फ़िरदौस ख़ान
खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा हुआ ईमान है
हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है
या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...
माहे-रमज़ान इबादत, नेकियों और रौनक़ का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल है. रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है.

इबादत
रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को 'तरावीह' कहते हैं. इसका वक्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली. आपने फ़रमाया कि ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.''उन्होंने फ़रमाया कि ''यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. आपने फ़रमाया कि ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ (विषम) रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है. शबे-क़द्र के बारे में क़ुरआन में कहा गया है कि यह हज़ार रातों से बेहतर है, यानि इस रात में इबादत करने का सवाब एक हज़ार रातों की इबादत के बराबर है. मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं.

ख़ुशनूदी ख़ान कहती हैं- इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है. हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है. हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहिए. वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज़्यादा ही मिलता है. वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके ख़नदान के सभी लोग रातभर जागते हैं. मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं.

वहीं, ज़ुबैर कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक़्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके. दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है. इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है. रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने का सबक़ देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है.

ज़ायक़ा
माहे-रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार व्यंजनों की भरमार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ व्यंजनों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होता. रमज़ान का ख़ास व्यंजन हैं फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है. अमूमन रोज़ा खजूर के साथ खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों का चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ व्यंजन शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ोरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़ान पर की शोभा बढ़ाते हैं.
ज़ीनत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगाना ज़्यादा पसंद करते हैं.
रमज़ान में रोटी बनाने वालों का काम बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है. दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं. यहां तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे रुमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि. अमूमन इस इलाके क़े होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं.

हदीस
जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं. इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं. हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते. ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम का फ़रमान है.
आप (सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम) फ़रमाते हैं- रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं.
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

ख़रीददारी
रमज़ान में बाज़ार की रौनक़ को चार चांद लग जाते हैं. रमज़ान में दिल्ली के मीना बाज़ार की रौनक़ के तो क्या कहने. दुकानों पर चमचमाते ज़री वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक़्क़ाशी वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच ख़रीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे. रमज़ान में तरह-तरह का नया सामान बाज़ार में आने लगता है. लोग रमज़ान में ही ईद की ख़रीददारी शुरू कर देते हैं. आधी रात तक बाज़ार सजते हैं. इस दौरान सबसे ज़्यादा कपड़ों की ख़रीददारी होती है. दर्ज़ियों का काम बढ़ जाता है. इसलिए लोग ख़ासकर महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं. अलविदा जुमे को भी नये कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने का दस्तूर है. हर बार नये डिज़ाइनों के कपड़े बाज़ार में आते हैं. नेट, शिफ़ौन, जॉरजेट पर कुन्दन वर्क, सिक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का काम महिलाओं को ख़ासा आकर्षित करता है. दिल्ली व अन्य शहरों के बाज़ारों में कोलकाता, सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है. इसके अलावा सदाबहार चिकन का काम भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पुरानी दिल्ली के कपड़ा व्यापारी शाकिर अली कहते हैं कि बाज़ार में जिस चीज़ का मांग बढ़ने लगती है हम उसे ही मंगवाना शुरू कर देते हैं. ईद के महीने में शादी-ब्याह भी ज़्यादा होते हैं. इसलिए माहे-रमज़ान में शादी की शॉपिंग भी जमकर होती है. शादियों में आज भी पारंपरिक पहनावे ग़रारे को ख़ासा पसंद किया जाता है.

चूड़ियों और मेहंदी के बिना ईद की ख़रीददारी अधूरी है. रंग-बिरंगी चूड़ियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं. चूड़ियों के बग़ैर सिंगार पूरा नहीं होता. बाज़ार में तरह-तरह की चूड़ियों की बहार है, जिनमें कांच की चूड़ियां, लाख की चूड़ियां, सोने-चांदी की चूड़िया, और मेटल की चूड़ियां शामिल हैं. सोने की चूड़ियां तो अमीर तबक़े तक ही सीमित हैं. ख़ास बात यह भी है कि आज भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां ही ज़्यादा आकर्षित करती हैं. बाज़ार में कांच की नगों वाली चूड़ियों की भी ख़ासी मांग है. कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कामकाजी महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूड़ियां ज़्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज़ करती हैं और टूटती भी नहीं हैं, जबकि कांच की नाज़ुक चूड़ियां ज़्यादा दिनों तक हाथ में नहीं टिक पातीं.

इसके अलावा मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें भी रमज़ान की रौनक़ को और बढ़ा देती हैं. इत्र, लोबान और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है. इत्र जन्नतुल-फ़िरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और हिना का ख़ूब पसंद किया जाता है. रमज़ान में मिस्वाक से दांत साफ़ करना सुन्नत माना जाता है. इसलिए इसकी मांग भी बढ़ जाती है. रमज़ान में टोपियों की बिक्री भी ख़ूब होती है. पहले लोग लखनवी दुपल्ली टोपी ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन अब टोपियों की नई वैरायटी पेश की जा रही हैं. अब तो लोग विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों से सराबोर पारंपरिक टोपी भी पसंद कर रहे हैं. इसके अलावा अरबी रुमाल भी ख़ूब बिक रहे हैं. रमज़ान के मौक़े पर इस्लामी साहित्य, तक़रीरों, नअत, हम्द,क़व्वालियों की कैसेट सीटी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है.

यूं तो दुनियाभर में ख़ासकर इस्लामी देशों में रमज़ान बहुत अक़ीदत के साथ मनाया जाता है, लेकिन हिन्दुस्तान की बात ही कुछ और है. विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में मुसलमानों के अलावा ग़ैर मुस्लिम लोग भी रोज़े रखते हैं. कंवर सिंह का कहना है कि वे पिछले कई सालों से रमज़ान में रोज़े रखते आ रहे हैं. रमज़ान के दौरान वे सुबह सूरज निकलने के बाद से सूरज छुपने तक कुछ नहीं खाते. उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोज़ों को ज़रूर क़ुबूल करेगा. भारत देश की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर त्योहार मनाते हैं. यही जज़्बात गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखते हैं.


-फ़िरदौस ख़ान
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी  सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.
भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा  उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. मातृ शक्ति को शत-शत नमन...     


फ़िरदौस ख़ान
एक ख़ुशहाल देश की पहचान यही है कि उसमें रहने वाले हर व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान हो, उसे बुनियादी ज़रूरत की सभी चीज़ें, सभी सुविधाएं मुहैया हों. जब व्यक्ति ख़ुशहाल होगा, तो परिवार ख़ुशहाल होगा, परिवार ख़ुशहाल होगा, तो समाज ख़ुशहाल होगा. एक ख़ुशहाल समाज ही आने वाली पीढ़ियों को बेहतर समाज, बेहतर परिवेश दे सकता है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सर्वोदय समाज का सपना देखा था और वे इसे साकार करना चाहते थे. गांधीजी कहते हैं- "समाजवाद का प्रारंभ पहले समाजवादी से होता है. अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो, तो उस पर शून्य बढ़ाए जा सकते हैं. हर शून्य से उसकी क़ीमत दस गुना बढ़ जाएगी, लेकिन अगर पहला अंक शून्य हो, तो उसके आगे कितने ही शून्य बढ़ाए जाएं, उसकी क़ीमत फिर भी शून्य ही रहेगी." भूदान आन्दोलन के जनक विनोबा भावे के शब्दों में, सर्वोदय का अर्थ है- सर्वसेवा के माध्यम से समस्त प्राणियो की उन्नति. आज देश को इसी सर्वोदय समाज की ज़रूरत है.

पिछले कुछ बरसों देश एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है, जहां सिर्फ़ मुट्ठीभर लोगों का ही भला हो रहा है. बाक़ी जनता की हालत बद से बदतर होती जा रही है. लोगों के काम-धंधे तो पहले ही बर्बाद हो चुके हैं. बढ़ती महंगाई की मार भी लोग झेल ही रहे हैं. ऐसे में अपराधों की बढ़ती वारदातों ने डर का माहौल पैदा कर दिया है. हालत ये है कि चंद महीने की मासूम बच्चियां भी दरिन्दों का शिकार बन रही हैं. क़ानून-व्यवस्था की हालत भी कुछ ऐसी है कि शिकायत करने वाले मज़लूम की हिरासत में मौत तक हो जाती है और आरोपी खुले घूमते रहते हैं. ऐसे में जनता का शासन-प्रशासन से यक़ीन उठने लगा है. बीते मार्च माह में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपी की फ़ौरन गिरफ़्तारी पर रोक लगाने के आदेश के बाद से इन तबक़ों में खौफ़ पैदा हो गया है. उन्हें लगता है कि पहले ही उनके साथ अमानवीय व्यवहार के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, ऐसे में उन पर दबंगों का ज़ुल्म और ज़्यादा बढ़ जाएगा. अपने अधिकारों के लिए उन्हें सड़क पर उतरना पड़ा. क़ाबिले-गौर है कि देश में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की आबादी तक़रीबन 20 करोड़ है. लोकसभा में इन तबक़ों के 131 सदस्य हैं. हैरानी की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी में 67 सांसद इसी तबक़े से होने के बावजूद दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है. चंद सांसदों के बयान सामने आए, लेकिन जो विरोध होना चाहिए था, वह दिखाई नहीं पड़ा. ग़ौरतलब है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक़, हर 15 मिनट में एक दलित के साथ अपराध होता है. रोज़ाना छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. ये तो सिर्फ़ सरकारी आंकड़े हैं, और उन मामलों के हैं, जो दर्ज हो जाते हैं. जो मामले दर्ज नहीं कराए जाते, या दर्ज नहीं हो पाते, उनकी तादाद कितनी हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है.

