कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाक़ात कर रहे हैं. अगर वे मुसलमानों के हालात जानने के लिए ऐसा कर रहे हैं, तो उन्हें वरिष्ठ पत्रकार फ़िरदौस ख़ान की ये रिपोर्ट ज़रूर पढ़नी चाहिए.
देश को आज़ाद हुए सात दशक बीत चुके हैं. इस दौरान बहुत कुछ बदल गया, लेकिन अगर कहीं कुछ नहीं बदला है, तो वह है देश के मुसलमानों की हालत. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी मुसलमानों की हालत अच्छी नहीं है. उन्हें उन्नति के लिए समान अवसर नहीं मिल रहे हैं. नतीजतन, मुसलमान सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से बेहद पिछ्ड़े हुए हैं.

संपत्ति के मामले में भी मुसलमानों की हालत बेहद ख़स्ता है. ग्रामीण इलाक़ों में 62.2 फ़ीसद मुसलमान भूमिहीन हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 43 फ़ीसद है. वक़्फ़ संपत्तियों यहां तक की क़ब्रिस्तानों पर भी बहुसंख्यकों का क़ब्ज़ा है. शर्मनाक बात तो यह भी है कि इन मामलों में वक़्फ़ बोर्ड के अधिकारियों की मिलीभगत शामिल रहती है. मुसलमानों को रोज़गार के अच्छे मौक़े भी बहुत कम ही मिल पाते हैं. इसलिए ज़्यादार मुसलमान छोटे-मोटे कामधंधे करके ही अपना गुज़ारा कर रहे हैं. 2001 की जनगणना के मुताबिक़ मुसलमानों की आबादी 13.43 फ़ीसद है, लेकिन सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी बहुत कम है. सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ सुरक्षा बलों में कार्यरत 18 लाख 89 हज़ार 134 जवनों में 60 हज़ार 517 मुसलमान हैं. सार्वजनिक इकाइयों को छोड़कर सरकारी रोज़गारों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व महज़ 4.9 फ़ीसद है. सुरक्षा बलों में 3.2 फ़ीसद, भारतीय प्रशासनिक सेवा में 30, भारतीय विदेश सेवा में 1.8, भारतीय पुलिस सेवा में 4, राज्यस्तरीय विभागों में 6.3, रेलवे में 4.5, बैंक और रिज़र्व बैंक में 2.2, विश्वविद्यालयों में 4.7,  डाक सेवा में 5, केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में 3.3 और राज्यों के सार्वजनिक उपक्रमों में 10.8 फ़ीसद मुसलमान हैं. ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले 60 फ़ीसद मुसलमान मज़दूरी करते हैं.

शिक्षा के मामले में भी मुसलमानों की हालत बेहद ख़राब है. शहरी इलाक़ों में 60 फ़ीसद मुसलमानों ने कभी स्कूल में क़दम तक नहीं रखा है. हालत यह है कि शहरों में 3.1 फ़ीसद मुसलमान ही स्नातक हैं, जबकि ग्रामीण इलाक़ों में यह दर सिर्फ़ 0.8 फ़ीसद ही है. साल 2001 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ मुसलमान दूसरे धर्मों के लोगों के मुक़ाबले शिक्षा के मामले में बहुत पीछे है. देश के तक़रीबन सभी राज्यों में कमोबेश यही हालत है. शहरी मुसलमानों की साक्षरता की दर बाक़ी शहरी आबादी के मुक़ाबले 19 फ़ीसद कम है. ग़ौरतलब है कि साल 2001 में देश के कुल 7.1 करोड़ मुस्लिम पुरुषों में सिर्फ़ 55 फ़ीसद ही साक्षर थे, जबकि 46.1 करोड़ ग़ैर मुसलमानों में यह दर 64.5 फ़ीसद थी. देश की 6.7 करोड़ मुस्लिम महिलाओं में सिर्फ़ 41 फ़ीसद महिलाएं साक्षर थीं, जबकि अन्य धर्मों की 43 करोड़ महिलाओं में 46 फ़ीसद महिलाएं साक्षर थीं. स्कूलों में मुस्लिम लड़कियों की संख्या अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के मुक़ाबले तीन फ़ीसद कम थी. 101 मुस्लिम महिलाओं में से सिर्फ़ एक मुस्लिम महिला स्नातक है, जबकि 37 ग़ैर मुसलमानों में से एक महिला स्नातक है. देश के हाईस्कूल स्तर पर मुसलमानों की मौजूदगी महज़ 7.2 फ़ीसद है. ग़ैर मुस्लिमों के मुक़ाबले 44 फ़ीसद कम मुस्लिम विद्यार्थी सीनियर स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं, जबकि महाविद्यालयों में इनकी दर 6.5 फ़ीसद है. स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले मुसलमानों में सिर्फ़ 16 फ़ीसद ही स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल कर पाते हैं. मुसलमानों के 4 फ़ीसद बच्चे मदरसों में पढ़ते हैं, जबकि 66 फ़ीसद सरकारी स्कूलों और 30 फ़ीसद बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं.

मुसलमानों को सरकारी योजनाओं का भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं मिल पाता है. ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीबी रेखा से नीचे के 94.9 फ़ीसद मुस्लिम परिवारों को मुफ़्त राशन नहीं मिल पाता है. इसी तरह सिर्फ़ 3.2 फ़ीसद मुसलमानों को ही सब्सिडी वाला क़र्ज़ मिलता है और महज़ 1.9 फ़ीसद मुसलमान सरकारी अनुदान वाले खाद्य कार्यक्रमों से फ़ायदा उठा पाते हैं. उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है.

