फ़िरदौस ख़ान
लोकतंत्र यानी जनतंत्र. जनतंत्र इसलिए क्योंकि इसे जनता चुनती है. लोकतंत्र में चुनाव का बहुत महत्व है. निष्पक्ष मतदान लोकतंत्र की बुनियाद है. यह बुनियाद जितनी मज़बूत होगी, लोकतंत्र भी उतना ही सशक्त और शक्तिशाली होगा. अगर यह बुनियाद हिल जाए, तो लोकतंत्र की दीवारों को दरकने में देर नहीं लगेगी. फिर लोकतंत्र, राजतंत्र में तब्दील होने लगेगा. नतीजतन, मुट्ठी भर लोग येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतकर लोकतंत्र पर हावी हो जाएंगे.

देश की आज़ादी के बाद निरंतर चुनाव सुधार किए गए. मसलन मतदाता की उम्र घटाकर कम की गई, जन मानस ख़ासकर युवाओं और महिलाओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया गया. इन सबसे बढ़कर मत-पत्र के इस्तेमाल की बजाय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) द्वारा मतदान कराया जाने लगा. इससे जहां वक़्त की बचत हुई, श्रम की बचत हुई, वहीं धन की भी बचत हुई. इतना ही नहीं, मत पेटियां लूटे जाने की घटनाओं से भी राहत मिली. सियासी दलों को मलाल है कि ईवीएम की वजह से चुनाव में धांधली कम होने की बजाय और बढ़ गई. चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. इस तरह की ख़बरें देखने-सुनने को मिल रही हैं कि बटन किसी एक पार्टी के पक्ष में दबाया जाता है और वोट किसी दूसरी पार्टी के खाते में चला जाता है. इसके अलावा जितने लोगों ने मतदान किया है, मशीन उससे कई गुना ज़्यादा वोट दिखा रही है.

कांग्रेस की अगुवाई में देश के सियासी दल ईवीएम के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं. तक़रीबन 16 बड़े सियासी दलों ने हाल के चुनावों में मतदान के लिए इस्तेमाल हुईं ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने की बढ़ती शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए इनके प्रति अपना अविश्वास ज़ाहिर किया है. उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की है कि आगामी चुनावों में मतदान के लिए ईवीएम की बजाय काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. उनका आरोप है कि केंद्र सरकार ईवीएम को फुलप्रूफ़ बनाने के लिए वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव आयोग को ज़रूरी रक़म मुहैया कराने में कोताही बरत रही है.
विपक्षी दलों की तरफ़ से चुनाव आयोग को दिए गए ज्ञापन में कहा गया है कि चुनाव कराने के तौर तरीक़ों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच एक राय है, लेकिन वे फ़िलहाल चुनाव के लिए ईवीएम का इस्तेमाल करने के ख़िलाफ़ हैं. वे चाहते हैं कि मतदान के लिए काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. इसलिए जब तक ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने और उसमें गड़बड़ी की समस्या का समाधान नहीं हो जाता और जब तक राजनीतिक दलों की संतुष्टि के लिहाज़ से यह तकनीकी तौर पक्का नहीं हो जाता कि ईवीएम बिना किसी दिक़्क़त के काम करेंगे और इसकी पुष्टि वैश्विक स्तर पर नहीं हो जाती, तब तक मतदान पुराने मतपत्र वाली व्यवस्था के हिसाब से ही हो. मतपत्रों के ज़रिये मतदान की व्यवस्था को दुनियाभर में मान्यता मिली हुई है. सेक्शन 61ए के तहत चुनाव आयोग के विवेक का इस्तेमाल तभी किया जाए, जब सभी राजनीतिक दलों की संतुष्टि के साथ उन दिक़्क़तों का दूर कर लिया जाए.

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि अगले चुनाव, भले ही गुजरात में हों या कहीं और, मतपत्र के साथ होने चाहिए और ईवीएम का इस्तेमाल बंद होना चाहिए. उनकी दलील है कि अगर बैंक ऒफ़ बांग्लादेश के खातों को हैक किया जा सकता है और आठ करोड़ डालर चुराए जा सकते हैं, रूसी बैंक से तीन करोड़ डॊलर निकाले जा सकते हैं, तो ईवीएम के साथ छेड़छाड़ क्यों नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि ईवीएम के मामले में वह आडवाणी से लेकर मायावती तथा केजरीवाल तक के साथ हैं. ग़ौरतलब है कि लालकृष्ण आडवाणी ने साल 2009 के आम चुनाव में ईवीएम को लेकर सवाल उठाए थे.

दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग को चुनौती दी है कि अगर ईवीएम मशीन उन्‍हें दे दी जाए, तो 72 घंटों के अंदर वह साबित कर देंगे कि इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ मुमकिन है. चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने चुनाव आयोग की इस दलील को नकार दिया कि ईवीएम में एक बार सॊफ़्टवेयर लगाने के बाद ना तो इसे पढ़ा जा सकता है और ना ही इस पर कुछ लिखा जा सकता है. उन्होंने मध्य प्रदेश के भिंड में गड़बड़ी वाले ईवीएम के सॊफ़्टवेयर से जुड़ा डाटा सार्वजनिक करने की मांग करते हुए कहा है कि अगर चुनाव आयोग के पास डाटा डीकोड करने का तंत्र उपलब्ध नहीं है, तो वह अपने विशेषज्ञों की टीम से गड़बड़ पाई गई मशीनों का सॊफ़्टवेयर 72 घंटे में डीकोड करके आयोग को इसकी रिपोर्ट दे सकते हैं.

बहुजन समाज पार्टी ईवीएम के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर आई है. पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बीते 11 अप्रैल को ईवीएम के ख़िलाफ़ काला दिवस मनाया और जगह-जगह धरने प्रदर्शन किए. उनका कहना है कि जब तक चुनाव मतपत्र से कराने की उनकी मांग नहीं मानी जाती, उनका आंदोलन जारी रहेगा. पार्टी अध्यक्ष मायावती ने भी राज्यसभा में ईवीएम से मतदान को बंद करने और इसके लिए जारी बजट सत्र में ही विधेयक लाने की मांग की है. उनका कहना है कि इसके लिए क़ानून बनना चाहिए और जारी सत्र में ही इससे संबंधित विधेयक आना चाहिए. पार्टी के महासचिव महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी का आरोप है कि 2017 की जीत बीजेपी की ईमानदारी की जीत नहीं है, ये 2019 को भी ऐसी ही मशीनों का इस्तेमाल कर जीतना चाहते हैं. इन्होंने 2014 के चुनावों में भी धोखा किया था, तब सत्ता में आए थे.
ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा चुनावों में ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अर्ज़ी दाख़िल की है. पार्टी ने अदालत से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग की है.समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक अताउर्रहमान ने भी ईवीएम से छेड़छाड़ की अर्ज़ी सर्वोच्च न्यायालय में दाख़िल की है. इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ईवीएम को लेकर दायर याचिका पर फ़ैसले के बाद भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ईवीएम के साथ वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल नहीं लगाने की बात कही गई है. उन्होंने ईवीएम में हर पांचवां वोट भारतीय जनता पार्टी को पड़ने और ईवीएम से छेड़छाड़ के सुबूत होने की बात कही है.

हालांकि चुनाव आयोग ईवीएम को सुरक्षित बता रहा है. इतना ही नहीं, विपक्ष में रहते ईवीएम मशीन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी अब ईवीएम पाक-साफ़ नज़र आ रही है.
बहरहाल, ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले सामने आने के बाद सियासी दलों में इनके प्रति अविश्वास पैदा हो गया है. इसके साथ-साथ जन मानस में भी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर भरोसा ख़त्म हुआ है. इतना ही नहीं, इस मामले में चुनाव आयोग जिस तरह का रवैया अख़्तियार किए हुए है, वह भी संतोषजनक नहीं है.

बहरहाल, ईवीएम के साथ छेड़छाड़ लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है. चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनाव निष्पक्ष हों. अगर सियासी दल मतपत्र से चुनाव की मांग कर रहे हैं, तो इसे मंज़ूर किया जाना चाहिए. अगर सरकार और चुनाव आयोग ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर लोकतांत्रिक प्रणाली का क्या महत्व रह जाता है.

फ़िरदौस ख़ान
आज़ादी के बाद देश पर सबसे लम्बे अरसे तक एक छत्र शासन करने वाली कांग्रेस प्रदेशों में क्षेत्रीय नेताओं को आगे करके ख़ुद को मज़बूत बना सकती है. सियासत में राष्ट्रीय नेताओं के साथ-साथ क्षेत्रीय नेताओं का भी अपना वजूद हुआ करता है. क्षेत्रीय नेता अपने इलाक़े से जुड़े होते हैं. उन्हें मालूम होता है कि ज़मीनी हक़ीक़त क्या है, जनता की बुनियादी ज़रूरतें क्या हैं, जनता क्या चाहती है, उनकी पार्टी से जनता को क्या उम्मीदें हैं.

