे सांसदों को मार्शलों की मार्फ़त बाहर निकलवाने वाली सरकार ने हम पर यह विश्वास क्यों नहीं किया कि थोड़ी बहुत बहसबाजी के बाद हम भी इसे पास करने में अपना समर्थन दे सकते थे? सरकार में रहना भी एक अच्छी लगने वाली मुसीबत का काम है. ख़ासतौर से, अगर वह बाहर से समर्थन दे रहे कुछ सांसदों के बलबूते टिकी ना रहने के मुगालतों से भरी हो.
उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते धन की चाहत ने लोगों को संवेदनहीन बना दिया है। वे पैसा कमाने के लिए खाद्य पदार्थों में भी मिलावट करने लगे हैं। कुछ जालसाज और स्वार्थी लोगों द्वारा शुद्ध दूध के नाम पर ‘सिंथेटिक दूध’ पीने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
यह सिंथेटिक दूध रिफाइंड आयल, कास्टिक सोडा, यूरिया, चीनी और डिटर्जेंट के मिश्रण से बनाया जाता है। यह कृत्रिम दूध स्वास्थ्य के लिए विशेषकर बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और हृदय व गुर्दे की बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए बेहद नुकसानदेह है।
अकेले दिल्ली महानगर में रोजाना करीब 55 लाख लीटर दूध् की मांग है, जिसमें से मदर डेयरी से करीब 13 लाख लीटर दूध, दिल्ली दुग्ध योजना से ढाई लाख लीटर, संगठित क्षेत्र की डेयरियों से करीब 14 लाख लीटर और असंगठित क्षेत्र के दुग्ध उत्पादकों, किसानों और पड़ोसी राज्यों से प्रतिदिन आने वाले दूध वालों से साढ़े तीन लाख लीटर दूध की आपूर्ति हो रही है। इसके अलावा करीब 23 लाख लीटर दूध की शुद्धता को लेकर भारी संदेह है।
इस बात की प्रबल संभावना है कि यह दूध् कृत्रिम तरीकों से निर्मित किया जाता है। गौरतलब है कि नकली दूध प्राकृतिक दूध की तरह ही दिखता है। लेकिन, इसका स्वाद थोड़ा-सा अलग होता है। इसके बावजूद चखने से इसकी पहचान नहीं हो पाती। सिंथेटिक दूध में सस्ते खाद्य तेल का इस्तेमाल किया जाता है। कपड़े धोने के काम आने वाले डिटर्जेंट का इस्तेमाल इमप्लीफाई करने में होता है। इस विलयन को पानी में मिलाकर झाग पैदा किए जाते हैं।
इसमें यूरिया और चीनी प्राकृतिक दूध के प्रोटीन, विटामिन और खनिज लवण का स्थान लेते हैं। तेल वसा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। प्राकृतिक दूध में 86 फीसदी पानी होता है। भैंस के दूध में छह फीसदी वसा होता है। गाय के दूध में वसा तीन से साढ़े चार फीसदी होता है। प्रोटीन, विटामिन, पोटेशियम और पोटेशियम-कैल्शियम के खनिज लवणों की मात्रा नौ फीसदी होती है। कच्चा दूध जल्दी ही फट जाता है। निकालने के चार घंटे के भीतर उबाल न लिया जाए या पाश्चराइज्ड न कर लिया जाए। तो यह निश्चित ही फट जाता है।
कहते हैं कि करीब डेढ़ दशक पहले हरियाणा के चंद ग्वालों ने कृत्रिम ढंग से दूध बनाना शुरू किया था। लेकिन, उसके बाद सफेद दूध का यह काला कारोबार उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान सहित देशभर में फैल गया। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि आम उपभोक्ता प्राकृतिक दूध और सिंथेटिक दूध में फर्क नहीं कर पाता। दूध के वसा और तेल के वसा में अंतर का पता विशेष उपकरणों के माध्यम से ही किया जा सकता है। ‘लेक्टोमीटर’ तो यह भी नहीं बता सकता कि दूध में यूरिया मिलाया गया है या नहीं? लेकिन, कोई भी तरीका इतना सस्ता और सुलभ नहीं है कि उसे घर पर ही इस्तेमाल में लाया जा सके। अगर कुछ देर बाद दूध के प्राकृतिक रंग में पीलापन आ जाए तो यह तय है कि दूध में कास्टिक सोडा मौजूद है।
प्राकृतिक दूध को अधिक समय तक संरक्षित रखने के लिए यूरिया, कास्टिक, रीठा पाउडर, केस्टर आयल, पैराफिन आदि रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। यह दूध काफी समय तक नहीं फटता। यहां तक कि छेना मिठाई बनाने वाले हलवाई भी इस दूध को फाड़ने में परेशानी महसूस करते हैं। दूध को संरक्षित रखने के लिए उसमें रसायनों को मिलाने जाने को उचित ठहराते हुए दुग्ध व्यापारी दलील देते हैं कि दिल्ली, कोलकाता और मुंबई आदि महानगरों में दूध की खपत ज्यादा है। इसलिए दूर-दराज के इलाकों से दूध ले जाना पड़ता है। परिवहन में दो से सात घंटे तक का समय लगता है। ऐसी हालत में दूध को खराब होने से बचाने के लिए उन्हें मजबूरन रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल करना पड़ता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कास्टिक सोडे में मौजूद सोडियम से अत्यधिक तनाव की बीमारी हो सकती है। बुजुर्गों के लिए तो यह और भी ज्यादा नुकसानदायक है। हृदय रोगियों के लिए भी यह घातक साबित हो सकता है। कास्टिक सोडे के कारण शरीर लाइसिन का इस्तेमाल नहीं कर पाता है। लाइसिन नामक एमीनो एसिड बच्चों के विकास के लिए जरूरी है। इसके सेवन करने से आंतों में घाव होने का खतरा भी पैदा हो जाता है।
बाजार में दूध के नाम पर सिंथेटिक दूध बेचकर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वह समय रहते कृत्रिम दूध की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए उचित व कारगर कदम उठाए। कृत्रिम दूध बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। जनता को संचार माध्यम द्वारा जागरूक करना चाहिए। हालांकि दिल्ली राज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सिंथेटिक दूध की रोकथाम के लिए अधिकारियों को विशेष निर्देश दिए हैं। लेकिन, इससे कुछ नहीं हो रहा है। अत: गंभीर कदम उठाने की जरूरत है।
पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद
किस मक़तल से गुजरा होगा
ऐसा सहमा-सहमा चांद
यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तनहा चांद
मेरे मुंह हो किस हैरत से
देख रहा है भोला चांद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चांद
इतने रोशन चेहरे पर भी
सूरज का है साया चांद
जब पानी में चेहरा देखा
तूने किसको सोचा चांद
बरगद की एक शाख हटाकर
जाने किसको झांका चांद
रात के शाने पर सर रखे
देख रहा है सपना चांद
सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद
रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चांद
-परवीन शाकिर
हिज्र की शब और ऐसा चांद
किस मक़तल से गुजरा होगा
ऐसा सहमा-सहमा चांद
यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तनहा चांद
मेरे मुंह हो किस हैरत से
देख रहा है भोला चांद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चांद
इतने रोशन चेहरे पर भी
सूरज का है साया चांद
जब पानी में चेहरा देखा
तूने किसको सोचा चांद
बरगद की एक शाख हटाकर
जाने किसको झांका चांद
रात के शाने पर सर रखे
देख रहा है सपना चांद
सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद
रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चांद
-परवीन शाकिर
दुनिया की क़रीब आधी आबादी महिलाओं की है। इस लिहाज़ से महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है। कमोबेश दुनियाभर में महिलाओं को आज भी दोयम दर्जे पर रखा जाता है। अमूमन सभी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की प्रवृत्ति है। भारत में ख़ासकर मुस्लिम समाज में तो महिलाओं की हालत बेहद बदतर है। सच्चर समिति की रिपोर्ट के आंकड़े भी इस बात को साबित करते हैं कि अन्य समुदायों के मुक़ाबले मुस्लिम महिलाएं आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से ख़ासी पिछड़ी हुई हैं, लेकिन काबिले-तारीफ़ बात यह है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद मुस्लिम महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में ख्याति अर्जित कर रही हैं।
सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ देशभर में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर 53.7 फ़ीसदी है। इनमें से अधिकांश महिलाएं केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित हैं। सात से 16 आयु वर्ग की स्कूल जाने वाली लडक़ियों की दर केवल 3.11 फ़ीसदी है। शहरी इलाकों में 4.3 फ़ीसदी और ग्रामीण इलाकों में 2.26 फ़ीसदी लडक़ियां ही स्कूल जाती हैं। वर्ष 2001 में शहरी इलाकों में 70.9 फ़ीसदी लडक़ियां प्राथमिक स्तर की शिक्षा हासिल कर पाईं, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह दर 47.8 फ़ीसदी है। वर्ष 1948 में यह दर क्रमश: 13.9 और 4.0 फ़ीसदी थी। वर्ष 2001 में आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाली शहरी इलाकों की लडक़ियों की दर 51.1 फ़ीसदी और ग्रामीण इलाकों में 29.4 फ़ीसदी है। वर्ष 1948 में शहरी इलाकों में 5.2 फ़ीसदी और ग्रामीण इलाकों में 0.9 फ़ीसदी लडक़ियां ही मिडल स्तर तक शिक्षा हासिल कर पाईं। वर्ष 2001 में मैट्रिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाली लडक़ियों की दर शहरी इलाकों में 32.2 फ़ीसदी और ग्रामीण इलाकों में 11.2 फ़ीसदी है। वर्ष 1948 में यह दर क्रमश: 3.2 और 0.4 फ़ीसदी है।
शिक्षा की ही तरह आत्मनिर्भरता के मामले में भी मुस्लिम महिलाओं की हालत चिंताजनक है। सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ 15 से 64 साल तक की हिन्दू महिलाओं (46.1 फ़ीसदी) के मुकाबले केवल 25.2 फ़ीसदी मुस्लिम महिलाएं ही रोज़गार के क्षेत्र में हैं। अधिकांश मुस्लिम महिलाओं को पैसों के लिए अपने परिजनों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसके चलते वे अपनी मर्ज़ी से अपने ऊपर एक भी पैसा ख़र्च नहीं कर पातीं।
यह एक कड़वी सच्चाई है कि मुस्लिम महिलाओं की बदहाली के लिए 'धार्मिक कारण' काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं। इनमें बहुपत्नी विवाह और तलाक़ के मामले मुख्य रूप से शामिल हैं। इतना ही नहीं शरीयत की आड़ में उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित भी किया जाता है और जब भी कोई पीड़ित महिला अदालत के दरवाज़े पर दस्तक देती है तो उससे कठमुल्लाओं को तकलीफ़ होने लगती है। गौरतलब है कि पिछले साल 21 जनवरी को मुंबई की एक अदालत द्वारा तलाक़ के बारे में दिए गए फ़ैसले से भी कठमुल्लाओं की भवें तन गई थीं। उन्होंने अदालत के फ़ैसले को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में हस्तक्षेप क़रार देते हुए इसे मानने तक से इंकार कर दिया था।