देश में सांप्रदायिकता, ग़रीबी और अशिक्षा की वजह से मुसलमानों के साथ नाइंसाफ़ी की जाती रही है. देश के किसी भी हिस्से में अगर कोई आतंकी वारदात हो जाती है, तो सुरक्षा एजेंसियां फ़ौरन मुसलमानों पर शिकंजा कस देती हैं. पुलिस का भी यही रवैया रहता है. कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनके लिए बेक़सूर मुसलमानों को गिरफ़्तार किया गया, उन्हें बहुसंख्यक वर्ग के लोगों ने अंजाम दिया था. लेकिन इस सबके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों से लेकर मीडिया की भूमिका भी मुसलमानों को फ़ंसाने की ही रहती है. नतीजतन, देशभर की जेलों में मुसलमान क़ैदियों की तादाद उनकी आबादी के मुक़ाबले काफ़ी ज़्यादा है. सच्चर समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि देश में मुसलमानों की आबादी जहां तक़रीबन 13.43 फ़ीसद है,  वहीं जेलों में उनकी तादाद क़रीब 21 फ़ीसद है. सच्चर समिति ने 2006 में कहा था कि सबसे ज़्यादा मुस्लिम क़ैदी महाराष्ट्र की जेलों में हैं, लेकिन मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक़, मुस्लिम क़ैदियों के मामले में पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है, जबकि महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है. नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के आंकड़ों (दिसंबर 2010 तक) के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में 47 फ़ीसद मुस्लिम क़ैदी हैं, जबकि महाराष्ट्र में यह दर 32 फ़ीसद है. उत्तर प्रदेश में 26 फ़ीसद और बिहार में 23 फ़ीसद मुसलमान जेलों में हैं. क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि इन प्रदेशों में विचाराधीन मुस्लिम क़ैदियों की तादाद सजायाफ़्ता मुस्लिम क़ैदियों से कई गुना ज़्यादा है. नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश की कुल 1,393 जेलों में 3 लाख 68 हज़ार 998 क़ैदी हैं, जिनमें 76 हज़ार 701 मुस्लिम क़ैदी हैं. इनमें सिर्फ़ 22 हज़ार 672 मुस्लिम क़ैदी ऐसे हैं, जिन्हें सज़ा सुनाई जा चुकी है, जबकि 53 हज़ार 312 मुस्लिम क़ैदी विचाराधीन हैं. देश की लचर क़ानून व्यवस्था जगज़ाहिर है कि यहां किसी भी मामले की सुनवाई में बरसों लग जाते हैं. ऐसी हालत में विचाराधीन क़ैदियों की उम्र जेल में ही गुज़र जाती है. एक अन्य रिपोर्ट की मानें तो ज़्यादातर क़ैदियों का आतंकवाद या संगठित अपराध से वास्ता नहीं है.

मुसलमानों की बदतर हालत के लिए सियासी तौर पर मुस्लिम प्रतिनिधित्व का कम और कमज़ोर होना भी है. मुसलमानों की आबादी के लिहाज़ से सियासत में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है. देश में तक़रीबन 15 करोड़ मुसलमान हैं. कुल मुस्लिम आबादी में से तक़रीबन 23.7 फ़ीसद मुसलमान उत्तर प्रदेश में रहते हैं. बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में एक-एक करोड़ मुसलमान रहते हैं. केरल, आंध्र प्रदेश, असम, जम्मू-कश्मीर और कर्नाटक में 25 लाख से एक करोड़ के बीच मुसलमान रहते हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड में से प्रत्येक राज्य में तक़रीबन 30 से 50 लाख मुसलमान रहते हैं. दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड में 10 से 20 लाख मुसलमान रहते हैं. देश के नौ ज़िलों में मुसलमानों की आबादी 75 फ़ीसद से ज़्यादा है. मुसलमानों की अपनी कोई सियासी पार्टी नहीं है. सियासी दल बहुत कम मुसलमानों को ही चुनाव मैदान में उतारते हैं. इनमें से जो जीतकर आते हैं, मुसलमानों के प्रति उनका अपना कोई नज़रिया नहीं होता, क्योंकि उन्हें तो अपनी पार्टी के मुताबिक़ ही काम करना है. हालांकि सरकार ने मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत जानने के लिए सच्चर समिति का गठन किया. इससे पहले रंगनाथन मिश्र आयोग बनाया गया, लेकिन इनकी सिफ़ारिशों को अभी तक लागू नहीं किया गया. इसलिए मुसलमानों को इनका कोई फ़ायदा नहीं मिला.

बहरहाल, मुसलमानों को अपनी क़ौम की तरक़्क़ी के लिए एकजुट होकर आगे आना होगा. इसके ज़रूरी है कि वे सियासत में ज़्यादा से ज़्यादा प्रतिनिधित्व हासिल करें.