दरअसल, क्षेत्रीय नेताओं को नज़रअंदाज़ करना कांग्रेस के लिए काफ़ी नुक़सानदेह साबित हुआ है. हाल-फ़िलहाल की बात करें, तो कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय नेताओं को नज़र अंदाज़ करके राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया. इसी तरह उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी भी दिल्ली की मुख्यमंत्री रही शीली दीक्षित को सौंप दी. बेशक शीला दीक्षित प्रभावशाली नेत्री हैं. वे लगातार तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं. उन्होंने दिल्ली के विकास के लिए बहुत काम किए. उन्हें सियासत में प्रशासन और संसदीय कामों का ख़ासा अनुभव है. वे केंद्र में मंत्री भी रही हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए वे बाहरी थीं.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने पहली बार क्षेत्रीय नेताओं को नज़र अंदाज़ किया है. इससे पहले भी ऐसा हो चुका है. कांग्रेस से गए कई नेताओं ने बाद में अपने सियासी दल बनाए और कांग्रेस को खुली चुनौती दी. कई नेता दूसरे सियासी दलों में शामिल होकर कांग्रेस के लिए मुसीबत का सबब बने. साल 1982 में तत्कालीन कांग्रेस के महासचिव राजीव गांधी ने आंध्र प्रदेश के क़द्दावर नेता टी अंजैय्याह पर टिप्पणी की थी और बाद में उन्हें पार्टी से निकाल दिया था. उनके बाहर होने से कांग्रेस की हालत लगातार कमज़ोर होती गई. उसी साल वजूद में आई तेलगु देसम पार्टी ने आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के प्रभाव को तक़रीबन ख़त्म कर दिया.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मतभेद की वजह से कांग्रेस छोड़कर ऒल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम से अपना नया सियासी दल बना लिया था. कांग्रेस से अपने सियासी सफ़र की शुरुआत करने वाली साल 1984 में कोलकाता के जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से साम्यवादी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराने वाली ममता बनर्जी अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव भी रहीं. वे साल 1991 में नरसिम्हाराव की सरकार में वे मानव संसाधन, युवा कल्याण–खेलकूद और महिला-बाल विकास विभाग की राज्यमंत्री भी रहीं. उन्होंने प्रस्तावित खेल–कूद विकास योजना को सरकार से बहाली न मिलने पर इस्तीफ़ा दे दिया. फिर साल 1996 में केन्द्रीय मंत्री रहते हुए उन्होंने अपनी ही सरकार द्वारा पेट्रोल की क़ीमत बढ़ाए जाने का विरोध किया था. इसी तरह महाराष्ट्र के क़द्दावर नेता शरद पवार ने भी अपनी सियासी ज़िन्दगी कांग्रेस से शुरू की थी. साल 1967 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बारामती विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा ने सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए कहा था कि कांग्रेस पार्टी का प्रधानमंत्री उम्मीदवार भारत में जन्म लिया हुआ चाहिए न कि विदेशी. फिर जून 1999 में ये तीनों कांग्रेस से अलग हो गए और उन्होंने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की स्थापना की. मगर जब 1999 के विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो उनकी पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई. इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के विश्वासपात्र माने जाने वाले हरियाणा के क़द्दावर नेता चौधरी बंसीलाल ने साल भी 1996 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी की स्थापना की थी. बंसीलाल सात बार राज्य विधानसभा चुनाव जीते थे. केंद्र में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां निभाने वाले बंसीलाल चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने. बाद में उनके बेटे सुरेंद्र सिंह ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया था.  

क़ाबिले-ग़ौर है कि सियासत में विश्वास पात्रों को साथ रखने का चलन है. इंदिरा गांधी ने हमेशा अपने पास उन लोगों को रखा, जिन्हें वे अपना विश्वासपात्र मानती थीं. इसी तरह राजीव गांधी ने भी अपने विश्वासपात्र अरुण नेहरू, अरुण सिंह, ऑस्कर फर्नांडिस और मणिशंकर अय्यर को अहमियत दी. पार्टी अधय्क्ष बनने के बाद सोनिया गांधी ने भी ऐसा ही किया. उन्होंने अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी और अंबिका सोनी अपने क़रीब रखा. इस दौरान पार्टी के कई वरिष्ठ नेता हाशिये पर चले गए, जिनमें अर्जुन सिंह, सीताराम केसरी, माखनलाल फोतेदार और नारायण दत्त तिवारी के नाम लिए जा सकते हैं. अब राहुल गांधी भी इसी परंपरा को निभा रहे हैं, लेकिन उनके साथ परेशानी यह है कि उनके चहेते नेता लोकप्रिय नहीं हैं. वे न तो भीड़ जुटा पाते हैं और न ही इस भीड़ को वोटों में तब्दील कर पाते हैं. राहुल गांधी के क़रीबी माने जाने वाले संजय निरुपम, सीपी जोशी, मधुसूदन मिस्त्री, अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण और मोहन प्रकाश जैसे नेता जनमानस में कोई असर नहीं छोड़ पाते.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस दो गुटों में बंटी नज़र आ रही है. एक तबक़ा सोनिया गांधी के साथ और दूसरा राहुल गांधी के साथ खड़ा दिखाई देता है. कांग्रेस के साथ के नेता प्रभावशाली हैं, लेकिन राहुल गांधी के साथ के नेता बिना जनाधार वाले हैं. प्रदेशों में भी कांग्रेस नेताओं के अपने-अपने गुट हैं. ऐसे में ज़रूरत है कि वरिष्ठ नेताओं के सलाह-मशविरे के मार्गदर्शन में क्षेत्रीय नेताओं के हाथों में प्रदेशों की कमान सौंपी जाए. कांग्रेस के पास ऐसे बहुत से युवा चेहरे हैं, जिन्हें आगे करके पार्टी अपनी खोई ज़मीन हासिल कर सकती है. पूर्व केंद्रीय मंत्री व मध्य प्रदेश के गुना से कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी प्रदेश में कांग्रेस को मज़बूत करने में अहम किरदार अदा कर सकते हैं. राज घराने से ताल्लुक़ रखने वाले सिंधिया आम लोगों मिलते-जुलते हैं. उन्होंने मंत्री रहते हुए कभी अपनी गाड़ी में लालबत्ती नहीं लगाई. उनमें नेतृत्व क्षमता है. वे जन मुद्दे उठाने में आगे रहते हैं. इतना ही नहीं वे भाजपा नेताओं के हर हमले का उन्हीं के अंदाज़ में जवाब देना भी जानते हैं. मगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और सुरेश पचौरी आदि गुटों में बंटी नज़र आती है. केंद्र में मंत्री रहे जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश में  शांतिप्रिय और विकासवादी राजनीति के लिए जाना जाता है. उनके पिता जितेन्द्र प्रसाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव के सियासी सलाहकार रहे हैं. आरपीएन सिंह भी केंद्र में मंत्री रहे हैं.

पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए चुनाव इस बात का सबूत हैं कि जहां-जहां क्षेत्रीय नेताओं के हाथ में पार्टी की कमान थी, वहां कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया. कांग्रेस को अपने संगठन को मज़बूत करने और जनाधार बढ़ाने के लिए राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं को आगे लाना ही होगा.


सरफ़राज़ ख़ान
गर्मियों की शुरुआत होते ही हार्ट क्रैम्प्स, हीट एग्जॉशन, हीट स्ट्रोक, टायफाइड, ज्वाइंडिस और डायरियां जैसी बीमारियां होने लगती हैं. गर्मी से जुड़ी समस्याएं या तो बहुत ज्यादा गर्मी के होने या फिर बहुत कम गर्मी के खोने से होती हैं। केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल कहते हैं कि थोड़ी-सी सावधानी बरत कर गर्मी के मौसम में होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है. जैसे :
  • प्रचंड गर्मी के दौरान परिश्रम वाले कामों से परहेज करना चाहिए।
  • पसीने से फ्ल्यूड्स और नमक की कमी हो जाती है जिसको हल्के नमक वाले भोजन और पेयों जैसे- नींबू पानी से हासिल किया जा सकता है।
  • पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ की भरपाई के लिए लगातार पानी पीने की जरूरत होती है, भले ही आपको प्यास न लगी हो।
  • जब गर्मी के माहौल में परिश्रम करने से परहेज करें साथ ही उचित मात्रा में तरल पेय लें ताकि आपकी त्वचा ठंडी रहे साथ ही आपके बदन का तापमान भी सामान्य रहे।
  • जो लोग घर के बाहर की गतिविधियों में ज्यादा शामिल रहते हैं उन्हें चाहिए कि वे अधिक से अधिक पेय लेने से रक्त में सोडियम मिल सकता है। नमक का सेवन करने से इस समस्या से निजात पाई जा सकती है। ऐसी जगह जहां पर वेंटीलेशन नहीं होता जैसे कि कार में अचानक से तापमान बढ़ जाता है। गर्मी के दिनों में बंद कार के अंदर का तापमान 15 मिनट के भीतर 80 से 120 डिग्री फारेनहाइट हो सकता है। बच्चों और पालतू पशुओं को ऐसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए भले ही कुछ मिनटों के लिए क्यों न हो।
  • इस मौसम में भोजन और पानी के दूषित होने के बारे में भी विशेष सावधानी बरतें।
  • कभी भी कटे हुए फल और सब्जियां न खाएं। हमेशा इस नुस्खे को अपनाएं कि पहले पकाएं, उबालें, छीले और गरम किये बगैर नहीं ले या छोड़ दें है।


सरफ़राज़ ख़ान
नई दिल्ली. हीट स्ट्रोक के बढ़ने और गर्मी से होने वाली अन्य समस्याएं सिर्फ तापमान पर निर्भर नहीं होती बल्कि उनका सम्बंध आद्रता यानी ह्यूमिडिटी से होता है.

