फ़िरदौस ख़ान
त्यौहार के दिनों मे बाज़ार में नक़ली मावे और पनीर से बनी मिठाइयों का कारोबार ज़ोर पकड़ लेता है. आए-दिन छापामारी की ख़बरें सुनने को मिलती हैं कि फ़लां जगह इतना नक़ली या मिलावटी मावा पकड़ा गया, फ़लां जगह इतना. इन मामलों में केस भी दर्ज होते हैं, गिरफ़्तारियां भी होती हैं और दोषियों को सज़ा भी होती है. इस सबके बावजूद मिलावटख़ोर कोई सबक़ हासिल नहीं करते और मिलावटख़ोरी का धंधा बदस्तूर जारी रहता है. त्योहारी सीज़न में कई मिठाई विक्रेता, होटल और रेस्टोरेंट संचालक मिलावटी और नक़ली मावे से बनी मिठाइयां बेचकर मोटा मुनाफ़ा कमाएंगे.

ज़्यादातर मिठाइयां मावे और पनीर से बनाई जाती हैं. दूध दिनोदिन महंगा होता जा रहा है.  ऐसे में असली दूध से बना मावा और पनीर बहुत महंगा बैठता है. फिर इनसे मिठाइयां बनाने पर ख़र्च और ज़्यादा बढ़ जाता है, यानी मिठाई की क़ीमत बहुत ज़्यादा हो जाती है. इतनी महंगाई में लोग ज़्यादा महंगी मिठाइयां ख़रीदना नहीं चाहते. ऐसे में दुकानदारों की बिक्री पर असर पड़ता है. इसलिए बहुत से हलवाई मिठाइयां बनाने के लिए नक़ली या मिलावटी मावे और पनीर का इस्तेमाल करते हैं. नक़ली और मिलावटी में फ़र्क़ ये है कि नक़ली मावा शकरकंद, सिंघाड़े, मैदे, आटे, वनस्पति घी, आलू, अरारोट को मिलाकर बनाया जाता है. इसी तरह पनीर बनाने के लिए सिंथेटिक दूध का इस्तेमाल किया जाता है. मिलावटी मावे उसे कहा जाता है, जिसमें असली मावे में नक़ली मावे की मिलावट की जाती है.मिलावट इस तरह की जाती है कि असली और नक़ली का फ़र्क़ नज़र नहीं आता.  इसी तरह सिंथेटिक दूध यूरिया, कास्टिक सोडा, डिटर्जेन्ट आदि का इस्तेमाल किया जाता है. सामान्य दूध जैसी वसा उत्पन्न करने के लिए सिंथेटिक दूध में तेल मिलाया जाता है, जो घटिया क़िस्म का होता है. झाग के लिए यूरिया और कास्टिक सोडा और गाढ़ेपन के लिए डिटर्जेंट मिलाया जाता है.

फूड विशेषज्ञों के मुताबिक़ थोड़ी-सी मिठाई या मावे पर टिंचर आयोडीन की पांच-छह बूंदें डालें. ऊपर से इतने ही दाने चीनी के डाल दें. फिर इसे गर्म करें. अगर मिठाई या मावे का रंग नीला हो जाए, तो समझें उसमें मिलावट है. इसके अलावा, मिठाई या मावे पर हाइड्रोक्लोरिक एसिड यानी नमक के तेज़ाब की पां-छह बूंदें डालें. अगर इसमें मिलावट होगी, तो मिठाई या मावे का रंग लाल या हल्का गुलाबी हो जाएगा. मावा चखने पर थोड़ा कड़वा और रवेदार महसूस हो, तो समझ लें कि इसमें वनस्पति घी की मिलावट है. मावे को उंगलियों पर मसल कर भी देख सकते हैं अगर वह दानेदार है, तो यह मिलावटी मावा हो सकता है.

इतना ही नहीं, रंग-बिरंगी मिठाइयों में इस्तेमाल होने वाले सस्ते घटिया रंगों से भी सेहत पर बुरा असर पड़ता है. अमूमन मिठाइयों में कृत्रिम रंग मिलाए जाते हैं. जलेबी में कृत्रिम पीला रंग मिलाया जाता है, जो नुक़सानदेह है. मिठाइयों को आकर्षक दिखाने वाले चांदी के वरक़ की जगह एल्यूमीनियम फॉइल से बने वर्क़ इस्तेमाल लिए जाते हैं.  इसी तरह केसर की जगह भुट्टे के रंगे रेशों से मिठाइयों को सजाया जाता है.

दिवाली पर सूखे मेवे और चॊकलेट देने का चलन भी तेज़ी से बढ़ा है. चॊकलेट का कारोबार बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. फूड नेविगेटर-एशिया की रिपोर्ट की मानें, तो साल 2005 में भारत में चॊकलेट का उपभोग 50 ग्राम प्रति व्यक्ति था, जो साल 2013-14 में बढ़कर 120 ग्राम प्रति व्यक्ति हो गया. एक अन्य रिपोर्ट की मानें, तो पिछले साल देश में चॉकलेट का 58 अरब रुपये का कारोबार हुआ था, जिसके साल 2019 में बढ़कर 122 अरब रुपये होने की संभावना है. चॊकलेट की लगातार बढ़ती मांग की वजह से बाज़ार में घटिया क़िस्म के चॊकलेट की भी भरमार है. मिलावटी और बड़े ब्रांड के नाम पर नक़ली चॉकलेट भी बाज़ार में ख़ूब बिक रही हैं. इसी तरह जमाख़ोर रखे हुए सूखे मेवों को एसिड में डुबोकर बेच रहे हैं. इसे भी घर पर जांचा जा सकता है. सूखे मेवे काजू या बादाम पर पानी की तीन-चार बूंदें डालें, फिर इसके ऊपर ब्लू लिटमस पेपर रख दें. अगर लिटमस पेपर का रंग लाल हो जाता है, तो इस पर एसिड है.

चिकित्सकों का कहना है कि मिलावटी मिठाइयां सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. इनसे पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं. फ़ूड प्वाइज़निंग का ख़तरा भी बना रहता है. लंबे अरसे तक खाये जाने पर किडनी और लीवर पर बुरा असर पड़ सकता है. आंखों की रौशनी पर भी बुरा असर पड़ सकता है. बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास अवरुद्ध हो सकता है. घटिया सिल्वर फॉएल में एल्यूमीनियम की मात्रा ज़्यादा होती है, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों के ऊतकों और कोशिकाओं को नुक़सान हो सकता है. दिमाग़ पर भी असर पड़ता है. ये हड्डियों तक की कोशिकाओं को डैमेज कर सकता है. मिठाइयों को पकाने के लिए घटिया क़िस्म के तेल का इस्तेमाल किया जाता है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं है. सिंथेटिक दूध में शामिल यूरिया, कास्टिक सोडा और डिटर्जेंट आहार नलिका में अल्सर पैदा करते हैं और किडनी को नुक़सान पहुंचाते हैं. मिलावटी मिठाइयों में फॉर्मेलिन, कृत्रिम रंगों और घटिया सिल्वर फॉएल से लीवर, किडनी, कैंसर, अस्थमैटिक अटैक, हृदय रोग जैसी कई बीमारियां हो सकती हैं. इनका सबसे ज़्यादा असर बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है.
सूखे मेवों पर लगा एसिड भी सेहत के लिए बहुत ही ख़तरनाक है. इससे कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है और लीवर, किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है.

हालांकि देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए कई क़ानून बनाए गए, लेकिन मिलावटख़ोरी में कमी नहीं आई. खाद्य पदार्थो में मिलावटखोरी को रोकने और उनकी गुणवत्ता को स्तरीय बनाए रखने के लिए खाद्य संरक्षा और मानक क़ानून-2006 लागू किया गया है. लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद 23 अगस्त 2006 को राष्ट्रपति ने इस क़ानून पर अपनी मंज़ूरी दी. फिर 5 अगस्त 2011 को इसे अमल में लाया गया, यानी इसे लागू होने में पांच साल लग गए. इसका मक़सद खाद्य पदार्थों से जुड़े नियमों को एक जगह लाना और इनका उल्लंघन करने वालों को सख़्त सज़ा देकर मिलावटख़ोरी को ख़त्म करना है. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की स्थापना खाद्य सुरक्षा और मानक विधेयक 2006 के तहत खाद्य पदार्थों के विज्ञान आधारित मानक निर्धारित करने एवं निर्माताओं को नियंत्रित करने के लिए 5 सितंबर 2008 को की गई. यह प्राधिकरण अंतरराष्ट्रीय तकनीकी मानकों और घरेलू खाद्य मानकों के बीच मध्य सामंजस्य को बढ़ावा देने के साथ घरेलू सुरक्षा स्तर में कोई कमी न होना सुनिश्चित करता है.  इसके प्रावधानों के तहत पहले काम कर रहे कई नियम-क़ानूनों (1-फ्रूट प्रोडक्ट्स आर्डर, 1955 2-मीट फूड प्रोडक्ट्स आर्डर, 1973 3- मिल्क एंड मिल्क प्रोडक्ट्स आर्डर, 1992 4-सालवेंट एक्सट्रैक्टेड आयल, डी-आयल्ड मील एंड एडिबल फ्लोर (कंट्रोल) आर्डर, 1967 5-विजिटेबल्स आयल प्रोडक्ट्स (रेगुलेशन) आर्डर, 1998 6-एडिबल आयल्स पैकेजिंग (रेगुलेशन) आर्डर, 1998 7- खाद्य अपमिश्रण निवारण कानून, 1954) का प्रशासनिक नियंत्रण को इसमें शामिल किया है.

इस क़ानून में खाद्य पदार्थों से जुड़े अपराधों को श्रेणियों में बांटा गया है और इन्हीं श्रेणियों के हिसाब से सज़ा भी तय की गई है. पहली श्रेणी में जुर्माने का प्रावधान है. निम्न स्तर, मिलावटी, नक़ली माल की बिक्री, भ्रामक विज्ञापन के मामले में संबंधित प्राधिकारी 10 लाख रुपये तक जुर्माना लगा सकते हैं. इसके लिए अदालत में मामला ले जाने की ज़रूरत नहीं है. दूसरी श्रेणी में जुर्माने और क़ैद का प्रावधान है. इन मामलों का फ़ैसला अदालत में होगा. मिलावटी खाद्य पदार्थो के सेवन से अगर किसी की मौत हो जाती है, तो उम्रक़ैद और 10 लाख रुपये तक जुर्माना भी हो सकता है.  पंजीकरण या लाइसेंस नहीं लेने पर भी जुर्माने का प्रावधान है. छोटे निर्माता, रिटेलर, हॉकर, वेंडर, खाद्य पदार्थो के छोटे व्यापारी जिनका सालाना टर्नओवर 12 लाख रुपये से कम है, उन्हें पंजीकरण कराना ज़रूरी है. इसके उल्लंघन पर उन पर 25 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है. 12 लाख रुपये सालाना से ज़्यादा टर्नओवर वाले व्यापारी को लाइसेंस लेना ज़रूरी है. ऐसा न करने पर पांच लाख रुपये तक जुर्माना और छह महीने तक की सज़ा ह सकती है. अप्राकृतिक और ख़राब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर दो लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. इसी तरह घटिया खाद्य पदार्थों की बिक्री पर पांच लाख रुपये, ग़लत ब्रांड खाद्य पदार्थों की बिक्री पर तीन लाख, भ्रामक विज्ञापन करने पर 10 लाख रुपये और खाद्य पदार्थ में अन्य चीज़ों की मिलावट करने पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.