बुरे हालात में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल दलितों के समर्थन में सामने आए. कांग्रेस ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संविधान बचाओ रैली का आयोजन करके जहां भाजपा सरकार को ये चेतावनी दी कि अब और ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, वहीं दलितों को भी ये यक़ीन दिलाने की कोशिश की गई कि वे अकेले नहीं हैं. कांग्रेस हमेशा उनके साथ है. रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि  दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार बढ़ रहा है. मोदी के दिल में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस दलितों, ग़रीबों, किसानों औऱ देश के सभी कमज़ोर तबक़ों की रक्षा के लिए हमेशा लड़ती रहेगी. कांग्रेस ने सत्तर साल में देश की गरिमा बनाई और पिछले चार साल में मोदी सरकार ने इसे धूमिल कर दिया, इसे चोट पहुंचाई. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने देश को संविधान दिया और ये संविधान दलितों, ग़रीबों और महिलाओं की रक्षा करता है. आज सर्वोच्च न्यायालय को कुचला और दबाया जा रहा है, पहली बार ऐसा हुआ है कि चार जज हिन्दुस्तान की जनता से इंसाफ़ मांग रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग इस संविधान को कभी नहीं छू पाएंगे, क्योंकि हम ऐसा होने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि आज जनता बेहाल है. देश के प्रधानमंत्री सिर्फ़ अपने मन की बात सुनते हैं. वह किसी को बोलना देना नहीं चाहते. वे कहते हैं कि सिर्फ़ मेरे मन की बात सुनो. मैं कहता हूं कि 2019 के चुनाव में देश की जनता मोदीजी को अपने मन की बात बताएगी.

दरअसल, आपराधिक मामलों में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के नाम सामने आने की वजह से भी अवाम का भाजपा सरकार से यक़ीन ख़त्म हो चला है. भाजपा नेताओं के अश्लील और विवादित बयान भी इस पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे को सामने लाते रहते हैं. ये बेहद अफ़सोस की बात है कि केंद्र सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग पूरी तरह से संवेदनहीन रवैया अपनाये हुए हैं. इसी ही वारदातों की तरफ़ इशारा करते हुए राहुल गांधी ने तंज़ किया, मोदी जी अब नया नारा देंगे- "बेटी बचाओ, बीजेपी के लोगों से बचाओ."

बहरहाल, आज देश को ऐसे रहनुमाओं की ज़रूरत है, जो बिना किसी भेदभाव के अवाम के लिए काम करें. जनता को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि देश में किस सियासी दल का शासन है, उसे तो बस चैन-अमन चाहिए, बुनियादी सुविधाएं चाहिएं, ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए अच्छा माहौल चाहिए. अवाम की ये ज़रूरतें वही सियासी दल पूरी कर सकते हैं, जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हों. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस ने इस देश के लिए बहुत कुछ किया है. आज भी अवाम को कांग्रेस से बहुत उम्मीदें हैं. राहुल गांधी की ज़िम्मेदारी है कि वे विपक्ष में होने के नाते, एक सियासी दल के अध्यक्ष होने के नाते, जनता को ये यक़ीन दिलाते रहें कि वे हमेशा उसके साथ हैं. महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत पर अमल करते हुए देश और समाज के लिए काम करना भी उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल हैं. आज जनता को ऐसे नेता की ज़रूरत है, जो उनकी आवाज़ बन सके. कांग्रेस इसमें कितना कामयाब हो पाती है, ये आने वाला वक़्त ही बताएगा.

फ़िरदौस ख़ान
जनतंत्र में, लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार होता है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन कर सकती है,  सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती है. लेकिन आंदोलन के दौरान, प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जा सकती. सरकार को भी ये अधिकार नहीं है कि वे शांति से किए जा रहे आंदोलन को कुचलने के लिए किसी भी तरह के बल का इस्तेमाल करे. बल्कि सरकार की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वह आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मुहैया कराए. इस बात का ख़्याल रखे कि कहीं इस आंदोलन की आड़ में असामाजिक तत्व कोई हंगामा खड़ा न कर दें. अगर आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा होती है, तो उस पर क़ाबू पाना, उसे रोकना भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. लेकिन केंद्र की  बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी की मज़बूत सरकार इस मामले में बेहद कमज़ोर साबित हो रही है.

हाल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को लेकर पहले दलितों ने भारत बंद किया था. उसके बाद सर्वणों ने आरक्षण के ख़िलाफ़ जवाबी आंदोलन शुरू कर दिया. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता ज़ाहिर करते हुए गिरफ़्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किए जाने पर रोक लगा दी थी. क़ाबिले-ग़ौर है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने और उन्हें इंसाफ़ दिलाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम लाया गया था. संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर, 1989 को पारित किया था. इसे 30 जनवरी, 1990 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे में लागू किया गया. यह अधिनियम उस हर व्यक्ति पर लागू होता हैं, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और वह इस तबक़े के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं. इस अधिनियम में पांच अध्याय और 23 धाराएं शामिल हैं.  इस क़ानून के तहत किए गए अपराध ग़ैर- ज़मानती, संज्ञेय और अशमनीय हैं. यह क़ानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों पर अत्याचार करने वालों को सज़ा देता है. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है और मामलों के जल्द निपटारे के लिए अदालतों को स्थापित करता है. इस क़ानून के तहत भारतीय दंड संहिता में शामिल क़ानूनों में ज़्यादा सज़ा दिए जाने का प्रावधान है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर होने वाले अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव को अपराध माना गया है.  इनमें उन्हें जबरन अखाद्य पदार्थ मल, मूत्र इत्यादि खिलाने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं. अगर कोई व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य से कारोबार करने से इनकार करता है, तो इसे आर्थिक बहिष्कार माना जाएगा.  इसमें किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य के साथ काम करने या उसे काम पर रखने/नौकरी देने से इनकार करना, इस तबक़े के लोगों को सेवा प्रदान न करना या उन्हें सेवा प्रदान नहीं करने देना आदि इसमें शामिल हैं.

लेकिन सर्वोच्च न्यालाय के फ़ैसले से दलितों पर अत्याचार करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी बेहद मुश्किल हो जाएगी, क्योंकि सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता की मज़ूरी लेना ज़रूरी है. अगर दोषी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं है,  तो एसएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी की सहमति के बाद ही उसकी गिरफ़्तारी हो सकेगी. इतना ही नहीं, अदालत ने अग्रिम ज़मानत का भी प्रावधान कर दिया है और एफ़आईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच को भी ज़रूरी कर दिया है. यानी दलितों पर अत्याचार के मामले में आरोपी की गिरफ़्तारी और उन पर कोई मामला दर्ज करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा. ऐसी हालत में दलितों पर अत्याचार के मामलों में इज़ाफ़ा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है. सख़्त क़ानून होने के बावजूद आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव करने के मामले सामने आते रहते हैं. अब जब क़ानून ही कमज़ोर हो जाएगा, तो हालात बद से बदतर होने में देर नहीं लगेगी.  

ये भी बेहद अफ़सोस की बात है कि आंदोलन न सिर्फ़ उग्र रूप धारण कर रहे हैं, बल्कि अमानवीयता की भी सारी हदें पार कर रहे हैं. बंद के दौरान कई जगह हिंसा की वारदातें हुईं. आगज़नी हुई, दुकानें जलाई गईं, वाहन फूंके गए, फ़ायरिंग हुई. लोग ज़ख़्मी हुए, कई लोगों की जानें चली गईं.  मरने वालों में पुलिस वाले भी शामिल थे, जो अपनी ड्यूटी कर रहे थे. जगह-जगह रेलें रोकी गईं, पटरियां उखाड़ दी गईं.  चक्का जाम किया गया. रास्ते बंद कर दिए गए. किसी को इस बात का ख़्याल भी नहीं आया कि बच्चे स्कूल से कैसे सही-सलामत घर लौटेंगे ? जो लोग सफ़र में हैं, वे कैसे अपने घरों को लौटेंगे या गंतव्य तक पहुंचेंगे? इस झुलसती गरमी में रेलों में बैठे यात्री बेहाल हो गए. बच्चे भूख-प्यास से बिलखते रहे. जो लोग बीमार थे, अस्पताल तक नहीं पहुंच पाए. अमानवीयता की हद ये रही कि बिहार के हाजीपुर में एंबुलस में बैठी महिला अपने बीमार बच्चे की ज़िन्दगी का वास्ता देती रही, प्रदर्शनकारियों के आगे हाथ जोड़ती रही, मिन्नतें करती रही, लेकिन किसी को उस पर तरस नहीं आया. किसी ने एंबुलेंस को रास्ता नहीं दिया, नतीजतन इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत हो गई, एक मां की गोद सूनी हो गई.

देश में बंद के दौरान हालात इतने ख़राब हो गए कि सेना बुलानी पड़ी. कई जगह कर्फ़्यू लगाया गया, जिससे रोज़मर्राह की ज़िन्दगी बुरी तरह मुतासिर हुई. आंदोलन के दौरान न सिर्फ़ सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया, बल्कि निजी संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया गया. आंदोलनकारी जिस सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाते हैं, वे जनता की अपनी संपत्ति है. ये संपत्ति जनता से लिए गए कई तरह के करों से ही बनाई जाती है. यानी इसमें जनता की ख़ून-पसीने की कमाई शामिल होती है. सरकार इस नुक़सान को पूरा करने के लिए जनता पर करों का बोझ और बढ़ा देती है. जिन लोगों की निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचता है, वे ताउम्र उसकी भरपाई करने में गुज़ार देते हैं. आबाद लोग बर्बाद हो जाते हैं. ये सच है कि कोई भी आंदोलन एक न एक दिन ख़त्म हो ही जाता है.  उस आंदोलन से हुई माली नुक़सान की भरपाई भी कुछ बरसों में हो ही जाती है, लेकिन किसी की जान चली जाए, तो उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती.

