इश्क़ की नज़्म...
-
मैं
उम्र के काग़ज़ पर
इश्क़ की नज़्म लिखती रही
और
वक़्त गुज़रता गया
मौसम-दर-मौसम
ज़िन्दगी की तरह...
*-फ़िरदौस ख़ान*
फ़िरदौस ख़ान
देशभर में 15 अगस्त
को जश्ने-आज़ादी के तौर पर मनाया जाता है, लेकिन इन्हीं खुशनुमा लम्हों के बीच एक ऐसा भी तबका है जिसके लिए इस दिन का
कोई विशेष महत्व नहीं है। चौंकिए नहीं, यह सच है। दरअसल, घुमंतू जातियां के लोग 31 अगस्त को आज़ादी का जश्न
मनाते हैं।
ऑल इंडिया विमुक्त जाति मोर्चा के सदस्य भोला का कहना है कि ऐसा
नहीं कि हम स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाते, लेकिन सच तो
यही है कि हमारे लिए 15 अगस्त की बजाय 31 अगस्त का ज़्यादा महत्व है।
वे बताते हैं कि 15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ था और लोग खुली फिजा में सांस ले रहे थे, तब भी
घुमंतू जातियों के लोगों को दिन में तीन बार पुलिस थाने में हाज़िरी लगानी पड़ती थी। अगर कोई व्यक्ति बीमार होने पर या किसी दूसरी वजह से
थाने में उपस्थित नहीं हो पाता तो पुलिस द्वारा उसे प्रताड़ित किया जाता था। इतना
ही नहीं चोरी या कोई अन्य अपराधिक घटना होने पर भी पुलिस कहर उन पर टूटता था। यह
सिलसिला लंबे अरसे तक चलता रहा। आखिरकार तंग आकर प्रताड़ित लोगों ने इस प्रशासनिक
कुप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की और फिर शुरू हुआ सिलसिला लोगों में जागरूकता लाने का। लोगों का
संघर्ष रंग लाया और फिर वर्ष 1952 में अंग्रेजों द्वारा 1871 में बनाए गए एक्ट
संशोधन किया गया। इसी साल 31 अगस्त को घुमंतू जातियों के लोगों को थाने में हाज़िरी लगाने से निजात मिली।
इस समय देशभर में विमुक्त जातियों के 192 कबीलों के क़रीब 20 करोड़
लोग हैं। हरियाणा की क़रीब साढ़े सात फ़ीसदी आबादी इन्हीं जातियों की है। इन विमुक्त
जातियों में सांसी, बावरिये, भाट, नट, भेड़कट और किकर आदि जातियां शामिल हैं। भाट जाति
से संबंध रखने वाले प्रभु बताते हैं कि 31 अगस्त के दिन कबीले के रस्मो-रिवाज के मुताबिक़ सामूहिक नृत्य का आयोजन किया जाता है।
महिलाएं इकट्ठी होकर पकवान बनाती हैं और उसके बाद सामूहिक भोज होता है। बच्चे भी
अपने-अपने तरीकों से खुशी ज़ाहिर करते हैं। कई क़बीलों में पतंगबाज़ी का आयोजन किया जाता है। जीतने वाले
व्यक्ति को समारोह की शोभा माना जाता है। लोग उसे बधाइयां के साथ उपहार पेश करते
हैं। इन जातियों के लोगों के संस्थानों में भी 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह
मनाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में केंद्रीय मंत्रियों से लेकर विभिन्न राजनीतिक
दलों के प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी भी शिरकत करते हैं। इसकी तैयारियों के लिए
संगठन के पदाधिकारी इलाके के गांव-गांव का दौरा कर लोगों को समारोह के लिए
आमंत्रित करते हैं।
हरियाणा के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी आदिवासी समाज की
अनेक जातियां निवास करती हैं, जिनमें आंध प्रदेश में भील, चेंचु, गोंड, कांडा, लम्बाडी, सुंगली और नायक, असम
में बोषे, कचारी मिकिर यानी कार्बी,
लंलुग, राथा, दिमासा, हमर और हजोंग, बिहार और झारखंड में झमुर, बंजारा, बिरहोर, कोर्वा, मुंडा, ओरांव, संथाल, गोंड और खंडिया, गुजराज में भील, ढोडिया, गोंड, सिद्दी, बोर्डिया और भीलाला, हिमाचल प्रदेश में गद्दी, लाहुआला और स्वांगला, कर्नाटक में भील, चेंचु, गाउड, कुरूबा, कम्मारा, कोली, कोथा, मयाका और टोडा, केरल में आदियम, कोंडकप्पू, मलैस और पल्लियार,
मध्य प्रदेश में भील, बिरहोर, उमर, गोंड, खरिआ, माझी, मुंडा और ओरांव, छत्तीसगढ़ में परही, भीलाला, भीलाइत, प्रधान, राजगोंड, सहरिया, कंवर, भींजवार, बैगा, कोल और कोरकू, महाराष्ट्र में भील, भुंजिआ, चोधरा, ढोडिया, गोंड, खरिया, नायक, ओरावं, पर्धी और पथना, मेघालय
में गारो, खासी और जयंतिया, उड़ीसा में
जुआंग, खांड, करूआ, मुंडारी, ओरांव, संथाल, धारूआ और नायक, राजस्थान में भील, दमोर, गरस्ता, मीना और सलरिया, तमिलनाडू में इरूलर, कम्मरार,
कोंडकप्पू, कोटा, महमलासर, पल्लेयन और टोडा, त्रिपुरा में चकमा, गारो, खासी, कुकी, लुसाई, लियांग और संताल,
पश्चिम बंगाल में असुर, बिरहोर, कोर्वा, लेपचा, मुंडा, संथाल और गोंड, मिजोरम में लुसई, कुकी, गारो, खासी, जयंतिया और मिकिट, गोवा
में टोडी और नायक, दमन व द्वीप में ढोडी, मिक्कड़ और वर्ती, अंडमान में जारवा, निकोबारी, ओंजे, सेंटीनेलीज, शौम्पेंस और ग्रेट अंडमानी, उत्तरप्रदेश और
उत्तराखंड में भाटी, बुक्सा, जौनसारी
और थारू, नागालैंड में नागा, कुकी, मिकिट और गारो, सिक्किम में भुटिया और लेपचा तथा
जम्मू व कश्मीर में चिद्दंपा, गर्रा,
गाुर और गड्डी आदि शामिल हैं। इनमें से अनेक जातियां अपने अधिकारों को लेकर
संघर्षरत हैं।
इंडियन नेशनल लोकदल के
टपरीवास विमुक्त जाति मोर्चा के जिलाध्यक्ष बहादुर सिंह का कहना है कि
आजादी के छह दशक बाद भी आदिवासी समाज की घुमंतू जातियां विकास से
कोसों दूर हैं। वे कहते हैं कि घुमंतू जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के
लिए सरकार को चाहिए कि वे इन्हें स्थाई रूप से आबाद करे। इनके लिए बस्तियां
बनाई जाएं और उन्हें आवास मुहैया कराए जाएं। बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाए।
उन्हें एसटी का दर्जा दिया जाए, ताकि उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल सके।
गौरतलब है कि आदिवासी समाज की अधिकतर जातियां आज भी बदहाली की ज़िन्दगी गुज़ारने का मजबूर हैं। ग्रामीण
विकास मंत्रालय के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ इन जातियों का आधे
से ज़्यादा हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे पाया गया है।
इनकी प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे नीचे रहती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ जनजातियों की 9,17,590 एकड़ जनजातीय भूमि हस्तांतरित की गई और ऐसी भूमि का महज़ 5,37,610 एकड़ भूमि ही उन्हें वापस दिलाई गई है।
घुमंतू जातियों की बदहाली के अनेक कारण हैं, जिनमें वनों का विनाश मुख्य रूप से शामिल है। वन जनजातियों के जीवनयापन
का एकमात्र साधन हैं, लेकिन वन परिस्थितिकी तंत्रों में
जनजातियों और वन के बीच एक अटूट रिश्ता है। खत्म हो रहे वन संसाधन, वन जनसंख्या के एक बड़े हिस्से के लिए खाद्य सुरक्षा को जोखिम में डाल रहे
हैं। जागरूकता की कमी भी इन जातियों के विकास में रुकावट बनी है। केंद्र सरकार और
प्रदेश सरकारों द्वारा शुरू किए गए विभिन्न विकास संबंधी कार्यक्रमों के बारे में
घुमंतू जातियों के लोगों को जानकारी नहीं है, जिसके कारण
उन्हें योजनाओं का समुचित लाभ नहीं मिल पाता।
गौरतलब है कि
पांचवीं पंचवर्षीय योजना से देशभर में जनजातियों के विकास के लिए जनजातीय उप योजना
कार्यनीत टीएसपी भी अपनाई गई। इसके तहत अमूमन जनजातियों से बसे संपूण क्षेत्र को
उनकी आबादी के हिसाब से कई वर्गों में शामिल किया गया है। इन वर्गों में समेकित
क्षेत्र विकास परियोजना टीडीपी, संशोधित क्षेत्र विकास .ष्टिकोण माडा, क्लस्टर और आदिम जनजातीय समूह शामिल हैं। जनजातीय उप योजना दृष्टिकोण कम
से कम राज्य में राज्य योजना से जनजातियों की आबादी के अनुपात में और केंद्रीय
मंत्रालयों और वित्तीय संस्थाओं के बजट से देश के लिए जनजातीय आबादी के समग्र
समानुपात में राज्य योजना के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रालयों से जनजातीय क्षेत्रों के
लिए निधि आबंटन सुनिश्चित करता है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अनुसूचित जनजातियों के
कल्याण और विकास पर लक्षित विभिन्न योजनाओं करे कार्यान्वित करना जारी रखा है, लेकिन अफ़सोस की बात
यही है कि अज्ञानता, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के चलते ये
जातियां सरकारी योजनाओं के लाभ से महरूम हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि इन जातियों में जागरूकता अभियान चलाकर उनके चहुंमुखी विकास के लिए
कारगर क़दम उठाए जाएं, वरना सरकार की कल्याणकारी योजनाएं कागज़ों तक ही सिमट कर रह जाएंगी।
फ़िरदौस ख़ान
मरहबा सद मरहबा आमदे-रमज़ान है
खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा
हुआ ईमान है
हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है
या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...