हार्ट केयर फाउंडेशन  ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल के मुताबिक़ 44 डिग्री सेंटीग्रेट या 110 डिग्री फारेनहाइट से अधिक तापमान पर जब आपका लगातार सूर्य की रौशनी से साबका हो, तो हीट स्ट्रोक हो सकता है. 40 फीसद की आद्रता के साथ 110 डिग्री फारेनहाइट में 130 डिग्री फारेनहाइट का अहसास होता है और इसे हाई रिस्क रेड जोन के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

जब समान तापमान पर आद्रता 30 से 40 फीसद के बीच होती है तब लोग सन स्ट्रोक, हीट स्ट्रोक और हीट एग्जाशन के शिकार होते हैं. फिर भी हीट स्ट्रोक लम्बे समय तक धूप में रहने या शारीरिक काम करने पर भी हो सकता है.

जब तक तापमान 85 डिग्री फारेनहाइट से कम नहीं हो जाता, तब तक ही क्रैम्प, हीट एग्जाशन और हीट स्ट्रोक से निजात मिलने में कमी नहीं आएगी. ऐसी स्थिति में सिर्फ थकान संभव है जो कि लम्बे समय तक खुले में रहने या शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने से होती है.

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति गमी से जुड़ी समस्या का षिकार होता है, तो उसे तरल पदार्थ (जिसमें नींबू पानी नमक के साथ शामिल है) 4 से 8 लीटर तक दिया जाना चाहिए। हीट स्ट्रोक और हीट एग्जाशन में मुख्य फर्क यह है कि हीट स्ट्रोक में पसीना नहीं आता. उच्च तापमान के साथ ही पसीना आने की स्थिति में व्यक्ति को आपातकालीन में दाखिल किया जाना चाहिए, ताकि उसके आंतरिक अंगों को झुलसने से बचाया जा सके.

सरफ़राज़ ख़ान
नई दिल्ली. भीषण गर्मी के कारण देश में हीट स्ट्रोक के मामलों में इज़ाफ़ा हो रहा है. हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने गर्मी में मरीजों द्वारा की जाने वाली गलतियों और प्रबंध के बारे में दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल के मुताबिक़ हीट स्ट्रोक दो तरह के होते हैं. पहला, वे जो युवा काफ़ी समय तक गर्मी के दौरान मेहनत वाले काम में संलिप्त होते हैं, हीट स्ट्रोक के षिकार होते हैं. हालांकि नॉन एक्जरशनल हीट स्ट्रोक कम सक्रिय रहने वाले वृध्दों या ऐसे लोगों पर अधिक असर डालती है जो बीमार होते हैं या कम उम्र वाले बच्चों में होती हैं.

अगर इस पर समय पर ध्यान नहीं दिया जाए तो सैकड़ों लोग 72 घंटों में जान गंवा सकते हैं. अगर उपचार में देरी हुई तो मृत्यु की संभावना 80 फ़ीसद तक होती है, इसमें भी दस फ़ीसद की कमी की जा सकती है अगर संभावित गलतियों से बचा जाए व जल्द ज़रूरी उपाय कर लिए जाएं.

बीमारी का पता न लगा पाना : यह रेक्टल तापमान है जो कि एग्जिलरी या ओरल तापमान से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है. व्यक्ति को हीट स्ट्रोक हो सकता है जिसमें उपचार न करा पाने की वजह रेक्टल तापमान ना लेना हो सकता है. हीट स्ट्रोक की स्थिति तब होती है जब तापमान 41 डिग्री सेंटीग्रेड (106 डिग्री फारेनहाइट) से अधिक हो और पसीना न आए.

हीट स्ट्रोक को हीट एग्जाशन समझने की भूल : दोनों में फर्क यह है कि हीट स्ट्रोक के दौरान मरीज को पसीना नहीं आता.

धीरे-धीरे तापमान कम होना : उपचार के तौर पर तापमान में कमी का लक्ष्य कम से कम 0.2 डिग्री सेंटीग्रेड प्रति मिनट कम करते हुए करीब 39 डिग्री सेंटीग्रेड (102 डिग्री फारेनहाइट) तक पहुंचाना होता है.
39 डिग्री से परे लगातार ठंड में रहना : हाइपोथर्मिया से बचाव के लिए 39 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान से कम के वातावरण में रहना चाहिए.

एंटी फीवर दवाएं देना : एंटी फीवर दवाएं पैरासीटामॉल, एस्प्रिन और नॉन स्टीरायॅडल एंटी इन्फ्लेमैटरी की कोई भूमिका नहीं होती. यह दवाएं अगर मरीज लीवर, ब्लड और गुर्दे की समस्या से ग्रसित है, तो नुकसानदायक साबित हो सकती हैं. इनकी वजह से रक्तस्राव भी हो सकता है.

बार-बार तापमान की जांच न करना : व्यक्ति को चाहिए कि वह लगातार रेक्टल तापमान को जांच करता रहे.

एक बार तापमान गिरने के बाद बुखार की जांच न करना : हीट स्ट्रोक के बाद कुछ दिनों तक बुखार रह सकता है. इसलिए जरूरी है कि इस दौरान लगातार शरीर के तापमान की जांच करते रहें.

कपड़े न उतारना : मरीज के सारे कपड़े उतार देने चाहिए, ताकि इवेपोरेशन से तापमान में कमी की जा सके.

सीज़र में फिनाइटॉइन देना : हीट स्ट्रोक में सीजर को काबू करने के लिए फिनाइटॉइन असरकारी नहीं होती.

तापमान को कम करने के लिए क्लोरप्रोमौजीन देना : पहले यह मुख्य उपचार के तौर पर इस्तेमाल होती थी, लेकिन अब इससे परहेज किया जाता है क्योंकि इससे सीजर की आशंका बढ़ जाती है.

मरीज़ के लिए खुद से एंटी कोलीनेर्जिक एंव एंटी हिस्टेमिनिक दवाए लेना : इस मौसम में खुद से एंटी एलर्जी और नाक बहने जैसी समस्याओं में दवाएं लेना हानिकारक साबित हो सकता है. इससे गर्मी का संतुलन गड़बड़ाने के साथ ही जल्द हाइपोथर्मिया भी हो सकता है.

हृदय रोगियों का सावधानी न बरतना : बूढ़े हृदय रोगियों में कार्डियोवैस्कुलर दवाएं जैसे- बीटा ब्लॉकर्स, कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स और डयूरेटिक्स हाइपरथर्मिया को बढ़ा सकता है.

मरीज़ द्वारा ली गई ड्रग्स के बारे में न बताना : कोकीन और एम्फेटामाइन्स जैसी ड्रग्स लेने पर मेटाबॉलिज्म बढ़ने से अधिक गर्मी हो सकती है. ऐसी स्थिति में हीट स्ट्रोक कहीं ज़्यादा घातक साबित हो सकता है.

हल्के तापमान को नज़र अंदाज़ करना : हर व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि उच्च तापमान तभी आता है जब हल्के बुखार को नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है. अगले कुछ दिनों तक अचानक बुखार को स्ट्रोक ही माना जाना चाहिए जब तक कि कुछ और साबित न हो जाए.

ज़्यादा तरल पदार्थ न देना : याद रखें कि ऐसे में आंतरिक अंग जलने की स्थिति में होते हैं और यह आग सिर्फ़ फीवर के साथ ही निकल सकती है. ऐसे मरीज़ों को चाहिए कि वे आंतरिक अंगों को ठंडक पहुंचाने के लिए अधिक से अधिक तरल पदार्थों का सेवन करें.

सिर्फ़ सिर को ठंडा करना : मरीज़ों को बहते हुए नल के नीचे बैठाकर नहलाना चाहिए ना कि सिर्फ पानी लेकर हाथ या सिर को ठंडक पहुंचाएं. आइस मसाज से परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि इससे आंतरिक तापमान में कोई कमी नहीं आती.