पुरातनपंथी तुच्छ मानसिकता को त्याग कर मुंबई उच्च न्यायालय के फ़ैसले का खुले दिलो-दिमाग़ से स्वागत करना चाहिए था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बीएच मारलापाले ने दिलशाद बेगम द्वारा दायर एक याचिका की सुनवाई के बाद महत्वपूर्ण फ़ैसला दिया कि कोई भी व्यक्ति महज़ तीन बार तलाक़ कहकर अपनी पत्नी से संबंध नहीं तोड़ सकता है। दिलशाद बेगम को जून 1989 में उसके पति अहमद ख़ान पठान ने तीन बार तलाक़ कहकर घर से निकाल दिया था। इस मामले में पश्चिमी महाराष्ट्र के बारामती के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी की धाराओं के तहत हर्जाने के रूप में दिलशाद बेगम को चार सौ रुपये प्रति माह दिए जाने का आदेश दिया था। महज़ एक माह गुज़ारा भत्ता देने के बाद मई 1994 में दिलशाद के पति ने एक स्थानीय मस्जिद में जाकर उसे तलाक़ दे दिया था। साथ ही अहमद ख़ान पठान ने दिलशाद बेगम को दिया जाना वाला भत्ता भी बंद कर दिया और सेशन कोर्ट में न्यायिक मजिस्ट्रेट के फ़ैसले को चुनौती भी दे डाली।
उसका तर्क था कि शरीयत (इस्लामी क़ानून) के मुताबिक़ तलाक़शुदा महिला को गुज़ारा भत्ता देने का प्रावधान नहीं है। इस पर सेशन कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को ख़ारिज कर दिया। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दिलशाद बेगम ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई, जहां उसे इंसाफ़ मिल गया। मगर यहां फिर कट्टरपंथियों ने उच्च न्यायालय के आदेश को मानने से इंकार करते जहां भारतीय संविधान का मखौल उड़ाया वहीं, एक पीड़ित महिला के साथ भी ज़्यादती करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सनद रहे 1981 में भी इसी तरह के एक मामले में न्यायमूर्ति मणिसेना और न्यायमूर्ति एसवी राम की खंडपीठ ने अनवरी बेगम को राहत देते हुए तलाक़ को अवैध क़रार दिया था। इस मामले में जियाउद्दीन ने एक बार तलाक़ कहकर ही अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया था। अपना फ़ैसला सुनाते हुए अदालत ने शरीयत का हवाला भी दिया था।
गौर करने लायक़ बात यह भी है कि दिलशाद बेगम के मामले में अदालत की टिप्पणी शरीयत के मद्देनज़र भी जायज़ है। अदालत ने कहा है कि केवल तीन बार तलाक़ बोलकर ही कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक़ नहीं दे सकता। मौखिक या लिखित तलाक़ कहने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि अपनी समस्या के निपटारे के लिए तलाक़ कहने वाले व्यक्ति ने सुलह के प्रयास किए हैं। शरीयत के मुताबिक़ तलाक़ को एक बड़ा गुनाह माना गया है और इसे ख़ुदा की सबसे ज्यादा नापसंद चीज़ों में शामिल किया गया है। अगर हालात ऐसे पैदा हो जाएं कि तलाक़ के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचता तो इसके लिए भी नियम तय किए गए हैं। इनके तहत पति और पत्नी के पक्ष का एक-एक व्यक्ति बातचीत के ज़रिये दोनों में सुलह कराने का प्रयास करेगा।अगर उन्हें इसमें कामयाबी न मिले तो वे क़ाज़ी के पास जाएंगे और क़ाज़ी उन्हें विचार-विमर्श के लिए तीन महीने का समय देगा। इस दौरान दोनों को एक ही घर में रहना होगा, ताकि समझौते की संभावना बनी रहे। अगर इस पर भी उनमें सुलह नहीं होती है तो क़ाज़ी उन्हें तलाक़ का हुकम देगा। क़ुरान शरीफ़ में कहीं भी एक साथ तीन बार तलाक़ कहने की बात नहीं कही गई है। मगर इसके बावजूद मुस्लिम समाज में पुरुष महिलाओं को तलाक़ देकर कभी भी घर से निकाल देते हैं और सबसे शर्मनाक बात यह है कि मंजहब के ठेकेदार भी इसमें पुरुषों को भरपूर सहयोग देते हैं। हैरत की बात यह भी है कि क़ुरान को अल्लाह का आदेश बताने वाले कठमुल्ला महिलाओं पर अत्याचार के मामले में ईश्वरीय आदेश तक की अवहेलना करने से बाज़ नहीं आते। यह कहना ग़लत न होगा कि कठमुल्लाओं को न तो ईश्वर के आदेश की परवाह है और न ही भारतीय संविधान की, उन्हें तो महज़ अपनी 'दुकानदारी' चलानी है।
यह कोई पहला मामला नहीं है जब शरीयत के नाम पर किसी पीड़ित महिला पर ज़्यादती की गई हो। 1986 में शाहबानो ने अपने पति से गुज़ारा भत्ता पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था। याचिका की सुनवाई के बाद अदालत ने जो फ़ैसला सुनाया था उससे शाहबानो को तो कुछ राहत मिली थी, लेकिन यह मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे से बाहर चला गया था। दरअसल जिस धारा के तहत यह फ़ैसला सुनाया गया था, वह मुसलमानों पर (मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण) लागू ही नहीं होती थीं। नतीजतन, सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले पर काफ़ी हंगामा हुआ था और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार को लोकसभा में विधेयक लाकर इस फ़ैसले को आंशिक रूप से बदलना तक पड़ा था। इस विधेयक का मक़सद सिर्फ़ कठमुल्लाओं को ख़ुश रखना था।अगर केंद्र की कांग्रेस सरकार चाहती तो सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का सम्मान करते हुए इसे बरक़रार रख सकती थी, मगर उसने ऐसा नहीं किया।
गौरतलब है कि उड़ीसा के भद्रक की नजमा बीबी को उसके पति शेर मोहम्मद ने नशे की हालत में 15 जुलाई 2003 को तीन बार तलाक़ दे दिया था। इसी आधार पर कठमुल्लाओं ने उन्हें अलग रहने पर मजबूर कर दिया। इस पर दम्पति ने पारिवारिक अदालत की शरण ली और फ़ैसला उनके हक़ में रहा। इसके बाद भी कठमुल्लाओं के विरोध के चलते उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे ख़ारिज कर दिया गया। इस पर उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। अदालत ने सुनवाई के बाद 21 अप्रैल 2006 को तलाक़ को अनुचित क़रार देते हुए उन्हें साथ रहने की अनुमति दी। साथ ही उडीसा सरकार को दम्पति को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश भी दिया। मगर कठमुल्लाओं ने सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को मानने तक से इंकार कर दिया। देवबंदी उलेमा ने तो यहां तक कह दिया कि सर्वोच्च न्यायालय को इस्लामी शरीयत में दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है।
इतना ही नहीं महिलाओं के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी करना भी कठमुल्लाओं का एक शगल बन चुका है। 15 मार्च 2006 को ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड (जदीद) के अध्यक्ष मौलाना तौक़ीर रज़ा ख़ां ने जदीद की बरेली में हुई बैठक में बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन का सिर क़लम करने वाले व्यक्ति को पांच लाख रुपये का इनाम देने का ऐलान किया था। साथ ही उनके भारत में प्रवेश पर रोक लगाने और उनका वीज़ा समाप्त करने की मांग भी केंद्र सरकार से कर डाली। इस मौलाना ने पिछले साल अमेरिका के राष्ट्रपति डब्ल्यू जॉर्ज बुश का सिर कलम करने वाले व्यक्ति को 25 सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। अदालती फैसलों पर टिप्पणी करते हुए तौक़ीर मियां ने यह भी चेतावनी दे डाली कि शरीयत (इस्लामी क़ानून) में किसी किस्म की भी दख़ल अंदाज़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए सहयोग देने पर मीडिया की सराहना करना तो दूर, बल्कि उन्होंने मीडिया पर ही कई आरोप जड़ डाले। इससे पहले कोलकाता के इमाम सैयद नुरूल रहमान बरकाती ने तस्लीमा नसरीन की मौत का फ़तवा जारी किया था।गत नौ अगस्त को हैदराबाद में मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (एमआईएम) के तीन विधायकों मौअज्ज़म ख़ान, मुक्तादा अफ़सर ख़ान और पाशा क़ादरी के नेतृत्व में भीड़ ने तसलीमा नसरीन पर हमला कर दिया और अगली बार हैदराबाद आने पर उनका सिर क़लम करने की घोषणा भी की।
बलात्कार के मामलों में भी पीड़ित महिलाओं पर अत्याचार करते हुए बलात्कारियों के पक्ष में फ़तवे जारी किए गए। जून 2005 में मुज़फ्फ़रपुर की इमराना को उसके ससुर अली मोहम्मद ने अपनी हवस का पक्ष में फ़तवा दिया था। फ़तवे कहा गया था कि वह अब अपने ससुर को पति मानेगी। इस रिश्ते से उसे अपने पति नूर इलाही को पुत्र मानना होगा। इमराना मामले में अदालत का फ़ैसला आने तक दो अन्य मुस्लिम महिलाओं ने इंसाफ़ के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग का दरवाज़ा खटखटाया। मुज़फ़्फ़रनगर की ही 28 वर्षीय रानी के साथ भी उसके ससुर ने बलात्कार किया था। हरियाणा की भी एक महिला को उसके ससुर ने हवस का शिकार बनाया। इस हादसे के बाद पीड़ित महिला अपने मायके आ गई तो बलात्कारी ससुर उसके पति की हैसियत से उसे लेने तक पहुंच गया.
गौरतलब है कि शरीयत के मुताबिक़ किसी महिला का अपने पति के रक्त संबंधियों के साथ शारीरिक संबंध क़ायम हो जाने पर उसकी शादी की मान्यता ख़त्म हो जाती है, लेकिन निश्चित रूप से ऐसा संबंध बलात्कार नहीं होता।25 जुलाई 2006 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले के गांव कंटाबागन की रेहाना के साथ वहीं के मंसूर मलिक ने बलात्कार किया। इस मामले में भी कठमुल्लाओं ने पीड़िता को प्रताड़ित करते हुए फ़ैसला सुनाया कि अब वह अपने पति की पत्नी नहीं रही और उसे बलात्कारी से निकाह करना होगा। शर्मनाक बात यह भी है कि रेहाना और उसके पति मुलुक शेख़ से कहा गया कि अगर वे 50 हजार रुपये मौलवी के पास जमा करा दें तो 'शरीयत' उन पर रहम करेगी, यानी सब खेल पैसों का है।
इसी तरह वर्ष 2006 में बिहार के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के गांव चांदवाडी में बलात्कार की शिकार एक गूंगी महिला को बच्चे को जन्म देने की वजह से नापाक क़रार दे दिया था। इतना ही नहीं कठमुल्लाओं ने दबाव बनाकर महिला को उसके पति के घर से निकलवा दिया। जब वह अपने पिता शमशेर अली के घर चली गई तो कठमुल्लाओं ने उसके पिता पर भी बेटी को घर से निकालने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया, मगर जब वह नहीं माने तो कठमुल्लाओं ने उन्हें प्रताड़ित करते हुए गांव के कुछ लोगों के साथ मिलकर उनका बहिष्कार करा दिया। हैरत की बात तो यह है कि बलात्कारी के ख़िलाफ़ कठमुल्लाओं ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुरुषों को सज़ा देने की बात पर कठमुल्ला शरीयत को भूल जाते हैं कि इस्लाम में बलात्कारी को सरेआम तब तक कोड़े मारने की बात कही गई है, जब तक की उसकी मौत नहीं हो जाती।
यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि मुस्लिम समाज में महिलाओं को केवल भोग की वस्तु बनाकर रख दिया गया है। इसीलिए शरीयत का डंडा भी हमेशा महिलाओं के ख़िलाफ़ ही चलता है। फ़तवा चाहे तस्लीमा नसरीन के ख़िलाफ़ जारी हो या किसी अन्य पीड़ित महिला के ख़िलाफ़, सभी में अमानवीयता कूट-कूटकर भरी है। कठमुल्ला आए दिन फ़तवे जारी महिलाओं की ज़िन्दगी में ज़हर घोलते रहते हैं, लेकिन 14 करोड़ क़ी मुस्लिम आबादी वाले देश में न तो किसी मुस्लिम संगठन ने इनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत की है और न ही छदम धार्मिक निरपेक्षता के चलते महिला आयोग या अन्य संगठन ने पीड़ित महिलाओं को सहारा दिया। कठमुल्लाओं का इतना खौफ़ है कि मार्च 2004 में मानवाधिकार आयोग ने भी नजमा बीबी के मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया था। मुसलमानों के मसीहा होने का दम भरने वाले और क़ौम की तरक्की के लिए सरकार से अनेक सुविधाओं की मांग करने वाले तथाकथित मुस्लिम नेता भी इस तरह के मामलों में दुबककर बैठ जाते हैं। जो नेता अपने क़ौम की महिलाओं पर अत्याचार होते देख ख़ामोश रहकर कठमुल्लाओं के हौसले बुलंद करते हैं, वे समुदाय का क्या भला करेंगे, यह वाक़ई समझ से परे है।
वर्ष 2006 में राजधानी में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव व राज्यसभा सांसद महमूद मदनी ने मुस्लिम महिलाओं के ख़िलाफ़ जारी फ़तवों का समर्थन करते हुए कहा था कि मैं मुसलमान हूं और फ़तवों को मानने के लिए बाध्य हूं। यानी जो मुसलमान है, उसे फ़तवों को मानना ही पडेग़ा। अब जब क़ौम के रहनुमाओं की यह मानसिकता है तो अधिकांश अनपढ़ तबके से क्या उम्मीद की जा सकती है? हक़ीक़त यह भी है कि इसी तालिबानी मानसिकता ने मुसलमानों को आगे नहीं बढ़ने दिया।
हक़ीक़त यह है कि मज़हब के ठेकेदार 'शरीयत' की परिभाषा अपने स्वार्थ की पूर्ति के नजरिये से करते हैं। भारत में इस्लाम का जो रूप प्रचलित है, इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगम्बर हज़रत मुहम्मद उसे नापसंद करते थे। क़ुरान में महिलाओं को सम्मानजनक दर्जा दिया गया है। यहां तक कहा जाता है कि मां के क़दमों के नीचे जन्नत है। हज़रत मुहम्मद के वक़्त में भी महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिए गए थे। वे मस्जिदों में जाकर नमाज़ पढती थीं और पुरुषों की तरह ही घर से बाहर जाकर काम करती थीं। अनगिनत युध्दों में महिलाओं ने अपने युध्द कौशल का लोहा भी मनवाया। प्रसिध्द औहद की जंग में जब हज़रत मुहम्मद ज़ख्मी हो गए तो उनकी बेटी फ़ातिमा ने उनका इलाज किया।
उस दौर में भी रफायदा और मैमूना नाम की प्रसिध्द महिला चिकित्सक थीं। रफायदा का तो मैदान-ए-नबवी में अस्पताल भी था, जहां गंभीर मरीज़ों को दाख़िल किया जाता था। मुस्लिम महिलाएं शल्य चिकित्सा भी करती थीं। उम्मे ज़ियाद शाज़िया, बिन्ते माऊज़, मआज़त-उल-अपगारिया, अतिया असरिया और सलीम अंसारिया आदि उस ज़माने की प्रसिध्द शल्य चिकित्सक थीं। मैदान-ए-जंग में महिला चिकित्सक भी पुरुषों जैसी ही वर्दी पहनती थीं। हज़रत मुहम्मद की पत्नी ख़दीजा कपड़े क़ा कारोबार करती थीं। महिला संत राबिया की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। पुरुष संतों की तरह वे भी धार्मिक सभाओं में उपदेश देती थीं। सियासत में भी महिलाओं ने सराहनीय काम किए। रंजिया सुल्ताना हिन्दुस्तान की पहली महिला शासक बनीं। नूरजहां भी अपने वक्त क़ी ख्याति प्राप्त राजनीतिक रहीं, जो शासन का अधिकांश कामकाज देखती थीं।1857 की जंगे-आज़ादी में कानपुर की हरदिल अज़ीज़ नृत्यांगना अज़ीज़न बाई सारे ऐशो-आराम त्यागकर देश को गुलामी की ज़ंजीरों से छुड़ाने के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ीं। उन्होंने महिलाओं के समूह बनाए जो मर्दाना वेश में रहती थीं। वे सभी घोड़ों पर सवार होकर और हाथ में तलवार लेकर नौजवानों को जंगे-आंजादी में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करती थीं। अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को मज़बूत करने के लिए उत्कृष्ट कार्य किए।
मौजूदा दौर में भी विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएं अपनी योग्यता का परिचय दे रही हैं।तुर्की जैसे आधुनिक देश में ही नहीं, बल्कि कट्टरपंथी समझे जाने वाले पाकिस्तान और बांग्लादेश सरीखे देशों में भी महिलाओं को प्रधानमंत्री तक बनने का मौक़ा मिला है। वाक़ई यह एक ख़ुशनुमा अहसास है कि 'मज़हब के ठेकेदारों' की तमाम बंदिशों के बावजूद मुस्लिम महिलाएं आज राजनीति के साथ खेल, व्यापार, उद्योग, कला, साहित्य, रक्षा और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। जम्मू कश्मीर के कुलाली-हिलकाक इलाक़े की मुनिरा बेगम ने आतंकवादियों का मुंकाबला करने के लिए बंदूक़ उठा ली। उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चलते हुए सूरनकोट के गांव की अन्य महिलाओं ने भी हथियार उठाकर आतंकवादियों से अपने परिजनों की रक्षा करने का संकल्प लिया। पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम की शबनम आरा ने तमाम अवरोधों को पार कर गांव के क़ाज़ी का पद संभाला।
इसमें दो राय नहीं कि आज मुसलमानों में ऐसे चेहरे भी सामने आ रहे हैं जो इस्लाम के उस वास्तविक रूप को सबके सामने रखना चाहते हैं, जिसकी बुनियाद ही कुप्रथाओं के ख़ात्मे के लिए पड़ी थी। धर्म गुरुओं को भी चाहिए कि वे क़ौम को अज्ञानता और रूढ़ियों के अंधेरे से निकालने में महती भूमिका अदा करें। इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय काम करने वाली महिलाओं को प्रोत्साहित करते हुए आदर्श के रूप में पेश किया जाए, जिससे अन्य लडक़ियां भी प्रेरणा हासिल कर सकें।
सरफ़राज़ ख़ान
पूर्वोत्तर भारत में अरुणाचल प्रदेश के कामेंग जिले में पाखुई बाघ संरक्षित क्षेत्र एक सुरक्षित क्षेत्र है। यहां दूर-दूर तक हरियाली फैली है और विभिन्न वन्य जीव रहते हैं। इस बाघ संरक्षित क्षेत्र का मुख्यालय सीजुसा है, जो असम के साइबारी से 21 किलोमीटर की दूरी पर है। यह बाघ संरक्षित क्षेत्र पश्चिम और उत्तर में कामेंग नदी, पूर्व में पक्के नदी तथा दक्षिण में असम की दुर्गम सीमा से घिरी है। इसमें काफी घने वन हैं। इसमें कई तरह के पर्यावास क्षेत्र, जैसे निचले अर्ध्द सदाबहार, सदाबहार और पूर्वी हिमालय हैं। पूर्वी हिमालय वाले इलाके में चौड़े पत्ते वाले पेड़ पाये जाते हैं। इस बाघ संरक्षित क्षेत्र से असम का नामेरी बाघ संरक्षित क्षेत्र भी लगा हुआ है।
संरक्षित वन से बाघ संरक्षित क्षेत्र
पहले, यह पक्के संरक्षित क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। इसके सीमावर्ती क्षेत्र से कामेंग और पक्के नदियों के बहने के कारण ही इसे सन 1966 में यह नाम दिया गया था। सन 1977 मे इसका नाम बदलकर कोमो अभयारण्य कर दिया गया। बाद में 2002 में इसे पाखुई वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। अंतत: 18 फरवरी, 2002 को इसे भारत सरकार की प्रोजेक्ट टाइगर स्कीम के अंतर्गत ले आया गया और उसके महज पांच दिन बाद ही इसे पाखुई बाघ संरक्षित क्षेत्र नाम दिया गया।
चैम्पियन एवं सेठ के वर्गीकरण के अनुसार इस संरक्षित क्षेत्र को निम्नलिखित वर्गों में बांटा गया है-
1. असम घाटी उष्णकटिबंधीय अर्ध्द सदाबहार वन
2. उप हिमालयी अल्प कछार अर्ध्द सदाबहार वन (92 बीसी151)
3. पूर्वी छोटी पहाड़ी वाले वन (3152(बी) )
4. ऊपरी असम घाटी उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन ( आईबीसी 2बी )
5. उष्णकटिबंधीय नदी क्षेत्र वन ( 4ईआरएसआई)
6. द्वितीयक नम बांस क्षेत्र ( ई12एसआई )
वनस्पति
इस संरक्षित क्षेत्र का निचला इलाका दलदली तथा वर्षा वाले वनों, बड़े पेड़ों जैसे हुलॉक, बोला तथा बड़े-बड़े बांसों, आकिर्ड, क्लाइम्बर्स (बेंत) आदि से ढका है। इस इलाके में बेंत की कैलामस क्रेक्टस, कैलामस टन्यूस तथा कैलामस पऊलैजेला प्रजातियां पाई जाती हैं।
बांस
यहां खासकर उपरी क्षेत्रों में बड़े-बड़े बांस मिलते हैं। अरूणाचल प्रदेश में बांस की 30 प्रजातियां पायी जाती हैं। डेंड्रोकैलामस हेमिटोन्नी, बंबूसा पेलिडा, स्यूडोस्टाकेम पोलीमारफिज्म बांस की महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं। हजार से तीन हजार की ऊंचाई पर पर्णपाती एवं अर्ध्द-पणपाती वन हैं। यहां, अखरोट, बांज, चेस्टनट स्प्रूस और डोडेन्ड्रस जैसे पौधे पाये जाते हैं। 4000 मीटर की ऊंचाई पर छोटे रोडोडेन्ड्रस पाये जाते हैं तथा पांच हजार मीटर की ऊंचाई के आसपास अल्पाइन घास पायी जाती है।
आकिर्ड
आकिर्ड के वन प्रारंभिक, अछूते तथा छेडछाड़ से मुक्त है। एक बहुत बड़े वन यात्री श्रुति रवीन्द्रन लिखते हैं, 'आकिर्ड में ऐसा कुछ है जो हमारे मस्तिष्क में स्त्रियोचित भाव पैदा करता है। यह हमें कस्तूरी के गंध का या गर्मी में भनभनाती मधुमक्खियों-सा भान कराता है। इसकी सुंदरता बहुविध होती है। यह हमें सनसनाती पत्तियों से घोसलें में पड़े कीड़े तक की याद दिलाता है।' दुनियाभर में आकिर्ड की 35000 वन्य प्रजातियां हैं, जिनमें से 1450 प्रजातियां भारत में हैं। इन 1450 प्रजातियों में 900 दुलर्भ एवं उत्तम प्रजातियां अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, सिक्किम तथा पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में पायी जाती हैं। कृषि योग्य बहुविध जलवायवीय अवस्थाएं, उच्च आद्रता और वर्षा एवं सीमावर्ती चीन और बर्मा की प्रजातियों का प्रसार इस इलाके को विभिन्न प्रकार के आकिर्ड के लिए आदर्श पर्यावास बनाते हैं। आकिर्ड जमीन पर उगते हैं। आकिर्ड दो प्रकार के होते हैं। अधिपादप यानि चट्टानों एवं पेड़ों पर उगने वाले आकिर्ड तथा मृतजीवी यानि वन अपशिष्ट पर उगने वाले आकिर्ड। भारत के दुर्लभ आकिर्ड लोस्ट लेडिज स्लीपर तथा नीले वांडा (धारीदार) पेड़ों पर उगते हैं। आकिर्ड साहित्य के अनुसार ब्रिटिश इंडियन आर्मी के एक जवान ने सबसे पहले 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में लोस्ट लेडिज स्लीपर देखा था। लाल और नीले वांडा दूसरे दुर्लभ आकिर्ड हैं जो विलुप्त होने के कगार पर हैं। डिप्लोमेरिस हिरसूट यानि बफीर्लें आकिर्ड को पूर्वी हिमालय में तीन दिनों की यात्रा के बाद देखा जा सकता है।
