फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.


चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.

कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वह ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया. ग़ौरतलब है कि श्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था.

श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था. श्री राजीव गांधी की मौत से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था. उन्होंने स्वर्गीय राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, मृत्यु शरीर का धर्म है. जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है. लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती, प्राकृतिक नहीं होती, ’जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती, जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है, जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है, एक षडतंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें. श्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है. एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है. शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो. लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा, जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो. यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती 'सद्भावना दिवस' और 'अक्षय ऊर्जा दिवस' के तौर पर मनाई जाती है, जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.

फ़िरदौस ख़ान
जिस देश में भूख से लोगों की मौतें होती हों, जहां करोड़ों लोग आज भी भूखे पेट सोते हों, ऐसे देश में सस्ता खाना मुहैया कराना बेहद ज़रूरी है. कर्नाटक सरकार ने राज्य को भूखमरी मुक्त बनाने के मक़सद से लोगों को सस्ता भोजन मुहैया कराने की एक सराहनीय योजना शुरू की है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कल बेंगलुरु के जयनगर वॉर्ड में इंदिरा कैंटीन का उद्घाटन किया. तमिलनाडु के अम्मा कैंटीन के तर्ज़ पर बने इस इंदिरा कैंटीन में 5 रुपये में नाश्ता और 10 रुपये में दिन और रात का खाना मिलेगा.  राहुल गांधी ने कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की इस पहल को ‘सभी को भोजन’ के कांग्रेस के संकल्प की ओर एक और क़दम बताया.  उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में बहुत से लोग बड़े घरों में रहते हैं और महंगी कारों से चलते हैं. उनके लिए खाना बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन यहां लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़्यादा पैसा नहीं है. इंदिरा कैंटीन इनकी सेवा करेगी. हम चाहते हैं कि शहर के सबसे ग़रीब और कमज़ोर तबक़े के लोग जानें कि वे भूखे नहीं रहने वाले. क़ैंटीन के भोजन की गुणवत्ता को परखने के लिए  उद्घाटन के बाद राहुल गांधी ने कैंटीन जाकर खाना भी खाया.

ग़ौरतलब है कि इस योजना के शुरुआती चरण में 101 कैंटीन खोली गई हैं. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का कहना है कि इस कैंटीन का शहर के ग़रीब पर पड़े अच्छे और बुरे प्रभाव का अध्ययन कर राज्य के अन्य शहरों और क़स्बों में भी इसी तरह के कैंटीन खोले जाएंगे. चालू वित्त वर्ष 2017-18 में सभी 198 वार्डों में कैंटीन चलाने के लिए 100 करोड़ रुपये के बजट में प्रावधान किया गया है. राज्य में हर महीने ग़रीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) को 'अन्न भाग्य योजना' के 7 किलोग्राम चावल मुफ़्त दिया जा रहा है, ताकि वे दो वक़्त भोजन कर सकें.

क़ाबिले-ग़ौर है कि देश की 32 फ़ीसद आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रही है. हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाज़ार में पड़ी गली-सड़ी सब्ज़ियां बटोर कर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं. महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कू़ड़ेदानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है. रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार की वजह से कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबाल कर पीने को मजबूर हैं. एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ लोग भूख से मर रहे होते हैं. कितने अफ़सोस की बात है कि देश में हर रोज़ क़रीब सवा आठ करोड़ लोग भूखे सोते हैं, जबकि हर साल लाखों टन अनाज सड़ जाता है. कुछ अरसा पहले अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख़ अपनाते हुए केंद्र सरकार से कहा था कि गेहूं को सड़ाने से अच्छा है, उसे ज़रूरतमंद लोगों में बांट दिया जाए. कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई थी कि एक तरफ़ इतनी बड़ी तादाद में अनाज सड़ रहा है, वहीं लगभग 20 करोड़ लोग कुपोषण का शिकार हैं. पिछले काफ़ी अरसे से हर साल लाखों टन गेहूं बर्बाद हो रहा है. बहुत-सा गेहूं खुले में बारिश में भीगकर सड़ जाता है, वहीं गोदामों में रखे अनाज का भी 15 फ़ीसद हिस्सा हर साल ख़राब हो जाता है. इतना ही नहीं, कोल्ड स्टोरेज के अभाव में हर साल हज़ारों करोड़ रुपये की सब्ज़ियां और फल भी ख़राब हो जाते हैं. अनाज ज़्यादा है और भंडारण क्षमता कम है. ऐसे में खुले में रखा अनाज खराब हो जाता है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक़, देश में 46 फ़ीसद बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. यूनिसेफ़ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के कुल कुपोषणग्रस्त बच्चों में से एक तिहाई आबादी भारतीय बच्चों की है. भारत में पांच करोड़ 70 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. विश्व में कुल 14 करोड़ 60 लाख बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं.

केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने खाद्यान्न उत्पादन में आई स्थिरता एवं बढ़ती जनसंख्या के खाद्य उपभोग को ध्यान में रखते हुए अगस्त 2007 में केंद्र प्रायोजित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना शुरू की थी. इसका मक़सद गेहूं, चावल एवं दलहन की उत्पादकता में वृद्धि लाना है, ताकि देश में खाद्य सुरक्षा की हालत को बेहतर किया जा सके. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत चावल की पैदावार बढ़ाने के लिए 14 राज्यों के 136 ज़िलों को चुना गया है. इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं. गेहूं की पैदावार बढ़ाने के लिए 9 राज्यों के 141 ज़िलों को चुना गया. इन राज्यों में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं पश्चिम बंगाल शामिल हैं. इसी तरह दलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए 14 राज्यों के 171 ज़िलों को चुना गया. इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल शामिल हैं. इस योजना के तहत इन ज़िलों के 20 मिलियन हेक्टेयर धान के क्षेत्र, 13 मिलियन हेक्टेयर गेहूं के क्षेत्र और 4.5 मिलियन हेक्टेयर दलहन के क्षेत्र शामिल किए गए हैं, जो धान एवं गेहूं के कुल बुआई क्षेत्र का 50 फ़ीसद है. दलहन के लिए अतिरिक्त 20 फ़ीसद क्षेत्र का सृजन किया जाएगा.

दरअसल, बढ़ती महंगाई और घटते रोज़गार ने निम्न आय वर्ग के लिए दो वक़्त की रोटी का भी संकट खड़ा कर दिया है. देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनके घर में उसी दिन चूल्हा जलता है, जिस दिन उन्हें कोई काम मिलता है. इसलिए रोज़गार के साधन बढ़ाए जाने चाहिए.  साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सरकारी राशन की दुकानों पर लोगों को उनके हिस्से का पूरा राशन मिले. बढ़ती महंगाई पर लोग लगना भी बेहद ज़रूरी है.  बहरहाल, ज़रूरतमंदों को सस्ता भोजन मुहैया कराने की इंदिरा कैंटीन एक सराहनीय योजना है. अन्य राज्यों में भी ऐसी ही कैंटीन खोली जानी चाहिए. 


फ़िरदौस ख़ान
दक्षिण भारत की कई अभिनेत्रियों ने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय की अपिट छाप छो़डी है. उनके सौंदर्य, नृत्य कौशल और अभिनय ने हिंदी सिनेमा के दर्शकों का मन मोह लिया और वे यहां भी उतनी ही कामयाब हुईं, जितनी दक्षिण भारतीय फिल्मों में. इन अभिनेत्रियों की लंबी फेहरिस्त है, जिनमें से एक नाम है वैजयंती माला का. वैजयंती माला में वह सब था, जो उन्हें हिंदी सिनेमा में बुलंदियों तक पहुंचा सकता था. बेहतरीन अभिनेत्री होने के साथ-साथ वह भरतनाट्यम की भी अच्छी नृत्यांगना रही हैं. फिल्म आम्रपाली में उनके नृत्य को शायद ही कोई भुला पाए. उनका अंदाज़ निराला रहा है. उन्होंने शास्त्रीय नृत्य के साथ वेस्टर्न डांस को मिलाकर नई नृत्य कला पेश की, जिसे दूसरी अभिनेत्रियों ने भी अपनाया.

वैजयंती माला का जन्म 13 अगस्त, 1936 को दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में एक आयंगर परिवार में हुआ था. उनकी मां वसुंधरा देवी तमिल फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध नायिका रही हैं. वैजयंती माला का बचपन धार्मिक माहौल में बीता. उनकी परवरिश उनकी नानी यदुगिरी देवी ने की. उन्हें अपने पिता एमडी रमन से बेहद लगाव रहा. क़रीब पांच साल की उम्र में वैजयंती माला को यूरोप जाने का मौक़ा मिला. मैसूर के महाराज के सांस्कृतिक दल में उनकी मां, पिता और नानी साथ गईं. यह 1940 का वाक़िया है. वेटिकन सिटी में वैजयंती माला को पोप के सामने नृत्य करने का मौक़ा मिला. उन्होंने अपने नृत्य प्रदर्शन से सबका मन मोह लिया. पोप ने एक बॉक्स में चांदी का मेडल देकर बच्ची की हौसला अ़फजाई की. इस दल ने पोप के सामने भी प्रदर्शन किया. वैजयंती माला ने गुरु अरियाकुडी रामानुज आयंगर और वझूवूर रमिआह पिल्लै से भरतनाट्यम सीखा, जबकि कर्नाटक संगीत की शिक्षा मनक्कल शिवराजा अय्यर से ग्रहण की.

तेरह साल की उम्र से ही उन्होंने स्टेज शो करने शुरू कर दिए थे. पहले स्टेज शो के दौरान उनके साथ एक ब़डा हादसा हो गया था, इसके बावजूद उन्होंने शानदार नृत्य प्रदर्शन करके यह साबित कर दिया कि वह हालात का मुक़ाबला करना जानती हैं. हुआ यूं कि 13 अप्रैल, 1949 को तमिल नववर्ष के दिन उनके नृत्य का कार्यक्रम था. इसके लिए एक ब़डा घर लिया गया और वहां एक स्टेज बनाया गया. स्टेज का जायज़ा लेते व़क्त वैजयंती माला का पैर वहां पड़े बिजली के नंगे तार से छू गया, जिससे वह झुलस गईं. लेकिन साहसी वैजयंती माला ने जख्मी पैर और दर्द की परवाह किए बिना नृत्य प्रदर्शन किया और उनके चेहरे पर उनकी तकली़फ ज़रा भी नहीं झलकी. अगले दिन के अ़खबारों में उनके नृत्य कौशल और साहस की सराहना करती हुई खबरें और तस्वीरें प्रकाशित हुईं. एक अ़खबार ने लिखा-वरूगिरल वैजयंती यानी यही है वैजयंती. उनके नृत्य के एक के बाद एक कार्यक्रमों का आयोजन होने लगा. उन्हीं दिनों चेन्नई के गोखले हॉल में आयोजित नृत्य समारोह में एवीएम प्रोडक्शन के मालिक एवी ययप्पा चेटियार और एमवी रमन भी मौजूद थे. कार्यक्रम के बाद ययप्पा चेटियार ने उन्हें अपनी तमिल फिल्म वजकई में काम करने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. दरअसल, निर्देशक एमवी रमन को अपनी फिल्म वजकई के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी. फ़िल्म हिट रही. इसे तेलगू में जिवीथम और हिंदी में बहार नाम से बनाया गया. मीडिया ने उन्हें वैजयंती द डांसिंग स्टार नाम दिया. इस दौरान उन्होंने कई क्षेत्रीय फिल्मों में काम किया, लेकिन पहली फिल्म जैसी कामयाबी नहीं मिली. इस दौरान वह नृत्य प्रदर्शन भी करती रहीं.