रायपुर (छत्तीसगढ़) . अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और हिंदी-संस्कृति को प्रतिष्ठित करने के लिए साहित्यिक वेब पत्रिका ‘सृजनगाथा डॉट कॉम’ द्वारा पिछले 13 वर्षों से प्रतिवर्ष दिए जानेवाले सम्मानों/पुरस्कारों के लिए हिंदी के रचनाकार, प्रकाशक, संपादक, साहित्यिक संस्थाएं एवं अनुशंसक पाठक प्रविष्टियाँ 30 जून 2017 तक प्रेषित कर सकते हैं.  इन सम्मानों का निर्णय वरिष्ठ साहित्यकारों के निर्णायक मंडल द्वारा किया जाएगा . ये सम्मान 14 वें अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, राजस्थान (1 अक्टूबर से 11 अक्टूबर, 2017 के मध्य आयोजित अलंकरण समारोह, जयपुर, बीकानेर, उदयपुर, माउंटआबू तथा अजमेर) में प्रदान किए जाएँगे . सभी प्रविष्टियाँ डॉ. जयप्रकाश मानस, संयोजक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा (विवकानंद नगर), रायपुर, छत्तीसगढ़-492001, मो.-9424182664 के पते पर भेजी जा सकती हैं.
सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान-2017 
सम्मान स्वरूप चयनित रचनाकार को साहित्यिक वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम द्वारा 21,000 रुपये नकद, शॉल, श्रीफल, प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाएगा . प्रतिभागी रचनाकार की उम्र 45 वर्ष से अधिक होनी चाहिए. इस सम्मान के लिए रचनाकार को अपनी प्रतिनिधि विधा या प्रकाशित किताब (केवल कथा या कविता केंद्रित) की 2-2 प्रतियाँ जो विगत 3 वर्षो के भीतर प्रकाशित हुई हो, प्रविष्टि के रूप में बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा.
बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान 2017  
द्विवेदी युग के ख्यात निबंधकार, विचारक, लेखक बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान-2017 के अंतर्गत प्रतिभागी रचनाकार को मावलीप्रसाद श्रीवास्तव साहित्यपीठ, रायपुर (संस्थापक एवं सचिव-शंकर श्रीवास्तव) की ओर से 5,000 की नगद राशि, मानपत्र, प्रतीक चिह्न् से अलंकृत किया जाएगा . इस सम्मान के लिए प्रतिभागी रचनाकार को निबंध/ललित निबंध की प्रकाशित कृतियों की 2-2 प्रतियाँ, जो विगत 3 वर्षो के भीतर प्रकाशित हुई हो, बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा.
सिन्धु रथ स्मृति सम्मान- 2017
ओड़िया, हिन्दी और छत्तीसगढ़ी की कवयित्री-कथाकार सिन्धु रथ स्मृति सम्मान केवल महिला रचनाकार (किसी भी विधा में मौलिक और उल्लेखनीय योगदान) के नाम होगा. सम्मान स्वरूप महिला रचनाकार को 11,000 की नगद राशि, मानपत्र, प्रतीकचिह्न् से अलंकृत किया जाएगा. इस सम्मान के लिए प्रतिभागी रचनाकार को कृतियों की 2-2 प्रतियाँ जो विगत 3 वर्षो के भीतरप्रकाशित हुई हो, बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा .
प्रो. सहदेव सिंह स्मृति सम्मान-2017
हिंदी के वरिष्ठ विचारक, लेखक, संपादक और उत्तरप्रदेश में प्रथम विधानसभा के समाजवादी विधायक प्रो. सहदेव सिंहस्मृत सम्मान स्वरूप प्रतिभागी रचनाकार को 11, 000 की नगद राशि, मानपत्र, प्रतीकचिह्न् से अलंकृत किया जाएगा. इस सम्मान के लिए प्रतिभागी रचनाकार को समाजशास्त्रीय/समाजवादी विचारधारा की किसी भी विधा कृतियों की 2-2 प्रतियाँ, जो विगत 3 वर्षो के भीतरप्रकाशित हुई हो,बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा .
सलेकचंद जैन स्मृति सम्मान-2017
दिल्ली के समाजसेवा, चिंतक स्व. सलेकचंद जैन स्मृति सम्मान स्वरूप प्रतिभागी रचनाकार को 11,000 की नगद राशि, मानपत्र, प्रतीकचिह्न् से अलंकृत किया जाएगा . इस सम्मान के लिए प्रतिभागी रचनाकार को साहित्य की किसी भी विधा की उत्कृष्ट कृतियों की 2-2 प्रतियाँ, जो विगत 3 वर्षो के भीतर प्रकाशित हुई हो,बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा .
नये पाठक सम्मान-2017
हिंदी की महत्वपूर्ण त्रैमासिकी ‘नये पाठक’ सम्मान स्वरूप प्रतिभागी रचनाकार को 5100 की नगद राशि, मानपत्र, प्रतीकचिह्न् से अलंकृत किया जाएगा. इस सम्मान के लिए प्रतिभागी रचनाकार को छांदस विधा यथा – गीत, नवगीत, ग़ज़ल आदि की कृतियों की 2-2 प्रतियाँ, जो विगत 3 वर्षो के भीतर प्रकाशित हुई हो,बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा .
मेजर दिवजोत कौर चावला स्मृति सम्मान-2017
कोलकाता की महत्वपूर्ण साहित्यिक संस्था ‘वाक्’ द्वारा मेजर दिवजोत कौर चावला (दिवंगत) की स्मृति में प्रतिवर्ष महिला रचनाकार को उल्लेखनीय रचनात्मक लेखन के लिए सम्मानित किया जायेगा . सम्मान स्वरूप प्रतिभागी महिला लेखक की पहली प्रकाशित कृति पर 5000 रूपये की नगद राशि, मान पत्र एवं प्रतीक चिन्ह से अलंकृत किया जायेगा . ज्ञातव्य हो कि दिवजोत कौर हिंदी के प्रतिष्ठित कवि-लघुकथाकार-लेखक जसवीर चावला जी की बिटिया हैं जिन्होंने अल्पायु में भी अपने रचनात्मक सेवाओं का प्रतिमान रचा है . इस सम्मान के लिए प्रतिभागी महिला रचनाकार को साहित्य की किसी भी विधा की पहली कृति की 2-2 प्रतियाँ, जो विगत 3 वर्षो के भीतर प्रकाशित हुई हो,बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा .
डॉ. उषा रानी सिंह स्मृति सम्मान-2017 
डॉ. सीताराम दीन - डा. उषा रानी सिंह स्मृति न्यास, पटना द्वारा विदुषी प्रोफ़ेसर, प्रख्यात कवयित्री-कथाकार, रेखा-चित्रकार डॉ. उषा रानी सिंह की स्मृति में डॉ. उषा रानी सिंह स्मृति सम्मान समकालीन कविता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रत्येक वर्ष चयनित कवयित्री को प्रदान किया जायेगा . चयनित कवयित्री को अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में सम्मान स्वरूप 5001/- की नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, आदि प्रदान किया जायेगा . इच्छुक एवं पंजीकृत प्रतिभागी कवयित्री अपनी प्रकाशित कविता संग्रह ( पिछले 5 वर्षों में अर्थात् केवल 1 जनवरी 2010 से 30 दिसम्बर, 2015 के दरमियान प्रकाशित) की 2 प्रतियाँ समन्वयक के पते पर 30 जून, 2017 के पूर्व तक भेज सकते हैं .
डॉ. सीताराम दीन स्मृति सम्मान-2017 
डॉ. सीताराम दीन - डॉ. उषा रानी सिंह स्मृति न्यास, पटना द्वारा प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, समालोचक और कबीर साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. सीताराम दीन जी स्मृति में डॉ. सीताराम दीन स्मृति सम्मान हिंदी आलोचना/समीक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रत्येक वर्ष चयनित आलोचक/समीक्षक को प्रदान किया जायेगा . चयनित आलोचक/समीक्षक/स्कॉलर को अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में सम्मान स्वरूप 5001/- की नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, आदि प्रदान किया जायेगा . इच्छुक एवं पंजीकृत प्रतिभागी आलोचक / समीक्षक/ स्कॉलर अपनी प्रकाशित आलोचनात्मक कृति भेज सकते हैं .
डॉ. राजेन्द्र सोनी स्मृति सम्मान- 2017 
हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा के ख्यात लघुकथाकार, लघुकथा आंदोलन के अग्रणी साथी, लघुकथा आधारित पत्रिका ‘पहचान यात्रा’ के संपादक स्व. डॉ. राजेन्द्र सोनी की स्मृति में चयनित व श्रेष्ठ लघुकथा संकलन को समादृत करने के लिए डॉ. राजेन्द्र सोनी स्मृति सम्मान-2017 प्रदान किया जायेगा . चयनित रचनाकार को सम्मान स्वरूप 5001/- की नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह आदि प्रदान किया जायेगा . इच्छुक एवं पंजीकृत प्रतिभागी लघुकथाकार अपनी प्रकाशित लघुकथा संग्रह ( केवल 1 जनवरी 2001 से 30 दिसम्बर, 2016 के दरमियान प्रकाशित) की 2-2 प्रतियाँ भेज सकते हैं .
राजकुमारी मिश्र स्मृति साहित्य यात्रा सम्मान-2017 
पटना से प्रकाशित और चर्चित शोध पत्रिका साहित्य यात्रा (संपादक-डॉ. कलानाथ मिश्र) द्वारा स्व. राजकुमारी मिश्र की स्मृति में 14 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में पंजीकृत प्रतिभागी द्वारा प्रस्तुत सर्वोत्कृष्ट शोध आलेख पर लेखक को 3100 रुपये, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र के साथ ‘राजकुमारी मिश्र स्मृति साहित्य यात्रा सम्मान-2017 से अलंकृत किया जायेगा . चयन गठित उच्च स्तरीय समिति द्वारा किया जायेगा.
साहित्य निबंध सम्मान-2017
बडोदरा, गुजरात से प्रकाशित एक मात्र साहत्यिक पत्रिका "साहित्य निबंध" परिवार द्वारा निबंध लेखन के प्रोत्साहन के लिए 14 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में उत्कृष्ट प्रकाशित निबंधात्मक कृति/कविता कृति के रचनाकार को 3100 रुपये, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र के ‘साहित्य निबंध सम्मान 2017’ से अलंकृत किया जायेगा . इस सम्मान के लिए प्रतिभागी रचनाकार को अपनी प्रकाशित कृति की 2-2 प्रतियाँ, जो विगत 3 वर्षो के भीतर प्रकाशित हुई हो,बायोडेटा और फोटो के साथ रजत सान्याय, संपादक, साहित्य निबंध,101 योगीसेवा 2,12 ए सेवाश्रम सोसाइटी, आनंद विदया विहार के पीछे , एल्लोरा पार्क वड़ोदरा 390023 गुजरात) को 30 अगस्त, 2017 तक रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा . उत्कृष्ट कृति का चयन निर्णायक मंडल द्वारा किया जायेगा .
शोध ऋतु सम्मान-2017 
जय सेवालाल बहु उद्देशीय सामाजिक, सांस्कृतिक विकास प्रतिष्ठान, नांदेड़, महाराष्ट्र द्वारा प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय रिसर्च जर्नल शोध ऋतु द्वारा सम्मेलन में प्रस्तुत सर्वोत्कृष्ट शोध आलेख पर लेखक को 2100 रुपये, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र के साथ ‘शोध ऋतु सम्मान 2017 से अलंकृत किया जायेगा .
लेखन सम्मान-2017
इलाहाबाद से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका लेखन (issn-2231-6450) द्वारा सम्मेलन में उत्कृष्ट आलोचनात्मक कृति के लिए प्रतिभागी रचनाकार को 2100 रुपये, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र के ‘लेखन सम्मान 2017 से अलंकृत किया जायेगा . इस सम्मान के लिए प्रतिभागी रचनाकार को अपनी प्रकाशित आलोचनात्मक कृति की 2-2 प्रतियाँ, जो विगत 3 वर्षो के भीतर प्रकाशित हुई हो,बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा .
पूर्वोत्तर साहित्य विमर्श सम्मान-2017
पूर्वोत्तर भारत के असम से प्रकाशित एक मात्र साहत्यिक पत्रिका ‘पूर्वोत्तर साहित्य विमर्श’ द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता/संपादन कर्म को प्रतीकात्मक रूप से प्रोत्साहित के लिए पूर्वोत्तर साहित्य विमर्श सम्मान-2017 प्रदान किया जायेगा . सम्मानस्वरूप पत्रिका-संपादक को 14 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में 2100 रुपये, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र व प्रकाशित साहित्य प्रदान कर अलंकृत किया जायेगा. प्रविष्टि के रूप में प्रतिभागी संपादक अपनी पत्रिका के विगत 3 वर्षों में प्रकाशित किसी भी 3 अंकों की एक-एक प्रति, बायोडेटा और फोटो के साथ रजिस्ट्री डाक से भेजना अनिवार्य होगा.

