फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.


चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.

कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वह ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया. ग़ौरतलब है कि श्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था.

श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था. श्री राजीव गांधी की मौत से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था. उन्होंने स्वर्गीय राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, मृत्यु शरीर का धर्म है. जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है. लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती, प्राकृतिक नहीं होती, ’जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती, जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है, जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है, एक षडतंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें. श्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है. एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है. शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो. लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा, जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो. यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती 'सद्भावना दिवस' और 'अक्षय ऊर्जा दिवस' के तौर पर मनाई जाती है, जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पिता को याद करते हुए कहते हैं, वे एक दयालु, सौम्य और स्नेही व्यक्ति थे, जिनकी असामयिक मृत्यु ने मेरे जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ा है. मुझे उनके साथ बिताया गया वक़्त याद है और भाग्यशाली था कि कई जन्मदिन उनके साथ मनाएं, जब वह ज़िन्दा थे. मैं उन्हें बहुत याद करता हूं, लेकिन वे मेरी यादों में हैं. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया. यह सबसे बेशक़ीमती तोहफ़ा है, जो एक पिता अपने बेटे को दे सकता है."

फ़िरदौस ख़ान
बरसात का मौसम शुरू ही देश के कई राज्य बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. बाढ़ से जान व माल का भारी नुक़सान होता है. लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं. कितने ही लोग बाढ़ की वजह से मौत की आग़ोश में समा जाते हैं. सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हो जाते हैं,  हज़ारों लोगों को बेघर होकर शरणार्थी जीवन गुज़ारने को मजबूर होना पड़ता हैं. खेतों में खड़ी फ़सलें तबाह हो जाती हैं.

देश में बाढ़ आने के कई कारण हैं. बाढ़ अमूमन उत्तर पूर्वी राज्यों को ही निशाना बनाती है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि चीन और ऊपरी पहाड़ों में भारी बारिश होती है और वर्षा का यह पानी भारत के निचले इलाक़ों की तरह बहता है. फिर यही पानी तबाही की वजह बनता है. नेपाल में भारी बारिश का पानी भी बिहार की कोसी नदी को उफ़ान पर ला देता है, जिससे नदी के रास्ते में आने वाले इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. ग़ौरतलब है कि कोसी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है. यह नदी बिहार में भीम नगर के रास्ते भारत में दाख़िल होती है. कोसी बिहार में भारी तबाही मचाती है, इसलिए इसे बिहार का शोक या अभिशाप भी कहा जाता है. कोसी नदी हर साल अपनी धारा बदलती रहती है. साल 1954 में भारत ने नेपाल के साथ समझौता करके इस पर बांध बनाया था. हालांकि बांध नेपाल की सीमा में बनाया गया है, लेकिन इसके रखरखाव का काम भारत के ज़िम्मे है. नदी के तेज़ बहाव के कारण यह बांध कई बार टूट चुका है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ बांध बनाते वक्त आकलन किया गया था कि यह नौ लाख क्यूसेक पानी के बहाव को सहन कर सकता है और बांध की उम्र 25 साल आंकी गई थी. पहली बार यह बांध 1963 में टूटा. इसके बाद 1968 में पांच जगहों से यह टूटा. उस वक़्त कोसी का बहाव नौ लाख 13 हज़ार क्यूसेक मापा गया था. फिर साल 1991 नेपाल के जोगनिया और 2008 में नेपाल के ही कुसहा नामक स्थान पर बांध टूट गया. हैरानी की बात यह रही कि उस वक़्त नदी का बहाव महज़ एक लाख 44 हज़ार क्यूसेक था. फ़िलहाल कोसी पर बने बांध में जगह-जगह दरारें पड़ी हुई हैं.

कोसी की तरह गंडक नदी भी नेपाल के रास्ते बिहार में दाख़िल करती है. गंडक को नेपाल में सालिग्राम और मैदान में नारायणी कहते हैं. यह पटना में आकर गंगा में मिल जाती है. बरसात में गंडक भी उफ़ान पर होती है और इसके आसपास के इलाक़े बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. ग़ौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है. देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं. उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं, लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. पश्चिम बंगाल की मयूराक्षी, अजय, मुंडेश्वरी, तीस्ता और तोर्सा नदियां तबाही मचाती हैं, ओडिशा में सुवर्णरेखा, बैतरनी, ब्राह्मणी, महानंदा, ऋषिकुल्या, वामसरदा नदियां उफ़ान पर रहती हैं. आंध्रप्रदेश में गोदावरी और तुंगभद्रा, त्रिपुरा में मनु और गुमती, महाराष्ट्र में वेणगंगा, गुजरात और मध्य-प्रदेश में नर्मदा नदियों की वजह से इनके तटवर्ती इलाक़ों में बाढ़ आती है.

बाढ़ से हर साल करोड़ों रुपये का नुक़सान होता है, लेकिन नुक़सान का यह अंदाज़ा वास्तविक नहीं होता. बाढ़ से हुए नुक़सान की सही राशि का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है, क्योंकि बाढ़ से मकान व दुकानें क्षतिग्रस्त होती हैं. फ़सलें तबाह हो जाती हैं. लोगों का कारोबार ठप हो जाता है. बाढ़ के साथ आने वाली बीमारियों की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी काफ़ी पैसा ख़र्च होता है. लोगों को बाढ़ से नुक़सान की भरपाई में काफ़ी वक़्त लग जाता है. यह कहना ग़लत न होगा कि बाढ़ किसी भी देश, राज्य या व्यक्ति को कई साल पीछे कर देती है. बाढ़ से उसका आर्थिक और सामाजिक विकास ठहर जाता है. इसलिए बाढ़ से होने वाले नुक़सान का सही अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है.

जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, देश में पिछले साढ़े छह दशक के दौरान बाढ़ से सालाना औसतन 1654 लोगों की मौत हुई और 92763 पशुओं की जान गई. इससे सालाना औसतन 71.69 लाख हेक्टेयर इलाक़े पर असर पड़ा और तकरीबन 1680 करोड़ रुपये फ़सलें तबाह हो गईं. बाढ़ से सालाना 12.40 लाख मकानों को नुक़सान पहुंचा. साल 1953 से 2017 के कुल नुक़सान पर नज़र डालें, तो देश में बाढ़ की वजह से 46.60 करोड़ हेक्टेयर इलाक़े में 205.8 करोड़
लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इस दौरान 8.06 करोड़ मकानों को नुक़सान पहुंचा है. अफ़सोस की बात है कि हर साल बाढ़ से होने वाले जान व माल के नुकसान में बढ़ोतरी हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है.

पिछले सात दशकों में देश में अनेक बांध बनाए गए हैं. साथ ही पिछले क़रीब तीन दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं. बाढ़ से निपटने के लिए 1978 में केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया था. देश के कुल 32.9 करोड़ हेक्टेयर में से तक़रीबन 4.64 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित इलाक़े में आती है. देश में हर साल तक़रीबन 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है.

हैरत का बात यह भी है कि बाढ़ एक राष्ट्रीय आपदा है, इसके बावजूद इसे राज्य सूची में रखा गया है. इसके तहत केंद्र सरकार बाढ़ से संबंधित कितनी ही योजनाएं बना ले, लेकिन उन पर अमल करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. प्रांतवाद के कारण राज्य बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं कर पाते. एक राज्य की बाढ़ का पानी समीपवर्ती राज्य के इलाक़ों को भी प्रभावित करता है. मसलन हरियाणा का बाढ़ का पानी राजधानी दिल्ली में छोड़ दिया जाता है, जिससे यहां के इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. राज्यों में हर साल बाढ़ की रोकथाम के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, मगर प्रशासनिक लापरवाही की वजह से इन योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं हो पाता. नतीजतन, यह योजनाएं महज़ काग़जों तक ही सिमट कर जाती हैं. हालांकि बाढ़ को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में बांध बनाना, नदियों के कटान वाले इलाक़ों में कटान रोकना, पानी की निकासी वाले नालों की सफ़ाई और उनकी सिल्ट निकालना, निचले इलाक़ों के गांवों को ऊंचा करना, सीवरेज व्यवस्था को सुधारना और शहरों में नालों के रास्ते आने वाले कब्ज़ों को हटाना आदि शामिल है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफ़ान, भूकंप और बाढ़ के लिए क़स्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है. उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है. वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं. गली-मोहल्लों के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के ज़रिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है. संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं. पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं. इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है. इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं. आग तूफ़ान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक ख़र्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना ख़र्चीला काम नहीं है. इसे बख़ूबी बाढ़ आने वाले इलाक़ों में लागू किया जा सकता है. विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम न हो जाए. इसके लिए नदी के किनारों पर ख़ासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं. नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बग़ीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं. जहां बाढ़ का ख़तरा ज़्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है. गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है.

हमारे देश में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा. इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है. इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है. इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है.

