फ़िरदौस ख़ान
वृक्ष जीवन का आधार हैं. इनसे जीवनदायिनी ऒक्सीज़न मिलती है. फल-फूल मिलते हैं, औषधियां मिलती हैं, छाया मिलती, लकड़ी मिलती है. इस सबके बावजूद बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वृक्षो को काटा जा रहा है. घटते वन क्षेत्र को राष्ट्रीय लक्ष्य 33.3 फ़ीसद के स्तर पर लाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा वृक्ष लगाने होंगे.  देश में वन क्षेत्रफल 19.2 फ़ीसद है. जंगल ख़त्म हो रहे हैं. इससे पर्यावरण के सामने संकट खड़ा हो गया है. इसलिए वन क्षेत्र को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है. कृषि वानिकी को अपनाकर कुछ हद तक पर्यावरण संतुलन को बेहतर बनाया जा सकता है. फ़सलों के साथ वृक्ष लगाने को कृषि वानिकी कहा जाता है.
खेतों की मेढ़ों के अलावा गांव की शामिलात भूमि, परती भूमि और ऐसी भूमि, जिस पर कृषि नहीं की जा रही हैं, वहां भी उपयोगी वृक्ष लगाकर पर्यावरण को हरा-भरा बनाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों ओर भी वृक्ष लगाए जा सकते हैं. कृषि वानिकी के तहत ऐसे वृक्ष लगाने चाहिए, जो ईंधन के लिए लकड़ी और खाने के लिए फल दे सकें. जिनसे पशुओं के लिए चारा और खेती के औज़ारों के लिए अच्छी लकड़ी भी मिल सके. इस बात का भी ख़्याल रखना चाहिए कि वृक्ष ऐसे हों, जल्दी उगें और उनका झाड़ भी अच्छा बन सके. बबूल, शीशम, नीम,  रोहिड़ा, ढाक, बांस, महुआ, जामुन, कटहल, इमली, शहतूत, अर्जुन, खेजड़ी, अशोक, पोपलर, सागौन और देसी फलों आदि के वृक्ष लगाए जा सकते हैं.

बबूल रेतीले, ऊबड़-खाबड़ और कम पानी वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है. इसका झाड़ काफ़ी फैलता है. बबूल की हरी पतली टहनियां दातुन के काम आती हैं. बबूल की दातुन दांतों को स्वच्छ और स्वस्थ रखती है. बबूल की लकड़ी बहुत मज़बूत होती है. उसमें घुन नहीं लगता. बबूल की लकड़ी का कोयला भी अच्छा होता है. भारत में दो तरह के बबूल ज़्यादा पाए और उगाये जाते हैं. एक देसी बबूल, जो देर से होता है और दूसरा विलायती बबूल. बबूल लगाकर पानी के कटाव को रोका जा सकता है. बबूल उगाकर बढ़ते रेगिस्तान को रोका जा सकता है. इसकी लकड़ी से किश्तियां, रेल स्लीपर, खिड़की-दरवाज़े, फ़र्नीचर और खेती में काम आने वाले कई तरह के औज़ार आदि बनाए जाते हैं. इससे ईंधन के लिए भी काफ़ी लकड़ी मिल जाती है. इसकी पत्तियों और बीजों को चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. बकरियों और भेड़ों का यह मुख्य भोजन है.

शीशम भी बहुत उपयोगी वृक्ष है. यह बहुत जल्दी बढ़ता है. इसका झाड़ बहुत बड़ा होता है. इसकी लकड़ी, पत्तियां, जड़ें सभी काम में आती हैं. इसकी लकड़ी भारी और मज़बूत होती है. इससे खिड़की-दरवाज़े, फ़र्नीचर आदि बनाया जाता है. शीशम की लकड़ी से खेतीबाड़ी में इस्तेमाल होने वाले औज़ार भी बनाए जाते हैं. इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के काम आती हैं. इसकी पत्तियों में प्रोटीन होता है. जड़ें ज़मीन को उपजाऊ बनाती हैं. भूमि कटाव को रोकते हैं.

नीम सदाबहार वृक्ष है. इसे जीवनदायिनी वृक्ष माना जाता है. यह काफ़ी भिन्नता वाली मिट्टी में उग जाता है. किसी भी प्रकार के पानी में जीवित रहता है. यह बहुत ज़्यादा तापमान को बर्दाश्त कर लेता है. पतझड़ में इसकी पत्तियां झड़ जाती हैं. यह घने झाड़ वाला वृक्ष है. इसकी छाया आराम देती है. इसके फूल सफ़ेद और सुगंधित होते हैं. इसका फल चिकना गोलाकार से अंडाकार होता है, जिसे निंबोली कहते हैं. फल का छिलका पतला, गूदा रेशेदार, सफ़ेद पीले रंग का और स्वाद में कड़वा-मीठा होता है. यह औषधीय गुणों से भरपूर है. यह वातावरण को शुद्ध करता है. अनेक बीमारियों के इलाज में इसका इस्तेमाल होता है. इसके बीज खाद के रूप में प्रयोग किए जाते हैं. इसमें काफ़ी मात्रा में नाइट्रोजन और कीटनाशक तत्व पाए जाते हैं. इसकी लकड़ी मज़बूत होती है. इसका इस्तेमाल मकान, ठेले और फ़र्नीचर बनाने के लिए होता है. घरों में इसे लगाना अच्छा माना जाता है. सड़कों के किनारे छाया के लिए नीम के वृक्ष लगाए जाते हैं.

रोहिड़ा सदाबहार वृक्ष है. इसे रोहिरा, रोही, रोहिटका आदि नामों से भी जाना जाता है. यह रेतीली मिट्टी में उगने वाला वृक्ष है. इसमें सूखा सहन करने की विलक्षण क्षमता होती है. यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगता है और अपना विकास करता है. इसे रेत के स्थायी टीलों पर सरलता से उगाया जा सकता है, जहां तापमान बहुत कम और बहुत ज़्यादा हो. इसकी जड़ें मिट्टी की ऊपरी सतह पर फैल जाती हैं. इससे मिट्टी का कटाव रुक जाता है.यह हवा के बहाव को भी नियंत्रित करता है. इसकी शाख़ाएं झुकी हुई और तना मुड़ा हुआ होता है. इसे खेतों के बीच भी उगाया जा सकता है. इसकी लकड़ी मज़बूत, सख़्त, सलेटी और पीले रंग की होती है. इसकी लकड़ी से फ़र्नीचर, खेती के औज़ार और खिलौने आदि बनाए जाते हैं. इसकी लकड़ी पर आसानी से नक़्क़ाशी हो जाती है. इसलिए इससे सजावटी सामान भी बनाया जाता है. इसकी शाख़ाएं ईंधन के काम आती हैं. इसमें औषधीय गुण पाए जाते हैं. इससे विभिन्न प्रकार के रोगों की देसी और आयुर्वेदिक औषधियां तैयार की जाती हैं. रोहिड़ा वृक्ष के तने की छाल में निकोटिन नामक पदार्थ पाया जाता है. यह लीवर संबंधी रोगों में विशेष रूप से गुणकारी है. लिव-52 नामक औषधि बनाने के लिए इसी का इस्तेनाल किया जाता है. रोहिड़ा का फूल बहुत ख़ूबसूरत होता है. इस पर सर्दियों के मौसम में फूल आते हैं. इसके फूल पीले, नारंगी और लाल रंग के होते हैं, जो घंटी के समान होते हैं.

पलाश को पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक और केसू भी कहा जाता है. इसके फूल बहुत आकर्षक होते हैं. इसके आकर्षक फूलों के कारण इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. प्राचीन काल ही से इसके फूलों से होली के रंग भी बनाए जाते हैं. यह अनुपजाऊ भूमि में भी उग जाते हैं. इसका झाड़ भी बहुत फैलता है. पलाश के पत्ते पत्तल और दोने आदि के बनाने के काम आते हैं. इनके पत्तों से बीड़ियां भी बनाई जाती हैं. फूल और बीज औषधीय गुणों से भरपूर हैं. इसकी छाल से रेशा निकलता है, जिसे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरा जाता है, ताकि अंदर पानी न आ सके. जड़ की छाल से निकलने वाले रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है. इसकी पतली डालियों को उबालकर एक प्रकार का कत्था तैयार किया जाता है. मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है. इसकी छाल से गोंद निकलता है.

बांस भी बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसकी लकड़ी बहुत उपयोगी मानी जाती है और छोटी-छोटी घरेलू वस्तुओं से लेकर मकान बनाने तक के काम आती है.
इसकी लकड़ी से कई तरह का सजावटी सामान बनाया जाता है. इससे काग़ज़ भी बनाया जाता है. बांस की खपच्चियों को तरह-तरह की चटाइयां, कुर्सी, मेज़, चारपाई, मछली पकड़ने का कांटा, डलियां और अन्य कई प्रकार की वस्तुएं बनाई जाती हैं. प्राचीन काल में बांस की कांटेदार झाड़ियों से क़िलों की रक्षा की जाती थी. इससे कई तरह के बाजे, जैसे बांसुरी और वॉयलिन आदि भे बनाए जाते हैं. दवा में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. बांस का प्ररोह खाया जाता है. इसका अचार और मुरब्बा भी बनता है. बांस के पेड़ तालाबों और पोखरों के पास लगाए जा सकते हैं. बांस पर सूखे या बारिश का ज़्यादा असर नहीं पड़ता.  बांस अन्य वृक्षों के मुक़ाबले 30 फ़ीसद ज़्यादा ऑक्सीजन छोड़ता. यह पीपल के वृक्ष की तरह दिन में कार्बन डाईऑक्साइड खींचता है और रात में ऑक्सीजन छोड़ता है.

महुआ तेज़ी से बढ़ने वाला वृक्ष है. यह हर तरह की ज़मीन में उग जाता है. इसका पेड़ ऊंचा और छतनार होता है और डालियां चारों तरफ़ फैलती हैं.  अमूमन यह सालभर हरा-भरा रहता है. यह भी बहु उपयोगी वृक्ष है. इसके बीज, फूल और लकड़ी कई काम आती है. इसका फल परवल के आकार का होता है, जिसे  कलेंदी कहते हैं. इसे छीलकर, उबालकर और बीज निकालकर तरकारी भी बनाई जाता है. इसके बीच में एक बीज होता है, जिससे तेल निकलता है. इसके पके फलों का गूदा खाने में मीठा होता है. इसके बीजों से त्वचा की देखभाल की चीज़ें, साबुन और डिटर्जेंट आदि का निर्माण किया जाता है. इसका तेल ईंधन के रूप में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. तेल निकालने के बाद बचे इसके खल का इस्तेमाल पशुओं के खाने और उर्वरक के रूप में किया जाता है. औषधीय गुणों के लिए दवाओं में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. महुए के फूल में चीनी का अंश होता है, जिसे इंसान ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी भी ख़ूब पसंद करते हैं. इसके रस में पूड़ी भी पकाई जाती है. इसे पीसकर आटे में मिलाकर रोटियां बनाई जाती हैं, जिन्हें महुअरी कहा जाता है. हरे और सूखे महुए लोग भूनकर भी खाते हैं.  इसे पशुओं को भी खिलाया जाता है. इससे पशुओं का दूध ज़्यादा और गाढ़ा होता है. आदिवासी इसे पवित्र मानते हैं.

जामुन भी उपयोगी वृक्ष है. इसे जामुन, राजमन, काला जामुन, जमाली, ब्लैकबेरी आदि नामों से जाना जाता है. इससे खाने के लिए लज़ीज़ फल तो मिलते ही हैं, साथ ही इसकी पत्तियां और छाल भी औषधियों के तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं. जामुन के फल में ग्लूकोज़ और फ्रक्टोज़ पाए जाते हैं. फल में खनिजों की तादाद ज़्यादा होती है. अन्य फलों के मुक़ाबले यह कम कैलोरी प्रदान करता है. एक मध्यम आकार का जामुन 3-4 कैलोरी देता है. फल के बीज में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम की अधिकता होती है. यह लौह का बड़ा स्रोत है. प्रति 100 ग्राम में एक से दो मिलीग्राम आयरन होता है. इसमें विटामिन बी, कैरोटिन, मैग्नीशियम और फाइबर होते हैं. जामुन को मधुमेह के बेहतर उपचार के तौर पर जाना जाता है. यकृत यानी लीवर से संबंधित बीमारियों समेत कई रोगों के बचाव में भी जामुन बेहद उपयोगी साबित होता है. जहां बाढ़ ज़्यादा आती हो, वहां इसे लगाना चाहिए. इससे भूमि कटाव रुकता है.

कटहल एक फलदार वृक्ष है. वृक्ष पर लगने वाले फलों में इसका फल दुनिया में सबसे बड़ा होता है. फल के बाहरी सतह पर छोटे-छोटे कांटे होते हैं.
इसकी सब्ज़ी और अचार बनाया जाता है. इसका फल बहुत पौष्टिक माना जाता है. इसकी जड़, छाल और पत्ते औषधि के रूप में काम आता है. कटहल में कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं, जैसे विटामिन ए, सी, थाइमिन, पोटैशियम, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, आयरन, नियासिन और जिंक आदि. इसमें फ़ाइबर पाया जाता है. इसमें बिल्कुल भी कैलोरी नहीं होती है.

इमली का वृक्ष ऊंचा और घने झाड़ वाला होता है. इन्हें सड़कों के किनारे भी लगाया जाता है. इससे छाया के साथ-साथ इमली भी मिलती है.  इसमें कैरोटीन, विटामिन सी और बी पाया जाता है. इसके फल खट्टे होते हैं. इसलिए खटाई के तौर पर विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है. इमली की पत्तियों का प्रयोग हर्बल चाय बनाने में किया जाता है. कई तरह की बीमारियों में भी यह कारगर है.

शहतूत एक बहुवर्षीय वृक्ष है. यह 15 सालों तक उच्च गुणवत्ता की पत्तियां देता है. शहतूत में ऐसे कई फ़ायदेमंद गुण पाए जाते हैं, जो कई बीमारियों में वरदान साबित हो सकते हैं.  शहतूत में उम्र को रोकने वाला गुण होता है. यह त्वचा को युवा बना देता है और झुर्रियों को चेहरे से ग़ायब कर देता है.