अचानक एक दिन उन्हें फिल्म नागिन का प्रस्ताव मिला. इसके लिए वह मुंबई आ गईं. उन्होंने सांपों के साथ काम करके सबको चौंका दिया, लेकिन फिल्म को प्रदर्शन के फौरन बाद कामयाबी नहीं मिली. कुछ व़क्त बाद इसी फिल्म को देखने के लिए दर्शक सिनेमाघरों में उम़डने लगे. 1954 में बनी फ़िल्म नागिन उनकी पहली हिट फ़िल्म थी. जिस व़क्त वैजयंती माला हिंदी सिनेमा में आईं, उस व़क्त सुरैया, मधुबाला, नरगिस और मीना कुमारी आदि अभिनेत्रियां सिने पटल पर छाई हुई थीं. वैजयंती माला को इनके बीच ही अपनी अलग पहचान बनानी थी, जो बेहद ही चुनौतीपूर्ण काम था. उन्होंने अपने अभिनय और नृत्य कला के बूते यह साबित कर दिया कि वह भी किसी से कम नहीं हैं. 1955 में बनी फिल्म देवदास में उन्होंने चंद्रमुखी के किरदार को कालजयी बना दिया. 1956 में आई उनकी फिल्म नया दौर में भी उन्होंने शानदार अभिनय किया. इस फिल्म को कई अवॉर्ड मिले. दिलीप कुमार के साथ उनकी जो़डी को दर्शकों ने खूब पसंद किया. नया दौर हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में शुमार की जाती है.

उनकी 1956 में न्यू डेल्ही, 1957 में कठपुतली, आशा और साधना, 1958 में मधुमति, 1959 में पैग़ाम, 1961 में गंगा-जमुना, 1964 में संगम और लीडर, 1966 में आम्रपाली और सूरज, 1967 में ज्वैलीथी़फ, 1968 में संघर्ष और 1969 में प्रिंस आई. उन्होंने बंगाली फिल्मों में भी काम किया. उनकी एक ब़डी खासियत यह भी थी कि उनके डायलॉग डब नहीं करने प़डते थे.वह पहली ऐसी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने डायलॉग खुद बोलने के लिए हिंदी सीखी. उन्हें 1956 में फ़िल्म देवदास के लिए पहली बार सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री का फ़िल्म़फेयर पुरस्कार मिला. इसके बाद 1958 में फ़िल्म मधुमती के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फ़िल्म़फेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया. फिर 1961 में फ़िल्म गंगा-जमुना और 1964 में फ़िल्म संगम के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्म़फेयर अवॉर्ड मिला. इसके अलावा 1996 में उन्हें फ़िल्म़फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देकर सम्मानित किया गया.

अपने करियर की बुलंदी पर ही उन्होंने विवाह करने का ऐलान कर दिया. उन्होंने डॉ. चमन लाल बाली को अपने जीवन साथी के रूप में चुना. डॉ. बाली राजकपूर के फैमिली डॉक्टर थे. तमिल फिल्म नीलाबू की शूटिंग के दौरान वैजयंती माला डल झील में डूबते-डूबते बचीं थीं. इलाज के लिए उन्हें डॉ. बाली के पास लाया गया. डॉ. बाली ने उनकी अच्छी देखभाल की. इसी दौरान उनका झुकाव डॉ. बाली के प्रति ब़ढता गया और वह उनसे प्रेम करने लगीं. डॉ. बाली रावलपिंडी के थे और वैजयंती शुद्ध दक्षिण भारतीय आयंगर परिवार से थीं. इसलिए उनके परिवार वाले रिश्ते के लिए राज़ी नहीं थे, लेकिन उनकी नानी के द़खल के बाद 10 मार्च, 1968 को उनका विवाह आयंगर विवाह पद्धति से संपन्न हुआ. वह एक बेटे की मां बनीं. उनकी ज़िंदगी में खुशियों का यह दौर उस व़क्त थम गया, जब उनके पति की तबीयत खराब रहने लगी. उनकी एक बार सर्जरी हो चुकी थी. एक रात उनकी तबीयत इतनी ज़्यादा बिग़डी कि फिर कभी वह स्वस्थ नहीं हो पाए. ऐसा व़क्त भी आया, जब डॉ. बाली के परिवार ने वैजयंती माला और उनके पुत्र को जायदाद से बेद़खल कर दिया. वैजयंती माला ने चार साल तक मुक़दमा लड़ा और जीत हासिल की. अब वह फिर से अपने करियर की शुरुआत करना चाहती थीं. 1989 के चुनाव के दौरान राजीव गांधी ने उन्हें अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने क़ुबूल कर लिया. उन्होंने चुनाव ल़डा और 1.5 लाख वोटों से जीत दर्ज की. इसके बाद वह दो बार राज्यसभा से सांसद रहीं. 1995 में अन्नामलाई विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से नवाज़ा. वह खुद को अभिनेत्री से ज़्यादा नृत्यांगना मानती हैं. वह नाट्यालय अकादमी की आजीवन अध्यक्ष हैं.


फ़िरदौस ख़ान
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी… यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है. हम ख़ुशनसीब हैं कि आज हम आज़ाद देश में रह रहे हैं. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं. उस वक़्त देश प्रेम के गीतों ने लोगों में जोश भरने का काम किया. बच्चों से लेकर नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक की ज़ुबान पर देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर गीत किसी मंत्र की तरह रहते थे. क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म ने तो अवाम में फ़िरंगियों की बंदूक़ों और तोपों का सामने करने की हिम्मत पैदा कर दी थी.

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

देश प्रेम के गीतों का ज़िक्र मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के बिना अधूरा है. उनके गीत सारे जहां से अच्छा के बग़ैर हमारा कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं होता. हर मौक़े पर यह गीत गाया और बजाया जाता है. देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर यह गीत दिलों में जोश भर देता है.

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशां हमारा...

जयशंकर प्रसाद का गीत यह अरुण देश हमारा, भारत के नैसर्गिक सौंदर्य का बहुत ही मनोहरी तरीक़े से चित्रण करता है.
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जा पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा...

हिंदी फ़िल्मों में भी देश प्रेम के गीतों ने लोगों में राष्ट्र प्रेम की गंगा प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज़ादी से पहले इन गीतों ने हिंदुस्तानियों में ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़कर मुल्क को आज़ाद कराने का जज़्बा पैदा किया और आज़ादी के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करने में अहम किरदार अदा किया है. फ़िल्मों का ज़िक्र किया जाए तो देश प्रेम के गीत रचने में कवि प्रदीप आगे रहे. उन्होंने 1962 की भारत-चीन जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी, गीत लिखा. लता मंगेशकर द्वारा गाये इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में 26 जनवरी, 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया. गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं. 1943 बनी फिल्म क़िस्मत के गीत दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है, ने उन्हें अमर कर दिया. इस गीत से ग़ुस्साई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे, जिसकी वजह से प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था. उनके लिखे फिल्म जागृति (1954) के गीत आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की और दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल, आज भी लोग गुनगुना उठते हैं. शकील बदायूंनी का लिखा फ़िल्म सन ऑफ इंडिया का गीत नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं, बच्चों में बेहद लोकप्रिय है. कैफ़ी आज़मी के लिखे और मोहम्मद रफ़ी के गाये फ़िल्म हक़ीक़त के गीत कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, को सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और शहीदों के लिए दिल श्रद्धा से भर जाता है. फिल्म लीडर का शकील बदायूंनी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और नौशाद के संगीत से सजा गीत अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं, बेहद लोकप्रिय हुआ. प्रेम धवन द्वारा रचित फ़िल्म हम हिंदुस्तानी का गीत छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नये दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी, आज भी इतना ही मीठा लगता है. उनका फिल्म क़ाबुली वाला का गीत भी रोम-रोम में देश प्रेम का जज़्बा भर देता है.

ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुर्बान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान...

राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित फिल्म सिकंदर-ए-आज़म का गीत भारत देश के गौरवशाली इतिहास का मनोहारी बखान करता है.
जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा
जहां सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा...

इसी तरह गुलशन बावरा द्वारा रचित फिल्म उपकार का गीत देश के प्राकृतिक खनिजों के भंडारों और खेतीबा़डी और जनमानस से जुड़ी भावनाओं को बख़ूबी प्रदर्शित करता है.
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरी देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू
जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोसों दूर हो जाता है
जब ख़ुशियों के कमल मुस्काते हैं...

इसके अलावा फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं, अमन, अमर शहीद, अपना घर, अपना देश, अनोखा, आंखें, आदमी और इंसान, आंदोलन, आर्मी, इंसानियत, ऊंची हवेली, एक ही रास्ता, क्लर्क, क्रांति, कुंदन, गोल्ड मेडल, गंगा जमुना, गंगा तेरा पानी अमृत, गंगा मान रही बलिदान, गंवार, चंद्रशेखर आज़ाद, चलो सिपाही चलो, चार दिल चार रास्ते, छोटे बाबू, जय चित्तौ़ड, जय भारत, जल परी, जियो और जीने दो, जिस देश में गंगा बहती है, जीवन संग्राम, जुर्म और सज़ा, जौहर इन कश्मीर, जौहर महमूद इन गोवा, ठाकुर दिलेर सिंह, डाकू और महात्मा, तलाक़, तू़फान और दीया, दीदी, दीप जलता रहे, देशप्रेमी, धर्मपुत्र, धरती की गोद में, धूल का फूल, नई इमारत, नई मां, नवरंग, नया दौर, नया संसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, प्यासा, परदेस, पूरब और पश्चिम, प्रेम पुजारी, पैग़ाम, फरिश्ता और क़ातिल, अंगारे, फ़ौजी, बड़ा भाई, बंदिनी, बाज़ार, बालक, बापू की अमर कहानी, बैजू बावरा, भारत के शहीद, मदर इंडिया, माटी मेरे देश की, मां बाप, मासूम, मेरा देश मेरा धर्म, जीने दो, रानी रूपमति, लंबे हाथ, शहीद, आबरू, वीर छत्रसाल, दुर्गादास, शहीदे-आज़म भगत सिंह, समाज को बदल डालो, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, हम एक हैं, कर्मा, हिमालय से ऊंचा, नाम और बॉर्डर आदि फिल्मों के देश प्रेम के गीत भी लोगों में जोश भरते हैं. मगर अफ़सोस कि अमूमन ये गीत स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या फिर गांधी जयंती जैसे मौक़ों पर ही सुनने को मिलते हैं, ख़ासकर ऑल इंडिया रेडियो पर.