प्रो. संजय द्विवेदी
अटलबिहारी वाजपेयी यानि एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से इस तरह प्रभावित किया जिसकी मिसाल नहीं मिलती। एक साधारण परिवार में जन्मे इस राजनेता ने अपनी भाषण कला, भुवनमोहिनी मुस्कान, लेखन और विचारधारा के प्रति सातत्य का जो परिचय दिया वह आज की राजनीति में दुर्लभ है। सही मायने में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के सबसे करिश्माई नेता और प्रधानमंत्री साबित हुए।
एक बड़े परिवार का उत्तराधिकार पाकर कुर्सियां हासिल करना बहुत सरल है किंतु वाजपेयी की पृष्ठभूमि और उनका संघर्ष देखकर लगता है कि संकल्प और विचारधारा कैसे एक सामान्य परिवार से आए बालक में परिवर्तन का बीजारोपण करती है। शायद इसीलिए राजनैतिक विरासत न होने के बावजूद उनके पीछे एक ऐसा परिवार था जिसका नाम संघ परिवार है। जहां अटलजी राष्ट्रवाद की ऊर्जा से भरे एक ऐसे महापरिवार के नायक बने, जिसने उनमें इस देश का नायक बनने की क्षमताएं न सिर्फ महसूस की वरन अपने उस सपने को सच किया जिसमें देश का नेतृत्व करने की भावना थी। अटलजी के रूप में इस परिवार ने देश को एक ऐसा नायक दिया जो वास्तव में हिंदू संस्कृति का प्रणेता और पोषक बना। याद कीजिए अटल जी की कविता तन-मन हिंदू मेरा परिचय। वे अपनी कविताओं, लेखों ,भाषणों और जीवन से जो कुछ प्रकट करते रहे उसमें इस मातृ-भू की अर्चना के सिवा क्या है। वे सही मायने में भारतीयता के ऐसे अग्रदूत बने जिसने न सिर्फ सुशासन के मानकों को भारतीय राजनीति के संदर्भ में स्थापित किया वरन अपनी विचारधारा को आमजन के बीच स्थापित कर दिया।
समन्वयवादी राजनीति की शुरूआतः
सही मायने में अटलबिहारी वाजपेयी एक ऐसी सरकार के नायक बने जिसने भारतीय राजनीति में समन्वय की राजनीति की शुरूआत की। वह एक अर्थ में एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार थी जिसमें विविध विचारों, क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तमाम लोग शामिल थे। दो दर्जन दलों के विचारों को एक मंत्र से साधना आसान नहीं था। किंतु अटल जी की राष्ट्रीय दृष्टि, उनकी साधना और बेदाग व्यक्तित्व ने सारा कुछ संभव कर दिया। वे सही मायने में भारतीयता और उसके औदार्य के उदाहरण बन गए। उनकी सरकार ने अस्थिरता के भंवर में फंसे देश को एक नई राजनीति को राह दिखाई। यह रास्ता मिली-जुली सरकारों की सफलता की मिसाल बन गया। भारत जैसे देशों में जहां मिलीजुली सरकारों की सफलता एक चुनौती थी, अटलजी ने साबित किया कि स्पष्ट विचारधारा,राजनीतिक चिंतन और साफ नजरिए से भी परिवर्तन लाए जा सकते हैं। विपक्ष भी उनकी कार्यकुशलता और व्यक्तित्व पर मुग्ध था। यह शायद उनके विशाल व्यक्तित्व के चलते संभव हो पाया, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की भावना थी। देशप्रेम था, देश का विकास करने की इच्छाशक्ति थी। उनकी नीयत पर किसी कोई शक नहीं था। शायद इसीलिए उनकी राजनीतिक छवि एक ऐसे निर्मल राजनेता की बनी जिसके मन में विरोधियों के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं था।
आम जन का रखा ख्यालः
 उनकी सरकार सुशासन के उदाहरण रचने वाली साबित हुई। जनसमर्थक नीतियों के साथ महंगाई पर नियंत्रण रखकर सरकार ने यह साबित किया कि देश यूं भी चलाया जा सकता है। सन् 1999 के राजग के चुनाव घोषणापत्र का आकलन करें तो पता चलता है कि उसने “सुशासन प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता”जैसे विषय को उठाने के साथ कहा-“लोगों के सामने हमारी प्रथम प्रतिबद्धता एक ऐसी स्थायी, ईमानदार, पारदर्शी और कुशल सरकार देने की है, जो चहुंमुखी विकास करने में सक्षम हो। इसके लिए सरकार आवश्यक प्रशासनिक सुधारों के समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करेगी, इन सुधारों में पुलिस और अन्य सिविल सेवाओं में किए जाने वाले सुधार शामिल हैं।” राजग ने देश के सामने ऐसे सुशासन का आदर्श रखा जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, संघीय समरसता, आर्थिक आधुनिकीकरण, सामाजिक न्याय, शुचिता जैसे सवाल शामिल थे। आम जनता से जुड़ी सुविधाओं का व्यापक संवर्धन, आईटी क्रांति, सूचना क्रांति इससे जुड़ी उपलब्धियां हैं।
एक भारतीय प्रधानमंत्रीः
   अटलबिहारी बाजपेयी सही मायने में एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो भारत को समझते थे।भारतीयता को समझते थे। राजनीति में उनकी खींची लकीर इतनी लंबी है जिसे पारकर पाना संभव नहीं दिखता। अटलजी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि माना। देश को सबसे बड़ा माना। देश के बारे में सोचा और अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया। उनकी समूची राजनीति राष्ट्रवाद के संकल्पों को समर्पित रही। वे भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री भी रहे। उनकी यात्रा सही मायने में एक ऐसे नायक की यात्रा है जिसने विश्वमंच पर भारत और उसकी संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास किया। मूलतः पत्रकार और संवेदनशील कवि रहे अटल जी के मन में पूरी विश्वमानवता के लिए एक संवेदना है। यही भारतीय तत्व है। इसके चलते ही उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए तो प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए प्रयास जारी रखे। भले ही कारगिल का धोखा मिला, पर उनका मन इन सबके विपरीत एक प्रांजलता से भरा रहा। बदले की भावना न तो उनके जीवन में है न राजनीति में। इसी के चलते वे अजातशत्रु कहे जाते हैं।
आज जबकि राष्ट्रजीवन में पश्चिमी और अमरीकी प्रभावों का साफ प्रभाव दिखने लगा है। रिटेल में एफडीआई के सवाल पर जिस तरह के हालात बने वे चिंता में डालते हैं। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर बड़े पदों पर बैठे राजनेता जिस तरह अमरीकी और विदेशी कंपनियों के पक्ष में खड़े दिखे वह बात चिंता में डालती है। यह देखना रोचक होता कि अगर सदन में अटलजी होते तो इस सवाल पर क्या स्टैंड लेते। शायद उनकी बात को अनसुना करने का साहस समाज और राजनीति में दोनों में न होता। सही मायने में राजनीति में उनकी अनुपस्थिति इसलिए भी बेतरह याद की जाती है, क्योंकि उनके बाद मूल्यपरक राजनीति का अंत होता दिखता है। क्षरण तेज हो रहा है, आदर्श क्षरित हो रहे हैं। उसे बचाने की कोशिशें असफल होती दिख रही हैं। आज भी वे एक जीवंत इतिहास की तरह हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वे एक ऐसे नायक हैं जिसने हमारे इसी कठिन समय में हमें प्रेरणा दी और हममें ऊर्जा भरी और स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरी राजनीति का पाठ पढ़ाया। हमें देखना होगा कि यह परंपरा उनके उत्तराधिकार कैसे आगे बढाते हैं। उनकी दिखायी राह पर भाजपा और उसका संगठन कैसे आगे बढ़ता है।  अपने समूचे जीवन से अटलजी जो पाठ पढ़ाते हैं उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा है। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए भी वे राजधर्म को निभाते हैं। सत्ता में रहकर भी वीतराग उनका सौंदर्य है। वे एक लंबी लकीर खींच गए हैं, इसे उनके चाहनेवालों को न सिर्फ बड़ा करना है बल्कि उसे दिल में भी उतारना होगा। उनके सपनों का भारत तभी बनेगा और सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला फैलेगा। स्वतंत्र भारत के इस आखिरी  करिश्माई नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व सदियों तक याद किया जाएगा, वे धन्य हैं जिन्होंने अटल जी को देखा, सुना और उनके साथ काम किया है। ये यादें और उनके काम ही प्रेरणा बनें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलसचिव हैं।)


फ़िरदौस ख़ान
बहुत कम लोग जानते हैं कि सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री एवं ट्रेजडी क्वीन के नाम से विख्यात मीना कुमारी शायरा भी थीं. मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था. एक अगस्त, 1932 को मुंबई में जन्मी मीना कुमारी के पिता अली बक़्श पारसी रंगमंच के जाने-माने कलाकार थे. उन्होंने कई फ़िल्मों में संगीत भी दिया था. उनकी मां इक़बाल बानो मशहूर नृत्यांगना थीं. उनका असली नाम प्रभावती देवी था. उनका संबंध टैगोर परिवार से था यानी मीना कुमारी की नानी रवींद्र नाथ टैगोर की भतीजी थीं, लेकिन अली बक़्श से विवाह के लिए प्रभावती ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था. मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में एक फ़िल्म में बतौर बाल कलाकार काम किया था. 1952 में प्रदर्शित विजय भट्ट की लोकप्रिय फ़िल्म बैजू बावरा से वह मीना कुमारी के रूप में जानी गईं. 1953 तक मीना कुमारी की तीन हिट फ़िल्में आ चुकी थीं, जिनमें दायरा, दो बीघा ज़मीन एवं परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिए एक नया दौर शुरू हुआ. इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को ख़ासा प्रभावित किया था. इसके बाद उन्हें ऐसी फ़िल्में मिलने लगीं, जिनसे वह ट्रेजडी क्वीन के रूप में मशहूर हो गईं. उनकी ज़िंदगी परेशानियों के दौर से ग़ुजर रही थी. उन्हें मशहूर फ़िल्मकार कमाल अमरोही के रूप में एक हमदर्द इंसान मिला. उन्होंने कमाल से प्रभावित होकर उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही और दस साल के वैवाहिक जीवन के बाद 1964 में वह कमाल अमरोही से अलग हो गईं. कहा यह भी गया कि औलाद न होने की वजह से उनके रिश्ते में दरार पड़ने लगी थी.
1966 में बनी फ़िल्म फूल और पत्थर के नायक धर्मेंद्र से मीना कुमारी की नज़दीकियां बढ़ने लगी थीं. मीना कुमारी उस दौर की कामयाब अभिनेत्री थीं, जबकि धर्मेंद्र का करियर ठीक से नहीं चल रहा था. लिहाज़ा धर्मेंद्र ने मीना कुमारी का सहारा लेकर ख़ुद को आगे बढ़ाया. उनके क़िस्से पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर पड़ा. अमरोहा में एक मुशायरे के दौरान किसी युवक ने मीना कुमारी पर कटाक्ष करते हुए एक ऐसा शेअर पढ़ा, जिस पर मुशायरे की सदारत कर रहे कमाल अमरोही भड़क गए.

कमाल अमरोही ने मीना कुमारी की कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें पाकीज़ा भी शामिल है. पाकीज़ा के निर्माण में सत्रह साल लगे थे, जिसकी वजह मीना कुमारी से उनका अलगाव था. यह कला के प्रति मीना कुमारी का समर्पण ही था कि उन्होंने बीमारी की हालत में भी इस फ़िल्म को पूरा किया. पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया था, लेकिन कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र को फ़िल्म से बाहर कर उनकी जगह राजकुमार को ले लिया. 1956 में शुरू हुई पाकीज़ा 4 फ़रवरी, 1972 को रिलीज़ हुई और उसी साल 31 मार्च को मीना कुमारी चल बसीं. फ़िल्म हिट रही, कमाल अमरोही अमर हो गए, लेकिन मीना कुमारी ग़ुरबत में मरीं. अस्पताल का बिल उनके प्रशंसक एक डॉक्टर ने चुकाया. मीना कुमारी ज़िंदगी भर सुर्ख़ियों और विवादों में रहीं. कभी शराब पीने की आदत को लेकर, तो कभी धर्मेंद्र के साथ संबंधों को लेकर. मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन में शराब और शायरी को अपना साथी बना लिया था. वह नज़्में लिखती थीं, जो उनकी मौत के बाद नाज़ नाम से प्रकाशित हुईं-
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करने की क़ुव्वत मिलती है…

मीना कुमारी की ग़ज़लों में मुहब्बत है, शोख़ी है. वह कहती हैं-
रूह का चेहरा किताबी होगा
जिस्म का रंग अनाबी होगा
शरबती रंग से लिखूं आंखें
और अहसास शराबी होगा
चश्मे-पैमाने से टपका आंसू
कोई बेचारा सवाबी होगा...

धर्मेंद्र ने भी करियर की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद मीना को अकेला छोड़ दिया. कभी मुड़कर भी उनकी तरफ़ नहीं देखा. मीना उम्र भर मुहब्बत पाने के लिए तरसती रह गईं-
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे
अपने जिस्म के रोएं-रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है, जिसके
रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके
आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम जज़ीरों
की तऱफ लिए जा रहे हों,
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह-रहकर चमकते दिखाई देते हैं,
हमारी गुफ़्तगू की ज़ुबान
वही है जो
दरख्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है,
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आंसू छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत…

कमाल अमरोही से निकाह करके भी उनका अकेलापन दूर नहीं हुआ और वह शराब में डूब गईं. एक बार जब दादा मुनि अशोक कुमार उनके लिए दवा लेकर पहुंचे तो उन्होंने कहा, दवा खाकर भी मैं जीऊंगी नहीं, यह जानती हूं मैं. इसलिए कुछ तंबाक़ू खा लेने दो, शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो. मीना कुमारी का यह जवाब सुनकर दादा मुनि कांप उठे. मीना कुमारी की उदासी उनकी नज़्मों में भी उतर आई थी-
दिन गुज़रता नहीं
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह क्षण पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका देख बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुआं क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है…

बचपन से जवानी तक या यूं कहें कि ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक उन्होंने दुश्वारियों का सामना किया-
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता,
जब ज़ुल्फ़ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता,
हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता,
बहते हुए आंसू ने आंख से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता,
दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता…

मीना कुमारी की ज़िंदगी एक सच्चे प्रेमी की तलाश में ही गुज़र गई. अकेलेपन का दर्द उनकी रचनाओं में समाया हुआ है :-
चांद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा,
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुंआ तन्हा,
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा,
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी
दोनों चलते रहे कहां तन्हा,
जलती-बुझती सी रोशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा,
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा…