अर्जुन एक औषधीय वृक्ष है. इसे घवल, ककुभ और नदीसर्ज भी कहते हैं,  क्योंकि यह नदी नालों के किनारे काफ़ी पाया जाता है. इसकी छाल पेड़ से उतार लेने पर फिर उग आती है. इसके फल कमरख़ों जैसे आकार के होते हैं.  इनमें हल्की-सी सुगंध होती है और स्वाद कसैला होता है. इसकी छाल औषधियों में काम आती है. होम्योपैथी में अर्जुन एक प्रचलित औषधि है.

खेजडी को संस्कृत में शमी वृक्ष कहा गया है. शमी का शाब्दिक अर्थ है शमन करने वाला.  इसे जांट, जांटी, जंड, समी, सुमरा आदि नामों से जाना जाता है. इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ये तेज़ गर्मियों के दिनों में भी हरा-भरा रहता है. इसकी छाया में पशु-पक्षी ही नहीं, इंसान भी आराम पाते हैं. जब खाने को कुछ नहीं होता है, तब यह चारा देता है, जिसे लूंग कहा जाता है. इसका फूल मींझर कहलाता है. इसके फल को सांगरी कहते हैं, जिसकी सब्ज़ी बनाई जाती है. यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है, जो सूखा मेवा है. इसकी लकड़ी मज़बूत होती है. इससे फ़र्नीचर बनाया जाता है.  इसकी जड़ से हल बनाया जाता है. इसकी लकड़ी ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है.

अशोक का वृक्ष घना और छायादार हाता है. इसके पत्ते शुरू में तांबे जैसे रंग के होते हैं, इसलिए इसे ताम्र पल्लव भी कहते हैं. इसके नारंगी रंग के फूल बसंत ऋतु में आते हैं, जो बाद में लाल रंग के हो जाते हैं. सुनहरी लाल रंग के फूलों वाला होने से इसे हेमपुष्पा भी कहा जाता है. यह औषधीय वृक्ष है.  इसकी छाल में हीमैटाक्सिलिन, टेनिन, केटोस्टेरॉल, ग्लाइकोसाइड, सैपोनिन, कार्बनिक कैल्शियम और लौह के यौगिक पाए गए हैं.

पोपलर एक उपयोगी वृक्ष है. यह 15 से 50 मीटर ऊंचा होता है. यह जल्द बढ़ने वाला वृक्ष है. सर्दी के मौसम में पत्ते न होने की वजह से  इसे खाद्यान्न, सब्ज़ियों, मसालों, तिलहनों और दलहन वाली फ़सलों को आसानी से उगाया जा सकता है.यह बाग़ों के किनारे और पानी की नालियों के साथ-साथ लगाए जाते हैं. इसकी लकड़ी प्लाई बनाने के काम आती है. इससे खेल-कूद का सामान भी बनाया जाता है. पोपलर सूर्य उष्णता, हवा के कुम्भालाने वाले प्रभाव से फ़सलों की रक्षा और मिट्टी का कटाव रोकने में भी मदद करता है. उपजाऊ मिट्टी और उच्च जल स्तर वृक्षारोपण को ऊपर उठाने के लिए काफ़ी अनुकूल पाया गया है.

सागौन सालभर हरा-भरा रहने वाला वृक्ष है. यह 80 से 100 फुट ऊंचा होता है. इसका वृक्ष काष्ठीय होता है. इसकी लकड़ी हल्की, मज़बूत और लंबे वक़्त तक चलने वाली होती है. इसके पत्ते काफ़ी बड़े होते हैं. यह बहुमूल्य इमारती लकड़ी देता है. इसकी लकड़ी बहुत कम सिकुड़ती है. इस पर पॉलिश जल्द चढ़ जाती है, जिससे यह बहुत आकर्षक हो जाती है. इसकी लकड़ी जहाज़ों, नावों, बोगियों, खिड़कियों, चौखटों, रेल के डिब्बों और फ़र्नीचर के निर्माण में इस्तेमाल की जाती है.

इनके अलावा सिरस, कचनार, शहतूत और बेरी आदि वृक्ष लगाकर भी कृषि वानिकी को बढ़ावा दिया जा सकता है. ये वृक्ष पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वृक्षों के पत्तों से चारा मिलता है. कचनार और शहतूत की पत्तियों के चारे में घास के मुक़ाबले ज़्यादा वसा, प्रोटीन, चूना आदि ज़रूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं. गांवों में ऐसे वृक्ष लगाने चाहिए, जिनसे पशुओं के लिए चारा मिल सके. इमारती लकड़ी और ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी की बढ़ती ज़रूरतों को कृषि वानिकी से पूरा किया जा सकता है. ऐसे में जंगल भी सुरक्षित रहेंगे. खेतों के आसपास पेड़ लगाने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कार्बन डाई ऑक्साइड से छुटकारा पाने में काफी मदद मिलेगी. कृषि वानिकी शोधकर्ताओं ने देश के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिए उपयुक्त वृक्षों की पहचान की है, ताकि वे अच्छे से फलफूल सकें. उनका मानना है कि स्थानीय जलवायु के मुताबिक़ अनुकूलित वृक्ष और झाड़ियां कृषि वानिकी के लिए सबसे सुरक्षित हैं. कई पौधों की प्रजातियां जैव विविधता की रक्षा करने, मृदा स्वास्थ्य में सुधार, लकड़ी और ईंधन लकड़ी मुहैया कराने, कार्बन डाई ऑक्साइड को कम करने आदि फ़ायदों को ध्यान में रखकर तय की गई हैं.

देश में प्रति हेक्टेयर औसत लकड़ी का उत्पादन विश्च के औसत से कम है. लकड़ी की मांग आपूर्ति से बहुत ज़्यादा है. इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए सालाना 400 करोड़ रुपए की लकड़ी बाहर से मंगवानी पड़ती है. देश की खाद्यान्नों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़मीन पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. इसकी वजह से भूमि के पोषक तत्व कम हो रहे हैं. मिट्टी के जल भंडारण की क्षमता भी कम हो रही है और भू-जल स्तर में भी गिरावट आ रही है. एक किलो धान पैदा करने के लिए 5000 लीटर पानी की ज़रूरत होती है. इसी तरह एक किलो गेहूं पैदा करने के लिए 1500 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है, जबकि एक किलो लकड़ी पैदा करने में 500 लीटर पानी  ख़र्च होता है. घटते वन क्षेत्र को बढ़ाने और लकड़ी की मांग को पूरा करने के लिए कृषि वानिकी को अपनाना चाहिए.  कृषि वानिकी के ज़रिये एक ही भूखंड पर एक साथ कई तरह की उपयोगी चीज़ें हासिल की जा सकती हैं, जैसे खाद्यान्न, फल-फूल, सब्ज़ियां, दूध, शहद, ईंधन, रेशा, चारा और खाद आदि. भूमि में नमी बनाकर रखी जा सकती है. भूमि कटाव को रोका जा सकता है. वृक्ष रेगिस्तान के बढ़ाव को रोकते हैं. हर साल रेगिस्तान का क्षेत्रफल बढ़ रहा है. रेगिस्तान में वृक्ष लगा देने से वे वहीं रुक जाते हैं और आगे नहीं बढ़ पाते.

बेरोज़गार युवकों को कृषि वानिकी की मुहिम में शामिल करके जहां उन्हें रोज़गार मुहैया कराया जा सकता है, वहीं इससे पर्यावरण भी स्वच्छ बनेगा. प्रशिक्षण शिविर लगाकर युवाओं को इसके बारे में जानकारी दी जा सकती है. इसके लिए ग्रामीणों ख़ासकर किसानों और पशु पालकों को भी जागरूक किया जाना चाहिए. दरअसल कृषि वानिकी आज के वक़्त की बहुत बड़ी ज़रूरत है. इसके ज़रिये जहां पर्यावरण को स्वच्छ रखा जा सकत है, वहीं वृक्षों से लाभ भी अर्जित किया जा सकता है.

फ़िरदौस ख़ान
दुनिया भर में आबादी लगातार बढ़ रही है. आबादी को रहने के लिए घर भी चाहिए और पेट भरने के लिए अनाज भी. बसावट के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, खेतों की जगह बस्तियां बसाई जा रही हैं. ऐसे में लगातार छोटे होते खेत आबादी का पेट कैसे भर पाएंगे.  इंसान को ज़िन्दा रहने के लिए हवा और पानी के अलावा भोजन भी चाहिए. ज़रा सोचिए, जब कृषि भूमि कम हो जाएगी, तब अनाज, फल और सब्ज़ियां कहां से आएंगी. ऐसी हालत में खेतीबाड़ी की ऐसी तकनीक की ज़रूरत होगी, जिससे बिना मिट्टी के भी फ़सलें उगाई जा सकें. काफ़ी अरसे से कृषि वैज्ञानिक ऐसी तकनीक की खोज में जुटे हैं, जिनके ज़रिये उन हालात में भी फ़सलें उगाई जा सकें, जब कृषि योग्य ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध न हों. कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत का ही नतीजा है कि आज ऐसी कई तकनीक मौजूद हैं, जिनके ज़रिये कम पानी और बंजर ज़मीन में भी फ़सलें लहलहा रही हैं. इतना ही नहीं, अब तो बिना मिट्टी के भी फ़सलें उगाई जा रही हैं. अमेरिका, ऒस्ट्रेलिया, चीन, जापान, इज़राइल, थाइलैंड, कोरिया, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि देशों में बिना मिट्टी के सब्ज़ियां उगाई जा रही हैं. इन देशों की देखादेखी और देश भी इस तकनीक को अपना रहे हैं. इस तकनीक के ज़रिये टमाटर, गोभी, बैंगन, भिंडी, करेला, मिर्च, ककड़ी, शिमला मिर्च, खीरा और पालक व अन्य़ पत्तेदार सब्ज़ियों की खेती की जा रही है.

बिना मिट्टी वाली खेती में मिट्टी की जगह ठोस पदार्थ के रूप में बालू, बजरी, धान की भूसी, कंकड़, लकड़ी का चूरा, पौधों का वेस्ट जैसे नारियल का जट्टा, जूट आदि का इस्तेमाल किया जाता है. जूट और नारियल के जट्टे में पानी सोखने की क्षमता ज़्यादा होती है. यह भुरभुरा होता है, जिससे जड़ों को हवा मिलती रहती है. बिना मिट्टी के खेती करने की तकनीक को हाइड्रोपोनिक्स यानी जलकृषि कहा जाता है. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं किया जाता. मिट्टी की जगह पानी ही खेती की बुनियाद होता है. पौधों को पानी से भरे एक बर्तन में उगाया जाता है. पौधों को बढ़ने के लिए जिन पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है, उन्हें पानी में मिला दिया जाता है. पोषक तत्वों और ऑक्सीज़न को पौधों की जड़ों तक पहुंचाने के लिए एक पतली नली का इस्तेमाल किया जाता है. जलकृषि दो तरीक़ों से की जाती है. पहली है घोल विधि और दूसरी माध्यम विधि. घोल विधि के तहत पौधों को पानी से भरे एक बर्तन में रखा जाता है और फिर पोषक तत्वों का घोल प्रवाहित किया जाता है. पौधों की जड़ों तक ऑक्सीज़न और पोषक तत्वों को पहुंचाया जाता है. घोल विधि तीन तरह की है- स्थैतिक घोल विधि, सतत बहाव विधि और एयरोपोनिक्स. स्थैतिक घोल विधि में पौधों को पानी से भरे बर्तन में रखा जाता है और फिर पोषक तत्वों के घोल को धीरे-धीरे नली से प्रवाहित किया जाता है. जब पौधे कम हों, तो यह विधि इस्तेमाल में लाई जाती है. ऐसा होने से जड़ों को ऑक्सीज़न भी मिलती रहती है. सतत बहाव घोल विधि के तहत पोषक तत्वों के घोल को लगातार जड़ों की तरफ़ प्रवाहित किया जाता है. जब बड़े से बर्तन में ज़्यादा पौधे उगाने हों, तो इसका इस्तेमाल करते हैं. इन्हें डीप वाटर विधि भी कहा जाता है. अमूमन एक हफ़्ते बाद जब घोल निर्धारित स्तर से कम हो जाता है, तो पानी और पोषक तत्वों को इसमें मिला दिया जाता है. एयरोपोनिक्स यानी बिना मिट्टी के हवा और नमी वाले वातावरण में फलों, सब्ज़ियों और फूलों की फ़सल उगाना. इस तकनीक के तहत पौधों को प्लास्टिक के पैनल के ऊपर बने छेदों में टिकाया जाता है और उनकी जड़ें हवा में लटका दी जाती हैं. सबसे नीचे पानी का टैंक रखा जाता है, जिसमें घुलने वाले पोषक तत्व डाल दिए जाते हैं. टैंक में लगे पंप के ज़रिये पौधों की हवा में लटकी जड़ों पर पानी का छिड़काव किया जाता है. पानी में मिले पोषक तत्वों से ख़ुराक और हवा से ऑक्सीज़न मिलने की वजह पौधे बड़ी तेज़ी से बढ़ते हैं और काफ़ी कम वक़्त में भरपूर पैदावार देते हैं. कमरे में होने वाली इस खेती में रौशनी के लिए एलईडी बल्ब इस्तेमाल किए जाते हैं.