दिवाली पर मिठाई की मांग ज़्यादा होती है और इसके मुक़ाबले आपूर्ति कम होती है. मिलावटख़ोर मांग और आपूर्ति के इस फ़र्क़ का फ़ायदा उठाते हुए बाज़ार में मिलावटी सामग्री से बनी मिठाइयां बेचने लगते हैं. इससे उन्हें तो ख़ासी आमदनी होती है, लेकिन ख़ामियाज़ा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ता है. हालांकि स्वास्थ्य विभाग द्वारा छापेमारी कर और नमूने लेकर ख़ानापूर्ति कर ली जाती है. फिर कुछ दिन बाद मामला रफ़ा-दफ़ा हो जाता है. दरअसल मिलावटख़ोरी पर रोक लगाने के लिए इतनी सख़्ती नहीं बरती जाती जितनी बरती जानी चाहिए. इसलिए यही बेहतर है कि मिठाई, चॊकलेट और सूखे मेवे ख़रीदते वक़्त एहतियात बरतनी चाहिए. साथ ही इनके ख़राब होने पर इसकी शिकायत ज़रूर करनी चाहिए, ताकि मिलावटख़ोरों पर दबाव बने. जागरूक बने, सुखी रहें

फ़िरदौस ख़ान
’लौह महिला’ के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी न सिर्फ़ भारतीय राजनीति पर छाई रहीं, बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी सूरज की तरह चमकीं. उनकी ज़िन्दगी संघर्ष, चुनौतियों और कामयाबी का एक ऐसा सफ़रनामा है, जो अदम्य साहस का इतिहास बयां करता है. अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना किया और हर मोर्चे पर कामयाबी का परचम लहराया. मामला चाहे कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी कलह का हो, अलगाववाद का हो, पाकिस्तान के साथ जंग का हो, बांग्लादेश की आज़ादी का हो, या फिर इसी तरह का कोई और बड़ा मुद्दा हो. हर मामले में उन्होंने अपनी सूझबूझ और साहस का परिचय दिया. बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रीवी पर्स का ख़ात्मा, प्रथम पोखरण परमाणु विस्फोट, प्रथम हरित क्रांति जैसे कार्यों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई और बांग्लादेश की आज़ादी भी उनके साहसिक कार्यों में शामिल है.

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी का जन्म 19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था. उनका पूरा नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी था. उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे और माता कमला नेहरू थीं. उन्होंने शुरुआती तालीम इलाहाबाद के स्कूल में ही ली. इसके बाद उन्होंने गुरु रबींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया. कहते हैं, रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ही उन्हें ’प्रियदर्शिनी’ नाम दिया था. इसके बाद वे इंग्लैंड चली गईं और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठीं,लेकिन नाकाम हुईं. इसके बाद उन्होंने ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में कुछ महीने बिताए. फिर साल 1937 में इम्तिहान में कामयाब होने के बाद उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड के सोमरविल कॉलेज में दाख़िला ले लिया. उस दौरान उनकी मुलाक़ात फ़िरोज़ गांधी से हुई, जिन्हें वे इलाहाबाद से जानती थीं. फ़िरोज़ गांधी उन दिनों लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में पढ़ रहे थे. उनकी जान-पहचान मुहब्बत में बदल गई और फिर 16 मार्च 1942 को उन्होंने इलाहाबाद के आनंद भवन में  फिरोज़ से विवाह कर लिया. उनके दो बेटे संजय और राजीव हुए. राजीव गांधी बाद में देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री बने.

बचपन से ही इंदिरा गांधी को सियासी माहौल मिला था, जिसका उनके किरदार और उनकी ज़िन्दगी पर गहरा असर पड़ा. साल 1941 में ऑक्सफ़ोर्ड से स्वदेश वापसी के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं. उन्होंने युवाओं के लिए वानर सेना बनाई. वानर सेना विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस निकालने के साथ-साथ कांग्रेस नेताओं की भी ख़ूब मदद करती थी, मसलन संवेदनशील प्रकाशनों और प्रतिबंधित सामग्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने का काम करती थी. आज़ादी की लड़ाई में इसके काम को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.  1930 की दहाई के शुरू का वाक़िया है, जब इंदिरा गांधी ने पुलिस की निगरानी में रह रहे अपने पिता के घर से एक अहम दस्तावेज़ को अपनी किताबों के बस्ते में छुपाकर गंतव्य तक पहुंचाया था. इस दहाई के आख़िर में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान वे लंदन में आज़ादी के समर्थक दल भारतीय लीग की सदस्य बनीं और विदेश में रहकर भी स्वदेश के लिए काम करती रहीं. सितम्बर 1942 में उन्हें  ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया. आख़िर तक़रीबन 243 दिन जेल में गुज़ारने के बाद उन्हें 13 मई 1943 को रिहा किया गया. साल 1947 के देश के बंटवारे के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों को संगठित किया और पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए भोजन और चिकित्सा का इंतज़ाम किया. उनके इस कार्य को ख़ूब सराहा गया और इससे उन्हें एक नई पहचान मिली.

1950 की दहाई में इंदिरा गांधी अपने पिता यानी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी सहायक के तौर पर काम कर रही थीं. साल 1959 वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं. पार्टी के लिए उन्होंने सराहनीय काम किया. 27 मई, 1964 को उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य के रूप में चुनी गईं और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं. साल 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान वे सेना की हौसला अफ़ज़ाई के लिए श्रीनगर सीमा के इलाक़े में गईं. सेना की चेतावनी के बावजूद उन्होंने दिल्ली आना मंज़ूर नहीं किया और सेना का मनोबल बढ़ाती रहीं. उस दौरान लालबहादुर शास्त्री ताशक़ंद गए हुए थे, जहां सोवियत मध्यस्थता में पाकिस्तान के अयूब ख़ान के साथ शांति समझौते पर दस्तख़त करने के कुछ घंटों बाद ही उनका निधन हो गया.
इसके बाद 19 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी देश की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं. उस वक़्त कांग्रेस दो गुटों में बंट चुकी थी. समाजवादी ख़ेमा इंदिरा गांधी के साथ खड़ा था, जबकि दूसरा रूढ़िवादी गुट मोरारजी देसाई का समर्थक था. मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी को ’गूंगी गुड़िया’ कहा करते थे, क्योंकि वे बहुत कम बोलती थीं. साल 1967 के चुनाव में 545 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को 297 सीटें मिलीं. उन्हें प्रधानमंत्री चुन लिया गया और वे  24 मार्च, 1977 अपने पद पर बनी रहीं. क़ाबिले-ग़ौर है कि वे 1967 में प्रधानमंत्री पद के लिए चुने जाने के बाद आख़िर तक प्रधानमंत्री बनी रहीं, लेकिन 1977 से 1980 के बीच उन्हें हुकूमत से बेदख़ल रहना पड़ा. उन्होंने मोरारजी देसाई को देश का उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बनाया. साल 1969 में मोरारजी देसाई के साथ अनेक मुद्दों पर मतभेद हुए और आख़िरकार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बंट गई. उन्होंने समाजवादी और साम्यवादी दलों के समर्थन से हुकूमत की. इसके कुछ वक़्त बाद फिर से देश को जंग का सामना करना पड़ा. साल 1971 में जंग के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति को नई दिशा दी. नतीजतन, जंग में भारत ने शानदार जीत हासिल की. इस दौरान बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ादी मिली. दरअसल, बांग्लादेश को आज़ाद कराने में इंदिरा गांधी ने बेहद अहम किरदार निभाया था. कहते हैं कि इस जीत के बाद जब संसद सत्र शुरू हुआ, तो विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण मे इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया था.

इंदिरा गांधी ने  26 जून, 1975 को देश में आपातकाल लागू किया. इसकी वजह से उनकी पार्टी 1977 के आम चुनाव में पहली बार हार गई. उन्हें अक्टूबर 1977 और दिसम्बर 1978 में जेल तक जाना पड़ा. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जद्दोजहद करती रहीं. फिर 1980 में उन्होंने हुकूमत में वापसी की. कांग्रेस को शानदार कामयाबी मिली और 22 राज्यों में से 15 राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी. 14 जनवरी, 1980 को वे फिर से देश की प्रधानमंत्री बनीं और अपनी ज़िन्दगी के आख़िर तक हुकूमत की. उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चरम पर था. उन्होंने पंजाब में अलगाववादियों के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी. इसकी वजह से अलगाववादी उनकी जान के दुश्मन बन गए और 31 अक्टूबर, 1984 को दिल्ली में उनके अंगरक्षकों ने ही उनका क़त्ल कर दिया. उनकी आकस्मिक मौत से देश शोक में डूब गया.

श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पंडित जवाहरलाल  नेहरू से श्रीमती इंदिरा गांधी की तुलना करते हुए कहा था कि अपने पिता के विपरीत श्रीमती इंदिरा गांधी संसद से दूर-दूर रहती थीं. आरंभ में तो वह इतनी चुप रहती थीं कि उन्हें ’गूंगी गुड़िया’ तक कह दिया गया था, किंतु यह उनके साथ अन्याय था. वह कम बोलने में विश्वास करती थीं. सबकी बातें सुनने के बाद अपना मत स्थिर करती थीं और सबसे अंत में प्रकट करती थीं. वह सदन में आकर समय गंवाने की बजाय अपने कमरे में बैठकर सत्ता की चाबियां घुमाती थीं. उन्होंने चौदह वर्ष तक शासन कर विश्व को चमत्कृत कर दिया और विरोधियों को कई बार पछाड़ा. इंदिरा जी के साथ संसद में कई बार काफी नोक-झोंक होती रहती थी, किंतु राजनीति के मतभेदों को उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों में बाधक नहीं बनने दिया. उनकी निर्मम त्रासद और क्रूर हत्या ने एक ऐसे व्यक्तित्व को हमारे बीच से उठा लिया, जिन्हें योग्य पिता की योग्य पुत्री के नाते ही नहीं, अपनी निजी योग्यता, कुशलता, निर्णय क्षमता तथा कठोरता के कारण याद किया जाएगा.

दरअसल, सियासत की इस महान और कामयाब शख़्सियत को अपनी निजी ज़िन्दगी में कई ग़म मिले थे. साल 1936 में उनकी मां कमला नेहरू तपेदिक से एक लम्बे अरसे तक जूझने के बाद उन्हें अकेला छोड़ गईं. उस वक़्त उनकी उम्र महज़ 18 साल थी. फिर शादीशुदा ज़िन्दगी में भी उन्हें दुख मिले.शादी के बाद उनकी शुरुआती ज़िन्दगी ठीक रही, लेकिन बाद में वे अपने पिता के घर आ नई दिल्ली आ गईं. देश के पहले आम चुनाव 1951 में वे अपने पिता और पति दोनों के लिए चुनाव प्रचार कर रही थीं. चुनाव जीतने के बाद फ़िरोज़ गांधी ने अपने लिए अलग घर चुना. फिर साल 1958 में उप-निर्वाचन के कुछ वक़्त बाद फिरोज़ गांधी को दिल का दौरा पड़ा. इस दौरान इंदिरा गांधी ने उनकी ख़ूब ख़िदमत की. उनके रिश्ते बेहतर होने लगे, लेकिन 8 सितम्बर1960 को जब इंदिरा गांधे अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गई थीं, तब फिरोज़ की मौत हो गई. उन्होंने ख़ुद को पार्टी और देश के काम में मसरूफ़ कर लिया. उन्होंने संजय गांधी को अपना सियासी वारिस चुना, लेकिन 23 जून, 1980 को एक उड़ान हादसे में उनकी मौत हो गई. इसके बाद वे अपने छोटे बेटे राजीव गांधी को सियासत में लेकर आईं. राजीव गांधी पायलट की नौकरी में ख़ुश थे और सियासत में आना नहीं चाहते थे, लेकिन मां को वे इंकार न कर सके और न चाहते हुए भी उन्हें सियासत में क़दम रखना पड़ा.