भारत देश एक बहु-सांस्कृतिक परिदृश्य के साथ बना एक ऐसा राष्ट्र है जो दो महान नदी प्रणालियों, सिंधु तथा गंगा, की घाटियों में विकसित हुई सभ्यता है, यद्यपि हमारी संस्कृति हिमालय की वजह से अति विशिष्ट भौगोलीय क्षेत्र में अवस्थित, जटिल तथा बहुआयामी है, लेकिन किसी भी दृष्टि से अलग-थलग सभ्यता नहीं रही।  भारतीय सभ्यता हमेशा से ही स्थिर न होकर विकासोन्मुख एवं गत्यात्मक रही है। भारत में स्थल और समुंद्र के रास्ते व्यापारी और उपनिवेशी आए।  अधिकांश प्राचीन समय से ही भारत कभी भी विश्व से अलग- थलग नहीं रहा। इसके परिणामस्वरूप, भारत में विविध संस्कृति वाली सभ्यता विकसित होगी जो प्राचीन भारत से आधुनिक भारत तक की अमूर्त कला और सांस्कृतिक परंपराओं से सहज ही परिलक्षित होता है, चाहे वह गंधर्व कला विद्यालय का बौद्ध नृत्य, जो यूनानियों के द्वारा प्रभावित हुआ था, हो या उत्तरी एवं दक्षिणी भारत के मंदिरों में विद्यमान अमूर्त सांस्कृतिक विरासत हो।
भारत का इतिहास पांच हजार से अधिक वर्षों को अपने सांस्कृतिक खंड में समेटे हुए अनेक सभ्यताओं के पोषक के रूप में विश्व के अध्ययन के लिए उपस्थित है। यहां के निवासी और उनकी जीवन शैलियां, उनके नृत्य और संगीत शैलियां, कला और हस्तकला जैसे अन्य अनेक तत्व भारतीय संस्कृति और विरासत के विभिन्न वर्ण हैं, जो देश की राष्ट्रीयता का सच्चा चित्र प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. ए एल बाशम ने अपने लेख ''भारत का सांस्कृतिक इतिहास'' में यह उल्लेख किया है कि ''जबकि सभ्यता के चार मुख्य उद्गम केंद्र पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ने पर, चीन, भारत, फर्टाइल क्रीसेंट तथा भूमध्य सागरीय प्रदेश, विशेषकर यूनान और रोम हैं, भारत को इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है क्योंकि इसने एशिया महादेश के अधिकांश प्रदेशों के सांस्कृतिक जीवन पर अपना गहरा प्रभाव डाला है। इसने प्रत्यक्ष ओर अप्रत्यक्ष रूप से विश्व के अन्य भागों पर भी अपनी संस्कृति की गहरी छाप छोड़ी है।"
संस्कृति से अर्थ होता है कि किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप जैसे जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है।
‘संस्कृति’ शब्द संस्कृत भाषा की धातु ‘कृ’ (करना) से बना है। इस धातु से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’ (मूल स्थिति), ‘संस्कृति’ (परिष्कृत स्थिति) और ‘विकृति’ (अवनति स्थिति)। जब ‘प्रकृत’ या कच्चा माल परिष्कृत किया जाता है तो यह संस्कृत हो जाता है और जब यह बिगड़ जाता है तो ‘विकृत’ हो जाता है। अंग्रेजी में संस्कृति के लिये 'कल्चर' शब्द प्रयोग किया जाता है जो लैटिन भाषा के ‘कल्ट या कल्टस’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है जोतना, विकसित करना या परिष्कृत करना और पूजा करना। संक्षेप में, किसी वस्तु को यहाँ तक संस्कारित और परिष्कृत करना कि इसका अंतिम उत्पाद हमारी प्रशंसा और सम्मान प्राप्त कर सके। यह ठीक उसी तरह है जैसे संस्कृत भाषा का शब्द ‘संस्कृति’।
संस्कृति का शब्दार्थ है - उत्तम या सुधरी हुई स्थिति। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। ऐसी प्रत्येक जीवन-पद्धति, रीति-रिवाज रहन-सहन आचार-विचार नवीन अनुसन्धान और आविष्कार, जिससे मनुष्य पशुओं और जंगलियों के दर्जे से ऊँचा उठता है तथा सभ्य बनता है, सभ्यता और संस्कृति का अंग है। सभ्यता (Civilization) से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति (Culture) से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है।
भारतीय संस्कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग अलग है। यहां के लोग अलग अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग अलग तरह के कपड़े पहनते हैं, भिन्न- भिन्न धर्मों का पालन करते हैं, अलग अलग भोजन करते हैं किन्तु उनका स्वभाव एक जैसा होता है। तो चाहे यह कोई खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षण, लोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैं, एक साथ खुशी या दर्द का अनुभव करते हैं। एक त्यौहार या एक आयोजन किसी घर या परिवार के लिए सीमित नहीं है। पूरा समुदाय या आस पड़ोसी एक अवसर पर खुशियां मनाने में शामिल होता है, इसी प्रकार एक भारतीय विवाह मेल जोल का आयोजन है, जिसमें न केवल वर और वधु बल्कि दो परिवारों का भी संगम होता है। चाहे उनकी संस्कृति या धर्म का मामला हो। इसी प्रकार दुख में भी पड़ोसी और मित्र उस दर्द को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वर्तमान समय में भारत की वैश्विक छवि एक उभरते हुए और प्रगतिशील राष्ट्र की है। सच ही है, भारत में सभी क्षेत्रों में कई सीमाओं को हाल के वर्षों में पार किया है, जैसे कि वाणिज्य, प्रौद्योगिकी और विकास आदि, और इसके साथ ही उसने अपनी अन्य रचनात्मक बौद्धिकता को उपेक्षित भी नहीं किया है।  हमारे राष्ट्र ने विश्व को विज्ञान दिया है, जिसका निरंतर अभ्यास भारत में अनंतकाल से किया जाता है। आयुर्वेद पूरी तरह से जड़ी बूटियों और प्राकृतिक खरपतवार से बनी दवाओं का एक विशिष्ट रूप है जो दुनिया की किसी भी बीमारी का इलाज कर सकती हैं। आयुर्वेद का उल्लेख प्राचीन भारत के एक ग्रंथ रामायण में भी किया गया है। और आज भी दवाओं की पश्चिमी संकल्पना जब अपने चरम पर पहुंच गई है, ऐसे लोग हैं जो बहु प्रकार की विशेषताओं के लिए इलाज की वैकल्पिक विधियों की तलाश में हैं।
भारतीय नागरिकों की सुंदरता उनकी सहनशीलता, लेने और देने की भावना तथा उन संस्कृतियों के मिश्रण में निहित है जिसकी तुलना एक ऐसे उद्यान से की जा सकती है जहां कई रंगों और वर्णों के फूल है, जबकि उनका अपना अस्तित्व बना हुआ है और वे भारत रूपी उद्यान में भाईचारा और सुंदरता बिखेरते हैं।
इन सब  गुणों के बावजूद भी वर्तमान दौर में भारत में अपनी ही संस्कृति को विखंडित और  विलोपित करने की कवायदें आरम्भ हो चुकी है, जिसके दुष्परिणाम स्वरुप भारत केवल एक ऐसा भूमि का टुकड़ा बच जाएगा जिसके सतही तल पर तो अधिकार हमारा होगा किन्तु मानसिक स्तर पर उस पर आधिपत्य पाश्चात्य के राष्ट्रों का होगा। इस विकराल समस्या को हम भारत की सांस्कृतिक अखंडता पर मंडरा रहे खतरे के तौर पर स्वीकार करना चाहिए और उसके उपचार हेतु शीघ्रातिशीघ्र प्रयास करना प्रारम्भ करना होगा।
सांस्कृतिक अखंडता को बनाये रखने के लिए प्राथमिक तौर पर हर भारतवंशी में राष्ट्रप्रेम की जागृति लाना होगी। 'पहले राष्ट्र' की मूलभावना को रगों में दौड़ने के लिए भारतीय भाषाओँ को संरक्षित करना परम आवश्यक है।  जब भारत आजाद होने वाला था उसके पहले १८ जुलाई १९४७ को इंग्लैंड की संसद में 'भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७' पास हुआ, यदि उसे पड़ा जाये और उसके बाद लार्ड मैकाले और एटमी के संवादों की तरफ दृष्टि डाली जाए तो हमें यह ज्ञात होगा कि भारत को आजादी शर्तों और अनुबंध के आधार पर दी गई है, और एटमी के अनुसार तो भारत को अंग्रेजो से आज़ाद करके अंग्रेजियत का गुलाम बनाया गया हैं। हमें इसको तोड़ कर भारतीय भाषाओँ को बढ़ावा देना होगा, बाजार पर जिस अंग्रेजियत का कब्ज़ा है उसे हटा कर भारतीयता का साम्राज्य स्थापित करना होगा।  बच्चों के बस्ते से गायब हुई नैतिक शिक्षा की किताब भी भारत की सांस्कृतिक अखंडता को बचने में अग्रणी थी, उसे वापस अनिवार्य शिक्षा की धारा में लाना होगा।
इसी के साथ हमें सांप्रदायिक सौहाद्र की स्थापना करनी होगी, क्योंकि भारत में धर्म और जाति के नाम पर झगड़े तो उन हथियारों के व्यापारियों की कारस्तानी और मंशा है जिनका व्यापार ही हथियार बेचना है, जिनमे अमरीका अग्रणी राष्ट्र है।
हमें हमारे त्यौहारों पर भी चाइनीज भागीदारी को समाप्त करना होगा, आज हमारे त्योंहारों की समझ हमसे ज्यादा चाइना की है क्योंकि वह एक व्यापारी देश है जो अपना माल विश्व के दूसरे बड़े बाजार के तौर पर स्थापित भारत में खपाना चाहता है। महात्मा गाँधी ने आज़ादी के पहले विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन इसलिए ही चलाया था क्योंकि हम ही हमारी गाढ़ी कमाई से हमारी सांस्कृतिक हत्या के लिए साधन जुटाने हेतु उन्हें पोषित करते है।
इन्ही सब महत्वपूर्ण उपायों से भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाया जा सकता है, वर्ना हमारे पर शेष हाथ मलने के अतिरिक्त कुछ न बचेगा जब राष्ट्र ही नहीं बचेगा।
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'