माहे-रमज़ान इबादत, नेकियों और रौनक़ का महीना है। यह हिजरी कैलेंडर का नौवां
महीना होता है। इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं,
जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल है। रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने
का मौक़ा रमज़ान में आता है। कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है। इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु
अलैहि वसल्लम पर कुरआन नाज़िल किया था। यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान
को क़ैद कर देता है।
रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम
पूरा कर लिया जाता है। मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं। रमज़ान का चांद देखने के
साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है। रमज़ान के महीने
में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को 'तरावीह' कहते हैं। इसका वक्त रात
में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि
वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली। आपने फ़रमाया कि ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) हासिल करने की नीयत से रमज़ान
में क़ियामुल्लैल किया उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे।''उन्होंने फ़रमाया कि ''यह ऐसा महीना है कि इसका
पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है
और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है।'' रमज़ान के
तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है। आपने फ़रमाया कि ''रमज़ान
के आख़िरी अशरे की ताक़ (विषम) रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो।'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है। शबे-क़द्र के बारे में कुरआन में
कहा गया है कि यह हज़ार रातों से बेहतर है, यानि इस रात में
इबादत करने का सवाब एक हज़ार रातों की इबादत के बराबर है। मुसलमान रमज़ान की 21,
23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत
करते हैं।
फ़रहाना कहती हैं- इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है। हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस
और आला है। हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज्यादा से ज्यादा वक्त ऌबादत में
गुज़ारना चाहिए। वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से
ज्यादा ही मिलता है। वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके परिवार के सभी लोग रातभर जागते
हैं। मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं।
वहीं, राशिद
कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके। दोस्तों
के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है। इस महीने की रौनक़ों को देखकर
कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है। रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने का सबक़ देता
है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है।
माहे-रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार व्यंजनों की
भरमार रहती है। रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ व्यंजनों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होता। रमज़ान का
ख़ास व्यंजन हैं फैनी, सेवइयां और खजला। सुबह सहरी
के वक्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है। इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ
पकाया जाता है। फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है। इसके अलावा मीठी
डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है। ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में
ही ज्यादा देखने को मिलती है।
इफ्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है।
अमूमन रोज़ा खजूर के साथ खोला जाता है। दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत
गले को तर करते हैं। फलों का चाट इफ्तार के का एक अहम हिस्सा है। ताज़े फलों का चाट
रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ
ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है। इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले मसालेदार
चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं। खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा,
नरगिसी कोफ्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने
दूसरे लज़ीज़ व्यंजन शामिल रहते हैं। इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है। रुमाली
रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है। इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती
है। यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ोरमे के साथ खाया जाता है। बिरयानी में
हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं। मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़ान पर
की शोभा बढ़ाते हैं।
इशरत जहां कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन
में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है। इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगाना ज़्यादा पसंद करते हैं।
रमज़ान में रोटी बनाने वालों का काम बहुत ज्यादा
बढ़ जाता है। दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं। यहां
तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे
रुमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि।
अमूमन इस इलाके क़े होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं।
रमज़ान में बाज़ार की रौनक़ को चार चांद लग जाते
हैं। रमज़ान में दिल्ली के मीना बाज़ार की रौनक़ के तो क्या कहने। दुकानों पर चमचमाते
ज़री वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक्क़ाशी
वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच ख़रीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे। रमज़ान में तरह-तरह का नया सामान बाज़ार में आने लगता
है। लोग रमज़ान में ही ईद की ख़रीददारी शुरू कर देते हैं। आधी रात तक बाज़ार सजते हैं।
इस दौरान सबसे ज्यादा कपड़ों की ख़रीददारी होती है। दर्ज़ियों का काम बढ़ जाता है। इसलिए
लोग ख़ासकर महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं। अलविदा जुमे को भी नए
कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने का दस्तूर है। हर बार नए डिज़ाइनों के कपड़े बाज़ार में आते हैं।
नेट, शिफ़ौन, जॉरजेट पर कुन्दन वर्क,
सिक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का
काम महिलाओं को ख़ासा आकर्षित करता है। दिल्ली व अन्य शहरों के बाज़ारों में कोलकाता,
सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है। इसके अलावा सदाबहार चिकन
का काम भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पुरानी दिल्ली के कपड़ा व्यापारी शाकिर अली कहते हैं
कि बाज़ार में जिस चीज़ का मांग बढ़ने लगती है हम उसे ही मंगवाना शुरू कर देते हैं। ईद
के महीने में शादी-ब्याह भी ज्यादा होते हैं। इसलिए माहे-रमज़ान में शादी की शॉपिंग
भी जमकर होती है। शादियों में आज भी पारंपरिक पहनावे ग़रारे को ख़ासा पसंद किया जाता
है।
चूड़ियों और मेहंदी के बिना ईद की ख़रीददारी अधूरी
है। रंग-बिरंगी चूड़ियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं। चूड़ियों के बग़ैर सिंगार
पूरा नहीं होता। बाज़ार में तरह-तरह की चूड़ियों की बहार है, जिनमें कांच की चूड़ियां, लाख की चूड़ियां,
सोने-चांदी की चूड़िया, और मेटल की चूड़ियां
शामिल हैं। सोने की चूड़ियां तो अमीर वर्ग तक ही सीमित हैं। ख़ास बात यह भी है कि आज
भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां ही ज्यादा आकर्षित करती हैं। बाज़ार
में कांच की नगों वाली चूड़ियों की भी ख़ासी मांग है। कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कामकाजी
महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूड़ियां ज्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज़ करती हैं और टूटती भी नहीं हैं, जबकि कांच की नाज़ुक चूड़ियां ज्यादा दिनों तक हाथ में नहीं टिक पातीं।
इसके अलावा मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें
भी रमज़ान की रौनक़ को और बढ़ा देती हैं। इत्र, लोबान
और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है। इत्र जन्नतुल-फ़िरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और
हिना का ख़ूब पसंद किया जाता है। रमज़ान में मिस्वाक से दांत साफ़ करना सुन्नत माना जाता
है। इसलिए इसकी मांग भी बढ़ जाती है। रमज़ान में टोपियों की बिक्री भी ख़ूब होती है। पहले
लोग लखनवी दुपल्ली टोपी ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन अब टोपियों
की नई वैरायटी पेश की जा रही हैं। अब तो लोग विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों से सराबोर
पारंपरिक टोपी भी पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा अरबी रुमाल भी ख़ूब बिक रहे हैं। रमज़ान
के मौक़े पर इस्लामी साहित्य, तक़रीरों, नअत, हम्द,क़व्वालियों
की कैसेट सीटी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है।
यूं तो दुनियाभर में ख़ासकर इस्लामी देशों में
रमज़ान बहुत श्रध्दा के साथ मनाया जाता है, लेकिन
भारत की बात ही कुछ और है। विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में मुसलमानों के अलावा
ग़ैर मुस्लिम लोग भी रोज़े रखते हैं। कंवर सिंह का कहना है कि वे पिछले कई वर्षों से
रमज़ान में रोज़े रखते आ रहे हैं। रमज़ान के दौरान वे सुबह सूरज निकलने के बाद से सूरज
छुपने तक कुछ नहीं खाते। उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोज़ों को ज़रूर क़ुबूल करेगा।
भारत देश की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर त्योहार मनाते हैं।
यही जज्बात गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखते हैं।
प्रबीर कुमार बसु