फ़िरदौस ख़ान
भाषा का दरख़्त दिल में उगता है और ज़ुबान से फल देता है. यानी जिसके दिल में जो होगा, वह शब्दों के ज़रिये बाहर आ जाएगा. किसी व्यक्ति की भाषा से उसके संस्कारों का, उसके विचारों का, उसके आचरण का पता चलता है. माना लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी है, सबको अपनी बात कहने का पूरा हक़ है. लेकिन कहीं अभिव्यक्ति की इस आज़ादी का, इस हक़ का ग़लत इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है? यह समझना भी ज़रूरी है. भाषा शैली व्यक्ति के व्यक्तित्व का आईना है, समाज की सभ्यता का पैमाना है. आए दिन जिस तरह के बयान सुनने को मिल रहे हैं, क्या वे एक सभ्य समाज की निशानी कहे जा सकते हैं ? ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने के ऐलान का है.

ग़ौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में बीरभूम ज़िले के सिवड़ी में हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ता हनुमान जयंती के मौक़े पर जय श्रीराम के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर आए. चूंकि पुलिस ने उन्हें जुलूस निकालने की इजाज़त नहीं दी थी, इसलिए जुलूस को रोकने की कोशिश की गई. इस बार विवाद इतना बढ़ गया कि हाथापाई होने लगी. पुलिस ने ग़ुस्साये कार्यकर्ताओं को क़ाबू करने के लिए लाठीचार्ज कर दिया. इस घटना के बाद इलाक़े में तनाव का माहौल पैदा हो गया. इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता योगेश वार्ष्णेय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा कि वह ख़ुद उसे 11 लाख का इनाम देंगे, जो ममता बनर्जी का स‍िर काटकर लाएगा. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि ऐसा घिनौना कृत्य किसी इंसान द्वारा किया जा सकता है. यह काम किसी हैवान द्वारा ही किया जा सकता है और हैवान को सज़ा मिलना अति आवश्यक है.
मीडिया में इस बयान के आते ही तृणमूल कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष रामफूल उपाध्याय की शिकायत पर योगेश वार्ष्णेय के ख़िलाफ़ सिविल लाइंस थाने में मुक़दमा दर्ज किया गया. ख़ैर, बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नुरूर रहमान बरकती ने एक क़दम आगे बढ़ते हुए योगेश वार्ष्णेय के सिर की क़ीमत दोगुनी कर दी. उन्होंने ऐलान किया कि योगेश वार्ष्णेय का सिर क़लम करने वाले को 22 लाख रुपये दिए जाएंगे. समाजवादी पार्टी के नेता भी कहां पीछे रहने वाले थे. पार्टी के पूर्व विधायक ज़मीरउल्लाह ने कहा कि ऐसा बयान देने वाले की जीभ काट लेनी चाहिए.
किसी का सिर काटकर लाने पर इनाम देने के ऐलान का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के भारतीय जनता पार्टी के विधायक राजा सिंह ने अपने विवादित बयान में कहा था कि जो लोग राम मंदिर बनाए जाने का विरोध करते हैं, हम उनका सिर काट देंगे. उन्होंने आगे कहा कि उनका यह बयान उन लोगों के लिए है, जो यह कहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण हुआ, तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. हम उनके इस बात के कहने का इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि हम उनका सिर काट सकें. इसी तरह पिछले माह मध्य प्रदेश के उज्जैन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महानगर प्रचार प्रमुख डॉ. कुंदन चंद्रावत ने एक विवादित बयान देते हुए कहा था कि कोई हत्यारे केरल के सीएम का सिर काटकर ला दे, वह अपनी एक करोड़ स्र्पये की संपत्ति उसके नाम कर देंगे.

दरअसल, आज सहनशीलता कम हो रही है. लोग अपनी आलोचना ज़रा सी भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. जहां कोई ऐसी बात हुई, जो उनके मन मुताबिक़ न हुई, या जो उन्हें पसंद नहीं आई, तो वे आग बबूला हो उठते हैं. सारी मान-मर्यादाएं ताख़ पर रख देते हैं और ऐसे बयान दे डालते हैं. सियासत में चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता इस मामले में सबसे आगे रहते हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने ही विवादित बयान दिए हैं. इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि के नेता भी पीछे नहीं हैं.

भारतीय संस्कृति में महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान है. नारी को नारायणी कहा गया है, देवी कहा गया है. लेकिन हक़ीक़त में देश और समाज के कर्ताधर्ता महिलाओं के ख़िलाफ़ अपशब्द बोलने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. हाल के कुछ सालों में सियासत में भाषाई मर्यादा ख़त्म होने लगी है. देश के प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक एक ही तरह की भाषा इस्तेमाल करते मिल जाएंगे. केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार में ऐसे बयानवीरों की लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनके बयानों ने देश में हंगामा बरपा किया है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि सत्ता के उच्च पदों पर बैठे लोग भाषाई मर्यादा के मामले में बेहद बौने साबित हो रहे हैं. कहते हैं, पहले तोलो, फिर बोलो, यानी बोलने से पहले सौ बार सोच लेना चाहिए कि क्या बोलना है, किस तरह बोलना है. कहा गया है कि तलवार का ज़ख़्म भर जाता है, लेकिन बात का ज़ख़्म कभी नहीं भरता.