वर्टिकल फ़ार्मिंग भी एक बेहतर विकल्प है. इसमें मिट्टी की ज़रूरत नहीं होती. वर्टिकल फ़ार्म एक बहुमंज़िला ‘ग्रीन हाउस’ है. इस विधि के तहत कमरों में एक बहु-सतही ढांचा खड़ा किया जाता है, जो कमरे की ऊंचाई के बराबर हिसाब से बनाया जाता है. इसकी दीवारें कांच की होती हैं, जिससे सूरज की रौशनी अंदर तक आती है. वर्टिकल यानी खड़े ढांचे के सबसे निचले ख़ाने में पानी से भरा टैंक रख दिया जाता है. उसमें मछलियां डाली जाती हैं. मछलियों की वजह से पानी में नाइट्रेट की अच्छी ख़ासी मात्रा होती है, जो पौधों के जल्दी बढ़ने में मददगार है. टैंक के ऊपरी ख़ानों में पौधों के छोटे-छोटे बर्तन रख दिए जाते हैं. टैंक से पंप के ज़रिये इस बर्तन तक पानी पहुंचाया जाता है.

जलकृषि में ऐसे पोषक तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है, जो पानी में घुलनशील होते हैं. इनका रूप अकार्बनिक और आयनिक होता है. कैल्सियम, मैग्निशियम और पोटैशियम प्राथमिक घुलनशील तत्व हैं. वहीं प्रमुख घोल के रूप में नाइट्रेट, सल्फ़ेट और डिहाइड्रोजन फ़ॊस्फ़ेट इस्तेमाल में लाए जाते हैं. पोटेशियम नाइट्रेट, कैल्सियम नाइट्रेट, पोटेशियम फ़ॊस्फ़ेट और मैग्निशियम सल्फ़ेट रसायनों का भी इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा आयरन, मैगनीज़, कॉपर, ज़िंक, बोरोन, क्लोरीन और निकल का भी इस्तेमाल होता है. इस तकनीक की ख़ासियत यह है कि इसमें मिट्टी के बिना और कम पानी के इस्तेमाल से सब्ज़ियां उगाई जाती हैं. इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए इसके ज़रिये छत पर भी खेती की जा सकती है. इस तकनीक की खेती में मेहनत कम लगती है. फ़सल की बुआई के लिए खेतों में जुताई करने और सिंचाई की भी ज़रूरत नहीं है. खरपतवान निकालने की मेहनत से भी आज़ादी है. इसमें पानी भी बहुत कम लगता है. मिसाल के तौर पर मिट्टी वाले खेत में एक किलो सब्ज़ी उगाने में जितने पानी की ज़रूरत होती है, उतने ही पानी में जलकृषि के ज़रिये सौ किलो से ज़्यादा सब्ज़ियां उगाई जा सकती हैं. इसमें खरपतवार नहीं उगते और फ़सल पर नुक़सानदेह कीटों का भी कोई प्रकोप नहीं होता. ऐसे में कीटनाशकों के छिड़काव की मेहनत और ख़र्च दोनों बच जाते हैं. कीटनाशकों का इस्तेमाल न होने की वजह से सब्ज़ियां पौष्टिक तत्वों से भरपूर होती हैं और लम्बे वक़्त तक ताज़ी रहती हैं. ये सब्ज़ियां ऒर्गेनिक सब्ज़ियों जैसी ही होती हैं और इनकी गुणवत्ता भी मिट्टी में उगने वाली फ़सल की तुलना में बेहतर साबित हुई है. ग़ौरतलब है कि सामान्य खेती में कीटनाशकों और रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने फ़सलों को ज़हरीला बना दिया है. अनाज ही नहीं, दलहन, फल और सब्ज़ियां भी ज़हरीली हो चुकी हैं. इनका सीधा असर सेहत पर पड़ रहा है.


इसके अलावा एक और विधि से बहुत कम पानी और कम मिट्टी में भी सब्ज़ियां उगाई जाती हैं. इस विधि का नाम है ट्रे कल्टीवेशन यानी ट्रे में फ़सल उगाना. इसके तहत ट्रे में हरी जाली बिछाई जाती है. फिर उसमें जूट बिछा दिया जाता है. इसके बाद केंचुए की खाद डाली जाती है. फिर इसमें बीज बो दिए जाते हैं. समय-समय पर इसमें पोषक तत्वों का छिड़काव किया जाता है. फिर से ट्रे को जाली से ढक दिया जाता है. जाली से ढकी होने की वजह से पौधे कीट-पतंगों से सुरक्षित रहते हैं. राजस्थान में किसान इस तकनीक को अपना रहे हैं. राज्स्थान में इस तकनीक से खेती हो रही है.

देश के कई हिस्सों में अब बिना मिट्टी के खेती हो रही है. हरियाणा के पानीपत ज़िले के जोशी गांव के किसान अनुज भी बिना मिट्टी के खेती कर रहे हैं. उन्होंने ऒस्ट्रेलिया में बिना मिट्टी वाली खेती देखी और इसका प्रशिक्षण लिया. फिर स्वदेश लौटने पर उन्होंने इस नई तकनीक से खेती शुरू की. वह 15 एकड़ से भी ज़्यादा भूमि पर मिट्टी रहित जैविक खेती कर रहे है.  इस प्रगतिशील किसान का कहना है कि उनके गांव की मिट्टी में खरपतवार बहुत है, जिससे उत्पादन होता है. इसी वजह से उन्होंने मिट्टी रहित खेती की इस तकनीक को अपनाया.  उन्होंने बताया कि इस खेती में मिट्टी की जगह नारियल के अवशेष का इस्तेमाल होता है और इसे छोटी-छोटी थैलियों में डालकर पॊली हाऊस में सब्ज़ी के पौधे उगाए जाते हैं. नारियल के इस अवशेष को खेती के लिए लगातार तीन साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि इस तकनीक से लगातार सात महीनों तक सब्ज़ियों की पैदावार होती है. वह हर तीन साल बाद केरल से नारियल के अवशेष मंगवाते हैं. इसका एक बैग तक़रीबन 5 किलो का होता है, जिसकी क़ीमत 30 रुपये है. उन्होंने बताया कि वह टमाटर, शिमला मिर्च, गोभी, मटर और खीरा आदि सब्ज़ियां उगाते हैं. सब्ज़ियों को बेचने के लिए उन्हें बाज़ार जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. व्यापारी ख़ुद उनके फ़ार्म से सब्ज़ियां ख़रीद कर ले जाते हैं. उन्हें सब्ज़ियों की अच्छी क़ीमत मिलती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले अनिमेष तिवारी अपने घर की छत पर सब्ज़ियां उगाते हैं. वह गोभी, बैंगन,  शिमला मिर्च और चाइनीज़ कैबिज, ब्रोकोली आदि की खेती करते हैं. उन्होंने छत पर एक स्टैंड पर प्लास्टिक के मोटे पाइप रखे हुए हैं, जिनमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर ख़ास आकार में छेद किए गए हैं. वह जालीदार बर्तन में नारियल की भूसी डालते हैं. फिर इसी भूसी में सब्ज़ियों के बीज बो देते हैं. इन बर्तनों में पानी डाला जाता है. जब बीज से छोटे पौधे निकलने लगते हैं, तो बर्तन को प्लास्टिक के पाइप में बने छेद पर फिट कर दिया जाता है. इससे उन्हें काफ़ी मुनाफ़ा हो रहा है.

इस तकनीक के ज़रिये अब चारा भी उगाया जाएगा. कम पानी वाले शुष्क इलाक़ों में उगने वाली सेवण घास की पौध भी इस तकनीक से तैयार की जा चुकी है. राजस्थान के वेटरनरी विश्वविद्यालय के पशुधन चारा संसाधन प्रबंधन एवं तकनीक केंद्र के वैज्ञानिकों ने सेवण के बीजों को बिना मिट्टी के धूप, पानी और पोषक तत्वों का इस्तेमाल करके नियंत्रित तापक्रम पर सात दिन की अवधि में सेवण की पौध तैयार की थी.  वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक से तैयार हुई पौध से चारागाह में सेवण घास को पनपाने और हल्के-फुल्के बीजों की बिजाई में आने वाली मुश्किलों से छुटकारा मिल जाएगा. ग़ौरतलब है कि सेवण घास रेगिस्तानी इलाक़ों के पालतू पशुओं गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंट और वन्य पशुओं का पौष्टिक आहार है. सेवण का पौधा एक बार पनपने के बाद बूझे का स्वरूप ले लेता है, जो बहुत लंबे वक़्त तक शुष्क क्षेत्र में पौष्टिक एवं स्वादिष्ट चारे का उत्पादन देने में सक्षम होता है. सेवण के बीज परिपक्व होते ही झड़ कर तेज़ हवा और आंधी में उड़ जाते हैं.

जलकृषि के ज़रिये लगातार पैदावार ली जा सकती है और किसी भी मौसम में सब्ज़ियां उगाई जा सकती हैं. इसमें खेती के आधुनिक उपकरणों की भी कोई ज़रूरत नहीं होती. इस तकनीक की एक बड़ी ख़ासियत यह भी है कि फ़सलें प्राकृतिक आपदाओं जैसे ओलावृष्टि, बेमौसमी बारिश और सूखे से भी बची रहती हैं. किसानों को बिना मिट्टी के खेती की यह तकनीक बहुत पसंद आ रही है. मिट्टी पारंपरिक खेती के मु़क़ाबले इसमें लागत बहुत कम आती है, जबकि मुनाफ़ा ज़्यादा होता है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिन किसानों की ज़मीन बंजर है, वे जलकृषि को अपनाकर फ़सलें उगा सकते हैं. कृषि विभाग के अधिकारी किसानों को बिना मिट्टी के खेती करने का प्रशिक्षण दे रहे हैं. हरियाणा के किसानों ने तक़रीबन 1800 एकड़ बंजर ज़मीन में पॊली हाउस बनाए हुए हैं.

जलकृषि वक़्त की ज़रूरत है. दुनिया की आबादी तक़रीबन आठ अरब है, जो लगातार बढ़ ही रही है. अगले एक-दो दशक में आबादी बढ़कर नौ अरब होने की संभावना है. आने वाले दो दशकों में खाद्यान्न उत्पादन में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी होने पर ही लोगों को भोजन मिल पाएगा. फ़िलहाल दुनिया भर में तक़रीबन 25000 लाख टन खाद्यान्न की पैदावार हो रही है, जो भविष्य़ की बढ़ी आबादी के लिए बहुत कम रहेगी. लगातार जलवायु परिवर्तन, बंजर होती ज़मीन, घटती कृषि भूमि, जल संकट को देखते हुए कृषि के नये तरीक़े अपनाकर ही आबादी के लिए खाद्यान्न जुटाया जा सकेगा.

वर्टिकल फ़ार्मिंग के ज़रिये भी किसान कम जगह में सब्ज़ियां उगा सकते हैं. कम जगह, कम लागत, कम मेहनत में अच्छी पैदावार मुनाफ़े का सौदा है. आज़माकर ज़रूर देखें.

फ़िरदौस ख़ान
जी हां, बंजर ज़मीन पर अब लिलियम के फूल लहलहा रहे हैं. आज जब खेती की उपजाऊ ज़मीन लगातार बंजर होती जा रही है, ऐसे में लिलियम के फूलों की खेती ने किसानों को एक नई राह दिखाई है.  लिलियम ठंडी आबोहवा का बेहद ख़ूबसूरत फूल है. दुनिया भर में कंदीय फूलों में ट्यूलिप के बाद लिलियम ही ऐसा फूल है, जिसकी ख़ासी मांग है. सजावट में यह बहुत काम आता है, जिसकी वजह से बाज़ार में इसकी अच्छी क़ीमत मिल जाती है. दुनिया भर में इसकी खेती की जाती है. इसकी खेती के लिए बल्ब हॉलैंड से मंगाया जाता है. एक अनुमान के मुताबिक़ भारत हॉलैंड से तक़रीबन 15-20 लाख बल्बों का आयात करता है. यह अनुमान लगाया गया है कि दुनिया के कुल सालाना कारोबार में कंदीय फूलों का तक़रीबन 12000 करोड़ का व्यापार है. सिर्फ़ 70 दिन की बाग़वानी वाला लिलियम किसानों के लिए फ़ायदेमंद का साबित हो रहा है. एक एकड़ में 90 हज़ाजार से एक लाख फूल तैयार हो जाते हैं. किसानों को प्रति एकड़ 12 से 15 लाख रुपये तक की आमदनी हो सकती है. बाग़वानी विभाग लिलियम की खेती पर 50 फ़ीसद अनुदान दे रहा है, जबकि नेट पॉली हाउस लगाने पर 65 फ़ीसद अनुदान दिया जा रहा है. यूं ओ जम्मू-कशमीर, हिमाचल और उत्तराखंड की जलवायु इसकी खेती के लिए उत्तम है, लेकिन अब देश के अन्य हिस्सों जैसे पंजाब और हरियाणा में भी किसान लिलियम की खेती कर रहे हैं.

उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के गांव हड़ौली के किसान प्रभाकर भाकुनी पिछले कई सालों से लिलियम के फूलों की खेती कर रहे हैं. उनका कहना है कि बाज़ार में लिलियम के एक फूल की क़ीमत 40 से 50 रुपये है. अगर किसान ख़ुद फूलों के कारोबारियों से संपर्क कर अपनी पैदावार बेचे, तो उसे बहुत अच्छी आमदनी हासिल हो सकती है. उनका यह भी कहना है कि लिलियम की खेती बेरोज़गारों के लिए आमदनी का एक बेहतर ज़रिया है.

हरियाणा के फ़तेहाबाद के किसान सुमित गडवाल और भिवानी ज़िले के गांव ढाणी किरावड़ के किसान राजेश श्योराण भी लिलियम के फूलों की खेती कर रहे हैं. उन्होंने सात एकड़ में लिलियम उगाया था. राजेश श्योराण के मुताबि़क पारंपरिक खेती से उन्हें ज़्यादा आमदनी नहीं हो पा रही थी. फिर उन्होंने लिलियम की खेती के बारे में सुना और फिर नेट से जानकारी इकट्ठी की. इसके बाद उन्होंने हिमाचल में जाकर लिलियम की खेती कर रहे किसानों से प्रशिक्षण लिया. उन्होंने तीन एकड़ ज़मीन में लिलियम की खेती शुरू की. इसके लिए उन्होंने लिलियम के बल्ब मंगाए. बल्ब एक तरह की गांथ होती है, जिससे तीन बार लिलियम की खेती की जा सकती है. एक बल्ब की क़ीमत 15 से 20 रुपये होती है और एक एकड़ में तक़रीबन 80 बल्ब लगाए जाते हैं.
ग़ौरतलब है कि आज के दौर में दुनियाभर में जहां फूलों की मांग दिनोदिन बढ़ रही है, ऐसे में किसान फूलों की खेती करके अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं.