देश की खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि क्षेत्र का महत्व बहुत बड़ा है। देश के कुल कामकाजी लोगों की 58 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका का यही प्रधान साधन है। ऐसे समय में जब विश्व अर्थव्यवस्था मंदी के दौरे से गुजर रही थी और हमारे किसान मौसम की मार झेल रहे थे, पिछले वर्ष के पहले के चार वर्षों के दौरान कृषि की औसत विकास दर 4 प्रतिशत से अधिक थी। वर्ष 2008-09 के दौरान 23 करोड़ 44 लाख 70 हजार टन का रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। 2010 की खरीफ फसल के अप्रत्याशित सूखे के प्रतिकूल प्रभाव से बचाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों ने समय रहते अनेक कदम उठाए, जिसके कारण सूखे का प्रभाव कमतर ही रहा। पिछले वर्ष का सूखा कितना गंभीर था इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2002-03 के भीषण सूखे के दौरान कुल 19 प्रतिशत वर्षा ही कम हुई थी, जबकि पिछले वर्ष सामान्य से 23 प्रतिशत कम वर्षा हुई। गेहूं और चावल के उत्पादन की तुलना की जाए तो जहां 2002-03 में 71.82 मी. टन चावल और 65. 76 मी. टन गेहूं की पैदावार हुई थी, वहीं 2009-10 में चावल की 89.31 मीटर और गेहूं की 80 98 मीटर पैदावार हुई थी।
इन प्रयासों को जारी रखने और विकास की दर बनाए रखने के लिए सरकार ने किसानों, विशेष कर छोटे और सीमांत किसानों की दशा सुधारने की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं। सरकार ने कृषि पर निर्भर लोगों की भलाई के लिए अनेक योजनाएं तैयार की हैं।
यूनतम समर्थन मूल्य
कृषि को स्थाई रूप से लाभदायक व्यवसाय बनाने के लिए प्रमुख अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में पिछले पांच वर्षों (2004-05 से 2009-10) के दौरान 39 प्रतिशत से 70 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृध्दि की गई है। इसी अवधि में दलहनों और तिलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी 104 प्रतिशत की वृध्दि की गई है।
कृषि में निवेश
पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकार द्वारा जो प्रगतिशील कदम उठाए गए हैं उसके परिणाम स्वरूप कृषि और संबंधित क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश में लगातार वृध्दि हो रही है। सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश 2004-05 के 16,183 करोड़ रूपये से बढ़कर 2008-09 में 24,452 करोड़ रूपये हो गया। कुल निवेश में भी वृध्दि हुई है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत आवंटित राशि का उपयोग भी कृषि जनित कार्यों के लिए किया जाना प्रस्तावित है। इनमें भूमि-विकास, जल संसाधनों का सृजन और ग्रामीण सड़कों का निर्माण जैसे कार्य शामिल हैं।
ऋण प्रवाह एवं कर्ज माफी
किसानों के लिए संस्थागत ऋण सुलभ कराना केन्द्र सरकार की प्राथमिकता रही है, क्योंकि उनकी उत्पादकता और आमदनी में सुधार के लिए यह एक महत्वपूर्ण साधन है। सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए 18 जून, 2004 को एक व्यापक पैकेज की घोषणा की थी, जिसमें कृषि हेतु ऋणों के प्रवाह में तेजी लाने और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों को राहत प्रदान करने जैसे उपाय शामिल थे। वर्ष 2006-07 के खरीफ मौसम से किसानों को 3 लाख रूपये तक का ऋण कुल 7 प्रतिशत के ब्याज पर दिया जा रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारें इस उद्देश्य से नाबार्ड और अन्य बैंकों को ब्याज माफी के लिए अनुदान प्रदान कर रही हैं। इसके अलावा, 2010-11 से सरकार समय पर कर्ज का भुगतान करने वाले किसानों के ब्याज में 2 प्रतिशत की अतिरिक्त माफी भी दे रही है। इस प्रकार, समय पर भुगतान करने वाले किसानों पर केवल पांच प्रतिशत की दर से ब्याज लग रहा है।
कर्ज के जाल में फंसे किसानों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार ने 2008-09 के केन्द्रीय वजट में कर्ज माफी और कर्ज में राहत की एक योजना की घोषणा की थी। इस योजना से करीब 3.68 करोड़ किसानों को लाभ हुआ है। इन किसानों को कर्ज माफी और कर्ज राहत के तौर पर 65318.33 करोड़ रूपये की राशि का लाभ हुआ है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम)
राष्ट्रीय और परिवारिक स्तर पर खाद्य सुरक्षा प्रदान करना सरकार के लिए बहुत महत्व रखता है। बढ़ती जनसंख्या की मांग को पूरा करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि की दृष्टि से 2007-08 के रबी मौसम से देश के 17 राज्यो ंके 467 जिलों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन पर अमल किया जा रहा है। इस मिशन के तीन घटक हैं-एनएफएसएम-चावल, एनएफएसएम-गेहूं और एनएफएसएम-दलहन। ग्यारवहीं योजना (2011-12) के अंत तक खाद्यान्न के उत्पादन में 2 करोड़ टन की अतिरिक्त वृध्दि का लक्ष्य रखा गया है। इसमें एक करोड़ टन चावल, 80 लाख टन गेहूं और 20 लाख टन दलहनों का उत्पादन शामिल है। इस योजना से 2 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं। जिल क्षेत्रों में पहले खाद्यान्न का अभाव रहा करता था वे आज देश के अन्न भंडार को भरने में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। गेहूं, चावल और दलहनों के उत्पादन में 2006-07 से 2008-09 के बीच क्रमश : 4.87, 5.83 और 0.37 मी.टन की वृध्दि दर्ज की गई है।
राष्ट्रीय और परिवारिक स्तर पर खाद्य सुरक्षा प्रदान करना सरकार के लिए बहुत महत्व रखता है। बढ़ती जनसंख्या की मांग को पूरा करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि की दृष्टि से 2007-08 के रबी मौसम से देश के 17 राज्यो ंके 467 जिलों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन पर अमल किया जा रहा है। इस मिशन के तीन घटक हैं-एनएफएसएम-चावल, एनएफएसएम-गेहूं और एनएफएसएम-दलहन। ग्यारवहीं योजना (2011-12) के अंत तक खाद्यान्न के उत्पादन में 2 करोड़ टन की अतिरिक्त वृध्दि का लक्ष्य रखा गया है। इसमें एक करोड़ टन चावल, 80 लाख टन गेहूं और 20 लाख टन दलहनों का उत्पादन शामिल है। इस योजना से 2 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं। जिल क्षेत्रों में पहले खाद्यान्न का अभाव रहा करता था वे आज देश के अन्न भंडार को भरने में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। गेहूं, चावल और दलहनों के उत्पादन में 2006-07 से 2008-09 के बीच क्रमश : 4.87, 5.83 और 0.37 मी.टन की वृध्दि दर्ज की गई है।
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर के वी वाई)
यह एक ऐसी अनूठी योजना है जिसके तहत राज्यों को कृषि और संबंधित क्षेत्रों से जुड़े कार्यक्रमों की स्थानीय आवश्यकता अनुसार योजना बनाने और उन पर अमल करने की पूर्ण स्वायत्ताता दी गई है। ग्यारहवीं योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय कृषि विकास योजना पर अमल के लिए 25,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता का प्रावधान किया गया है। आर के वी वाई के तहत विभिन्न राज्यों को जो आवंटन किया जाएगा वह वर्ष के दौरान कृषि और संबंध्द कार्यों पर पूर्ववर्ती वर्ष में किए गए कुल योजना व्यय के तुलनात्मक आकार पर आधारित होगा। इस प्रकार राज्यों को उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में राज्यों को इस योजना के तहत बीज मिनी किट वितरण, विस्तार सहायता, जल संसाधनों की व्यवस्था करने जैसे तात्कालिक प्रकृति के उपायों के लिए वित्तीय सहायता देने की पूर्व छूट है। राज्य सरकारें आरकेवीवाई के तहत खाद्यान्न फसलों, बागबानी, जैविक कृषि, पशुपालन जैसे कार्यों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने में पर्याप्त रुचि दिखा रही है। यह योजना राज्य कृषि प्रक्षेत्र, मिट्टी और उर्वरक परीक्षण प्रयोगशालाओं जैसी महत्वपूण्र् ा संरचनाएं प्रदान करने में भी सफल साबित हो रही है। आरकेवीवाई ने निश्चित रूप से कृषि और संबध्द क्षेत्रों के बढ़ावा दिया है।
पूर्वी भारत पहल
भारत सरकार बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्यों में हरित क्रांति का विस्तार करने के लिए संकल्पित है। इस उद्देश्य के लिए 4 अरब रुपये का प्रारंभिक आवंटन किया गया है। इससे कृषि के बुनियादी ढांचे में जो खामियां हैं उनके विकास के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों और संसाधनों को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी।
दलहन और तिलहन गांव
शुभुष्क क्षेत्रों में दलहनों और तिलहनों के उत्पादन के लिए एक विशेष पहल शुरू की गई है। इसके लिए चिन्हित जलग्राही क्षेत्रों में 60 हजार दलहन और तिलहन गांवों का गठन किया जाएगा और वहां के किसानों को दलहनों और तिलहनों के उत्पादन में उपयोगी कृषि यंत्र और उपकरण किराए पर दिए जाएंगे। भारत सरकार के दलहन और तिलहन संवर्धन की अन्य योजनाओं से तालमेल बिठाकर इन क्षेत्रों में मदद पहुंचाई जाएगी। वर्ष 2010-11 में इस योजना के मद में तीन अरब रुपये का प्रावधान किया गया है।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम)
राष्ट्रीय बागवानी मिशन पर 2005 से ही काम चल रहा है। देश में बागवानी को प्रोत्साहित करने के लिए जो उपाय पहले से चल रहे हैं उनको और आगे बढ़ाने के लिए मिशन के तहत अनुसंधान, उत्पादन-फसलोपरांत प्रबंधन, प्रसंस्करण और विपणन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मिशन के तहत 2011-12 तक बागवानी उत्पादन में दो गुनी वृध्दि अर्थात 6 प्रतिशत की वृध्दि दर के साथ 30 करोड़ टन के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस मिशन के अंतर्गत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों, जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड तथा तीन केन्द्र शासित प्रदेशों को छोड़कर देश के शेष राज्यों के 367 जिलों में यह योजना चलाई जा रही है। उपर्युक्त राज्यों को पूर्वोत्तर राज्य, एकीकृत बागवानी विकास हेतु प्रौद्योगिकी मिशन (टीएमएनई) का लाभ मिल रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन (के शुरू होने के बाद 16 लाख 60 हजार एनएचएम) हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी की फसल ली जा रही है। एनएचएम के कारण ग्रीन हाउस उद्यानिकी प्लास्टिक की छांव, छायादार जाली उद्यानिकी (शेड नेट कल्टीवेशन) और नीचे की ओर बहाव वाली नालियों से सिंचाई का खूब प्रयोग हो रहा है। इसके अलावा करीब एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गुलाब, कार्नेशन और ग्लैडिओलस जैसे फूलों की खेती हो रही है। घरेलू जरूरतों को पूरा करने के अलावा इनका नियति भी हो रहा है। जहां तक कोल्ड चेन, पैक हाउसेज, ग्रेडिंग एवं पैकिंग इकाइयों, प्रशीतन भंडार, रेफ्रीजरेटेड वैन्स जैसी ढांचागत सुविधाओं का प्रश्न है, सरकार पूंजी निवेश के लिए उद्यमियों को करों में रियायत और अन्य लाभ दे रही है।