चेहरे के दाग़-धब्बे कम करने के लिए महंगा इलाज करने और महंगे तरीक़े अपनाने की ज़रूरत नहीं है. बिना मेहनत किए भी दाग़-धब्बों को कम किया जा सकता है. दाग़-धब्बे कम करने के कुछ आसान घरेलू तरीक़े पेश हैं, जिन्हें आज़मा कर दाग़-धब्बों को कम किया जा सकता है.
ऐलो वेरा जेल 
ऐलो वेरा जेल के पत्ते को लंबा काटकर शीशे की प्याली में जेल निकाल लें. फिर इसे दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगाएं. आधा घंटे बाद पानी से धो लें.
नींबू का रस
शीशे की प्याली में नींबू का रस निचोड़ लें.  फिर इसमें रूई का गोला भिगोकर दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगाएं. नींबू को काटकर सीधे भी लगाया जा सकता है. एक घंटे बाद पानी से धो लें. ध्यान रहे कि नींबू का रस लगाने के बाद धूप में न जाएं.
नींबू में जो एसकॉर्बिक एसिड (ascorbic acid) या विटामिन सी होता है, जो वह एन्टी-ऑक्सिडेंट्स के रूप में काम करते हैं और त्वचा में दाग़-धब्बों को दूर करने में मदद करते हैं.
दूध
रात को सोने से पहले रूई के गोले को दूध में भिगोकर दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगा लें. रात भर यूं ही छोड़ दें. अगले दिन सुबह गुनगुने गर्म पानी से धो लें.
दूध में लैक्टिक एसिड होता है, जो दाग़-धब्बों को दूर करने में बहुत मदद करता है.
दही
एक कटोरी में दही लें और उसमें आधा नींबू का रस डालकर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को दाग़-धब्बे पर लगाएं. फिर सूखने के बाद गुनगुने पानी से धो लें.
दही में भी लैक्टिक एसिड होता है, जो ब्लीचिंग एजेन्ट का काम करता है.
संतरा
एक कटोरी में दो बड़े चम्मच संतरे का रस लें और उसमें एक चुटकी हल्दी डालकर अच्छी तरह से मिला लें. इस पेस्ट को रात को सोने से पहले चेहरे पर अच्छी तरह से लगा लें और अगली सुबह गुनगुने गर्म पानी से धो लें.
नींबू की तरह ही संतरे के रस में भी ब्लीचिंग का गुण होता है, जो दाग़-धब्बों को दूर करने में मदद करता है.
शहद
शहद को दाग़-धब्बे वाली जगह पर लगाएं.
एक कटोरी में ज़रूरत के अनुसार नींबू का रस या ऑलिव ऑयल लें. उसमें थोड़ा शहद डालकर पेस्ट बना लें. उसके बाद पेस्ट को चेहरे पर लगाएं. 
ज़रूरत के हिसाब से बादाम को भिगोकर पीस लें. उसमें एक छोटा चम्मच नींबू का रस और दूध डालें. उसके बाद थोड़ा-सा शहद डालकर अच्छी तरह से पेस्ट बना लें. पेस्ट को चेहरे पर लगाकर सूखने का बाद पानी से धो लें.

शहद त्वचा की मृत कोशिकाओं (dead cells) को निकालकर रौनक़ लाने में मदद करता है. शहद में एन्जाइम होता है, जो वह त्वचा को मुलायम और आकर्षक बनाने में भी बहुत मदद करता है. अगर आपकी त्वचा संवेदनशील है, तो पहले हाथ पर इसका इस्तेमाल करके देख लें. उसके बाद ही चेहरे पर लगाएं.

ग़ौरतलब है कि इन घरेलू तरीक़ों को कम से कम एक महीना तक लगातार इस्तेमाल करने के बाद ही नतीजा नज़र में आएगा.


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाक़ात कर रहे हैं. अगर वे मुसलमानों के हालात जानने के लिए ऐसा कर रहे हैं, तो उन्हें वरिष्ठ पत्रकार फ़िरदौस ख़ान की ये रिपोर्ट ज़रूर पढ़नी चाहिए.
देश को आज़ाद हुए सात दशक बीत चुके हैं. इस दौरान बहुत कुछ बदल गया, लेकिन अगर कहीं कुछ नहीं बदला है, तो वह है देश के मुसलमानों की हालत. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी मुसलमानों की हालत अच्छी नहीं है. उन्हें उन्नति के लिए समान अवसर नहीं मिल रहे हैं. नतीजतन, मुसलमान सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से बेहद पिछ्ड़े हुए हैं.

संपत्ति के मामले में भी मुसलमानों की हालत बेहद ख़स्ता है. ग्रामीण इलाक़ों में 62.2 फ़ीसद मुसलमान भूमिहीन हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 43 फ़ीसद है. वक़्फ़ संपत्तियों यहां तक की क़ब्रिस्तानों पर भी बहुसंख्यकों का क़ब्ज़ा है. शर्मनाक बात तो यह भी है कि इन मामलों में वक़्फ़ बोर्ड के अधिकारियों की मिलीभगत शामिल रहती है. मुसलमानों को रोज़गार के अच्छे मौक़े भी बहुत कम ही मिल पाते हैं. इसलिए ज़्यादार मुसलमान छोटे-मोटे कामधंधे करके ही अपना गुज़ारा कर रहे हैं. 2001 की जनगणना के मुताबिक़ मुसलमानों की आबादी 13.43 फ़ीसद है, लेकिन सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी बहुत कम है. सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ सुरक्षा बलों में कार्यरत 18 लाख 89 हज़ार 134 जवनों में 60 हज़ार 517 मुसलमान हैं. सार्वजनिक इकाइयों को छोड़कर सरकारी रोज़गारों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व महज़ 4.9 फ़ीसद है. सुरक्षा बलों में 3.2 फ़ीसद, भारतीय प्रशासनिक सेवा में 30, भारतीय विदेश सेवा में 1.8, भारतीय पुलिस सेवा में 4, राज्यस्तरीय विभागों में 6.3, रेलवे में 4.5, बैंक और रिज़र्व बैंक में 2.2, विश्वविद्यालयों में 4.7,  डाक सेवा में 5, केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में 3.3 और राज्यों के सार्वजनिक उपक्रमों में 10.8 फ़ीसद मुसलमान हैं. ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले 60 फ़ीसद मुसलमान मज़दूरी करते हैं.

शिक्षा के मामले में भी मुसलमानों की हालत बेहद ख़राब है. शहरी इलाक़ों में 60 फ़ीसद मुसलमानों ने कभी स्कूल में क़दम तक नहीं रखा है. हालत यह है कि शहरों में 3.1 फ़ीसद मुसलमान ही स्नातक हैं, जबकि ग्रामीण इलाक़ों में यह दर सिर्फ़ 0.8 फ़ीसद ही है. साल 2001 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ मुसलमान दूसरे धर्मों के लोगों के मुक़ाबले शिक्षा के मामले में बहुत पीछे है. देश के तक़रीबन सभी राज्यों में कमोबेश यही हालत है. शहरी मुसलमानों की साक्षरता की दर बाक़ी शहरी आबादी के मुक़ाबले 19 फ़ीसद कम है. ग़ौरतलब है कि साल 2001 में देश के कुल 7.1 करोड़ मुस्लिम पुरुषों में सिर्फ़ 55 फ़ीसद ही साक्षर थे, जबकि 46.1 करोड़ ग़ैर मुसलमानों में यह दर 64.5 फ़ीसद थी. देश की 6.7 करोड़ मुस्लिम महिलाओं में सिर्फ़ 41 फ़ीसद महिलाएं साक्षर थीं, जबकि अन्य धर्मों की 43 करोड़ महिलाओं में 46 फ़ीसद महिलाएं साक्षर थीं. स्कूलों में मुस्लिम लड़कियों की संख्या अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के मुक़ाबले तीन फ़ीसद कम थी. 101 मुस्लिम महिलाओं में से सिर्फ़ एक मुस्लिम महिला स्नातक है, जबकि 37 ग़ैर मुसलमानों में से एक महिला स्नातक है. देश के हाईस्कूल स्तर पर मुसलमानों की मौजूदगी महज़ 7.2 फ़ीसद है. ग़ैर मुस्लिमों के मुक़ाबले 44 फ़ीसद कम मुस्लिम विद्यार्थी सीनियर स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं, जबकि महाविद्यालयों में इनकी दर 6.5 फ़ीसद है. स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले मुसलमानों में सिर्फ़ 16 फ़ीसद ही स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल कर पाते हैं. मुसलमानों के 4 फ़ीसद बच्चे मदरसों में पढ़ते हैं, जबकि 66 फ़ीसद सरकारी स्कूलों और 30 फ़ीसद बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं.

मुसलमानों को सरकारी योजनाओं का भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं मिल पाता है. ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीबी रेखा से नीचे के 94.9 फ़ीसद मुस्लिम परिवारों को मुफ़्त राशन नहीं मिल पाता है. इसी तरह सिर्फ़ 3.2 फ़ीसद मुसलमानों को ही सब्सिडी वाला क़र्ज़ मिलता है और महज़ 1.9 फ़ीसद मुसलमान सरकारी अनुदान वाले खाद्य कार्यक्रमों से फ़ायदा उठा पाते हैं. उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है.

देश में सांप्रदायिकता, ग़रीबी और अशिक्षा की वजह से मुसलमानों के साथ नाइंसाफ़ी की जाती रही है. देश के किसी भी हिस्से में अगर कोई आतंकी वारदात हो जाती है, तो सुरक्षा एजेंसियां फ़ौरन मुसलमानों पर शिकंजा कस देती हैं. पुलिस का भी यही रवैया रहता है. कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनके लिए बेक़सूर मुसलमानों को गिरफ़्तार किया गया, उन्हें बहुसंख्यक वर्ग के लोगों ने अंजाम दिया था. लेकिन इस सबके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों से लेकर मीडिया की भूमिका भी मुसलमानों को फ़ंसाने की ही रहती है. नतीजतन, देशभर की जेलों में मुसलमान क़ैदियों की तादाद उनकी आबादी के मुक़ाबले काफ़ी ज़्यादा है. सच्चर समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि देश में मुसलमानों की आबादी जहां तक़रीबन 13.43 फ़ीसद है,  वहीं जेलों में उनकी तादाद क़रीब 21 फ़ीसद है. सच्चर समिति ने 2006 में कहा था कि सबसे ज़्यादा मुस्लिम क़ैदी महाराष्ट्र की जेलों में हैं, लेकिन मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक़, मुस्लिम क़ैदियों के मामले में पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है, जबकि महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है. नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के आंकड़ों (दिसंबर 2010 तक) के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में 47 फ़ीसद मुस्लिम क़ैदी हैं, जबकि महाराष्ट्र में यह दर 32 फ़ीसद है. उत्तर प्रदेश में 26 फ़ीसद और बिहार में 23 फ़ीसद मुसलमान जेलों में हैं. क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि इन प्रदेशों में विचाराधीन मुस्लिम क़ैदियों की तादाद सजायाफ़्ता मुस्लिम क़ैदियों से कई गुना ज़्यादा है. नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश की कुल 1,393 जेलों में 3 लाख 68 हज़ार 998 क़ैदी हैं, जिनमें 76 हज़ार 701 मुस्लिम क़ैदी हैं. इनमें सिर्फ़ 22 हज़ार 672 मुस्लिम क़ैदी ऐसे हैं, जिन्हें सज़ा सुनाई जा चुकी है, जबकि 53 हज़ार 312 मुस्लिम क़ैदी विचाराधीन हैं. देश की लचर क़ानून व्यवस्था जगज़ाहिर है कि यहां किसी भी मामले की सुनवाई में बरसों लग जाते हैं. ऐसी हालत में विचाराधीन क़ैदियों की उम्र जेल में ही गुज़र जाती है. एक अन्य रिपोर्ट की मानें तो ज़्यादातर क़ैदियों का आतंकवाद या संगठित अपराध से वास्ता नहीं है.