पेड़ों की प्रमुख प्रजातियों में बड़े पेड़ टर्मिनालिया मायरियोकार्पा (हॉलाक), ऐलांथस इजसेला (बारापेट), दुभानगगरांडिपऊलोरा (खोकान), केनेरियम रेसिनफेरम, ट्रेविया नूडिपऊलोरा, टेट्रोमिलूस नूडिमपऊलोरा, स्टेरकूलिया विल्लोसा, मैक्रोपैनेक्स डेपरमस, सिजिगियमएक्रोकारपम, गार्सिनिया, स्पेशीज, क्यूरकस लामा लियोसा आदि कई प्रकार के वृक्ष शामिल हैं।
वन्य जीव
इस संरक्षित क्षेत्र में बाघ, चीते, बादलों के रंगवाले चीते, जंगली बिल्लियां, जंगली कुत्ते, सियार, भारतीय लोमड़ियां, हमालयी काले भालू, हाथी, गौर, बिटूरोंग, सांभर, पाढा, बाकिर्गं डीयर, स्लो लोरिस, पीले गले वाले अबाबील, मलयालन बड़ी गिलहरी, उड़ने वाली गिलहरी, गिलहरी, मुष्क बिलाव, लंगूर, रियसस मैकेक, असमी मैकेक आदि जानवर पाये जाते हैं। एक अनुसंधानकर्ता ने इस क्षेत्र में पूंछ पर छाप वाले मैकेक के पाये जाने की बात कही है।
चिड़िया
इस संरक्षित क्षेत्र में रंग-बिरंगे पक्षी पाये जाते हैं। उनमें हार्नबिल, सफेद पंख वाले काले बतख, जंगली मुर्गियां, महोख, पंडुक, बसंता, गरूड, बाज आदि शामिल हैं। कुछ सरीसृप जैसे अजगर और करैत सांप भी यहां मिल जाते हैं।
भारत में बाघ अभयारण्य -: नमेरी बाघ अभयारण्य- व्हाईट विंग्ड वुड डक का अंतिम घर
असम का सोनितपुर जिला पूर्वी हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की तराई में स्थित है, जहां नमेरी बाघ अभयारण्य मौजूद है। यह क्षेत्र पूरी दुनिया में फूल-पौधों और वन्य प्राणियों के खजाने के तौर पर जाना जाता है, लेकिन यह सबसे ज्यादा खतरे में भी है। इस पूरे इलाके को जिया भोरोली और दिजी, दिनाई, दोइगुरंग, नमेरी, दिकोराई, खारी आदि सहायक नदियों से पानी मिलता है। अभयारण्य 200 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इससे बालीपारा संरक्षित वन क्षेत्र भी सटा हुआ है, जिससे इसका क्षेत्रफल बढ़ जाता है। बालीपारा संरक्षित वन क्षेत्र जिया भोरोली की उलटी दिशा में 64 वर्ग किलोमीटर और नदुआर संरक्षित वन क्षेत्र के 80 वर्ग किलोमीटर के इलाके में पड़ता है। यह इलाका ऊंचा-नीचा है। नदी के किनारे-किनारे कहीं-कहीं ऊंचाई 80 मीटर है तो मध्य व उत्तरी हिस्से में ऊंचाई 225 मीटर है।
यह पारिस्थितिकी क्षेत्र नार्थ बैंक लैंडस्केप और ईस्टर्न हिमालयन मेगा बायोडाइवर्सिटी हॉटस्पॉट का अंग है। पौधों की किस्मों और पौधों की जटिल संरचना के मामले में यह क्षेत्र दुनिया में सबसे ज्यादा मालामाल है। क्षेत्र पर ऊष्णकटिबंधीय वर्षा का खासा प्रभाव है, जहां मौसमी व भारी वर्षा होती है। मई और सितम्बर के बीच औसतन 3400 मिलीमीटर वर्षा होती है। असम की जिया भोरोली नदी अंग्रेजों के समय से ही महासीर मछली पकड़ने के लिए प्रसिध्द रही है। अरुणाचल प्रदेश के कठोर पर्वतों से बल खाती हुई यह नदी असम के भालुकपुंग के मैदान में उतरती है। यह नदी भारतीय नदियों के बाघ के नाम से प्रसिध्द -सुनहरी महासीर का घर है। एचएस थॉमस ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि महासीर अपने वजन और चपलता में मेरे वतन की शानदार सालमन से बहुत बेहतर है।
जंगलों के प्रकार व बनावट
· असम वेली ट्रापिकल एवरग्रीन फॉरेस्ट - आई आरसी 2 बी मेसुआ सब टाइप
· असम ऐल्युवियल प्लेन्स सेमी एवरग्रीन फॉरेस्ट्स - 2 बीसीआईए फोवे-अनूरा एसोशिएसन
· सब-हिमालयन लाइट एल्युवियल सेमी एवरग्रीन फॉरेस्ट्स, 2बीआईएसआई मेकाही सब टाइप
· ईस्टर्न एल्युवियल सेकेन्डरी सेमी एवरग्रीन फॉरेस्ट्स - 2बी2 एस
· केन ब्रेक्स 2बीईआई
· वैट बेम्बू ब्रेक्स 2बीके 2
· नार्दन सेकेन्डरी मोइस्ट मिक्स, डेसीडूअस फॉरेस्ट्स 3सी2 एसआई
· लो एल्यूवियल सवान्ना वुड लैंड - 3आईएसआई
· इर्स्टन हॉल्लॉक फॉरेस्ट्स - 3आईएस 2बी
· 4 डीएसएसआई ईस्टर्न सीजनल स्वॉम्प फॉरेस्ट्स
· ईस्टर्न डिल्लेनिया स्वॉम्प फॉरेस्ट्स 4डीएसएस डिल्लेनिया एल्टिनजिया एसोशिसन
· ईस्टर्न वैट एल्यूवियल ग्रास लैंड 4डी2.5.2.
यह राष्ट्रीय उद्यान असम का दूसरा बाघ अभयारण्य है। नमेरी को 17 अक्तूबर, 1978 को संरक्षित वन घोषित किया गया था। इसकी स्थापना 18 सितम्बर, 1985 को नमेरी अभयारण्य के तौर पर हुई, जिसका रकबा 137 वर्ग किलोमीटर रखा गया जो वास्तव में नदुआर संरक्षित वन का अंग था। इसके बाद इसमें 75 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र जोड़ दिया गया, और इस तरह यह रकबा कुल 212 वर्ग किलोमीटर हो गल। 15 नवम्बर, 1988 को इसे आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय उद्यान के रूप में गठित किया गया, जिसका रकबा 200 किलोमीटर रखा गया। वर्ष 2002 की गणना के अनुसार अभयारण्य में 26 बाघ हैं।
वर्षा काल के दौरान वहां कुछ झीलें भी बन जाती हैं। वर्षा काल में जब ऊंचाई वाले स्थानों पर लगातार बारिश होती है तो जिया भोरोली और उसकी सहायक नदियां उफन उठती हैं। एक तो यहां पहुंचना कठिन है और दूसरे अगल-बगल भी जंगल है, जिसने नमेरी में वन्य जीवन को फलने-फूलने में मदद की। यहां सांभर, हिरणों की प्रजातियां, जंगली सूअर और गौर जैसे शिकार भी बाघों के लिए उपलब्ध हैं। बाघों और चीतों के लिए लगभग 3000 मवेशी भी उपलब्ध हैं।
पादप
नमेरी का पर्यावास उष्णकटिबंधीय क्षेत्र है, जहां सदैव हरे-भरे रहने वाले वर्षा वन हैं। बांसों और नदियों के किनारे-किनारे तंग खुले घास के मैदान हैं। वर्षा वन में 600 से भी ज्यादा प्रजातियां हैं, जिसमें गामारी, टिटोचोपा, अमारी, बोगीपोमा, अजर, यूरियम पोमा, भेलौ, अगारू, रूद्राक्ष, बोंजोलोकिया, हातीपोलिया अखाकन, एहोलॉक, नाहोर, सिया नाहर, सेमल, बॉनसम आदि शामिल हैं। यहां डेंड्रोबियम, सिमबीडियम, लेडीज स्लीपर आदि ऑर्काइड्स भी हैं। लताओं में ट्री फर्न, लियानास वहां की कुछ विशेषताएं हैं।
प्रमुख पादप प्रजातियों में शामिल हैं - अलबिजिया, लुसीडा, अलबिजिया प्रोकेरा, अमूरा, वालिची, जावानिका, बॉमबैक्स सेबा, कनेरियम स्ट्रिक्टम, कैस्टानोपसिस इंडिका, कॉर्डिया डिकोटोमा, सिनामोमम सेसिकोडाफनिया, डेंड्रोकेलेमस हैमिलटोनी, डिलेनिया इंडिका, दुआबंगा ग्रेडीपऊलोरा, दुआबंगा सोनेरेटायड्स, डाइसोक्सीलम प्रोकेरम, इंडोस्पेरमम चिनेनसे, लागरस्ट्रोमिया फलॉस-रेगिने, लिटसी सेबीफेरा, मेसुआ फेरा, मोरस रॉक्सबरगी, प्रेमना बेंगालेनसिस, सूडोस्टेनियम पोलीमारफम, पेटरोस्परमम एसिरीफोलियम, सेपियम बकैटम, शोरिया असामिका, स्टरकुलिया हेमिलटोनीद्ग, आईजिम कुमिनी, टरमिनालिया सिटरीना, टरमिनालिया मायरिकारपा, ट्रेविया नूडीपऊलोरा और वैटिका लेंसियेफोलिया।
प्राणी
नमेरी वन्य जीवों के मामले में भी मालामाल है। यहां 30 से अधिक स्तनपायी प्रजातियां देखी गई हैं और यह राष्ट्रीय उद्यान बाघों व हाथियों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। अन्य पशुओं में चीता, काला शेर, क्लाउडेड लेपर्ड, लैस्से कैट, स्लॉथ बियर, हिमालयन ब्लैक बियर, इंडियन बाइसन, धोल, सांभर, बाकिर्गं डियर, डॉग डियर, फॉक्स, हिसपिड हेयर, इंडियन हेयर, कैप्ड लंगूर, स्लो लॉरिस, असमीज मैकाक्यू, रेहसस मैकाक्यू, हिमालय यलो थ्रोटेड मार्टिन, मलायन बड़ी गिलहरी, उड़ने वाली गिलहरी, जंगली सूअर आदि आते हैं।
यहां पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां भारी तादाद में हैं। इस समय लगभग 315 प्रजातियां देखी गई हैं और इनकी सूची बढ़ती जा रही है। नमेरी के पक्षियों में सबसे महत्त्वपूर्ण सफेद पंखों वाली बतख है। नमेरी राष्ट्रीय उद्यान को व्हाइट विंग्ड वुड डक के अंतिम आवास के रूप में भी जाना जाता है। वुड डक की खोज बहुत शानदार और निराली है। जंगल के नालों के आस-पास वुड डक की अच्छी खासी तादाद है। यहां इस लुप्तप्राय प्रजाति के 150 जोड़े हैं।
अन्य प्रमुख पक्षियों में व्हाइट चीक्ड पैट्रिज, ग्रेट, वीदेद व रूफोस नेक्ड हार्नबिल, रडी, ब्लू इयर्ड, ओरियंटल डॉर्फ किंगफिशर, ओरियंटल हॉबी, एमुर फॉलकन, जार्डन व ब्लैक बाज़ा, पलास, ग्रे हेडेड व लेसर हेडड फिश ईगल, सिल्वर बैक्ड नीडलटेल, माउंटेन इंपीरियल पिजन, ब्लू नेप्ड पिट्टा, स्लेंडर बिल्ड ओरियोल, हिज ब्लयू पऊलाईकैचर, व्हाईट क्राउन्ड फार्कटेल, सुल्तान टिट, ब्लैक बैलिड टर्न, जर्डन बैबलर, सफोस कैम्ड़ सिबिया, यलो बैलीड पऊलॉवर पैकर, रेड थ्रोटेड पिपिट, लांग बिल्ड प्लोवर, ब्लैक स्टॉर्क किंग वल्चर, लोंग बिल्ड किंग प्लोवर, क्लेज फीसेन्ट, हिल मैना, पिन टेल्ड ग्रीन पिजन, हिमालयन पाइड किंगफिशर, थ्री-टोड किंगफिशर, फेयरली ब्लू बर्ड, कॉमन मर्जनसर आदि।
नमेरी हाथियों के झुंडों के लिए भी प्रसिध्द है । उद्यान में हाथियों की अच्छी खासी तादाद है। 1997 की गणना के अनुसार हाथियों की संख्या 225 थी।
नमेरी रेंगने वाले जीवों का भी घर है। किंग कोबरा, कोबरा, पिट वाइपर, रसेल वाइपर, बैंडेड करैत, पायथन, रैट स्नेक, असम रूफ टर्टल, मलायन बॉक्स टर्टल, कील्ड बॉक्स टर्टल, एशियन लीफ टर्टल, नैरो हैडेड सॉपऊट शैल्ड टर्टल, इंडियन सॉपऊट टर्टल भी यहां रहते हैं। गोल्डन माहसीर, शाओर्ट गिल्ड माहसीर, सिलगोरिया जैसी मछलियां भी यहां के जल में पाई जाती हैं।
जिस 'महिला-आरक्षण विधेयक' के बारे में यह विश्वास हो चला था कि वह अब कभी पास नहीं हो पाएगा, वह अमिताभ बच्चन के पप्पू की तरह पास हो गया. जिस विधेयक ने अपने पास होने से पहले संसद के दोनों सदनों को यू.पी. और बिहार की विधान सभाओं जैसे हालातों में पहुंचा दिया था, वह आज बहुत खुश था और बाक़ायदा मुस्करा रहा था. जिस विधेयक की वजह से सभापति के सामने रखा माइक उखाड़कर फेंक दिया गया और बाद में माफ़ी मांग ली गयी कि वह बिना किसी प्रयास के अपने आप ही हमारे हाथ में आ गया था, वह विधेयक पास हो गया. जिस विधेयक की प्रतियां माननीय सभापति के मुंह की तरफ जाने के बाद अपने आप फटकर सदन में बिखर गयी थीं, वह विधेयक बिना किसी शोर-शराबे के पास हो गया.