विस्तार सुधार
देश में मौजूदा कृषि विस्तार प्रचार प्रणाली में प्राण फूंकने के लिए और विस्तार तंत्र के सामने पेश आने वाली समस्याओं के निराकरण के लिए देश के 591 ग्रामीण बहुल जिलों में एक विशेष योजना चलाई जा रही है जिसका नाम है-विस्तार सुधारों हेतु राज्य विस्तार कार्यक्रमों की सहायता (सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंशन प्रोग्राम्स फॉर एक्सटेंशन रिफर्ाम्स)। योजना को और मजबूती प्रदान करने के राज्य, जिला और विकासखंड स्तर पर विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। इसके साथ ही एक नए प्रयास के तौर पर ग्राम स्तर पर किसान मित्र (एफएफ) (प्रति दो गांवों के लिए एक किसान मित्र) भी मुकर्रर किए जा रहे हैं जो हर किसान को समझाए और सिखाएँगे। लगभग 1000 कृषि विद्यालय स्थापित किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त कृषि क्लीनिक (निदानघर) एवं कृषि व्यापार केन्द्रों (एसीएबीसी) की योजना भी चलाई जा रही है जो बेरोजगार कृषि स्नातकों को कृषि क्लीनिक और कृषि व्यापार केन्द्रों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इस योजना के तहत 21579 कृषि स्नातकों को प्रशिक्षण दिया गया है और 7667 कृषि उद्यम (ऐग्रीवेंचर्स) स्थापित किए जा चुके हैं।
जहां तक जनसंचार का प्रश्न है, दूरदर्शन और आकाशवाणी द्वारा प्रतिवर्ष हजारों कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है जो मुख्यत: विशिष्ट क्षेत्रों, स्थलों और मौसम में कृषि से संबंधित होते हैं। किसान काल सेंटर 1800-180-1551 नंबर पर देश भर के किसानों को बिना कोई समय गंवाए स्थान विशेष के लिए उपयोगी सूचना प्रदान करता है। किसान ज्ञान प्रबंधन प्रणाली (केकेमएस) का विकास किया जा रहा है ताकि किसानों के सवालों का जवाब देते समय काल सेंटर एजेंट को तुरंत आवश्यक सूचना प्रदान की जा सके। देश भर में फैले 25 किसान काल सेंटरों के जरिए मार्च, 2010 तक 46 लाख से अधिक लोगों ने फोन पर सवाल किए और सूचनाएं मांगी।
बीजों की उपपलब्धता
बीजों की उपलब्धता में पर्याप्त वृध्दि हुई है। पिछले कुछ वर्षों में अधिक उत्पादन वाले प्रमाणित/उत्तम किस्म के बीजों के उत्पादन में भारी वृध्दि हुई है। वर्ष 2009-10 के दौरान 279 लाख क्विंटल बीज वितरित किए गए जबकि 2008-09 में 250 लाख क्विंटल और 2007-08 में कुल 194.31 लाख क्विंटल बीज ही वितरित किए गए थे। बीज ग्राम योजना को भारी सफलता मिली है। देश भर में 64,634 बीज गांवों को तैयार किया गया जिनमें 112.65 लाख क्विंटल बीजों की पैदावार हुई है। गुणवत्ता के मामले में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की गई हैं।
देशवासियों की पोषाहार सुरक्षा आवश्यकता को पूरा करने और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आजीविका और आमदनी के साधन प्रदान करने के लिए कृषि का सतत विकास अनिवार्य है। उपर्युक्त योजना पर समन्वित रूप से काम करने से ग्रामीण विकास के प्रयासों को नई ऊर्जा मिलेगी।
(लेखक कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय में सचिव हैं)
सुनील दत्त
19वीं शताब्दी में अनेक अवतारी महापुरुषों ने भारत की धरती पर जन्म लिया। 14 अप्रैल 1881 का दिन ऐतिहासिक दिन था। इस दिन डा. भीमराव अम्बेडकर जी का जन्म हुआ। वर्षप्रतिपदा 1889 को डा. हैडगेवार जी का जन्म हुआ । 1983 में डा. हेडगेवार जी के जन्मदिन वर्षप्रतिपदा पर समरसता शब्द डा. अम्बेडकर जी की ही देन है। परमपूजनीय गुरूगोविन्द सिंह ने क्रांति का सूत्रपात किया। “सिंह” शब्द नाम ने न्यूनता ग्रंथि से ग्रसित करोंड़ों के समाज को आन्दोलित, प्रेरित करने का यशस्वी प्रयत्न किया।
अवतारी महापुरुषों का जीवन वाल्यकाल से ही संकटों में गुजरता है जिस प्रकार भगवान राम ,भगवान कृष्ण , स्वामी विवेकानन्द व गुरूगोविन्द सिंह जी का बाल्यकाल संकटों व संघर्षों में गुजरा. डा हेडगेवार जी का बाल्य काल भी संकटों के दौर से ही गुजरा-डा. हेडगवार जी ने 13 वर्ष की आयु में ही अपने माता-पिता को एक ही चिता में मुखाग्नि देने के बाद सारा जीवन कष्टों व संघर्षों में बिताया। घर में चाय तक पीने के लिए पैसे उपलब्ध नहीं रहते थे।
उसी प्रकार डा. भीमराव अम्बेडकर जी का जीवन भी कष्टों व संघर्षों के लिए ही जाना जाता है। डा भीमराव अम्बेडकर जी ने भी न्यूनता ग्रंथि से ग्रसित करोंड़ों हिन्दुओं को एक नई राह दिखाई वो राह जो उनके अन्दर आत्मविश्वास व आशा का संचार करती थी।
डा. भीम राव जी के एक प्रिय गुरू जी का अन्तिम नाम अम्बेडकर था उन्हीं के नाम पर डा. भीमराव जी का नाम भीम राव अम्बेडकर हुआ। डा. भीमराव अम्बेडकर जी की माता जी का देहांत तो 5वर्ष की आयु में ही हो गया । फिर भी उन्हें अपने पिता जी से घर में ही अच्छे संस्कार मिले। मुम्बई में एक ही कमरे में दोनों रहते थे ।एक सोता था तो एक पढ़ता था इतना छोटा कमरा था वो। आगे चलकर इन्हें केअसकर नाम के व्यक्ति( सज्जन) मिले जिन्होंने इनका परिचय बड़ौदा के महाराजा सहजराव गायकवाड़ जी से करवाया ।गायकवाड़ जी ने इन्हें छात्रवृति लगा दी । गायकवाड़ जी ने अम्बेडकर जी को विदेश भेजा बाद में लन्दन गए। लन्दन में खरीदी पुस्तकें मालबाहक जहाज में भेजने के कारण डूब गईं जिनका मुआवजा 2000 रूपए मिला फिर बड़ौदा गए। Ph. D करने पर बड़ौदा आने के बाद अम्बेडकर जी को तरह तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। जिससे उनके मन में पीड़ा तो हुई पर कभी उनके मन में कटुता पैदा नहीं हुई।
फिर उनके मन में LAW की पढ़ाई करने का विचार आया। कोहलापुर के महाराजा ने उन्हें लंदन भेजा। डा. अम्बेडकर जी ने संस्कृत सीखी ।स्पृश्य-अस्पृश्य क्या है जानने का प्रयत्न किया।वेद, उपनिषद् , भगवद गीता सबका डटकर अध्ययन किया, साहित्य लिखा। डा.अम्बेडकर जी अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि छुआ-छूत मुगलकाल की देन है । हिन्दू धर्म में इसका कोई स्थान नहीं। आर्य-द्रविड़ भेद पैदा करना अंग्रेजों की हिन्दूओं को आपस में लड़वाने की चाल है ऐसा उन्होंने खुद महसूस किया व ये सब उन्होंने लोगों को समझाने का भी प्रयत्न किया। आर्य बाहर से नहीं आए ये डा. अम्बेडकर जी ने कहा।
WHO ARE SHUDRAS में अम्बेडकर जी ने कहा जिस हिन्दू धर्म का ज्ञान इतना श्रेष्ठ है कि उस ज्ञान के प्रभाव से चींटी, सांप, तुलसी मतलब छोटे से चोटे जीव से लेकर पेड़-पौधों तक की पूजा करने वाला हिन्दू, हिन्दू को न छुए ऐसा कैसे हो सकता है ?
उन्होंने सपष्ट कहा कि समस्या धर्म की नहीं समस्या मानसिकता की है खासकर स्वर्ण मानसिकता जो गुलामी के प्रभाव के कारण विकृत हो चुकी है जिसे बदलने की जरूरत है । यदि स्वर्ण मानसिकता बदलेगी तो हिन्दू समाज बदलेगा ।
उन्होंने सत्याग्रह का शस्त्र उठाया। भगवद गीता को हथियार बनाया।तालाब के पानी हेतु---महाड़ सत्यग्रह ।नासिक के कालराम मन्दिर में प्रवेश हेतु सत्याग्रह किया लाठियां खाईं।
1935 में रूढ़ीबादिता व भ्रम के शिकार लोगों को Shock TREATMENT देते हुए कहा सुधरना है तो सुधर जाओ वरना मैं धर्मांतरण कर लूंगा। जबकि वासत्विकता यह है कि उन्होंने कभी धर्मांतरण किया ही नहीं। उनके सारे सहित्य में हिन्दू राष्ट्र शब्द का प्रयोग बार-बार हुआ है उन्होंने जातिविहीन समाज रचना, राष्ट्र संगठन सब पर लिखा है।
1947 में मुसलिम अलगावबाद के परिणास्वारूप देश का विभाजन हो गया । जिस पर अम्बेडकर जी ने सपष्ट कहा कि अब जबकि मुसलमानों को अलग देश दे दिया गया है तो हमें पाकिस्तान से सब हिन्दूओं को भारत ले आना चाहिए व भारत से सब मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देना चाहिए ताकि मुसलमान अपने घर पाकिस्तान में सुख से रहें और हिन्दू अपने घर भारत में सुख से रहें। आज चारों ओर फैले मुसलिम आतंकवाद को देखकर आप खुद समझ सकते हैं कि डा. अम्मवेडकर जी कितने दूरदर्शी थे।
विभाजन के बाद Hindu Code Bill अम्बेडकर जी की हिन्दू समाज को सबसे बढ़ी देन है । इसी में अम्बेडकर जी ने ‘हिन्दू किसे कहते हैं, इसकी व्याख्या की जिसमें सपष्ट कहा गया कि विदेशी धारणाओं इस्लाम और इसाईयत को छोड़कर भारत में रहने वाले (हिन्दू-सिख-बौद्ध-जैन इत्यादि) सब लोग हिन्दू हैं।
ये उन्हीं की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने SC/St के नाम से वंचित हिन्दुओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था बनाकर अंग्रेजों के बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करने के षडयन्त्र को असफल किया।
अम्बेडकर जी ने सबको राजकीय समानता दिलवाते हुए सबके लिए एक ही वोट का प्रावधान किया। डा. भीमराव अम्बेडकर जी ने 1965 में कहा कि वेशक मेरा जन्म हिन्दू धर्म में हुआ है पर हिन्दू के रूप में मैं मरूंगा नहीं ।
अपनी जिन्दगी में जाति के कारण भी कई तरह के असहनीय कष्ट सहने के बाद भी उन्होंने हिन्दू हित के लिए काम करते हुए अन्त में बौद्ध मत अपनाया जो कि हिन्दू समाज का अपना ही मत है इसलिए उसे धर्मांतरण नहीं कहा जा सकता। उन्होंने किसी विदेशी अबधारणा को नहीं अपनाया। ये भी उनके मन में अपने देश-संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम को दर्शाता है।
हैदराबाद के निजाम द्वारा 40 करोड़ ( आज आप अनुमान लगा सकते हैं कि कितना अधिक धन बनता है ये) व औरंगावाद में बंगला,जमीन का प्रलोभन देने के बाबजूद डा. भीम राव अम्बेडकर जी ने अत्याचारी इस्लाम स्वीकार नहीं किया ।
इसी तरह उन्हें ईसाईयों द्वारा ईसाईयत अपनाने के लिए भी कई तरह के प्रलोभन दिए गए लेकिन उन्होंने ईसाई बनना भी सवीकार नहीं किया।
वो अच्छी तरह जानते थे कि ये दोनों विदेशी अवधारणायें देशहित-हिन्दू हित में नहीं हैं ।