फ़िरदौस ख़ान
नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से देश में हर साल करोड़ों रुपये की फ़सलें तबाह हो जाती हैं. इससे किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, किसान क़र्ज़ लेकर फ़सलें उगाते हैं, फ़सलों को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशक कीटों पर प्रभावी नहीं होते, जिससे कीट और पौधों को लगने वाली बीमारियां फ़सल को नुक़सान पहुंचाती हैं. इसकी वजह से उत्पादन कम होता है या कई बार पूरी फ़सल ही ख़राब हो जाती है. ऐसे में किसानों के सामने अंधेरा छा जाता है. कई मामले तो ऐसे भी सामने आ चुके हैं कि जब किसानों ने फ़सल बर्बाद होने पर आत्महत्या तक कर ली. खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान किसानों की मौतें होने की ख़बरें भी आए-दिन सुनने को मिलती रहती हैं.

मगर अफ़सोस की बात यह है कि नक़ली कीटनाशक और उर्वरक माफ़िया के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, जिसकी वजह से नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़, इस कारोबार में हर साल तक़रीबन 20 फ़ीसद की बढ़ोतरी हो रही है. देश में कीटनाशकों के इस्तेमाल पर नज़र रखने वाली नई दिल्ली की एग्रोकेमिकल्स पॉलिसी ग्रुप (एपीजी) के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2009 में 1400 करोड़ रुपये के कीटनाशकों की बिक्री हुई, जिसकी वजह से सात हज़ार करोड़ रुपये की फ़सलें तबाह हो गईं. इससे किसानों की हालत बद से बदतर हो गई. नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रिकल्चरल साइंसेज के मुताबिक़, देश में हर साल औसतन तीन हज़ार करोड़ रुपये के नक़ली कीटनाशक बेचे जाते हैं, जबकि कीटनाशकों का कुल बाज़ार क़रीब सात हज़ार करोड़ रुपये का है. यहां हर साल तक़रीबन 80 हज़ार टन कीटनाशक बनाए जाते हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रिकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की मानें तो देश में इस्तेमाल होने वाले कुल कीटनाशकों में तक़रीबन 40 फ़ीसद हिस्सा नक़ली है. क़ाबिले-ग़ौर है कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र आदि राज्यों में नक़ली कीटनाशक बनाने का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है. ये कारोबारी नामी गिरामी कंपनियों के लेबल का इस्तेमाल करते हैं. अधिकारियों की मिलीभगत के कारण इन कारोबारियों के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती है. कभी-कभार निरीक्षण के नाम पर कार्रवाई होती भी है तो इसे छोटे कारोबारियों तक ही सीमित रखा जाता है. अनियमितता पाए जाने पर कीटनाशक और उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वे फिर से लाइसेंस बनवा लेते हैं या बिना लाइसेंस के अपना कारोबार करते हैं. इस तरह यह धंधा बदस्तूर जारी रहता है.

दरअसल, उर्वरक ऐसे यौगिक हैं, जो पौधों के विकास में सहायक होते हैं. उर्वरक दो प्रकार के होते हैं, जैविक और अजैविक. जैव उर्वरक कार्बन पर आधारित होते हैं, जिनमें पत्तियों और गोबर के यौगिक शामिल होते हैं. अजैविक उर्वरक में अमूमन अजैविक रसायन होते हैं. उर्वरकों में मौजूद कुछ सामान्य पोषक नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम हैं. इनमें कैल्शियम, सल्फर और मैगनेशियम जैसे तत्व भी होते हैं. कुछ खास उर्वरकों में बोरोन, क्लोरीन, मैंगनीज, लौह, जिम, तांबा और मोलिबडीनम आदि शामिल होते हैं. उर्वरक पौध की वृद्धि में मदद करते हैं, जबकि कीटनाशक कीटों से पौध की रक्षा करते हैं. कीटनाशकों में रासायनिक पदार्थ या वायरस, बैक्टीरिया आदि होते हैं. इसमें फासफैमीडोन, लिंडेन, फ्लोरोपाइरीफोस, हेप्टालक्लोथर और मैलेथियान जैसे रासायनिक पदार्थ होते हैं. बहुत से कीटनाशक इंसानों के लिए खतरनाक होते हैं. सरकार ने कुछ कीटनाशकों पर पाबंदी लगाई है, इसके बावजूद देश में इनकी बिक्री बेरोकटोक चल रही है.