"आप अब कैसा महसूस कर रहे हैं, इस विधेयक के पास होने पर?" संसद के बाहर खड़े रामभरोसे लाल ने एक पत्रकार की हैसियत से किसी ऐसे सांसद से पूछा, जो अपने इसी जन्म के कुछ समसामयिक कर्मों की वजह से संसद से निलंबित हो चुके थे और अब बाहर खड़े होकर मीडिया की मार्फ़त अपनी बात देशवासियों के सामने रखने के लिए उसका मुंह ताक रहे थे.
"अच्छा, बहुत अच्छा महसूस कर रहे हैं. यह तो होना ही चाहिए था. भाई, महिलाओं को आरक्षण नहीं दीजिएगा तो क्या पुरुषों को दीजिएगा आप?" निलंबन की पीड़ा से वाक़िफ सांसद ने अपने चेहरे को हंसने लायक बनाते हुए सवालपूर्ण जवाब दिया.
"लेकिन आपने तो सबसे ज़्यादा हंगामा काटा था कि इसे हरगिज़ पारित नहीं होने देंगे और ईंट से ईंट बजा देंगे ?" रामभरोसे ने अपनी तरफ से 'ईंट से ईंट बजा देने' वाला अपना वह प्रिय मुहावरा इस्तेमाल करते हुए पूछा, जो वे अपने स्थानीय चैनल के मालिक के सामने अपनी तनख्वाह बढ़वाने की मांग के तहत अकसर ही इस्तेमाल कर लिया करते थे.
"हमने ऐसा कुछ नहीं कहा, ग़लत बात है यह." जो बात ग़लत है, वह हमेशा ग़लत रहेगी, इस बात को सिद्ध करने के अंदाज़ में जवाब मिला.
"लेकिन कल तो आपने कहा था कि इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा?" रामभरोसे ने अपने चैनल मालिक के भतीजे रुपी कैमरामैन को कोहनी से घसीटते हुए उस तरफ खड़ा किया, जिधर से सांसद महोदय का चेहरा दिखाने के लिए सांसद को खुद अपना मुंह कैमरे के सामने ना लाना पड़े.
"अब वो तो कल की बात थी. कल की बात कल कीजियेगा, फिलहाल, आप आज की बात करिए. आज हम बहुत खुस हैं कि हमारे दिल की जो बात है, वो मान ली गयी. महिलाओं को तो यह बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था. इस सरकार में बैठे चंद चापलूसों की वजह से यह जो फैसला है, वो देर से लिया गया." सरकार को समर्थन देने के बावजूद संसद से निलंबित सांसद ने पुनः वापसी की उम्मीद में बिना कैमरे में अपना मुंह घुसाए बिना अपनी बात स्थानीय चैनल के माध्यम से देश की तमाम महिलाओं को खुश करने लिहाज़ से कह डाली.
"सच क्या होता है और झूठ क्या होता है, यह समझाए बिना हमने अभी सदन से निष्काषित सांसद से अपनी बेबाक बातचीत सुनवाई. अब हम उन महिला सांसदों से भी बात करेंगे, जो इस विधेयक के पारित होने से वाक़ई काफी खुश हैं." कैमरे के सामने इतना कहकर अपने माइक को अपने हाथों में दबोचे राम भरोसे लाल तेज़ी से महिलाओं के समूह की तरफ चल दिए.
नई दिल्ली. लंबी जद्दो-जहद के बाद आखिर आज राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक भारी बहुमत से पारित होने से एक नया इतिहास रचा गया है. महिला आरक्षण के पक्ष में 186 मत डाले गए, जबकि इसके खिलाफ़ सिर्फ़ एक वोट ही दिया गया.
पहली बार 12 सितंबर 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार ने महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण संबंधी विधेयक लोकसभा में पेश किया था. इसके बाद 9 दिसंबर 1996 को भाकपा की गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने महिला आरक्षण पर अपनी रिपोर्ट पेश की. विपक्षी दलों का समर्थन न मिलने की वजह से लोकसभा में यह विधेयक पारित नहीं हो पाया. इसके बाद दिसंबर 1998 में एनडीए सरकार के दौरान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने महिला आरक्षण से संबंधित विधेयक दोबारा पेश किया, लेकिन इसका वही हश्र हुआ. फिर 23 दिसंबर 1999 को लोकसभा में विपक्षी सांसदों ने महिला आरक्षण विधेयक को तत्कालीन कानून मंत्री राम जेठमलानी के हाथ से छीन लिया और सदन में शोर-शराबा किया. करीब एक दशक बाद जून 2008 में राष्ट्रपति ने 15वीं लोकसभा के गठन पर अपने अभिभाषण में महिला आरक्षण पर मौजूदा यूपीए सरकार की प्रतिबद्धता का ज़िक्र करते हुए इस मुद्दे को एक बार फिर से ज़िंदा कर दिया. फरवरी 2010 में कैबिनेट ने नए संशोधन के साथ महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी दे दी. इसी माह 4 मार्च को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विधेयक पास करने का आह्वान करते हुए महिलाओं के हक़ की बात की. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ८ मार्च को भारी हंगामे के बीच महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया. हालांकि इस विधेयक को लेकर संसद के दोनों सदनों में काफ़ी शोर-शराबा हुआ. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और समाजवादी पार्टी (सपा) सांसदों ने इसका जमकर विरोध किया. इतना ही नहीं महिला आरक्षण विधेयक से नाराज़ राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी ने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार से समर्थन भी वापस ले लिया.
क़ाबिले-गौर है कि किसी भी विधेयक पारित होने के लिए सदन में मौजूद सांसदों की दो तिहाई संख्या उसके पक्ष में होनी चाहिए. इसलिए लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण दिलाने वाले इस विधेयक की मंज़ूरी के लिए 233 की 155 मतों की ज़रूरत थी और इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी, उसके सहयोगी दलों, वाम दलों व यूपीए के एक मंच पर आ जाने से इसकी सारी रुकावटें दूर हो गईं.
बहुजन समाजवादी पार्टी के राज्यसभा में सभी 15 सदस्यों ने भी इसका बहिष्कार किया, वहीं तृणमूल कांग्रेस ने भी इस विधेयक के मतदान में हिस्सा नहीं लिया. अपने तर्क में पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कहा कि उनकी पार्टी को विधेयक पारित कराने के तरीके की जानकारी नहीं दी गई थी. साथ ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें आश्वासन दिया था कि पहले इस मामले पर एक सर्वदलीय बैठक होगी.
स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष किरण माहेश्वरी ने कहा है कि विगत 15 वर्षों से कांग्रेस महिला आरक्षण पर पाखंड की राजनीति कर रही है। सदन में हो-हल्ला करने वाले सदस्य कांग्रेस के समर्थक दलों के ही है। पूर्व में भी कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के शोर-गुल के मध्य भी सरकार ने पारित करवाए थे। सर्वदलीय बैठक के बहाने कांग्रेस महिला आरक्षण को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है।
आज भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय महिला मोर्चा द्वारा 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल पास न होने पर सैकड़ों की तादाद में महिला कार्यकताओं ने अपनी गिरफ्तारी संसद के बाहर दी। महिलाओं का नेतृत्व किरण माहेश्वरी एवं महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष सरिता चौधरी ने किया। प्रदर्शन में महामंत्री रेखा गुप्ता एवं पार्षद तथा बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद थीं। सैकड़ों की संख्या में महिलाएं संसद पर इकट्ठी हुईं तथा अपनी मांग प्रधानमंत्री को बताना चाहती थीं, लेकिन बीच में ही पुलिस द्वारा रोक लिया गया।
किरण माहेश्वरी ने कहा कि सरकार भविष्य में महिलाओं के साथ मजाक बंद करें अन्यथा भाजपा महिला मोर्चा द्वारा पूरे देश में आंदोलन चलाया जाएगा तथा बिल को पास करवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाएगा।
महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्षा, सरिता चौधरी ने कहा कि उन्हें सरकार की नीयत में खोट नजर आ रहा है अन्यथा बहुमत होने पर भी बिल का पास न होना कहीं न कहीं सरकार की कमजोरी दिखाता है। महिलाओं को संसद में, विधान सभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना ही चाहिए। भारतीय जनता पार्टी द्वारा बिल का समर्थन करना अपनी भूमिका का सकारात्मक तरीके से निवर्हन है तथा भाजपा चाहती है कि यह बिल तुरंत पास होना चाहिए।
स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. बीटी कपास के तहत क्षेत्र 2002-03 में 29,000 हैक्टेयर से बढ़कर 2009-10 में 80,000 हैक्टेयर (अनुमानित) हो गया है। बीटी कपास की औसत उपज भी 2001-02 में 300 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर से बढ़कर 2007-08 में 560 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हो गई है। बीटी कपास की खेती से उपज में 31 प्रतिशत वृध्दि हुई है, कीटनाशकों के प्रयोग में 39 प्रतिशत की कटौती हुई है तथा किसानों की लाभप्रदता में 80 प्रतिशत से अधिक की वृध्दि हुई है।
कृषि मंत्रालय तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में राज्य मंत्री प्रो. के.वी. थामस ने आज लोकसभा में में यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर राज्य स्तर पर 9 प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों के राज्य कृषि विश्वविद्यालयों से सहयोग करते हुए विस्तृत अध्ययन कराता रहा है। अब तक एकत्रित की गई जानकारी से पता चलता है कि बीटी कपास के प्रयोग से इन कपास उत्पादक राज्यों में उपज में वृध्दि हुई है। समूचे देश में कपास में बॉलवार्य की समस्या में महत्त्वपूर्ण कमी आई है तथा कपास में प्रयोग में लाये जाने वाले कीटनाशकों के मंडी अंश में कटौती हुई है।
स्टार न्यूज़ एजेंसी
देहरादून (उत्तराखंड). भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने देहरादून के दृष्टिबाधितों के लिए राष्ट्रीय संस्थान में एक सामुदायिक रेडियो केन्द्र स्थापित करने, उसका रखरखाव करने और उसके संचालन के लिए अनुमति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
अन्तर्मंत्रालय समिति की सिफारिशों और अनेक मंत्रालयों से आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद इस संस्थान को सहमति पत्र जारी किया गया। इस समझौते के अनुसार सामुदायिक रेडियो केन्द्र तीन महीनों के भीतर काम करने लगेगा। इसके साथ ही देश में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की तादाद बढ़कर 66 हो जाएगी।
यह सामुदायिक रेडियो केन्द्र नेत्रहीन लोगों, उनके परिवारों और सामुदायिक संस्थानों के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण, रोजगार और अन्य उपलब्ध सुविधाओं पर सूचना सम्प्रेषित करने के उद्देश्य से किया जाएगा और यह नेत्रहीन लोगों की प्रतिभा दर्शाने के लिए एक मंच के रूप में काम करेगा। यह सामुदायिक रेडियो महिलाओं के सशक्तीकरण, दृष्टिबाधित लोगों की शिक्षा और पुनर्वास के सभी पहलुओं पर अध्ययन आयोजित, प्रायोजित, समन्वित या आर्थिक सहायता देने के लिए और दृष्टिबाधित बच्चों और वयस्कों को क्रमश: स्कूलों और समाज में एकीकृत करने के लिए एक अवसर प्रदान करता है। सूचना प्रसारण मंत्रालय सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना को प्रोत्साहन देता है, क्योंकि इससे स्थानीय समुदायों को अपने विचार प्रकट करने का, अपनी बातों को बांटने का अवसर प्रदान करता है और खासतौर पर महिला, युवा और सीमान्त समूहों को स्थानीय स्वशासन और क्षेत्र के पूर्ण सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में भागीदार बनने की शक्ति प्रदान करता है।
स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. नेशनल एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड (नालको) ने दामनजोड़ी, जिला कोरापुट में नालको की परियोजनाओं की स्थापना के कारण कुल 600 परिवार विस्थापित हुए थे। उनकी जिला प्रशासन और कंपनी द्वारा संयुक्त रूप से पहचान की गई थी। समय के उस बिन्दु पर राज्य सरकार द्वारा निर्धारित दर के अनुसार नालको द्वारा अधिग्रहीत भूमि और घरों के लिए सभी विस्थापित/प्रभावित परिवारों को देय मौद्रिक मुआवजा अदा कर दिया गया है।
खान मंत्री और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री बिजय कृष्ण हांडिक ने आज लोकसभा में बताया कि भूमि अधिग्रहण के समय कंपनी की आरंभिक वचनबध्दता के अनुसार पहचान किए गए कुल 600 विस्थापित परिवरों में से 598 परिवारों को दामनजोड़ी मे विशेष रूप से निर्मित दो पुनर्वास कालोनियों में पुनवार्सित किया गया और शेष दो परिवारों ने अपने जन्मजात स्थान में ठहरने को तरजीह दी। 596 भूमि विस्थापित परिवारों से प्रत्येक एक नामित व्यक्ति को कंपनी में रोजगार प्रदान किया गया है। शेष चार मामलों में नालको जिला प्रशासन द्वारा नामांकन को अंतिम रूप न दिए जाने की बाधा के कारण आज तक रोजगार प्रदान नहीं कर सका है।
मुहम्मद उमर कैरानवी
क़लम और ज़बान से धर्म की तो तलवार से देश के लिए अंग्रेजों से टक्कर लेने वाली शख्सियत, जिसे शिया, सुन्नी, बरेलवी और देवबंदी यहां तक कि इस्लाम से निकाले गए. अहमदी भी अपना मानते हैं कि बारे में जरूरी है जान लिया जाए, मेरी जानकारी में नये उलमा यानी गदर से अब तक ऐसी कोई आलिम शख्सित नहीं हुई जिसे दूसरे मसलकों वालों ने भी इतना प्यार दिया हो, साजिश के तहत इन से संबंधित बहुत कुछ मिटा दिया गया था, यही एक कारण है शायद इनके बारे में अधिकतर अनजान हैं.