बहरहाल, यह हमारे देश की ख़ासियत है कि जब राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवय या इसी तरह के अन्य दिवस आते हैं तो रेडियो पर देश प्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं. बाक़ी दिनों में इन गीतों को सहेजकर रख दिया जाता है. शहीदों की याद और देश प्रेम को कुछ विशेष दिनों तक ही सीमित करके रख दिया गया है. इन्हीं ख़ास दिनों में शहीदों को याद करके उनके प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी के शब्दों में यही कहा जा सकता है-
शहीदों की चिताओं लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा…


सरफ़राज़ ख़ान
देश को स्वतंत्र हुए छह देशक से भी ज्यादा का समय हो गया है. हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फ़हराया जाता है. मगर क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि 15 अगस्त, 1947 की रात को जब देश आज़ाद हुआ था, उस वक़्त भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर जो तिरंगा लहराया फहराया था, वह कहां है?
इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है. राष्ट्रीय ध्वज पूरे राष्ट्र के लिए एक ऐसा प्रतीक चिन्ह होता है जो पूरे देश की अस्मिता से जुड़ा होता है. यूं तो आज़ादी के बाद से हर बरस लाल क़िले पर फहरया जाने वाला तिरंगा देश की धरोहर है, लेकिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर फहराये राष्ट्रीय ध्वज का अपना अलग ही एक महत्व है.
कुछ लोगों का कहना है कि 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर लहराया गया तिरंगा नेहरू स्मारक में रखा गया है, जबकि स्मारक के अधिकारी इस बात से इंकार करते हैं. हैरत की बात तो यह भी है कि यह विशेष तिरंगा राष्ट्रीय अभिलेखागार में भी मौजूद नहीं है. इस अभिलेखागार में 1946 में नौसेना विद्रोह के दौरान बाग़ी सैनिकों द्वारा फहराया गया ध्वज रखा हुआ है. बंबई में 1946 में नौसेना विद्रोह के वक्त तीन ध्वज फहराये गए थे. इनमें कांग्रेस का ध्वज, मुस्लिम लीग का ध्वज और कम्युनिस्ट पार्टी का ध्वज शामिल थे. इनमें से कांग्रेस का ध्वज अभिलेखागार में मौजूद है.

प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर फहराया गया ध्वज राष्ट्रीय संग्रहालय में भी नहीं है. राष्ट्रीय संग्रहालय के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक़ आम तौर पर ऐतिहासिक महत्व की ऐसी धरोहर राष्ट्रीय संग्रहालय में रखने की बात हुई थी, लेकिन बाद में इसे भारतीय सेना को सौंप दिया गया था. इसके बाद इसे स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस के प्रबंध की देखरेख करने वाले केंद्रीय लोक निर्माण विभाग को सौंप दिया गा, लेकिन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग तथा सर्च द फ्लैग मिशन के पास उस तिरंगे के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है.

15 अगस्त 1947 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो पर देश के नाम संदेश देने दिया था और शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां ने अपनी स्वर लहरियों से आज़ादी का स्वागत किया था.




फ़िरदौस ख़ान
रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है. यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षाबंधन बांधकर उनकी लंबी उम्र और कामयाबी की कामना करती हैं. भाई भी अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देते हैं.

रक्षाबंधन के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था तो दानवों ने देवताओं को पछाड़ना शुरू कर दिया. देवताओं को कमज़ोर पड़ता देख स्वर्ग के राजा इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे मदद मांगी. तभी वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों का जाप कर एक धागा अपने पति के हाथ पर बांध दिया. इस युद्ध में देवताओं को जीत हासिल हुई. उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी. तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा शुरू हो गई. अनेक धार्मिक ग्रंथों में रक्षा बंधन का ज़िक्र मिलता है. जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली ज़ख़्मी हो गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी. बाद में श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में चीरहरण के वक़्त द्रौपदी की रक्षा कर उस आंचल के टुकड़े का मान रखा था. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना थी . राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी.

विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत के सभी राज्यों में पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता है. उत्तरांचल में रक्षा बंधन को श्रावणी के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा और श्रावणी कहते हैं, बाकि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे अवनि अवित्तम कहते हैं. रक्षाबंधन का धार्मिक ही नहीं, सामाजिक महत्व भी है. भारत में दूसरे धर्मों के लोग भी इस पावन पर्व में शामिल होते हैं.

रक्षाबंधन ने भारतीय सिनेमा जगत को भी ख़ूब लुभाया है. कई फ़िल्मों में रक्षाबंधन के त्यौहार और इसके महत्व को दर्शाया गया है. रक्षाबंधन को लेकर अनेक कर्णप्रिय गीत प्रसिद्ध हुए हैं. भारत सरकार के डाक-तार विभाग ने भी रक्षाबंधन पर विशेष सुविधाएं शुरू कर रखी हैं. अब तो वाटरप्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी उपलब्ध हैं. कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं. राज्य सरकारें भी रक्षाबंधन के दिन अपनी रोडवेज़ बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यातायात सुविधा मुहैया कराती है.

आधुनिकता की बयार में सबकुछ बदल गया है. रीति-रिवाजों और गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के प्रतीक पारंपरिक त्योहारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा है. आज के ग्लोबल माहौल में रक्षाबंधन भी हाईटेक हो गया है. वक़्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है. दरअसल, व्यस्तता के इस दौर में त्योहार महज़ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं.

यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां त्योहार व्यवसायीकरण के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे संबंधित जनमानस की भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं. अब महिलाओं को राखी बांधने के लिए बाबुल या प्यारे भईया के घर जाने की ज़रूरत भी नहीं रही. रक्षाबंधन से पहले की तैयारियां और मायके जाकर अपने अज़ीज़ों से मिलने के इंतज़ार में बीते लम्हों का मीठा अहसास अब भला कितनी महिलाओं को होगा. देश-विदेश में भाई-बहन को राखी भेजना अब बेहद आसान हो गया है. इंटरनेट के ज़रिये कुछ ही पलों में वर्चुअल राखी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे भाई तक पहुंचाई जा सकती है. डाक और कोरियर की सेवा तो देहात तक में उपलब्ध है. शुभकामनाओं के लिए शब्द तलाशने की भी ज़रूरत नहीं. गैलरियों में एक्सप्रेशंस, पेपर रोज़, आर्चीज, हॉल मार्क सहित कई देसी कंपनियों केग्रीटिंग कार्ड की श्रृंख्लाएं मौजूद हैं. इतना ही नहीं फ़ैशन के इस दौर में राखी भी कई बदलावों से गुज़र कर नई साज-सज्जा के साथ हाज़िर हैं. देश की राजधानी दिल्ली और कला की सरज़मीं कलकत्ता में ख़ास तौर पर तैयार होने वाली राखियां बेहिसाब वैरायटी और इंद्रधनुषी दिलकश रंगों में उपलब्ध हैं. हर साल की तरह इस साल भी सबसे ज़्यादा मांग है रेशम और ज़री की मीडियम साइज़ राखियों की. रेशम या ज़री की डोर के साथ कलाबत्तू को सजाया जाता है, चाहे वह जरी की बेल-बूटी हो, मोती हो या देवी-देवताओं की प्रतिमा. इसी अंदाज़ में वैरायटी के लिए जूट से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं, जो बेहद आकर्षक लगती हैं. कुछ कंपनियों ने ज्वैलरी राखी की श्रृंख्ला भी पेश की हैं. सोने और चांदी की ज़ंजीरों में कलात्मक आकृतियों के रूप में सजी ये क़ीमती राखियां धनाढय वर्ग को अपनी ओर खींच रही हैं. यहीं नहीं मुंह मीठा कराने के लिए पारंपरिक दूध से बनी मिठाइयों की जगह अब चॉकलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू हो गया है. बाज़ार में रंग-बिरंगे काग़ज़ों से सजे चॉकलेटों के आकर्षक डिब्बों को ख़ासा पसंद किया जा रहा है.

कवयित्री इंदुप्रभा कहती हैं कि आज पहले जैसा माहौल नहीं रहा. पहले संयुक्त परिवार होते थे. सभी भाई मिलजुल कर रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. नौकरी या अन्य कारोबार के सिलसिले में लोगों को दूर-दराज के इलाक़ों में बसना पड़ता है. इसके कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल हो गए हैं. ऐसी स्थिति में बहनें रक्षाबंधन के दिन अलग-अलग शहरों में रह रहे भाइयों को राखी नहीं बांध सकतीं. महंगाई के इस दौर में जब यातायात के सभी साधनों का किराया काफ़ी ज़्यादा हो गया है, तो सीमित आय अर्जित करने वाले लोगों के लिए परिवार सहित दूसरे शहर जाना और भी मुश्किल काम है. ऐसे में भाई-बहन को किसी न किसी साधन के ज़रिये भाई को राखी भेजनी पड़ेगी. बाज़ार से जुड़े लोग मानते हैं कि भौतिकतावादी इस युग में जब आपसी रिश्तों को बांधे रखने वाली भावना की डोर बाज़ार होती जा रही है, तो ऐसे में दूरसंचार के आधुनिक साधन ही एक-दूसरे के बीच फ़ासलों को कम किए हुए हैं. आज के समय में जब कि सारे रिश्ते-नाते टूट रहे हैं, सांसारिक दबाव को झेल पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं. ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार हमें भाई- बहन के प्यारे बंधन को हरा- भरा करने का मौक़ा देता है. साथ ही दुनिया के सबसे प्यारे बंधन को भूलने से भी रोकता है.

फ़िरदौस ख़ान
गुजरात में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की कार पर किए गए हमले को किसी भी सूरत में हल्के में नहीं लिया जा सकता है. यह हमला कई सवाल खड़े करता है. यह हमला एक पार्टी विशेष के नेता पर किया गया हमला नहीं है. दरअसल, यह फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा लोकतंत्र पर किया गया हमला है. यह हमला इस बात का सबूत है कि शासन-प्रशासन कितना नाकारा है.  कितना डरा हुआ है. विशेष सुरक्षा बल की तैनाती के बावजूद कुछ लोग काले झंडे लेकर मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए आते हैं और फिर अचानक राहुल गांधी की कार पर पत्थरों से हमला बोल देते हैं.
यह हमला उस वक़्त हुआ, जब राहुल गांधी गुजरात के बाढ़ प्राभावित ज़िले बनासकांठा के धनेरा में पीड़ितों से मिलकर लौट रहे थे. वे कार की अगली सीट पर बैठे थे.  उनकी कार पर एक बड़ा पत्थर फेंका गया, जिससे गाड़ी का शीशा चकनाचूर हो गया. कार में पिछली सीट पर बैठे एसपीगी कमांडो को चोट आई. हमले से पहले राहुल गांधी को काले झंडे दिखाए गए. उनके सामने लोगों ने मोदी-मोदी के नारे भी लगाए. इसके बावजूद राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें आने दो, ये काले झंडे यहां लगाने दो, ये लोग घबराए हुए लोग हैं. हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. हमले के बाद राहुल गांधी ने कहा कि ऐसे हमलों से उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकती. मैं इन काले झंडे दिखाने वालों से डरने वाला नहीं हूं. मैं आप सभी के बीच आना चाहता था और कहना चाहता था कि कांग्रेस पार्टी आपके साथ है. उनके दफ़्तर की तरफ़ किए गए ट्वीट में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी जी के नारों से, काले झंडों से और पत्थरों से हम पीछे हटने वाले नहीं हैं, हम अपनी पूरी ताक़त लोगों की मदद करने में लगाएंगे. उन्होंने ऐसा किया भी.
राहुल गांधी हमले से ज़रा भी विचलित नहीं हुए और गुजरात के बाढ़ प्रभावित इलाक़ों के हवाई दौरे के लिए निकल गए. राहुल गांधी पर हमला करने वाले शायद यह भूल गए हैं कि वे उस शख़्स को डराने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी रगों में शहीदों का ख़ून है. उनके पूर्वजों ने इस देश के लिए अपनी जानें क़ुर्बान की हैं. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी और श्रीमती सोनिया गांधी ने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी ने उसे परवान चढ़ाया. श्री राजीव गांधी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में श्रीमती सोनिया गांधी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