इंदिरा गांधी ख़ाली वक़्त में अपने परिजनों के लिए स्वेटर बुना करती थीं. उन्हें संगीत और किताबों से भी ख़ास लगाव था. पाकिस्तानी गायक मेहंदी हसन की ग़ज़लें भी अकसर सुनती थीं. सोने से पहले वे आध्यात्मिक किताबें पढ़ती थीं. भारत रत्न से सम्मानित इंदिरा गांधी ने कहा था- जीवन का महत्व तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के लिए समर्पित हो. यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त हो. शहादत कुछ ख़त्म नहीं करती, वो महज़ शुरुआत है. अगर मैं एक हिंसक मौत मरती हूं, जैसा कि कुछ लोग डर रहे हैं और कुछ षड़यंत्र कर रहे हैं, तो मुझे पता है कि हिंसा हत्यारों के विचार और कर्म में होगी, मेरे मरने में नहीं. लोग अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं, लेकिन अधिकारों को याद रखते हैं. अपने आप को खोजने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि आप अपने आप को दूसरों की सेवा में खो दें. संतोष प्राप्ति में नहीं, बल्कि प्रयास में होता है पूरा प्रयास पूर्ण विजय है. प्रश्न करने का अधिकार मानव प्रगति का आधार है. देशों के बीच के शांति, व्यक्तियों के बीच प्यार की ठोस बुनियाद पर टिकी होती है
उन्होंने यह भी कहा था, जब मैं सूर्यास्त  पर आश्चर्य या चांद की ख़ूबसूरती की प्रशंसा कर रही होती हूं, उस समय मेरी आत्मा इन्हें बनाने वाले की पूजा कर रही होती है.

फ़िरदौस ख़ान
अमृता प्रीतम की रचनाओं को पढ़कर हमेशा सुकून मिलता है. शायद इसलिए कि उन्होंने भी वही लिखा जिसे उन्होंने जिया. अमृता प्रीतम ने ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने शब्दों में पिरोकर रचनाओं के रूप में दुनिया के सामने रखा. पंजाब के गुजरांवाला में 31 अगस्त, 1919 में जन्मी अमृता प्रीतम पंजाबी की लोकप्रिय लेखिका थीं. उन्हें पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. उन्होंने तक़रीबन एक सौ किताबें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है. उनकी कई रचनाओं का अनेक देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ. अमृता की पंजाबी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हुई. इसमें उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए उसके वक़्त के हालात बयां किए थे.
अज्ज आखां वारिस शाह नूं कित्थों क़बरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरक़ा फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण
अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां तैनू वारिस शाह नू कहिण

ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा गया. इससे पहले उन्हें 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत किया गया. अमृता को 1988 में अंतरराष्ट्रीय बल्गारिया वैरोव पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें 1982 में देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से नवाज़ा गया. अमृता प्रीतम जनवरी 2002 में अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से बिस्तर से नहीं उठ पाईं. उनकी मौत 31 अक्टूबर, 2005 को नई दिल्ली में हुई.
अमृता प्रीतम ने रसीदी टिकट में अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखा है, यूं तो मेरे भीतर की औरत सदा मेरे भीतर के लेखक से सदा दूसरे स्थान पर रही है. कई बार यहां तक कि मैं अपने भीतर की औरत का अपने आपको ध्यान दिलाती रही हूं. सिर्फ़ लेखक का रूप सदा इतना उजागर होता है कि मेरी अपनी आंखों को भी अपनी पहचान उसी में मिलती है. पर ज़िंदगी में तीन वक़्त ऐसे आए हैं, जब मैंने अपने अंदर की सिर्फ़ औरत को जी भर कर देखा है. उसका रूप इतना भरा पूरा था कि मेरे अंदर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया. वहां उस वक़्त थोड़ी सी भी ख़ाली जगह नहीं थी, जो उसकी याद दिलाती. यह याद केवल अब कर सकती हूं, वर्षों की दूरी पर खड़ी होकर. पहला वक़्त तब देखा था जब मेरी उम्र पच्चीस वर्ष की थी. मेरे कोई बच्चा नहीं था और मुझे प्राय: एक बच्चे का स्वप्न आया करता था. जब मैं जाग जाती थी. मैं वैसी की वैसी ही होती थी, सूनी, वीरान और अकेली. एक सिर्फ़ औरत, जो अगर मां नहीं बन सकती थी तो जीना नहीं चाहती थी. और जब मैंने अपनी कोख से आए बच्चे को देख लिया तो मेरे भीतर की निरोल औरत उसे देखती रह गई.
दूसरी बार ऐसा ही समय मैंने तब देखा था, जब एक दिन साहिर आया था, उसे हल्का सा बुख़ार चढ़ा हुआ था. उसके गले में दर्द था, सांस खिंचा-खिंचा था. उस दिन उसके गले और छाती पर मैंने विक्स मली थी. कितनी ही देर मलती रही थी, और तब लगा था, इसी तरह पैरों पर खड़े-खड़े मैं पोरों से, उंगलियों से और हथेली से उसकी छाती को हौले-हौले मलते हुए सारी उम्र ग़ुजार सकती हूं. मेरे अंदर की सिर्फ़ औरत को उस समय दुनिया के किसी काग़ज़ क़लम की आवश्यकता नहीं थी.
और तीसरी बार यह सिर्फ़ औरत मैंने तब देखी थी, जब अपने स्टूडियो में बैठे हुए इमरोज़ ने अपना पतला सा ब्रश अपने काग़ज़ के ऊपर से उठाकर उसे एक बार लाल रंग में डुबोया था और फिर उठकर उस ब्रश से मेरे माथे पर बिंदी लगा दी थी. मेरे भीतर की इस सिर्फ़ औरत की सिर्फ़ लेखक से कोई अदावत नहीं. उसने आप ही उसके पीछे, उसकी ओट में खड़े होना स्वीकार कर लिया है. अपने बदन को अपनी आंखों से चुराते हुए, और शायद अपनी आंखों से भी, और जब तक तीन बार उसने अगली जगह पर आना चाहा था, मेरे भीतर के सिर्फ़ लेखक ने पीछे हटकर उसके लिए जगह ख़ाली कर दी थी.
मशहूर शायर साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम को लेकर कई क़िस्से हैं. अमृता प्रीतम ने भी बेबाकी से साहिर के प्रति अपने प्रेम को बयां किया है. वह लिखती हैं, मैंने ज़िंदगी में दो बार मुहब्बत की. एक बार साहिर से और दूसरी बार इमरोज़ से. अक्षरों के साये में जवाहर लाल नेहरू और एडविना पर लिखी एक किताब का हवाला देते हुए वह कहती हैं, मेरा और साहिर का रिश्ता भी कुछ इसी रोशनी में पहचाना जा सकता है, जिसके लंबे बरसों में कभी तन नहीं रहा था, सिर्फ़ मन था, जो नज़्मों में धड़कता रहा दोनों की.
लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिए आता था, तो जैसे मेरी ही ख़ामोशी से निकला हुआ ख़ामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और चला जाता था. वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था, कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नया सिगरेट सुलगा लेता था. और उसके जाने के बाद केवल सिगरेट के बड़े-छोटे टुकड़े कमरे में रह जाते थे. कभी, एक बार उसके हाथ छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी. तब कल्पना की करामात का सहारा लिया था. उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेट को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक-एक टुकड़े को अकेले जलाती थी, और जब उंगलियों के बीच पकड़ती थी तो बैठकर लगता था जैसे उसका हाथ छू रही हूं. वह कहती हैं-
मेरे इस जिस्म में
तेरा सांस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा
उम्र की सिगरेट जल गई
मेरे इश्क़ की महक
कुछ तेरी सांसों में
कुछ हवा में मिल गई

अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा में इमरोज़ के बारे में भी विस्तार से लिखा है. एक जगह वह लिखती हैं-
मुझ पर उसकी पहली मुलाक़ात का असर-मेरे शरीर के ताप के रूप में हुआ था. मन में कुछ घिर आया, और तेज़ बुख़ार चढ़ गया. उस दिन-उस शाम उसने पहली बार अपने हाथ से मेरा माथा छुआ था-बहुत बुख़ार है? इन शब्दों के बाद उसके मुंह से केवल एक ही वाक्य निकला था- आज एक दिन में मैं कई साल बड़ा हो गया हूं.
कभी हैरान हो जाती हूं. इमरोज़ ने मुझे कैसा अपनाया है, उस दर्द के समेत, जो उसकी अपनी ख़ुशी का मुख़ालिफ़ है. एक बार मैने हंसकर कहा था, ईमू! अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिलता, और वह मुझे, मुझसे भी आगे, अपनाकर कहने लगा- मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ पढ़ते हुए ढूंढ लेता. सोचती हूं, क्या ख़ुदा इस जैसे इंसान से कहीं अलग होता है. अपनी एक कविता में वह अपने जज़्बात को कुछ इस तरह बयां करती हैं-
मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूं
कि वक़्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी

एक बार जब अमृता प्रीतम से पूछा गया कि ज़िंदगी में उन्हें किस चीज़ ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया तो जवाब में उन्होंने एक क़िस्सा सुनाते हुए कहा था, 1961 में जब मैं पहली बार रूस गई थी तब ताजिकिस्तान में एक मर्द और एक औरत से मिली, जो एक नदी के किनारे लकड़ी की एक कुटिया बनाकर रहते थे. औरत की नीली और मर्द कि काली आंखों में क्षण-क्षण जिए हुए इश्क़ का जलाल था. पता चला अब कि साठ-सत्तर बरस की उम्र इश्क़ का एक दस्तावेज़ है. मर्द की उठती जवानी थी, जब वह किसी काम से कश्मीर से यहां आया था और उस नीली आंखों वाली सुंदरी की आंखों में खोकर यहीं का होकर रहा गया था और फिर कश्मीर नहीं लौटा. वह दो देशों की नदियों की तरह मिले और उनका पानी एक हो गया. वे यहीं एक कुटिया बनाकर रहने लगे. अब यह कुटिया उनके इश्क़ की दरगाह है औरत माथे पर स्कार्फ़ बांधकर और गले में एक चोग़ा पहनकर जंगल के पेड़ों की देखभाल करने लगी और मर्द अपनी पट्टी का कोट पहनकर आज तक उसके काम में हाथ बंटाता है. वहां मैंने हरी कुटिया के पास बैठकर उनके हाथों उस पहाड़ी नदी का पानी पीया और एक मुराद मांगी थी कि मुझे उनके जैसी ज़िंदगी नसीब हो. यह ख़ुदा के फ़ज़ल से कहूंगी कि मुझे वह मुराद मिली है.

फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.

दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.

अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम  आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.

पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं. 


फ़िरदौस ख़ान
नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से देश में हर साल करोड़ों रुपये की फ़सलें तबाह हो जाती हैं. इससे किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, किसान क़र्ज़ लेकर फ़सलें उगाते हैं, फ़सलों को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशक कीटों पर प्रभावी नहीं होते, जिससे कीट और पौधों को लगने वाली बीमारियां फ़सल को नुक़सान पहुंचाती हैं. इसकी वजह से उत्पादन कम होता है या कई बार पूरी फ़सल ही ख़राब हो जाती है. ऐसे में किसानों के सामने अंधेरा छा जाता है. कई मामले तो ऐसे भी सामने आ चुके हैं कि जब किसानों ने फ़सल बर्बाद होने पर आत्महत्या तक कर ली. खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान किसानों की मौतें होने की ख़बरें भी आए-दिन सुनने को मिलती रहती हैं.