योद्धा सृष्टा, इमामुल मनाजिरीन और बानीये दारूल उलूम हरम मदरसा सौलतिया मक्क़ा मुअज्जमा हज़रत मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी जमादीउल अव्वल 1233 हिजरी को कस्बा कैराना (जिला मुजफ़्फ़रनगर, यू.पी.) में पैदा हुये। आप के जद्दे आला (पूर्वज) शेख अब्दुर्रहमान गाजरोनी थे, जो सल्तनत महमूद के साथ हिन्दोस्तान आए और पानीपत में निवास कर लिया आप के जन्म से पूर्व माता ने सपना देखा कि तेरे यहां चांद समान पुत्र पैदा होगा और उसका प्रकाश समस्त संसार में फैलेगा! मौलाना रहमतुल्ला ने 12 वर्ष की आयु में कुरान मजीद स्मरण कर दीनियात और फारसी की प्राथमिक पुस्तकें अपने बड़ों से पढ़ी. तत्पश्चात शिक्षा ग्रहण हेतु देहली प्रस्थान किया और मौलाना मोहम्मद हयात साहब के मदरसे में प्रविष्ट हुए. मौलाना मोहम्मद हयात के मदरसे के विषय में सर सैयद ने लिखा है कि आप की शिक्षा के प्रसार से निम्न श्रेणी का शिक्षार्थी उस वक्त के विद्वानों से उच्च कोटि का माना जाता था। दूसरे महत्वपूर्ण शिक्षक मौलाना अब्दुर्रहमान चिश्ती थे जो उस्ताद शाहे वक्त हयात साहब के शिष्यों मे थे और सम्पूर्ण ज्ञान में दक्षता रखते थे। हकीम फैज मौहम्मद साहब जो कि अपने जमाने के प्रसिद्ध एवं योग्य चिकित्सक थे, उन से ज्ञानर्जन किया। आप का शजरा नसब (वंश लता) से ज्ञात होता है कि हर युग में इस वंश ने चिकित्सा सेवा की है मुगल बादशाह जहांगीर के वज़ीर नवाब मुकर्रब खां कैरानवी ने चिकित्सकीय सेवा के साथ साथ महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किये थे। लेखक लोकारनम से गणित की शिक्षा पाई. दूषित वातावरण और हिन्दोस्तान में ईसाईयत के बढ़ते हुए प्रभुत्व को रोकने की चिंता ने आपको इस का अवसर न दिया कि आप अपनी शिक्षा को यथावत जारी रख सकें। दरबार कैराना की मस्जिद में मौलाना ने एक दीनी मदरसा स्थापित किया. इस मदरसे से लाभान्वित शिक्षार्थियों में मौलाना अब्दुस्समी, लेखक ‘हम्द बारी’ योग्य विद्यार्थी प्रसिद्ध हुए। मौलाना मरहूम की शादी 1256 हिजरी में अपनी खाला की लड़की से हुई. देहली में महाराजा हिन्दुराव के यहां अमीर मुंशी बनकर रहे कुछ घरेलू मजबूरियों के कारण मौलाना को कैराना वापस आना पड़ा. कैराना पहुंचकर पठन तथा पाठन के साथ रददे नसारा, ईसाईयत के विरोध में युद्ध पर महत्वपूर्ण पुस्तक, इजालतुल औहाम लिखनी शुरू की. इस पुस्तक की छपाई के दौरान ही मौलाना बहुत बीमार हो गए. एक रोज़ मौलाना फ़ज्र की नमाज़ के पश्चात रोने लगे. संबंधियों ने समझा कि आप जीवन से निराश हो गए हैं। आपने बताया कि बखुदा स्वस्थ होने का कोई लक्षण नहीं, परन्तु आराम होगा इंशा अल्लाह. रोने का कारण यह है कि सपने में हज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम तशरीफ लाए, हज़रत सददी के अकबर साथ हैं। हज़रत फ़रमाते हैं "ए जवान तेरे लिए रसूलुल्लाह की यह खुशखबरी है अगर तकलीफ़ ‘इजालतुल औहाम’ की वजह है तो वह आराम की वजह भी होगी, अल्हम्दु लिल्लाह वह स्वस्थ हो गए। इस पुस्तक में ईसाइयत के अकसर प्रश्नों के उत्तर हैं। इजालतुल औहाम के छपने से पहले ही देहली में काफ़ी प्रसिद्ध हो गई, जिस का विरोध भी प्रारंभ हो गया. इस कारण मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी ने उस समय के योग्य विद्वान मौलाना नूरूल हसन साहब कांधलवी को छपाई हेतु तैयार कागजात संशोधन के लिये भेजे थे, मौलाना रहमतुल्लाह साहब इजालतुल औहाम की छपाई के विषय में देहली आए तो उन की भेंट काक्टर वजीर खां से हुई, जो मौलाना रहमतुल्लाह के सच्चे सहायक मित्र सिद्ध हुए। डाक्टर साहब आगरे में अंग्रजी चिकित्सालय में प्रतिष्ठित पद पर सुशोभित थे। अंग्रेजी की उच्च शिक्षा के कारण अंग्रेजी अवतरणों की व्याख्या करने में मौलाना के सहायक बन गए. मौलाना ने उनको कई स्थान पर रहमत के फरिशत जैसा बताया है। डाक्टर वज़ीर खां जब डाक्टरी की डिग्री लेने इंग्लैंड गए तो वहां से ईसाईयों की बहुत-सी धार्मिक पुस्तकें साथ लेते आए. उन पुस्तकों का अवलोकन आगरे के मुनाजिरे (तर्क वितर्क) में बहुत काम आया, डाक्टर साहब अंग्रेजी के अलावा इबरानी यहूदी भाषा भी जानते थे। आगरे में ईसाई पादरी, उलमा के मौनधारण से अनुचित लाभ उठाते थे और जनता में परोपेगन्डा करते फिरते थे कि हमारे धर्म की सत्यता का भय इतना है कि हिन्दोस्तानी विद्वान हमारे तर्क का उत्तर नहीं दे सकते और अपने धर्म इस्लाम की सत्यता सिद्ध नहीं कर सकते. इसी बीच मौलाना रहमतुल्लाह वजीर खां के निमंत्रण पर आगरे गए. आगरे में मौलाना के दो मुनाजरे हुए जो कि छोटा मुनाजरा, बड़ा मुनाजरा के नाम से प्रसिद्ध हैं। छोटा मुनाजरा दो तीन पादरी मौलाना रहमतुल्लाह और डाक्टर वज़ीर खां के बीच हुआ जिस में पादरियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा, लेकिन यह बात उन लोगों तक ही सीमित रही इस कारणवश मौलाना ने बड़े मुनाजरे की तैयारी की, ताकि दुनिया देखे और सुने। मौलाना की कोशिशों से पादरी फन्डर आम मुनाजरे के लिए तैयार हुआ. शर्त यह तय पाई कि जो हार जाएगा दूसरे का धर्म स्वीकार कर लेगा। मुनाजरा तीन दिन चलना था, मगर दो रोज की पराजय ने पादरियों को तीसरे दिन मुंह दिखाने के काबिल न छोड़ा और वह न आए। मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी और डाक्टर वजीर खां ने इन्जील, बाईबिल के जो नुस्खे जमा किए थे, उन्हें भरे मजमे में दिखाकर यह साबित किया कि किसी में कुछ हटा दिया गया किसी में कुछ बढा दिया गया, भरे मजमे में पादरियों के इन्जील में परिवर्तन स्वीकार करना पडा। मुनाजिरे (तर्क-वितर्क) से पादरियों की शिकस्त का लाभ यह हुआ कि पादरियों का जोर शोर घट गया और उन्होंने धर्म प्रचार व प्रसार की पुस्तकें जो अधिकतर बांटते थे. एकदम बांटना छोड़ दी, मौलाना और भी बड़ा मुनाजरा करना चाहते थे, मगर पादरी फान्डर हिन्दुस्तान ही से चला गया बाद में मौलाना रहमतुल्ला कैरानवी साहब से कुस्तुनतुनिया में पादरी फान्डर टकराता के मौलाना की आगमन की खबर मिलते ही वह वहां से भी चला गया। ईसाईयत की रही सही कसर मौलाना के शागिर्दो ने तोड़ दी। मौलाना शरफुल हक़ वालिद इमदाद साबरी ने मौलाना रहमतुल्लाह से मुनाजरे की इइजाज़त लेकर इसाईयों से सैकडों मुनाजरे किये अल्हमदु लिल्लाह सबमें पादरियों को हार हुई। मौलाना रहमतुल्लाह साहब की पुस्तकें और मुनाजरे ईसाईयों के उत्तर में कलमी जिहाद था और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की भूमिका साबित हुई। मेरठ के धर्म योद्धाओं ने स्वतंत्रता का युद्ध प्रारम्भ कर दिया। अन्य यौद्धओं के साथ मौलाना रहमतुल्ला कैरानवी ने भी स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जंग में अपने मित्रा डा.वजीर खां और मौलवी फेज अहमद बदांयूनी के साथ स्वतंत्रता संग्राम मे सम्मिलित हुए। कस्बा कैराना में जमींदारी शेखों व गूजरों के हाथों में थी, जिनमें नैतिक गुण तथा उत्साह यौवन पर था। थाना भवन और कैराना का एक मोर्चा स्थापित किया गया योद्धा मुकाबला करते रहे। शामली की तहसील पर हमला किया गया। थाना भवन का मोर्चा हाजी इमदादुल्ला मुहाजिर मक्की तथा कैराना का मोर्चा मौलाना रहमतुल्ला कैरानवी संभाले हुए थे। उस जमाने में शाम की नमाज के बाद धर्म योद्धाओं के संगठन व दीक्षा के लिए नक्कारे की आवाज पर एकत्रित किया जाता और ऐलान होताः ‘‘मुल्क खुदा का और हुक्म मौलवी रहमतुल्लाह का’’ शामली की तहसील तोड़ने में हाफिज जामिन साहब शहीद हुए, इन्हीं कारणवश मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी का वारन्ट जारी कर दिया गया, मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी ने पंजीठ में पनाह ली। अंग्रेज फौज ने गांव वालों को परेशान किया जिस पर मौलाना ने कहा इस से अच्छा हो कि मैं गिरफ़्तार हो जाऊं, इस पर गांव के चैधरी अज़ीम साहब ने कहा कि अगर पूरा गाँव भी गिरफ़्फतार हो जाए और उनको फाँसी पर लटका दिया जाए तो ऐसे वक्त भी आपको फौज के हवाले नहीं किया जाएगा, ऐसे बलिदानी थे मौलाना के मित्रगण, यहाँ यह तथ्य उल्लेखनिय है कि इन महान स्वतंत्रता सेनानियों की पाठय पुस्तकों के इतिहास में उपेक्षा की जा रही है इन्हीं दिनों में मौलाना रहमतुल्लाह अपना नाम मुसलिहुददीन रख कर दिल्ली रवाना हुए और जयपुर व जोधपुर के खतरनाक जंगलों को पैदल तय करते हुए सूरत बन्दरगाह पहुंचे, सूरत से हज के लिए रवाना हुए एक लम्बे और कठिनाइयों से परिपूर्ण यात्रा करके अल्लाह पर विश्वास करते हुए मक्का मुअज्जमा पहुंचे, ताकि अल्लाह के घर शान्त वातावरण में इस्लाम को फैला सकें।