राहुल गांधी भी लोगों की मदद करने से कभी पीछे नहीं रहते. इस मामले में वह अपनी सुरक्षा की ज़रा भी परवाह नहीं करते. एक बार वह अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी से लौट रहे थे. रास्ते में उन्होंने एक ज़ख़्मी व्यक्ति को सड़क पर तड़पते देखा, तो क़ाफ़िला रुकवा लिया. उन्होंने एंबुलेंस बुलवाई और ज़ख़्मी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया. उन्होंने विधायक और पार्टी प्रवक्ता को उसके इलाज की ज़िम्मेदारी सौंपी. इस दौरान सुरक्षा की परवाह किए बिना वह काफ़ी देर तक सड़क पर खड़े रहे.
राहुल गांधी जब पीड़ितों से मिलने सहारनपुर पहुंचे, तो वहां एक बच्चा भी था. उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठा लिया. उन्होंने बच्चों से प्यार से बातें कीं और फिर घटना के बारे में पूछा. इस पर बच्चे ने कहा कि अंकल हमारा घर जल गया है, बस्ता भी जल गया और सारी किताबें भी जल गईं. घर बनवा दो, नया बस्ता और किताबें दिलवा दो. इस पर राहुल गांधी ने एक स्थानीय कांग्रेस नेता को उस बच्चे का घर बनवाकर देने और नया बस्ता व किताबें दिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी. वे मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी पीड़ित किसानों से मिलने पहुंच गए. शासन-प्रशासन से उन्हें किसानों से मिलने से रोकने के लिए भरपूर कोशिश कर ली, लेकिन वे भी किसानों से मिले बिना दिल्ली नहीं लौटे, भले उन्हें गिरफ़्तार होना पड़ा. वे आक्रामक रुख़ अख्तियार करते हुए कहते हैं, मोदी किसानों का क़र्ज़ नहीं माफ़ कर सकते, सही रेट और बोनस नहीं दे सकते, मुआवज़ा नहीं दे सकते, सिर्फ़ किसानों को गोली दे सकते हैं.

राहुल गांधी का कहना है कि उनके क़ाफ़िले पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने हमला किया. ये हमला एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत किया गया. उन्होंने कहा, ''एक बड़ा पत्थर बीजेपी कार्यकर्ता ने मेरी ओर मारा, मेरे पीएसओ को लगा.'' उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी पार्टी की राजनीति का तरीक़ा बताया. उन्होंने कहा, ''मोदी जी और बीजेपी-आरएसएस का राजनीति का तरीक़ा है. क्या कह सकते हैं.'' भाजपा की तरफ़ से हादसे को लेकर आ रही प्रतिक्रिया पर राहुल गांधी ने कहा कि जब उन्होंने खुद इस तरह की चीज़ें की हों, तो वे इसकी निंदा कैसे कर सकते हैं. यह काम उनके लोगों ने किया है तो वे इसकी भर्त्सना कैसे करेंगे.

राहुल गांधी पर हमले के बाद कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल का कहना है कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. यह सबकुछ पहले से तयशुदा साज़िश के तहत हुआ है. राहुल गांधी को इतनी ज़्यादा सुरक्षा मिली हुई है, इसके बावजूद यह हमला होना सवाल खड़ा करता है. सरकार ने पहले से कोई इंतज़ाम नहीं किए, यह हमला रोका जा सकता था. भाजपा के लोगों ने हमला किया. राहुल गांधी के दौरे से भाजपा सरकार डर गई है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद का कहना है कि राहुल गांधी पर जानलेवा हमला किया गया है.  उन्होंने कहा कि जिस पत्थर से हमला किया गया है वह सीमेंट और पत्थर से बना था. जो वहां कहीं और से लाया गया था. राहुल गांधी को निशाना बनाकर पत्थर फेंके गए हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा इन कामों के लिए हमेशा से मशहूर रही है. गांधी जी से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं.
वहीं कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने राहुल गांधी पर हुए हमले की आलोचना करते हुए कहा कि क्या हम इस लोकतंत्र में ऐसी जगह पहुंच रहे हैं, जहां राजनीतिक विरोधियों को लोकतांत्रिक राजनीति की इजाज़त नहीं दी जाएगी? उन्होंने तल्ख़ लहजे में कहा, "बीजेपी के गुंडों ने राहुल गांधी पर सीमेंट की ईंटों से हमला किया. उनके साथ चलने वाली एसपीजी को भी हल्की चोटें आई हैं. इसकी चौतरफ़ा निंदा की जानी चाहिए." कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने भी राहुल पर हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा, 'बीजेपी के गुंडों ने गुजरात में बनासकांठा के धनेरा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला किया है. यह बेहूदा और शर्मनाक हरकत है. बीजेपी सरकार अब किस हद की राजनीति पर उतर आई है? राहुल गांधी की गाड़ी पर हमला करने दिया गया. इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए. कांग्रेस उपाध्यक्ष ठीक हैं, लेकिन उनके साथ के लोगों को चोटें आई हैं. बीजेपी के गुंडे हमें नुक़सान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हम और मज़बूत होकर उभरेंगे.'
उधर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा ने भी राहुल गांधी पर हमले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह हमला बीजेपी शासित राज्य में हुआ है, इसलिए बीजेपी को जवाब देना होगा.

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. पिछले साल दिसंबर में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में कांग्रेस की चुनावी जनसभा में मोदी मुर्दाबाद के नारे लगे, तो राहुल गांधी ने कहा कि ऐसा मत कीजिए. ये कांग्रेस की जनसभा है और यहां मुर्दाबाद लफ़्ज़ का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, उनसे हमारी सियासी लड़ाई है. लेकिन मुर्दाबाद बोलना हमारा काम नहीं है, ये बीजेपी और आरएसएस वाले लोगों का काम है.
राहुल गांधी ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  आज देश को उनके जैसे ही नेता की बेहद ज़रूरत है. वे मुल्क की अवाम की उम्मीद हैं. हिन्दुस्तान की उम्मीद हैं. उनके विरोधी उनसे ख़ौफ़ खाते हैं, तभी उन्हें झुकाने के लिए बरसों से उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रच रहे हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है. गुजरात में एक आयोजित एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर तंज़ करते हुए कहते हैं, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है, तो हमारी सरकार हर किसी के लिए होगी न कि केवल एक व्यक्ति के लिए. अपने 'मन की बात' कहने के बजाय हमारी सरकार आपके मन की बात सुनने का प्रयास करेगी.

वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.
उधर गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल का कहना है कि राहुल गांधी को बुलेट प्रूफ़ कार ऒफ़र की गई थी, इसके बावजूद वे पार्टी की कार से गए.  राहुल गांधी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार की है. इस मामले में सरकार पूरी तरह नाकाम रही है, हमलावर सत्ताधारी पार्टी के ही पदाधिकारी हैं, इसलिए इसमें गहरी साज़िश से इंकार नहीं किया जा सकता.

राहुल गांधी पर किया गया हमला यह साबित करता है कि आने वाला वक़्त कांग्रेस का है. आज़ादी के बाद से देश में सबसे ज़्यादा वक़्त तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के लोकसभा में भले ही 44 सांसद हैं, लेकिन कई मामलों में वे भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसदों पर भारी पड़े हैं. सत्ताधारी पार्टी ने कई बार ख़ुद कहा है कि कांग्रेस के सांसद उसे काम नहीं करने दे रहे हैं.
भारत एक लोकतांत्रिक देश है. क्या इस देश में किसी सियासी पार्टी को इतना भी हक़ नहीं है कि वे पीड़ित लोगों से मिल सके. आख़िर देश किस दिशा में जा रहा है.
बहरहाल, अंधेरा कितना ही घना क्यों न हो, सुबह को आने से नहीं रोक सकता.

शरद जायसवाल
बुरहानपुर जिले के मोहद गाँव के 15 लड़कों पर से राजद्रोह का मुकदमा हटाकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का मुकदमा कायम किया जाना यह बताता है कि इस घटना के गंभीर सियासी निहितार्थ हैं. हिन्दुस्तान के बटवारे के बाद से ही हिंदुत्व लगातार इस बात को प्रचारित और प्रसारित करता रहा है कि यहाँ के मुसलमानों की सहानभूति और प्रतिब्द्ता पाकिस्तान के साथ है. संघ परिवार गोएबल्स की उस रणनीति पर शुरू से काम कर रहा है कि अगर एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो जनता उसे सच मान लेती है. इसी प्रयोग को उसनें बड़ी चतुराई के साथ भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट मैच के दरम्यान भी इस्तेमाल किया है. मध्य प्रदेश के एक गाँव मोहद की घटना इस मायने में अलग है कि पहली बार खुद राज्य हिंदुत्व के इस तर्क को कि देश के मुसलमानों की सहानभूति पाकिस्तान के साथ है, को वैधता प्रदान कर रहा है. यह घटना जाहिर करती है कि भारतीय राज्य के अन्दर मुसलमानों को देशद्रोही बताने को लेकर कितना ज्यादा उतावलापन है. मोहद की घटना से पहले तक मुसलमानों को देशद्रोही कहने के लिए आतंकवाद के मामले में फंसाया जाता था, लेकिन पहली बार राज्य के द्वारा क्रिकेट के बहाने मुसलमानों को देशद्रोही बताया जा रहा है.

हिन्दुत्व की इन साज़िशों का पर्दाफाश भी हो चुका है. जब कर्नाटक के बीजापुर के पास श्री राम सेना के कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पाकिस्तानी झण्डा फहराने के जुर्म में पकड़ा था. पहले तो श्री राम सेना के कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान का झण्डा फहराया और घटना के अगले दिन आरोपियों की गिरफ्तारी न होने के चलते प्रशासन के खिलाफ धरना भी दिया. जब पुलिस ने इस घटना में संलिप्त श्री राम सेना के 6 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया तो श्री राम सेना के प्रमुख प्रमोद मुतालिक ने बयान दिया कि इस घटना में हमारे कार्यकर्ताओं की कोई भूमिका नहीं है, बल्कि इस साजिश में आरएसएस के लोग शामिल हैं.

पिछले कुछ सालों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं हैं जिसमें कश्मीर के उन मुस्लिम ;विद्यार्थियों को निशाना बनाया गया, जो कश्मीर से बाहर रहकर पढ़ रहे हैं.23 फरवरी 2014 को भारत पाकिस्तान मैच के दरम्यान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने के आरोप में मेरठ के स्वामी विवेकानन्द सुभारती यूनिवर्सिटी के 67 कश्मीरी छात्रों को पहले सस्पैंड किया गया और फिर उन पर राजद्रोह का मुकदमा कायम किया गया. हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में राजद्रोह का मुकदमा हटा लिया गया. इन कश्मीरी लड़कों के कमरों में पथरबाजी की गयी. घटना के कुछ समय के बाद कई सारे लड़के कालेज छोड़कर वापस कश्मीर लौट गए. इस घटना के बिलकुल आस-पास इसी आरोप के चलते ग्रेटर नोएडा के शारदा युनिवर्सिटी के 4 कश्मीरी लड़कों को हॉस्टल से निकाला गया. हरियाणा में तो भारत पाकिस्तान मैच के दरम्यान कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जब संगठित हिन्दुत्व ने कश्मीरी छात्रों पर हमला किया है. दरअसल हिन्दुत्व के लिए कश्मीर के लोगों को पाकिस्तान के साथ जोड़ना बहुत मुश्किल नहीं है लेकिन पिछले कुछ एक सालों में हिन्दुत्व ने अपनी इस रणनीति का विस्तार कश्मीर से इतर देश के दूसरे हिस्सों में भी किया है.