मगर अफ़सोस की बात यह है कि नक़ली कीटनाशक और उर्वरक माफ़िया के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, जिसकी वजह से नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़, इस कारोबार में हर साल तक़रीबन 20 फ़ीसद की बढ़ोतरी हो रही है. देश में कीटनाशकों के इस्तेमाल पर नज़र रखने वाली नई दिल्ली की एग्रोकेमिकल्स पॉलिसी ग्रुप (एपीजी) के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2009 में 1400 करोड़ रुपये के कीटनाशकों की बिक्री हुई, जिसकी वजह से सात हज़ार करोड़ रुपये की फ़सलें तबाह हो गईं. इससे किसानों की हालत बद से बदतर हो गई. नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रिकल्चरल साइंसेज के मुताबिक़, देश में हर साल औसतन तीन हज़ार करोड़ रुपये के नक़ली कीटनाशक बेचे जाते हैं, जबकि कीटनाशकों का कुल बाज़ार क़रीब सात हज़ार करोड़ रुपये का है. यहां हर साल तक़रीबन 80 हज़ार टन कीटनाशक बनाए जाते हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रिकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की मानें तो देश में इस्तेमाल होने वाले कुल कीटनाशकों में तक़रीबन 40 फ़ीसद हिस्सा नक़ली है. क़ाबिले-ग़ौर है कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र आदि राज्यों में नक़ली कीटनाशक बनाने का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है. ये कारोबारी नामी गिरामी कंपनियों के लेबल का इस्तेमाल करते हैं. अधिकारियों की मिलीभगत के कारण इन कारोबारियों के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती है. कभी-कभार निरीक्षण के नाम पर कार्रवाई होती भी है तो इसे छोटे कारोबारियों तक ही सीमित रखा जाता है. अनियमितता पाए जाने पर कीटनाशक और उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वे फिर से लाइसेंस बनवा लेते हैं या बिना लाइसेंस के अपना कारोबार करते हैं. इस तरह यह धंधा बदस्तूर जारी रहता है.

दरअसल, उर्वरक ऐसे यौगिक हैं, जो पौधों के विकास में सहायक होते हैं. उर्वरक दो प्रकार के होते हैं, जैविक और अजैविक. जैव उर्वरक कार्बन पर आधारित होते हैं, जिनमें पत्तियों और गोबर के यौगिक शामिल होते हैं. अजैविक उर्वरक में अमूमन अजैविक रसायन होते हैं. उर्वरकों में मौजूद कुछ सामान्य पोषक नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम हैं. इनमें कैल्शियम, सल्फर और मैगनेशियम जैसे तत्व भी होते हैं. कुछ खास उर्वरकों में बोरोन, क्लोरीन, मैंगनीज, लौह, जिम, तांबा और मोलिबडीनम आदि शामिल होते हैं. उर्वरक पौध की वृद्धि में मदद करते हैं, जबकि कीटनाशक कीटों से पौध की रक्षा करते हैं. कीटनाशकों में रासायनिक पदार्थ या वायरस, बैक्टीरिया आदि होते हैं. इसमें फासफैमीडोन, लिंडेन, फ्लोरोपाइरीफोस, हेप्टालक्लोथर और मैलेथियान जैसे रासायनिक पदार्थ होते हैं. बहुत से कीटनाशक इंसानों के लिए खतरनाक होते हैं. सरकार ने कुछ कीटनाशकों पर पाबंदी लगाई है, इसके बावजूद देश में इनकी बिक्री बेरोकटोक चल रही है.

कीटनाशक विके्रता राजेश कुमार कहते हैं कि किसानों को असली और नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों की पहचान नहीं होती. इसलिए वे विक्रेता पर भरोसा करके कीटनाशक ख़रीद लेते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी विक्रेता नक़ली कीटनाशक बेचते हैं, जिन विक्रेताओं को बाज़ार में अपनी पहचान क़ायम रखनी है, वे सीधे कंपनी से माल ख़रीदते हैं. ऐसे कीटनाशक विक्रेताओं की भी कमी नहीं है, जो किसी बिचौलिये से माल ख़रीदते हैं. दरअसल, बिचौलिये ज़्यादा मुना़फ़ा कमाने के फेर में विक्रेताओं को असली की जगह नक़ली कीटनाशक बेचते हैं. नक़ली कीटनाशकों की पैकिंग बिल्कुल ब़डी कीटनाशक कंपनियों की तरह होती है. लेकिन इनकी क़ीमत में फ़र्क़ होता है, जैसे जो असली कीटनाशक तीन सौ रुपये में मिलता है, वही नक़ली कीटनाशक बाज़ार में 150 से 200 रुपये तक में मिल जाता है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए. इससे मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं. किसान ज़्यादा उपज पाने के लालच में अंधाधुंध कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह से जहां भूमि की उपजाऊ शक्ति ख़त्म हो रही है, वहीं खाद्यान्न भी ज़हरीला हो रहा है. हालत यह है कि फल, सब्ज़ियों से लेकर अनाज तक में रसायनों की मात्रा पाई जा रही है, जो सेहत के लिए बेहद ऩुकसानदेह है. नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों की वजह से कई बार किसानों की मेहनत से उगाई गई फ़सल भी बर्बाद हो जाती है. विश्वविद्यालय द्वारा समय-समय पर शिविर लगाकर किसानों को कीटनाशकों और उर्वरकों के सही इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है.

किसानों का कहना है कि वे जितने रुपये के कीटनाशक फ़सलों में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें उसका तक़रीबन पांच गुना फ़ायदा मिलता है, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से उनकी फ़सल बर्बाद हो जाती है. हिसार के किसान राजेंद्र कुमार का कहना है कि बढ़ती आबादी और घटती ज़मीन ने भी किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल के लिए मजबूर किया है. पीढ़ी दर पीढ़ी ज़मीन का बंटवारा होने की वजह से किसानों के हिस्से में कम ज़मीन आ रही है. किसान को अपने परिवार का भरण-पोषण करना है, ऐसे में अगर वह ज़्यादा उत्पादन चाहता है, तो इसमें ग़लत क्या है. साथ ही वह यह भी कहते हैं कि बंजर भूमि की समस्या को देखते हुए किसानों को वैकल्पिक तरीक़ा अपनाना चाहिए, जिससे लागत कम आए और उत्पादन भी अच्छा हो. कैथल ज़िले के चंदाना गांव के किसान कुशलपाल सिरोही का मानना है कि जैविक खेती को अपनाकर किसान अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं. केंद्रीय उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण तथा प्रशिक्षण संस्थान (सीएफक्यूसीटीआई) मुख्य संस्थान है, जो उर्वरक की गुणवत्ता का परीक्षण करता है. हरियाणा के फ़रीदाबाद ज़िले में स्थित इस संस्थान की तीन क्षेत्रीय उर्वरक नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं, जो मुंबई, चेन्नई और कल्याणी में हैं. वैसे इस वक़्त देश में तक़रीबन 67 उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं. हर साल तक़रीबन 1,25,205 नमूनों की जांच की जाती है. अमूमन राज्यों में एक या इससे ज़्यादा प्रयोगशालाएं होती हैं. पुडुचेरी को छोड़कर अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, दिल्ली, गोवा और सभी संघ शासित राज्यों में एक भी प्रयोगशाला नहीं है. ये राज्य केंद्रीय सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं.

बहरहाल, नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों के मामले में बड़ी कंपनियों को भी आगे आना चाहिए, ताकि उनके नाम पर चल रहे गोरखधंधे पर रोक लगाई जा सके. किसानों को भी जागरूक होने की ज़रूरत है, ताकि वे असली और नक़ली में पहचान कर सकें. इसके अलावा किसानों को वैकल्पिक खेती अपनाने पर भी ज़ोर देना चाहिए, ताकि भूमि की उर्वरता बनाए रखने के साथ ही वे अच्छा उत्पादन हासिल कर पाएं.

फ़िरदौस ख़ान                                    
प्लास्टिक ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. अमूमन हर चीज़ के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है, वो चाहे दूध हो, तेल, घी, आटा, चावल, दालें, मसालें, कोल्ड ड्रिंक, शर्बत, सनैक्स, दवायें, कपड़े हों या फिर ज़रूरत की दूसरी चीज़ें सभी में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. बाज़ार से फल या सब्ज़ियां ख़रीदो, तो वे भी प्लास्टिक की ही थैलियों में ही मिलते हैं. प्लास्टिक के इस्तेमाल की एक बड़ी वजह यह भी है कि टिन के डिब्बों, कपड़े के थैलों और काग़ज़ के लिफ़ाफ़ों के मुक़ाबले ये सस्ता पड़ता है. पहले कभी लोग राशन, फल या तरकारी ख़रीदने जाते थे, तो प्लास्टिक की टोकरियां या कपड़े के थैले लेकर जाते थे. अब ख़ाली हाथ जाते हैं, पता है कि प्लास्टिक की थैलियों में सामान मिल जाएगा. अब तो पत्तल और दोनो की तर्ज़ पर प्लास्टिक की प्लेट, गिलास और कप भी ख़ूब चलन में हैं. लोग इन्हें इस्तेमाल करते हैं और फिर कूड़े में फेंक देते हैं. लेकिन इस आसानी ने कितनी बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है, इसका अंदाज़ा अभी जनमानस को नहीं है.

दरअसल, प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़ देश में सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा बोतलों से आता है. साल 2015-16 में करीब 900 किलो टन प्लास्टिक बोतल का उत्पादन हुआ था. राजधानी दिल्ली में अन्य महानगरों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. साल 2015 के आंकड़ों की मानें, तो दिल्ली में 689.52 टन, चेन्नई में 429.39 टन, मुंबई में 408.27 टन, बेंगलुरु में 313.87 टन और हैदराबाद में 199.33 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. सिर्फ़ दस फ़ीसद प्लास्टिक कचरा ही रि-साइकिल किया जाता है, बाक़ी का 90 फ़ीसद कचरा पर्यावरण के लिए नुक़सानदेह साबित होता है.
रि-साइक्लिंग की प्रक्रिया भी प्रदूषण को बढ़ाती है. रि-साइकिल किए गए या रंगीन प्लास्टिक थैलों में ऐसे रसायन होते हैं, जो ज़मीन में पहुंच जाते हैं और इससे मिट्टी और भूगर्भीय जल विषैला बन सकता है. जिन उद्योगों में पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तकनीक वाली रि-साइकिलिंग इकाइयां नहीं लगी होतीं. उनमें रि-साइक्लिंग के दौरान पैदा होने वाले विषैले धुएं से वायु प्रदूषण फैलता है. प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है, जो सहज रूप से मिट्टी में घुल-मिल नहीं सकता. इसे अगर मिट्टी में छोड़ दिया जाए, तो भूगर्भीय जल की रिचार्जिंग को रोक सकता है. इसके अलावा प्लास्टिक उत्पादों के गुणों के सुधार के लिए और उनको मिट्टी से घुलनशील बनाने के इरादे से जो रासायनिक पदार्थ और रंग आदि उनमें आमतौर पर मिलाए जाते हैं, वे भी अमूमन सेहत पर बुरा असर डालते हैं.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक मूल रूप से नुक़सानदेह नहीं होता, लेकिन प्लास्टिक के थैले अनेक हानिकारक रंगों, रंजक और अन्य तमाम प्रकार के अकार्बनिक रसायनों को मिलाकर बनाए जाते हैं. रंग और रंजक एक प्रकार के औद्योगिक उत्पाद होते हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक थैलों को चमकीला रंग देने के लिए किया जाता है. इनमें से कुछ रसायन कैंसर को जन्म दे सकते हैं और कुछ खाद्य पदार्थों को विषैला बनाने में सक्षम होते हैं. रंजक पदार्थों में  कैडमियम जैसी जो धातुएं होती हैं, जो सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और दिल का आकार बढ़ सकता है. लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होने लगता है.