मुसलमानों की बदतर हालत के लिए सियासी तौर पर मुस्लिम प्रतिनिधित्व का कम और कमज़ोर होना भी है. मुसलमानों की आबादी के लिहाज़ से सियासत में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है. देश में तक़रीबन 15 करोड़ मुसलमान हैं. कुल मुस्लिम आबादी में से तक़रीबन 23.7 फ़ीसद मुसलमान उत्तर प्रदेश में रहते हैं. बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में एक-एक करोड़ मुसलमान रहते हैं. केरल, आंध्र प्रदेश, असम, जम्मू-कश्मीर और कर्नाटक में 25 लाख से एक करोड़ के बीच मुसलमान रहते हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड में से प्रत्येक राज्य में तक़रीबन 30 से 50 लाख मुसलमान रहते हैं. दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड में 10 से 20 लाख मुसलमान रहते हैं. देश के नौ ज़िलों में मुसलमानों की आबादी 75 फ़ीसद से ज़्यादा है. मुसलमानों की अपनी कोई सियासी पार्टी नहीं है. सियासी दल बहुत कम मुसलमानों को ही चुनाव मैदान में उतारते हैं. इनमें से जो जीतकर आते हैं, मुसलमानों के प्रति उनका अपना कोई नज़रिया नहीं होता, क्योंकि उन्हें तो अपनी पार्टी के मुताबिक़ ही काम करना है. हालांकि सरकार ने मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत जानने के लिए सच्चर समिति का गठन किया. इससे पहले रंगनाथन मिश्र आयोग बनाया गया, लेकिन इनकी सिफ़ारिशों को अभी तक लागू नहीं किया गया. इसलिए मुसलमानों को इनका कोई फ़ायदा नहीं मिला.

बहरहाल, मुसलमानों को अपनी क़ौम की तरक़्क़ी के लिए एकजुट होकर आगे आना होगा. इसके ज़रूरी है कि वे सियासत में ज़्यादा से ज़्यादा प्रतिनिधित्व हासिल करें.

भारत देश एक बहु-सांस्कृतिक परिदृश्य के साथ बना एक ऐसा राष्ट्र है जो दो महान नदी प्रणालियों, सिंधु तथा गंगा, की घाटियों में विकसित हुई सभ्यता है, यद्यपि हमारी संस्कृति हिमालय की वजह से अति विशिष्ट भौगोलीय क्षेत्र में अवस्थित, जटिल तथा बहुआयामी है, लेकिन किसी भी दृष्टि से अलग-थलग सभ्यता नहीं रही।  भारतीय सभ्यता हमेशा से ही स्थिर न होकर विकासोन्मुख एवं गत्यात्मक रही है। भारत में स्थल और समुंद्र के रास्ते व्यापारी और उपनिवेशी आए।  अधिकांश प्राचीन समय से ही भारत कभी भी विश्व से अलग- थलग नहीं रहा। इसके परिणामस्वरूप, भारत में विविध संस्कृति वाली सभ्यता विकसित होगी जो प्राचीन भारत से आधुनिक भारत तक की अमूर्त कला और सांस्कृतिक परंपराओं से सहज ही परिलक्षित होता है, चाहे वह गंधर्व कला विद्यालय का बौद्ध नृत्य, जो यूनानियों के द्वारा प्रभावित हुआ था, हो या उत्तरी एवं दक्षिणी भारत के मंदिरों में विद्यमान अमूर्त सांस्कृतिक विरासत हो।
भारत का इतिहास पांच हजार से अधिक वर्षों को अपने सांस्कृतिक खंड में समेटे हुए अनेक सभ्यताओं के पोषक के रूप में विश्व के अध्ययन के लिए उपस्थित है। यहां के निवासी और उनकी जीवन शैलियां, उनके नृत्य और संगीत शैलियां, कला और हस्तकला जैसे अन्य अनेक तत्व भारतीय संस्कृति और विरासत के विभिन्न वर्ण हैं, जो देश की राष्ट्रीयता का सच्चा चित्र प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. ए एल बाशम ने अपने लेख ''भारत का सांस्कृतिक इतिहास'' में यह उल्लेख किया है कि ''जबकि सभ्यता के चार मुख्य उद्गम केंद्र पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ने पर, चीन, भारत, फर्टाइल क्रीसेंट तथा भूमध्य सागरीय प्रदेश, विशेषकर यूनान और रोम हैं, भारत को इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है क्योंकि इसने एशिया महादेश के अधिकांश प्रदेशों के सांस्कृतिक जीवन पर अपना गहरा प्रभाव डाला है। इसने प्रत्यक्ष ओर अप्रत्यक्ष रूप से विश्व के अन्य भागों पर भी अपनी संस्कृति की गहरी छाप छोड़ी है।"
संस्कृति से अर्थ होता है कि किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप जैसे जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है।
‘संस्कृति’ शब्द संस्कृत भाषा की धातु ‘कृ’ (करना) से बना है। इस धातु से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’ (मूल स्थिति), ‘संस्कृति’ (परिष्कृत स्थिति) और ‘विकृति’ (अवनति स्थिति)। जब ‘प्रकृत’ या कच्चा माल परिष्कृत किया जाता है तो यह संस्कृत हो जाता है और जब यह बिगड़ जाता है तो ‘विकृत’ हो जाता है। अंग्रेजी में संस्कृति के लिये 'कल्चर' शब्द प्रयोग किया जाता है जो लैटिन भाषा के ‘कल्ट या कल्टस’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है जोतना, विकसित करना या परिष्कृत करना और पूजा करना। संक्षेप में, किसी वस्तु को यहाँ तक संस्कारित और परिष्कृत करना कि इसका अंतिम उत्पाद हमारी प्रशंसा और सम्मान प्राप्त कर सके। यह ठीक उसी तरह है जैसे संस्कृत भाषा का शब्द ‘संस्कृति’।
संस्कृति का शब्दार्थ है - उत्तम या सुधरी हुई स्थिति। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। ऐसी प्रत्येक जीवन-पद्धति, रीति-रिवाज रहन-सहन आचार-विचार नवीन अनुसन्धान और आविष्कार, जिससे मनुष्य पशुओं और जंगलियों के दर्जे से ऊँचा उठता है तथा सभ्य बनता है, सभ्यता और संस्कृति का अंग है। सभ्यता (Civilization) से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति (Culture) से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है।
भारतीय संस्कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग अलग है। यहां के लोग अलग अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग अलग तरह के कपड़े पहनते हैं, भिन्न- भिन्न धर्मों का पालन करते हैं, अलग अलग भोजन करते हैं किन्तु उनका स्वभाव एक जैसा होता है। तो चाहे यह कोई खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षण, लोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैं, एक साथ खुशी या दर्द का अनुभव करते हैं। एक त्यौहार या एक आयोजन किसी घर या परिवार के लिए सीमित नहीं है। पूरा समुदाय या आस पड़ोसी एक अवसर पर खुशियां मनाने में शामिल होता है, इसी प्रकार एक भारतीय विवाह मेल जोल का आयोजन है, जिसमें न केवल वर और वधु बल्कि दो परिवारों का भी संगम होता है। चाहे उनकी संस्कृति या धर्म का मामला हो। इसी प्रकार दुख में भी पड़ोसी और मित्र उस दर्द को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वर्तमान समय में भारत की वैश्विक छवि एक उभरते हुए और प्रगतिशील राष्ट्र की है। सच ही है, भारत में सभी क्षेत्रों में कई सीमाओं को हाल के वर्षों में पार किया है, जैसे कि वाणिज्य, प्रौद्योगिकी और विकास आदि, और इसके साथ ही उसने अपनी अन्य रचनात्मक बौद्धिकता को उपेक्षित भी नहीं किया है।  हमारे राष्ट्र ने विश्व को विज्ञान दिया है, जिसका निरंतर अभ्यास भारत में अनंतकाल से किया जाता है। आयुर्वेद पूरी तरह से जड़ी बूटियों और प्राकृतिक खरपतवार से बनी दवाओं का एक विशिष्ट रूप है जो दुनिया की किसी भी बीमारी का इलाज कर सकती हैं। आयुर्वेद का उल्लेख प्राचीन भारत के एक ग्रंथ रामायण में भी किया गया है। और आज भी दवाओं की पश्चिमी संकल्पना जब अपने चरम पर पहुंच गई है, ऐसे लोग हैं जो बहु प्रकार की विशेषताओं के लिए इलाज की वैकल्पिक विधियों की तलाश में हैं।
भारतीय नागरिकों की सुंदरता उनकी सहनशीलता, लेने और देने की भावना तथा उन संस्कृतियों के मिश्रण में निहित है जिसकी तुलना एक ऐसे उद्यान से की जा सकती है जहां कई रंगों और वर्णों के फूल है, जबकि उनका अपना अस्तित्व बना हुआ है और वे भारत रूपी उद्यान में भाईचारा और सुंदरता बिखेरते हैं।
इन सब  गुणों के बावजूद भी वर्तमान दौर में भारत में अपनी ही संस्कृति को विखंडित और  विलोपित करने की कवायदें आरम्भ हो चुकी है, जिसके दुष्परिणाम स्वरुप भारत केवल एक ऐसा भूमि का टुकड़ा बच जाएगा जिसके सतही तल पर तो अधिकार हमारा होगा किन्तु मानसिक स्तर पर उस पर आधिपत्य पाश्चात्य के राष्ट्रों का होगा। इस विकराल समस्या को हम भारत की सांस्कृतिक अखंडता पर मंडरा रहे खतरे के तौर पर स्वीकार करना चाहिए और उसके उपचार हेतु शीघ्रातिशीघ्र प्रयास करना प्रारम्भ करना होगा।
सांस्कृतिक अखंडता को बनाये रखने के लिए प्राथमिक तौर पर हर भारतवंशी में राष्ट्रप्रेम की जागृति लाना होगी। 'पहले राष्ट्र' की मूलभावना को रगों में दौड़ने के लिए भारतीय भाषाओँ को संरक्षित करना परम आवश्यक है।  जब भारत आजाद होने वाला था उसके पहले १८ जुलाई १९४७ को इंग्लैंड की संसद में 'भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७' पास हुआ, यदि उसे पड़ा जाये और उसके बाद लार्ड मैकाले और एटमी के संवादों की तरफ दृष्टि डाली जाए तो हमें यह ज्ञात होगा कि भारत को आजादी शर्तों और अनुबंध के आधार पर दी गई है, और एटमी के अनुसार तो भारत को अंग्रेजो से आज़ाद करके अंग्रेजियत का गुलाम बनाया गया हैं। हमें इसको तोड़ कर भारतीय भाषाओँ को बढ़ावा देना होगा, बाजार पर जिस अंग्रेजियत का कब्ज़ा है उसे हटा कर भारतीयता का साम्राज्य स्थापित करना होगा।  बच्चों के बस्ते से गायब हुई नैतिक शिक्षा की किताब भी भारत की सांस्कृतिक अखंडता को बचने में अग्रणी थी, उसे वापस अनिवार्य शिक्षा की धारा में लाना होगा।
इसी के साथ हमें सांप्रदायिक सौहाद्र की स्थापना करनी होगी, क्योंकि भारत में धर्म और जाति के नाम पर झगड़े तो उन हथियारों के व्यापारियों की कारस्तानी और मंशा है जिनका व्यापार ही हथियार बेचना है, जिनमे अमरीका अग्रणी राष्ट्र है।
हमें हमारे त्यौहारों पर भी चाइनीज भागीदारी को समाप्त करना होगा, आज हमारे त्योंहारों की समझ हमसे ज्यादा चाइना की है क्योंकि वह एक व्यापारी देश है जो अपना माल विश्व के दूसरे बड़े बाजार के तौर पर स्थापित भारत में खपाना चाहता है। महात्मा गाँधी ने आज़ादी के पहले विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन इसलिए ही चलाया था क्योंकि हम ही हमारी गाढ़ी कमाई से हमारी सांस्कृतिक हत्या के लिए साधन जुटाने हेतु उन्हें पोषित करते है।
इन्ही सब महत्वपूर्ण उपायों से भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाया जा सकता है, वर्ना हमारे पर शेष हाथ मलने के अतिरिक्त कुछ न बचेगा जब राष्ट्र ही नहीं बचेगा।
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'



फ़िरदौस ख़ान
नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से देश में हर साल करोड़ों रुपये की फ़सलें तबाह हो जाती हैं. इससे किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, किसान क़र्ज़ लेकर फ़सलें उगाते हैं, फ़सलों को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशक कीटों पर प्रभावी नहीं होते, जिससे कीट और पौधों को लगने वाली बीमारियां फ़सल को नुक़सान पहुंचाती हैं. इसकी वजह से उत्पादन कम होता है या कई बार पूरी फ़सल ही ख़राब हो जाती है. ऐसे में किसानों के सामने अंधेरा छा जाता है. कई मामले तो ऐसे भी सामने आ चुके हैं कि जब किसानों ने फ़सल बर्बाद होने पर आत्महत्या तक कर ली. खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान किसानों की मौतें होने की ख़बरें भी आए-दिन सुनने को मिलती रहती हैं.