बहरहाल, उच्च पदों पर बैठे वाले लोगों ख़ास कर सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए. ऐसे बयानों से समाज में कटुता बढ़ती है. ऐसे बयान देश की एकता और अखंडता के साथ-साथ समाज के चैन-अमन के लिए भी ख़तरनाक हैं. देश और समाज में वैमन्य फैलाने वाले इन बयानों में तेज़ी आई है, तो इसके लिए वरिष्ठ नेता भी ज़िम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिन पर अपने कार्यकर्ताओं को भाषा की मर्यादा व देश की संस्कृति सिखाने की ज़िम्मेदारी है. किसी भी पार्टी का कोई नेता अगर भड़काऊ बयानबाज़ी करता है, तो उस पर कार्रवाई तक नहीं की जाती. यही दूसरे नेताओं में भी उत्साह का संचार करती है. देश में भाषाई मर्यादा जिस तरह की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, उसे देखते हुए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा और ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी कहने की आज़ादी किसी को न दे. न तो सार्वजनिक मंचों से और न ही चुनावी रैलियों में. लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए यही बेहतर मार्ग है.

फ़िरदौस ख़ान
जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके बावजूद वह देश की माटी में रची-बसी है. देश का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी ने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी ने उसे परवान चढ़ाया. राजीव गांधी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में सोनिया गांधी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. कांग्रेस ने देश को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाया. देश को मज़बूत करने वाली कांग्रेस को आज ख़ुद को मज़बूत करने की ज़रूरत है. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को हार को भुलाकर संघर्ष करना चाहिए. सड़क से सदन तक पार्टी को नये सिरे से खड़ा करने का मौक़ा उनके पास है. राहुल गांधी  किसी ख़ास वर्ग के नेता न होकर जन नेता हैं. वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."

इस वक़्त राहुल गांधी के कंधों पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. पहले उन्हें पार्टी को मज़बूत बनाना है और फिर खोई हुई हुकूमत को हासिल करना है. उन्हें चाहिए कि वे देश भर के सभी राज्यों में युवा नेतृत्व ख़ड़ा करें. सियासत में आज जो हालात हैं, वे कल भी रहेंगे, ऐसा ज़रूरी नहीं है. जनता को ऐसी सरकार चाहिए, जो जनहित की बात करे, जनहित का काम करे. बिना किसी भेदभाव के सभी तबक़ों को साथ लेकर चले. कांग्रेस ने जनहित में बहुत काम किए हैं. ये अलग बात है कि वे अपने जन हितैषी कार्यों का प्रचार नहीं कर पाई, उनसे कोई फ़ायदा नहीं उठा पाई, जबकि भारतीय जनता पार्टी लोक लुभावन नारे देकर सत्ता तक पहुंच गई. बाद में ख़ुद प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के चुनावी वादों को’ जुमला’ क़रार दे दिया. आज देश को राहुल गांधी जैसे नेता की ज़रूरत है, जो छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है. ऐसे ईमानदार नेता को जनता क्यों न सर-आंखों में बिठाएगी.

कांग्रेस को मज़बूत करने के लिए राहुल गांधी को पार्टी की आंतरिक कलह को दूर करना होगा. पार्टी में आंतरिक कलह दिनोदिन बढ़ रही है. पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री सज्जन वर्मा ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कुछ सियासी परिवारों पर कांग्रेस को ख़त्म करने की एवज में सुपारी लेने का आरोप लगाया है. उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को फ़ौरन सख़्त कार्रवाई करने की सलाह देते हुए लिखा है कि "इंदिरा गांधी ने राजा-महाराजाओं का प्रभाव ख़त्म करने के लिए रियासतें ख़त्म कर दी थीं, तब कुछ लोगों ने ख़ूब शोर मचाया था. अब वही लोग राजनीतिक शोर मचा रहे हैं. ऐसे लोगों का प्रभाव ख़त्म करने के लिए कठोर निर्णय लेने होंगे. तभी हमारी पार्टी प्रदेश और देश में खड़ी हो पाएगी." सज्जन कुमार का पत्र सार्वजनिक होने के बाद पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्‌डू ने भी सोनिया गांधी को पत्र लिख डाला है, जिसमें उन्होंने सज्जन वर्मा के बयान को ग़ैर ज़िम्मेदाराना बताते हुए उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की मांग की है. उनका कहना है कि हमारी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी से है, लेकिन कांग्रेस के सचिव अपने ही लोगों पर सवाल उठा रहे हैं.
बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस की नैया डुबोने में इसके खेवनहारों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. राहुल गांधी को इस बात को भी समझना होगा और इसी को मद्देनज़र रखते हुए आगामी रणनीति बनानी होगा.  पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस को अपनी जागीर समझ लिया और सत्ता के मद में चूर वे कार्यकर्ताओं से भी दूर होते गए. नतीजतन, जनमानस ने कांग्रेस को सबक़ सिखाने की ठान ली और उसे सत्ता से बदख़ल कर दिया. वोटों के बिखराव और सही रणनीति की कमी की वजह से कांग्रेस को ज़्यादा नुक़सान हुआ. लेकिन इसका यह मतलब क़तई नहीं कि कांग्रेस का जनाधार कम हुआ है. लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा है. हाल में विधानसभा चुनाव में पांच में से तीन राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा है.  

आज़ादी के बाद से देश में सबसे ज़्यादा वक़्त तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के अब लोकसभा में भले ही 44 सांसद हैं, लेकिन कई मामलों में वे भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसदों पर भारी पड़े हैं. सत्ताधारी पार्टी ने कई बार ख़ुद कहा है कि कांग्रेस के सांसद उसे काम नहीं करने दे रहे हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनमें  हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और नगालैंड शामिल हैं. हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय और मिज़ोरम में कांग्रेस की हुकूमत है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता है. इन राज्यों में कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से कड़ा मुक़ाबला करना होगा. इसके लिए कांग्रेस को अभी से तैयारी शुरू करनी होगी.

इस साल 31 दिसंबर तक कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव होने हैं. पहले ये चुनाव 30 जून तक कराए जाने थे, लेकिन पार्टी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर छह महीने का और वक़्त मांगा, जिसे मंज़ूर कर लिया गया. कांग्रेस को चाहिए कि वह पार्टी की कमान राहुल गांधी के हाथों में सौंपे. राहुल गांधी को चाहिए कि वे ऐसे नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाएं, जो पार्टी के बीच रहकर पार्टी को कमज़ोर करने का काम कर रहे हैं. राहुल गांधी को चाहिए कि वे कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाएं, क्योंकि कार्यकर्ता किसी भी पार्टी की रीढ़ होता है. जब तक रीढ़ मज़बूत नहीं होगी, तब तक पार्टी भला कैसे मज़बूत हो सकती है.  उन्हें पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं से लेकर पार्टी के आख़िरी कार्रकर्ता तक अपनी पहुंच बनानी होगी. बूथ स्तर पर पार्टी को मज़बूत करना होगा. साफ़ छवि वाले जोशीले युवाओं को ज़्यादा से ज़्यादा पार्टी में शामिल करना होगा. कांग्रेस की मूल नीतियों पर चलना होगा, ताकि पार्टी को उसका खोया हुआ वर्चस्व मिल सके.

डॊ. सौरभ मालवीय
वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में गाय का विशेष महत्व है. दुख की बात है कि भारतीय संस्कृति में जिस गाय को पूजनीय कहा गया है, आज उसी गाय को भूखा-प्यासा सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया गया है. लोग अपने घरों में कुत्ते तो पाल लेते हैं, लेकिन उनके पास गाय के नाम की एक रोटी तक नहीं है. छोटे गांव-कस्बों की बात तो दूर देश की राजधानी दिल्ली में गाय को कूड़ा-कर्कट खाते हुए देखा जा सकता है. प्लास्टिक और पॊलिथीन खा लेने के कारण उनकी मृत्यु तक हो जाती है. भारतीय राजनीति में जाति, पंथ और धर्म से ऊपर होकर लोकतंत्र और पर्यावरण की भी चिंता होनी चाहिए. गाय की रक्षा, सुरक्षा बहस का मुद्दा आख़िर क्यों बनाया जा रहा है?

धार्मिक ग्रंथों में गाय को पूजनीय माना गया है. श्रीकृष्ण को गाय से विशेष लगाव था. उनकी प्रतिमाओं के साथ गाय देखी जा सकती है.
बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
अर्थात ब्राह्मण (प्रबुद्ध जन) धेनु (गाय) सूर (देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरित होते हैं. परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुणातीत एवम् इन्द्रीयातीत इसमें गाय तत्व इतना महत्वपूर्ण है कि वह सबका आश्रय है. गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास रहता है. इसलिए गाय का प्रत्येक अंग पूज्यनीय माना जाता है. गो सेवा करने से एक साथ 33 करोड़ देवता प्रसन्न होते हैं. गाय सरलता शुद्धता और सात्विकता की मूर्ति है. गऊ माता की पीठ में ब्रह्म, गले में विष्णु और मुख में रूद्र निवास करते हैं, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम-रोम में सभी महार्षि बसते हैं. सभी दानों में गो दान सर्वधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.