हालांकि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रि-साइकिंल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एंड यूसेज़ रूल्स-1999 जारी किया था. इसे 2003 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1968 के तहत संशोधित किया गया है, ताकि प्लास्टिक की थैलियों और डिब्बों का नियमन और प्रबंधन सही तरीक़े से किया जा सके. भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने धरती में घुलनशील प्लास्टिक के 10 मानकों के बारे में अधिसूचना जारी की थी, मगर इसके बावजूद हालात वही 'ढाक के तीन पात' वाले ही हैं.

हालांकि दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में पॉलीथिन और प्लास्टिक से बनी सामग्रियों पर रोक लगाने का ऐलान किया जा चुका है. इसका उल्लंघन करने पर जुर्माने और क़ैद का प्रावधान भी है.प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाली समस्याएं ज़्यादातर कचरा प्रबंधन प्रणालियों की ख़ामियों की वजह से पैदा हुई हैं. प्लास्टिक का यह कचरा नालियों और सीवरेज व्यवस्था को ठप कर देता है. इतना ही नहीं नदियों में भी इनकी वजह से बहाव पर असर पड़ता है और पानी के दूषित होने से मछलियों की मौत तक हो जाती है. नदियों के ज़रिये प्लास्टिक का ये कचरा समुद्र में भी पहुंच रहा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रिपोर्ट के मुताबिक़ हर साल तकरीबन 80 लाख टन कचरा समंदरों में मिल रहा है. समंदरों में जो प्लास्टिक कचरा मिल रहा है, उसका तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा दस नदियों से आ रहा है, जिनमें यांग्त्जे, गंगा, सिंधु, येलो, पर्ल, एमर, मिकांग, नाइल और नाइजर नदियां शामिल हैं. इनमें से आठ नदियां एशिया की हैं. इनमें सबसे ज़्यादा पांच नदियां चीन की, जबकि दो नदियां भारत और एक अफ़्रीका की है. चीन ने 46 शहरों में कचरे को क़ाबू करने का निर्देश जारी किया है, ताकि नदियों के प्रदूषण को कम किया जा सके. प्लास्टिक पशुओं की मौत का भी सबब बन रहा है. कूड़े के ढेर में पड़ी प्लास्टिक की थैलियों को खाकर आवारा पशुओं की बड़ी तादाद में मौतें हो रही हैं.

प्लास्टिक के कचरे की समस्या से निजात पाने के लिए प्लास्टिक थैलियों के विकल्प के रूप में जूट से बने थैलों का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा किया जाना चाहिए. साथ ही प्लास्टिक कचरे का समुचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए. देश में सड़क बनाने और दीवारें बनाने में इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है. प्लास्टिक को इसी तरह अन्य जगह इस्तेमाल करके इसके कचरे की समस्या से निजात पाई जा सकती है. बहरहाल, प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए बेहद ज़रूरी है कि इसके प्रति जनमानस को जागरूक किया जाए, क्योंकि इस मुहिम में जनमानस की भागीदारी बहुत ज़रूरी है. इसके लिए जन आंदोलन चलाया जाना चाहिए.


फ़िरदौस ख़ान
देश की एक बड़ी आबादी धीमा ज़हर खाने को मजबूर है, क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है. हम बात कर रहे हैं भोजन के साथ लिए जा रहे उस धीमे ज़हर की, जो सिंचाई जल और कीटनाशकों के ज़रिये अनाज, सब्ज़ियों और फलों में शामिल हो चुका है. देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में आर्सेनिक सिंचाई जल के माध्यम से फ़सलों को ज़हरीला बना रहा है. यहां भू-जल से सिंचित खेतों में पैदा होने वाले धान में आर्सेनिक की इतनी मात्रा पाई गई है, जो मानव शरीर को नुक़सान पहुंचाने के लिए काफ़ी है. इतना ही नहीं, देश में नदियों के किनारे उगाई जाने वाली फ़सलों में भी ज़हरीले रसायन पाए गए हैं. यह किसी से छुपा नहीं है कि हमारे देश की नदियां कितनी प्रदूषित हैं. कारख़ानों से निकलने वाले कचरे और शहरों की गंदगी को नदियों में बहा दिया जाता है, जिससे इनका पानी अत्यंत प्रदूषित हो गया है. इसी दूषित पानी से सींचे गए खेतों की फ़सलें कैसी होंगी, सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

दूर जाने की ज़रूरत नहीं, देश की राजधानी दिल्ली में यमुना की ही हालत देखिए. जिस देश में नदियों को मां या देवी कहकर पूजा जाता है, वहीं यह एक गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है. काऱखानों के रासायनिक कचरे ने इसे ज़हरीला बना दिया है. नदी के किनारे सब्ज़ियां उगाई जाती हैं, जिनमें काफ़ी मात्रा में विषैले तत्व पाए गए हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, नदियों के किनारे उगाई गई 50 फ़ीसद फ़सलों में विषैले तत्व पाए जाने की आशंका रहती है. इसके अलावा कीटनाशकों और रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने भी फ़सलों को ज़हरीला बना दिया है. अनाज ही नहीं, दलहन, फल और सब्ज़ियों में भी रसायनों के विषैले तत्व पाए गए हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं. इसके बावजूद अधिक उत्पादन के लालच में डीडीटी जैसे प्रतिबंधित कीटनाशकों का इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है. अकेले हरियाणा की कृषि भूमि हर साल एक हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा के कीटनाशक निग़ल जाती है. पेस्टिसाइड्‌स ऐसे रसायन हैं, जिनका इस्तेमाल अधिक उत्पादन और फ़सलों को कीटों से बचाने के लिए किया जाता है. इनका इस्तेमाल कृषि वैज्ञानिकों की सिफ़ारिश के मुताबिक़ सही मात्रा में किया जाए, तो फ़ायदा होता है, लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति ख़त्म होने लगती है और इससे इंसानों के अलावा पर्यावरण को भी नुक़सान पहुंचता है. चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से कृषि भूमि पर होने वाले असर को जांचने के लिए मिट्टी के 50 नमूने लिए. ये नमूने उन इलाक़ों से लिए गए थे, जहां कपास की फ़सल उगाई गई थी और उन पर कीटनाशकों का कई बार छिड़काव किया गया था. इसके साथ ही उन इलाक़ों के भी नमूने लिए गए, जहां कपास उगाई गई थी, लेकिन वहां कीटनाशकों का छिड़काव नहीं किया गया था. कीटनाशकों के छिड़काव वाले कपास के खेत की मिट्टी में छह प्रकार के कीटनाशकों के तत्व पाए गए, जिनमें मेटासिस्टोक्स, एंडोसल्फान, साइपरमैथरीन, क्लोरो पाइरीफास, क्वीनलफास और ट्राइजोफास शामिल हैं. मिट्टी में इन कीटनाशकों की मात्रा 0.01 से 0.1 पीपीएम पाई गई. इन कीटनाशकों का इस्तेमाल कपास को विभिन्न प्रकार के कीटों और रोगों से बचाने के लिए किया जाता है. कीटनाशकों की लगातार बढ़ती खपत से कृषि वैज्ञानिक भी हैरान और चिंतित हैं. कीटनाशकों से जल प्रदूषण भी बढ़ रहा है. प्रदूषित जल से फल और सब्ज़ियों का उत्पादन तो बढ़ जाता है, लेकिन इनके हानिकारक तत्व फलों और सब्ज़ियों में समा जाते हैं. सब्ज़ियों में पाए जाने वाले कीटनाशकों और धातुओं पर भी कई शोध किए गए हैं. एक शोध के मुताबिक़, सब्ज़ियों में जहां एंडोसल्फान, एचसीएच एवं एल्ड्रिन जैसे कीटनाशक मौजूद हैं, वहीं केडमियम, सीसा, कॉपर और क्रोमियम जैसी ख़तरनाक धातुएं भी शामिल हैं. ये कीटनाशक और धातुएं शरीर को बहुत नुक़सान पहुंचाती हैं. सब्ज़ियां तो पाचन तंत्र के ज़रिए हज़म हो जाती हैं, लेकिन कीटनाशक और धातुएं शरीर के संवेदनशील अंगों में एकत्र होते रहते हैं. यही आगे चलकर गंभीर बीमारियों की वजह बनती हैं. इस प्रकार के ज़हरीले तत्व आलू, पालक, फूल गोभी, बैंगन और टमाटर में बहुतायत में पाए गए हैं. पत्ता गोभी के 27 नमूनों का परीक्षण किया गया, जिनमें 51.85 फ़ीसद कीटनाशक पाया गया. इसी तरह टमाटर के 28 नमूनों में से 46.43 फ़ीसद में कीटनाशक मिला, जबकि भिंडी के 25 नमूनों में से 32 फ़ीसद, आलू के 17 में से 23.53 फ़ीसद, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 फ़ीसद नमूनों में कीटनाशक पाया गया. फ़सलों में कीटनाशकों के इस्तेमाल की एक निश्चित मात्रा तय कर देनी चाहिए, जो स्वास्थ्य पर विपरीत असर न डालती हो. मगर सवाल यह भी है कि क्या किसान इस पर अमल करेंगे. 2005 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने केंद्रीय प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला के साथ मिलकर एक अध्ययन किया था. इसकी रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिकी स्टैंडर्ड (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) के मुक़ाबले पंजाब में उगाई गई फ़सलों में कीटनाशकों की मात्रा 15 से लेकर 605 गुना ज़्यादा पाई गई. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी में कीटनाशकों के अवशेषों का होना भविष्य में घातक सिद्ध होगा, क्योंकि मिट्टी के ज़हरीला होने से सर्वाधिक असर केंचुओं की तादाद पर पड़ेगा. इससे भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण होगी और फ़सलों की उत्पादकता भी प्रभावित होगी. मिट्टी में कीटनाशकों के इन अवशेषों का सीधा असर फ़सलों की उत्पादकता पर पड़ेगा और साथ ही जैविक प्रक्रियाओं पर भी. उन्होंने बताया कि यूरिया खाद को पौधे सीधे तौर पर अवशोषित कर सकते हैं. इसके लिए यूरिया को नाइट्रेट में बदलने का कार्य विशेष प्रकार के बैक्टीरिया द्वारा किया जाता है. अगर भूमि ज़हरीली हो गई तो बैक्टीरिया की तादाद प्रभावित होगी. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि रसायन अनाज, दलहन और फल-सब्ज़ियों के साथ मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं. फलों और सब्ज़ियों को अच्छी तरह से धोने से उनका ऊपरी आवरण तो स्वच्छ कर लिया जाता है, लेकिन उनमें मौजूद विषैले तत्वों को भोजन से दूर करने का कोई तरीक़ा नहीं है. इसी धीमे ज़हर से लोग कैंसर, एलर्जी, हृदय, पेट, शुगर, रक्त विकार और आंखों की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. इतना ही नहीं, पशुओं को लगाए जाने वाले ऑक्सीटॉक्सिन के इंजेक्शन से दूध भी ज़हरीला होता जा रहा है. अब तो यह इंजेक्शन फल और सब्ज़ियों के पौधों और बेलों में भी धड़ल्ले से लगाया जा रहा है. ऑक्सीटॉक्सिन के तत्व वाले दूध, फल और सब्ज़ियों से पुरुषों में नपुंसकता और महिलाओं में बांझपन जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं. हालांकि देश में कीटनाशक की सीमा यानी मैक्सिमम ऐजिड्यू लिमिट के बारे में मानक बनाने और उनके पालन की ज़िम्मेदारी तय करने से संबंधित एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद फ़सलों को ज़हरीले रसायनों से बचाने के लिए कोई ख़ास कोशिश नहीं की जाती. रसायन और उर्वरक राज्यमंत्री श्रीकांत कुमार जेना के मुताबिक़, अगर कीटनाशी अधिनियम, 1968 की धारा 5 के अधीन गठित पंजीकरण समिति द्वारा अनुमोदित दवाएं प्रयोग में लाई जाती हैं तो वे खाद्य सुरक्षा के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं करती हैं. कीटनाशकों का पंजीकरण उत्पादों की जैव प्रभाविकता, रसायन एवं मानव जाति के लिए सुरक्षा आदि के संबंध में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप वृहद आंकड़ों के मूल्यांकन के बाद किया जाता है. केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार स्वीकार कर चुके हैं कि कई देशों में प्रतिबंधित 67 कीटनाशकों की भारत में बिक्री होती है और इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से फ़सलों के लिए होता है. उन्होंने बताया कि कैल्शियम सायनायड समेत 27 कीटनाशकों के भारत में उत्पादन, आयात और इस्तेमाल पर पाबंदी है. निकोटिन सल्फेट और केप्टाफोल का भारत में इस्तेमाल तो प्रतिबंधित है, लेकिन उत्पादकों को निर्यात के लिए उत्पादन करने की अनुमति है. चार क़िस्मों के कीटनाशकों का आयात, उत्पादन और इस्तेमाल बंद है, जबकि सात कीटनाशकों को बाज़ार से हटाया गया है. इंडोसल्फान समेत 13 कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति तो है, लेकिन कई पाबंदियां भी लगी हैं.
ग़ौरतलब है कि भारत में क्लोरडैन, एंड्रिन, हेप्टाक्लोर और इथाइल पैराथीओन पर प्रतिबंध है. कीटनाशकों के उत्पादन में भारत एशिया में दूसरे और विश्व में 12वें स्थान पर है. देश में 2006-07 के दौरान 74 अरब रुपये क़ीमत के कीटनाशकों का उत्पादन हुआ. इनमें से क़रीब 29 अरब रुपये के कीटनाशकों का निर्यात किया गया. ख़ास बात यह भी है कि भारत डीडीटी और बीएचसी जैसे कई देशों में प्रतिबंधित कीटनाशकों का सबसे बड़ा उत्पादक भी है. यहां भी इनका खूब इस्तेमाल किया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, डेल्टिरन, ईपीएन और फास्वेल आदि कीटनाशक बेहद ज़हरीले और नुक़सानदेह हैं. पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में बिक रही सब्ज़ियों में प्रतिबंधित कीटनाशकों के प्रयोग को लेकर सरकार को फलों और सब्ज़ियों की जांच करने का आदेश दिया है. अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से कहा कि शहर में बिक रही सब्ज़ियों की जांच अधिकृत प्रयोगशालाओं में कराई जाए. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपने आदेश में कहा कि हम जांच के ज़रिये यह जानना चाहते हैं कि सब्ज़ियों में कीटनाशकों का इस्तेमाल किस मात्रा में हो रहा है और ये सब्ज़ियां बेचने लायक़ हैं या नहीं. अदालत ने यह भी कहा कि यह जांच इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट की प्रयोगशाला या दूसरी प्रयोगशालाओं में की जाए. ये प्रयोगशालाएं नेशनल एक्रेडेशन बोर्ड फोर टेस्टिंग से अधिकृत होनी चाहिए. यह आदेश कोर्ट ने कंज्यूमर वॉयस की उस रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए दिया है, जिसमें कहा गया है कि भारत में फलों और सब्ज़ियों में कीटनाशकों की मात्रा यूरोपीय मानकों के मुक़ाबले 750 गुना ज़्यादा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि क्लोरडैन के इस्तेमाल से आदमी नपुंसक हो सकता है. इसके अलावा इससे खू़न की कमी और ब्लड कैंसर जैसी बीमारी भी हो सकती है. यह बच्चों में कैंसर का सबब बन सकता है. एंड्रिन के इस्तेमाल से सिरदर्द, सुस्ती और उल्टी जैसी शिकायतें हो सकती हैं. हेप्टाक्लोर से लीवर ख़राब हो सकता है और इससे प्रजनन क्षमता पर विपरीत असर पड़ सकता है. इसी तरह इथाइल और पैराथीओन से पेट दर्द, उल्टी और डायरिया की शिकायत हो सकती है. केयर रेटिंग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कीटनाशकों के समुचित प्रयोग से उत्पादकता में सुधार आ सकता है. इससे खाद्य सुरक्षा में भी मदद मिलेगी. देश में हर साल कीटों के कारण क़रीब 18 फ़ीसद फ़सल बर्बाद हो जाती है यानी इससे हर साल क़रीब 90 हज़ार करोड़ रुपये की फ़सल को नुक़सान पहुंचता है. भारत में कुल 40 हज़ार कीटों की पहचान की गई है, जिनमें से एक हज़ार कीट फ़सलों के लिए फ़ायदेमंद हैं, 50 कीट कभी कभार ही गंभीर नुक़सान पहुंचाते हैं, जबकि 70 कीट ऐसे हैं, जो फ़सलों के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि फ़सलों के नुक़सान को देखते हुए कीटनाशकों का इस्तेमाल ज़रूरी हो जाता है. देश में जुलाई से नवंबर के दौरान 70 फ़ीसद कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इन दिनों फ़सलों को कीटों से ज़्यादा ख़तरा होता है. भारतीय खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों का अवशेष 20 फ़ीसद है, जबकि विश्व स्तर पर यह 2 फ़ीसद तक होता है. इसके अलावा देश में सिर्फ़ 49 फ़ीसद खाद्य उत्पाद ऐसे हैं, जिनमें कीटनाशकों के अवशेष नहीं मिलते, जबकि वैश्विक औसत 80 फ़ीसद है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में कीटनाशकों के इस्तेमाल के तरीक़े और मात्रा के बारे में जागरूकता की कमी है.