फ़िरदौस ख़ान
मिट्टी हमें पर्यावरण का एक अहम हिस्सा है. मिट्टी के बिना ज़िन्दगी का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता. हमारी ज़िन्दगी के लिए जो चीज़ें बेहद ज़रूरी हैं, वे हमें मिट्टी से ही तो मिलती हैं, जैसे अनाज, सब्ज़ियां, फल, फूल, औषधियां, लकड़ी वग़ैरह-वग़ैरह. लेकिन मिट्टी की गौणवत्ता, उसका उपजाऊपन ख़त्म होता जा रहा है. उपजाऊ शक्ति के लगातार क्षरण से भूमि के बंजर होने की समस्या ने आज विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है. सूखा, बाढ़, लवणीयता, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल और अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर में गिरावट आने से सोना उगलने वाली उपजाऊ धरती मरुस्थल का रूप धारण करती जा रही है.

इस वक़्त दुनिया की आबादी तक़रीबन सात अरब है, जो 2050 तक नौ अरब हो जाएगी. ज़ाहिर है, अगले चार दशकों में धरती पर दो अरब लोग बढ़ जाएंगे, लेकिन भूमि सीमित होने की वजह से लोगों को उतना अनाज नहीं मिल पाएगा, जितने की उन्हें ज़रूरत होगी. ऐसे में खाद्यान्न संकट पैदा होगा. दुनिया की कुल ज़मीन का सिर्फ़ 11 फ़ीसद हिस्सा ही उपजाऊ है. संयुक्त राष्ट्र ने भी बढ़ते मरुस्थलीकरण पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा है कि अगर रेगिस्तान के फैलते दायरे को रोकने के लिए विशेष क़दम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वक़्त में अनाज का संकट पैदा हो जाएगा. इसके मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र ने 2010-20 को मरुस्थलीकरण विरोधी दशक के तौर पर मनाने का फैसला किया. हमारे देश में भी उपजाऊ भूमि लगातार बंजर हो रही है. भारत में दुनिया की कुल आबादी का 16 फ़ीसद हिस्सा है, जबकि इसकी भूमि विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्र का महज़ दो फ़ीसद है. जिस तरह मध्य एशिया के गोबी मरुस्थल से उड़ी धूल उत्तर चीन से लेकर कोरिया के उपजाऊ मैदानों को ढंक रही है, उसी तरह थार मरुस्थल की रेत उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों को निग़ल रही है. अरावली पर्वत काफ़ी हद तक धूल भरी आंधियों को रोकने का काम करता है, लेकिन अंधाधुंध खनन की वजह से इस पर्वतमाला को नुक़सान पहुंच रहा है, जिससे यह धूल भरी आंधियों को पूरी तरह नहीं रोक पा रही है. इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले मरुस्थल राजस्थान के थार तक ही सीमित था, लेकिन अब यह देश के सबसे बड़े अनाज उत्पादक राज्यों हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक फैलने लगा है. 1996 में थार मरुस्थल का क्षेत्र 1.96 लाख वर्ग किलोमीटर था, जो अब बढ़कर 2.08 लाख वर्ग किलोमीटर हो गया है.

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक अनुमान के मुताबिक़, देश में कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर ज़मीन में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हज़ार हेक्टेयर भूमि बंजर है. मध्य प्रदेश में दो करोड़ एक लाख 42 हेक्टेयर ज़मीन बंजर है, जबकि राजस्थान में एक करोड़ 99 लाख 34 हेक्टेयर ज़मीन बंजर है. महाराष्ट्र में एक करोड़ 44 लाख हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में एक करोड़ 14 लाख 16 हज़ार हेक्टेयर, कर्नाटक में 91 लाख 65 हज़ार हेक्टेयर, उत्तर प्रदेश में 80 लाख 61 हज़ार हेक्टेयर, गुजरात में 98 लाख 36 हज़ार हेक्टेयर, उड़ीसा में 63 लाख 84 हज़ार हेक्टेयर, बिहार में 54 लाख 58 हज़ार हेक्टेयर, पश्चिम बंगाल में 25 लाख 36 हज़ार हेक्टेयर, हरियाणा में 24 लाख 78 हज़ार हेक्टेयर, असम में 17 लाख 30 हज़ार हेक्टेयर, हिमाचल प्रदेश में 19 लाख 78 हज़ार हेक्टेयर, जम्मू-कश्मीर में 15 लाख 65 हज़ार हेक्टेयर, केरल में 12 लाख 79 हज़ार हेक्टेयर, पंजाब में 12 लाख 30 हज़ार हेक्टेयर, मणिपुर में 14 लाख 38 हज़ार हेक्टेयर, मेघालय में 19 लाख 18 हज़ार हेक्टेयर और नागालैंड में 13 लाख 86 हज़ार हेक्टेयर भूमि बंजर है. अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (एसएसी) ने 17 अन्य राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर मरुस्थलीकरण और भूमि की गुणवत्ता के गिरते स्तर पर देश का पहला एटलस बनाया है. इसके मुताबिक़, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का तक़रीबन 25 फ़ीसद हिस्सा मरुस्थल में तब्दील हो चुका है, जबकि 32 फ़ीसद भूमि की गुणवत्ता कम हुई है. इसके अलावा देश के 69 फ़ीसद हिस्से को शुष्क क्षेत्र के तौर पर वर्गीकृत किया गया है.

ग़ौरतलब है कि देश में हर साल 600 करोड़ टन मिट्टी कटाव की वजह से बह जाती है, जबकि अच्छी पैदावार योग्य भूमि की एक सेंटीमीटर मोटी परत बनने में तक़रीबन तीन सौ साल लगते हैं. उपजाऊ मिट्टी की बर्बादी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर साल 84 लाख टन पोषक तत्व बाढ़ आदि की वजह से बह जाते हैं. इसके अलावा कीटनाशकों की वजह से हर साल एक करोड़ चार लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की उपजाऊ शक्ति ख़त्म हो रही है. बाढ़, लवणीयता और क्षारपन आदि की वजह से हर साल 270 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का बंजर होना भी निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है. अत्यधिक दोहन की वजह से भू-जल स्तर में गिरावट आने से भी बंजर भूमि के क्षेत्र में बढ़ोतरी हो रही है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले पांच दशकों में भू-जल के इस्तेमाल में 125 गुना वृद्धि हुई है. पहले एक तिहाई खेतों की सिंचाई भू-जल से होती थी, लेकिन अब तक़रीबन आधी कृषि भूमि की सिंचाई के लिए किसान भू-जल स्तर पर ही निर्भर हैं. 1947 में देश में एक हज़ार ट्यूबवेल थे, जो 1960 में बढ़कर एक लाख हो गए. व़क्त के साथ इनकी तादाद में लगातार इज़ा़फा होता गया. अब इनकी तादाद दो करोड़ दस लाख है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

दिलचस्प बात यह भी है कि सरकारी आंकड़ों में बंजर भूमि लगातार कम होती जा रही है. ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) के मुताबिक़, 1986 से 2000 के बीच पांच चरणों में चलाई गई परियोजना के ज़रिए देश में 6.38 करोड़ हेक्टेयर बंजर ज़मीन आकलित की गई थी. 2003 में किए गए आकलन के मुताबिक़, देश में बंजर ज़मीन घटकर 82 लाख हेक्टेयर कम हो गई. इसके बाद 2005-06 में उपग्रह मैपिंग के ज़रिए तैयार की गई रिपोर्ट में बंजर ज़मीन 84 लाख हेक्टेयर और घटकर 4.72 करोड़ हेक्टेयर रह गई. अधिकारियों का मानना है कि बंजर ज़मीन के क्षेत्रफल में इस कमी की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारे पास तीनों मौसमों में ज़मीन के उपजाऊपन के तुलनात्मक आंकड़े मौजूद नहीं हैं. ज़मीन का कोई टुकड़ा जो गर्मियों में अनुपजाऊ दिखता है, वही मानसून में हरा दिखाई देता है, जबकि सर्दी के मौसम में इसी ज़मीन का रंग अलग नज़र आता है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक़, देश की मौजूदा बंजर ज़मीन में 50 फ़ीसद भूमि ऐसी है, जिसे समुचित रूप से विकसित कर उपजाऊ बनाया जा सकता है. यह असुरक्षित ग़ैर-वनेतर भूमि है, जो अत्यधिक दबाव की वजह से प्रभावित हुई है. बंजर भूमि के उन्मूलन के लिए केंद्र सरकार ने 1992 में ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत बंजर भूमि विकास विभाग का गठन किया था. बाद में इसका पुनर्गठन कर इसका नाम बदल कर भूमि संसाधन विभाग रखा गया. इसके बाद ज़मीन के अतिक्रमण की समस्या को हल करने और ईंधन लकड़ी एवं चारे की लगातार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के तहत 1985 में राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड का गठन किया गया. सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड द्वारा अपनाई गई कार्य नीति में बंजर भूमि के विकास के लिए सामुदायिक भागीदारी की बजाय पौधारोपण पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया. इसके बाद 1992 में ग्रामीण विकास मंत्रालय (तत्कालीन ग्रामीण क्षेत्र एवं रोज़गार मंत्रालय) के तहत एक नये विभाग का गठन किया गया और राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड को उसके अधीन रखा गया. अगस्त, 1992 में बोर्ड का पुनर्गठन किया गया और विकास के हर स्तर पर स्थानीय लोगों को शामिल करके वनेतर क्षेत्रों में मुख्यत: बंजर भूमि को समग्र रूप में विकसित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. इसका मक़सद एक ऐसा परिदृश्य सृजित करना है, जिसमें सरकार सुविधा मुहैया कराने वाले के रूप में और लोग ज़मीनी स्तर पर कार्यक्रम के वास्तविक संचालक के तौर काम कर सकें. ग़रीबी, पिछड़ापन एवं स्त्री-पुरुष असमानता आदि के मद्देनज़र बंजर और अतिक्रमित भूमि की उत्पादकता में सुधार लाने के लिए कार्यान्वित किए गए समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम के वे नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं, जो आने चाहिए.

बढ़ती आबादी की रिहायशी और अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पिछले पांच दशकों में हरित वनीय क्षेत्र और पेड़-पौधों को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया गया है. वन्य इलाक़ों में वृक्षों को काटकर वहां बस्तियां बसा ली गईं. फ़र्नीचर और ईंधन आदि के लिए हरे-भरे वृक्षों को काट डाला गया. आदिवासी इलाक़े छोटे गांवों और गांव शहरों में तब्दील होने लगे. शहर महानगर बन रहे हैं. ऐसे में इंसान की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन किया गया. नतीजतन, प्राकृतिक चीज़ें, मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित होने लगीं. इसका सीधा असर इंसान की सेहत पर भी पड़ा है. बहरहाल, धरती के मरुस्थलीकरण और मिट्टी की ऊपरी परत के क्षरण को रोकने के कई तरीक़े हैं, जैसे पौधारोपण और बेहतर जल प्रबंधन. पौधारोपण के ज़रिए मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है, वहीं बेहतर जल प्रबंधन करके अत्यधिक भू-जल दोहन पर रोक लगाई जा सकती है. इसके अलावा यह कोशिश भी करनी चाहिए कि कृषि योग्य भूमि को किसी अन्य काम में इस्तेमाल न किया जाए. देखने में आ रहा है कि कृषि योग्य भूमि पर कॉलोनियां बसाई जा रही हैं, उद्योग लगाए जा रहे हैं.

पूरी दुनिया मरुस्थीकरण की समस्या से जूझ रही है. इससे निपटने के लिए विश्व स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं. स्टॊकहोम सम्मेलन 1972 से प्रेरणा लेकर पूरी दुनिया में 1992 में रियो में जैवविविधता, जलवायु परिवर्तन और मरुस्थीकरण के विषय पर एकजुटता प्रकट की थी। पृथ्वी शिखर वार्ता के दौरान जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता और मरुस्थीकरण का मुकाबला (यूएनसीसीडी) जैसे तीन महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंज़ूर किया था। ग़ौरतलब है कि 17 जून को मरुस्थीकरण का मुक़ाबला करने के दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 17 जून, 1994 को अपनाया था. इसके बाद दिसम्बर, 1996 में इसे मंज़ूर किया गया। 14 अक्टूबर, 1994 को भारत ने यूएनसीसीडी पर हस्ताक्षर किए थे। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय इसका नोडल मंत्रालय है। साल 1995 से मरुस्थीकरण का मुक़ाबला करने के लिए विश्व दिवस मनाया जाता है, ताकि लोगों को इस संबंध में जागरूक किया जा सकें और सूखे की स्थिति तथा भूमि के बंजर होने से रोकने के लिए संघर्ष किया जा सके। इसका मक़सद मरुस्थीकरण से लड़ना और सूखे के असर को कम करना है.

मरुस्थीकरण से मुक़ाबले के लिए एक जनआंदोन की ज़रूरत है. हम सभी को अपनी ज़िम्मेदारी को बख़ूबी समझना होगा. हमें ये याद रखना होगा कि हमारी ज़िन्दगी उपजाऊ ज़मीन से जुड़ी हुई है. उपजाऊ ज़मीन की बदौलत ही हमें भोजन मिलता है, जिसके बिना जीवन असंभव है. इसीलिए हर हाल में ज़मीन को बंजर होने से बचाना ही होगा. 