गाय को भारतीय मनीषा में माता केवल इसीलिए नहीं कहा कि हम उसका दूध पीते हैं. मां इसलिए भी नहीं कहा कि उसके बछड़े हमारे लिए कृषि कार्य में श्रेष्ठ रहते हैं, अपितु हमने मां इसलिए कहा है कि गाय की आंख का वात्सल्य सृष्टि के सभी प्राणियों की आंखों से अधिक आकर्षक होता है. अब तो मनोवैज्ञानिक भी इस गाय की आंखों और उसके वात्सल्य संवेदनाओं की महत्ता स्वीकारने लगे हैं. ऋषियों का ऐसा मंतव्य है कि गाय की आंखों में प्रीति पूर्ण ढंग से आंख डालकर देखने से सहज ध्यान फलित होता है. श्रीकृष्ण भगवान को भगवान बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका गायों की ही थी. स्वयं ऋषियों का यह अनुभव है कि गाय की संगति में रहने से तितिक्षा की प्राप्ति होती है. गाय तितिक्षा की मूर्ति होती है. इसी कारण गाय को धर्म की जननी कहते हैं. धर्मग्रंथों में सभी गाय की पूजा को महत्वपूर्ण बताया गया है. हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश और देवी पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है.

परोपकारय दुहन्ति गाव:
अर्थात यह परोपकारिणी है. गाय की सेवा करने से से परम पुण्य की प्राप्ति होती है. मानव मन की कामनाओं को पूर्ण करने के कारण इसे कामधेनु कहा जाता है.
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि:।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट नमो नम: स्वाहा।।
ॐ सर्वदेवमये देवि लोकानां शुभनन्दिनि।
मातर्ममाभिषितं सफलं कुरु नन्दिनि।।

उल्लेखनीय यह भी है कि ज्योतिष शास्त्र में नव ग्रहों के अशुभ फल से मुक्ति पाने के लिए गाय से संबंधित उपाय ही बताए जाते जाते हैं. हिन्दू मान्यता के अनुसार गाय ईश्वर का श्रेष्ठ उपहार है. भारतीय परम्परा के पूज्य पशुओं में गाय को सर्वोपरि माना जाता है. गाय से संबंधित गोपाष्‍टमी भारतीय संस्‍कृति का एक महत्‍वपूर्ण पर्व है. यह कार्तिक शुक्ल की अष्टमी को मनाया जाता है, इस कारण इसका नाम गोपाष्टमी पड़ा. इस पावन पर्व पर गौ-माता का पूजन किया जाता है. गाय की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है. गोवर्धन के दिन गोबर को जलाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है. धार्मिक प्रवृत्ति के बहुत लोग प्रतिदिन गाय की पूजा करते हैं. भोजन के समय पहली रोटी गाय के लिए निकालने की भी परंपरा है.

भारत में प्राचीन काल से ही गाय का विशेष महत्व रहा है. मानव जाति की समृद्धि को गौ-वंश की समृद्धि की दृष्टि से जोड़ा जाता है. जिसके पास जितनी अधिक गायें होती थीं, उसे समाज में उतना ही समृद्ध माना जाता था. प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं की अपनी गौशालाएं होती थीं, जिनकी व्यवस्था वे स्वयं देखते थे. विजय प्राप्त होने, कन्याओं के विवाह तथा अन्य मंगल उत्सवों पर गाय उपहार स्वरूप या दान स्वरूप दी जाती थीं.

गोहत्या को पापा माना जाता है, जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है.
गोहत्यां ब्रह्महत्यां च करोति ह्यतिदेशिकीम्।
यो हि गच्छत्यगम्यां च यः स्त्रीहत्यां करोति च ॥

भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते।
कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

गाय संसार में प्राय: सर्वत्र पाई जाती है. एक अनुमान के अनुसार विश्व में कुल गायों की संख्या 13 खरब है. गाय से उत्तम प्रकार का दूध प्राप्त होता है, जो मां के दूध के समान ही माना जाता है. जिन बच्चों को किसी कारण वश उनकी माता का दूध नहीं मिलता, उन्हें गाय का दूध पिलाया जाता है.
उल्लेखनीय है कि हमारे देश में गाय की 30 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें सायवाल जाति, सिंधी, कांकरेज, मालवी, नागौरी, थरपारकर, पवांर, भगनाड़ी, दज्जल, गावलाव, हरियाना, अंगोल या नीलोर और राठ, गीर, देवनी, नीमाड़ी, अमृतमहल, हल्लीकर, बरगूर, बालमबादी, वत्सप्रधान, कंगायम, कृष्णवल्ली आदि प्रजातियों की गाय सम्मिलित हैं. गाय के शरीर में सूर्य की गो-किरण शोषित करने की अद्भुत शक्ति होती है. इसीलिए गाय का दूध अमृत के समान माना जाता है. गाय के दूध से बने घी-मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता है. गाय का गोबर उपले बनाने के काम आता है, जो अच्छा ईंधन है. गोबर से जैविक खाद भी बनाई जाती है. इसके मूत्र से भी कई रोगों का उपचार किया जा रहा है. यह अच्छा कीटनाशक भी है.

वास्तव में गाय को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की बजाय राजनीति से जोड़ दिया गया है, जिसके कारण इसे जबरन बहस का विषय बना दिया गया. गाय सबके लिए उपयोगी है. इसलिए गाय पर बहस करने की बजाय इसके संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए. सरकार को चाहिए कि वह सड़कों पर विचरती गायों के लिए गौशालाओं का निर्माण कराए. 

फ़िरदौस ख़ान
देश में लोकतंत्र की आड़ में हिन्दुत्व विचारधारा पनप रही है. इसकी ताज़ा मिसाल उत्तर प्रदेश है. उत्तर प्रदेश ने देश की सियासत में एक ऐसी इबारत लिखी है, जिसका आने वाले वक़्त में गहरा असर पड़ेगा. नरेंद्र मोदी ने गुजरात से हिन्दुत्व की जो राजनीति शुरू की थी, वह अब उत्तर प्रदेश से परवान चढ़ेगी. भारतीय जनता पार्टी पहले से ही कहती रही है कि पूर्ण बहुमत मिलने के बाद देश में हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू किया जाएगा. केंद्र में भी बहुमत की सरकार है और अब उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने बहुमत की सरकार बनाई है. ऐसे में देश-प्रदेश में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को ध्यान में रखकर फ़ैसले लिए जाएं, तो हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए.

क़ाबिले-ग़ौर है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा, जबकि अन्य राज्यों में वह क्षेत्रीय नेताओं के नाम पर विधानसभा चुनाव लड़ती है. मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान के नाम पर जनता से वोट मांगे जाते हैं. इसी तरह छ्त्तीसगढ़ में रमन सिंह और बिहार में सुशील मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता है. इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, यह भी पहले से ही तय होता है. फिर उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या हो गया कि राज्य में नेताओं की एक बड़ी फ़ौज होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी के काफ़ी वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश से ही हैं, जिनमें राजनाथ, कलराज मिश्र, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि शामिल हैं. इसके बावजूद पार्टी ने इन नेताओं को तरजीह नहीं दी.

विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद से ज़्यादा कामयाबी मिली. अकेले उसके 312 विधायक जीते, जबकि सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 325 है. इसके बावजूद इनमें से कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया. भाजपा ने सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास में पहली बार बने दो उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. लोकसभा सांसद केशव मौर्या की भी पहचान एक कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही हैं. वह विश्व हिन्दू परिषद से भी जुड़े रहे हैं.

योगी सरकार के इकलौते मुसलमान मंत्री मोहसिन रज़ा भी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. वह कुछ वक़्त पहले ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे. माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और वक्फ़ बोर्ड समेत कई ऐसे निगम हैं, जिनका अध्यक्ष मुसलमान ही होता है. शायद इसलिए ही रज़ा को यह पद मिल गया, वरना भारतीय जनता 20 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला था, जिसे वह उम्मीदवार बना पाती. पार्टी के वरिष्ठ नेता शाहनवाज़ ख़ान ने ख़ुद इस बात की तस्दीक की थी.