1857 में शिक्षा जगत के नायक मौलाना मोहम्मद कासिम थे, जिन्होंने देवबन्द में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक छावनी स्थापित की. बाद में उसका नाम मदरसा देवबंद रखा गया। जिसे दारूल उलूम देवबंद के नाम से एतिहासिक प्रसिद्धी प्राप्त है। मौलाना मोहम्मद कासिम का दृष्टिकोण था ‘‘शिक्षा एक शक्ति है’’ मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी ने भी इसी दृष्टिकोण के अनुसार एक मदरसा स्थापित किया जिसका नाम मदरसा सौलतिया रखा गया। धार्मिक शिक्षा मक्का से चलकर हिन्दुस्तान आई और हिन्दुस्तानी विद्वान मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी का यह चमत्कार है कि उन्होंने इस ज्ञान को पुनः मक्का पहुंचा दिया. उनके समय के पश्चात ये शिक्षा केन्द ज्ञान की ज्योति तथा धर्म की सेवा निरन्तर कर रहा है। कैराना व आसपास के इलाके के हाजी जब मक्का जाते हैं तो इस मदरसे को देखकर गर्व महसूस करते हैं।
वर्तमान काल के लोकप्रिय कवि कलीम अहमद ‘आजिज’ मदरसा सौलतिया का परिचय अपनी रचना ‘यहां से मदीना, मदीना से काबा’ में यूं देते हैं ‘‘ये मदरसे का मदरसा है खानकाह की खानकाह है, दफ्तर का दफ्तर है, सराय की सराय है जो जिस कैफियत का इच्छुक हो वो मिलेगी। ये एक ऐसी संस्था है जो सदियों पहले हुआ करती थी यहां शिक्षा का अभिलाषी ज्ञानार्जन कर सकता है बुद्धि के इच्छुक को बुद्धि मिलेगी, जुनूं के दिवानों के जुनून प्राप्त होता है, मुहब्बत चाहिए तो जितनी चाहिए उससे ज़्यादा मिले रोटी, कपड़ा, मकान चाहिए तो बकदरे जर्फ वो भी मौजूद है फ़तवा चाहिए तो फ़तवा हाज़िर, अमानत रखनी हो तो आजाओ छोड जाओ ये घर तुम्हारा घर है, अमानत वापस लेनी चाहो तो वह पड़ी है उठा लो, साहित्य चाहिए तो सुबहान अल्लाह वो भी हाज़िर, संक्षिप्त ये कि मानवता का डिपार्टमेन्टल स्टोर है’’।
मौलाना रहमतुल्ला की कई रचनाएं बाजार में उपलब्ध नहीं वर्तमान में फ़रीद बुक डिपो,नई दिल्ली ने उर्दू में ‘‘मुजाहिद-ए-इस्लाम मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी’’ पुस्तक छापकर इस कमी को दूर किया है। मौजूदा अध्यक्ष मौलाना हशीम साहब ने एक बार टेलीफोन वार्ता में बताया कि मौलाना से मुताल्लिक पुस्तकें आदि पोस्ट बाक्स न. 114, मदरसा सौलतिया, मक्का से मुफ़्त मंगाई जा सकती हैं। मदरसे की वेसाईट http://www.alsawlatiyah.com/ जो अभी अरबी में है उसे जल्द ही उर्दू और इंडोनेशियन में भी कर दिया जाएगा। उपलब्ध पुस्तकें ‘इजालतुश्शुकूक’’ में ईसाइयों के 29 सवालों के जवाब हैं और उसमें मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म के नबी होने पर और इन्जील ईसाइयों की धार्मिक पुस्तक में रददो बदल साबित की गयी है। पुस्तक ऐजाज-ए-ईसवी में मौलाना ने इन्जील का अविश्वसनीय होना सिद्ध किया है।
पुस्तक 'इज़हार उल हक़' जो असल अरबी भाषा में है मौलाना की अन्तिम आयु की है जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। अंग्रेजी संस्करण लंदन से छपा है जिसका विवरण कैराना वेबसाईट कैराना डोट नेट पर देख सकते हैं। इस पुस्तक की तैयारी में मौलाना ने अरबी,फारसी, उर्दू और दूसरी भाषाओं की पुस्तकों का अवलोकन करने के पश्चात जब ईसाईयत पर अन्तिम बार कलम उठायी तो वो गौरवशाली रचना बन गयी जिसने ईसाई संसार में तहलका मचा दिया, लन्दन टाईम्स ने पुस्तक 'इज़हार उल हक़' पर टिप्पणी करते हुए लिखा है ‘अगर लोग इस पुस्तक को पढ़ते रहे तो मज़हबे-ईसा की तरक्क़ी बंद हो जाएगी’. इस्लामी विद्वानों की ओर से जितनी पुस्तकें ईसाईयत की रोकथाम में लिखी गईं. सब ''इज़हार उल हक़' की रोशनी में लिखी गईं।
मौलाना अशरफ अली थानवी बयानुल कुरआन में, मौलाना हिफजुर्रहमान ने किससुल कुरआन में, मौलाना मोहम्मद अली ने पैगाम-ए- मोहम्मदी में आपकी पुस्तकों की बहुत प्रशंसा की है।
कादनियत के मुकाबले में अल्लामा कश्मीरी मैदान में आये तो आपके अवलोकन में मौलाना रहमतुल्ल कैरानवी की रचनाएं रहा करतीं और प्रार्थना किया करते ‘ अल्लाह मौलाना रहमतुल्ला को जजाऐ खैर अता फ़रमाया कि उनकी पुस्तकें इस्लामी विचारधारा की सुरक्षा में अद्वितीय हैं. खुदा न करे वक़्त पड़ने पर हमारे धार्मिक विद्वानों को परेशान होने की आवश्यकता नहीं। मौलाना का देहान्त रमजानुल मुबारक में 1308 हिजरी, 1861 ई0 में हुआ। आपकी कबर मक्का जन्नतुल मुअल्ला नामक कब्रिस्तान में है. आपके पहलू में हाजी इमदादुल्लाह महाजिर मक्की भी दफ़न हैं।
विशेष सूचना : हम दुनिया के सभी मज़हबों का समान रूप से सम्मान करते हैं. हम न किसी विशेष मज़हब का प्रचार कर रहे हैं और न ही विरोध... संपादक
विशेष सूचना : हम दुनिया के सभी मज़हबों का समान रूप से सम्मान करते हैं. हम न किसी विशेष मज़हब का प्रचार कर रहे हैं और न ही विरोध... संपादक
मेरे गीतों में तू मेरे ख्वाबों में तू,
इक हकीकत भी हो और किताबों में तू।
तू ही तू है मेरी जिन्दगी।
क्या करूं मां तेरी बन्दगी।।
तू न होती तो फिर मेरी दुनिया कहां ?
तेरे होने से मैंने ये देखा जहां।
कष्ट लाखों सहे तुमने मेरे लिए,
और सिखाया कला जी सकूं मैं यहां।
प्यार की झिरकियां और कभी दिल्लगी।
क्या करूं मां तेरी बन्दगी।।
तेरी ममता मिली मैं जिया छांव में।
वही ममता बिलखती अभी गांव में।
काटकर के कलेजा वो मां का गिरा,
आह निकली उधर, क्या लगी पांव में?
तेरी गहराइयों में मिली सादगी।
क्या करूं मां तेरी बन्दगी।।
गोद तेरी मिले है ये चाहत मेरी।
दूर तुमसे हूं शायद ये किस्मत मेरी।
है सुमन का नमन मां हृदय से तुझे,
सदा सुमिरूं तुझे हो ये आदत मेरी।
बढ़े अच्छा इयां दूर हो गन्दगी।
क्या करूं मां तेरी बन्दगी।।
-श्यामल सुमन
फ़िरदौस ख़ान
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी / आंचल में है दूध् और आंखों में पानी। हिन्दी कविता की ये पंक्तियां पारंपरिक भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को बखूबी बयान करती हैं। भारत में ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते’ के आधार पर महिलाओं को देवी की संज्ञा देकर उनका गुणगान किया गया है। लेकिन, आधुनिक समाज में नारी का एक और रूप उभरकर सामने आया है, जहां उसे मात्र भोग की वस्तु बनाकर रख दिया गया है।
काफी हद तक इसका श्रेय विज्ञापन जगत को जाता है। मौजूदा दौर में विज्ञापनों में उत्पाद का कम और नारी काया का ज्यादा से ज्यादा प्रदर्शन कर दौलत बटोरने की होड़ मची हुई है।
पुरुषों के द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली शेविंग क्रीम, अंत:वस्त्र, सूट के कपड़े, जूते, मोटर साइकिल, तम्बाकू, गुटखा, सिगरेट और शराब तक के विज्ञापनों में नारी को दिखाया जाता है। जबकि, यहां उनकी कोई जरूरत नहीं है। इन वस्तुओं का इस्तेमाल मुख्यत: पुरुषों द्वारा किया जाता है। इसके बावजूद इसमें नारी देह का जमकर प्रदर्शन किया जाता है। इसके लिए तर्क दिया जाता है कि विज्ञापन में आर्कषण पैदा करने के लिए नारी का होना बेहद जरूरी है, यानी पुरुषों को गुमराह किया जाता है कि अगर वे इन वस्तुओं का इस्तेमाल करेंगे तो महिलाएं मधुमक्खी की तरह उनकी ओर खिंची चली आएंगी।
ऐसा नहीं है कि विज्ञापन में नारी देह के प्रदर्शन से उत्पाद की श्रेष्ठता और उसके टिकाऊपन में सहज ही बढ़ोतरी हो जाती है या उसकी कीमत में इजाफा हो जाता है। दरअसल, इस प्रकार के विज्ञापन कामुकता को बढ़ावा देकर समाज को विकृत करने का काम करते हैं। शायद इसका अंदाजा उत्पादक विज्ञापनदाताओं को नहीं है या फिर वे लोग इसे समझना ही नहीं चाहते। आज न जाने कितने ही ऐसे विज्ञापन हैं जिन्हें परिवार के साथ बैठकर नहीं देखा जा सकता। अगर किसी कार्यक्रम के बीच ‘ब्रेक’ में कोई अश्लील विज्ञापन आ जाए तो नजरें शर्म से झुक जाती हैं। परिजनों के सामने शर्मिंदगी होती है। विज्ञापन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि विज्ञापन को चर्चित बनाने के लिए कई चौंकाने वाली कल्पनाएं गढ़ी जाती हैं।
यह माना जा सकता है कि आज विज्ञापन कारोबार की जरूरत बन गए हैं। लेकिन, इसका यह भी मतलब नहीं कि अपने फायदे के लिए महिलाओं की छवि को धूमिल किया जाए। निर्माताओं को चाहिए कि वे अपने उत्पाद को बेहतर तरीके से उपभोक्ताओं के सामने पेश करें। उन्हें उत्पाद की जरूरत के साथ ही उसके फायदे, गुणवत्ता और विशेषता बताएं। लेकिन, निर्माताओं की मानसिकता ही आज बदल गई है। उन्हें लगता है कि वे विज्ञापनों में माडल को कम से कम कपड़े पहनवा कर ही अपने उत्पाद को लोकप्रिय बना सकते हैं। लेकिन, हकीकत में ऐसा कतई नहीं है।
पश्चिम में हुए कई सर्वेक्षणों से यह साबित हो चुका है कि सामान्य दृश्यों वाले विज्ञापन ही उपभोक्ताओं और उत्पाद के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करते हैं। दुनिया के बड़े मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों में एक ब्रैंड बुशमन ने अपने अध्ययन में पाया है कि टेलीविजन शो के हिंसक और कामुकता भरे विज्ञापन के प्रदर्शन से विज्ञापित उत्पाद का कोई बेहतर प्रचार नहीं हो पाता। अगर विज्ञापन में खूनखराबे वाले दृश्य हों तो दर्शकों को विज्ञापित उत्पाद का नाम तक याद नहीं रहता। यही हाल यौन प्रदर्शन वाले विज्ञापनों का पाया गया है। आथोवा स्पेस विश्वविद्यालय के स्नातक की छात्रा एंजालिका बआंनक्सी ने हिंसा और यौन प्रदर्शन वाले विज्ञापनों के दर्शकों को 40-45 मिनट तक ऐसे विज्ञापन दिखाए।