फ़िरदौस ख़ान
कविता अपने ख़्यालात, अपने जज़्बात को पेश करने का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़रिया है. प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को बहुत ज़रूरी माना जाता था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद और अलंकारों से आज़ाद हो गईं. कविताओं में छंदों और अलंकारों की अनिवार्यता ख़त्म हो गई और नई कविता का दौर शुरू हुआ. दरअसल, कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है. रस को कविता की आत्मा माना जाता है. कविता के अवयवों में आज भी इसकी जगह सबसे अहम है. आज मुक्त छंद कविताओं की नदियां बह रही हैं. मुक्तछंद कविताओं में पद की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ़ एक भाव प्रधान तत्व रहता है. आज की कविता में मन में हिलोरें लेने वाले जज़्बात, उसके ज़ेहन में उठने वाले ख़्याल और अनुभव प्रभावी हो गए और छंद लुप्त हो गए. मगर इन कविताओं में एक लय होती है, भावों की लय, जो पाठक को इनसे बांधे रखती है. शौकत हुसैन मंसूरी की ऐसी ही कविताओं का एक संग्रह है-‘कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का’. इसे राजस्थान के उदयपुर के अंकुर प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.  इस कविता संग्रह में एक गीत और कुछ क्षणिकाएं भी हैं. 

बक़ौल शौकत हुसैन मंसूरी हृदय में यदि कोई तीक्ष्ण हूक उठती है.एक अनाम-सी व्यग्रता सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर छाई रहती है और कुछ कर गुज़रने की उत्कट भावना हमारी आत्मा को झिंझोड़ती रहती है. ऐसी परिस्थिति में, कितना ही दीर्घ समय का अंतराल हमारी रचनाशीलता में पसर गया हो, तब भी अवसर मिलते ही, हृदय में एकत्रित समस्त भावनाएं, विचार और संवेदनाएं अपनी सम्पूर्णता से अभिव्यक्त होती ही हैं. सिर्फ़ ज्वलंत अग्नि पर जमी हुई राख को हटाने मात्र का अवसर चाहिए होता है. तदुपरांत प्रसव पीड़ा के पश्चात जो अभिव्यक्ति का जन्म होता है. वह सृजनात्मक एवं गहन अनुभूति का सुखद चरमोत्कर्ष होता है. यह काव्य संग्रह ऐसी ही प्रसव पीड़ा के पश्चात जन्मा हुआ अभिव्यक्ति का संग्रह है. 

उनकी कविताओं में ज़िंदगी के बहुत से रंग हैं. अपनी कविता ‘आत्महन्ता’ में जीवन के संघर्ष को बयां करते हुए वे कहते हैं-
विपत्तियां क्या हैं
रहती हैं आती-जातीं
सारा जीवन ही यूं
भरा होता है संघर्षों से...

बदलते वक़्त के साथ रिश्ते-नाते भी बदल रहे हैं. इन रिश्तों को कवि ने कुछ इस अंदाज़ में पेश किया है-
रिश्तों की अपनी-अपनी
होती है दुनिया
कुछ रिश्ते होते हैं दिल के
क़रीब और कुछ सिर्फ़
होते हैं निबाहने की ख़ातिर...
कविताओं में मौसम से रंग न हों, ऐसा भला कहीं होता है. दिलकश मौसम में ही कविताएं परवान चढ़ती हैं. कवि ने फागुन के ख़ुशनुमा रंग बिखेरते हुए कहा है-
खिल गए हैं फूल सरसों के
पड़ गया है दूध
गेहूं की बाली में
लगे बौराने आम
खट्टी-मीठी महक से बौरा गए वन-उपवन

कवि ने समाज में फैली बुराइयों पर भी कड़ा प्रहार किया है, वह चाहे महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध हों, भ्रष्टाचार हो, सांप्रदायिकता का ज़हर हो, भीड़ द्वारा किसी को भी घेरकर उनका सरेआम बेरहमी से क़त्ल कर देना हो, रूढ़ियों में जकड़ी ज़िदगियां हों, या फिर दरकती मानवीय संवेदनाएं हों. सभी पर कवि ने चिंतन किया है. इतना ही नहीं, कवि ने  निराशा के इस घने अंधकार में भी आस का एक नन्हा दीया जलाकर रखा है. कवि का कहना है-
ज़िन्दगी में फैले अंधेरे को
मिटाने का आत्म विश्वास इंसानों को
स्वयं पैदा करना होता है     

बहरहाल, भावनाओं के अलावा काव्य सृजन के मामले में भी कविताएं उत्कृष्ट हैं. कविता की भाषा में प्रवाह है, एक लय है. कवि ने कम से कम शब्दों में प्रवाहपूर्ण सारगर्भित बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि को अच्छे से मालूम है कि उसे अपनी भावनाओं को किन शब्दों में और किन बिम्बों के माध्यम से प्रकट करना है. और यही बिम्ब विधान पाठक को स्थायित्व प्रदान करते हैं. कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीक़े से पेश किया गया है, जिससे कविता का अर्थ पाठक को सहजता से समझ आ जाता है. पुस्तक का आवरण सूफ़ियाना है, जो इसे आकर्षक बनाता है. काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का
कवि : शौकत हुसैन मंसूरी
प्रकाशक : अंकुर प्रकाशन, उदयपुर (राजस्थान)
पेज : 112
मूल्य : 150 रुपये

फ़िरदौस ख़ान
देश में तीन हज़ार सालों से नारियल उगाया जा रहा है. भारत के अलावा लंका, फ़िलीपींस, इंडोनीशिया, मलेशिया और दक्षिण सागर के द्वीपों, अमेरिका के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों और प्रशांत महासागर के उष्ण द्वीपों में नारियल का उत्पादन होता है. दुनिया भर में नारियल के उत्पादन में भारत दूसरे स्थान पर है. देश के कई राज्यों की 16 लाख एकड़ भूमि में नारियल की खेती होती है. इनमें केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, अरब सागर, लक्षदीव और बंगाल की खाड़ी के अंडमान एवं निकोबार द्वीप शामिल हैं. बिहार, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी अब नारियल की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है.

दक्षिण भारत के राज्यों केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भरपूर नारियल होता है.  देश का फ़ीसद नारियल इन्हीं चार दक्षिणी प्रदेशों से मिलता है. नारियल का पेड़ तक़रीबन 80 सौ साल तक ज़िन्दा रहता है. यह सालाना 50 से 100 फल देता है. देश में नारियल की उत्पादकता 830 नारियल प्रति हेक्टेयर है. नारियल की खेती के लिए 100 से 150 सेंटीमीटर वर्षा अच्छी मानी जाती है. जहां का सालाना तापमान परिसर 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता हो यानी 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे न जाता हो, वह जगह इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम है. जहां सूरज की रौशनी में तेज़ी हो और 70 फ़ीसद से ज़्यादा आर्द्रता हो, वहां पर नारियल की खेती नहीं की जा सकती है. नारियल की खेती कई क़िस्म की मिट्टी में का जाती है, लेकिन जल निकास वाली रेतीली दोमट भूमि ख़ासकर समुद्र किनारे की मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी मानी जाती है. अमूमन नारियल की क़िस्में दो तरह की हैं, ऊंची और बौनी. ऊंची क़िस्मों को नारियल के साथ-साथ खोपरा और नारियल तेल के लिए उगाया जाता है, जबकि बौनी क़िस्में सजावटी पौधों के लिए उगाई जाती हैं. इन बौनी क़िस्मों में हरे, पीले और नारंगी रंग के फल लगते हैं. अमूमन इसकी रोपाई मानसून से पहले मई में करना अच्छा रहता है.  जिन इलाक़ों में सिंचाई के पर्याप्त साधन हैं, वहां अप्रैल में रोपण किया जा सकता है. निचले इलाक़ों में सितम्बर में भारी बारिश के मौसम के बीतने पर रोपाई करनी चाहिए.

देश की अर्थव्यवस्था में नारियल क्षेत्र सात हज़ार करोड़ रुपये का योगदान कर रहा है. एक करोड़ से ज़्यादा लोग नारियल से जुड़े रोज़गार में लगे हैं.
देश-विदेश में नारियल की भारी मांग है. नारियल को पवित्र माना जाता है. ये पूजा और कई तरह के धार्मिक कर्मकांडों में भी इस्तेमाल किया जाता हैं. नारियल का पानी पीने के काम में आता है. कच्चे और पक्के दोनों ही तरह के नारियल का मिठाइयों और पकवानों में इस्तेमाल होता है. नारियल के रेशों से गद्दे, थैले और भी कई तरह की चीज़ें बनाई जाती हैं. नारियल से बनी चीज़ों का एक बड़ा बाज़ार है. इनके निर्यात से देश को तक़रीबन 470 करोड़ रुपये की आमदनी होती है.

नारियल की खेती को बढ़ावा देने के लिए अंग्रेज़ी शासन काल यानी साल 1945 में भारतीय केंद्रीय नारियल समिति का गठन किया गया था. तब से इसे प्रोत्साहन देने का काम जारी है. नारियल उत्पादकों को उनकी फ़सल के सही दाम दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने साल 2004 में कई योजनाएं शुरू की थीं. इनमें गुणवत्ता रोपण सामग्री का उत्पादन एवं वितरण, नारियल के तहत क्षेत्र विस्तार, उत्पादकता सुधारने के लिए एकीकृत खेती, केंद्रीय क्षेत्र स्कीम, नारियल प्रौद्योगिकी मिशन का कार्यान्वयन,  देश के परम्परागत नारियल उगाने वाले राज्यों में नारियल के बाग़ों की पुन: रोपाई और नवीकरण, सिफ़ारिश की गई पद्धतियों का प्रौद्योगिक प्रदर्शन, बाज़ार संवर्धन और सूचना प्रसार शामिल हैं.  देश में नारियल की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए संकर प्रजातियों की नई क़िस्में ईजाद की जा रही हैं. नारियल की संकर प्रजाति बीएचसी-3 विकसित करना देश के लिए एक बड़ी कामयाबी है. देश में एक दर्जन से ज़्यादा संकर प्रजातियां विकसित की जा चुकी है, जिनसे उत्पादकता में 80 फ़ीसद तक की बढ़ोतरी हुई है.

नारियल विकास बोर्ड (सीबीडी) द्वारा बेरोज़गार लोगों को नारियल और इसकी देखभाल से जुडे विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाता है.  इन्हें नारियल मित्र कहा जाता है, जो पौधा-रोपण से लेकर नारियल की खेती के विभिन्न चरणों का ध्यान रखते हैं. यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 17 अगस्त, 2011 में शुरू हुआ था. छह दिन के इस प्रशिक्षण के साथ प्रशिक्षार्थी को दैनिक भत्ता, पेड़ों पर चढ़ने की मशीन और दो पोशाकें मुफ़्त दी जाती हैं. ग़ौरतलब है कि नारियल विकास बोर्ड देश में नारियल की खेती और उद्योग के समेकित विकास के लिए कृषि मंत्रालय के अंतर्गत स्थापित एक सांविधिक निकाय है.

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों पर कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने 2016 सीज़न के लिए खोपरा के न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) को अपनी मंज़ूरी दे दी है. यह फ़ैसला कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफ़ारिशों पर आधारित है. सीएसीपी, जो एक विशेषज्ञ निकाय है, एमएसपी के लिए अपनी सिफ़ारिशें पेश करने से पहले उत्पादन से जुड़े विभिन्न संसाधनों जैसे भूमि एवं जल के तर्कसंगत उपयोग को सुनिश्चित करने के अलावा उत्पादन लागत, मांग-आपूर्ति की समग्र स्थिति, घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों, खोपरा को नारियल तेल में परिवर्तित करने की लागत और शेष अर्थव्यवस्था पर मूल्य नीति के असर को भी ध्यान में रखता है.
उचित औसत गुणवत्ता वाले ‘मिलिंग खोपरा’ के न्यूनतम समर्थन मूल्य को 2016 सीज़न के लिए बढ़ाकर प्रति क्विंटल 5950 रुपये कर दिया गया है, जबकि साल 2015 में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रति क्विंटल 5550 रुपये था. इसी तरह ‘बॉल खोपरा’ के न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी 2016 सीज़न के लिए बढ़ाकर प्रति क्विंटल 6240 रुपये कर दिया गया है, जो साल 2015 में प्रति क्विंटल 5830 रुपये था. खोपरा के न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसानों को उपयुक्त न्यूनतम मूल्य मिलना सुनिश्चित होने की उम्मीद है. इसी तरह खोपरा के न्यूनतम समर्थन मूल्य से नारियल की खेती में निवेश बढ़ने और इसकी बदौलत उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ने की भी उम्मीद है.
भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (नेफ़ेड) और भारतीय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ लिमिटेड (एनसीसीएफ़) नारियल उत्पादक राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्यों से जुड़े मूल्य समर्थन परिचालन के लिए आगे भी प्रमुख केन्द्रीय एजेंसियों के तौर पर काम करते रहेंगे.

फ़िरदौस ख़ान
मखाने की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. जिन किसानों की ज़मीन बंजर होने और जलभराव की वजह से बेकार पड़ी थी, और किसान दाने-दाने को मोहताज हो गए थे. अब वही किसान अपनी बेकार पड़ी ज़मीन में मखाने की खेती कर ख़ुशहाल ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं. इस काम में उनके परिवार की महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर तरक्क़ी की राह पर आगे बढ़ रही हैं. बहुत सी महिलाओं ने ख़ुद ही तालाब पट्टे पर लेकर मखाने की खेती शुरू कर दी है. उन्हें मखाने की बिक्री के लिए बाज़ार भी जाना नहीं पड़ता. कारोबारी ख़ुद उनके पास से उपज ले जाते हैं. ये सब किसानों की लगन और कड़ी मेहनत से ही मुमकिन हो पाया है.