उन्होंने अपने वंचित हिन्दू भाईयों को सपष्ट आदेश दिया कि बेशक अपने हिन्दू भाईयों में कमियां हैं वो गुलामी के प्रभाव के कारण स्वर्ण मानसिकता के शिकार हैं पर अत्याचारी मुसलमान व लुटेरे ईसाई किसी भी हालात में हमारे हित में नही हो सकते ।
आज जिस तरह धरमांतरित हिन्दूओं को दलित व काले ईसाई कहकर पुकारा जा रहा है व धर्मांतरित हिन्दूओं को जिस तरह पाकिस्तान व बंगलादेश में मस्जिदों में बमविस्फोट कर मारा जा रहा है ,मुहाजिर कहा जा रहा है भारत में भी मुसलिम बहुल क्षेत्रों में निशाना बनाया जा रहा है उसे देख कर आप समझ सकते हैं कि डा. भीमराव अम्बेडकर जी कितने दूरदर्शी व देशहित-हिन्दूहित में कितने विस्तार से सोचने व निर्णय लेने में समर्थ थे।
दुनिया को धर्म सिखाना ही भारत की विभूतियों का काम है Deep Cultural Unity in our Society(India) में लिखते हैं कि आपस में झगड़ों के बाबजूद हिन्दू समाज एक है और एक रहेगा । मानसिकता में परिवर्तन के साथ ही ये झगड़े भी समाप्त हो जायेंगे।
1916 में लखनऊ पैक्ट में 13% मुसलमानों को 30% सीटें देने का उन्होंने कांग्रेस के हिन्दूविरोधी रुख के बावजूद डटकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि जो बात हिन्दू हित की नहीं वो देशहित की कैसे हो सकती है।आज हर देशभक्त को अपने घर में डा. भीमराव अम्बेडकर जी का चित्र लगाना चाहिए व उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयत्न करना चाहिए।
लिमटी खरे
राजस्थान के गर्भ में पैदा हुआ बारूद जिसमें से लगभग एक हजार टन बारूद 164 ट्रकों में लादकर गन्तव्य की ओर रवाना किया गया था, वह अचानक ही गायब हो गया। ट्रकों की साईज इतनी छोटी भी नहीं होती है कि कोई उसे आसानी से छिपा सके। वैसे भी ज्वलनशील पदार्थ या बारूद ले जाने वाले ट्रकों की बनावट आम ट्रकों से अलग ही होती है। फिर 164 ट्रकों को आखिर कहां और कैसे गायब कर दिया गया है, यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।
भारत में आंतरिक और बाहरी तौर पर आज आतंकवाद, अलगाववाद, माओवाद, नक्लवाद आदि के मामले में आग जिस तेजी से सुलग रही है, उसे देखते हुए 872 टन बारूद का हवा में गायब हो जाना सामान्य घटना नहीं माना जा सकता है। इस मामले को राजस्थान सहित छः राज्यों की पुलिस जिस हल्के तरीके से ले रही है, उसे देखकर लगता है कि सरकारें ही इस तरह के हिंसक आंदोलनों के लिए उपजाऊ माहौल प्रशस्त करती हैं।
देखा जाए तो सुरक्षा एजेंसियों की नींद इस तरह के संगीन और बड़े मामले में उड़ना चाहिए था। दो माह से अधिक समय पूर्व हुई यह कथित चोरी के बाद पुलिस के हाथों खाली ट्रक के अलावा कुछ नहीं लग सका है। पुलिस और प्रशासन हैं कि एक दूसरे पर जवाबदारी डालने पर तुले हुए हैं। इतनी व्यापक मात्रा में गायब हुआ विस्फोटक बारूद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है।
गौरतलब है कि गत दिनों सूरत में हुए विस्फोट में राजस्थान के ही धौलपुर में मचकुंड के पास 1979 - 80 में स्थापित राजस्थान एक्सप्लोसिव एवं केमिकल लिमटेड (आरईसीएल) बरूद फेक्ट्री में बने विस्फोटक और डेटोनेटर के इस्तेमाल की पुष्टि की गई थी। 164 ट्रक विस्फोटक के गायब होने के बाद धौलपुर पुलिस की तंद्रा टूटी है। धौलपुर के पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र कुमार अब यह जांच करवा रहे हैं कि कितना माल वहां से निकला और कहां गया? पुलिस अधीक्षक का यह कहना कि कंपनी द्वारा माल निकासी की सूचना देने के बाद भी विस्फोटकों से लदे फदे वाहनों को सुरक्षा मुहैया करवाने की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं है, बहुत ही हास्यास्पद माना जाएगा।
नियमानुसार तो विस्फोटकों से लदी लारी को पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई जाना चाहिए, अथवा अगर कोई कंपनी इसका परिवहन कर रही है तो उसे निजी तौर पर आर्मड सिक्यूरिटी गार्ड की मदद लेना चाहिए। विशेष प्रकार की कमोबेश बख्तरबंद गाडियों को पहचानना किसी के लिए कठिन नहीं है। ये लारी जब सुनसान इलाकों से होकर गुजरती हैं, तब इन्हें लूटना नक्सलवादी, आतंकवादी या डकैतों के लिए बहुत ही आसान होता है।
वैसे भी विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय द्वारा इस तरह की लूट एवं अन्य घटनाओें की आशंकाओं के मद्देनजर फेक्ट्री से विस्फोटक को गंतव्य तक कड़ी सुरक्षा में पहुंचाने का निर्देश पहले ही जारी किया जा चुका है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर बारूद का निर्माण या भण्डारण होता है, उन स्थलों का निरीक्षण संबंधित जिले के जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक को कम से कम छः माह में एक बार करना अत्यावश्यक होता है।
अगर पुलिस की जवाबदारी में इन वाहनों की सुरक्षा का शुमार नहीं है तो फिर किस हक से अब पुलिस द्वारा इसकी तहकीकात की जा रही है कि माल कितना निकला और कहां गया? साथ ही साथ जब पुलिस के कारिंदे सड़कों पर खड़े होकर इन्हीं ट्रक चालकों से ‘चौथ‘ वसूलते हैं तब वे कागज पत्तर देखकर ही उस पर लदे माल की तादाद, अनुज्ञा आदि के बारे में पूछताछ कर ही अपनी ‘चौथ‘ के रेट तय करते हैं।
इतना ही नहीं जब हर बार माल की लदाई के साथ ही इसकी सूचना जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक को लिखित तौर पर भेज दी जाती है तो फिर क्या वजह है कि अधिकारियों द्वारा इन वाहनों का भौतिक सत्यापन कराना भी जरूरी नहीं समझा। इस तरह के संवेदनशील मामलों को धौलपुर के जिलाधिकारी और जिला पुलिस अधीक्षक ने बहुत ही हल्के रूप में लिया है, जिसकी निंदा से काम नहीं चलने वाला, इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की आवश्यक्ता है।
यहां उल्लेखनीय होगा कि लगभग सोलह साल पहले 1994 में विस्फोटकों के पड़ोसी देश बंग्लादेश भेजने, दो वर्ष पूर्व हैदराबाद, सायबर सिटी बैंग्लुरू और सूरत में हुए बम विस्फोटों में यह तथ्य कमोबेश स्थापित हो चुका था कि इनमें प्रयुक्त विस्फोटक आरईसीएल के ही थे, फिर प्रशासन ने इस मामले को बहुत ही सतही तौर पर लिया।
इस मामले में अनेक लचीले पेंच उभरकर सामने आ रहे हैं। बारूद निर्माता आरईसीएल के महाप्रबंधक वाई.सी.उपाध्याय का कहना है कि उनका काम विस्फोटक बेचना है, खरीददार उसका क्या करता है इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं है। इसका मतलब यह है कि अगर आतंकवादी आकर उनसे माल खरीदे तो वे देश की कीमत पर उसे भी माल बेचने से गुरेज नहीं करेंगे। उपाध्याय यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि जिन्हें माल बेचा गया उनका लाईसेंस समाप्त हो गया था। सवाल यह उठता है कि लाईसेंस समाप्त होने पर नवीनीकरण न होने या नवीनीकरण होने की प्रत्याशा में क्या बारूद बेचा जाना युक्तिसंगत माना जाएगा?
लाईसेंस नवीनीकरण की पद्धति बहुत ही उलझी हुई है। अनुज्ञा की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी कंपनी द्वारा संबंधित उपभोक्ता को तब तक माल बेच सकती है जब तक कि उसकी अनुज्ञा निरस्त होने की सूचना कंपनी को न मिल जाए। देखा जाए तो कंपनी को हर बार कंसाईंमेंट जारी करने के पहले लाईसेंस की मूल प्रति देखने के साथ ही साथ प्रमाणित छाया प्रति भी अपने पास रखना चाहिए। अगर किसी की अनुज्ञा को आगे नहीं बढ़ाया गया है तो उसकी आपूर्ति को तत्काल प्रभाव से रोक ही दिया जाना चाहिए।
किस वाहन में कितना माल कहां के लिए रवाना किया गया, रास्ते में कहां कितना माल उतारा गया, इस मामले से न तो विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय को ही कोई लेना देना है और न ही आरईसीएल कंपनी को। कंपनी का काम विस्फोटक बेचना और नियंत्रक कार्यालय का काम सिर्फ कागज पत्तर दुरूस्त कर रखना ही लगता है। जिस डीलर या उपभोक्ता के पास अनुज्ञा है उसे कितना माल बेचा गया है, इसका भौतिक सत्यापन विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय द्वारा किया ही नहीं जाता है।
यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में विस्फोटक गया कहां? विस्फोटक का उपयोग क्या क्या हो सकता है। इस विस्फोटक के पहले दुरूपयोग के बारे में यही कहा जा सकता है कि इसे देश में अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों के हाथों बेच दिया गया हो, या उनके द्वारा लूट लिया गया हो। इस विस्फोटक का उपयोग नक्सलवादी, अलगाववादी, आतंकवादी, उग्रवादी, माओवादी आदि द्वारा गलत तौर पर किया जा सकता है।
दूसरी आशंका यह भी जताई जा रही है कि विस्फोटक को सड़क, बांध आदि निर्माण में लगी कंपनियों के हाथों बेच दिया गया हो, जिससे वे कम लागत में ज्यादा लाभ कमाने के लिए अवैध खनन के तौर पर प्रयोग कर सकती हैं। देश भर में सक्रिय खनन माफिया जिससे कि सफेदपोश, जनसेवक, खद्दरधारी और नौकरशाह प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं के द्वारा इसका प्रयोग किया जा सकता है।
कुल मिलाकर 164 ट्रक में 872 टन बारूद गायब हुए दो माह से अधिक समय बीत चुका है पर न तो राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा की सरकारों के माथे पर पसीना छलका है और न ही आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद, माओवाद, नक्लवाद आदि के लिए संजीदा होने का प्रहसन करने वाले कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की पेशानी पर ही चिंता की लकीरें उभरी हैं! उभरें भी आखिर क्यों? इससे जनसेवकों को क्या लेना देना, जान पर तो आवाम ए हिन्द की बन आना है, जनसेवक तो सुरक्षा घेरे में महफूज ही रहने वाले हैं।
पंकज झा
वैसे तो कोई ज़रूरी नहीं है कि समूचे अंतर्जाल के हर कोने में फैलाई जा रही गंदगी पर हर कोई झाड़ू ले कर पिल ही पड़े. खास कर तब, जब कथित पीड़ित और तथाकथित पीडक के बीच अंतर्संबंध के बारे में आप कुछ भी नहीं जानते हो. नूराकुश्ती भी तो कई बार सस्ती लोकप्रियता का एक उपकरण बन कर सामने आता है. तो निश्चय ही जिनका दाना-पानी ही नेट के भरोसे चलता हो उनको तो नहीं लेकिन जो निरपेक्ष एवं अन्यत्र कामकाजी लोग अपने कीमती समय का उपयोग कर इस आभासीय दुनिया को गुलज़ार करते हैं उन्हें हर तरह के सस्ते बहस को शंका की नज़र से देखना चाहिए. आज के अखबारों की एक छोटी सी खबर ने एक साईट पर गैरज़रूरी ढंग से चेहरे को चस्पा करने य नहीं करने के सम्बन्ध में रोपित और आरोपित बहस के बारे में दो शब्द कहने को प्रेरित किया.