ग़ौर करने लायक़ बात यह भी है कि पिछले तीन दशकों से कीटनाशकों के इस्तेमाल को लेकर समीक्षा तक नहीं की गई. बाज़ार में प्रतिबंधित कीटनाशकों की बिक्री भी बदस्तूर जारी है. हालांकि केंद्र एवं राज्य सरकारें कीटनाशकों के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करती हैं. किसानों को अनुशंसित मात्रा में कीटनाशकों की पंजीकृत गुणवत्ता के प्रयोग, अपेक्षित सावधानियां बरतने और निर्देशों का पालन करने की सलाह दी जाती है. यह सच है कि मौजूदा दौर में कीटनाशकों पर पूरी तरह पाबंदी लगाना मुमकिन नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि इनका इस्तेमाल सही समय पर और सही मात्रा में किया जाए.

फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.


चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.

कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वह ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया. ग़ौरतलब है कि श्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था.

श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था. श्री राजीव गांधी की मौत से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था. उन्होंने स्वर्गीय राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, मृत्यु शरीर का धर्म है. जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है. लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती, प्राकृतिक नहीं होती, ’जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती, जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है, जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है, एक षडतंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें. श्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है. एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है. शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो. लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा, जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो. यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती 'सद्भावना दिवस' और 'अक्षय ऊर्जा दिवस' के तौर पर मनाई जाती है, जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पिता को याद करते हुए कहते हैं, वे एक दयालु, सौम्य और स्नेही व्यक्ति थे, जिनकी असामयिक मृत्यु ने मेरे जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ा है. मुझे उनके साथ बिताया गया वक़्त याद है और भाग्यशाली था कि कई जन्मदिन उनके साथ मनाएं, जब वह ज़िन्दा थे. मैं उन्हें बहुत याद करता हूं, लेकिन वे मेरी यादों में हैं. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया. यह सबसे बेशक़ीमती तोहफ़ा है, जो एक पिता अपने बेटे को दे सकता है."

फ़िरदौस ख़ान
बरसात का मौसम शुरू ही देश के कई राज्य बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. बाढ़ से जान व माल का भारी नुक़सान होता है. लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं. कितने ही लोग बाढ़ की वजह से मौत की आग़ोश में समा जाते हैं. सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हो जाते हैं,  हज़ारों लोगों को बेघर होकर शरणार्थी जीवन गुज़ारने को मजबूर होना पड़ता हैं. खेतों में खड़ी फ़सलें तबाह हो जाती हैं.

देश में बाढ़ आने के कई कारण हैं. बाढ़ अमूमन उत्तर पूर्वी राज्यों को ही निशाना बनाती है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि चीन और ऊपरी पहाड़ों में भारी बारिश होती है और वर्षा का यह पानी भारत के निचले इलाक़ों की तरह बहता है. फिर यही पानी तबाही की वजह बनता है. नेपाल में भारी बारिश का पानी भी बिहार की कोसी नदी को उफ़ान पर ला देता है, जिससे नदी के रास्ते में आने वाले इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. ग़ौरतलब है कि कोसी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है. यह नदी बिहार में भीम नगर के रास्ते भारत में दाख़िल होती है. कोसी बिहार में भारी तबाही मचाती है, इसलिए इसे बिहार का शोक या अभिशाप भी कहा जाता है. कोसी नदी हर साल अपनी धारा बदलती रहती है. साल 1954 में भारत ने नेपाल के साथ समझौता करके इस पर बांध बनाया था. हालांकि बांध नेपाल की सीमा में बनाया गया है, लेकिन इसके रखरखाव का काम भारत के ज़िम्मे है. नदी के तेज़ बहाव के कारण यह बांध कई बार टूट चुका है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ बांध बनाते वक्त आकलन किया गया था कि यह नौ लाख क्यूसेक पानी के बहाव को सहन कर सकता है और बांध की उम्र 25 साल आंकी गई थी. पहली बार यह बांध 1963 में टूटा. इसके बाद 1968 में पांच जगहों से यह टूटा. उस वक़्त कोसी का बहाव नौ लाख 13 हज़ार क्यूसेक मापा गया था. फिर साल 1991 नेपाल के जोगनिया और 2008 में नेपाल के ही कुसहा नामक स्थान पर बांध टूट गया. हैरानी की बात यह रही कि उस वक़्त नदी का बहाव महज़ एक लाख 44 हज़ार क्यूसेक था. फ़िलहाल कोसी पर बने बांध में जगह-जगह दरारें पड़ी हुई हैं.