ग़ौरतलब है कि देश में तक़रीबन 20 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र में मखाने की खेती होती है. कुल उत्पादन में से 80 फ़ीसद अकेले बिहार में होता है. बिहार में भी सबसे ज़्यादा मखाने का उत्पादन मिथिलांचल में होता है. इसके अलावा पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, जम्मू-कश्मीर, मणीपुर, मध्यप्रदेश, राजस्थान और नेपाल के तराई वाले इलाक़ों में भी मखाने की खेती होती है. अब उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद के किसान भी मखाने की खेती कर रहे हैं. इसके लिए दरभंगा से बीज लाए जाते हैं. मिथिलांचल में छोटे-बड़े तालाब सालभर मखानों की फ़सल से गुलज़ार रहते हैं. मखाना की उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशिया चीन से हुई है. भारत के अलावा चीन, जापान और कोरिया में भी इसकी खेती होती है. मखाने की खेती की ख़ासियत यह है कि इसमें लागत ज़्यादा नहीं आती. खेती के लिए तालाब और पानी की ज़रूरत होती है. ज़्यादा गहरे तालाब की ज़रूरत भी नहीं होती. बस दो से तीन फ़ीट गहरा तालाब ही इसके लिए काफ़ी रहता है. जिन इलाक़ों में अच्छी बारिश होती है और पानी के संसाधन मौजूद हैं, वहां इसकी खेती ख़ूब फलती-फूलती है. यूं तो मखाने की खेती दिसंबर से जुलाई तक ही होती है, लेकिन अब कृषि की नित-नई तकनीकों और उन्नत क़िस्म के बीजों की बदौलत किसान साल में मखाने की दो फ़सलें भी ले रहे हैं. यह नक़दी फ़सल है, जो तक़रीबन पांच माह में तैयार हो जाती है और यह बेकार पड़ी ज़मीन और सालों भर जलमग्न रहने वाली ज़मीन में उगाया जा सकता हैं.

मखाने की खेती ठहरे हुए पानी में यानी तालाबों और जलाशयों में की जाती है.  एक हेक्टेयर तालाब में 80 किलो बीज बोये जाते हैं. मखाने की पहचान पानी की सतह पर फैले गोल कटीले पत्ते से की जाती है. मखाने की बुआई दिसंबर-जनवरी तक की जाती है. मखाने की बुआई से पहले तालाब की सफ़ाई की जाती है. पानी में से जलकुंभी अ अन्य जलीय घास को निकाल दिया जाता है, ताकि मखाने की फ़सल इससे प्रभावित न हो. अप्रैल माह तक तालाब कटीले पत्तों से भर जाता है. इसके बाद मई में इसमें नीले, जामुनी, लाल और गुलाबी रंग के फूल खिलने लगते हैं, जिन्हें नीलकमल कहा जाता है. फूल दो-चार दिन में पानी में चले जाते हैं. इस बीच पौधों में बीज बनते रहते हैं. जुलाई माह तक इसमें मखाने लग जाते हैं. हर पौधे में 10 से 20 फल लगते हैं. हर फल में तक़रीबन 20 बीज होते हैं. दो-तीन दिन में फल पानी की सतह पर तैरते रहते हैं और फिर तालाब की तलहटी में बैठ जाते हैं. फल कांटेदार होते हैं और एक-दो महीने का वक़्त कांटो को गलने में लग जाता है. सितंबर-अक्टूबर महीने में किसान पानी की निचली सतह से इन्हें इकट्ठा करते हैं और बांस की छपटियों से बने गांज की मदद से इन्हें बाहर निकालते हैं. फिर इनकी प्रोसेसिंग का काम शुरू किया जाता है. पहले बीजों को रगड़ कर इनका ख़ोल उतार दिया जाता है. इसके बाद इन्हें भूना जाता है और भूनने के बाद लोहे की थापी से फोड़ कर मखाना निकाला जाता है. यह बहुत मेहनत का काम है. अकसर किसान के परिवार की महिलाएं ही ये सारा काम करती हैं.

पहले किसान मखाने की खेती को घाटे की खेती मानते थे. लेकिन जब उन्होंने कुछ किसानों को इसकी खेती से मालामाल होते देखा, तो उनकी सोच में भी बदलाव आया. जो तालाब पहले बेकार पड़े रहते थे, अब फिर उनमें मखाने की खेती की जाने लगी. इतना ही नहीं, किसानों ने नये तालाब भी खुदवाये और खेती शुरू की. बिहार के दरभंगा ज़िले के गांव मनीगाछी के नुनु झा अपने तालाब में मखाने की खेती करते हैं. इससे पहले वह पट्टे पर तालाब लेकर उसमें मखाना उगाते थे. केदारनाथ झा ने 70 तालाब पट्टे पर लिए थे. वह एक हेक्टेयर के तालाब से एक हज़ार से डेढ़ हज़ार किलो मखाने का उत्पादन कर रहे हैं. उनकी देखादेखी उनके गांव व आसपास के अन्य गांवों के किसानों ने भी मखाने की खेती शुरू कर दी. मधुबनी, सहरसा, सुपौल अररिया, कटिहार और पूर्णिया में भी हज़ारों किसान मखाने की खेती कर अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं. यहां मखाने का उत्पादन 400 किलोग्राम प्रति एकड़ हो गया है.

ख़ास बात यह भी है कि किसान अब बिना तालाब के भी अपने खेतों में मखाने की खेती कर रहे हैं.
बिहार के पूर्णिया ज़िले ले किसानों ने खेतों में ही मेड़ बनाकर उसमें पानी जमा किया और मखाने की खेती शुरू कर दी. सरवर, नौरेज़, अमरजीत और रंजीत आदि किसानों का कहना है कि गर्मी के मौसम में खेतों में पानी इकट्ठा रखने के लिए उन्हें काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है, लेकिन उन्हें फ़ायदा भी ख़ूब हो रहा है. बरसात होने पर उनके खेत में बहत सा पानी जमा हो जाता है.

मखाने को मेवा में शुमार किया जाता है. दवाओं, व्यंजनों और पूजा-पाठ में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. अरब और यूरोपीय देशों में भी इसकी ख़ासी मांग है. दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता के बाज़ार मे मखाने चार सौ रुपये किलोग्राम तक बिक रहे हैं.

सरकार भी मखाने की खेती को प्रोत्साहित कर रही है. पहले पानी वाली ज़मीन सिर्फ़ 11 महीने के लिए ही पट्टे पर दी जाती थी, लेकिन अब सात साल के लिए पट्टे पर दी जाने लगी है. मखाने की ख़रीद के लिए विभिन्न शहरों में केंद्र भी खोले गए हैं, जिनमें किसानों को मखाने की वाजिब क़ीमत मिल रही है. ख़रीद एजेंसियां किसानों को उनके उत्पाद का वक़्त पर भुगतान भी कर रही हैं. बैंक भी अब मखाना उत्पादकों को क़र्ज़ दे रहे हैं. इससे पहले किसानों को अपनी फ़सल औने-पौने दाम में बिचौलियों को बेचनी पड़ती थी. पटना के केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र में मखाने की प्रोसेसिंग को व्यवस्था की गई है. इसके अलावा निजी स्तर पर कई भी इस तरह की कोशिशें की जा रही हैं. एक कारोबारी सत्यजीत ने 70 करोड़ की लागत से पटना में प्रोसेसिंग यूनिट लगाई है. उनका बिहार के आठ ज़िलों के चार हज़ार से भी ज़्यादा किसानों से संपर्क है. उन्होंने ‘सुधा शक्ति उद्योग‘ और ‘खेत से बाज़ार‘ तक केंद्र बना रखे हैं.

सरकार बेकार और अनुपयोगी ज़मीन पर मखाने की खेती करने की योजना चला रही है. सीवान ज़िले में एक बड़ा भू-भाग सालों भर जलजमाव की वजह से बेकारहो चुका है, जहां कोई कृषि कार्य नहीं हो पाता. कई किसानों की ज़्यादातर ज़मीन जलमग्न है,  जिसकी वजह से वे भुखमरी के कगार पर हैं. कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबि़क ज़िले में पांच हज़ार हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन बेकार पड़ी है. इस अनुपयुक्त ज़मीन पर मखाना उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की योजना है, जिससे उनकी समस्या का समाधान संभव होगा और वे आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे. मखाना उत्पादन के साथ ही इस प्रस्तावित जगह में मछली उत्पादन भी किया जा सकता है. मखाना उत्पादन से जल कृषक को प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 55 हज़ार रुपये की लागत आती है. इसकी गुर्री बेचने से 45 से 50 हज़ार रुपये का मुनाफ़ा होता हैं. इसके अलावा लावा बेचने पर 95 हज़ार से एक लाख रुपये प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ होता है. इतना ही नहीं, मछली उत्पादन और मखाने की खेती एक-दूसरे से अन्योनाश्रय  रूप से संबद्ध है, जो संयुक्त रूप से आय का एक बड़ा ज़रिया है. मखाने की खेती की एक ख़ास बात यह भी है कि एक बार उत्पादन के बाद वहां दुबारा बीज डालने की ज़रूरत नहीं होती है.

कृषि वैज्ञानिक मखाने की खेती को ख़ूब प्रोत्साहित कर रहे हैं. इसके लिए नये उन्नत बीजों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. कृषि वैज्ञानिक मखाने की क़िस्म सबौर मखाना-1 को बढ़ावा दे रहे हैं. पिछले साल हरदा बहादुपुर के 25 किसानों से सबौर मखाना-1 की खेती करवाई गई थी, जो कामयाब रही. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे किसान को कम से कम 20 फ़ीसद ज़्यादा उत्पाद मिल सकता है. हरदा बहादुर के किसान मोहम्मद ख़लील के मुताबिक़ कृषि वैज्ञानिकों के कहने पर उन्होंने दो एकड़ में सबौर मखाना-1 लगाया है. इसके लिए उनको 12 किलो बीज दिया गया था.  पहले जो मखाने लगाते थे, उसके फल एक समान नहीं होते थे, लेकिन इस बीज से जो फल बने हैं वे सभी एक समान दिख रहे हैं. लगाने में लागत भी कम है.

कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन कर किसानों को मखाने की खेती की पूरी जानकारी दी जाती है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि एक बार मखाने का पौधा लगा देने से हर साल फ़सल की मिलती रहती है, लेकिन पहली फ़सल के बाद उसकी उत्पादन क्षमता घटने लगती है़. तालाब के पानी का स्तर भी तीन से चार फ़ीट रहना चाहिए. फ़सल में कीड़े न लगें, इसलिए थोड़े-थोड़े वक़्त पर इन फ़सल की जांच करते रहना चाहिए. उन्नत तरीक़े से पौधे लगाई जा सकती है, जैसे धान के बिचड़े होते हैं, ठीक उसी तरह मखाने की पौध तैयार की जाती है. बहुत से किसान इसकी पौध तैयार करके बेचते हैं.

बहरहाल, मखाने की खेती फ़ायदे की खेती है. जिनके पास बेकार ज़मीन है, वे मखाने की खेती करके अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं. इसलिए इसे आज़माएं ज़रूर.

फ़िरदौस ख़ान
देश में किसानों का रुझान खेती की उन्नत पद्धतियों की तरफ़ बढ़ा है, जिससे उन्हें ख़ासा फ़ायदा हुआ है. इज़राइल की तर्ज़ पर जल संकट से जूझते किसानों ने खेती में ड्रिप प्लॉस्टिक मल्चिंग पद्धति अपनानी शुरू कर दी है. दरअसल, मल्च प्लास्टिक की शीट है. इसे फ़सल बुआई से पहले खेत में ड्रिप सिंचाई के लिए बनाए मिट्टी के बैड या क्यारियों में बिछाया जाता है. इसके कई फ़ायदे हैं. इससे उत्पादन में 30 फ़ीसद तक बढ़ोतरी देखी गई है. पहली बार मेहनत तो लगती है, लेकिन उसके बाद किसानों को बहुत से फ़ायदे मिलते हैं. प्लास्टिक के ऊपर से सफ़ेद, सिल्वर या गोल्डन कलर का होने की वजह से वाष्पीकरण कम होता है और मिट्टी में ज़्यादा समय तक नमी बनी रहती है. ड्रिप सिंचाई से मिट्टी पर परत नहीं जमती. मिट्टी भुरभूरी होने से पौधा अच्छी तरह पनपता है. किसानों को निंदाई-गुड़ाई और कीटनाशक छिड़काव से भी निजात मिल जाती है. खाद और रसायनों का कम इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे लागत में कमी आती है. प्लास्टिक कवर की वजह से खरपतवार नहीं उगता, जिससे मेहनत बचती है. कीटनाशक भी एक ही जगह से ड्रिप के ज़रिये सीधे पौधों तक पहुंच जाता है. मिट्टी में उर्वरक लंबे अरसे तक सुरक्षित रहते हैं. इतना ही नहीं हानिकारक कीटों की आशंका भी कम होती है. सबसे ख़ास बात इससे पानी की बचत होती है. देश में 60 फ़ीसद कृषि भूमि सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर है. ऐसे में भारत के लिए यह पद्धति किसी वरदान से कम नहीं है.

मल्चिंग पद्धति से खेती के लिए सबसे पहले खेत को बखरनी कर तैयार किया जाता है. फिर एक-एक फ़ीट दूर ज़मीन से 6 इंच ऊंचे मिट्टी के पौने तीन-तीन फ़ीट चौड़े बेड बनाए जाते हैं.  एक बेड पर ड्रिप की दो नलियां लगाई जाती हैं. ऊपर चार फ़ीट चौड़ी प्लास्टिक शीट बिछा दी जाती है. इसके दोनों छोर मिट्टी से दबा दिए जाते हैं. फिर प्लास्टिक पर 8 इंच दूर छोटे-छोटे छेद कर दिए जाते हैं. इन छेदों में बीज बोये जाते हैं. यह पद्धति टमाटर, खीरा, मिर्च, तरबूज़, बैंगन सहित अन्य हाइब्रिड फ़सलों में अपनाई जाती है. इससे फल अच्छे मिलते हैं, जिससे मंडी में उनकी सही क़ीमत मिल जाती है. 

मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के गांव कुशलगढ़ के खुशालचंद पाटीदार ने 1 नवंबर 2012 को एक एकड़ ज़मीन में मल्चिंग पद्धति से लहसुन की खेती शुरू की. इससे उन्हें बहुत फ़ायदा हुआ. लहसुन में मल्चिंग का इस्तेमाल करने पर उन्हें नवंबर 2013 में कृषि विज्ञान केंद्र बेंगलुरू में सर्वश्रेष्ठ किसान के पुरस्कार से सम्मानित किया गया.  अब वह 24 एकड़ में मल्चिंग पद्धति से खेती कर रहे हैं.  उनकी देखादेखी आसपास के गांवों के किसान भी इस पद्धति से खेती करने लगे. किसानों का कहना है कि पहले एक एकड़ में 30 से 35 क्विंटल लहसुन ही पैदा होता था, अब बढ़कर 50 क्विंटल हो गया है. लहसुन की गांठ भी वज़नी और बड़े आकार की है. लहसुन की गुणवत्ता भी बेहतर है, जिससे उन्हें डेढ़ लाख रुपये प्रति एकड़ का मुनाफ़ा हो रहा है.  मल्चिंग पद्धति के प्रति किसानों के रुझान का इसी बात से अंदाज़ा लगाया का सकता है, जहां दो साल पहले इस क्षेत्र में एक एकड़ में इस पद्धति से खेती होती थी, वहीं अब इसका रक़बा बढ़कर 180 एकड़ तक पहुंच गया है.

ग़ौरतलब है कि ड्रिप प्लॉस्टिक मल्चिंग पद्धति की शुरुआत सबसे पहले इज़राइल में हुई. इज़राइल में पानी की कमी है. वहां के किसान मल्चिंग पद्धति से खेती करके पानी का सदुपयोग करते हैं. भारत के किसान इज़राइल जाकर उन्नत खेती का प्रशिक्षण लेते हैं और फिर यहां आकर ख़ुद तो इस पद्धति से खेती करते हैं, साथ ही अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं. बड़वानी ज़िले के किसान तुलसीराम यादव ने भी इज़राइल जाकर इस पद्धति का प्रशिक्षण लिया था. अब वह इसी पद्धति से खेती कर रहे हैं. उनका कहना है कि केले-टमाटर में प्रति पौधा पांच लीटर पानी की बचत हो जाती है.  सागर ज़िले के गांव कंजेरा के खेतों में मल्चिंग पद्धति से डीपीआईपी परियोजना के ज़रिये गठित समूहों की महिलाएं और किसान इस नई पद्धति से मिर्च की खेती करके अच्छी पैदावार ले रहे हैं. इसके अलावा टमाटर, करेला, लौकी, प्याज़ आदि की खेती भी की जा रही है.

राजस्थान के सीकर ज़िले में तक़रीबन एक हज़ार किसान मल्चिंग पद्धति से खेती कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस पद्धति से खेती करने पर 75 फ़ीसद तक पानी की बचत की जा सकती है. गुजरात और महाराष्ट्र सहित कई अन्य राज्यों के किसान भी इस पद्धति से खेती करके अच्छी फ़सल हासिल कर रहे हैं.

एक एकड़ कृषि भूमि में मल्चिंग करने पर 20 हज़ार रुपये तक की लागत आती है.  मल्चिंग पद्धति से खेती करने पर उद्यान विभाग द्वारा 50 फ़ीसद अनुदान दिया जाता है. जिन किसानों के पास मशीन नहीं हैं, उन्हें चार हज़ार रुपये अतिरिक्त किराये के रूप में देने होते हैं.
बहरहाल, भारत जैसे देश में मल्चिंग पद्धति के प्रचार-प्रसार की बेहद ज़रूरत है, ताकि कम पानी वाले इलाक़ों के किसान खेती से भरपूर आमदनी हासिल कर सकें.  

फ़िरदौस ख़ान
सर्दियों के मौसम में किसानों को सबसे ज्यादा जिस चीज़ का डर सताता है, वह है पाला. हर साल पाले से उत्तर भारत में फलों और सब्जियों की फसलें प्रभावित होती हैं. इससे पैदावार घट जाती है. अमूमन पाला दिसंबर और जनवरी में पड़ता है, लेकिन कभी-कभार यह फ़रवरी के पहले पखवाड़े तक भी क़हर बरपाता है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक़ तापमान गिरने से जब भूमि की ऊष्मा बाहर निकलती है और भूमि के समीप वायुमंडल का तापमान एक डिग्री से नीचे हो तो ऐसे में ओस की बूंदे जम जाती हैं, जिसे पाला कहा जाता है. जब आसमान साफ हो, हवा न चल रही हो और तापमान गिरकर 0.5 डिग्री से. तक पहुंच जाए तो पाला गिरने की संभावना बढ़ जाती है. पाला दो प्रकार का होता है, काला पाला और सफेद पाला. जब भूमि के समीप तापमान 0.5 डिग्री से कम हो जाए और पानी की बूंदे न जमें तो इसे काला पाला कहते हैं. इस अवस्था में हवा बेहद शुष्क हो जाती है और पानी की बूंदे नहीं बन पातीं. जब पाला ओस की बूंदों के रूप में होता है तो उसे सफेद पाला कहते हैं. सफ़ेद पाला ही फ़सलों को सबसे ज्यादा नुक़सान पहुंचाता है. सफेद पाला ज्यादा देर तक रहने से पौधे नष्ट हो जाते हैं. पाले के कारण पौधों की कोशिकाओं व ऊतकों में मौजूद कोशिका द्रव्य जमकर बर्फ़ बन जाता है. इससे कोशिका का द्रव्य आयतन बढ़ने से कोशिका भित्ति फट जाती है. कोशिकाओं में निर्जलीकरण होने लगता है, जिससे पौधों की जैविक क्रियाएं प्रभावित होती हैं और पौधा मर जाता है. पाला फलों में आम, पपीते व केले और सब्जियों में आलू, मटर, सरसों व अन्य कोमल पत्तियों वाली सब्ज़ियों को ज्यादा प्रभावित करता है.

फलों को पाले से बचाने के लिए कई तरीक़े अपनाए जा सकते हैं. जिस रात पाला पड़ने की संभावना हो, उस वक्त सूखी पत्तियां या उपले या पुआल आदि जलाकर बाग में धुंआ कर दें. इससे आसपास के वातावरण का तापमान बढ़ जाएगा और पाले से नुकसान नहीं होगा. धुंआ पाले को नीचे आने से भी रोकता है. फसल को पाले से बचान के लिए 10 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए. सिंचाई करने से भूमि के तापमान के साथ पौधों के तापमान में भी बढ़ोतरी होती है, जो पाले के असर को कम कर देती है. बाग में सूखी पत्तियां और घास-फूंस फैलाना देने और पेड़ों के तनों पर गोबर का लेप कर देने से भी पाले से बचाव किया जा सकता है. छोटे पौधों और नर्सरियों को पाले से बचाने उन्हें प्लास्टिक शीट से ढक देना चाहिए. इससे तापमान बढ़ जाता है. इसके अलावा सरकंडों और धान की पुआल की टाटियां बनाकर भी पौधों की पाले से रक्षा की जा सकती है. वायुरोधी टाटियां उत्तर-पश्चिम की तरफ़ बांधें. छोटे फलदार पौधों के थांवलों के चारों तरफ़ पूर्वी भाग छोड़कर टाटियां लगाकर सुरक्षा करें.

सभी प्रकार के पौधों पर गंधक के तेज़ाब का 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए. इससे न केवल पाले से बचाव होता है, बल्कि पौधों में लौह तत्व की जैविक व रासायनिक सक्रियता भी बढ़ जाती है. यह पौधों को रोगों से बचान व फसल को जल्दी पकाने का भी काम करता है. इस छिड़काव का असर एक पखवाड़े तक रहता है. इसी तरह सब्जियों की फसल को पाले से बचाने के लिए भी कई तरीके अपनाए जा सकते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात, बिजाई के वक्त ऐसे किस्मों को चुना जाना चाहिए, जो पालारोधी हों. फसल की सिंचाई करते रहना चाहिए. खेत में घासफूंस बिछाकर भी तापमान को कम होने से रोका जा सकता है. 


फ़िरदौस ख़ान
न हींग लगे, न फिटकरी और रंग चौखा. यह कहावत सनाय की खेती पर पूरी तरह से लागू होती है, क्योंकि सनाय की खेती में लागत बहुत कम आती है और आमदनी ख़ूब होती है. सबसे बड़ी बात, इसे न तो उपजाऊ ज़मीन की ज़रूरत होती है, न ज़्यादा सिंचाई जल की,  न ज़्यादा खाद की और न ही  ज़्यादा कीटनाशकों की. इसे किसी ख़ास देखभाल की भी ज़रूरत नहीं होती. तो हुआ न फ़ायदा का सौदा. इसके फ़ायदों को देखते हुए किसान सनाय की खेती करने लगे हैं. बहुत से किसानों ने सनाय की खेती करके बंजर ज़मीन को हराभरा बना दिया है. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं राजस्थान के जोधपुर के नारायणदास प्रजापति. उन्होंने बंजर ज़मीन पर सनाय की खेती की और इतनी कामयाबी हासिल कर ली कि आज उनका उद्योग भी है. उन्होंने अरब देशों से सनाय के बीज मंगवाकर इसकी खेती शुरू की थी. अब वह कई देशों में सनाय की पत्तियों का निर्यात करते हैं. शुरू में उन्हें अपनी फ़सल बेचने में परेशानी काफ़ी हुई. फिर उन्होंने ऐसे व्यापारियों को ढूंढा, जो सनाय की पत्तियां ख़रीदते हैं. जब एक बार व्यापारियों से उनका संपर्क हो गया, तो फिर उन्हें फ़सल बेचने में कोई दिक़्क़त नहीं हुई. इसके बाद उन्होंने अपना उद्योग स्थापित कर लिया. उन्होंने एक प्रशिक्षण केंद्र भी खोला, जहां किसानों को सनाय की खेती की जानकारी दी जाती है. उन्होंने सनाय पर आधारित एक संग्रहालय भी बनाया हुआ है. उनके परिवार के सदस्य भी उनका हाथ बटा रहे हैं. उनके यहां से प्रशिक्षण पाकर बहुत से किसान सनाय की खेती करने लगे हैं.

सनाय औषधीय पौधा है. इसे स्वर्णमुखी, सोनामुखी और सुनामुखी भी कहा जाता है. यह झाड़ीनुमा पौधा है. इसकी ऊंचाई 120 सेंटीमीटर तक होती है. भारत में यह अरब देश से आया और सबसे पहले तमिलनाडु में इसकी खेती शुरू हुई. इसके बाद देश के अन्य राज्यों में भी इसकी खेती शुरू हो गई. नतीजतन, आज भारत सनाय की खेती के मामले में दुनियाभर में पहले स्थान पर है. यह बहुवर्षीय पौधा है. एक बार बिजाई के बाद यह पांच साल तक उपज देता है. सनाय की ख़ासियत यह है कि यह बंजर ज़मीन में भी उगाया जा सकता है. रेतीली और दोमट भूमि इसके लिए सबसे ज़्यादा बेहतर है. लवणीय भूमि इसके लिए ठीक नहीं होती. जिस भूमि में बरसात का पानी थोड़ा भी रुकता है, उसमें सनाय नहीं उगाना चाहिए, क्योंकि वहां यह पनप नहीं पाता. इसकी जड़ें गल जाती हैं, जिससे पौधा सूख जाता है. इसे ज़्यादा सिंचाई की ज़रूरत नहीं होती. इसलिए यह बहुत कम वर्षा वाले इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. किसानों को इसकी सिंचाई पर ज़्यादा पैसे ख़र्च नहीं करने पड़ते. पौधे के बढ़ने पर इसकी जड़ें ज़मीन से पानी सोख लेती हैं. यह पौधा चार डिग्री से 50 डिग्री सैल्सियस तापमान में भी ख़ूब फलता-फूलता है. देश के शुष्क और बंजर इलाक़ों में इसकी खेती की जा सकती है. 

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक़ सनाय की बिजाई के लिए 15 जुलाई से 15 सितंबर का वक़्त अच्छा माना जाता है. इसकी बिजाई के लिए किसी ख़ास तैयारी की ज़रूरत नहीं होती. खेत में एक-दो जुताई करना ही काफ़ी है.  इसकी बिजाई एक फ़ुट की दूरी पर करनी चाहिए. सनाय की एक ख़ासियत यह भी है कि इसमें किसी भी तरह की कोई बीमारी नहीं लगती. हालांकि बरसात के मौसम में कभी-कभार इसके पत्तों पर काले धब्बे आ जाते हैं, लेकिन धूप निकलने पर ये धब्बे ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो जाते हैं. इसलिए फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है. सनाय को किसी भी तरह की ज़्यादा खाद और रसायनों की ज़रूरत नहीं होती. कीट-पतंगे और पशु-पक्षी भी इसे कोई नुक़सान नहीं पहुंचाते. इसलिए इसे किसी विशेष देखभाल की ज़रूरत नहीं होती. बिजाई के तक़रीबन सौ दिन बाद इसकी पत्तियां काटी जा सकती हैं. पौधों को ज़मीन से पांच इंच ऊपर काटना चाहिए, ताकि फिर से पौधे में पत्तियां उग सकें. कटाई वक़्त पर कर लेनी चाहिए.  दूसरी कटाई 70 दिन बाद की जा सकती है, जबकि तीसरी कटाई 60 दिन में की जा सकती है. दोबारा बिजाई के लिए इसके बीज प्राप्त करने के लिए स्वस्थ पौधों को छोड़ देना चाहिए. इनकी कटाई नहीं करनी चाहिए. इससे इनमें फलियां लग जाएंगी. पकने पर फलियां भूरे रंग की हो जाती हैं. इन फलियों को धूप में सुखाकर इनके बीज निकाल लेने चाहिए. यही बीज बाद में नई फ़सल उगाने में काम आएंगे.