भोजपुर (बिहार) जिले के पीरो में 12 अक्तूबर 2016 को सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम दिया गया. मुसलमानों के ताजिया जुलूस पर होने वाली पत्थरबाजी को वैधता देने के लिए पाकिस्तान के समर्थन में होने वाली नारेबाजी का तर्क गढ़ा गया. इस हिंसा में मुसलमानों की कई दुकानों को जलाया गया, कई सारे लोग घायल हुए.
मोहद की तर्ज पर ही 20 जून 2017 को चैम्पियन्स ट्रॉफी के फ़ाइनल मैच में पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी करने के जुर्म में तीन नाबालिग लड़कों को उत्तराखंड के मंसूरी से गिरफ्तार किया गया था. दरअसल यह गिरफ्तारी हिंदुत्ववादी संगठनों के द्वारा थाने में दी गयी तहरीर के आधार पर हुई थी. ठीक इसी आरोप के चलते तीन लड़कों की गिरफ्तारी उज्जैन जिले के खमरिया गाँव से भी हुई थी. हिंदुत्व का यह प्रयोग सिर्फ हिंदी भाषी राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि अखिल भारतीय स्तर पर इसे अमल में लाया जा रहा है. चैंपियन्स ट्राफी के मैच के दरम्यान कई गिरफ्तारियां उन राज्यों में भी हुईं, जहाँ पर गैर भाजपाई सरकारें हैं. मसलन दक्षिणी कर्नाटका के कोडागु के होसाकोटे गाँव से 4 ड़कों को, कुर्ग पुलिस ने 3 लड़कों को, केरल में बड़िया डुक्का पुलिस ने 23 लोगों को व केरल में ही कसरगोड के पास चक्कूडल कुंबदाजे से 20 लोगों को गिरफ्तार किया गया. मजेदार बात यह है कि इन सारी गिरफ्तारियों के पीछे हिंदुत्ववादी संगठनों का दबाव काम कर रहा था. इन गिरफ्तारियों के लिए बाकायदा धरना प्रदर्शन व सम्बंधित थाने में मुकदमा भी दर्ज कराया गया था. अब हिन्दुत्व के लिए यह जरूरी नहीं रह गया है कि इस तरह की साज़िशों को वहीं रचा जाएगा, जहां पर उनकी अपनी सरकार है. इसलिए हमें हिन्दुत्व और बीजेपी के बीच के रिश्तों और फर्क की भी ईमानदारी से पड़ताल करनी होगी. बहुसंख्यक समाज के बीच में सांप्रदायिक विचारधारा की जड़ें इस कदर पैठ कर गयी हैं कि एक सेकुलर सरकार को भी हिन्दुत्व के सामने नतमस्तक होना ही होगा या एक सेकुलर सरकार की सेकुलरिज्म को लेकर कमजोर प्रतिबद्धता के रूप में भी इसे देखा जा सकता है.

बुरहानपुर पुलिस के द्वारा 15 मुसलमानों की गिरफ्तारी, अगले दिन कोर्ट के अंदर ‘राष्ट्रवादी’ वकीलों के द्वारा यह कहना कि देश विरोधी लोगों का केस कोई नहीं लड़ेगा, कोर्ट के बाहर हिन्दुत्ववादी संगठनों का नारेबाजी करना और हर बार की तरह इस बार भी मीडिया के द्वारा उन पंद्रह लोगों को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति यह बताती है कि एक घटना जिसकी स्क्रिप्ट पहले से तैयार थी. हिन्दुत्व ने अपने एजेंडे के लिए जो श्रम विभाजन किया, उसके अनुसार कहानी के सभी पात्रों ने पूरी मेहनत और लगन से अपनी-अपनी भूमिकाएँ अदा कीं. सरकार, पुलिस, मीडिया, हिन्दुत्ववादी संगठन, न्यायपालिका सभी
संगठित हिंदुत्व से पर्याप्त दिशा निर्देश लेते हुए आगे बढ़ रहे थे और बुरहानपुर में सफलता मिलने ही वाली थी. लेकिन सुभाष कोली नाम के व्यक्ति ने संगठित हिंदुत्व के मंसूबों पर पानी फेर दिया. मोहद गाँव में रची गयी साजिश के केंद्र में प्रत्यक्ष तौर पर कोई हिन्दुत्ववादी संगठन शामिल नहीं था. बल्कि पुलिस की अगुवाई में यहाँ पर एक साजिश को अंजाम दिया गया था. हिन्दुत्ववादी पुलिस ने जिस व्यक्ति को इस घटना का प्रत्यक्षदर्शी व गवाह बताया, उसी सुभाष कोली ने पुलिस के द्वारा गढ़ी गयी कहानी पर सवाल खड़ा कर दिया. पुलिस की और ज्यादा भद्द पिटती इससे पहले ही घटना के मुख्य साजिशकर्ता टीआई संजय पाठक का तबादला कर दिया गया. इस तबादले के बाद भी बुरहानपुर के आला पुलिस अधिकारियों ने कहा कि टीआई संजय पाठक का तबादला मोहद की घटना की वजह से नहीं बल्कि किसी दूसरे मामले के चलते किया जा रहा है. स्क्रॉल.इन में छपी एक स्टोरी में भी भोपाल में बैठे पुलिस के उच्च अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि ‘टीआई पाठक को इसलिए सज़ा नहीं दी गई कि उन्होने कोई फर्जी केस गढ़ा है बल्कि इसलिए दी गई है कि उन्होने सही शिकायतकर्ता का चुनाव नहीं किया है. उनका ये गलत चुनाव ही पुलिस को महंगा पड़ा’.

इस पूरी घटना में टीआई संजय पाठक की भूमिका तब और संदिग्ध हो गयी, जब थाने में बंद 15 लड़कों में से एक लड़के ने ये कहा कि मोहद के स्थानीय बीजेपी नेता ने पाठक को दो हज़ार रूपये की तीन से चार गड्डी दी थी. इस संबंध में एक खबर हिन्दी के एक दैनिक अखबार में प्रकाशित हुई थी. यह भी कहा गया कि क्योंकि पाठक की पहुँच सीधे आरएसएस के बड़े नेताओं से है इसलिए पुलिस के बड़े आलाधिकारी भी उसके खिलाफ बोलने से कतरा रहे हैं.

सुभाष कोली के सामने आने के बाद इस घटना में कुछ भी छुपा नहीं रह गया था. और एक मात्र विपक्ष यानि कांग्रेस के लिए मैदान बिलकुल साफ था. हमने जब नागरिक समाज के नुमाइंदों (खास तौर पर मुसलमानों) से इस बारे में जानने की कोशिश की कि घटना के बाद विपक्ष अथवा कांग्रेस की क्या भूमिका है? उन सभी का कहना था कि काँग्रेस हमें पीछे से सहयोग कर रही है. काँग्रेस का इस मुद्दे पर चोरी छिपे मुसलमानों के साथ खड़े होने का मतलब यही है कि एक सेकुलर पार्टी यह नहीं चाहती है कि इसकी तनिक भी भनक हिंदुओं को लगे. क्योंकि अगर हिंदुओं को गलती से भी मालूम पड़ गया कि इस मुद्दे पर काँग्रेस मुसलमानों का साथ दे रही है तो उसका हिन्दू वोट दूर जा सकता है.

यह काफी मजेदार इसलिए है कि देश की सबसे बड़ी सेकुलर पार्टी अब चोरी छिपे सेकुलरिज्म को बचाए रखना चाहती है. जबकि सांप्रदायिक ताक़तें खुलकर नंगा नाच कर रही हैं. इस पूरी घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि खुद मुस्लिम समाज के बड़े हिस्से में भी इस बात को लेकर एक आम सहमति बन चुकी है कि अगर हमने या काँग्रेस ने इस घटना (मोहद) को उठाया तो इसका फायदा भी बीजेपी को ही मिलेगा क्योंकि तब बीजेपी के लिए सांप्रदायिक आधार पर गोलबंदी करना ज्यादा आसान होगा. यह आम धारणा पूरे देश के पैमाने पर दिखती है. देश की सेकुलर पॉलिटिक्स ने मुसलमानों के बीच इस बात के लिए सहमति निर्मित कर ली है कि अगर हम आपके सवालों को उठाएंगे तो इसका फायदा बीजेपी को ही होगा. इसे मॉब लिंचिंग की तमाम सारी घटनाओं में भी देखा जा सकता है. इसलिए देश के मुसलमानों के पास इस तंत्र पर या भाग्य पर भरोसा करने के सिवाय कोई अन्य विकलप नहीं है. खुद मुस्लिम समाज के द्वारा इस घटना के इर्द गिर्द होने वाली पूरी सियासत मेमोरंडम देने या कोर्ट में पीआईएल करने तक ही सीमित हो चुकी है.

मोहद गाँव से पुलिस के द्वारा जिस तरह से 15 मुस्लिम लड़कों को गिरफ्तार किया गया व कुछ और नहीं बल्कि पुलिस के द्वारा गाँव में घुसकर मुसलमानों पर किया गया हमला था. क्योंकि पुलिस उन्हें उनके घर से घसीटते और मारते पीटते हुए थाने में लायी. कई सारे लड़कों को दाढ़ी और टोपी देखकर, बिना उनका नाम पूछे ही पुलिस उठा ले गयी. थाने में लाने के साथ एक बार फिर से उनकी बेरहमी से पिटाई की गयी. थाने में पुलिस ने जिस भाषा का प्रयोग इन 15 पीड़ितों के साथ किया कि ‘तुम्हारी कौम को ख़त्म कर दिया जाएगा’, ‘बीपीएल कार्ड को ख़त्म कर दिया जाएगा’, ‘एक रूपए का अनाज खाते-खाते मस्ती आ गयी है’, ‘तुम्हारी माँ के साथ सोने के लिए पाकिस्तान से लोग आये थे’.
यह भाषा सिर्फ पुलिस के सांप्रदायिक चरित्र को ही उजागर नहीं करती है बल्कि कल्याणकारी राज्य से लाभान्वित होने वाले तबके के प्रति उनके अन्दर व्याप्त नफरत को भी उजागर करती है. वो सारे नागरिक अधिकार, जिसे भारतीय राज्य ने बमुश्किल और काफी जद्दोजेहद के बाद इस देश की आम जनता को दिए थे. अब वही चीज़ें देश के मध्यम वर्ग की आँख का काँटा बन चुकी हैं. लगभग इसी तरह की बहस उस समय भी हुई थी, जब जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी नारे लगाये गए थे. मीडिया के एक धड़े ने उस समय भी इसी बहस को चलाया था कि मध्यम वर्ग के द्वारा दिए गए टैक्स से ही कल्याणकारी योजनाओं को संचालित किया जाता है और उसी पैसे से संचालित सरकारी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों द्वारा देशविरोधी गतिविधियां संचालित होती हैं. इसलिए ऐसे संस्थानों को बंद कर दिया जाना चाहिए. नवउदारवाद ने पिछले तीन दशकों में एक ऐसी पीढ़ी को तैयार किया है जो न केवल कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से नफरत करता है बल्कि इन योजनाओं से लाभान्वित होने वाले वंचित समूह से भी बेपनाह नफरत करता है.