दरअसल, देश में किसी भी तरह की हिंसा के लिए सरकार की सीधी जवाबदेही बनती है. देश में चैन-अमन क़ायम रखना, जनमानस को सुरक्षित रखना, उनके जान-माल की सुरक्षा करना सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. सरकार के पास पुलिस है, सेना है, ताक़त है, इसके बावजूद अगर हिंसा होती है, तो इसे सरकार की नाकामी ही माना जाएगा. शासन और प्रशासन दोनों ही इस मामले में नाकारा साबित हुए हैं. केंद्र सरकार न तो दलितों के अधिकारों की रक्षा कर पा रही है और न ही क़ानून व्यवस्था को सही तरीक़े से लागू कर पा रही है. ऐसी हालत में जनता किसे पुकारे?

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश के लिए सिर्फ़ सरकार का मज़बूत होना ही काफ़ी नहीं होता.  देश की ख़ुशहाली के लिए, उसकी तरक़्क़ी के लिए एक मज़बूत विपक्ष की भी ज़रूरत होती है. ये विपक्ष ही होता है, जो सरकार को तानाशाह होने से रोकता है, सरकार को जनविरोधी फ़ैसले लेने से रोकता है. सरकार के हर जन विरोधी क़दम का जमकर विरोध करता है. अगर सदन के अंदर उसकी सुनवाई नहीं होती है, तो वह सड़क पर विरोध ज़ाहिर करता है. जब सरकार में शामिल अवाम के नुमाइंदे सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं और उन लोगों की अनदेखी करने लगते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है, तो उस वक़्त ये विपक्ष ही तो होता है, जो अवाम का प्रतिनिधित्व करता है. अवाम की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाता है. आज देश की यही हालत है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तानाशाही रवैया अख़्तियार किए हुए. सत्ता में आने के बाद जिस तरह से कथित जन विरोधी फ़ैसले लिए गए, उससे अवाम की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है. यह फ़ैसला नोटबंदी का हो या जीएसटी का, बिजली और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने का हो या फिर बात-बात पर कर वसूली का. इस सबने अवाम को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया है कि अब उसका दम घुटने लगा है. कहीं मिनिमम बैंलेस न होने पर ग्राहकों के खाते से मनमाने पैसे काटे जा रहे हैं, तो कहीं आधार न होने के नाम पर, राशन कार्ड को आधार से न जोड़ने के नाम पर लोगों को राशन से महरूम किया जा रहा है.

देश की अवाम पिछले काफ़ी वक़्त से बुरे दौर से गुज़र रही है. जनमानस ने जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में, विधानसभा में भेजा था, वे अब सत्ता के नशे में हैं. उन्हें जनमानस के दुखों से, उनकी तकलीफ़ों से कोई सरोकार नहीं रह गया है. ऐसे में जनता किसके पास जाए, किसे अपने अपने दुख-दर्द बताए. ज़ाहिर है, ऐसे में जनता विपक्ष से ही उम्मीद करेगी. जनता चाहेगी कि विपक्ष उसका नेतृत्व करे. उसे इस मुसीबत से निजात दिलाए. ये विपक्ष का उत्तरदायित्व भी है कि वे जनता की आवाज़ बने, जनता की आवाज़ को मुखर करे.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की प्रमुख व कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी  देश के हालात को बख़ूबी समझ रहे हैं. सोनिया गांधी अवाम को एक मज़बूत विपक्ष देना चाहती हैं, वे देश को एक जन हितैषी सरकार देना चाहती हैं. इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी है. दिल्ली में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में कांग्रेस को तबाह करने के लिए अहंकारी और सत्ता के नशे में मदमस्त लोगों ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी. साम-दाम-दंड-भेद का पूरा खेल चल रहा है, लेकिन सत्ता के अहंकार के आगे ना कांग्रेस कभी झुकी है और ना कभी झुकेगी. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तानाशाही तौर तरीक़ों, संविधान की उपेक्षा, संसद का अनादर, विपक्ष पर फ़ज़्री मुक़दमों और मीडिया पर लगाम लगाने का कांग्रेस विरोध कर रही है.

राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू कश्मीर के कठुआ में हुई बलात्कार की घटनाओं के विरोध में गुरुवार आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च निकाला.

ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ गठजोड़ बनाने के लिए विपक्षी दलों को रात्रिभोज दिया. सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर हुए इस रात्रिभोज में विपक्षी दल के नेता शामिल हुए, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेइटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के नेता बदरुद्दीन अजमल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और तारिक अनवर, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और मीसा भारती, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह और जयंत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के कनिमोई, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सुदीप बंदोपाध्याय, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी, जनता दल-सेक्युलर (जेडी-एस) के कुपेंद्र रेड्डी, रेवलूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के रामचंद्रन और केरल कांग्रेस के नेता भी शामिल हुए. कांग्रेस के नेताओं में राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गु़लाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल,  एके एंटोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, रणदीप सुरजेवाला आदि नेताओं ने शिरकत की.

सोनिया गांधी बख़ूबी समझती हैं कि इस वक़्त कांग्रेस को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी पार्टी पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की जनता के लिए, पार्टी के लिए हमेशा उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश का शासन उनके हाथ में था, प्रधानमंत्री का ओहदा उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं या अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. उनकी अगुवाई में न सिर्फ़ कांग्रेस एक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी और सत्ता तक पहुंची, बल्कि भारत विश्व मंच पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडौर सौंपने के बाद सोनिया गांधी आराम करना चाहती थीं. अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी. राहुल गांधी ही पार्टी के सभी अहम फ़ैसले कर रहे थे. लेकिन पार्टी को मुसीबत में देखकर उन्होंने सियासत में सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला और उसे मज़बूती दी. उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में वापसी के लिए देशभर में रोड शो किए थे. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई थी. उस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में भी शासन खो दिया. हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी.

अगले साल आम चुनाव होने हैं. उससे पहले इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. कांग्रेस के पास बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. सोनिया गांधी ने रात्रिभोज के बहाने विपक्षी द्लों को एकजुट करने की कोशिश की है. अगर सोनिया गांधी इसमें कामयाब हो जाती हैं, तो इससे जहां देश को एक मज़बूत विपक्ष मिलेगा, वहीं आम चुनाव में पार्टी की राह भी आसान हो सकती है.

जावेद अनीस 
वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सहस्राब्दि विकास के 8 लक्ष्य तय किये थे. जिसका मकसद  2015 तक दुनिया भर में गरीबी, स्वास्थ्य, मृत्यु दर, शिक्षा, लिंगभेद, भुखमरी जैसी चुनौतियों पर काबू पाना था. लेकिन दुर्भाग्य से 2015  तक इन्हें हासिल नहीं किया जा सका. इसके बाद वर्ष 2030 तक के लिये “सतत् विकास लक्ष्य” (एसडीजी) का विचार सामने आया जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अगले 15 सालों के लिए नए लक्ष्य तय कर दिए गए हैं. इन्हें टिकाऊ विकास लक्ष्य भी कहा जाता है. 'ट्रांस्फॉर्मिंग आवर वर्ल्ड : द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' के संकल्प को साल 2015  में संयुक्त राष्ट्र संघ की 70वें अधिवेशन में औपचारिक  रूप से स्वीकार किया गया था. यह एक जनवरी 2016 से लागू है. एसडीजी के तहत कुल 17 विकास लक्ष्य तय किये गये हैं. सतत विकास लक्ष्यों का उद्देश्य सबके लिए समान, न्यायसंगत, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, समृद्ध और रहने योग्य विश्व का निर्माण करते हुये विकास के तीनों पहलुओं, सामाजिक समावेश, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को व्यापक रूप से समाहित करना है. सतत विकास की अवधारणा में भविष्य की भी चिंता शमिल है. एसडीजी की खासियत यह है कि इसमें पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक विकास का अंग माना गया है, यह एक ऐसे विकास के माडल की वकालत करती है जो भावी पीढ़ियों की जरूरतें को प्रभावित किए बिना ही हमारे मौजूदा समय की आवश्यकताओं को पूरा कर सके.
सतत विकास की अवधारणा को सैद्धांतिक तौर पर मानना तो आसान है लेकिन इसे व्यवहार में लाना उतना ही मुश्किल है खासकर भारत जैसे विकासशील देशों के लिये, दरअसल एसडीजी जैसे लक्ष्यों को हासिल करने में भारत जैसे देशों की सबसे बड़ी चुनौती विकास की अपनी रफ्तार को रोके बिना पर्यावरण संरक्षण तथा संसाधनों का प्रबंधन करना है, इसके अलावा गरीब व विकासशील देशों के पास पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास के लिए ग्रीन टेक्नोलॉजी और तकनीकि दक्षता का अभाव भी होता है.
शायद इसीलिये  एसडीजी लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में भारत की शुरुआत निराशाजनक है. पिछले साल सतत विकास समाधान नेटवर्क (एसडीएसएन) और बर्टल्समैन स्टिफटंग द्वारा सतत विकास सूचकांक पेश किया गया था जिसमें भारत को 149 देशों की सूची में 110वें स्थान पर रखा गया.
सतत् विकास का सातवाँ लक्ष्य है सभी के लिये सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सुनिश्चित करना. जिसका मकसद है 2030 तक सभी को स्वच्छ उर्जा स्रोतों के जरिये सस्ती बिजली उपलब्ध करना.विश्व की करीब सवा अरब आबादी अभी भी बिजली जैसी बुनियादी जरूरत से महरूम है ऐसे में सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा को नये लक्ष्यों में शामिल किया जाना बहुत प्रासंगिक है. एसडीजी 7 भारत जैसे विकासशील देशों के लिये एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है. नीति आयोग के अनुसार भारत में करीब 30 करोड़ लोग अभी भी ऐसे हैं जिन तक बिजली की पहुँच नहीं हो पायी है, इसी तरह से 2014 में जारी यूनाइटेड नेशंस इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार अपने लोगों को खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन न उपलब्ध करा पाने वाले देशों की सूची में भारत शीर्ष पर है और यहां की दो-तिहाई आबादी खाना बनाने के लिए कार्बन उत्पन्न करने वाले ईंधन और गोबर से तैयार होने वाले ईंधन का इस्तेमाल करती है जिसकी वजह से इन परिवारों की महिलाओं और बच्चों के सेहत को गंभीर असर पड़ता है.
सितंबर, 2015 को केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल द्वारा ‘स्वच्छ पाक ऊर्जा और विद्युत तक पहुँच राज्यों का सर्वेक्षण’ रिपोर्ट जारी किया गया था इस सर्वेक्षण में 6 राज्यों (बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल) के 51 जिलों के 714 गांवों के 8500 परिवार शामिल किये गये थे. रिपोर्ट के अनुसार इन राज्यों में 78% ग्रामीण आबादी भोजन पकाने के लिए पारंपरिक बायोमास ईंधन का उपयोग करती है और केवल 14% ग्रामीण परिवार ही भोजन पकाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करते हैं.