पत्तियों को सुखाते वक़्त ध्यान रखना चाहिए कि इनका रंग हरा रहे. ताकि बाज़ार में इनकी अच्छी क़ीमत मिल सके. टहनियों की छोटी-छोटी ढेरियां बनाकर इन्हें छाया में सुखाना चाहिए. इनके सूख जाने पर इन्हें किसी तिरपाल पर झाड़ देना चाहिए, जिससे पत्तियां टहनी से अलग हो जाएं. फिर इन्हें बोरियों में भर देना चाहिए. अब सनाय बिक्री के लिए तैयार है. सनाय औषधीय पौधा है, इसलिए बाज़ार में इसकी ख़ासी मांग है. सनाय की पत्तियों का इस्तेमाल आयुर्वेदिक, यूनानी और एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में किया जाता है. इससे पेट संबंधी दवाएं बनाई जाती हैं. बड़े स्तर पर खेती करने पर दवा निर्माता खेत से ही सनाय की पत्तियां ख़रीद लेते हैं, जिससे किसानों को बिक्री के लिए बाज़ार जाना नहीं पड़ता. सनाय अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, चीन सहित कई देशों में निर्यात किया जाता है. इससे भारत को हर साल तीस करोड़ रुपये से ज़्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है.   

बहरहाल, जिन लोगों को कृषि की ज़्यादा जानकारी नहीं है, वे भी सनाय की खेती करके मुनाफ़ा हासिल कर सकते हैं. 

फ़िरदौस ख़ान
किसान अब पारंपरिक खाद्यान्न की फ़सलों के साथ सब्ज़ियों की फ़सलों पर भी ध्यान दे रहे हैं. जिन किसानों के खेत छोटे हैं, वे गेहूं, धान और चने की परंपरागत खेती की बजाय अब आधुनिक तकनीक के ज़रिये सब्ज़ियों और फूलों की खेती करके अच्छी ख़ासी आमदनी हासिल कर रहे हैं. टमाटर की उन्नत क़िस्मों की आधुनिक तरीक़े से खेती करके किसान मिसाल क़ायम कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश के सागर ज़िले के गांव सेमराबाग के किसान शालिक राम पटेल टमाटर की खेती करके सालाना आठ लाख रुपये तक कमा रहे हैं. पहले तीन साल पहले तक वह अपने एक एकड़ के खेत में पारंपरिक तरीक़े से बैंगन और आलू की खेती करके महज़ 60 से 70 हज़ार रुपये की कमा पाते थे. फिर उन्होंने आधुनिक खेती को अपनाया. उन्होंने उद्यानिकी विभाग की सलाह से टमाटर की खेती शुरू की. इसके लिए उन्होंने हाइब्रिड चिरायु टमाटर के बीज के पौधे तैयार किए और फिर उन्हें खेत में रोपा. खेती में ड्रिप सिंचाई, मलचिंग, स्टेकिंग जैसी अन्य आधुनिक विधियों का इस्तेमाल किया.  अब वह इसी खेत में टमाटर की खेती करके लाखों रुपये अर्जित कर रहे हैं. इसी तरह कटनी ज़िले के गांव भजिया के किसान संतोष पाल भी टमाटर की आधुनिक खेती कर लाखों रुपये कमा रहे हैं. उनके पास 16 एकड़ ज़मीन है.  पहले उनका परिवार पारंपरिक तौर पर गेहूं और धान की खेती करता था. इससे उन्हें इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि परिवार का गुज़र-बसर सही से हो सके. उन्होंने दो एकड़ में टमाटर की उन्नत क़िस्म 5005 लगाई. इसके साथ ही उन्होंने उन्नत क़िस्म के बैंगन भी फ़सल उगाई. इसके बाद उन्होंने गेंदे भी उगाए. खेती में उन्होंने जैविक खाद का इस्तेमाल किया. इससे उन्हें भरपूर फ़सल मिली. छत्तीसगढ़ के कवर्धा के गांव पंडरिया के किसान भी टमाटर की खेती करके ख़ूब मुनाफ़ा कमा रहे हैं. पहले वह परंपरागत खेती धान और चने की फ़सल उगाते थे. इससे उन्हें बहुत कम आमदनी होती थी. फिर उन्होंने राष्ट्रीय बाग़वानी मिशन के तहत मिली मदद से टमाटर की खेती शुरू की.  इससे उन्हें सालाना दो लाख रुपये तक की आमदनी होने लगी. इसी तरह  सुखचंद चंद्रवंशी ने भी परंपरागत धान और चने की खेती छोड़कर सब्ज़ियां उगाना शुरू कर दिया. इससे उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी.

माना जाता है कि टमाटर की उत्त्पति मैक्सिको और पेरू में हुई थी. वहां से यह पूरी दुनिया में फैल गया. समूचे भारत में इसकी खेती होती है. यहां यह 83 हज़ार हेक्टेयर में उगाया जाता है, जिससे तक़रीबन 790 हज़ार टन उत्पादन होता है. टमाटर की फ़सल की अवधि 60 से 120 दिन होती है. पौधे रोपण के ढाई से 3 माह बाद फल तैयार हो जाती है. मुख्य फ़सल सर्दियो में यानी दिसंबर-जनवरी में होती है. बारिश के मौसम और गर्मियों में भी टमाटर की खेती की जा सकती है. प्रति हेक्टेयर 250 से 300 क्विंटल टमाटर का उत्पादन होता है, जबकि संकर क़िस्मों से 500 से 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज ली जा सकती है. टमाटर का उत्पादन उसकी क़िस्म और मौसम के हिसाब से अलग-अलग होता है. टमाटर की खेती के लिए ऐसा मौसम ज़्यादा अच्छा होता है कि न ज़्यादा सर्दी हो और न ही ज़्यादा गर्मी. तापमान कम होने से टमाटर के पौधे मर जाते हैं और ज़्यादा गर्मी होने से पौधे झुलस जाते हैं और फल झड़ जाते हैं, यानी टमाटर की अच्छी बढ़ोतरी और फलन के लिए 21 से 23 डिग्री तापक्रम अच्छा माना जाता है. इसकी खेती के लिए जल निकास वाली ज़मीन सही रहती है. बलुई-दोमट ज़मीन टमाटर की खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है. मिट्टी का पीएच मान 6 से 7 होना उचित है.

बहरहाल, टमाटर की खेती सालभर ही होती है. जिन किसानों के पास कम ज़मीन है, वह टमाटर की उन्नत क़िस्में उगा सकते हैं. खेती में जैविक खाद का इस्तेमाल करके और खेती की आधुनिक विधियां अपनाकर ज़्यादा आमदनी हासिल कर सकते हैं. 

फ़िरदौस ख़ान
किसान अब पारंपरिक खाद्यान्न की खेती के साथ मसालों की खेती के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. जिन किसानों के पास खेती योग्य ज़मीन कम है, वे मसालों की खेती करके अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं. देश में हर साल अनुमानित 12.50 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में मसालों की खेती होती है. विभिन्न प्रकार की जलवायु के की वजह से उष्णकटिबंध क्षेत्र से उपोष्ण कटिबंध और शीतोष्ण क्षेत्र तक तक़रीबन सभी तरह के मसालों की खेती की जा रही है. संसद द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्पाइसेस बोर्ड के अधिकार-क्षेत्र के अधीन कुल 52 मसाले लाए गए हैं. हालांकि आईएसओ की सूची में 109 मसालों के नाम शामिल हैं , जिनमें ऑलस्पाइस, सौंफ़, हींग, तुलसी, बे-पत्ता, मसाले का पौधा, केम्बोज, केपर, कलौंजी, बड़ी इलायची, केसिया, सेलरी, दालचीनी, लौंग, धनिया, पुदीना, करी पत्ता, सोआ, बड़ी सौंफ, मेथी, लहसुन, महा गेलेंजा, हॊर्स रैडिश, हिस्सप, जूनिपर बेरी, कोकम लूवेज, मर्जोरम, सरसों, जायफल व जावित्री, ओरगेनो, अजमोद, पीपला, अनारदाना, ख़शख़श, रोज़मेरी, केसर, सेज, स्टार एनीज़, घोड बच, इमली, तेजपात, थाइम, वैनिला, अदरक, हल्दी, ज़ीरा, मिर्च, काली मिर्च और छोटी इलायची शामिल हैं.

दुनिया भर में भारत मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. इतना ही नहीं, मसालों की खपत और निर्यात में भी भारत सबसे आगे है.  भारत 30 से ज़्यादा देशों को मसाले निर्यात करता है. दुनियाभर की मसालों की तक़रीबन आधी यानी 48 फ़ीसद मांग हमारा देश पूरी करता है. यूं तो मसालों की खेती देश के कई राज्यों में होती है, लेकिन केरल में सबसे ज़्यादा मसालों का उत्पादन होता है. एक अंदाज़ के मुताबिक़ देश में मसालों की खपत 5.11 मिलियन टन है.  देश में तक़रीबन 60 मसालों की खेती की जाती है.

देश में जैविक मसालों की खेती भी हो रही है. यूरोप, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में जैविक मसालों की मांग लगातार बढ़ रही है. मसालों की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार इनकी खेती को प्रोत्साहित कर रही है. देश में राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसके लिए वाणिज्य मंत्रालय के अधीन एक राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन भी किया गया है. भारतीय मसाला बोर्ड को भी इसका सदस्य बनाया गया है. ग़ौरतलब है कि राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम देश में उन केंद्रों का नियमन करता है, जो जैविक उत्पादों का प्रमाणन करते हैं. फ़िलहाल देश में जैविक उत्पादों के प्रमाणन के लिए 24 केंद्र काम कर रहे हैं.

जो किसान मसालों की खेती करना चाहते हैं, बाग़वानी विभाग उन्हें हरसंभव मदद मुहैया करा रहा है. राष्ट्रीय बाग़वानी मिशन के तहत मसालों की खेती के लिए किसानों को 50 फ़ीसद का अनुदान दिया जाता है. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत फव्वारा, बूंद-बूंद सिंचाई के साथ ही अन्य पर कृषि यंत्रों पर भी अनुदान देने का प्रावधान है. मसालों की जैविक खेती के लिए किसानों को अतिरिक्त अनुदान दिया जाता है. मसालों की जैविक खेती करने वाले किसानों को लागत का 50 फ़ीसद या अधिकतम 10 हज़ार रुपये प्रति हैक्टेयर के तौर पर अनुदान दिया जाता है. कीट रोग प्रबंधन के लिए लागत का 30 फ़ीसद यानी 1200 रुपये प्रति हैक्टेयर अनुदान दिया जाता है. राष्ट्रीय बाग़वानी मिशन के तहत कोल्ड स्टोरेज पर अधिकतम चार करोड़ रुपये तक का अनुदान देने का प्रावधान है. मसालों से संबंधित प्रसंस्करण यूनिट लगाने के लिए लागत का 40 फ़ीसद और अधिकतम 10 लाख रुपये का अनुदान दिया जाता है. इसके अलावा छंटाई करने ग्रेडिंग, शॉर्टिंग के लिए 35 फ़ीसद अनुदान देने का प्रावधान है. इसकी इकाई लगाने के लिए 40 फ़ीसद अनुदान दिया जाता है. मसालों की खेती के लिए लागत का 40 फ़ीसद या अधिकतम 5500 रुपये प्रति हैक्टेयर अनुदान देने का प्रावधान है. अनुदान प्राप्त करने के लिए किसान ज़िले में मौजूद सहायक निदेशक (बाग़वानी) कार्यालय में आवेदन कर सकते हैं. हॉर्टीकल्चर कार्यालय जाकर भी बाग़वानी मिशन के तहत मसालों की खेती की समुचित जानकारी हासिल की जा सकती है.

भारतीय मसाला बोर्ड द्वारा देश में मसाला उत्पादक क्षेत्रों में मसाला पार्क स्थापित किए गए हैं. बोर्ड ने मसाला उत्पादकों की मदद के लिए उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में तीन और मसाला पार्कों की स्थापना की योजना बना रहा है. फ़िलहाल देश में छह मसाला पार्क हैं. तीन नए पार्क उत्तर प्रदेश के रायबरेली, राजस्थान के कोटा और गुजरात के ऊंझा में स्थापित किए जाएंगे. हर पार्क की परियोजना लागत 20 करोड़ रुपये होगी. हाल ही में मध्यप्रदेश के गुना में भी ऐसा ही मसाला पार्क शुरू किया गया है. गुना का मसाला पार्क देश के विभिन्न मसाला उत्पादक क्षेत्रों में मसाला बोर्ड द्वारा स्थापित किए गए मसाला पार्कों में चौथा मसाला पार्क है, जिसमें 45 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है. किसान अपने मसालों के उत्पाद को वाजिब किराया देकर पार्क में रख सकते हैं या पार्क के अंदर स्थित मसाला प्रोसेसरों को सीधे बेच सकते हैं. इसमें बिचौलियों की भूमिका न होने की वजह से किसानों को अपनी उपज की सही क़ीमत मिल जाएगी. इन पार्कों में निर्यातक भी मसाला बोर्ड द्वारा निर्धारित शर्तों पर अपने यूनिट खोल सकेंगे. मसाला पार्कों  को मसालों और मसाला उत्पादों के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्द्धन के लिए औद्योगिक पार्क माना जाता है. यहां अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप प्रोसेसिंग की सुविधाएं होती हैं.

हाल में हरियाणा के हिसार स्थित चौधरी चरण सिंग विश्वविद्यालय में मसालों की फ़सलों पर दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें सौ से ज़्यादा किसानों ने शिरकत की. विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॊ. एमएस दहिया ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि मसाला उत्पादों की मांग न केवल भारत, बल्कि विश्व में दिनोदिन बढ़ रही है. ऐसे में इनकी खेती को बढ़ावा देने की ज़रूरत है. किसान मसाला फ़सलों की खेती को फ़सल-चक्र में शामिल करके मांग आपूर्ति के साथ-साथ ज़्यादा मुनाफ़ा भी कमा सकते हैं. हरियाणा के लिए मसालों की फ़सलें नई नहीं हैं. इन फ़सलों में बीमारियां कम लगती हैं और इन्हें कम सिंचाई वाले इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. किसानों को मसालों की फ़सलों के उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.

बहरहाल, मसालों की ज़्यादा क़ीमत और बढ़ती मांग को देखते हुए किसानों को मसालों की खेती की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए.

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