मोहद की घटना देश भर में मुसलमानों के साथ हो रही सांप्रदायिक हिंसा की एक कड़ी मात्र है. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ पर हिन्दुत्व को डिफ़्फ़ेंसिव होना पड़ा और वह भी सिर्फ सुभाष कोली के चलते. मोहद की घटना का असली नायक सुभाष कोली है. अगर सुभाष पुलिस की साजिश का भंडाफोड़ नहीं करते तो हिंदुत्व अपने प्लैंक पर कामयाब हो चुका था और इसके साथ ही उन 15 लड़कों का भविष्य भी दांव पर लग जाता. पुलिस की तरफ से मिलने वाली धमकियों के बावजूद वह अकेले उन पंद्रह लड़कों के पक्ष में खड़ा रहा. आज के समय में ऐसी मिसाल बहुत मुश्किल से नज़र आती है. यह घटना बताती है कि यदि बहुसंख्यक समाज का कोई व्यक्ति किसी घटना विशेष के सन्दर्भ में इमानदारी और प्रतिबद्ता के साथ सांप्रदायिक साजिशों के खिलाफ खड़ा होता है तो ये हिंदुत्व के लिए मुश्किल भरा हो सकता है.
सुभाष कोली को सलाम.
(लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में सहायक प्रोफ़ेसर हैं)


फ़िरदौस ख़ान 
मुंशी प्रेमचंद क्रांतिकारी रचनाकर थे. वह समाज सुधारक और विचारक भी थे. उनके लेखन का मक़सद सिर्फ़ मनोरंजन कराना ही नहीं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान आकर्षित कराना भी था. वह सामाजिक क्रांति में विश्वास करते थे. वह कहते थे कि समाज में ज़िंदा रहने में जितनी मुश्किलों का सामना लोग करेंगे, उतना ही वहां गुनाह होगा. अगर समाज में लोग खु़शहाल होंगे, तो समाज में अच्छाई ज़्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा. मुंशी प्रेमचंद ने शोषित वर्ग के लोगों को उठाने की हर मुमकिन कोशिश की. उन्होंने आवाज़ लगाई- ऐ लोगों, जब तुम्हें संसार में रहना है, तो ज़िंदा लोगों की तरह रहो, मुर्दों की तरह रहने से क्या फ़ायदा.

मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था. उनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले के गांव लमही में हुआ था. उनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल और माता का नाम आनंदी देवी था. उनका बचपन गांव में बीता. उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी की शिक्षा हासिल की. 1818 में उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी. वह एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापन का कार्य करने लगे और कई पदोन्नतियों के बाद वह डिप्टी इंस्पेक्टर बन गए. उच्च शिक्षा उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की. उन्होंने अंग्रेज़ी सहित फ़ारसी और इतिहास विषयों में स्नातक किया था. बाद में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में योगदान देते हुए उन्होंने अंग्रेज़ सरकार की नौकरी छोड़ दी.

प्रेमचंद ने पारिवारिक जीवन में कई दुख झेले. उनकी मां के निधन के बाद उनके पिता ने दूसरा विवाह किया. लेकिन उन्हें अपनी विमाता से मां की ममता नहीं मिली. इसलिए उन्होंने हमेशा मां की कमी महसूस की. उनके वैवाहिक जीवन में भी अनेक कड़वाहटें आईं. उनका पहला विवाह पंद्रह साल की उम्र में हुआ था. यह विवाह उनके सौतेले नाना ने तय किया था. उनके लिए यह विवाह दुखदाई रहा और आख़िर टूट गया. इसके बाद उन्होंने फ़ैसला किया कि वह दूसरा विवाह किसी विधवा से ही करेंगे. 1905 में उन्होंने बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह कर लिया. शिवरानी के पिता ज़मींदार थे और बेटी का पुनर्विवाह करना चाहते थे.  उस वक़्त एक पिता के लिए यह बात सोचना एक क्रांतिकारी क़दम था. यह विवाह उनके लिए सुखदायी रहा और उनकी माली हालत भी सुधर गई. वह लेखन पर ध्यान देने लगे. उनका कहानी संग्रह सोज़े-वतन प्रकाशित हुआ, जिसे ख़ासा सराहा गया.

उन्होंने जब कहानी लिखनी शुरू की, तो अपना नाम नवाब राय धनपत रख लिया. जब सरकार ने उनका पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन ज़ब्त किया. तब उन्होंने अपना नाम नवाब राय से बदलकर प्रेमचंद कर लिया और उनका अधिकतर साहित्य प्रेमचंद के नाम से ही प्रकाशित हुआ.  कथा लेखन के साथ उन्होंने उपन्यास पढ़ने शुरू कर दिए. उस समय उनके पिता गोरखपुर में डाक मुंशी के तौर पर काम कर रहे थे. गोरखपुर में ही प्रेमचंद ने अपनी सबसे पहली साहित्यिक कृति रची, जो उनके एक अविवाहित मामा से संबंधित थी. मामा को एक छोटी जाति की महिला से प्यार हो गया था. उनके मामा उन्हें बहुत डांटते थे. अपनी प्रेम कथा को नाटक के रूप में देखकर वह आगबबूला हो गए और उन्होंने पांडुलिपि को जला दिया. इसके बाद हिंदी में शेख़ सादी पर एक किताब लिखी. टॊल्सटॊय की कई कहानियों का हिंदी में अनुवाद किया. उन्होंने प्रेम पचीसी की भी कई कहानियों को हिंदी में रूपांतरित किया, जो सप्त-सरोज शीर्षक से 1917 में प्रकाशित हुईं. इनमें बड़े घर की बेटी, सौत, सज्जनता का दंड, पंच परमेश्वर, नमक का दरोग़ा, उपदेश, परीक्षा शामिल हैं. प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में इनकी गणना होती है. उनके उपन्यासों में सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, वरदान, निर्मला, ग़बन, कर्मभूमि, कृष्णा, प्रतिज्ञा, प्रतापचंद्र, श्यामा और गोदान शामिल है. गोदान उनकी कालजयी रचना मानी जाती है. बीमारी के दौरान ही उन्होंने एक उपन्यास मंगलसूत्र लिखना शुरू किया, लेकिन उनकी मौत की वजह से वह अधूरा ही रह गया. उनकी कई रचनाएं उनकी स्मृतियों पर भी आधारित हैं. उनकी कहानी कज़ाकी उनके बचपन की स्मृतियों से जुड़ी है. कज़ाकी नामक व्यक्ति डाक विभाग का हरकारा था और लंबी यात्राओं पर दूर-दूर जाता था. वापसी में वह प्रेमचंद के लिए कुछ न कुछ लाता था. कहानी ढपोरशंख में वह एक कपटी साहित्यकार द्वारा ठगे जाने का मार्मिक वर्णन करते हैं.

उन्होंने अपने उपन्यास और कहानियों में ज़िंदगी की हक़ीक़त को पेश किया. गांवों को अपने लेखन का प्रमुख केंद्रबिंदु रखते हुए उन्हें चित्रित किया. उनके उपन्यासों में देहात के निम्न-मध्यम वर्ग की समस्याओं का वर्णन मिलता है. उन्होंने सांप्रदायिक सदभाव पर भी ख़ास ज़ोर दिया. प्रेमचंद को उर्दू लघुकथाओं का जनक कहा जाता है. उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख और संस्मरण आदि विधाओं में साहित्य की रचना की, लेकिन प्रसिद्ध हुए कहानीकार के रूप में. उन्हें अपनी ज़िंदगी में ही उपन्यास सम्राट की पदवी मिल गई. उन्होंने 15 उपन्यास, तीन सौ से ज़्यादा कहानियां, तीन नाटक और सात बाल पुस्तकें लिखीं. इसके अलावा लेख, संपादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र लिखे और अनुवाद किए. उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया. उनकी कहानियों में अंधेर, अनाथ लड़की, अपनी करनी, अमृत, अलग्योझा, आख़िरी तोहफ़ा, आख़िरी मंज़िल, आत्म-संगीत, आत्माराम, आधार, आल्हा, इज़्ज़त का ख़ून, इस्तीफ़ा, ईदगाह, ईश्वरीय न्याय, उद्धार, एक आंच की कसर, एक्ट्रेस, कप्तान साहब, कफ़न, कर्मों का फल, कवच, क़ातिल, काशी में आगमन, कोई दुख न हो तो बकरी ख़रीद लो, कौशल, क्रिकेट मैच, ख़ुदी, ख़ुदाई फ़ौजदार, ग़ैरत की कटार, गुल्ली डंडा, घमंड का पुतला, घरजमाई, जुर्माना, जुलूस, जेल, ज्योति,झांकी, ठाकुर का कुआं, डिप्टी श्यामचरण, तांगेवाले की बड़, तिरसूल तेंतर, त्रिया चरित्र, दिल की रानी, दुनिया का सबसे अनमोल रतन, दुर्गा का मंदिर, दूसरी शादी, दो बैलों की कथा, नबी का नीति-निर्वाह, नरक का मार्ग, नशा, नसीहतों का दफ़्तर, नाग पूजा, नादान दोस्त, निर्वासन, नेउर, नेकी, नैराश्य लीला, पंच परमेश्वर, पत्नी से पति, परीक्षा, पर्वत-यात्रा, पुत्र- प्रेम, पूस की रात, प्रतिशोध, प्रायश्चित, प्रेम-सूत्र, प्रेम का स्वप्न, बड़े घर की बेटी,  बड़े बाबू, बड़े भाई साहब,  बंद दरवाज़ा, बांका ज़मींदार, बूढ़ी काकी, बेटों वाली विधवा, बैंक का दिवाला, बोहनी, मंत्र, मंदिर और मस्जिद, मतवाली योगिनी, मनावन, मनोवृति, ममता, मां, माता का हृदय, माधवी, मिलाप, मिस पद्मा, मुबारक बीमारी, मैकू, मोटेराम जी शास्त्री, राजहठ, राजा हरदैल, रामलीला, राष्ट्र का सेवक, स्वर्ग की देवी, लेखक, लैला, वफ़ा का ख़ंजर, वरदान, वासना की कड़ियां, विक्रमादित्य का तेगा, विजय, विदाई, विदुषी वृजरानी, विश्वास, वैराग्य, शंखनाद, शतरंज के खिलाड़ी, शराब की दुकान, शांति, शादी की वजह, शूद्र, शेख़ मख़गूर, शोक का पुरस्कार, सभ्यता का रहस्य, समर यात्रा, समस्या, सांसारिक प्रेम और देशप्रेम, सिर्फ़ एक आवाज़, सैलानी,  बंदर, सोहाग का शव, सौत, स्त्री और पुरुष, स्वर्ग की देवी, स्वांग, स्वामिनी, हिंसा परमो धर्म और होली की छुट्टी आदि शामिल हैं. साल 1936 में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन को सभापति के रूप में संबोधित किया था. उनका यही भाषण प्रगतिशील आंदोलन का घोषणा-पत्र का आधार बना. प्रेमचंद अपनी महान रचनाओं की रूपरेखा पहले अंग्रेज़ी में लिखते थे. इसके बाद उन्हें उर्दू या हिंदी में अनुदित कर विस्तारित करते थे.