कीटनाशक विके्रता राजेश कुमार कहते हैं कि किसानों को असली और नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों की पहचान नहीं होती. इसलिए वे विक्रेता पर भरोसा करके कीटनाशक ख़रीद लेते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी विक्रेता नक़ली कीटनाशक बेचते हैं, जिन विक्रेताओं को बाज़ार में अपनी पहचान क़ायम रखनी है, वे सीधे कंपनी से माल ख़रीदते हैं. ऐसे कीटनाशक विक्रेताओं की भी कमी नहीं है, जो किसी बिचौलिये से माल ख़रीदते हैं. दरअसल, बिचौलिये ज़्यादा मुना़फ़ा कमाने के फेर में विक्रेताओं को असली की जगह नक़ली कीटनाशक बेचते हैं. नक़ली कीटनाशकों की पैकिंग बिल्कुल ब़डी कीटनाशक कंपनियों की तरह होती है. लेकिन इनकी क़ीमत में फ़र्क़ होता है, जैसे जो असली कीटनाशक तीन सौ रुपये में मिलता है, वही नक़ली कीटनाशक बाज़ार में 150 से 200 रुपये तक में मिल जाता है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए. इससे मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं. किसान ज़्यादा उपज पाने के लालच में अंधाधुंध कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह से जहां भूमि की उपजाऊ शक्ति ख़त्म हो रही है, वहीं खाद्यान्न भी ज़हरीला हो रहा है. हालत यह है कि फल, सब्ज़ियों से लेकर अनाज तक में रसायनों की मात्रा पाई जा रही है, जो सेहत के लिए बेहद ऩुकसानदेह है. नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों की वजह से कई बार किसानों की मेहनत से उगाई गई फ़सल भी बर्बाद हो जाती है. विश्वविद्यालय द्वारा समय-समय पर शिविर लगाकर किसानों को कीटनाशकों और उर्वरकों के सही इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है.

किसानों का कहना है कि वे जितने रुपये के कीटनाशक फ़सलों में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें उसका तक़रीबन पांच गुना फ़ायदा मिलता है, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से उनकी फ़सल बर्बाद हो जाती है. हिसार के किसान राजेंद्र कुमार का कहना है कि बढ़ती आबादी और घटती ज़मीन ने भी किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल के लिए मजबूर किया है. पीढ़ी दर पीढ़ी ज़मीन का बंटवारा होने की वजह से किसानों के हिस्से में कम ज़मीन आ रही है. किसान को अपने परिवार का भरण-पोषण करना है, ऐसे में अगर वह ज़्यादा उत्पादन चाहता है, तो इसमें ग़लत क्या है. साथ ही वह यह भी कहते हैं कि बंजर भूमि की समस्या को देखते हुए किसानों को वैकल्पिक तरीक़ा अपनाना चाहिए, जिससे लागत कम आए और उत्पादन भी अच्छा हो. कैथल ज़िले के चंदाना गांव के किसान कुशलपाल सिरोही का मानना है कि जैविक खेती को अपनाकर किसान अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं. केंद्रीय उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण तथा प्रशिक्षण संस्थान (सीएफक्यूसीटीआई) मुख्य संस्थान है, जो उर्वरक की गुणवत्ता का परीक्षण करता है. हरियाणा के फ़रीदाबाद ज़िले में स्थित इस संस्थान की तीन क्षेत्रीय उर्वरक नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं, जो मुंबई, चेन्नई और कल्याणी में हैं. वैसे इस वक़्त देश में तक़रीबन 67 उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं. हर साल तक़रीबन 1,25,205 नमूनों की जांच की जाती है. अमूमन राज्यों में एक या इससे ज़्यादा प्रयोगशालाएं होती हैं. पुडुचेरी को छोड़कर अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, दिल्ली, गोवा और सभी संघ शासित राज्यों में एक भी प्रयोगशाला नहीं है. ये राज्य केंद्रीय सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं.

बहरहाल, नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों के मामले में बड़ी कंपनियों को भी आगे आना चाहिए, ताकि उनके नाम पर चल रहे गोरखधंधे पर रोक लगाई जा सके. किसानों को भी जागरूक होने की ज़रूरत है, ताकि वे असली और नक़ली में पहचान कर सकें. इसके अलावा किसानों को वैकल्पिक खेती अपनाने पर भी ज़ोर देना चाहिए, ताकि भूमि की उर्वरता बनाए रखने के साथ ही वे अच्छा उत्पादन हासिल कर पाएं.

फ़िरदौस ख़ान
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती देवी कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.

बिहार के छपरा ज़िले के गांव कोरिया के सब्ज़ी विक्रेता ओमप्रकाश सिंह कहते हैं कि जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 40 से 70 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के लोग भी शामिल हैं.