खबर यह है कि एक फिल्म में केवल बाबा रामदेव का एक बार जिक्र आ जाने पर निर्माता को सेंसर बोर्ड ने यह आदेश दिया कि वे रामदेव से अनापत्ति प्रमाण पत्र लायें. यह शर्त पूरा करने के बाद ही फिल्म को सेंसर ने पास किया. उसी खबर से यह भी पता चला कि क़ानूनन यह ज़रूरी है कि फिल्मों में सम्बंधित व्यक्ति की अनापत्ति के बाद ही आप किसी जीवित व्यक्ति का नाम ले सकते हैं. तो अगर फिल्म, जो विशुद्ध कथात्मक माध्यम है वहां बिना अनुमति के किसी का नाम भी लेना निषिद्ध है, वहीं जबरदस्त आपत्ति के बावजूद किसी महिला के फोटो का उपयोग एक तथ्यात्मक माध्यम में करना कहाँ तक जायज़ है?
सवाल यह नही है कि इस हरकत से किसी कम्युनिटी साईट पर दर्ज़नों फोटो सार्वजनिक करने वाली लेखिका के सम्मान को कोई ठेस पहुच गयी हो. सवाल यह भी नहीं है कि इसमें दूसरे पक्ष द्वारा जिस तरह से खुद को पीड़ित दिखाने की हो रही है वह सही है. यदि सही में स्टोरी में वर्णित ढंग से धमकी दी गयी हो या अपने ज्ञान या ओहदे का रौब झाड़ा गया हो तो गलत यह भी है. लेकिन सवाल तो यह भी है कि क्या नैतिकता का तकाजा है यह कि किसी के मना करने पर भी आप केवल अहंकारवश उसके फोटो पर फोटो चिपकाते जाएँ. निश्चित ही यह तो जान बूझकर अपमान प्रदर्शित करना हुआ ना? कम से कम अपने शरीर की तरह ही अपने चेहरे पर हर व्यक्ति का नीजी अधिकार होना चाहिए. लेकिन यह भी सच है कि अगर आप सार्वजनिक लेखन या जीवन में हैं और आपने अपना फोटो बिना किसी प्राइवेसी सेटिंग के नेट पर डाला हुआ है तो कानूनी रूप से यह शायद माना जा सकता है कि उस फोटो के किसी भी उचित उपयोग से आपको आपत्ति नहीं है. खैर...!
दौलत और इज्ज़त की तरह शोहरत की भूख भी दैहिक भूख की तरह ही एक मानवीय कमजोरी या विशेषता है. आप इससे बच नहीं सकते. यदि आपने इस भूख के शमन के लिए उचित तरीका अपनाया तो सफलता के साथ ही प्रशंसा के भी पात्र होंगे. लेकिन अगर आपने इसके लिए किसी पब्लिसिटी स्टंट का सहारा लिया तो दुर्गति के लिए भी तैयार ही रहना चाहिए. कहते हैं....सूरज के हमसफ़र जो बने हो तो सोच लो, इस रास्ते में रेत का दरिया भी आएगा...!
छपास और देखास की भूख यूं तो नेताओं में सबसे ज्यादा हुआ करता है लेकिन कोई भी इससे वंचित हो कर तो नहीं रह सकता. इस लेख के बारे में सोचते-सोचते अपना एक पुराना सपना याद आ गया. जब उत्तर प्रदेश की साम्राज्ञी समूचे प्रदेश के भूख से अपना पत्थर दिल अक्स तैयार कर रही थी उस समय यह लेखक अपने सपनों के एक ऐसे मुख्यमंत्री के बारे में सोचा करता था जो शपथ लेते ही सबसे पहले अपने चेहरे का पेटेंट करवाए और यह घोषणा करे कि बिना उपयुक्त शुल्क चुकाए कोई उसका इस्तेमाल नहीं कर सके. अखबार वाले भी फोटो छापने से पहले फीस अदा कर राशि को मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करवाए. साथ ही मुख्यमंत्री यह घोषणा करे कि किसी भी सरकारी योजना का पैसा चुकि उनके पिताजी के घर से नहीं आ कर जनता का हे होता है तो किसी भी ऐसे योजना में भी उनका नाम और फोटो इस्तेमाल ना किया जाय. लेकिन जब ऐसे सस्ती लोकप्रियता के मोह से समाज को दिशा दिखाने का दंभ भरने वाले लेखक-लेखिका नहीं बच सकते तो फिर नेताओं से ऐसी उम्मीद करना तो वास्तव में सपने जैसा ही हो सकता है. बहरहाल.
हाल में सम्बंधित साईट से उस बहस से सम्बंधित सारे पोस्ट हटा लिए जाने का कारण तो नहीं पता. किसकी हार और किसकी जीत इस मामले में हुई यह भी ज्ञात नहीं. लेकिन इस सस्ते और अनावश्यक विवाद से मोटे तौर पर फायदा तो दोनों पक्षों का हुआ है. जहां चटखारे ले-ले कर इस लड़ाई को पढ़ने वाले पाठकों के कारण साईट का भला हुआ वहीं कामुक साहित्य के काले चश्में की ‘हंसीय’ दुनिया से बाहर के लोगों से भी लेखिका का परिचय हुआ. अगर पाठक वर्ग भी दिल पर ना ले कर ऐसे चीज़ों से केवल आनंदित होने के बारे ही सोचते हों तो नुकसान उनका भी नहीं है. इंतज़ार कीजिये तब तक किसी अन्य शिगूफा का उसी तरह जिस तरफ बचपन में अपने मोहल्ले में साइकिल पर बायोस्कोप लेकर घूमने वाले बुज़ुर्ग का करते थे....आमीन.
अशोक हांडू
भारतीय रिजर्व बैंक ने मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही की मौद्रिकनीति की समीक्षा के बाद प्रमुख दरों में एक बार फिर वृध्दि की है। दरों में इस वर्ष यह चौथी वृध्दि है। रिजर्व बैंक ने रिपो दर में 25 अंकों अर्थात चौथाई प्रतिशत की वृध्दि की है। अब यह दर 5.57 प्रतिशत हो गई है। इसी प्रकार रिवर्स रिपो दर में 50 अंकों की यानी आधा प्रतिशत की बढोतरी की गई है। यह दर अब 4.5 प्रतिशत हो गई है। रिपो दर वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है और रिवर्स रिपो दर वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों से कर्ज लेता है।
दोनों दरों में वृध्दि से बाजार में तरलता में कमी आएगी , क्योंकि वाणिज्यिक बैंकों को रिजर्व बैंक से त्रऽण वापस लेने के लिये ज्यादा पैसे चुकाने होंगे। इससे बैंकों को अपना पैसा रिजर्व बैंक के पास जमा रखने को प्रोत्साहन मिलता है, क्योंकि जमा धन पर अधिक लाभ (ब्याज) मिलता है। इस प्रकार न्यूनतम दरों में वृध्दि से बाजार में नकदी के प्रवाह में कमी आएगी और उसे बाहर निकालने के प्रयास में तेजी आएगी। उद्देश्य यह है कि मुद्रास्फीति पर मांग का दबाव कम हो, जो पिछले पांच महीनों से लगातार दहाई अंकों में बनी हुई है और जो सरकार के लिये चिंता का विषय बनी हुई है। जून में मुद्रास्फीति की दर 10.55 प्रतिशत थी।
नई दरों से मुद्रास्फीति से सख्ती से निपटने और स्थायी विकास के अनुकूल वातावरण के निर्माण के बारे में सरकार के संकल्प का आभास होता है। नई दर आशानुरुप ही हैं। रिजर्व बैंक की समीक्षा से पहले ही अनुमान लगाया जा रहा था कि मुख्य दरों में 25 अंकों की वृध्दि की जा सकती है परन्तु रिवर्स रिपो दर में आधा प्रतिशत की वृध्दि आशा से कुछ अधिक है। आरबीआई ने दरों में कोई ज्यादा वृध्दि नहीं की, इससे यह पता चलता है कि केन्द्रीय बैंक विकास प्रक्रिया को किसी भी प्रकार से प्रभावित किये बिना बाजार में नकदी के प्रवाह को रोकने के लिये धीरे-धीरे सोच समझकर कदम उठा रहा है। ब्याज दरों में अधिक वृध्दि से आर्थिक सुधार की प्रक्रिया तो प्रभावित होती ही साथ ही बैंकिंग प्रणाली में नकदी की समस्या भी आ सकती थी।
अधिसूचित बैंकों द्वारा रिजर्व बैंक में अनिवार्य रूप से जमा की जाने वाली राशि के अनुपात सी आर आर में कोई घट बढ न क़रते हुए केन्द्रीय बैंक ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि उसकी नीति पिछले दो वर्षों की वैश्विक मंदी के प्रभाव से ऊपर रही अर्थव्यवस्था से किसी भी प्रकार की छेडछाड़ नहीं करने की है। साधारणत: अर्थशास्त्रियों का विश्वास है कि प्रमुख दरों में हालिया मामूली वृध्दि से बैंको की त्रऽण दरों में वृध्दि नहीं होगी क्योंकि बैंक इतनी वृध्दि तो मान कर ही चल रहे थे। कुछ अर्थशास्त्रियों का विश्वास है कि इससे बैंकों की त्रऽण दरों में मामूली वृध्दि होगी। आर बी आई ने स्पष्ट संकेत दिये है कि वह जमा और उधार दोनों ही दरों में वृध्दि देखना चाहता है ताकि जहां एक ओर बैंकों से कर्ज लेना थोड़ा मंहगा हो वहीं बैंकों में लोगों की जमा राशि में वृध्दि भी हो।
रिजर्व बैंक की तिमाही समीक्षा से दो और बातें साफ होती हैं। इसने मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर का लक्ष्य 8 से बढाक़र 8.5 प्रतिशत कर दिया है, वहीं आशा जताई है कि मार्च 2011 तक मुद्रास्फीति की दर 5.5 से 6 प्रतिशत के आसपास रहेगी । वित्त मंत्रालय को भी आशा है कि अच्छे मानसून की संभावना को देखते हुए मुद्रास्फीति दिसम्बर तक कम होकर 6 प्रतिशत रह जाएगी।
मुद्रास्फीति में इन दिनों जो बढोतरी हो रही है, वह मुख्यत: पिछले वर्ष अच्छी वर्षा न होने के कारण ही है । वर्षा के अभाव में देश में प्राय: सभी कृषि उत्पादनों में कमी आई जिससे खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति में वृध्दि हुई। खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति शैन: शनै:-शनै: अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित करने लगी और थोक मूल्य सूचकांक में वृध्दि के साथ ही स्थिति संकट पूर्ण होने लगी।