मगर अफ़सोस की बात यह है कि नक़ली कीटनाशक और उर्वरक माफ़िया के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, जिसकी वजह से नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़, इस कारोबार में हर साल तक़रीबन 20 फ़ीसद की बढ़ोतरी हो रही है. देश में कीटनाशकों के इस्तेमाल पर नज़र रखने वाली नई दिल्ली की एग्रोकेमिकल्स पॉलिसी ग्रुप (एपीजी) के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2009 में 1400 करोड़ रुपये के कीटनाशकों की बिक्री हुई, जिसकी वजह से सात हज़ार करोड़ रुपये की फ़सलें तबाह हो गईं. इससे किसानों की हालत बद से बदतर हो गई. नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रिकल्चरल साइंसेज के मुताबिक़, देश में हर साल औसतन तीन हज़ार करोड़ रुपये के नक़ली कीटनाशक बेचे जाते हैं, जबकि कीटनाशकों का कुल बाज़ार क़रीब सात हज़ार करोड़ रुपये का है. यहां हर साल तक़रीबन 80 हज़ार टन कीटनाशक बनाए जाते हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रिकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की मानें तो देश में इस्तेमाल होने वाले कुल कीटनाशकों में तक़रीबन 40 फ़ीसद हिस्सा नक़ली है. क़ाबिले-ग़ौर है कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र आदि राज्यों में नक़ली कीटनाशक बनाने का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है. ये कारोबारी नामी गिरामी कंपनियों के लेबल का इस्तेमाल करते हैं. अधिकारियों की मिलीभगत के कारण इन कारोबारियों के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती है. कभी-कभार निरीक्षण के नाम पर कार्रवाई होती भी है तो इसे छोटे कारोबारियों तक ही सीमित रखा जाता है. अनियमितता पाए जाने पर कीटनाशक और उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वे फिर से लाइसेंस बनवा लेते हैं या बिना लाइसेंस के अपना कारोबार करते हैं. इस तरह यह धंधा बदस्तूर जारी रहता है.

दरअसल, उर्वरक ऐसे यौगिक हैं, जो पौधों के विकास में सहायक होते हैं. उर्वरक दो प्रकार के होते हैं, जैविक और अजैविक. जैव उर्वरक कार्बन पर आधारित होते हैं, जिनमें पत्तियों और गोबर के यौगिक शामिल होते हैं. अजैविक उर्वरक में अमूमन अजैविक रसायन होते हैं. उर्वरकों में मौजूद कुछ सामान्य पोषक नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम हैं. इनमें कैल्शियम, सल्फर और मैगनेशियम जैसे तत्व भी होते हैं. कुछ खास उर्वरकों में बोरोन, क्लोरीन, मैंगनीज, लौह, जिम, तांबा और मोलिबडीनम आदि शामिल होते हैं. उर्वरक पौध की वृद्धि में मदद करते हैं, जबकि कीटनाशक कीटों से पौध की रक्षा करते हैं. कीटनाशकों में रासायनिक पदार्थ या वायरस, बैक्टीरिया आदि होते हैं. इसमें फासफैमीडोन, लिंडेन, फ्लोरोपाइरीफोस, हेप्टालक्लोथर और मैलेथियान जैसे रासायनिक पदार्थ होते हैं. बहुत से कीटनाशक इंसानों के लिए खतरनाक होते हैं. सरकार ने कुछ कीटनाशकों पर पाबंदी लगाई है, इसके बावजूद देश में इनकी बिक्री बेरोकटोक चल रही है.

कीटनाशक विके्रता राजेश कुमार कहते हैं कि किसानों को असली और नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों की पहचान नहीं होती. इसलिए वे विक्रेता पर भरोसा करके कीटनाशक ख़रीद लेते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी विक्रेता नक़ली कीटनाशक बेचते हैं, जिन विक्रेताओं को बाज़ार में अपनी पहचान क़ायम रखनी है, वे सीधे कंपनी से माल ख़रीदते हैं. ऐसे कीटनाशक विक्रेताओं की भी कमी नहीं है, जो किसी बिचौलिये से माल ख़रीदते हैं. दरअसल, बिचौलिये ज़्यादा मुना़फ़ा कमाने के फेर में विक्रेताओं को असली की जगह नक़ली कीटनाशक बेचते हैं. नक़ली कीटनाशकों की पैकिंग बिल्कुल ब़डी कीटनाशक कंपनियों की तरह होती है. लेकिन इनकी क़ीमत में फ़र्क़ होता है, जैसे जो असली कीटनाशक तीन सौ रुपये में मिलता है, वही नक़ली कीटनाशक बाज़ार में 150 से 200 रुपये तक में मिल जाता है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए. इससे मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं. किसान ज़्यादा उपज पाने के लालच में अंधाधुंध कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह से जहां भूमि की उपजाऊ शक्ति ख़त्म हो रही है, वहीं खाद्यान्न भी ज़हरीला हो रहा है. हालत यह है कि फल, सब्ज़ियों से लेकर अनाज तक में रसायनों की मात्रा पाई जा रही है, जो सेहत के लिए बेहद ऩुकसानदेह है. नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों की वजह से कई बार किसानों की मेहनत से उगाई गई फ़सल भी बर्बाद हो जाती है. विश्वविद्यालय द्वारा समय-समय पर शिविर लगाकर किसानों को कीटनाशकों और उर्वरकों के सही इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है.

किसानों का कहना है कि वे जितने रुपये के कीटनाशक फ़सलों में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें उसका तक़रीबन पांच गुना फ़ायदा मिलता है, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से उनकी फ़सल बर्बाद हो जाती है. हिसार के किसान राजेंद्र कुमार का कहना है कि बढ़ती आबादी और घटती ज़मीन ने भी किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल के लिए मजबूर किया है. पीढ़ी दर पीढ़ी ज़मीन का बंटवारा होने की वजह से किसानों के हिस्से में कम ज़मीन आ रही है. किसान को अपने परिवार का भरण-पोषण करना है, ऐसे में अगर वह ज़्यादा उत्पादन चाहता है, तो इसमें ग़लत क्या है. साथ ही वह यह भी कहते हैं कि बंजर भूमि की समस्या को देखते हुए किसानों को वैकल्पिक तरीक़ा अपनाना चाहिए, जिससे लागत कम आए और उत्पादन भी अच्छा हो. कैथल ज़िले के चंदाना गांव के किसान कुशलपाल सिरोही का मानना है कि जैविक खेती को अपनाकर किसान अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं. केंद्रीय उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण तथा प्रशिक्षण संस्थान (सीएफक्यूसीटीआई) मुख्य संस्थान है, जो उर्वरक की गुणवत्ता का परीक्षण करता है. हरियाणा के फ़रीदाबाद ज़िले में स्थित इस संस्थान की तीन क्षेत्रीय उर्वरक नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं, जो मुंबई, चेन्नई और कल्याणी में हैं. वैसे इस वक़्त देश में तक़रीबन 67 उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं. हर साल तक़रीबन 1,25,205 नमूनों की जांच की जाती है. अमूमन राज्यों में एक या इससे ज़्यादा प्रयोगशालाएं होती हैं. पुडुचेरी को छोड़कर अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, दिल्ली, गोवा और सभी संघ शासित राज्यों में एक भी प्रयोगशाला नहीं है. ये राज्य केंद्रीय सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं.

बहरहाल, नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों के मामले में बड़ी कंपनियों को भी आगे आना चाहिए, ताकि उनके नाम पर चल रहे गोरखधंधे पर रोक लगाई जा सके. किसानों को भी जागरूक होने की ज़रूरत है, ताकि वे असली और नक़ली में पहचान कर सकें. इसके अलावा किसानों को वैकल्पिक खेती अपनाने पर भी ज़ोर देना चाहिए, ताकि भूमि की उर्वरता बनाए रखने के साथ ही वे अच्छा उत्पादन हासिल कर पाएं.

फ़िरदौस ख़ान
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती देवी कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.

बिहार के छपरा ज़िले के गांव कोरिया के सब्ज़ी विक्रेता ओमप्रकाश सिंह कहते हैं कि जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 40 से 70 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के लोग भी शामिल हैं.

सहजन बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बंगाल में सजिना, महाराष्ट्र में शेगटा, आंध्र प्रदेश में मुनग और हिंदी भाषी इलाक़ों में इसे सहजना, सुजना, सैजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ड्रमस्टिक कहा जाता है.  इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है. सहजन का वृक्ष मध्यम आकार का होता है. इसकी ऊंचाई दस मीटर तक होती है, लेकिन बढ़ने पर इसे छांट दिया जाता है, ताकि इसकी फलियां, फूल और पत्तियां आसानी से तोड़ी जा सकें. यह किसी भी तरह की ज़मीन पर उगाया जा सकता है. नर्सरी में इसकी पौध बीज या क़लम से तैयार की जा सकती है. पौधारोपण फ़रवरी-मार्च या बरसात के मौसम में करना चाहिए.  इसे खेत की मेढ़ पर लगाया जा सकता है. इसे तीन से चार फ़ुट की दूरी पर लगाना चाहिए. यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है. इसके पौधारोपण के आठ माह बाद ही इसमें फलियां लग जाती हैं. उत्तर भारत में इसमें एक बार फलियां लगती हैं, जबकि दक्षिण भारत में यह सालभर फलियों से लदा रहता है. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के लिए साल में दो बार फलियां देने वाली क़िस्म तैयार कर ली है और अब यही क़िस्म उगाई जा रही है. दक्षिण भारत के लोग इसके फूल, पत्ती और फलियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में करते हैं. उत्तर भारत में भी इन्हें ख़ूब चाव से खाया जाता है. इसकी फलियों से सब्ज़ी, सूप और अचार भी बनाया जाता है. इसके फूलों की भी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसकी पत्तियों की चटनी और सूप बनाया जाता है.

गांव-देहात में इसे जादू का वृक्ष कहा जाता है. गांव-देहात के बुज़ुर्ग इसे स्वर्ग का वृक्ष भी कहते हैं. सहजन में औषधीय गुण पाए जाते हैं. इसके सभी हिस्से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इसके सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में इसे तीन सौ रोगों का उपचार बताया गया है. इसमें अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कैलोरी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ़ास्फ़ोरस, पोटैशियम, कॊपर, सल्फ़र, ऒक्जेलिक एसिड, विटामिन ए-बीटासीरोटीन, विटामिन बी- कॊरिन, विटामिन बी1 थाइमिन, विटामिन बी2 राइबोफ़्लुविन, विटामिन बी3 निकोटिनिक एसिड, विटामिन सी एस्कार्बिक एसिड, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, ज़िंक, अर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, ट्रिप्टोफन,फ़िनॊयलेनेलिन, मीथिओनिन, थ्रिओनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, वैलिन, ओमेगा आदि. एक अध्ययन के मुताबिक़ सहजन की पत्तियों में विटामिन सी संतरे से सात गुना होता है. इसी तरह इसकी पत्तियों में विटामिन ए गाजर से चार गुना, कैल्शियम दूध से चार गुना, पोटैशियम केले से तीन गुना और प्रोटीन दही से दोगुना होता है. सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है, जो दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं. कहा जाता है कि इसके सेवन से सेहत अच्छी रहती है और बुढ़ापा भी दूर भागता है. आंखों की रौशनी भी अच्छी रहती है. इसके पोषक तत्वों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दक्षिण अफ़्रीका के कई देशों में कुपोषित लोगों के आहार में इसे शामिल करने की सलाह दी है. डब्ल्यूएचओ ने कुपोषण और भूख की समस्या से लड़ने के लिए इसे बेहतर माना है. फ़िलीपींस और सेनेगल में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत बच्चों के आहार में सहजन को शामिल किया गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने आए हैं. फ़िलीपींस, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में सहजन की काफ़ी मांग है. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह वरदान है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं. इसे चारे के लिए भी उगाया जाता है. चारे के लिए इसकी पौध छह इंच की दूरी पर लगाई जाती है. बरसीम की तरह इसकी कटाई 75 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए.  स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऒफ़ एग्रीकल्चरल साइंस उपासला द्वारा निकारगुआ में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गायों को चारे के साथ सहजन की पत्तियां खिलाने से उनके दूध में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है. सहजन के बीजों से पानी को शुद्ध किया जा सकता है. इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाया जाता है, जिससे पानी शुद्ध हो जाता है.