कोसी की तरह गंडक नदी भी नेपाल के रास्ते बिहार में दाख़िल करती है. गंडक को नेपाल में सालिग्राम और मैदान में नारायणी कहते हैं. यह पटना में आकर गंगा में मिल जाती है. बरसात में गंडक भी उफ़ान पर होती है और इसके आसपास के इलाक़े बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. ग़ौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है. देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं. उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं, लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. पश्चिम बंगाल की मयूराक्षी, अजय, मुंडेश्वरी, तीस्ता और तोर्सा नदियां तबाही मचाती हैं, ओडिशा में सुवर्णरेखा, बैतरनी, ब्राह्मणी, महानंदा, ऋषिकुल्या, वामसरदा नदियां उफ़ान पर रहती हैं. आंध्रप्रदेश में गोदावरी और तुंगभद्रा, त्रिपुरा में मनु और गुमती, महाराष्ट्र में वेणगंगा, गुजरात और मध्य-प्रदेश में नर्मदा नदियों की वजह से इनके तटवर्ती इलाक़ों में बाढ़ आती है.

बाढ़ से हर साल करोड़ों रुपये का नुक़सान होता है, लेकिन नुक़सान का यह अंदाज़ा वास्तविक नहीं होता. बाढ़ से हुए नुक़सान की सही राशि का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है, क्योंकि बाढ़ से मकान व दुकानें क्षतिग्रस्त होती हैं. फ़सलें तबाह हो जाती हैं. लोगों का कारोबार ठप हो जाता है. बाढ़ के साथ आने वाली बीमारियों की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी काफ़ी पैसा ख़र्च होता है. लोगों को बाढ़ से नुक़सान की भरपाई में काफ़ी वक़्त लग जाता है. यह कहना ग़लत न होगा कि बाढ़ किसी भी देश, राज्य या व्यक्ति को कई साल पीछे कर देती है. बाढ़ से उसका आर्थिक और सामाजिक विकास ठहर जाता है. इसलिए बाढ़ से होने वाले नुक़सान का सही अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है.

जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, देश में पिछले साढ़े छह दशक के दौरान बाढ़ से सालाना औसतन 1654 लोगों की मौत हुई और 92763 पशुओं की जान गई. इससे सालाना औसतन 71.69 लाख हेक्टेयर इलाक़े पर असर पड़ा और तकरीबन 1680 करोड़ रुपये फ़सलें तबाह हो गईं. बाढ़ से सालाना 12.40 लाख मकानों को नुक़सान पहुंचा. साल 1953 से 2017 के कुल नुक़सान पर नज़र डालें, तो देश में बाढ़ की वजह से 46.60 करोड़ हेक्टेयर इलाक़े में 205.8 करोड़
लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इस दौरान 8.06 करोड़ मकानों को नुक़सान पहुंचा है. अफ़सोस की बात है कि हर साल बाढ़ से होने वाले जान व माल के नुकसान में बढ़ोतरी हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है.

पिछले सात दशकों में देश में अनेक बांध बनाए गए हैं. साथ ही पिछले क़रीब तीन दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं. बाढ़ से निपटने के लिए 1978 में केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया था. देश के कुल 32.9 करोड़ हेक्टेयर में से तक़रीबन 4.64 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित इलाक़े में आती है. देश में हर साल तक़रीबन 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है.

हैरत का बात यह भी है कि बाढ़ एक राष्ट्रीय आपदा है, इसके बावजूद इसे राज्य सूची में रखा गया है. इसके तहत केंद्र सरकार बाढ़ से संबंधित कितनी ही योजनाएं बना ले, लेकिन उन पर अमल करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. प्रांतवाद के कारण राज्य बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं कर पाते. एक राज्य की बाढ़ का पानी समीपवर्ती राज्य के इलाक़ों को भी प्रभावित करता है. मसलन हरियाणा का बाढ़ का पानी राजधानी दिल्ली में छोड़ दिया जाता है, जिससे यहां के इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. राज्यों में हर साल बाढ़ की रोकथाम के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, मगर प्रशासनिक लापरवाही की वजह से इन योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं हो पाता. नतीजतन, यह योजनाएं महज़ काग़जों तक ही सिमट कर जाती हैं. हालांकि बाढ़ को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में बांध बनाना, नदियों के कटान वाले इलाक़ों में कटान रोकना, पानी की निकासी वाले नालों की सफ़ाई और उनकी सिल्ट निकालना, निचले इलाक़ों के गांवों को ऊंचा करना, सीवरेज व्यवस्था को सुधारना और शहरों में नालों के रास्ते आने वाले कब्ज़ों को हटाना आदि शामिल है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफ़ान, भूकंप और बाढ़ के लिए क़स्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है. उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है. वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं. गली-मोहल्लों के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के ज़रिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है. संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं. पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं. इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है. इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं. आग तूफ़ान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक ख़र्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना ख़र्चीला काम नहीं है. इसे बख़ूबी बाढ़ आने वाले इलाक़ों में लागू किया जा सकता है. विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम न हो जाए. इसके लिए नदी के किनारों पर ख़ासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं. नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बग़ीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं. जहां बाढ़ का ख़तरा ज़्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है. गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है.

हमारे देश में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा. इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है. इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है. इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है.

प्रो. संजय द्विवेदी
अटलबिहारी वाजपेयी यानि एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से इस तरह प्रभावित किया जिसकी मिसाल नहीं मिलती। एक साधारण परिवार में जन्मे इस राजनेता ने अपनी भाषण कला, भुवनमोहिनी मुस्कान, लेखन और विचारधारा के प्रति सातत्य का जो परिचय दिया वह आज की राजनीति में दुर्लभ है। सही मायने में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के सबसे करिश्माई नेता और प्रधानमंत्री साबित हुए।
एक बड़े परिवार का उत्तराधिकार पाकर कुर्सियां हासिल करना बहुत सरल है किंतु वाजपेयी की पृष्ठभूमि और उनका संघर्ष देखकर लगता है कि संकल्प और विचारधारा कैसे एक सामान्य परिवार से आए बालक में परिवर्तन का बीजारोपण करती है। शायद इसीलिए राजनैतिक विरासत न होने के बावजूद उनके पीछे एक ऐसा परिवार था जिसका नाम संघ परिवार है। जहां अटलजी राष्ट्रवाद की ऊर्जा से भरे एक ऐसे महापरिवार के नायक बने, जिसने उनमें इस देश का नायक बनने की क्षमताएं न सिर्फ महसूस की वरन अपने उस सपने को सच किया जिसमें देश का नेतृत्व करने की भावना थी। अटलजी के रूप में इस परिवार ने देश को एक ऐसा नायक दिया जो वास्तव में हिंदू संस्कृति का प्रणेता और पोषक बना। याद कीजिए अटल जी की कविता तन-मन हिंदू मेरा परिचय। वे अपनी कविताओं, लेखों ,भाषणों और जीवन से जो कुछ प्रकट करते रहे उसमें इस मातृ-भू की अर्चना के सिवा क्या है। वे सही मायने में भारतीयता के ऐसे अग्रदूत बने जिसने न सिर्फ सुशासन के मानकों को भारतीय राजनीति के संदर्भ में स्थापित किया वरन अपनी विचारधारा को आमजन के बीच स्थापित कर दिया।
समन्वयवादी राजनीति की शुरूआतः
सही मायने में अटलबिहारी वाजपेयी एक ऐसी सरकार के नायक बने जिसने भारतीय राजनीति में समन्वय की राजनीति की शुरूआत की। वह एक अर्थ में एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार थी जिसमें विविध विचारों, क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तमाम लोग शामिल थे। दो दर्जन दलों के विचारों को एक मंत्र से साधना आसान नहीं था। किंतु अटल जी की राष्ट्रीय दृष्टि, उनकी साधना और बेदाग व्यक्तित्व ने सारा कुछ संभव कर दिया। वे सही मायने में भारतीयता और उसके औदार्य के उदाहरण बन गए। उनकी सरकार ने अस्थिरता के भंवर में फंसे देश को एक नई राजनीति को राह दिखाई। यह रास्ता मिली-जुली सरकारों की सफलता की मिसाल बन गया। भारत जैसे देशों में जहां मिलीजुली सरकारों की सफलता एक चुनौती थी, अटलजी ने साबित किया कि स्पष्ट विचारधारा,राजनीतिक चिंतन और साफ नजरिए से भी परिवर्तन लाए जा सकते हैं। विपक्ष भी उनकी कार्यकुशलता और व्यक्तित्व पर मुग्ध था। यह शायद उनके विशाल व्यक्तित्व के चलते संभव हो पाया, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की भावना थी। देशप्रेम था, देश का विकास करने की इच्छाशक्ति थी। उनकी नीयत पर किसी कोई शक नहीं था। शायद इसीलिए उनकी राजनीतिक छवि एक ऐसे निर्मल राजनेता की बनी जिसके मन में विरोधियों के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं था।
आम जन का रखा ख्यालः
 उनकी सरकार सुशासन के उदाहरण रचने वाली साबित हुई। जनसमर्थक नीतियों के साथ महंगाई पर नियंत्रण रखकर सरकार ने यह साबित किया कि देश यूं भी चलाया जा सकता है। सन् 1999 के राजग के चुनाव घोषणापत्र का आकलन करें तो पता चलता है कि उसने “सुशासन प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता”जैसे विषय को उठाने के साथ कहा-“लोगों के सामने हमारी प्रथम प्रतिबद्धता एक ऐसी स्थायी, ईमानदार, पारदर्शी और कुशल सरकार देने की है, जो चहुंमुखी विकास करने में सक्षम हो। इसके लिए सरकार आवश्यक प्रशासनिक सुधारों के समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करेगी, इन सुधारों में पुलिस और अन्य सिविल सेवाओं में किए जाने वाले सुधार शामिल हैं।” राजग ने देश के सामने ऐसे सुशासन का आदर्श रखा जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, संघीय समरसता, आर्थिक आधुनिकीकरण, सामाजिक न्याय, शुचिता जैसे सवाल शामिल थे। आम जनता से जुड़ी सुविधाओं का व्यापक संवर्धन, आईटी क्रांति, सूचना क्रांति इससे जुड़ी उपलब्धियां हैं।
एक भारतीय प्रधानमंत्रीः
   अटलबिहारी बाजपेयी सही मायने में एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो भारत को समझते थे।भारतीयता को समझते थे। राजनीति में उनकी खींची लकीर इतनी लंबी है जिसे पारकर पाना संभव नहीं दिखता। अटलजी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि माना। देश को सबसे बड़ा माना। देश के बारे में सोचा और अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया। उनकी समूची राजनीति राष्ट्रवाद के संकल्पों को समर्पित रही। वे भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री भी रहे। उनकी यात्रा सही मायने में एक ऐसे नायक की यात्रा है जिसने विश्वमंच पर भारत और उसकी संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास किया। मूलतः पत्रकार और संवेदनशील कवि रहे अटल जी के मन में पूरी विश्वमानवता के लिए एक संवेदना है। यही भारतीय तत्व है। इसके चलते ही उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए तो प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए प्रयास जारी रखे। भले ही कारगिल का धोखा मिला, पर उनका मन इन सबके विपरीत एक प्रांजलता से भरा रहा। बदले की भावना न तो उनके जीवन में है न राजनीति में। इसी के चलते वे अजातशत्रु कहे जाते हैं।
आज जबकि राष्ट्रजीवन में पश्चिमी और अमरीकी प्रभावों का साफ प्रभाव दिखने लगा है। रिटेल में एफडीआई के सवाल पर जिस तरह के हालात बने वे चिंता में डालते हैं। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर बड़े पदों पर बैठे राजनेता जिस तरह अमरीकी और विदेशी कंपनियों के पक्ष में खड़े दिखे वह बात चिंता में डालती है। यह देखना रोचक होता कि अगर सदन में अटलजी होते तो इस सवाल पर क्या स्टैंड लेते। शायद उनकी बात को अनसुना करने का साहस समाज और राजनीति में दोनों में न होता। सही मायने में राजनीति में उनकी अनुपस्थिति इसलिए भी बेतरह याद की जाती है, क्योंकि उनके बाद मूल्यपरक राजनीति का अंत होता दिखता है। क्षरण तेज हो रहा है, आदर्श क्षरित हो रहे हैं। उसे बचाने की कोशिशें असफल होती दिख रही हैं। आज भी वे एक जीवंत इतिहास की तरह हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वे एक ऐसे नायक हैं जिसने हमारे इसी कठिन समय में हमें प्रेरणा दी और हममें ऊर्जा भरी और स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरी राजनीति का पाठ पढ़ाया। हमें देखना होगा कि यह परंपरा उनके उत्तराधिकार कैसे आगे बढाते हैं। उनकी दिखायी राह पर भाजपा और उसका संगठन कैसे आगे बढ़ता है।  अपने समूचे जीवन से अटलजी जो पाठ पढ़ाते हैं उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा है। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए भी वे राजधर्म को निभाते हैं। सत्ता में रहकर भी वीतराग उनका सौंदर्य है। वे एक लंबी लकीर खींच गए हैं, इसे उनके चाहनेवालों को न सिर्फ बड़ा करना है बल्कि उसे दिल में भी उतारना होगा। उनके सपनों का भारत तभी बनेगा और सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला फैलेगा। स्वतंत्र भारत के इस आखिरी  करिश्माई नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व सदियों तक याद किया जाएगा, वे धन्य हैं जिन्होंने अटल जी को देखा, सुना और उनके साथ काम किया है। ये यादें और उनके काम ही प्रेरणा बनें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलसचिव हैं।)