सहजन बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बंगाल में सजिना, महाराष्ट्र में शेगटा, आंध्र प्रदेश में मुनग और हिंदी भाषी इलाक़ों में इसे सहजना, सुजना, सैजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ड्रमस्टिक कहा जाता है.  इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है. सहजन का वृक्ष मध्यम आकार का होता है. इसकी ऊंचाई दस मीटर तक होती है, लेकिन बढ़ने पर इसे छांट दिया जाता है, ताकि इसकी फलियां, फूल और पत्तियां आसानी से तोड़ी जा सकें. यह किसी भी तरह की ज़मीन पर उगाया जा सकता है. नर्सरी में इसकी पौध बीज या क़लम से तैयार की जा सकती है. पौधारोपण फ़रवरी-मार्च या बरसात के मौसम में करना चाहिए.  इसे खेत की मेढ़ पर लगाया जा सकता है. इसे तीन से चार फ़ुट की दूरी पर लगाना चाहिए. यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है. इसके पौधारोपण के आठ माह बाद ही इसमें फलियां लग जाती हैं. उत्तर भारत में इसमें एक बार फलियां लगती हैं, जबकि दक्षिण भारत में यह सालभर फलियों से लदा रहता है. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के लिए साल में दो बार फलियां देने वाली क़िस्म तैयार कर ली है और अब यही क़िस्म उगाई जा रही है. दक्षिण भारत के लोग इसके फूल, पत्ती और फलियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में करते हैं. उत्तर भारत में भी इन्हें ख़ूब चाव से खाया जाता है. इसकी फलियों से सब्ज़ी, सूप और अचार भी बनाया जाता है. इसके फूलों की भी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसकी पत्तियों की चटनी और सूप बनाया जाता है.

गांव-देहात में इसे जादू का वृक्ष कहा जाता है. गांव-देहात के बुज़ुर्ग इसे स्वर्ग का वृक्ष भी कहते हैं. सहजन में औषधीय गुण पाए जाते हैं. इसके सभी हिस्से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इसके सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में इसे तीन सौ रोगों का उपचार बताया गया है. इसमें अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कैलोरी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ़ास्फ़ोरस, पोटैशियम, कॊपर, सल्फ़र, ऒक्जेलिक एसिड, विटामिन ए-बीटासीरोटीन, विटामिन बी- कॊरिन, विटामिन बी1 थाइमिन, विटामिन बी2 राइबोफ़्लुविन, विटामिन बी3 निकोटिनिक एसिड, विटामिन सी एस्कार्बिक एसिड, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, ज़िंक, अर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, ट्रिप्टोफन,फ़िनॊयलेनेलिन, मीथिओनिन, थ्रिओनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, वैलिन, ओमेगा आदि. एक अध्ययन के मुताबिक़ सहजन की पत्तियों में विटामिन सी संतरे से सात गुना होता है. इसी तरह इसकी पत्तियों में विटामिन ए गाजर से चार गुना, कैल्शियम दूध से चार गुना, पोटैशियम केले से तीन गुना और प्रोटीन दही से दोगुना होता है. सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है, जो दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं. कहा जाता है कि इसके सेवन से सेहत अच्छी रहती है और बुढ़ापा भी दूर भागता है. आंखों की रौशनी भी अच्छी रहती है. इसके पोषक तत्वों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दक्षिण अफ़्रीका के कई देशों में कुपोषित लोगों के आहार में इसे शामिल करने की सलाह दी है. डब्ल्यूएचओ ने कुपोषण और भूख की समस्या से लड़ने के लिए इसे बेहतर माना है. फ़िलीपींस और सेनेगल में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत बच्चों के आहार में सहजन को शामिल किया गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने आए हैं. फ़िलीपींस, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में सहजन की काफ़ी मांग है. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह वरदान है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं. इसे चारे के लिए भी उगाया जाता है. चारे के लिए इसकी पौध छह इंच की दूरी पर लगाई जाती है. बरसीम की तरह इसकी कटाई 75 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए.  स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऒफ़ एग्रीकल्चरल साइंस उपासला द्वारा निकारगुआ में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गायों को चारे के साथ सहजन की पत्तियां खिलाने से उनके दूध में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है. सहजन के बीजों से पानी को शुद्ध किया जा सकता है. इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाया जाता है, जिससे पानी शुद्ध हो जाता है.

सहजन की खेती किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. किसान सहजन की खेती कर आर्थिक रूप से समृद्ध बन सकते हैं. एक वृक्ष से आठ क्विंटल फलियां प्राप्त की जा सकती हैं. यह वृक्ष दस साल तक उपज देता है. इसे खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों तरफ़ भी सजहन के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. बिहार में किसान सहजन की खेती कर रहे हैं. यहां सहजन की खेती व्यवसायिक रूप ले चुकी है.  बिहार सरकार ने सहजन की खेती के लिए महादलित परिवारों को पौधे मुहैया कराने की योजना बनाई है. इस योजना का मक़सद महादलित और ग़रीब परिवारों को स्वस्थ करना और उन्हें आमदनी का ज़रिया मुहैया कराना है. राज्य में समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहजन के पौधे वितरित किए जाते हैं. यहां स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों के परिसरों में सहजन बोया जा रहा है. कृषि विभाग के प्रोत्साहन की वजह से यहां के किसान सहजन उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे सहजन की क़लम खेत में लगाते हैं. मार्च-अप्रैल में वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. उत्पादन वृक्ष के अनुसार होता है. एक वृक्ष से एक से पांच क्विंटल तक फलियां मिल जाती हैं. इसमें लागत भी ज़्यादा नहीं आती. वे अन्य सब्ज़ियों के साथ सहजन की खेती करते हैं. इससे उन्हें दोहरा फ़ायदा हो जाता है. इसके साथ ही पशुओं के लिए अच्छा चारा भी मिल जाता है, जो उनके लिए पौष्टिक आहार है. छत्तीसगढ़ में किसान पारंपरिक धान की खेती के साथ सहजन उगा रहे हैं.  उनका कहना है कि वे इसकी फलियां शहर की मंडियों में बेजते हैं. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और झारखंड आदि राज्यों में सहजन की ख़ासी मांग है. सहजन की फलियां 40 से 80 रुपये प्रति किलो बिकती हैं. सहजन के फ़ायदों को देखते हुए अब पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने इसे पंजाब में उगाने की योजना बनाई है. इसे किचन गार्डन के तौर पर प्रोत्साहित किया जाएगा. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वेजिटेबल साइंस डिपार्टमेंट के प्रो. डीएस खुराना और डॉ. हीरा सिंह ने सहजन पर शोध करते हुए पंजाब की जलवायु के अनुकूल एक नई क़िस्म तैयार की है. इसका नाम पीकेएम टू रखा गया है.
आदिवासी इलाक़ों में भूमिहीन लोग बेकार पड़ी ज़मीन पर सहजन के वृक्ष उगाकर आमदनी हासिल कर रहे हैं. उनका कहना है कि ख़ाली ज़मीन पर जो भी वृक्ष उगाता है, वृक्ष के फल पर अधिकार भी उसी का होता है. इससे जहां बेकार पड़ी ज़मीन आमदनी का ज़रिया बन गई है, वहीं वृक्षों से पर्यावरण भी हराभरा बना रहता है. वृक्ष फल और छाया  देने के साथ-साथ बाढ़ को रोकते हैं, भूमि कटाव को रोकते हैं.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सहजन की विदेशों में बहुत मांग है, लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से यहां के लोगों को इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी होनी चाहिए. ऐसे में सहजन की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पारंपरिक खेती के साथ भी सहजन उगाया जा सकता है. इसमें कोई विशेष लागत भी नहीं आती.  सहजन कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी का भी अहम हिस्सा बन सकता है. बस ज़रूरत है जागरुकता की.