सहजन की खेती किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. किसान सहजन की खेती कर आर्थिक रूप से समृद्ध बन सकते हैं. एक वृक्ष से आठ क्विंटल फलियां प्राप्त की जा सकती हैं. यह वृक्ष दस साल तक उपज देता है. इसे खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों तरफ़ भी सजहन के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. बिहार में किसान सहजन की खेती कर रहे हैं. यहां सहजन की खेती व्यवसायिक रूप ले चुकी है.  बिहार सरकार ने सहजन की खेती के लिए महादलित परिवारों को पौधे मुहैया कराने की योजना बनाई है. इस योजना का मक़सद महादलित और ग़रीब परिवारों को स्वस्थ करना और उन्हें आमदनी का ज़रिया मुहैया कराना है. राज्य में समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहजन के पौधे वितरित किए जाते हैं. यहां स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों के परिसरों में सहजन बोया जा रहा है. कृषि विभाग के प्रोत्साहन की वजह से यहां के किसान सहजन उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे सहजन की क़लम खेत में लगाते हैं. मार्च-अप्रैल में वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. उत्पादन वृक्ष के अनुसार होता है. एक वृक्ष से एक से पांच क्विंटल तक फलियां मिल जाती हैं. इसमें लागत भी ज़्यादा नहीं आती. वे अन्य सब्ज़ियों के साथ सहजन की खेती करते हैं. इससे उन्हें दोहरा फ़ायदा हो जाता है. इसके साथ ही पशुओं के लिए अच्छा चारा भी मिल जाता है, जो उनके लिए पौष्टिक आहार है. छत्तीसगढ़ में किसान पारंपरिक धान की खेती के साथ सहजन उगा रहे हैं.  उनका कहना है कि वे इसकी फलियां शहर की मंडियों में बेजते हैं. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और झारखंड आदि राज्यों में सहजन की ख़ासी मांग है. सहजन की फलियां 40 से 80 रुपये प्रति किलो बिकती हैं. सहजन के फ़ायदों को देखते हुए अब पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने इसे पंजाब में उगाने की योजना बनाई है. इसे किचन गार्डन के तौर पर प्रोत्साहित किया जाएगा. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वेजिटेबल साइंस डिपार्टमेंट के प्रो. डीएस खुराना और डॉ. हीरा सिंह ने सहजन पर शोध करते हुए पंजाब की जलवायु के अनुकूल एक नई क़िस्म तैयार की है. इसका नाम पीकेएम टू रखा गया है.
आदिवासी इलाक़ों में भूमिहीन लोग बेकार पड़ी ज़मीन पर सहजन के वृक्ष उगाकर आमदनी हासिल कर रहे हैं. उनका कहना है कि ख़ाली ज़मीन पर जो भी वृक्ष उगाता है, वृक्ष के फल पर अधिकार भी उसी का होता है. इससे जहां बेकार पड़ी ज़मीन आमदनी का ज़रिया बन गई है, वहीं वृक्षों से पर्यावरण भी हराभरा बना रहता है. वृक्ष फल और छाया  देने के साथ-साथ बाढ़ को रोकते हैं, भूमि कटाव को रोकते हैं.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सहजन की विदेशों में बहुत मांग है, लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से यहां के लोगों को इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी होनी चाहिए. ऐसे में सहजन की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पारंपरिक खेती के साथ भी सहजन उगाया जा सकता है. इसमें कोई विशेष लागत भी नहीं आती.  सहजन कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी का भी अहम हिस्सा बन सकता है. बस ज़रूरत है जागरुकता की.


फ़िरदौस ख़ान                                    
प्लास्टिक ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. अमूमन हर चीज़ के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है, वो चाहे दूध हो, तेल, घी, आटा, चावल, दालें, मसालें, कोल्ड ड्रिंक, शर्बत, सनैक्स, दवायें, कपड़े हों या फिर ज़रूरत की दूसरी चीज़ें सभी में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. बाज़ार से फल या सब्ज़ियां ख़रीदो, तो वे भी प्लास्टिक की ही थैलियों में ही मिलते हैं. प्लास्टिक के इस्तेमाल की एक बड़ी वजह यह भी है कि टिन के डिब्बों, कपड़े के थैलों और काग़ज़ के लिफ़ाफ़ों के मुक़ाबले ये सस्ता पड़ता है. पहले कभी लोग राशन, फल या तरकारी ख़रीदने जाते थे, तो प्लास्टिक की टोकरियां या कपड़े के थैले लेकर जाते थे. अब ख़ाली हाथ जाते हैं, पता है कि प्लास्टिक की थैलियों में सामान मिल जाएगा. अब तो पत्तल और दोनो की तर्ज़ पर प्लास्टिक की प्लेट, गिलास और कप भी ख़ूब चलन में हैं. लोग इन्हें इस्तेमाल करते हैं और फिर कूड़े में फेंक देते हैं. लेकिन इस आसानी ने कितनी बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है, इसका अंदाज़ा अभी जनमानस को नहीं है.

दरअसल, प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़ देश में सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा बोतलों से आता है. साल 2015-16 में करीब 900 किलो टन प्लास्टिक बोतल का उत्पादन हुआ था. राजधानी दिल्ली में अन्य महानगरों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. साल 2015 के आंकड़ों की मानें, तो दिल्ली में 689.52 टन, चेन्नई में 429.39 टन, मुंबई में 408.27 टन, बेंगलुरु में 313.87 टन और हैदराबाद में 199.33 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. सिर्फ़ दस फ़ीसद प्लास्टिक कचरा ही रि-साइकिल किया जाता है, बाक़ी का 90 फ़ीसद कचरा पर्यावरण के लिए नुक़सानदेह साबित होता है.
रि-साइक्लिंग की प्रक्रिया भी प्रदूषण को बढ़ाती है. रि-साइकिल किए गए या रंगीन प्लास्टिक थैलों में ऐसे रसायन होते हैं, जो ज़मीन में पहुंच जाते हैं और इससे मिट्टी और भूगर्भीय जल विषैला बन सकता है. जिन उद्योगों में पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तकनीक वाली रि-साइकिलिंग इकाइयां नहीं लगी होतीं. उनमें रि-साइक्लिंग के दौरान पैदा होने वाले विषैले धुएं से वायु प्रदूषण फैलता है. प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है, जो सहज रूप से मिट्टी में घुल-मिल नहीं सकता. इसे अगर मिट्टी में छोड़ दिया जाए, तो भूगर्भीय जल की रिचार्जिंग को रोक सकता है. इसके अलावा प्लास्टिक उत्पादों के गुणों के सुधार के लिए और उनको मिट्टी से घुलनशील बनाने के इरादे से जो रासायनिक पदार्थ और रंग आदि उनमें आमतौर पर मिलाए जाते हैं, वे भी अमूमन सेहत पर बुरा असर डालते हैं.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक मूल रूप से नुक़सानदेह नहीं होता, लेकिन प्लास्टिक के थैले अनेक हानिकारक रंगों, रंजक और अन्य तमाम प्रकार के अकार्बनिक रसायनों को मिलाकर बनाए जाते हैं. रंग और रंजक एक प्रकार के औद्योगिक उत्पाद होते हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक थैलों को चमकीला रंग देने के लिए किया जाता है. इनमें से कुछ रसायन कैंसर को जन्म दे सकते हैं और कुछ खाद्य पदार्थों को विषैला बनाने में सक्षम होते हैं. रंजक पदार्थों में  कैडमियम जैसी जो धातुएं होती हैं, जो सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और दिल का आकार बढ़ सकता है. लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होने लगता है.

हालांकि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रि-साइकिंल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एंड यूसेज़ रूल्स-1999 जारी किया था. इसे 2003 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1968 के तहत संशोधित किया गया है, ताकि प्लास्टिक की थैलियों और डिब्बों का नियमन और प्रबंधन सही तरीक़े से किया जा सके. भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने धरती में घुलनशील प्लास्टिक के 10 मानकों के बारे में अधिसूचना जारी की थी, मगर इसके बावजूद हालात वही 'ढाक के तीन पात' वाले ही हैं.

हालांकि दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में पॉलीथिन और प्लास्टिक से बनी सामग्रियों पर रोक लगाने का ऐलान किया जा चुका है. इसका उल्लंघन करने पर जुर्माने और क़ैद का प्रावधान भी है.प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाली समस्याएं ज़्यादातर कचरा प्रबंधन प्रणालियों की ख़ामियों की वजह से पैदा हुई हैं. प्लास्टिक का यह कचरा नालियों और सीवरेज व्यवस्था को ठप कर देता है. इतना ही नहीं नदियों में भी इनकी वजह से बहाव पर असर पड़ता है और पानी के दूषित होने से मछलियों की मौत तक हो जाती है. नदियों के ज़रिये प्लास्टिक का ये कचरा समुद्र में भी पहुंच रहा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रिपोर्ट के मुताबिक़ हर साल तकरीबन 80 लाख टन कचरा समंदरों में मिल रहा है. समंदरों में जो प्लास्टिक कचरा मिल रहा है, उसका तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा दस नदियों से आ रहा है, जिनमें यांग्त्जे, गंगा, सिंधु, येलो, पर्ल, एमर, मिकांग, नाइल और नाइजर नदियां शामिल हैं. इनमें से आठ नदियां एशिया की हैं. इनमें सबसे ज़्यादा पांच नदियां चीन की, जबकि दो नदियां भारत और एक अफ़्रीका की है. चीन ने 46 शहरों में कचरे को क़ाबू करने का निर्देश जारी किया है, ताकि नदियों के प्रदूषण को कम किया जा सके. प्लास्टिक पशुओं की मौत का भी सबब बन रहा है. कूड़े के ढेर में पड़ी प्लास्टिक की थैलियों को खाकर आवारा पशुओं की बड़ी तादाद में मौतें हो रही हैं.

प्लास्टिक के कचरे की समस्या से निजात पाने के लिए प्लास्टिक थैलियों के विकल्प के रूप में जूट से बने थैलों का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा किया जाना चाहिए. साथ ही प्लास्टिक कचरे का समुचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए. देश में सड़क बनाने और दीवारें बनाने में इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है. प्लास्टिक को इसी तरह अन्य जगह इस्तेमाल करके इसके कचरे की समस्या से निजात पाई जा सकती है. बहरहाल, प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए बेहद ज़रूरी है कि इसके प्रति जनमानस को जागरूक किया जाए, क्योंकि इस मुहिम में जनमानस की भागीदारी बहुत ज़रूरी है. इसके लिए जन आंदोलन चलाया जाना चाहिए.