फ़िरदौस ख़ान
बहुत कम लोग जानते हैं कि सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री एवं ट्रेजडी क्वीन के नाम से विख्यात मीना कुमारी शायरा भी थीं. मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था. एक अगस्त, 1932 को मुंबई में जन्मी मीना कुमारी के पिता अली बक़्श पारसी रंगमंच के जाने-माने कलाकार थे. उन्होंने कई फ़िल्मों में संगीत भी दिया था. उनकी मां इक़बाल बानो मशहूर नृत्यांगना थीं. उनका असली नाम प्रभावती देवी था. उनका संबंध टैगोर परिवार से था यानी मीना कुमारी की नानी रवींद्र नाथ टैगोर की भतीजी थीं, लेकिन अली बक़्श से विवाह के लिए प्रभावती ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था. मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में एक फ़िल्म में बतौर बाल कलाकार काम किया था. 1952 में प्रदर्शित विजय भट्ट की लोकप्रिय फ़िल्म बैजू बावरा से वह मीना कुमारी के रूप में जानी गईं. 1953 तक मीना कुमारी की तीन हिट फ़िल्में आ चुकी थीं, जिनमें दायरा, दो बीघा ज़मीन एवं परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिए एक नया दौर शुरू हुआ. इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को ख़ासा प्रभावित किया था. इसके बाद उन्हें ऐसी फ़िल्में मिलने लगीं, जिनसे वह ट्रेजडी क्वीन के रूप में मशहूर हो गईं. उनकी ज़िंदगी परेशानियों के दौर से ग़ुजर रही थी. उन्हें मशहूर फ़िल्मकार कमाल अमरोही के रूप में एक हमदर्द इंसान मिला. उन्होंने कमाल से प्रभावित होकर उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही और दस साल के वैवाहिक जीवन के बाद 1964 में वह कमाल अमरोही से अलग हो गईं. कहा यह भी गया कि औलाद न होने की वजह से उनके रिश्ते में दरार पड़ने लगी थी.
1966 में बनी फ़िल्म फूल और पत्थर के नायक धर्मेंद्र से मीना कुमारी की नज़दीकियां बढ़ने लगी थीं. मीना कुमारी उस दौर की कामयाब अभिनेत्री थीं, जबकि धर्मेंद्र का करियर ठीक से नहीं चल रहा था. लिहाज़ा धर्मेंद्र ने मीना कुमारी का सहारा लेकर ख़ुद को आगे बढ़ाया. उनके क़िस्से पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर पड़ा. अमरोहा में एक मुशायरे के दौरान किसी युवक ने मीना कुमारी पर कटाक्ष करते हुए एक ऐसा शेअर पढ़ा, जिस पर मुशायरे की सदारत कर रहे कमाल अमरोही भड़क गए.

कमाल अमरोही ने मीना कुमारी की कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें पाकीज़ा भी शामिल है. पाकीज़ा के निर्माण में सत्रह साल लगे थे, जिसकी वजह मीना कुमारी से उनका अलगाव था. यह कला के प्रति मीना कुमारी का समर्पण ही था कि उन्होंने बीमारी की हालत में भी इस फ़िल्म को पूरा किया. पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया था, लेकिन कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र को फ़िल्म से बाहर कर उनकी जगह राजकुमार को ले लिया. 1956 में शुरू हुई पाकीज़ा 4 फ़रवरी, 1972 को रिलीज़ हुई और उसी साल 31 मार्च को मीना कुमारी चल बसीं. फ़िल्म हिट रही, कमाल अमरोही अमर हो गए, लेकिन मीना कुमारी ग़ुरबत में मरीं. अस्पताल का बिल उनके प्रशंसक एक डॉक्टर ने चुकाया. मीना कुमारी ज़िंदगी भर सुर्ख़ियों और विवादों में रहीं. कभी शराब पीने की आदत को लेकर, तो कभी धर्मेंद्र के साथ संबंधों को लेकर. मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन में शराब और शायरी को अपना साथी बना लिया था. वह नज़्में लिखती थीं, जो उनकी मौत के बाद नाज़ नाम से प्रकाशित हुईं-
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करने की क़ुव्वत मिलती है…

मीना कुमारी की ग़ज़लों में मुहब्बत है, शोख़ी है. वह कहती हैं-
रूह का चेहरा किताबी होगा
जिस्म का रंग अनाबी होगा
शरबती रंग से लिखूं आंखें
और अहसास शराबी होगा
चश्मे-पैमाने से टपका आंसू
कोई बेचारा सवाबी होगा...

धर्मेंद्र ने भी करियर की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद मीना को अकेला छोड़ दिया. कभी मुड़कर भी उनकी तरफ़ नहीं देखा. मीना उम्र भर मुहब्बत पाने के लिए तरसती रह गईं-
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे
अपने जिस्म के रोएं-रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है, जिसके
रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके
आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम जज़ीरों
की तऱफ लिए जा रहे हों,
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह-रहकर चमकते दिखाई देते हैं,
हमारी गुफ़्तगू की ज़ुबान
वही है जो
दरख्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है,
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आंसू छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत…

कमाल अमरोही से निकाह करके भी उनका अकेलापन दूर नहीं हुआ और वह शराब में डूब गईं. एक बार जब दादा मुनि अशोक कुमार उनके लिए दवा लेकर पहुंचे तो उन्होंने कहा, दवा खाकर भी मैं जीऊंगी नहीं, यह जानती हूं मैं. इसलिए कुछ तंबाक़ू खा लेने दो, शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो. मीना कुमारी का यह जवाब सुनकर दादा मुनि कांप उठे. मीना कुमारी की उदासी उनकी नज़्मों में भी उतर आई थी-
दिन गुज़रता नहीं
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह क्षण पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका देख बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुआं क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है…

बचपन से जवानी तक या यूं कहें कि ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक उन्होंने दुश्वारियों का सामना किया-
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता,
जब ज़ुल्फ़ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता,
हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता,
बहते हुए आंसू ने आंख से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता,
दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता…

मीना कुमारी की ज़िंदगी एक सच्चे प्रेमी की तलाश में ही गुज़र गई. अकेलेपन का दर्द उनकी रचनाओं में समाया हुआ है :-
चांद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा,
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुंआ तन्हा,
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा,
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी
दोनों चलते रहे कहां तन्हा,
जलती-बुझती सी रोशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा,
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा…




चेहरे के दाग़-धब्बे कम करने के लिए महंगा इलाज करने और महंगे तरीक़े अपनाने की ज़रूरत नहीं है. बिना मेहनत किए भी दाग़-धब्बों को कम किया जा सकता है. दाग़-धब्बे कम करने के कुछ आसान घरेलू तरीक़े पेश हैं, जिन्हें आज़मा कर दाग़-धब्बों को कम किया जा सकता है.
ऐलो वेरा जेल 
ऐलो वेरा जेल के पत्ते को लंबा काटकर शीशे की प्याली में जेल निकाल लें. फिर इसे दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगाएं. आधा घंटे बाद पानी से धो लें.
नींबू का रस
शीशे की प्याली में नींबू का रस निचोड़ लें.  फिर इसमें रूई का गोला भिगोकर दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगाएं. नींबू को काटकर सीधे भी लगाया जा सकता है. एक घंटे बाद पानी से धो लें. ध्यान रहे कि नींबू का रस लगाने के बाद धूप में न जाएं.
नींबू में जो एसकॉर्बिक एसिड (ascorbic acid) या विटामिन सी होता है, जो वह एन्टी-ऑक्सिडेंट्स के रूप में काम करते हैं और त्वचा में दाग़-धब्बों को दूर करने में मदद करते हैं.
दूध
रात को सोने से पहले रूई के गोले को दूध में भिगोकर दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगा लें. रात भर यूं ही छोड़ दें. अगले दिन सुबह गुनगुने गर्म पानी से धो लें.
दूध में लैक्टिक एसिड होता है, जो दाग़-धब्बों को दूर करने में बहुत मदद करता है.
दही
एक कटोरी में दही लें और उसमें आधा नींबू का रस डालकर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को दाग़-धब्बे पर लगाएं. फिर सूखने के बाद गुनगुने पानी से धो लें.
दही में भी लैक्टिक एसिड होता है, जो ब्लीचिंग एजेन्ट का काम करता है.
संतरा
एक कटोरी में दो बड़े चम्मच संतरे का रस लें और उसमें एक चुटकी हल्दी डालकर अच्छी तरह से मिला लें. इस पेस्ट को रात को सोने से पहले चेहरे पर अच्छी तरह से लगा लें और अगली सुबह गुनगुने गर्म पानी से धो लें.
नींबू की तरह ही संतरे के रस में भी ब्लीचिंग का गुण होता है, जो दाग़-धब्बों को दूर करने में मदद करता है.
शहद
शहद को दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगाएं.
एक कटोरी में ज़रूरत के अनुसार नींबू का रस या ऑलिव ऑयल लें. उसमें थोड़ा शहद डालकर पेस्ट बना लें. उसके बाद पेस्ट को चेहरे पर लगाएं. 
ज़रूरत के हिसाब से बादाम को भिगोकर पीस लें. उसमें एक छोटा चम्मच नींबू का रस और दूध डालें. उसके बाद थोड़ा-सा शहद डालकर अच्छी तरह से पेस्ट बना लें. पेस्ट को चेहरे पर लगाकर सूखने का बाद पानी से धो लें.

शहद त्वचा की मृत कोशिकाओं (dead cells) को निकालकर रौनक़ लाने में मदद करता है. शहद में एन्जाइम होता है, जो वह त्वचा को मुलायम और आकर्षक बनाने में भी बहुत मदद करता है. अगर आपकी त्वचा संवेदनशील है, तो पहले हाथ पर इसका इस्तेमाल करके देख लें. उसके बाद ही चेहरे पर लगाएं.

ग़ौरतलब है कि इन घरेलू तरीक़ों को कम से कम एक महीना तक लगातार इस्तेमाल करने के बाद ही नतीजा नज़र में आएगा.

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