फ़िरदौस ख़ान                                    
प्लास्टिक ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. अमूमन हर चीज़ के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है, वो चाहे दूध हो, तेल, घी, आटा, चावल, दालें, मसालें, कोल्ड ड्रिंक, शर्बत, सनैक्स, दवायें, कपड़े हों या फिर ज़रूरत की दूसरी चीज़ें सभी में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. बाज़ार से फल या सब्ज़ियां ख़रीदो, तो वे भी प्लास्टिक की ही थैलियों में ही मिलते हैं. प्लास्टिक के इस्तेमाल की एक बड़ी वजह यह भी है कि टिन के डिब्बों, कपड़े के थैलों और काग़ज़ के लिफ़ाफ़ों के मुक़ाबले ये सस्ता पड़ता है. पहले कभी लोग राशन, फल या तरकारी ख़रीदने जाते थे, तो प्लास्टिक की टोकरियां या कपड़े के थैले लेकर जाते थे. अब ख़ाली हाथ जाते हैं, पता है कि प्लास्टिक की थैलियों में सामान मिल जाएगा. अब तो पत्तल और दोनो की तर्ज़ पर प्लास्टिक की प्लेट, गिलास और कप भी ख़ूब चलन में हैं. लोग इन्हें इस्तेमाल करते हैं और फिर कूड़े में फेंक देते हैं. लेकिन इस आसानी ने कितनी बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है, इसका अंदाज़ा अभी जनमानस को नहीं है.

दरअसल, प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़ देश में सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा बोतलों से आता है. साल 2015-16 में करीब 900 किलो टन प्लास्टिक बोतल का उत्पादन हुआ था. राजधानी दिल्ली में अन्य महानगरों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. साल 2015 के आंकड़ों की मानें, तो दिल्ली में 689.52 टन, चेन्नई में 429.39 टन, मुंबई में 408.27 टन, बेंगलुरु में 313.87 टन और हैदराबाद में 199.33 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. सिर्फ़ दस फ़ीसद प्लास्टिक कचरा ही रि-साइकिल किया जाता है, बाक़ी का 90 फ़ीसद कचरा पर्यावरण के लिए नुक़सानदेह साबित होता है.
रि-साइक्लिंग की प्रक्रिया भी प्रदूषण को बढ़ाती है. रि-साइकिल किए गए या रंगीन प्लास्टिक थैलों में ऐसे रसायन होते हैं, जो ज़मीन में पहुंच जाते हैं और इससे मिट्टी और भूगर्भीय जल विषैला बन सकता है. जिन उद्योगों में पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तकनीक वाली रि-साइकिलिंग इकाइयां नहीं लगी होतीं. उनमें रि-साइक्लिंग के दौरान पैदा होने वाले विषैले धुएं से वायु प्रदूषण फैलता है. प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है, जो सहज रूप से मिट्टी में घुल-मिल नहीं सकता. इसे अगर मिट्टी में छोड़ दिया जाए, तो भूगर्भीय जल की रिचार्जिंग को रोक सकता है. इसके अलावा प्लास्टिक उत्पादों के गुणों के सुधार के लिए और उनको मिट्टी से घुलनशील बनाने के इरादे से जो रासायनिक पदार्थ और रंग आदि उनमें आमतौर पर मिलाए जाते हैं, वे भी अमूमन सेहत पर बुरा असर डालते हैं.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक मूल रूप से नुक़सानदेह नहीं होता, लेकिन प्लास्टिक के थैले अनेक हानिकारक रंगों, रंजक और अन्य तमाम प्रकार के अकार्बनिक रसायनों को मिलाकर बनाए जाते हैं. रंग और रंजक एक प्रकार के औद्योगिक उत्पाद होते हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक थैलों को चमकीला रंग देने के लिए किया जाता है. इनमें से कुछ रसायन कैंसर को जन्म दे सकते हैं और कुछ खाद्य पदार्थों को विषैला बनाने में सक्षम होते हैं. रंजक पदार्थों में  कैडमियम जैसी जो धातुएं होती हैं, जो सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और दिल का आकार बढ़ सकता है. लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होने लगता है.

हालांकि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रि-साइकिंल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एंड यूसेज़ रूल्स-1999 जारी किया था. इसे 2003 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1968 के तहत संशोधित किया गया है, ताकि प्लास्टिक की थैलियों और डिब्बों का नियमन और प्रबंधन सही तरीक़े से किया जा सके. भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने धरती में घुलनशील प्लास्टिक के 10 मानकों के बारे में अधिसूचना जारी की थी, मगर इसके बावजूद हालात वही 'ढाक के तीन पात' वाले ही हैं.