इंटरनेट की दुनिया ने हिंदी या कहे प्रत्येक भाषा के साहित्य और लेखन को जनमानस के करीब और उनकी पहुँच में ला दिया है, इससे रचनाकारों की लोकप्रियता में भी अभिवृद्धि हुई है। किन्तु इन्हीं सब के बाद उनके सृजन की चोरी भी बहुत बड़ी है। जिन लोगों को लिखना नहीं आता या सस्ती लोकप्रियता के चलते वो लोग अन्य प्रसिद्ध लोगों की रचनाओं को तोड़ मरोड़ कर या फिर कई बार तो सीधे उनका नाम हटा कर खुद के नाम से प्रचारित और प्रकाशित भी करवा लेते है। ऐसी विकट स्थिति में असल चोर द्वारा कई बार इतना प्रचार कर दिया जाता है कि कई बार तो मूल रचनाकार को भी लोग साहित्य चोर समझ लेते हैं। साहित्यिक सामग्रियों की चोरी कर अपने प्रकाशित साहित्य या सन्दर्भ में शामिल कर लेना, अखबारों या सोशल मीडिया में अपने नाम से प्रचारित करना, दूसरे की कविता वे सरेआम मंचों से सुनाना, साझा संग्रहों में स्वयं के नाम से दूसरे की रचनाएं प्रकाशित करवाना आदि साहित्य चोरों का प्रिय शगल बन चुका है।

किसी दूसरे की भाषाशैली, उसके विचार, उपाय, आदि का अधिकांशतः नकल करते हुए अपने मौलिक कृति के रूप में प्रकाशन करना साहित्यिक चोरी की श्रेणी में आता है। यूरोप में अट्ठारहवीं सदी के बाद ही इस तरह का व्यवहार अनैतिक व्यवहार माना जाने लगा था, इसके पूर्व की शताब्दियों में लेखक एवं कलाकार अपने क्षेत्र के श्रेष्ठ सृजन की हूबहू नकल करने के लिये प्रोत्साहित किये जाते थे। साहित्यिक चोरी तब मानी जाती है, जब हम किसी के द्वारा लिखे गए साहित्य को बिना उसका सन्दर्भ दिए अपने नाम से प्रकाशित कर लेते हैं। आज जब सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार तेजी से हुआ है, ऐसे में पूरा विश्व एक वैश्विक गाँव में बदल गया गया है और ऐसे में साहित्य चोरों के अनैतिक कार्य आसानी से पकड़ में आ जाते हैं।

इस समस्या को 'प्लेगरिज्म' कहा जाता है और यह अकादमिक बेईमानी है। प्लेगरिज्म कोई अपराध नहीं है बल्कि नैतिक आधार पर तो अमान्य है। इंटरनेट से कोई लेख डाउनलोड कर लेना, किसी और को अपने लेखन के लिए काम पर रख लेना, दूसरे के विचारों को अपने विचार दिखाने का प्रयास करना भी साहित्यिक चोरी मानी जाती है।

कानून रूप से भी देखा जाये तो साहित्यिक चोरी धोखाधड़ी की श्रेणी में भी आता है। इसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। अगर आप किसी अन्य के रचनात्मक कार्य का उपयोग करते हैं, तो आप को उनके हर स्रोत का श्रेय देना होगा, इसलिए ऑनलाइन या मुद्रित सामग्री के लिए फुटनोट या उद्धरण का उपयोग करें। किसी भी समय आप किसी अन्य व्यक्ति द्वारा लिखी, रचना, आकर्षित या आविष्कार किए गए किसी भी चीज़ का हिस्सा या किसी का उपयोग करते हैं, तो आपको उन्हें क्रेडिट देना होगा। यदि आप लेखन या विचारों को चोरी करते हैं और उन्हें अपने ही रूप में बंद करते हैं, तो आप पकड़े जा सकते हैं।
क्या कहता है कानून
बौद्धिक सम्पदा अधिकार: बौद्धिक सम्पदा (Intellectual property) किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा सृजित कोई संगीत, साहित्यिक कृति, कला, खोज, प्रतीक, नाम, चित्र, डिजाइन, कापीराइट, ट्रेडमार्क, पेटेन्ट आदि को कहते हैं। जिस प्रकार कोई किसी भौतिक धन (फिजिकल प्रापर्टी) का स्वामी होता है, सी प्रकार कोई बौद्धिक सम्पदा का भी स्वामी हो सकता है। इसके लिये बौद्धिक सम्पदा अधिकार प्रदान किये जाते हैं। आप अपने बौद्धिक सम्पदा के उपयोग का नियंत्रण कर सकते हैं और उसका उपयोग कर के भौतिक सम्पदा (धन) बना सकते हैं। इस प्रकार बौद्धिक सम्पदा के अधिकार के कारण उसकी सुरक्षा होती है और लोग खोज तथा नवाचार के लिये उत्साहित और उद्यत रहते हैं। बौद्धिक संपदा कानून के तहत, इस तरह बौद्धिक सम्पदा का स्वामी को अमूर्त संपत्ति के कुछ विशेष अधिकार दिए है, जैसे कि संगीत, वाद्ययंत्र साहित्य, कलात्मक काम, खोज और आविष्कार, शब्दों, वाक्यांशों, प्रतीकों और कोई डिजाइन.आदि।

इस तरह की साहित्यिक चोरियां इंटरनेट आम हो चली है, कई चोरों के हौसले तो इतने बुलंद है कि वे लोगों की रचनाओं में कुछ एक शब्दों का हेर फेर करके खुद की पुस्तक भी मुद्रित करवा लेते हैं। इस तरह चोरी से बचने के लिए साहित्यकारों को भी कुछ प्रबंध करना होंगे जैसे –
1. सबसे पहले तो अपनी मौलिक रचनाएँ अपने ब्लॉग पर मय दिनांक और समय के साथ प्रकाशित करें। ऐसा करने से आपकी रचनाओं के प्रथम प्रकाशन का सन्दर्भ और मौलिकता का साक्ष्य उपलब्ध होगा।
2. सोशल मीडिया में प्रकाशन के पूर्व रचनाएं साझा करने से बचें, अन्यथा आप सबूत देने में असमर्थ रहेंगे और साहित्यचोर उस पर खुद की मौलिकता का प्रमाण दर्ज कर लेगा।
3. यदि आपने भी किसी सन्दर्भ का उपयोग किया है तो सन्दर्भ सूची में उसका उल्लेख जरूर करे, अन्यथा आप पर भी साहित्य चोरी का आरोप लग सकता है।
4. सोशल मीडिया में रचनाओं को हर जगह अपने ब्लॉग की लिंक या जहाँ प्रकाशित हुई है उसी सन्दर्भ के साथ साझा करें, यह चोर की मनोस्थिति पर भी प्रभाव डालेगा।
5. कही भी आपको आपकी रचनाओं की चोरी नजर आये तो तुरंत उसकी शिकायत मय पर्याप्त साक्ष्य के और स्वयं की मौलिक रचना होने के साक्ष्य के साथ नजदीकी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाएं।
6. अपनी पुस्तकें मय आईएसबीएन (ISBN) के प्रकाशित करवाएं
प्लेजरिज्म से बचने के लिए कुछ आम टिप्स
1. शुरुआत में बिना किसी कोट, डाटा, रिपोर्ट, रिसर्च की मदद लिए अपने विचारों को लिखने की आदत डालें।
2. किसी और का आइडिया चुराने से बचने के लिए, आर्टिकल लिखने से पहले ही अपने तर्क और तथ्य तैयार कर लें। ध्यान रहे कि किसी और के आइडियाज़ से आपका अपना आर्टिकल तैयार नहीं हो सकता, हां वो आपके लेख में रेफरेंस के तौर पर ज़रूर हो सकते हैं।
3. याद रखिये कि निजी विचारों और तथ्यों के बीच बाल भर का फर्क होता है। इस फर्क को हमेशा दिमाग में रखे। मसलन, “माहवारी एक ऐसी वजह है जिसके कारण भारत की 80% महिलाएं शोषण और दमन का सामना कर रही हैं।” यह एक तथ्य है जिसकी सत्यता को उचित सोर्स से प्रमाणित किया जाना ज़रूरी है।” “मुझे नहीं लगता कि मेंसट्रुअल लीव पॉलिसी भारत में महिलाओं की बड़ी समस्याओं को हल कर पाएगी।” ये पूरी तरह से एक निजी विचार है जिसे सत्यापित करने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन अगर आपके लेख में कोई आंकड़ा या तथ्य शामिल है तो उसका सत्यापन किया जाना बहुत ज़रूरी है।
4. जानकारी के लिए अन्य वेबसाइट्स और श्रोतों से कॉपी पेस्ट कर रहे हैं तो संभल जाएं। ज़ाहिर सी बात है कि इन वेबसाइट्स और जानकारी के श्रोतों को भी अपनी मीडिया सामग्री को लेकर उतनी ही चिंता होगी जितनी की आपको है। अपने लेख में इस्तेमाल की गई जानकारियों का सोर्स लिखना कभी ना भूलें।
शिक्षा विभाग में तो आगया रेगुलेशन एक्ट
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सचिव पी के ठाकुर ने विश्वविद्यालयों सहित छात्रों के नाम जन सूचना जारी की है कि रिसर्च और साहित्य चोरी की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसी के चलते यूजीसी ने दूसरे के ज्ञान को अपना बनाने के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए विशेषज्ञों की कमेटी बनाई थी, जिसकी सिफारिशों के आधार पर अब साहित्यिक चोरी रोकने के लिए रेग्यूलेशन 2017 तैयार किया गया है। इसके आधार पर रिसर्च स्कालर्स, शिक्षक या विशेषज्ञ अपनी-अपनी राय भेज सकते हैं। यह रेग्यूलेशन नौ पन्नों का है। कमेटी ने अपनी सिफारिश में लिखा है कि साहित्य, रिसर्च की चोरी पर जीरो टॉलरेंस पॉलिसी होनी चाहिए। यदि कोई रिसर्च स्कॉलर्स दस फीसदी सामग्री की चोरी करता पकड़ा गया तो कोई जुर्माना नहीं लगेगा। चालीस फीसदी कंटेंट चुराने वाले छात्र को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। साठ फीसदी सामग्री चोरी का इस्तेमाल करने पर रजिस्ट्रेशन तक रोकने की सिफारिश की गई है।

यदि कोई शिक्षक 40 फीसदी तक साहित्यिक चोरी करता पकड़ा जाता है तो लिखित सामग्री को हटाने के साथ ही एक साल तक उसके प्रकाशन पर भी रोक लगेगी। 60 फीसदी से अधिक की चोरी करने पर लिखित सामग्री हटाने के साथ-साथ तीन साल तक प्रकाशन पर रोक लगाने की भी तैयारी है। वहीं, ऐसे शिक्षक को तीन साल तक के लिए अंडरग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमफिल और पीएचडी स्कॉलर्स का गाइड न बनाने की भी सिफारिश की गई है। यदि छात्र गलती करता है तो रजिस्ट्रेशन पर रोक लग जाएगी, जिससे उसकी डिग्री भी ब्लॉक होगी। वहीं, शिक्षक यदि गलती करता है कि उसे एक साल तक प्रकाशन पर रोक के साथ वेतनवृद्धि रुकेगी। वहीं, यदि बार-बार गलती की जाती है तो उसे नौकरी से निकालने का भी प्रावधान होगा।

एमफिल और पीएचडी रिसर्च स्कॉलर्स यदि अपनी थीसिस या रिसर्च में किसी व्यक्ति द्वारा तैयार सामग्री का प्रयोग करते हैं तो उन्हें इसकी जानकारी देनी होगी। यदि कोई स्कॉलर साहित्यिक चोरी करता पकड़ा जाता है तो उसका रजिस्ट्रेशन तक रद्द हो सकता है। वहीं, यदि शिक्षक ऐसा करता पकड़ा गया तो उसके इंक्रीमेंट, प्रकाशन पर रोक लग सकती है। नियमों का बार-बार उल्लंघन करने पर शिक्षक की नौकरी भी जा सकती है।

इन सब के अतिरिक्त मौलिक साहित्य की कमी और साहित्य चोरी जैसी घटनाओं से भाषा की समृद्धता और लेखन शैली प्रभावित होती है। सत्य तो यह भी है कि तथाकथित साहित्य चोरों को सार्वजनिक अपमान का डर न होना भी इसका कारण है। ऐसी स्थिति में हिंदी प्रचार हेतु प्रतिबद्ध अंतरताना मातृभाषा.कॉम द्वारा एक मुहिम भी चलाई जा रही है, जिसमें साहित्य चोरी की घटना को संवेदनशील मसला मान कर सप्रमाण शिकायत आने पर उस साहित्य चोर के विरुद्ध न्यायिक दावा भी लगाया जाएगा साथ ही सोशल मीडिया पर भी बेनकाब करेगा। इसी तरह से अन्य हिन्दी साहित्यिक संस्थानों को भी आगे आना चाहिए और साहित्य चोरी के विरुद्ध एक सार्थक आवाज़ बन कर खड़े होना होगा, जिससे इस तरह की साहित्य चोरी पर नकेल कस कर भाषा की मौलिकता और अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे से बचा जा सकता है।
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'