आख़िर क्या वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में विधायकों को तरजीह देने की बजाय सांसद को मुख्यमंत्री बनाया. जानकारों का मानना है कि इतना बड़ा फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम पर नहीं ले सकती. इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक का एजेंडा काम कर रहा था. ऐसा लगता है कि संघ मोदी का विकल्प तैयार कर रहा है. योगी आदित्यनाथ की छवि कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही है. वह गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं. वह हिन्दू युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं. एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ विवादित बयान देने के लिए भी जाने जाते हैं. उनके विवादित बयानों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है. पिछले साल जून में उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, "जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा." उससे पहले जून 2015 में योग के विरोध पर उन्होंने कहा था,  "जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए. जो लोग सूर्य नमस्कार को नहीं मानते उन्हें समुद्र में डूब जाना चाहिए." इसी तरह फ़रवरी 2015 में उनका यह बयान आया, "अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है." प्रदूषण और मुसलमानों की बढ़ती आबादी जैसे मुद्दों पर भी वह कई विवादित बयान दे चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 1998 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. चुनाव के दौरान उनके समर्थकों ने 'दिल्ली में मोदी, यूपी में योगी' का नारा दिया था. उत्तर प्रदेश में योगी के मुख्यमंत्री बनने से यह साफ़ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के लोकतंत्र में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को बढ़ावा दे रहा है. साल 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के बनने के बाद से देश में सांप्रदायिक घटनाओं में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है. उत्तर प्रदेश के दादरी कांड के बाद एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ हमले बढ़ गए. गौमांस के नाम पर लोगों का एक झुंड किसी पर भी टूट पड़ता था. इससे एक समुदाय विशेष के मन में असुरक्षा की भावना बढ़ गई. अन्य सियासी दलों ने मुसलमानों के इसी डर का ख़ूब फ़ायदा उठाया. इस तरह की घटनाओं ने वोटों के ध्रुवीकरण का काम किया. भाजपा समर्थित लोगों के वोट इकट्टे हो गए और ग़ैर भाजपाई और मुसलमानों के वोट बंट गए.

मोदी भले ही सबका साथ, सबका विकास का नारा देते रहें, लेकिन सब जानते हैं कि उन्होंने किसका विकास किया और किसे अनदेखा किया. उनके ’जुमले’ तो जगज़ाहिर हैं. संवैधानिक पद पर बैठने के बाद व्यक्ति विशेष की मजबूरी बन जाती है कि उसे सबके हित की बात बोलनी ही पड़ती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की यह विशेषता रही है कि वे कितने ही बड़े संवैधानिक पद पर क्यों न बैठ जाएं, बात सिर्फ़ अपने मन की ही करते हैं. भले ही इससे किसी को ठेस ही क्यों न पहुंचे.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी का मुख्यमंत्री बनना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी जीत ज़रूर है, लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी की सियासी हार है. 

फ़िरदौस ख़ान
पिछले के कई बरसों से देश में कोई भी चुनाव हो, राहुल गांधी की जान पर बन आती है. पिछले लोकसभा चुनाव हों, उससे पहले के विधानसभा चुनाव हों या उसके बाद के विधानसभा चुनाव हों, सभी के चुनाव नतीजे राहुल गांधी के सियासी करियर पर गहरा असर डालते हैं. पिछले काफ़ी अरसे से कांग्रेस को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है. और हर हार के साथ राहुल गांधी के हिस्से में एक हार और दर्ज हो जाती है. आख़िर क्या वजह है कि राहुल गांधी के आसपास शुभचिंतकों की बड़ी फ़ौज होने के बावजूद वह कामयाब नहीं हो पा रहे हैं.

हाल ही में पांच राज्यों में चुनाव के नतीजे आने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. भले ही पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हो गई, लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को ख़ासा मायूस किया है. उत्तराखंड में भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा है. हालांकि मणिपुर और गोवा में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन सियासी रणनीति सही नहीं होने की वजह से कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही.

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में साल 2009 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस 2004 के मुक़ाबले और ज़्यादा मज़बूत होकर सामने आई, तो उसका श्रेय राहुल गांधी को ही दिया गया. ख़ासकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के 21 सांसद जीतकर आने को राहुल गांधी की कामयाबी बताया गया. मगर उसके बाद से कांग्रेस को ज़्यादातर नाकामी का ही सामना करना पड़ रहा है. जिस वक़्त केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उत्तर प्रदेश से कांग्रेस मंि 21 सांसद थे, तब साल 2012 में वहां हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज़ 28 सीटें ही जीत पाई थी. उस वक़्त पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 117 में से 46 सीटें जीत सकी थी. हार की वजह कैप्टन अमरिन्दर सिंह से कांग्रेसियों का नाराज़ होना और पार्टी द्वारा अमरिन्दर सिंह को मुख्यमंत्री पद के लिए पसंद किया जाना बताया गया था. इसी तरह गोवा में भी कांग्रेस को सत्ता से बेदख़्ल होना पड़ा. उत्तराखंड और मणिपुर में कांग्रेस सत्ता हासिल करने में कामयाब रही. गुजरात चुनाव में भले ही कांग्रेस को हार मिली हो, लेकिन देवभूमि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने जीत हासिल की. फिर अगले साल 2013 में दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और नगालैंड में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. मेघालय, मिज़ोरम और कर्नाटक में कांग्रेस को जीत हासिल हुई. पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी. एक दशक से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस महज़ 44 सीटों तक ही सिमट कर रह गई. इतना ही नहीं, साल 2014 में हरियाणा और महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की हार हुई और सत्ता उसके हाथों से निकल गई. इसी तरह झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. अगले साल 2015 में कांग्रेस बिहार में महागठबंधन में शामिल हुई और उसने जीत का मुंह देखा. साल 2016 में असम कांग्रेस के हाथ से निकल गया. केरल और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को नाकामी ही मिली. पुड्डुचेरी में कांग्रेस को जीत नसीब हुई.
इस साल के आख़िर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. कुछ दिन बाद दिल्ली नगर निगम में चुनाव होने हैं. कांग्रेस निकाय चुनाव में भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही है. पिछले दिनों महाराष्ट्र निकाय चुनाव में कांग्रेस को नाकामी हासिल हुई. कांग्रेस महज़ 31 सीटों तक ही सिमट कर रह गई, जबकि साल 2012 के चुनाव में कांग्रेस के 52 पार्षद जीते थे.

हालत यह है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन पर मायूसी ज़ाहिर करते हुए कांग्रेस को नये सिरे से अपनी रणनीतियों पर विचार करने की सलाह दे डाली. कांग्रेस की लगातार हार से पार्टी के बीच से आवाज़ उठने लगी है. कुछ वक़्त पहले दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी को अपरिपक्व कह दिया था. अब उनके बेटे संदीप दीक्षित ने पार्टी की रणनीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि देवरिया से दिल्ली तक की यात्रा रोकने से पार्टी को काफ़ी नुक़सान हो गया है. सनद रहे कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले कांग्रेस ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया था और बड़े ही जोश से राहुल गांधी अगुवाई में देवरिया से दिल्ली की यात्रा शुरू कर दी थी, लेकिन बाद में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से समझौता कर लिया.

राहुल गांधी बहुत अच्छे इंसान हैं. वह ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं और मेहनत भी ख़ूब करते हैं. इसके बावजूद उतने कामयाब नहीं हो पाते, जितने होने चाहिए. आख़िर उनकी नाकामी की वजह क्या है? अगर इस पर गौर क्या जाए, तो कई वजहें सामने आती हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जो लोग ख़ुद को राहुल गांधी का क़रीबी और शुभचिंतक कहते हैं, वही लोग उनके बारे में दुष्प्रचार करते हैं. यूं तो राहुल गांधी जनसभाएं करते हैं, आम आदमी से सीधे रूबरू होकर बात करते हैं, लेकिन अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं से दूर हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बीमारी की वजह से सियासत में सक्रिय नहीं हैं. उनकी ग़ैर हाज़िरी में पार्टी के सभी फ़ैसले राहुल गांधी ही ले रहे हैं. इन फ़ैसलों में उनके सियासी सलाहकारों की भी बड़ी भूमिका रहती है. हर चुनाव में पार्टी की हार के बाद राहुल गांधी को अपनी रणनीतियों में बदलाव लाने की सलाह दी जाती है. पार्टी को अपनी हार का विशलेषण कर ख़ामियों को दूर करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता. पार्टी हर चुनाव में अपनी पुरानी ख़ामियों को दोहराती है.

कुछ महीनों बाद फिर से दो राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव आ रहा है. कांग्रेस के पास ज़्यादा वक़्त नहीं है. उसे आने वाले चुनावों में जीत हासिल करनी है, तो ईमानदारी से अपनी ख़ामियों पर ग़ौर करना होगा. पार्टी को अपनी चुनावी रणनीति बनाते वक़्त कई बातों को ज़ेहन में रखना होगा. उसे सभी वर्गों का ध्यान रखते हुए अपने पदाधिकारी तक करने होंगे. पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी विश्वास में लेना होगा, क्योंकि जनता के बीच तो इन्हीं को जाना है. बूथ स्तर तक पार्टी संगठन को मज़बूत करना होगा. राहुल गांधी को चाहिए कि वे पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक से संवाद करें. उनकी पहुंच हर कार्यकर्ता तक और कार्यकर्ता की पहुंच राहुल गांधी तक होनी चाहिए. उन्हें पार्टी के मायूस कार्यकर्ताओं में जोश भरना होगा और जनसंपर्क बढ़ाना होगा. अगर वह ऐसा कर पाए, तो फिर कांग्रेस को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा.

फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की... गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूजरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद वह भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...

हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.

गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.

सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.

एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.

1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.

दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.

किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-

सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

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