उर्जा मंत्रालय द्वारा दिये गये आंकड़ों के अनुसार हमारे देश अभी 4 करोड़ 5 लाख 30 हजार 31 घरों में बिजली नहीं है जिनमें से प्रमुख राज्यों की स्थिति निम्नानुसार है-
राज्य बिजली से वंचित घरों की संख्या
उत्तर प्रदेश 1,46,66,815
बिहार 64,95,622
झारखंड 30,47,833
मध्य प्रदेश 45,02,027
राजस्थान 20,20,979
हरियाणा 6,83,690
छत्तीसगढ़ 6,44,458
(स्रोत : उर्जा मंत्रालय )
दरअसल वर्तमान में भारत ऊर्जा को लेकर मुख्यतः कोयले, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैसों और तेल पर ही निर्भर है जिसकी अपनी सीमायें हैं, एक तो महंगी होने की वजह से सभी तक इनकी पहुँच नहीं है दूसरा इनसे बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है, इसके साथ ही ये विकल्प टिकाऊ भी नहीं है, जिस रफ्तार से ऊर्जा के इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा उससे वे जल्द ही खत्म हो जायेंगी और फिर इन्हें दोबारा बनने में सदियां लग जायेंगी. इसका प्रभाव पर्यावरण के साथ-साथ भावी पीढ़ियों पर भी पड़ना तय है. ऐसे में ऊर्जा के नये विकल्पों की तरफ बढ़ना समय की मांग है जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर लगाम लग सके और सभी लोगों तक सस्ती और  टिकाऊ ऊर्जा की पहुँच बनायी जा सके. इस दिशा में भारत अभी शुरूआती दौर में ही है. विश्व आर्थिक मंच ग्लोबल एनर्जी आर्किटेक्चर परफार्मेंस इंडेक्स रिपोर्ट में हर साल वैश्विक स्तर पर विभिन्न मुल्कों में सुरक्षित, सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा की आपूर्ति के आधार पर ऊर्जा ढांचे का आकलन पेश किया जाता है, यानी 2017 में जारी इसकी रिपोर्ट में 127 देशों में से भारत को 87वां स्थान दिया गया है जिसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. इस सम्बन्ध में  नीति आयोग ने उम्मीद जतायी है कि चूंकि अक्षय ऊर्जा स्रोतों की कीमत कम हो रही है जिससे सभी को सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा पहुँच के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिल सकती है. वर्तमान में हमारे देश में नवीकरणीय ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों के माध्यम से लगभग 50 गीगावॉट बिजली पैदा की जाती है जिसे 2022 तक 100 गीगावॉट यानी दुगना करने के लक्ष्य रखा गया है.
इधर मोदी सरकार का जोर भी ग्रामीण क्षेत्रों में सभी को एलपीजी कनेक्शन  और बिजली उपलब्ध कराने के लिये 'प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना'  और “प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना” जैसी योजनाओं की शुरुआत की गयी है. उज्ज्वला योजना की शुरुआत तीन सालों में पांच करोड़ गरीब महिलाओं को रसोई गैस कनैक्शन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गयी है, इसका मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए एलपीजी के उपयोग को बढ़ावा देना है जिससे लकड़ी और उपले जैसे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन के उपयोग को कम किया जा सके.  इसी तरह से 'प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना' के तहत  31 मार्च 2019 तक तक भारत के  हर घर को बिजली उपलब्ध कराने लक्ष्य रखा गया है. हालांकि जानकार मानते है कि भारत का भी परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर होना इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा है. इस दिशा में सौर उर्जा एक अच्छा विकल्प हो सकता है. हमारा देश सौर उर्जा के उत्पादन के लिए एक आदर्श स्थल है क्योंकि हमारे यहाँ साल भर में 250 से 300 दिनों तक सूरज की पर्याप्त रोशनी उपलब्ध है.
मध्यप्रदेश के संदर्भ में बात करें तो राज्य में बिजली की सरप्लस उतपादन होने के बावजूद यहाँ अभी भी लगभग 45 लाख परिवार बिजली विहीन हैं.दूसरी तरफ हालत यह है कि मध्यप्रदेश में राज्यों के मुकाबले बिजली ज्यादा महंगी मिल रही है. यहाँ देश में सबसे ज्यादा महंगी दरों पर बिजली के बिल वसूले जा रहे हैं जिसका असर गरीब किसानों और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है. इसी साल ही  बिजली कंपनियों के प्रस्ताव पर विद्युत नियामक आयोग द्वारा बिजली दरों में करीब 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गयी है, यह लगातार तीसरा साल था जब बिजली दरों में इजाफा किया गया है और इस तरह से यहाँ पिछले तीन सालों में बिजली दरों में करीब तीस प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की जा चुकी है. यह स्थिति तब है जबकि राज्य में बिजली का  उत्पादन मांग से अधिक हो रहा है और मध्यप्रदेश दूसरे राज्यों को भी बिजली उपलब्ध कराता है लेकिन फिर भी यहाँ लोग महंगी दरों पर बिजली खरीदने को मजबूर हैं तो इसकी वजह यह है कि मध्यप्रदेश सरकार प्राइवेट बिजली कंपनियों से महंगी दरों पर बिजली खरीद रही है. विपक्षी पार्टियां इसे देश का सबसे बड़ा बिजली घोटाला बता रही हैं, उनका आरोप है कि राज्य में भरपूर बिजली उपलब्ध होने के बावजूद सरकार ने प्राइवेट बिजली कंपनियों से महंगी दरों पर बिजली खरीदने का करार किया हुआ है. उनका आरोप है कि सरकार निजी कंपनियों से महंगी बिजली खरीदने के लिए खुद के बिजलीघरों को या तो बंद रख रही है या फिर उनसे नाममात्र का बिजली पैदा किया जा रहा है. दरअसल मध्यप्रदेश ऐसा राज्य है जहाँ लोगों ने बिजली उत्पादन के बड़े प्रोजेक्ट के चलते भरी कीमत चुकायी है. इसके लिये नर्मदा घाटी में ही दो सौ से ज्यादा बांध बनाये जा चुके हैं जिसके चलते लाखों लोगों को उनकी जगह से विस्थापित होने को मजबूर किया गया है. लेकिन इतनी बड़ी कीमत चुकाने के बावजूद यहाँ बनायी गयी बिजलीघरों  का क्षमता से बहुत कम उपयोग किया जा रहे है.
इधर मध्यप्रदेश सरकार का चुटका परमाणु प्लांट भी सवालों के घेरे में है, मध्यप्रदेश सरकार मंडला जिले के चुटका में बिजली के लिये परमाणु प्लांट बना रही है जिसकी क्षमता 1400 मेगावाट होगी लेकिन स्थानीय लोग इस परियोजना का भारी विरोध कर रहे हैं. विरोध करने वालों का कहना है कि प्लांट से बड़ी संख्या में लोग विस्थापित तो होंगें ही लेकिन इसके साथ ही परमाणु बिजली-घर पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित भी नहीं है. अब सवाल उठता है कि ज्यादा बिजली होने के बावजूद इस तरह का रिस्क लेने की क्या जरूरत है जिससे पर्यावरण की क्षति हो और हजारों लोगों को आपनी जगह से उजाड़ना पड़े.
मध्यप्रदेश प्राकृतिक संसाधनों के मामले में बहुत धनी है  यहाँ नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा स्रोतों की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं जिसपर ध्यान देने की जरूरत है. मध्य प्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर काम शुरू करने वाले शुरआती राज्यों में से एक है जिसकी शुरुआत 2009 में की गयी थी, साल 2010 में मध्यप्रदेश में नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग के रूप में एक स्वतंत्र मंत्रालय का  गठन किया गया जिसके बाद से प्रदेश में नवकरणीय ऊर्जा के विकास का रास्ता खुला है. वर्तमान में नवकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में कुल 3200 मेगावॉट ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है. देश की सबसे बड़ी 130 मेगावॉट की सौर परियोजना नीमच जिले में स्थापित की जा चुकी है. इस साल अप्रैल में  मध्यप्रदेश सरकार ने तीन निजी कंपनियों के साथ मिलकर  रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्रोजेक्ट पर अनुबंध किया है इसके  तहत करीब  5,000 करोड़ की लागत से 750 मेगावॉट की उत्पादन क्षमता का सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया जायेगा. सरकार द्वारा दावा किया जा रहा है कि इस सोलर प्लांट से 2 रुपए 97 पैसे के टैरिफ पर बिजली मिलेगी. इसके 2018 के अंत तक शुरू हो जाने की सम्भावना है .
 एसडीजी 7 इस बात की वकालत करता है कि ऊर्जा क्षेत्र में नवीकरणीय ही एकमात्र रास्ता  है जिससे  भविष्य को नुकसान पहुचाये बिना तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता है. यह आर्थिक विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की मांग करता है. जरूरत इस बात की है कि भारत और चीन जैसे उभरते देश इस क्षेत्र में अपनी दक्षता को हासिल करें और इसके लिए सस्ती तकनीक के आविष्कार की तरफ भी ध्यान दें.

डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
6 जून, 1984 की घटना ने हिन्दुस्तान के सृजन को बाधित करते हुए पाकिस्तान बनने के बाद राष्ट्र के अंदर ही एक नया राष्ट्र रचने की बात शुरू की थी, यह घटना आज़ाद हिंदुस्तान के इतिहास की सबसे अहम घटनाओं में से एक है| इसे स्वार्थगत राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और गलत रणनीति का नतीजा भी माना जाता है| संभवत: पहली बार भारत में फौज के अपने देश के लोगों के ख़िलाफ़ लड़ने की यह घटना है|  यह सेना के दो बड़े अफसरों की दास्तां भी है जो कभी एक साथ देश के लिए लड़े थे और फिर एक दूसरे के खिलाफ़ लड़े| यह पंजाब के सबसे दुर्दांत आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले के खात्मे की घटना है जिसकी परिणिति इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में हुई थी|
20वीं सदी के पूर्वार्ध के दौरान पंजाब में कम्युनिस्ट पार्टी का बोलबाला था, दूसरे विश्व युद्ध के बाद पार्टी के गंगाधर अधिकारी ने ‘सिख होमलैंड’ का नारा बुलंद किया, जिनमे अधिकारी एक रसायन विज्ञानी थे जिन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन और मार्क्स प्लांक जैसे महान वैज्ञानिकों के साथ काम किया था|
चर्चित पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह ने अपनी किताब ‘सिखों का इतिहास’ में स्पष्ट: लिखा है कि सिखों में ‘अलग राज्य’ की कल्पना हमेशा से ही थी| रोज़ की अरदास के बाद गुरु गोविंद सिंह का ‘राज करेगा खालसा’ नारा लगाया जाता है, इस नारे ने अलग राज्य के ख्व़ाब को हमेशा जिंदा रखा| खुशवंत आगे लिखते हैं, ‘सिख नेताओं ने कहना शुरू कर दिया था कि अंग्रेज़ों के बाद पंजाब पर सिखों का हक है.’ लेकिन आजादी के बाद हुए विभाजन ने उनकी ‘अलग राज्य’ की उम्मीदों को धूमिल कर दिया था|

आजादी के बाद जब भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन हुआ तो अकाली दल ने पंजाबी भाषी इलाके को ‘पंजाब सूबा’ घोषित करवाने की मांग रख दी| उधर जनसंघ पार्टी के पंजाबी हिंदू नेताओं ने आंदोलन चलाकर पंजाबी हिंदुओं को गुरमुखी के बजाए हिंदी भाषा अपनाने को कहा, यहीं से हिंदुओं और सिखों के बीच की खाई गहरी होने लग गयी|
देश के अंदर देश
विभिन्न राजनैतिक मंशाओं या कूटनीतियों ने जनता को बरगलाकर अपने धर्म, जाति, वर्ग, भाषा और जनसंख्या के आधार पर अलग राष्ट्र, अलग ध्वज, अलग प्रधानमंत्री यहाँ तक कि अलग संविधान और अलग सत्ता तक की माँग करना शुरू कर दी | इसकी शुरुआत तो वैसे पंजाब के भींडरवाला और कर्नाटक से हुए| परंतु तत्कालीन नेतृत्व ने उस माँग को ज़्यादा पनपने नहीं दिया किंतु वर्तमान में स्थितियाँ विकट होती जा रही हैं | अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर गर्माती राजनीति देखते हुए अब पृथक गोरखालैंड का मुद्दा भी तेज हो गया है| दार्जीलिंग के पर्वतीय क्षेत्र में आंदोलन चला रही गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने बीच में 72 घंटे के बंद का आह्वान किया था, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का कहना है कि अगर अलग तेलंगाना राज्य की मांग पूरी की जाती है, तो अलग गोरखालैंड की उनकी पुरानी मांग भी पूरी की जानी चाहिए|
गोरखालैंड की माँग
पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्सों को मिलाकर गोरखालैंड बनाने की माँग ने 1980 के दशक में ज़ोर पकड़ा था|अलग राज्य की मांग में मुख्य रूप से दार्जीलिंग की पहाड़ियों के अलावा उससे लगे सिलीगुड़ी के इलाक़े भी थे, उस समय सुभाष घीसिंग ने गोरखालैंड नेशनल लिबरेशन फ़्रंट या जीएनएलएफ़ नाम के संगठन की स्थापना की| उनके आंदोलन ने हिंसक रूप भी लिया, जिसकी वजह से तत्कालीन सरकार ने आंदोलन को दबाने की कोशिश की, नतीजा ये हुआ कि उस क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां ठप होने लगीं|
आठ साल बाद पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार दार्जीलिंग की पहाड़ियों के इलाक़े को अर्द्धस्वायत्तशासी क्षेत्र के बतौर मान्यता देने को राज़ी हुई और अगस्त 1988 में दार्जीलिंग गोरखालैंड पर्वतीय परिषद की स्थापना हुई,परिषद के पहले चुनाव में घीसिंग को जीत मिली और वह परिषद के चेयरमैन नियुक्त हुए|
कर्नाटक के अपने अलग क्षेत्रीय झंडे के प्रस्ताव को विधानसभा चुनावों की ज़मीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, यह प्रस्ताव फ़िलहाल शुरुआती स्तर पर ही है| याचिकाकर्ताओं के एक समूह के सवालों के जवाब में राज्य सरकार ने राज्य के लिए "क़ानूनी तौर पर मान्य झंडे का डिज़ाइन तैयार" करने के लिए अधिकारियों की एक समिति तैयार की थी| जबकि भारत में जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय किसी अन्य राज्य के पास अपना झंडा नहीं है. जम्मू-कश्मीर के पास धारा 370 के तहत अपना अलग झंडा है|
दिलचस्प बात यह है कि याचिका 2008-09 के बीच उस वक्त दायर की गई थी जब कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी, उस वक्त भाजपा सरकार ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया था कि राज्य का अलग झंडा होना देश की एकता और अखंडता के ख़िलाफ़ है| अपनी उसी दलील पर कायम रहते हुए भाजपा ने इसे राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाया है, पहले ऐसा लगा कि केंद्र में मौजूद कांग्रेस नेतृत्व इस पर असमंजस की स्थिति में रही|

एक तरफ अखंड राष्ट्र का दिवा स्वप्न और दूसरी तरफ भाषा में समन्वय  नहीं, राष्ट्र के लोगो में आपसी समन्वय नहीं | यह केवल राजनैतिक आकाओं का ही षड्यंत्र नहीं बल्कि जनता को झाँसे में आने का कारण भी भावनाएँ हैं |
राजनीति हमेशा से ही मतदाताओं को लुभाने के चक्कर में राष्ट्र को तोड़ने का ख्वाब जनमत में पैदा कर ही देती हैं, जनमानस अपने विवेक का उपयोग करने के बजाए राजनैतिक आकाओं का 'यूजसड टूल' या कहे' कट्पुतली' बन कर हिस्सेदार बन जाता हैं, जबकि अपने ही राष्ट्र में कितने टुकड़े और होंगे इस बात से वो बाख़बर हैं |
भाषा के आधार पर जो जहर देश के विभिन्न राज्यों में फैलाया जा रहा हैं उसके समाधान के तौर पर देश में संशोधित त्रिभाषा सिद्धांत लागू करना ही होगा, जिसमें १. राष्ट्रभाषा २. मातृभाषा और ३. अंतराष्ट्रीय भाषा या कहे वैश्विक भाषा| इस राष्ट्र के सम्मान की सूचक और जनमानस में संपर्क भाषा के तौर पर स्थापित जनभाषा हिन्दी जिसको बोलने वालों की संख्या भारत में लगभग ५० प्रतिशत से अधिक हैं, उसे राष्ट्रभाषा घोषित करें ताकि देश की एक संपर्क और अनिवार्य भाषा हो| इसी के साथ हर राज्य की मातृभाषा भी अनिवार्य शिक्षा और राजकीय कार्यव्यवहार में सम्मिलित हो | केंद्र व राज्य सरकारें अनुवादकों को कार्य हेतु रोज़गार भी प्रदान करें और भाषाओं का आपस में समन्वय भी हो |
जबतक भाषाओं के साथ लोगो का आपसी समन्वय नहीं होता तब तक राष्ट्र में हमेशा से ही विखंडन का डर जिंदा रहेगा और हर बार 'भारत तेरे टुकड़े होंगे ......" जैसे नारे देश के अंदर ही लगते रहेंगे | भाषा के आधार पर विखंडन से बचने के लिए त्रिभाषा सिद्धांत ही सर्वश्रेष्ठ हैं | इसके साथ ही उदार हृदय का परिचय देते हुए लोगों को राष्ट्रभाषा को स्वीकारना होगा | और मातृभाषा के साथ-साथ वैश्विक भाषा के तौर पर अँग्रेज़ी या अन्य प्रसिद्ध भाषा को भी जीवन में शामिल करना होगा | वरना विकास हमेशा बाधित ही होगा| क्योंकि हम चाह कर भी मातृभाषा यानी भारतीय भाषाओं में बैर कर के राष्ट्र के अखंडित होने की कल्पना नहीं कर सकते |
भारत में जातिगत, वर्णगत, भाषागत मसलों में हो रही राजनीति को जनता की शिक्षा और विवेक ही बचा सकता हैं वरना हमेशा की तरह देश छला जाएगा और नए भारत को खंड खंड में विभक्त होने से कोई रोक नहीं पाएगा |
भारत एक बहूभाषी राष्ट्र हैं, इसमें सभी भाषाओं का सम्मान समान रूप से होना भी चाहिए साथ जो भाषा देश के बड़े हिस्से में बोली जाती है उसे राष्ट्रभाषा का ओहदा देना भी आवश्यक हैं | क्योंकि शासकीय कामों से लगाकर अन्य क्षेत्र जैसे वकालत, पर्यटन, रोज़गार आदि क्षेत्रों में बहुभाषी प्रांत के लोगो साथ-साथ हिन्दी भाषियों की बाहुलता भी रहेगी और देश में त्रिभाषी सिद्धांत से सभी भाषाओं का सम्मान भी यथावत रहेगा | न अँग्रेज़ी का विरोध न भारतीय भाषाओं का | सभी का विकास समान रूप से चलेगा, जिससे राष्ट्र भी टुकड़ों में बंटने से सुरक्षित रहेगा |
(लेखक डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं)