भारत देश पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा हैं, जिसमें तरक्की की गगनचुम्भी इमारतों से लेकर सरपट दौड़ती बुलेट ट्रेन का स्वप्न, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के सहारे देशवासियों के लिए आधारभूत सुविधाओं को जुटाना, राष्ट्रीयता की स्थापना से लेकर आतंक से मुक्ति का महा मृत्युंजय मन्त्र भी जपा जा रहा है। इन्हीं सब प्रगति के विशाल आकाश में मोहनदास करमचंद गाँधी के स्वप्नों का स्वच्छ भारत भी अपना आकार ले रहा है। स्वस्थ्य जीवन जीने के लिए स्वच्छता का विशेष महत्व है। स्वच्छता अपनाने से व्यक्ति रोग मुक्त रहता है और एक स्वस्थ राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है। अत: हर व्यक्ति को जीवन में स्वच्छता अपनानी चाहिए और अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।
शरीर की स्वच्छता से लेकर, मन की स्वच्छता और यहाँ तक कि धन की स्वच्छता से मिलकर भी भारत के पुनर्निर्माण की नीव रखी जा सकती है। ग्राम,नगर,प्रान्त की गंदगी समाप्त होंगे के बाद ही राष्ट्र का स्वस्थ्य होना संभव है। तन-मन-धन की स्वच्छता के बाद ही इस राष्ट्र का नवीन रूप सामने आएगा। भारत माँ के अभिनन्दन  का प्रथम त्यौहार तभी मनाया जायेगा जब राष्ट्र तमाम तरह की गन्दगी से मुक्त होगा।
हज़ारों सालों तक महामारियों ने इंसानों पर अपना कहर ढाया है। कुछ लोगों का मानना था कि ये महामारियाँ परमेश्वर के क्रोध की निशानी हैं और वह बुरे लोगों को सज़ा दे रहा है। सदियों तक इस मामले में काफी जाँच-परख और खोज-बीन करने से पता चला है कि अकसर इनके कसूरवार हमारे आस-पास रहनेवाले छोटे-छोटे जीव-जंतु होते हैं।
चिकित्सा क्षेत्र के खोजकर्ताओं ने पाया कि बीमारियाँ फैलाने में छछूँदरों, चूहों, तिलचट्टों, मक्खियों और मच्छरों का बहुत बड़ा हाथ होता है। उन्होंने यह भी पाया कि लोग साफ-सफाई में लापरवाही बरतकर अकसर संक्रामक बीमारियों को न्यौता देते हैं। तो कहा जा सकता है कि साफ-सफाई का ताल्लुक ज़िंदगी और मौत से है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हालात और रिवाज़ों के मुताबिक लोगों के साफ-सफाई के स्तर अलग-अलग होते हैं। जिन इलाकों में साफ पानी नहीं मिलता या गंदे पानी के निकास की अच्छी व्यवस्था नहीं होती, वहाँ साफ-सफाई पर ध्यान देना एक चुनौती हो सकता है। मगर गौर कीजिए, जब इसराईली वीराने में सफर कर रहे थे, तब उनके लिए साफ-सफाई पर खास ध्यान देना कितना मुश्किल रहा होगा! इसके बावजूद परमात्मा ने उन्हें इस मामले में हिदायतें दीं।
अफ्रीका के देश कैमरून में रहनेवाला बच्चा मैक्स* स्कूल से छुट्टी होने के बाद दौड़ा-दौड़ा अपने छोटे-से घर में आता है। उसे ज़ोरों की भूख लगी है। घर में घुसते ही उसका कुत्ता दुम हिलाता हुआ उसके पास आता है, वह उससे लिपट जाता है। फिर अपना बस्ता खाने की मेज़ पर पटक देता है और वहीं बैठकर खाने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगता है।  रसोई में माँ को पता चल जाता है कि मैक्स आ चुका है। वह उसके लिए गर्म-गर्म चावल और फली की सब्जी परोसकर लाती है। मगर जैसे ही वह उसका बस्ता साफ मेज़ पर पड़ा देखती है उसके तेवर बदल जाते हैं। वह अपने बेटे को घूरते हुए धीरे से सिर्फ इतना कहती है, “बेटा” वह फट से समझ जाता है और अपना बस्ता वहाँ से हटा देता है। फिर दौड़कर बाहर हाथ धोने चला जाता है। भूख के मारे बेहाल जल्द ही लौट आता है और आँख चुराते हुए बुदबुदाता है: “ माँफ करना माँ, मैं भूल गया था।”
जब सेहत और साफ-सफाई की बात आती है तो इसमें एक परवाह करनेवाली माँ का बहुत बड़ा हाथ होता है। मगर उसे पूरे परिवार के सहयोग की भी ज़रूरत होती है। मैक्स का उदाहरण दिखाता है कि सफाई के मामले में लंबे समय तक तालीम देना ज़रूरी है, क्योंकि साफ-सफाई में काफी मेहनत लगती है। और खासकर बच्चों को इस मामले में लगातार याद दिलाने की ज़रूरत होती है।
मैक्स की माँ को पता है कि खाना कई तरीकों से दूषित हो सकता है। इसलिए खाना छूने से पहले वह न सिर्फ अच्छी तरह से हाथ धोती है, बल्कि मक्खियों से बचाने के लिए खाना ढककर रखती है। खाने को ढककर रखने और घर को साफ-सुथरा रखने की वजह से उसे छछूँदरों, चूहों और तिलचट्टों से निजात मिलती है।
“बाइबल के मुताबिक परमेश्वर के लोगों को पवित्र होना चाहिए क्योंकि परमेश्वर पवित्र है।” (1 पतरस 1:16) बाइबल यह भी कहती है: “पवित्रता और साफ-सफाई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए मैं अपने घर को साफ-सुथरा रखना चाहती हूँ और चाहती हूँ कि मेरा परिवार भी साफ-सुथरा दिखे। मगर यह तभी मुमकिन है जब इसमें परिवार का हर सदस्य सहयोग दे।”
वैसे तो भारत में स्वच्छता अभियान को आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से भारत सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन किया था और पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) शुरू किया जिसको बाद में (1 अप्रैल 2012 को) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा निर्मल भारत अभियान (एनबीए) नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था।
निर्मल भारत अभियान (1999 से 2012 तक पूर्ण स्वच्छता अभियान, या टीएससी) भारत सरकार द्वारा शुरू की गई समुदाय की अगुवाई वाली पूर्ण स्वच्छता (सीएलटीएस) के सिद्धांतों के तहत एक कार्यक्रम था। इस स्थिति को हासिल करने वाले गांवों को निर्मल ग्राम पुरस्कार नामक कार्यक्रम के तहत मौद्रिक पुरस्कार और उच्च प्रचार प्राप्त हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट किया कि मार्च 2014 में यूनिसेफ इंडिया और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने भारत सरकार द्वारा 1999 में शुरू विशाल पूर्ण स्वच्छता अभियान के हिस्से के रूप में स्वच्छता सम्मेलन का आयोजन किया, जिसके बाद इस विचार को विकसित किया गया।
परन्तु १५ अगस्त २०१४ को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गाँधी के स्वप्न को दोहराते हुए इस देश को स्वच्छ रखने की बात कही और उसके बाद महात्मा गाँधी के जन्मदिवस 02 अक्टूबर 2014 को 'स्वच्छ भारत अभियान' आरंभ किया गया। स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा आरंभ किया राष्ट्रीय स्तर का अभियान है जिसका उद्देश्य गलियों, सड़कों तथा अधोसंरचना को साफ-सुथरा करना है।  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने देश को गुलामी से मुक्त कराया, परन्तु 'स्वच्छ भारत' का उनका सपना पूरा नहीं हुआ। महात्मा गांधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था।
स्वच्छ भारत का उद्देश्य व्यक्ति, क्लस्टर और सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के माध्यम से खुले में शौच की समस्या को कम करना या समाप्त करना है। स्वच्छ भारत मिशन लैट्रिन उपयोग की निगरानी के जवाबदेह तंत्र को स्थापित करने की भी एक पहल करेगा। सरकार ने 2 अक्टूबर 2019, महात्मा गांधी के जन्म की 150 वीं वर्षगांठ तक ग्रामीण भारत में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत (यूएस $ 30 बिलियन) के 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके खुले में शौच मुक्त भारत (ओडीएफ) को हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
स्वच्छ भारत अभियान के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने देश की सभी पिछली सरकारों और सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों द्वारा सफाई को लेकर किए गए प्रयासों की सराहना की। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारत को स्वच्छ बनाने का काम किसी एक व्यक्ति या अकेले सरकार का नहीं है, यह काम तो देश के 125 करोड़ लोगों द्वारा किया जाना है जो भारत माता के पुत्र-पुत्रियां हैं। उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आंदोलन में तब्दील करना चाहिए। लोगों को ठान लेना चाहिए कि वह न तो गंदगी करेंगे और न ही करने देंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक साफ-सफाई न होने के चलते भारत में प्रति व्यक्ति औसतन 6500 रुपये जाया हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इसके मद्देनजर  स्वच्छ भारत जन स्वास्थ्य पर अनुकूल असर डालेगा और इसके साथ ही गरीबों की गाढ़ी कमाई की बचत भी होगी, जिससे अंतत: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होगा। उन्होंने लोगों से साफ-सफाई के सपने को साकार करने के लिए इसमें हर वर्ष 100 घंटे योगदान करने की अपील की है। प्रधानमंत्री ने शौचालय बनाने की अहमियत को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि साफ-सफाई को राजनीतिक चश्में से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे देशभक्ति और जन स्वास्थ्य के प्रति कटिबद्धता से जोड़ कर देखा जाना चाहिए।
 रोजमर्रा के जीवन में हमें अपने बच्चों को साफ-सफाई के महत्व और इसके उद्देश्य को सिखाना चाहिये। स्वच्छता एक ऐसा कार्य नहीं है जो हम दबाव में करे बल्कि ये एक अच्छी आदत और स्वस्थ तरीका है हमारे अच्छे स्वस्थ जीवन के लिये। अच्छे स्वास्थ्य के लिये सभी प्रकार की स्वच्छता बहुत जरुरी है चाहे वो व्यक्तिगत हो, अपने आसपास की, पर्यावरण की, पालतु जानवरों की या काम करने की जगह (विद्यालय, महाविद्यालय आदि) हो। हम सभी को निहायत जागरुक होना चाहिये कि कैसे अपने रोजमर्रा के जीवन में स्वच्छता को बनाये रखना है। अपनी आदत में साफ-सफाई को शामिल करना बहुत आसान है। हमें स्वच्छता से कभी समझौता नहीं करना चाहिये, ये जीवन में पानी और खाने की तरह ही आवश्यक है। इसमें बचपन से ही कुशल होना चाहिये जिसकी शुरुआत केवल हर अभिभावक के द्वारा हो सकती है पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी है के रुप में।
स्वस्थ्य भारत के निर्माण हेतु बतौर प्रथम कदम राष्ट्र की तमाम गंदगियों को मिटा कर ही आगे बड़ा जा सकता है, तन की स्वच्छता की और विशेष ध्यान दे, फिर मन में बुरे विचारों को आने न दे यहीं मन में आतंक, धर्म , जाति  लिंगभेद, ऊँच -नीच का भाव न आने पाएं, जिससे मन स्वच्छ होगा, न रिश्वत लो न ही रिश्वत दो, न ही बिना कर चुकाए कालाधन रखे, जिससे धन भी स्वच्छ होगा, उसके बाद घर को स्वच्छ रखें, मोहल्ले को स्वच्छ रखें, ग्राम,नगर और प्रान्त के साथ-साथ राष्ट्र को स्वच्छ रखें, जिससे भारत स्थाई स्वस्थ्यता मिलेगी।स्वस्थ्य भारत के साथ ही भारत के पुनर्निर्माण हेतु प्रत्येक तरीके की स्वच्छता ही कारगार विकल्प है।
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'

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  • आलमे-अरवाह - मेरे महबूब ! हम आलमे-अरवाह के बिछड़े हैं दहर में नहीं तो रोज़े-मेहशर में मिलेंगे... *-फ़िरदौस ख़ान* शब्दार्थ : आलमे-अरवाह- जन्म से पहले जहां रूहें रहती हैं दहर...
  • अल्लाह और रोज़ेदार - एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ? अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ म...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

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