रिजर्व बैंक का कहना है कि मुद्रास्फीति का दबाव बढ रहा है और इस पर मांग का दबाव स्पष्ट दिखाई देता है, जिससे मंहगाई आम हो गई है। बैंक का कहना है कि मुद्रास्फीति के विस्तार और उसके बने रहने के स्वभाव को देखते हुए मांग पक्ष की मुद्रास्फीति के दबाव को काबू में करना होगा।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का कहना है कि आरबीआई की नीति से पहले से ही कम हो रही मुद्रास्फीति में और भी कमी आएगी। उनका विचार है कि इससे हम विकास के रास्ते पर भी भलीभांति बने रहेंगे। आरबीआई की मौद्रिक नीति इस दिशा में उठाया गया सोचा समझा कदम है।
परन्तु सच्चाई यह है कि ब्याज दरों में वृध्दि केवल मांग पक्ष की मुद्रास्फीति को काबू में कर सकती है, जो कि समस्या का केवल एक अंश है। मुद्रास्फीति पर प्रभावी नियंत्रण के लिये हमें विशेष तौर पर खाद्यान्न उत्पादन बढाने के साथ-साथ आपूर्ति पक्ष के दबावों में भी कमी लानी होगी। इसके लिये हमें मुख्यत: इंद्र देव की कृपा का ही आसरा होता है। दीर्घकालिक दृष्टि से कृषि पर और गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने हाल ही में हुई राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में राज्य सरकारों से कृषि क्षेत्र पर और अधिक ध्यान देने का आग्रह किया ताकि मंहगाई पर प्रभावी रोक लगाई जा सके । कृषि चूंकि राज्यों का विषय है, इस विषय पर उन्हें ही अधिक ध्यान देना होगा । उन पर यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है । यद्यपि सफल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर में कृषि का योगदान मात्र 18 से 20 प्रतिशत ही है, तथापि अपने देशव्यापी विस्तार और अपनी गतिविधियों से देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या को प्रभावित करने के कारण इसकी भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।
कृषि क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना और ढीली-ढाली मौद्रिक नीति से योनजाबध्द ढंग से बाहर आना, देश में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के महत्वपूर्ण सूत्र हैं। आपूर्ति पक्ष के अभावों पर भी और तेजी से ध्यान देने की जरूरत है।
जैसा कि अन्य देशों के केन्द्रीय बैंकों द्वारा किया जाता है, आर बी आई ने भी अपनी मध्यावधि समीक्षाओं से चौंकाने वाला तत्व समाप्त करने का निर्णय लिया है। ये समीक्षायें तिमाही समीक्षाओं के डेढ महीने बाद की जाया करेंगी ताकि आवश्यकतानुसार बीच रास्ते ही सुधार किया जा सके। इससे अर्थव्यवस्था को मौजूदा स्थिति को समझने और तदनुसार कदम उठाने में मदद मिलेगी।
आर बंदोपाध्याय
आर्थिक सुधार, जो 1980 के दशक में
शुरू किया गया और मौजूदा दशक में जिसे नयी दिशा दी गयी, के साथ भारतीय कोरपोरेट
क्षेत्र लगातार विकास कर रहा है और लगातार वैश्विक अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा
बनता जा रहा है। जहां पिछली सहस्राब्दि के अंतिम दशक में विदेशी कंपनियों ने भारत
में खूब निवेश किया है वहीं नयी शहस्राब्दि के पहले दशक में भारतीय कंपनियों ने
विदेश में उल्लेखनीय निवेश किया है। इस दशक में संपोषणीय उच्चवृध्दि देखी गयी ।
कोरपोरेट क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की वृध्दि का मुख्य वाहक बनता जा रहा है।
मौजूदा दशक में अल्पविकास, विषमता, संपोषणीयता एवं विषमता से जुड़ी
चुनौतियों पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
अतएव जहां एक तरफ कोरपोरेट क्षेत्र को अपनी वृध्दि को टिकाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी
विनियामक एवं सेवा प्रदाय ढांचे की उम्मीद है वहीं दूसरी तरफ हितधारकों की यह मांग
लगातार बढती ज़ा रही है कि कोरपोरेट क्षेत्र का कामकाज समग्रतापूर्ण एवं जवाबदेह हो।
इसी संदर्भ में कोरपोरेट मंत्रालय अपनी सभी पहलों में हितधारकों की भागीदारी को
समुन्नत बनाने के लिए अपने कामकाज में एक बहुत बड़ा बदलाव लाया है।
पहले
स्तर पर मंत्रालय ने अपने कामकाज को निर्देशित करने के लिए दो आदर्शवाक्य अपनाए हैं
ताकि वह अपनी पहल का डिजायन तैयार करते वक्त कोरपोरेट क्षेत्र के साथ साथ हितधारक
की चिंताओं एवं आकांक्षाओं का भी ख्याल रख सके। ये दो आदर्शवाक्य हैं- उपयुक्त
विनियम के माध्यम से कोरपोरेट की वृध्दि तथा कोरपोरेट क्षेत्र एवं समग्र वृध्दि। इस
दिशा में मंत्रालय ने दिसंबर, 2009 में कोरेपोरेट शासन एवं कोरपोरेट सामाजिक
जिम्मेदारी पर स्वैच्छिक दिशानिर्देश तैयार कर उसे जारी किया। ये दिशानिर्देश
हितधारकों के साथ व्यापक विचार विमर्श के बाद तैयार किए गए। जहां कोरपोरेट शासन पर
स्वैच्छिक दिशानिर्देश में कंपनी के अंदरूनी शासन के मामले में मानक बढा दिए गए हैं
वहीं कोरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पर दिशानिर्देश में कंपनियों को उसके कामकाज से
पड़ने वाले पर्यावरण एवं सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चिंताओं के समाधान और समाज के
कल्याण में योगदान के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इन स्वैच्छिक दिशानिर्देशों को
मानो या कारण बताओ सिध्दांत के साथ जारी किया गया है। मंत्रालय कोरपोरेट क्षेत्र
द्वारा इन सिध्दांतों को अपनाने के बाद होने वाले अनुभवों के आधार इन दिशानिर्देशों
की समीक्षा भी करेगा।
देश के संपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक विकास में
कोरपोरेट क्षेत्र की भूमिका को एक सही दिशा प्रदान करने के लिए मंत्रालय ने दिसंबर,
2009 में भारतीय कोरपोरेट सप्ताह मनाया था । इसका ध्येयवाक्य कोरपोरेट क्षेत्र एवं
समग्र वृध्दि था। कोरपोरेट सप्ताह के अंतर्गत देशभर में व्यापार एवं उद्योग मंडलों,
पेशेवर संस्थानों एवं अन्य संगठनों के साथ मिलकर उपरोक्त ध्येयवाक्य पर 124
कार्यक्रम आयोजित किए गए।
इन कार्यक्रमों के दौरान आम आदमी समेत हितधारकों
को जनता के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के वास्ते मंत्रालय की पहलों, कोरपोरेट
क्षेत्र की भूमिका और उनके योगदानों से रूबरू कराया गया। इन कार्यक्रमों के माध्यम
से मंत्रालय विनियामक प्राधिकरणों, कोरपोरेट क्षेत्र, पेशेवरों और कई अन्य
हितधारकों को एक मंच पर लाने में सफल रहा ताकि वे साझे मुद्दों पर एक दूसरे के साथ
तालमेल कायम कर काम कर सकें।
हितधारकों को एक साथ लाने के लिए यह महसूस
किया गया कि आम आदमी को निवेश के बारे में उपयुक्त जानकारी देने के माध्यम से उसे
कोरपोरेट अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना महत्वपूर्ण है। विभिन्न निवेश उपकरणों के
माध्यम से भारतीय लोगों की कोरपोरेट अर्थव्यवस्था में भागीदारी कुछ विकसित देशों की
तुलना में काफी कम है। जहां एक तरफ कोरपोरेट क्षेत्र को अपने विकास के लिए अधिक
निवेश की आवश्यकता है वहीं दूसरी तरफ भारतीय लोगों के पास काफी घरेलू बचत है जिसे
कोरपोरेट अर्थव्यवस्था निवेशित होने के लिए उपयुक्त चैनल नहीं मिल पाता है। इस दूरी
को खत्म करने के लिए मंत्रालय ने अपने कार्यक्रमों को पिछले वर्ष के 300
कार्यक्रमों से बढाक़र इस वर्ष 3000 कर दिया है । इस प्रकार मंत्रालय निवेशक
जागरूकता अभियान में तेजी लाया है।
मंत्रालय ने राष्ट्र निर्माण के इस
महत्वपूर्ण क्षेत्र पर राष्ट्र का ध्यान आकर्षित करने के लिए जुलाई , 2010 में कई
साझेदार संगठनों के साथ मिलकर भारत निवेशक सप्ताह आयोजित किया। इस सप्ताह का
ध्येयवाक्य काफी सोच समझकर सुशिक्षित निवेशक- राष्ट्र की संपत्ति रखा गया था। इन
साझेदार संगठनों में फिक्की, एसोचैम, अखिल भारतीय प्रबंधन परिसंघ, आंध्रप्रदेश
वाणिज्य एवं उद्योग मंडल, दक्षिणी भारत वाणिज्य एवं उद्योग मंडल, इंडियन मर्चेंट
चैम्बर, पीएचडी चैम्बर, आल इंडिया एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज , बंबई स्टॉक एक्सचेंज,
इंस्टीटयूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया,, इंस्टीटयूट ऑफ कंपनी सेक्रेटीज ऑफ
इंडिया, इंस्टीटयूट ऑफ कोस्ट एंड वर्क्स एकाउंटेट्स ऑफ इंडिया, एमसीएक्स स्टॉक
एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय प्रत्याभूति एवं
विनिमय बोर्ड और यूटीआई म्यूच्यूअल फंड शामिल हैं।