इन विज्ञापनों में 18 ऐसे विज्ञापन कुश्ती फेडरेशन, नाइट कल्ब और मिरैकल पेट्स जैसे हिंसक व कामुक शोज के थे। बाद में उन्हें सामान्य तटस्थता वाले विज्ञापन दिखाए गए जिनमें उत्पादों का प्रचार शामिल था। दर्शकों के आकलन में पाया गया कि हिंसा-यौन दृश्यों वाले विज्ञापनों में दर्शकों को उत्पाद का नाम याद रहने की प्रवृत्ति नगण्य पाई गई। उनके मुकाबले सामान्य तटस्थता वाले उत्पाद विज्ञापनों के आंकलन में पाया गया कि दर्शकों में उत्पादों का नाम याद रहने की क्षमता उनसे 17 फीसदी ज्यादा है। यौन दृश्यों वाले विज्ञापनों के मुकाबले सामान्य दृश्यों में निहित उत्पादों का नाम याद रखने की उनकी क्षमता 21 फीसदी अधिक देखी गई। निष्कर्ष यह रहा कि हिंसा से जुड़े विज्ञापनों में उत्पादों का नाम याद रहने की उनकी क्षमता जहां 21 फीसदी कम हो जाती है, वहीं तटस्थता के विज्ञापनों के मुकाबले में यौन विज्ञापनों में स्मरण क्षमता 17 फीसदी कम हो जाती है। इन आकलनों में ब्रांड के पहचान की कोई समस्या नहीं रखी गई थी। क्योंकि, सारे उत्पादों के नाम बराबर दिखाए जाते रहे। चाहे वे सामान्य थे, हिंसा वाले दृश्यों के थे या यौन दृश्यों वाले विज्ञापनों के थे।
यह नहीं भूलना चाहिए कि नारी को भारत में एक समय सती प्रथा के नाम पर पति के साथ चिता में जलकर मरने को मजबूर किया गया था। देवदासी प्रथा की आड़ में उनसे वेश्यावृत्ति कराई गई थी। सदियों के बाद महिलाओं में जागरूकता आई है। अब जब वे अपने सम्मानजनक अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं तो ऐसे में देह प्रदर्शन के जरिए उन्हें भोग की वस्तु के रूप में पेश करना अपमानजनक है। यह देश के सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों पर भी कुठाराघात करने के समान है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत के करीब 40 करोड़ लोग टेलीविजन देखते हैं और हर घर में यह आठ से दस घंटे तक चलता है। यानी विज्ञापन देश की करीब आधी आबादी को सीधे रूप से प्रभावित करते हैं। इसलिए टेलीविजन पर किस तरह के विज्ञापन दिखाएं इस पर नजर रखने और नियमों की अवहेलना करने वालों के खिलाफ सख्ती बरतने की जरूरत है। बेहतर समाज के निर्माण के लिए सरकार को अपना दायित्व ईमानदारी के साथ निभाना चाहिए।
ईश्वर धामु
चंडीगढ़. हरियाणा जनहित कांग्रेस के अध्यक्ष कुलदीप बिश्नोई ने कहा कि जनहितों के लिए पार्टी द्वारा शुरू किए गए आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने हजकां नेताओं व कार्यकर्ताओं पर लाठियां बरसाईं और वाहन क्षतिग्रस्त कर दिए। अपनी इस बर्बरतापूर्ण कार्रवाई पर पर्दा डालने व दबाव बनाने के लिए पार्टी नेताओं पर झूठे व आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए। उन्होंने कहा कि पार्टी के सभी नेता व कार्यकर्ता निहत्थे थे और वे प्रदर्शन स्थल के दायरे में थे तथा पार्टी के पास प्रदर्शन स्थल की अधिकारिक अनुमति भी थी। इन सबके बावजूद उन पर कहर बरपाया गया। कुलदीप बिश्नोई सेक्टर-25 में भूख हड़ताल व धरने पर पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। इस अवसर पर पार्टी नेता पूर्व सांसद धर्मपाल सिंह मलिक, पूर्व विधायक रण सिंह मान, देवीलाल बिश्नोई, रमेश गोदारा, कमल सिंह तोशाम, कुसुम शर्मा, प्रोफेसर रोशनलाल यादव, नरेश ढांडे, शशि शर्मा, दलबीर वाल्मीकि, गुलजार काहलों, मंगतराम लालवास, तेजपाल गर्ग, धर्मबीर खत्री, योगेंद्र नाथ मल्होत्रा, रामफल गुर्जर, राकेश भडाना, बलबीर शर्मा, ज्ञान काजल, ठेकेदार रामसिंह, संतोष ढुल आदि भूख हड़ताल पर बैठे जबकि उनके साथ भारी संख्या में पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं ने धरने में हिस्सा लिया।
उन्होंने कहा कि जनहितों के लिए पार्टी नेता व कार्यकर्ता संघर्ष करने से कभी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा कि शुक्रवार को पुलिस द्वारा किए गए अत्याचार में पार्टी के पांच हजार नेता व कार्यकर्ता घायल हो गए और इनमें से करीब 50 को गंभीर चोटें आई हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को बर्बरता पूर्ण पीट कर भी जब पुलिस का मन नहीं भरा तो उन्होंने वाहनों पर लाठियां व पत्थर बरसाने शुरू कर दिए जिससे करीब एक हजार वाहन बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए। उन्होंने कहा कि इस समूचे घटनाक्रम की न्यायिक जांच होनी चाहिए तथा मामले में दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों को तुरंत बर्खास्त किया जाए। इसके अतिरिक्त बेकसूर हजकां कार्यकर्ताओं पर दर्ज किए गए झूठे मुकदमे वापस रद्द किए जाएं और इस घटना में क्षतिग्रस्त वाहनों व घायल हुए पार्टी कार्यकर्ताओं को राहत स्वरूप पांच करोड़ रुपए क्षतिपूर्ति के लिए प्रदान किए जाएं।
पार्टी अध्यक्ष ने कहा कि पुलिस ने पार्टी के विरोध प्रदर्शन में लाठियां बरसाकर भी एक-तरफा कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि हजकां नेताओं पर तो हत्या प्रयास जैसे गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज कर दिए गए जबकि पार्टी के घायल कार्यकर्ताओं की शिकायत भी दर्ज नहीं की। उन्हांने कहा कि मामले में न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. हिंदी अकादमी दिल्ली ने इस साल (2009-2010) और पिछले साल (2008-2009) के पुरस्कारों की घोषणा कर दी है. काका हाथरसी सम्मान से स्टार कार्टूनिस्ट इरफ़ान खान को दिया जाएगा. यह पुरस्कार 23 मार्च को श्रीराम सेंटर में पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान दिए जाएंगे. समारोह में अकादमी की अध्यक्ष व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तथा प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी मौजूद रहेंगी.
अकादमी के सचिव प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव परिचयदास ने बताया कि इस साल प्रो. केदारनाथ सिंह को शलाका पुरस्कार (दो लाख) की घोषणा की जा चुकी है. नए नियमों के मुताबिक़ अन्य सात पुरस्कारों की घोषणा की जा रही है, जिनमें हिन्दी अकादमी विशिष्ट योगदान सम्मान (प्रो. नजीब रिज़वी), हिन्दी अकादमी काव्य सम्मान (डा. कन्हैया लाल नंदन), हिन्दी अकादमी गद्य विधा सम्मान (प्रो. सुधीश पचौरी), हिन्दी अकादमी नाटक सम्मान (डा. असगर वज़ाहत), हिन्दी अकादमी हास्य व्यंग्य सम्मान (डा.ज्ञान चतुर्वेदी), हिन्दी अकादमी बाल साहित्य सम्मान (रेखा जैन) और हिन्दी अकादमी ज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान (बालेंदु दाधीच) शामिल हैं. इन सभी पुरस्कारों की राशि नए प्रारूप के मुताबिक़ 50 हज़ार रुपए रखी गई है.
उन्होंने बताया कि शलाका पुरस्कार नहीं दिया जा रहा है. अन्य पुरस्कारों के तहत साहित्यकार सम्मान 11 लोगों को दिया जा रहा है, जिनमें प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रो. कृष्ण कुमार, गगन गिल, पंकज सिंह, द्रोणवीर कोहली, प्रो अब्दुल बिस्मिल्लाह, लीलाधर मंडलोई, बनवारी, प्रो इन्द्रनाथ चौधरी, डा.रामेश्वर प्रेम, सुरेश सलिल शामिल हैं.
वर्ष 2007-2008 के साहित्यिक कृति पुरस्कारों में विशिष्ट कृति का पुरस्कार कृपाशंकर सिंह की किताब ‘ऋगवेद, हडप्पा सभ्यता और सांस्कृतिक निरंतरता’ को दिया जा रहा है. कहानी संग्रह के लिए प्रियदर्शन के संग्रह ‘उसके हिस्से का जादू’, कविता संग्रह के लिए सूरजपाल सिंह चौहान की कविता संग्रह ‘कब होगी वह भोर’, मधु वर्मा के संग्रह ‘ये लहरें घेर लेती हैं’, मुकेश शर्मा के संग्रह ‘पसीने की बूंद’, उपन्यास के लिए अशोक गुप्ता की रचना ‘उत्सव अभी शेष है’ तथा नाटक के लिए दया प्रकाश सिन्हा के नाटक ‘रक्त अभिषेक’ को पुरस्कृत किया जा रहा है.
अन्य विधाओं में पुरस्कृत किताबों में विमल कुमार की ‘सत्ता समाज और बाजार’, आदित्य अवस्थी की ‘दिल्ली क्रांति के 150 वर्ष’, प्रो पवन माथुर की ‘शब्द बीज’ और प्रो पीके आर्य की ‘इलेक्ट्रॉनिक मीडिया’। इस वर्ष की बाल एवं किशोर साहित्यिक सम्मान से पुरस्कृत की जा रहीं किताबें हैं - चित्र का रहस्य (कुसुम लता सिंह), खुशी के पल (सरस्वती बाली), कहावतों की कहानियां (राधाकांत भारती), फूलों के बाबूजी (मधुलिका अग्रवाल), मोबाइल के जादूगर (अखिल चंद्र), बचपन की बुनियाद (पूरनचंद्र काण्डपाल) शामिल है.
आज का दिन
26 रबी अल-अव्वल, हिजरी सन् 1431, 11 मार्च, 2010 गुरुवार, तिथि संवत : चैत्र कृष्ण एकादशी, संवत् 2066, शाके 1931, रवि उत्तरायने, वसंत ऋतु. पापमोचनी एकादशी. सूर्योदय कालीन नक्षत्र : उत्तराषाढ़ा सायं 7.21 तक, पश्चात श्रवण नक्षत्र, परिघ योग तथा बालवकरण. ग्रह विचार : सूर्य-बुध, गुरु-कुंभ, शुक्र-मीन, केतु-मिथुन, मंगल-कर्क, शनि-कन्या, राहु-धनु तथा चंद्रमा-मकर राशि में. चौघड़िया मुहूर्त : प्रात: 6.39 से 8.09 तक शुभ, प्रात: 11.07 से 12.37 तक चंचल, दोपहर 12.37 से 2.06 तक लाभ, सायं 5.05 से 6.34 तक शुभ, सायं 6.34 से 8.05 तक अमृत, रात्रि 8.05 से 9.35 तक चंचल. राहुकाल : दोपहर 2.06 से 3.35 तक. शुभ अंक 8, शुभ रंग नीला