प्रेमचंद सिनेमा के सबसे ज़्यादा लोकप्रिय साहित्यकारों में से हैं. उनकी मौत के दो साल बाद के सुब्रमण्यम ने 1938 में सेवासदन उपन्यास पर फ़िल्म बनाई. प्रेमचंद की कुछ कहानियों पर और फ़िल्में भी बनी हैं, जैसे सत्यजीत राय की फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी. प्रेमचंद ने मज़दूर फ़िल्म के लिए संवाद लिखे थे. फ़िल्म में एक देशप्रेमी मिल मालिक की कहानी थी, लेकिन सेंसर बोर्ड को यह पसंद नहीं आई. हालांकि दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब में यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई. फ़िल्म का मज़दूरों पर ऐसा असर पड़ा कि पुलिस बुलानी पड़ गई. आख़िर में फ़िल्म के प्रदर्शन पर सरकार ने रोक लगा दी. इस फ़िल्म में प्रेमचंद को भी दिखाया गया था. वह मज़दूरों और मालिकों के बीच एक संघर्ष में पंच की भूमिका में थे. 1977  में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी कफ़न पर आधारित ओका ऊरी कथा नाम से एक तेलुगु फ़िल्म बनाई, जिसे सर्वश्रेष्ठ तेलुगु फ़िल्म का राष्ट्रीय प्रुरस्कार मिला. 1963 में गोदान और  1966 में ग़बन उपन्यास पर फ़िल्में बनीं, जिन्हें ख़ूब पसंद किया गया. 1980 में उनके उपन्यास पर बना टीवी धारावाहिक निर्मला भी बहुत लोकप्रिय हुआ था.

8 अक्टूबर, 1936 को जलोदर रोग से मुंशी प्रेमचंद की मौत हो गई. उनकी स्मृति में भारतीय डाक विभाग ने 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के मौक़े पर  30 पैसे मूल्य का डाक टिकट जारी किया. इसके अलावा गोरखपुर के जिस स्कूल में वह शिक्षक थे, वहां प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई. यहां उनसे संबंधित वस्तुओं का एक संग्रहालय भी है. प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी ने प्रेमचंद घर में नाम से उनकी जीवनी लिखी. उनके बेटे अमृत राय ने भी क़लम का सिपाही नाम से उनकी जीवनी लिखी.


लाल बिहारी लाल
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायधीश एमवी मुरलीधरन ने आदेश दिया है कि राष्ट्रगीत वंदे-मातरम को हर सरकारी/ग़ैर-सरकारी दफ़्तरों/संस्थानों/उद्योगों में हर महीने कम से कम एक बार गाना होगा. यह गीत मूल रूप से बांग्ला और संस्कृत भाषा में है, इसलिए इसे तमिल और अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के भी आदेश दिए गए हैं. जिस मामले में यह फ़ैसला दिया गया है, उसमें इस गीत को गाने या न गाने से संबंधित किसी तरह की अपील नहीं की गई थी. यह गीत शिक्षा संस्थाओं में अनिवार्य रूप से गाया जाए या नहीं, इस के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में आगामी 25 अगस्त को सुनवाई होनी है.
काबिले-ग़ौर है कि वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद एक मुस्लिम महिला लड़की ने ही किया है, जिनका नाम है फ़िरदौस ख़ान. वे शाइरा, लेखिका और पत्रकार हैं और लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी के नाम से जानी जाती हैं.
वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद इस प्रकार है-
मां तैनूं सलाम
तू भरी है मिठ्ठे पाणी नाल
फल फुल्लां दी महिक सुहाणी नाल
दक्खण दीआं सरद हवावां नाल
फ़सलां दीआं सोहणिआं फ़िज़ावां नाल
मां तैनूं सलाम…

तेरीआं रातां चानण भरीआं ने
तेरी रौणक पैलीआं हरीआं ने
तेरा पिआर भिजिआ हासा है
तेरी बोली जिवें पताशा है

डॊ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र गीत वंदे मातरम एक बार भी चर्चा में है. इस बार मद्रास उच्च न्यायालय की वजह से इसके गायन का मुद्दा गरमाया है.   मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायधीश एमवी मुरलीधरन ने आदेश दिया है कि राष्ट्रगीत वंदे-मातरम को हर सरकारी/ग़ैर-सरकारी कार्यालयों/संस्थानों/उद्योगों में हर महीने कम से कम एक बार गाना होगा. यह गीत मूल रूप से बांग्ला और संस्कृत भाषा में है, इसलिए इसे तमिल और अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के भी आदेश दिए गए हैं. उल्लेखनीय है कि एक ओर मुस्लिम समुदाय से ही वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक मुस्लिम लड़की ने ही वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद कर सराहनीय कार्य किया है.वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद करने वाली फ़िरदौस ख़ान शाइरा, लेखिका और पत्रकार हैं. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया. उर्दू में ’वंदे मातरम’ का अर्थ है ’मां तुझे सलाम’. ऐसे में किसी को भी अपनी मां को सलाम करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. आशा है कि आगे भी देश-विदेश की अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होगा.

उल्लेखनीय यह भी है कि जिस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया गया है, उसमें वंदे मातरम को गाने या न गाने से संबंधित किसी तरह की अपील नहीं की गई थी. यह गीत शिक्षा संस्थाओं में अनिवार्य रूप से गाया जाए या नहीं, इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय में आगामी 25 अगस्त को सुनवाई होनी है.

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. फिर अपनी मातृभूमि से प्रेम क्यों नहीं ? अपनी मातृभूमि की अस्मिता से संबद्ध प्रतीक चिन्हों से घृणा क्यों? प्रश्न अनेक हैं, परंतु उत्तर कोई नहीं. प्रश्न है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का. क्यों कुछ लोग इसका इतना विरोध करते हैं कि वे यह भी भूल जाते हैं कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, जिस राष्ट्र में निवास करते हैं, यह उसी राष्ट्र का गीत है, उस राष्ट्र की महिमा का गीत है?

वंदे मातरम को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होते रहे हैं, परंतु इसकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती चली गई.  2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार वंदे मातरम विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है. इस सर्वेक्षण विश्व के लगभग सात हज़ार गीतों को चुना गया था. बीबीसी के अनुसार 155 देशों और द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था.  उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कर्नाटक विधानसभा के इतिहास में पहली बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ शुरू हुई. अधिकारियों के अनुसार कई विधानसभा सदस्यों के सुझावों के बाद यह निर्णय लिया गया था. विधानसभा अध्यक्ष कागोदू थिमप्पा ने कहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में वंदे मातरम गाया जाता है और सदस्य बसवराज रायारेड्डी ने इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव दिया था, जिसे आम-सहमति से स्वीकार कर लिया गया.

वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. वंदे मातरम बहुत लंबी रचना है, जिसमें मां दुर्गा की शक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है. उल्लेखनीय है कि 1870 के दौरान ब्रिटिश शासन ने 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था. बंकिमचंद्र चटर्जी को इससे बहुत दुख पहुंचा. उस समय वह एक सरकारी अधिकारी थे. उन्होंने इसके विकल्प के तौर पर 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में वंदे मातरम की रचना की. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया. 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया. वास्तव में बंकिमचंद्र ने 1881 में अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में इस गीत को सम्मिलित कर लिया. उसके बाद कहानी की मांग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को और लंबा किया, अर्थात बाद में जोड़े गए भाग में ही दशप्रहरणधारिणी, कमला और वाणी के उद्धरण दिए गए हैं. बाद में इस गीत को लेकर विवाद पैदा हो गया.

वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था. इसके बावजूद इसे राष्ट्रगान के रूप में नहीं चुना गया. वंदे मातरम के स्थान पर वर्ष 1911 में इंग्लैंड से भारत आए जॊर्ज पंचम के सम्मान में रबींद्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे और गाये गए गीत जन गण मन को वरीयता दी गई. इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर आपत्ति थी. उनका कहना था कि वंदे मातरम में मूर्ति पूजा का उल्लेख है, इसलिए इसे गाना उनके धर्म के विरुद्ध है. इसके अतिरिक्त यह गीत जिस आनंद मठ से लिया गया है, वह मुसलमानों के विरुद्ध लिखा गया है. इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है.  1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठे. कुछ मुसलमानों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने इस पर विचार-विमर्श किया. पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव भी शामिल थे. समिति का मानना था कि इस गीत के प्रथम दो पदों में मातृभूमि की प्रशंसा की गई है, जबकि बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का उल्लेख किया गया है. समिति ने 28 अक्टूबर, 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस गीत के प्रारंभिक दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा. इस समिति का मार्गदर्शन रबींद्रनाथ ठाकुर ने किया था. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने ’सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ के साथ बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारंभिक दो पदों का गीत वंदे मातरम राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ. 14 अगस्त, 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ वंदे मातरम के साथ हुआ. फिर 15 अगस्त, 1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध वंदे मातरम के गायन का सजीव प्रसारण हुआ था. डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी, 1950 को  वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.  वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता मिल जाने पर अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसरों पर यह  गीत गाया जाता है. आज भी आकाशवाणी के सभी केंद्रों का प्रसारण वंदे मातरम से ही होता है. वर्ष 1882 में प्रकाशित इस गीत को सर्वप्रथम 7 सितंबर, 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया था. इसलिए वर्ष 2005 में इसके सौ वर्ष पूरे होने पर साल भर समारोह का आयोजन किया गया. 7 सितंबर, 2006 को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया था.  इसके बाद देशभर में वंदे मातरम का विरोध प्रारंभ हो गया. परिणामस्वरूप तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को संसद में यह वक्तव्य देना पड़ा कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है. यह व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह वंदे मातरम गाये अथवा न गाये. इस तरह कुछ दिन के लिए यह मामला थमा अवश्य, परंतु वंदे मातरम के गायन को लेकर उठा विवाद अब तक समाप्त नहीं हुआ है. जब भी वंदे मातरम के गायन की बात आती है, तभी इसके विरोध में स्वर सुनाई देने लगते हैं. इस गीत के पहले दो पदों में कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है. इसके बाद भी कुछ मुसलमानों का कहना है कि इस गीत में दुर्गा की वंदना की गई है, जबकि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने की मनाही है. इसके अतिरिक्त यह गीत ऐसे उपन्यास से लिया गया है, जो मुस्लिम विरोधी है. गीत के पहले दो पदों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन किया गया है. इसके बाद के दो पदों में मां दुर्गा की अराधना है, लेकिन इसे कोई महत्व नहीं दिया गया है. ऐसा भी नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को वंदे मातरम के गायन पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर विशेष बल देते हैं. कुछ वर्ष पूर्व विख्यात संगीतकार एआर रहमान ने वंदे मातरम को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था, जो बहुत लोकप्रिय हुआ. उल्लेखनीय बात यह भी है कि ईसाई समुदाय के लोग भी मूर्ति-पूजा नहीं करते, इसके बावजूद उन्होंने कभी वंदे मातरम के गायन का विरोध नहीं किया.  

संतोष जैन पासी / आकांक्षा जैन  
हैपेटाइटिस : हैपेटाइटिस संक्रमण के कारण फैलने वाला यकृत (लिवर) संबंधी रोग है. वर्ष 2015 में इससे दुनियाभर में लगभग 13.4 लाख लोगों की मौत हो गई थी. (यह संख्या क्षय रोग से होने वाली मौतों के बराबर थी). हैपेटाइटिस से होने वाली मौतों में से ज्यादातर का कारण पुरानी यकृत बीमारी/यकृत कैंसर का प्राथमिक स्वरूप रहा. (सिरोसिस के कारण होने वाली मौतें – 7,20,000 और  हैप्टो सेल्यूलर कार्सिनोमा के कारण होने वाली मौतें – 4,70,000).  अभी भी समय के साथ हैपेटाइटिस संक्रमण से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ रही हैं.  