पिछले दस महीनों में
उठाए गए इन कदमों के माध्यम से मंत्रालय ने अपने कामकाज को हितधारक उन्मुखी बनाने
के लिए अपने कामकाज को बदला है। हितधारकों को साथ् लेकर चलने की कारपोरेट क्षेत्र
की भूमिका से देश के सामाजिक एवं आर्थिक विकास की राह आसान हुई है ।
लिमटी खरे
खराब सेवा प्रदाता मोबाईल कंपनियों के नंबर दूसरे अच्छे सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ अदला बदली के मामले में केंद्र सरकार और दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) के बीच चल रही तनातनी का नतीजा है कि अब तक मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी को हरी झंडी नहीं दिखाई जा सकी है। बार बार तारीख पर तारीख देने के उपरांत भी एमएनपी में विलंब को कांग्रेस नीत केंद्र में बैठी भारत सरकार की सबसे बड़ी विफलता ही माना सकता है। वैसे तो अनेक एसे मोर्चे हैं जिन पर भारत सरकार ने विफलता के नए आयामों को छुआ है किन्तु मंहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, शिक्षा, स्वास्थ्य के बाद एमएनपी एक एसा मसला है जो आज देश के कमोबेश हर आदमी से जुड़ा हुआ माना जा सकता है।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा एमएनपी के मसले को अनेकों बार टाला जा चुका है। यह क्यों हो रहा है? किसके दबाव में हो रहा है? इसके पीछे किसको प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ पहुंचाने की जनसेवकों की मंशा है, यह तो केंद्र सरकार ही जाने पर 31 दिसंबर 2009 के पहले दो मर्तबा एमएनपी की तारीख देकर उसे टाला गया था। अंत में 31 दिसंबर 2009 को डेड लाईन बना दिया गया था।
इसके उपरांत केंद्र सरकार ने मोबाईल पोर्टेबिलिटी को लागू करने की तारीख बढ़ाकर इस साल मई के पहले सप्ताह तक कर दी गई थी। यह तिथि गुजरने के बाद एक बार फिर 30 जून तक के लिए समयावधि बढ़ा दी गई थी। इस साल अप्रेल के पहले सप्ताह में ट्राई द्वारा कहा गया था कि वह एमएनपी में हो रहे अनावश्यक विलंब को लेकर चिंतित है, और जल्द ही दूरसंचार विभाग को इस संबंध में पत्र लिखने जा रहा है।
ट्राई द्वारा एमएनपी सेवाओं में बार बार हो रहे विलंब के कारणों का पता लगाने के लिए दूरसंचार विभाग को पत्र लिखकर पता करने की बात कही गई थी कि आखिर क्या वजह है कि इस सुविधा को लागू नहीं किया जा पा रहा है। इससे पहले अप्रेल में ही दूरसंचार विभाग द्वारा कहा गया था कि वह इस मसले को निजी सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ होने वाली बैठक में भी उठाने जा रहा है।
शुरूआती दौर में सरकारी कंपनियां बीएसएनएल और एमटीएनएल द्वारा ही इस संबंध में आवश्यक तकनीकी तैयारियां विशेषकर एमएनपी गेटवे की स्थापना ही नहीं किया जा सका था। पिछले माह में जब तीसरी पीढ़ी के मोबाईल यानी 3 जी की सेवाएं आरंभ कराने की बात सामने आई थी, तब सरकार द्वारा दूरसंचार कंपनियों के सामने यह शर्त रख दी थी कि दूरसंचार कंपनियों को किसी भी तरह की नई सेवा आरंभ करने के पहले मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी को आरंभ करना आवश्यक होगा। सरकार की इस कड़ी शर्त के आगे निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियां झुकती नजर आ रही थीं।
सरकार ने इसके साथ ही निजी सेवा प्रदाता कंपनियों से कहा था कि वे एमएनपी को अक्टूबर माह में आरंभ करवा दें। विडम्बना यह है कि बीएसएनएल और एमटीएनएल ने तो 3 जी सेवाओं को आम उपभोक्ताओं के लिए लागू कर दिया है, पर उसे अपनी एमएनपी की शर्त के बारे में शायद याद नहीं रहा। अगर सरकार को अपनी कड़ी शर्त के बारे में याद होता तो निश्चित तौर पर 3 जी सुविधाएं लांच करने के पहले सरकारी कंपनियों द्वारा एमएनपी को अमली जामा अवश्य ही पहनाया होता।
सरकारी और निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को संभवतः यह भय सता रहा है कि अगर एमएनपी को लागू कर दिया गया तो खराब नेटवर्क, काल ड्राप, मनमाना बिल, छिपी हुई शर्तों आदि से आजिज आ चुके उपभोक्ता किसी अन्य सेवा प्रदाता की शरण में न चले जाएं। अगर एसा होगा तो उनके राजस्व में जबर्दस्त कमी दर्ज की जा सकती है। अभी वर्तमान नियम कायदों को देखकर यह कहा जा सकता है कि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी चाहे सरकारी क्षेत्र की हो या निजी क्षेत्र की हर किसी का एकाधिकार मोबाईल सेक्टर पर दिख रहा है। एमएनपी के लागू होने के बाद कंपनियों का एकाधिकार पूरी तरह से समाप्त होने की उम्मीद है। इसके उपरांत बाजार में वही कंपनी टिक पाएगी जिसकी शर्तें साफ हों, और नेटवर्क तथा सुविधाएं जनता को पसंद आएंगी।
दरअसल एमएनपी की कल्पना एमएनपी गेटवे तकनीक के बिना किया जाना संभव ही नहीं है। कुछ कंपनियां जहां इस तकनीक के लिए वांछित उपकरणों के लिए आपूर्ति का इंतजार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ कंपनियां इसकी खरीददारी के लिए आदेश देने की गरज से सुरक्षा इजाजत की बाट जोह रही हैं। कंपनियां इस सेवा को आरंभ करने की स्थिति में कतई नहीं दिख रही हैं। सरकार का यह मानना है कि जो कंपनियां इस सेवा को आरंभ करने में विलंब का दोषी पाई जाएंगी, उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी।
कुल मिलाकर मोबाईल नंबर स्थाई रखकर अपने सेवा प्रदाता की सेवाएं बदलने वाली योजना एमएनपी में बार बार तारीख पर तारीख मिलने से साफ होने लगा है कि निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियां इसके लिए क्लीन हेण्ड से आगे आने को तैयार कतई नहीं है। साथ ही साथ सरकार भी यह नहीं चाह रही है कि इन सेवा प्रदाता कंपनियों की इस मामले में मश्कें कसी जाएं। सरकार पर किस बात का दबाव है, यह बात तो सरकार ही बेहतर जान समझ सकती है, किन्तु एमएनपी में तारीख पर तारीख से मरण अंतत्तोगत्वा उपभोक्ता की ही हो रही है।
ख़ूबसूरत हैं आंखें तेरी, रात को जागना छोड़ दे
खुद-बखुद नींद आ जाएगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे
तेरी आंखों से कलियां खिलीं, तेरे आंचल से बादल उड़ें
देख ले जो तेरी चाल को, मोर भी नाचना छोड़ दे
तेरी अंगड़ाईयों से मिलीं ज़हन-ओ-दिल को नई रोशनी
तेरे जलवों से मेरी नज़र किस तरह खेलना छोड़ दे
तेरी आंखों से छलकी हुई जो भी इक बार पी ले अगर
फिर वो मयख्वार ए साक़िया जाम ही मांगना छोड़ दे
वक़्त के हाथ में डोर है अक्ल इंसां की कमज़ोर है
जो है क़िस्मत में होगा वही जाने मन सोचना छोड़ दे
ज़िंदगी है मुसलसल सफ़र सबकी है एक ही रहगुज़र
एक ही सबकी है डगर क्यूं कोई रास्ता छोड़ दे
ए ख़ुशी एक पल को सही मैं कभी तुझसे मिल तो सकूं
मेरे घर से कहां जाएगी कुछ तो अपना पता छोड़ दे
मेरा क़ातिल झिझकता है क्यूं पुश्त से वार करता है क्यूं
या मुक़ाबिल में आए मेरे या मेरा रास्ता छोड़ दे
-हसन काज़मी आज का दिन
4 सितंबर 2010, शनिवार, 13 भाद्रपद (सौर) शक 1932, भाद्रपद मास 20 प्रविष्टे 2067, 24 रमज़ान सन हिजरी 1431, भाद्रपदा कृष्ण दशमी प्रात: 8 बजकर 14 मिनट तक उपरान्त एकादशी, आद्रा नक्षत्र मघ्यान्ह 12 बजकर 33 मिनट तक तदनन्तर पुनर्वसु नक्षत्र, व्यतीपात योग रात्रि 2 बजकर 46 मिनट तक तदनन्तर वरीयान योग,विष्टि(भद्रा) करण प्रात: 8 बजकर 14 मिनट तक,चन्दमा रात्रि 5 बजकर 21मिनट तक मिथुन राशि में तदनन्तर कर्क राशि में. जया एकादशी व्रत स्मार्त। पर्युषण पर्वारम्भ (जैन) चतुर्थी पक्ष। सूर्य दक्षिणायन। सूर्य उत्तर गोल। वर्षा ऋतु। प्रात: 9 बजे से प्रात: 10 बजकर 30 मिनट तक राहु काल. सूर्य : सिंह राशि में, चंद्रमा : मिथुन राशि में, बुध : सिंह (वक्री) राशि में, शुक्र : तुला राशि में, मंगल : कन्या राशि में, वृहस्पति : मीन (वक्री) राशि में, शनि : कन्या राशि में, राहु : धनु राशि में, केतु : मिथुन राशि में (ज्योतिषाचार्य वेदप्रकाश जाबाली)
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भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन - Add caption *...रक्षाबंधन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं...* *फ़िरदौस ख़ान* रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है. यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के ...