डॊ. सौरभ मालवीय
सामाजिक समता, सामाजिक न्याय, सामाजिक अभिसरण जैसे समाज परिवर्तन के मुद्दों को प्रमुखता से स्वर देने और परिणाम तक लाने वाले प्रमुख लोगों में डॊ. भीमराव आंबेडकर का नाम अग्रणीय है. उन्हें बाबा साहेब के नाम से जाना जाता है. एकात्म समाज निर्माण, सामाजिक समस्याओं, अस्पृश्यता जैसे सामजिक मसले पर उनका मन संवेदनशील एवं व्यापक था.  उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ऊंच-नीच, भेदभाव, छुआछूत के उन्मूलन के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया.  वे कहा करते थे- एक महान आदमी एक आम आदमी से इस तरह से अलग है कि वह समाज का सेवक बनने को तैयार रहता है.

4 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू में जन्मे भीमराव आंबेडकर रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की चौदहवीं संतान थे. वह हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे. इसके कारण उनके साथ समाज में भेदभाव किया जाता था. उनके पिता भारतीय सेना में सेवारत थे. पहले भीमराव का उपनाम सकपाल था, लेकिन उनके पिता ने अपने मूल गांव अंबाडवे के नाम पर उनका उपनाम अंबावडेकर लिखवाया, जो बाद में आंबेडकर हो गया.
पिता की स्वानिवृति के बाद उनका परिवार महाराष्ट्र के सतारा में चला गया. उनकी मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया और बॉम्बे में जाकर बस गए. यहीं उन्होंने शिक्षा ग्रहण की. वर्ष 1906 में मात्र 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह नौ वर्षीय रमाबाई से कर दिया गया. वर्ष 1908 में उन्होंने बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की. विद्यालय की शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने बॉम्बे के एल्फिनस्टोन कॉलेज में दाखिला लिया. उन्हें गायकवाड़ के राजा सहयाजी से 25 रुपये मासिक की स्कॉलरशिप मिलने लगी थी.
वर्ष 1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान व अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि ली.  इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका चले गए. वर्ष 1916 में उन्हें उनके एक शोध के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया. इसके बाद वह लंदन चले गए, किन्तु उन्हें बीच में ही लौटना पड़ा. आजीविका के लिए इस समयावधि में उन्होंने कई कार्य किए. वह मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्राध्यापक भी रहे. इसके पश्चात एक बार फिर वह इंग्लैंड चले गए. वर्ष 1923 में उन्होंने अपना शोध ’रुपये की समस्याएं’ पूरा कर लिया. उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा ’डॉक्टर ऑफ साईंस’ की उपाधि प्रदान की गई.  उन्हें ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया. स्वदेश वापस लौटते हुए भीमराव आंबेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके और बॉन विश्वविद्यालय में  उन्होंने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन जारी रखा. उन्हें  8 जून, 1927 कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी प्रदान की गई.

भीमराव आंबेडकर को बचपन से ही अस्पृश्यता से जूझना पड़ा. विद्यालय से लेकर नौकरी करने तक उनके साथ भेदभाव किया जाता रहा.  इस भेदभाव और निरादर ने उनके मन को बहुत ठेस पहुंचाई. उन्होंने छूआछूत के समूल नाश के लिए कार्य करने का प्रण लिया. उन्होंने कहा कि नीची जाति व जनजाति एवं दलित के लिए देश में एक भिन्न चुनाव प्रणाली होनी चाहिए. उन्होंने देशभर में घूम-घूम कर दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और लोगों को जागरूक करने का कार्य किया. उन्होंने एक समाचार-पत्र ‘मूक्नायका’ (लीडर ऑफ़ साइलेंट) प्रारंभ किया. एक बार उनके भाषण से प्रभावित होकर कोल्हापुर के शासक शाहूकर ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, जिसकी देशभर में चर्चा हुई. इस घटना ने भारतीय राजनीति को एक नया आयाम दिया.

वर्ष 1936 में भीमराव आंबेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना की. अगले वर्ष 1937 के केन्द्रीय विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 15 सीटों पर विजय प्राप्त की. उन्होंने इस दल को ऒल इंडिया शिड्यूल कास्ट पार्टी में परिवर्तित कर दिया. वह वर्ष 1946 में संविधान सभा के चुनाव में खड़े हुए, किन्तु उन्हें असफलता मिली. वह रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे. वह देश के पहले कानून मंत्री बने. उन्हें संविधान गठन समिति का अध्यक्ष बनाया गया.

भीमराव आंबेडकर समानता पर विशेष बल देते थे. वह कहते थे- अगर देश की अलग अलग जाति एक दुसरे से अपनी लड़ाई समाप्त नहीं करेंगी, तो देश एकजुट कभी नहीं हो सकता. यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए. हमारे पास यह आजादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें, जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरी है जो हमारे मौलिक अधिकारों के विरोधी हैं. एक सफल क्रांति के लिए केवल असंतोष का होना ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए न्याय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत आवश्यक है. राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और जो सुधारक समाज की अवज्ञा करता है, वह सरकार की अवज्ञा करने वाले राजनीतिज्ञ से ज्यादा साहसी हैं. जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके किसी काम की नहीं.यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए.

भीमराव आंबेडकर का बचपन परिवार के अत्यंत संस्कारी एवं धार्मिक वातावरण में बीता था. उनके घर में रामायण, पाण्डव प्रताप, ज्ञानेश्वरी व अन्य संत वांग्मय के नित्य पाठन होते थे, जिसके कारण उन्हें श्रेष्ठ संस्कार मिले. वह कहते थे- मैं एक ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारा सिखाये. वर्ष 1950 में वह एक बौद्धिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका गए, जहां वह बौद्ध धर्म से अत्यधिक प्रभावित हुए. स्वदेश वापसी पर उन्होंने बौद्ध व उनके धर्म के बारे में पुस्तक लिखी. उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया. उन्होंने वर्ष 1955 में भारतीय बौध्या महासभा की स्थापना की. उन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 को एक आम सभा का आयोजन किया, जिसमें उनके पांच लाख समर्थकों ने  बौद्ध धर्म अपनाया. इसके कुछ समय पश्चात 6 दिसम्बर, 1956 को दिल्ली में उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार बौद्ध धर्म की रीति के अनुसार किया गया. वर्ष 1990 में मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान  भारत रत्न से सम्मानित किया गया. कई भाषाओं के ज्ञाता बाबासाहब ने अनेक पुस्तकें भी लिखी हैं.

बाबासाहब ने जीवनपर्यंत छूआछूत का विरोध किया. उन्होंने दलित समाज के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरहानीय कार्य किए. वह कहते है कि आप स्वयं को अस्पृस्य न मानें, अपना घर साफ रखें.  पुराने और घिनौने रीति-रिवाजों को छोड़ देना चाहिए.
निसंदेह, देश उनके योगदान को कभी भुला नहीं पाएगा.

डॊ. सौरभ मालवीय
बैसाखी ऋतु आधारित पर्व है. बैसाखी को वैसाखी भी कहा जाता है. पंजाबी में इसे विसाखी कहते हैं. बैसाखी कृषि आधारित पर्व है. जब फ़सल पक कर तैयार हो जाती है और उसकी कटाई का काम शुरू हो जाता है, तब यह पर्व मनाया जाता है. यह पूरी देश में मनाया जाता है, परंतु पंजाब और हरियाणा में इसकी धूम अधिक होती है. बैसाखी प्रायः प्रति वर्ष 13 अप्रैल को मनाई जाती है, किन्तु कभी-कभी यह पर्व 14 अप्रैल को भी मनाया जाता है.

यह सिखों का प्रसिद्ध पर्व है. जब मुगल शासक औरंगजेब ने अन्याय एवं अत्याचार की सभी सीमाएं तोड़कर  श्री गुरु तेग बहादुरजी को दिल्ली में चांदनी चौक पर शहीद किया था, तब इस तरह 13 अप्रैल,1699 को श्री केसगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की थी. सिखो के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव का जन्म इसी महीने में हुआ था. सिख इसे सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं. गोविंद सिंह जी ने निम्न जाति के समझे जाने वाले लोगों को एक ही पात्र से अमृत छकाकर पांच प्यारे सजाए, जिन्हें पंज प्यारे भी कहा जाता है. ये पांच प्यारे किसी एक जाति या स्थान के नहीं थे. सब अलग-अलग जाति, कुल एवं अलग स्थानों के थे. अमृत छकाने के बाद इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगा दिया गया.
इस दिन श्रद्धालु अरदास के लिए गुरुद्वारों में जाते हैं. आनंदपुर साहिब में मुख्य समारोह का आयोजन किया जाता है. प्रात: चार बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोहपूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है. फिर दूध और जल से प्रतीकात्मक स्नान करवाया जाता है. इसके पश्चात गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर बिठाया जाता है. इस अवसर पर पंज प्यारे पंजबानी गाते हैं. दिन में अरदास के बाद गुरु को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है. प्रसाद लेने के बाद श्रद्धालु गुरु के लंगर में सम्मिलत होते हैं. इस दिन श्रद्धालु कारसेवा करते हैं. दिनभर गुरु गोविंदसिंह और पंज प्यारों के सम्मान में शबद और कीर्तन गाए जाते हैं.
शाम को आग के आसपास इकट्ठे होकर लोग नई फ़सल की की खुशियां मनाते हैं और पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है.

बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है. हिन्दुओं के लिए भी बैसाखी का बहुत महत्व है. पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना इसी दिन की थी.  इसी दिन अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था. राजा विक्रमादित्य ने विक्रमी संवत का प्रारंभ इसी दिन से किया था, इसलिए इसे विक्रमी संवत कहा जाता है. बैसाखी के पावन पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है. महादेव और दुर्गा देवी की पूजा की जाती है. इस दिन लोग नये कपड़े पहनते हैं. वे घर में मिष्ठान बनाते हैं. बैसाखी के पर्व पर लगने वाला बैसाखी मेला बहुत प्रसिद्ध है. जगह-जगह विशेषकर नदी किनारे बैसाखी के दिन मेले लगते हैं. हिंदुओं के लिए यह पर्व नववर्ष की शुरुआत है. हिन्दू इसे स्नान, भोग लगाकर और पूजा करके मनाते हैं.

डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
विविधताओं में एकता की परिभाषा से अलंकृत राष्ट्र यदि कोई हैं तो भारत के सिवा दूसरा नहीं | यक़ीनन इस बात में उतना ही दम हैं जितना भारत के विश्वगुरु होने के तथ्य को स्वीकार करने में हैं | भारत संस्कृतिप्रधान और विभिन्न जाति, धर्मों, भाषाओं, परिवेश व बोलियों को साथ लेकर एक पूर्ण गणतांत्रिक राष्ट्र बना | इसकी परिकल्पना में ही सभी धर्म, पंथ, जाति और भाषाओं का समावेश हैं |
जिस राष्ट्र के पास अपनी २२ संवैधानिक व अधिकारिक भाषाएँ हों, जहां पर कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदलने की बात कही जाती है, जहां लगभग १७९ भाषाओं ५४४ बोलिया हैं बावजूद इसके राष्ट्र का राजकाज एक विदेशी भाषा के अधिकनस्थ और गुलामी की मानसिकता के साथ हो रहा हो यह तो ताज्जुब का विषय हैं | स्वभाषाओं के उत्थान हेतु न कोई दिशा हैं न ही संकल्पशक्ति | भारतीय भाषाएं अभी भी विदेशी भाषाओं के वर्चस्व के कारण दम तोड़ रही रही हैं | एक समय आएगा जब देश की एक भाषा हिन्दी तो दूर बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं की भी हत्या हो चुकी होगी | इसलिए राष्ट्र के तमाम भाषा हितैषियों को भारतीय भाषाओं में समन्वय बना कर हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाना होगा और अंतर्राज्यीय कार्यों को स्थानीय भाषाओं में करना होगा | अँग्रेजियत की गुलाम मानसिकता से जब तक किनारा नहीं किया जाता भारतीय भाषाओं की मृत्यु तय हैं| और हिन्दी को इसके वास्तविक स्थान पर स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि इसकी स्वीकार्यता जनभाषा के रूप में हो | यह स्वीकार्यता आंदोलनों या क्रांतियों से नही आने वाली है | इसके लिए हिन्दी को रोजगारपरक भाषा के रूप में विकसित करना होगा क्योंकि भारत विश्व का दूसरा बड़ा बाजार हैं और बाजारमूलक भाषा की स्वीकार्यता सभी जगह आसानी से हो सकती हैं | साथ ही अनुवादों और मानकीकरण के जरिए इसे और समृद्धता और परिपुष्टता की ओर ले जाना होगा |
हमारे राष्ट्र को सृजन की ऐसी आधारशिला की आवश्यकता हैं जिससे हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओँ के उत्थान के लिए एक ऐसा सृजनात्मक द्दष्टिकोण विकसित हो जो न सिर्फ हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओँ को पुष्ट करेगा बल्कि उन भाषाओ को एक दूसरे का पूरक भी बनाएगा| इससे भाषा की गुणवता तो बढ़ेगी ही उसकी गरिमा फिर से स्थापित होगी| आज के दौर में हिन्दी को लेकर जो नकारात्मकता चल रही है उसे सकारात्मक मूल्यों के साथ संवर्धन हेतु प्रयास करना होगा|
भारतीय राज्यों में समन्वय होने के साथ-साथ प्रत्येक भाषा को बोलने वाले लोगो के मन में दूसरी भाषा के प्रति भरे हुए गुस्से को समाप्त करना होगा | जैसे द्रविड़ भाषाओं का आर्यभाषा,नाग और कोल भाषाओं से समन्वय स्थापित नहीं हो पाया, उसका कारण भी राजनीति की कलुषित चाल रही, अपने वोटबैंक को सहेजने के चक्कर में नेताओं ने भाषाओं और बोलियों के साथ-साथ लोगो को भी आपस में मिलने नहीं दिया | इतना बैर दिमाग़ में भर दिया कि एक भाषाई दूसरे भाषाई को अपना निजी शत्रु मानने लग गया, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था| हर भारतवंशीय को स्वभाषा का महत्व समझा कर देश की एक केंद्रीय संपर्क भाषा के लिए तैयार करना होगा. क्योंकि विश्व पटल पर भारत की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं हैं, विविधताओं के बावजूद भी भारत की साख में केवल राष्ट्रभाषा न होना भी एक रोड़ा हैं| हर भारतीय को चाहना होगा एक संपर्क भाषा वरना दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर रोटी खा जाएगा, मतलब साफ है कि यदि हमारी भारतीय भाषाओं के बीच हो लड़ाई चलती रही तो स्वभाविक तौर पर अँग्रेज़ी उस स्थान को भरेगी और आनेवाले समय में एक अदने से देश में बोली जाने वाली भाषा जिसे विश्व में भी कुल ७ प्रतिशत से ज़्यादा लोग नहीं बोलते भारत की राष्ट्रभाषा बन जाएगी |
स्वभाषाओं के बीच समन्वय का सबसे बेहतर विकल्प हैं- अंतर्राज्यीय भाषा सम्मेलन व परिचर्चा | भारत के प्रत्येक वर्चस्वशील भाषाओं के बीच में साहित्यिक समन्वय से शुरुआत की जा सकती हैं | जैसे एक कवि सम्मेलन में तमिल, तेलगु, मलयाली भाषा के कवियों को आमंत्रित किया जाए और साथ में एक-एक हिन्दी अनुवादक लाए जाए जो तमिल की रचना को हिन्दी में सुनाए और हिन्दी की रचना को तमिल आदि भाषा में | साथ में भाषाओं के बोलने वालों के बीच समन्वय हेतु चर्चाओं का दौर शुरू हो, एक-दूसरे को स्वभाषा का सम्मान  बताया जाए, कमियाँ न गिना कर समन्वय की स्थापना की जाए | जब यह कार्य वृहद स्तर पर होने लगेगा तो निश्चित तौर पर हिन्दी राष्ट्र की जनभाषा का दर्जा पुन: प्राप्त कर लेगी और राष्ट्रभाषा बनने की कठिनाई भी दूर होगी|
साथ-साथ जनता में भाषा को लेकर राजनैतिक दूषिता को भी दूर करना होगा | एक भाषा की स्वीकार्यता के लिए सभी स्वभाषाओं का सम्मान करना सबसे आवश्यक कदम है | देश के २९ राज्यों और ७ केंद्रशासित राज्यों में भाषा की एकरूपता और स्वीकार्यता बहुत आवश्यक हैं | जनभाषा बनने के लिए हिन्दी भाषियों को भी विशाल हृदय का परिचय देते हुए अन्य भाषी समाज को स्वीकारना होगा तो अन्य भाषाओं के लोगों को हिन्दी भाषियों के साथ भी समन्वय रखना होगा| इसमे शासकीय भूमिका और मंशा भी महत्वपूर्ण कड़ी है | अन्यथा जनता की स्वीकारता को सरकार कमजोर भी कर सकती है यदि उनकी मंशा नहीं हैं तो | फिर भी जनतंत्र में जनता से बड़ी कोई इकाई नहीं हैं | जहाँ जनमत चाहेगा की एक भाषा हो, हिन्दी हमारी राष्ट्र की प्रतिनिधि भाषा हो तब सरकार को भी झुकना होगा | 'एक साधे-सब सधे' के सूत्र से राष्ट्र में भाषा क्रांति का सूत्रनाद संभव हैं, अन्यथा ढाक के तीन पात|
राजनीति से बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि इन्हीं राजनैतिक छल-प्रपंचों ने हिन्दी को अभी तक स्वाभिमान नहीं दिलाया | इन्ही पर किसी शायर का एक शेर है –
'गर चिरागों की हिफ़ाज़त फिर इन्हें सौंपी गई,
तो रोशनी के शहर में बस अंधेरा ही रह जाएगा…’
(लेखक डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं)

पत्रकार, लेखिका व शायरा फ़िरदौस ख़ान ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर एक गज़ल लिखी है. इस ग़ज़ल में राहुल गांधी के वजूद का अक्स झलकता है. ये ग़ज़ल उन्होंने राहुल गांधी को समर्पित की है. कांग्रेस अध्यक्ष और उनके चाहने वालों को ये ग़ज़ल ज़रूर पसंद आएगी.
ग़ज़ल
भारत की मुहब्बत ही इस दिल का उजाला है
आंखों में मेरी बसता एक ख़्वाब निराला है

बेटा हूं मैं भारत का, इटली का नवासा हूं
रिश्तों को वफ़ाओं ने हर रूप में पाला है

राहों में सियासत की, ज़ंजीर है, कांटें हैं
सुख-दुख में सदा मुझको जनता ने संभाला है