हैपेटाइटिस संक्रमण : हैपेटाइटिस संक्रमण एक जन स्वास्थ्य समस्या है. यह इन 5 में से किसी भी एक हैपेटोट्रोपिक विषाणु से हो सकती है. इसमें शामिल हैं हैपेटाइसिस ए, बी, सी, डी और ई. ये अपनी संरचना, जानपदिक, प्रसार प्रणाली, अंडे सेने की अवधि, लक्षण, रोग की पहचान, बचाव और उपचार के विकल्प के संबंध में एक-दूसरे से बहुत अधिक भिन्न होते हैं.

विश्व में 24 करोड़ लोग लंबे समय से हैपेटाइसिस बी और 13-15 करोड़ लोग हैपेटाइसिस सी के संक्रमित है. वैश्विक हैपेटाइसिस रिपोर्ट 2017 बताती है कि इन लोगों में से अधिकतर संख्या उन लोगों की है जिनकी पहुंच जीवन रक्षक जांच और उपचार तक नहीं है. इसके परिणामस्वरूप इन में से अधिकतर क्रॉनिक लिवर रोग और कैंसर के खतरे से जूझ रहे हैं. जिससे अंतत: उनकी मौत हो जाती है. जन स्वास्थ्य के इस खतरे को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक मार्ग्रेट चान ने सभी देशों से वर्ष 2030 हैपेटाइटिस संक्रमण को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाने और विश्व को इस जानलेवा बीमारी से मुक्त करने का अनुरोध किया है. सतत विकास उद्देश्य 3 - लक्ष्य 3 (सीडीजी 3.3) हैपेटाइटिस संक्रमण, जल जनित, और अन्य संक्रामक रोगों का सामना करने के लिए विशिष्ट कदम उठाने का आह्वाहन करता है.

भारत में संक्रामक हैपेटाइटिस (ए से ई तक) बड़ी जन स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है. जिसमें हैपेटाइटिस बी के रोगियों की संख्या अधिक है. एक आकलन के अनुसार 4 करोड़ लोग इससे ग्रसित हैं जो विद्यमान जनसंख्या का 3 से 4 प्रतिशत है. हालांकि इसकी भौगोलिक मौजूदगी में विभिन्नता है. अरूणाचल प्रदेश और अंडमान के निवासियों में सर्वाधिक है.

विश्व हैपेटाइटिस दिवस (28 जुलाई) प्रतिवर्ष मनाया जाता है. यह संक्रामक हैपेटाइटिस के संबंध में वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ इसकी रोकथाम, रोग की पहचान और उपचार को प्रोत्साहित करने राष्ट्रीय/ अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है. ताकि वर्ष 2030 तक इसका उन्मूलन किया जा सके. जेनेवा में 69वीं विश्व स्वास्थ्य परिषद में 194 सरकारों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अगले 13 वर्षों में संक्रामक हैपेटाइटिस पर स्वास्थ्य क्षेत्र की पहली वैश्विक रणनीति (2016-2021) को हैपेटाइटिस बी और हैपेटाइटिस सी के उन्मूलन के लक्ष्य के साथ स्वीकार किया है. समुदाय ने वर्ष 2030 तक संक्रामक हैपेटाइटिस के उन्मूलन के पहले वैश्विक आंदोलन को लेकर ‘नो हैप’ का शुभारंभ किया है. वर्ष 2017 की थीम ‘हैपेटाइटिस उन्मूलन’ है.

हैपेटाइटिस संक्रमण के प्रतिजन में विभिन्न्ता के बावजूद, रोग के विकट चरण के दौरान ज्यादातर लक्षण सामान्य हैं. जिसमें बुखार, थकान, अरूचि, जी मचलाना, उल्टी, दस्त, पेट दर्द, जोड़ों का दर्द और  पीलिया शामिल है. हालांकि इनके संचरण की प्रणाली भिन्न है. हैपेटाइटिस ए और ई का संचरण मौखिक और मल के द्वारा होता है, वहीं हैपेटाइटिस बी, सी और डी का संचरण असुरक्षित खून चढ़ाने, दूषित सुई, सिरींज, यौन संचरण या मां से बच्चे को संचरण के द्वारा होता है. हैपेटाइटिस डी और और ई की तुलना में हैपेटाइटिस ए, बी और सी अधिक सामान्य है.

हैपेटाइटिस ए विषाणु (एचएवी) प्राय: इससे संक्रमित व्यक्ति के मल में उपस्थित होता है और सामान्यत: दूषित पानी/भोजन और कई बार असुरक्षित यौन संबंधों (15 से 50 दिनों की प्रजनन के अवधि के दौरान) के जरिए फैलता है. ज्यादातर मामलों में संक्रमण हल्का और स्वास्थ्य लाभ पूरा नहीं मिल पाता, बल्कि इससे प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है. कई बार गंभीर संक्रमण जानलेवा साबित होते हैं. रोगी को समुचित आहार प्रबंधन और उपचार  की आवश्यकता होती है. अस्वच्छ पर्यावरणीय परिस्थितियों में रहने वाले लोग इस संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं. हालांकि इससे बचाव के लिए सुरक्षित और प्रभावकारी टीके उपलब्ध हैं.

हैपेटाइटिस बी विषाणु (एचबीवी) सामान्यत: संक्रमित रक्त, शुक्राणुओं और शरीर के अन्य द्रव्यों के जरिए फैलता है. खासतौर पर खून /खून उत्पादों को चढ़ाने के दौरान, दूषित सुइयों/ सिरींज के इस्तेमाल (खासकर दवा के रूप में उपयोग) या संक्रमित व्यक्ति से यौन संबंध बनाने, कई बार संक्रमित माताओं से उनके नवजात बच्चों को जन्म के समय 45-160 दिनों की प्रजनन अवधि के दौरान होता है. भारत में इस संक्रमण के कारण 30 प्रतिशत लीवर सिरोसिस और 40 से 50 प्रतिशत लिवर कैंसर के मामले सामने आते हैं. रोगी को समुचित नियमित जांच व निगरानी की आवश्यकता होती है. कुछ को जीवाणुरोधी उपचार की आवश्यकता पड़ती है. इस संक्रमण से उपचार के भी प्रभावकारी और सुरक्षित टीके उपलब्ध हैं.

हैपेटाइटिस सी विषाणु (एचसीवी) भी संक्रमित रक्त, शुक्राणुओं और शरीर के अन्य द्रव्यों के जरिए फैलता है. इसके संचरण की प्रणाली और उपचार के विकल्प एचबीवी के समान ही हैं. इसके प्रजनन की अवधि 14-180 दिनों की होती है. वर्ष 2014 में लीवर एंड बिलेरी साइंसिस संस्थान ने बताया कि लगभग 1.2 करोड़ लोग लंबे समय से हैपेटाइसिस सी से संक्रमित हैं. पंजाब, हरियाणा, आंध्रप्रदेश, पुदुचेरी, अरूणाचल और मिजोरज राज्यों में इसके रोगियों की संख्या अधिक है. हालांकि इसके विषाणु से सुरक्षा के लिए अभी तक कोई भी टीका उपलब्ध नहीं है.

लंबे समय से हैपेटाइटिस बी और सी से संक्रमित अधिकतर रोगी संक्रमण से अनभिज्ञ होते हैं. इसलिए उनको सिरोसिस और यकृत कैंसर होने का गंभीर खतरा बना रहता है.

हैपेटाइटिस डी विषाणु (एचडीवी) एक आरएनए विषाणु है जो हैपेटाइटिस बी की जगह लेता है. इसलिए यह एचबीवी से संक्रमित रोगियों को ही अपनी चपेट में लेता है. विश्वभर में लगभग 1.2 करोड़ लोग लंबे समय से चली आ रही बीमारी एचबीवी और एचडीवी से एक साथ संक्रमित हैं. यह दोहरा संक्रमण अधिक गंभीर और घातक साबित हो सकता है. इसका संक्रमण लगभग एचबीवी के संक्रमण के समान है. केवल इसमें माता से बच्चे संक्रमण के बेहद कम मामले सामने आते हैं. हालांकि एचडीवी के प्रभावकारी विषाणुरोधी उपचार उपलब्ध है. हैपेटाइटिस बी का टीका इस संक्रमण में भी सुरक्षा और बचाव का काम करता है.  

हैपेटाइटिस ई विषाणु (एचईवी) एक छोटा विषाणु है. इसका संक्रमण सामान्यत: दूषित पानी और भोजन से होता है. इसके प्रजनन की अवधि 2-10 सप्ताह की होती है. विश्वभर में लगभग 2 करोड़ लोग एचईवी से संक्रमित हैं. इससे प्रतिवर्ष 56,600 लोग मारे जाते हैं. हालांकि यह विश्वभर में विद्यमान है लेकिन दक्षिणी- पूर्वी एशिया में इसके सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं. हैपेटाइटिस ई संक्रमित गर्भवती महिलाओं को खासकर दूसरी और तीसरी तिमाही में लि वर खराब होने, गर्भपात या मृत्यु का गंभीर खतरा बना रहता है. यह संक्रमण कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों में अधिक सामान्य होता है. खासकर अंग प्रत्यार्पण और प्रतिरक्षा प्रणाली की दवाओं का सेवन करने वाले लोगों में यह संक्रमण अधिक होता है. गुणवतापूर्ण जलापूर्ति, मानव मल का समुचित निष्कासन, आहार सुरक्षा और प्रभावकारी तरीकों को अपनाकर इस संक्रमण से बचाव संभव है. चीन को छोड़कर भारत या किसी अन्य देश में इसका टीका उपलब्ध नहीं है.

भारत दुनिया के उन 11 देशों में शामिल है जो लंबे समय से चली आ रही बीमारी हैपेटाइटिस के वैश्विक बोझ का 50 प्रतिशत वहन करता है. खासकर हैपेटाइटिस बी के खतरों को महसूस करते हुए वर्ष 2004 में आरंभिक योजना के तहत लगभग 12 लाख भारतीय बच्चों को हैपेटाइटिस बी की 3 खुराक प्रदान की गई. इसके बाद सरकार ने वर्ष 2007-08 में हैपेटाइटिस बी के टीकाकरण को सार्वभौमिक प्रतिरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत विस्तार प्रदान किया. इसके बाद भारत सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय हैपेटाइटिस संक्रमण नियंत्रक और बचाव कार्यक्रम की शुरूवात की. इसके पश्चात सरकार ने रोग नियंत्रण राष्ट्रीय केंद्र के अधीन 30 करोड़ की अनुमानित बजट के साथ राष्ट्रीय हैपेटाइटिस संक्रमण निगरानी कार्यक्रम की शुरूवात की.

भारत को एचएवी टीकाकरण को पुन: और अधिक युक्तिसंगत बनाने की आवश्यकता है. वहीं  एचसीवी और एचईवी टीकों की उपलब्धता और विकास को प्रमुखता देने की आवश्यकता है. स्वच्छ भारत अभियान के तहत सुरक्षित पेयजल और समुचित स्वच्छता के संगठित प्रयासों के बावजूद को इसे और अधिक प्रमुखता देने की आवश्यकता है. रक्त चढ़ाते समय, सुई लगाते समय सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना हैपेटाइटिस संक्रमण से बचाव में अहम भूमिका निभाता है. हैपेटाइटिस संक्रमण के मुददों का समाधान करने के लिए समर्पित, प्रशिक्षित जन स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं की अत्यंत आवश्यकता है.

देश में हैपेटाइटिस संक्रमण से बचाव, प्रबंध और उन्मूलन कई चुनौतियों के बावजूद सभी हितधारकों के सामूहिक समन्वय और विस्तृत कार्य योजना से निश्चित तौर पर भारत को हैपेटाइटिस संक्रमण मुक्त राष्ट्र बनाने के लक्ष्य में मदद मिलेगी.

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