धड़कन में बसा मेरी, इस देश की गरिमा का
मस्जिद कहीं, गिरजा कहीं, गुरुद्वारा, शिवाला है

बचपन से ले के अब तक ख़तरे में जां है, लेकिन
दुरवेशों की शफ़क़त का इस सर पे दुशाला है

नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है

पतझड़ में, बहारों में, फ़िरदौस नज़ारों में
हर दौर में देखोगे राहुल ही ज़ियाला है
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ : दुरवेश- संत,  अदावत- शत्रुता, अख़लाक़- संस्कार,  फ़िरदौस- स्वर्ग, ज़ियाला- उजाला


प्रभुनाथ शुक्ल 
सर्वोच्च अदालत की तरफ़ से अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिनियम पर एक फैसला आया है। लेकिन फैसले पर राजनीति शुरु हो गई है। आखिर क्यों ? फैसले में बुराई क्या है । लेकिन कथित दलित हिमायती और राजनेताओं को अपच होने लगी है। उन्हें ऊना तो दिखता है लेकिन भीमा कोरेगाँव नहीँ। दलितों और आदिवासियों को समाज की अगड़ी और समर्थ जातियों के प्रकोप से बचाने के लिए आज से लगभग तीस साल पहले यह क़ानून बनाया गया था। दलितों और आदिवासियों को सार्वजनिक अपमान और मारपीट से बचाने के लिए 1989 में यह कानून बनाया गया।  सुप्रीम कोर्ट का ये ताज़ा फ़ैसला डॉक्टर सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य और एएनआर मामले में आया है। मामला महाराष्ट्र का है जहां अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ इस क़ानून के अंतर्गत मामला दर्ज कराया था।

हमारे समाज में दलित और आरक्षण बेहद संवेदशील मसला है। इस पर जुबान खुली नहीँ की सियासतदां राजनीतिक रोटिया सेंकनी शुरु कर देते हैं और पूरी कोशिश रहती है की आग लगा किसी तरह समाज को बांट सत्ता हथियायी जाय। यानी आरक्षण और दलित आंदोलन एक तरह से सत्ता की चाबी भी है। ऐसा लगता है की दलितों और आदिवासियों की चिंता सिर्फ राजनीतिक दलों और राजनेताओं को है बाकि समाज इस पर मौन है। राजनीति के लिए दलित विमर्श बेहद खास है, लेकिन यह खोखला और बनावटी है। स्थिति यहाँ तक है कि आरक्षण और दलित जैसे विषयों पर चर्चा करना भी गुनाह है। दलितों की सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा के साथ संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए तमाम कानून बने और बनाए गए। इसके अलावा आजादी के बाद संविधान में कई संशोधन कर अनगिनत कड़े कानून भी बनाए गए हैं।  लेकिन वह कितने असर कारक हैं कहना मुश्किल है। इस तरह के कानून में दलितों को सामाजिक सुरक्षा और समानता का अधिकार उन्हें भले न दिला पाए हों लेकिन लोगों में कानूनी भय पैदा करने में सफल रहे हैं। हालांकि इसका व्यापक दुरपयोग भी हुआ है और सियासी लाभ के लिए इसे हथियार के रुप में इस्तेमाल किया गया। हालांकि दलितों के हितरक्षा वाले इन कानूनों का खुला दुरपयोग हो रहा है, जिसकी वजह से समाज में खाई बढ़ रही है। यहीं वजह है की सुप्रीमकोर्ट को समाज की वर्तमान ज़रूरत
को देखते हुए फ़ैसला सुनना पड़ा है।

काँग्रेस और दूसरे दल इस पर राजनीति शुरु कर दिए हैं। ऐसा लगने लगा है कि इस कानून के बाद दलित अब देश में रह नहीँ पाएंगे। उनका उत्पीड़न और तीखा हो जाएगा। अफसोस अदालत अगर एससी और एसटी एक्ट पर फांसी की सजा मुकर्रर करती तो भी इस पर राजनीति होती। क्योंकि सवाल राजनीति का है। अब तक जितने भी कानून बने हैं क्या वे अपराध रोकने में सक्षम हैं । क्या तमाम कानूनों के बाद विभिन्न जाति - धर्म , सम्प्रदाय के खिलाफ अपराध कम हुए हैं। देश के कई राज्यों में बलात्कार के खिलाफ फांसी की सजा का कानून है फ़िर भी  क्या इस तरह की घटनाएं रुक गई हैं। अनूसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम अर्से से बना है फ़िर ऊना जैसी घटनाएं क्यों होती हैं ? सिर्फ कानून और संविधान से किसी के अधिकारों की रक्षा नहीँ हो सकती जब तक लोगों में सामाजिक जागरूकता नहीँ आएगी। दलित हों या पिछड़ा, ब्राह्मण  अथवा आम नागरिक सभी के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। संविधान के दायरे में समाजिक सुरक्षा , रीति रिवाज़ और परम्परा के साथ जीने की पूरी आजादी है। लेकिन समाजिक सुरक्षा और कानूनी आड़ में किसी कानून का गलत उपयोग किया जाय तो यह गलत है। अदालत ने फैसले में यह तो नहीँ कहा है कि इस अधिनियम को ही ख़त्म कर दिया जाय या फ़िर दलित उत्पीड़न के केस ही ना दर्ज़ किए जाएं । उसने तो इस कानून के गलत उपयोग पर चिंता जताते हुए फैसला सुनाया है। अदालत ने जो आदेश दिया है वह सांविधानिक अधिकारों के तहत है। यह व्यक्ति के हितों की रक्षा करने वाला है । इससे दलितों को भला क्या नुकसान होगा।

जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने कहा कि दलित उत्पीड़न का केस दर्ज़ होने के बाद सात दिनों के भीतर शुरुआती जांच ज़रूर पूरी हो जानी चाहिए। यह भी साफ किया है कि आरोपी की गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं है। आरोपी अगर  सरकारी कर्मचारी है तो उसकी गिरफ़्तारी के लिए उसे नियुक्त करने वाले अधिकारी की सहमति ज़रूरी होगी। दूसरी बात सरकारी कर्मचारी नहीं है तो गिरफ़्तारी के लिए सक्षम अधिकारी एसएसपी की सहमति ज़रूरी होगी। हालांकि अभी तक इस कानून में अग्रिम जमानत की सुविधा नहीँ थी,  लेकिन अदालत ने अपने आदेश में अग्रिम ज़मानत की इजाज़त दे दी है।  अदालत ने कहा कि पहली नज़र में अगर ऐसा लगता है कि कोई मामला नहीं है या जहां न्यायिक समीक्षा के बाद लगता है कि क़ानून के अंतर्गत शिकायत में बदनीयती की भावना है, वहां अग्रिम ज़मानत पर कोई रोक नहीं है। फैसले में अदालत ने एक बड़ी बात कहीं है जिसमें कहा है कि एससी और एसटी क़ानून का यह  मतलब नहीं कि जाति व्यवस्था जारी रहे क्योंकि ऐसा होने पर समाज में सभी को एक साथ लाने में और संवैधानिक मूल्यों पर असर पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि संविधान बिना जाति या धर्म के भेदभाव के सभी की बराबरी की बात करता है। यह संविधान में निहित भावना के साथ अन्याय होगा। ऐसी व्यवस्था में समाजिक एवं जातीय असमानता और बढ़ेगी। उस स्थिति में कानून  और संविधान का कोई मतलब नहीँ रह जाता ।

एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 में एसी- एसटी एक्ट में 15-16 प्रतिशत मामलों में पुलिस ने जांच के बाद क्लोज़र रिपोर्ट फ़ाइल कर दी। इसके अलावा अदालत में गए 75 प्रतिशत मामलों को या तो ख़त्म कर दिया गया, या उनमें अभियुक्त बरी हो गए। फ़िर इस तरह के आरोपों में कितनी सच्चाई है। अनुसूचित जाति-जनजाति क़ानून को और मज़बूत करने की माँग के लिए बनाए गए दलित संगठनों के एक राष्ट्रीय गठबंधन का कहना है कि देश में औसतन हर 15 मिनट में चार दलितों और आदिवासियों के साथ ज़्यादती की जाती है। रोज़ाना तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है, 11 दलितों की पिटाई होती है। हर हफ़्ते 13 दलितों की हत्या की जाती है और पाँच दलित घरों को आग लगा दी जाती है। जबकि छह दलितों का अपहरण कर लिया जाता है। संगठन के मुताबिक़ पिछले 15 बरसों में दलितों के ख़िलाफ़ ज़्यादती के साढ़े पाँच लाख से ज़्यादा मामले दर्ज किए गए। इस तरह देखें तो डेढ़ करोड़ दलित और आदिवासी प्रभावित हुए हैं। 2013 में दलितों पर ज़्यादती के 39,346 मुक़द्दमे दर्ज हुए थे। अगले साल ये आँकड़ा बढ़कर 40,300 तक पहुँचा।  फिर 2015 में दलितों के ख़िलाफ़ ज़्यादती के 38,000 से ज़्यादा मुक़दमे दर्ज हुए। दलितों के एक निकाय ने केंद्र से अपील की है कि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अधिनियम को लागू करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे। संगठन ने कहा कि कोर्ट के इस फैसले का सामाजिक न्याय की अवधारणा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जबकि बीजेपी सांसदों ने भी कोर्ट के फैसले को लेकर केंद्रीय सामजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत से मुलाकात की है। सांसदों ने गहलोत से इस मामले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रखने को कहा है। अन्याय किसी के साथ नहीँ होना नहीँ चाहिए। सभी के  हितों की कानूनी रक्षा होनी चाहिए। तभी हम समता मूलक समाज की स्थापना में अपनी सामजिक भूमिका निभा सकते हैं । संविधान पीठ को स्वतंत्र रुप से अपना कार्य करने दिया जाए। अदालती फैसलों पर राजनीति नहीँ होनी चाहिए।

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