हालांकि दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में पॉलीथिन और प्लास्टिक से बनी सामग्रियों पर रोक लगाने का ऐलान किया जा चुका है. इसका उल्लंघन करने पर जुर्माने और क़ैद का प्रावधान भी है.प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाली समस्याएं ज़्यादातर कचरा प्रबंधन प्रणालियों की ख़ामियों की वजह से पैदा हुई हैं. प्लास्टिक का यह कचरा नालियों और सीवरेज व्यवस्था को ठप कर देता है. इतना ही नहीं नदियों में भी इनकी वजह से बहाव पर असर पड़ता है और पानी के दूषित होने से मछलियों की मौत तक हो जाती है. नदियों के ज़रिये प्लास्टिक का ये कचरा समुद्र में भी पहुंच रहा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रिपोर्ट के मुताबिक़ हर साल तकरीबन 80 लाख टन कचरा समंदरों में मिल रहा है. समंदरों में जो प्लास्टिक कचरा मिल रहा है, उसका तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा दस नदियों से आ रहा है, जिनमें यांग्त्जे, गंगा, सिंधु, येलो, पर्ल, एमर, मिकांग, नाइल और नाइजर नदियां शामिल हैं. इनमें से आठ नदियां एशिया की हैं. इनमें सबसे ज़्यादा पांच नदियां चीन की, जबकि दो नदियां भारत और एक अफ़्रीका की है. चीन ने 46 शहरों में कचरे को क़ाबू करने का निर्देश जारी किया है, ताकि नदियों के प्रदूषण को कम किया जा सके. प्लास्टिक पशुओं की मौत का भी सबब बन रहा है. कूड़े के ढेर में पड़ी प्लास्टिक की थैलियों को खाकर आवारा पशुओं की बड़ी तादाद में मौतें हो रही हैं.

प्लास्टिक के कचरे की समस्या से निजात पाने के लिए प्लास्टिक थैलियों के विकल्प के रूप में जूट से बने थैलों का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा किया जाना चाहिए. साथ ही प्लास्टिक कचरे का समुचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए. देश में सड़क बनाने और दीवारें बनाने में इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है. प्लास्टिक को इसी तरह अन्य जगह इस्तेमाल करके इसके कचरे की समस्या से निजात पाई जा सकती है. बहरहाल, प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए बेहद ज़रूरी है कि इसके प्रति जनमानस को जागरूक किया जाए, क्योंकि इस मुहिम में जनमानस की भागीदारी बहुत ज़रूरी है. इसके लिए जन आंदोलन चलाया जाना चाहिए.

भारत देश पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा हैं, जिसमें तरक्की की गगनचुम्भी इमारतों से लेकर सरपट दौड़ती बुलेट ट्रेन का स्वप्न, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के सहारे देशवासियों के लिए आधारभूत सुविधाओं को जुटाना, राष्ट्रीयता की स्थापना से लेकर आतंक से मुक्ति का महा मृत्युंजय मन्त्र भी जपा जा रहा है। इन्हीं सब प्रगति के विशाल आकाश में मोहनदास करमचंद गाँधी के स्वप्नों का स्वच्छ भारत भी अपना आकार ले रहा है। स्वस्थ्य जीवन जीने के लिए स्वच्छता का विशेष महत्व है। स्वच्छता अपनाने से व्यक्ति रोग मुक्त रहता है और एक स्वस्थ राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है। अत: हर व्यक्ति को जीवन में स्वच्छता अपनानी चाहिए और अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।
शरीर की स्वच्छता से लेकर, मन की स्वच्छता और यहाँ तक कि धन की स्वच्छता से मिलकर भी भारत के पुनर्निर्माण की नीव रखी जा सकती है। ग्राम,नगर,प्रान्त की गंदगी समाप्त होंगे के बाद ही राष्ट्र का स्वस्थ्य होना संभव है। तन-मन-धन की स्वच्छता के बाद ही इस राष्ट्र का नवीन रूप सामने आएगा। भारत माँ के अभिनन्दन  का प्रथम त्यौहार तभी मनाया जायेगा जब राष्ट्र तमाम तरह की गन्दगी से मुक्त होगा।
हज़ारों सालों तक महामारियों ने इंसानों पर अपना कहर ढाया है। कुछ लोगों का मानना था कि ये महामारियाँ परमेश्वर के क्रोध की निशानी हैं और वह बुरे लोगों को सज़ा दे रहा है। सदियों तक इस मामले में काफी जाँच-परख और खोज-बीन करने से पता चला है कि अकसर इनके कसूरवार हमारे आस-पास रहनेवाले छोटे-छोटे जीव-जंतु होते हैं।
चिकित्सा क्षेत्र के खोजकर्ताओं ने पाया कि बीमारियाँ फैलाने में छछूँदरों, चूहों, तिलचट्टों, मक्खियों और मच्छरों का बहुत बड़ा हाथ होता है। उन्होंने यह भी पाया कि लोग साफ-सफाई में लापरवाही बरतकर अकसर संक्रामक बीमारियों को न्यौता देते हैं। तो कहा जा सकता है कि साफ-सफाई का ताल्लुक ज़िंदगी और मौत से है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हालात और रिवाज़ों के मुताबिक लोगों के साफ-सफाई के स्तर अलग-अलग होते हैं। जिन इलाकों में साफ पानी नहीं मिलता या गंदे पानी के निकास की अच्छी व्यवस्था नहीं होती, वहाँ साफ-सफाई पर ध्यान देना एक चुनौती हो सकता है। मगर गौर कीजिए, जब इसराईली वीराने में सफर कर रहे थे, तब उनके लिए साफ-सफाई पर खास ध्यान देना कितना मुश्किल रहा होगा! इसके बावजूद परमात्मा ने उन्हें इस मामले में हिदायतें दीं।
अफ्रीका के देश कैमरून में रहनेवाला बच्चा मैक्स* स्कूल से छुट्टी होने के बाद दौड़ा-दौड़ा अपने छोटे-से घर में आता है। उसे ज़ोरों की भूख लगी है। घर में घुसते ही उसका कुत्ता दुम हिलाता हुआ उसके पास आता है, वह उससे लिपट जाता है। फिर अपना बस्ता खाने की मेज़ पर पटक देता है और वहीं बैठकर खाने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगता है।  रसोई में माँ को पता चल जाता है कि मैक्स आ चुका है। वह उसके लिए गर्म-गर्म चावल और फली की सब्जी परोसकर लाती है। मगर जैसे ही वह उसका बस्ता साफ मेज़ पर पड़ा देखती है उसके तेवर बदल जाते हैं। वह अपने बेटे को घूरते हुए धीरे से सिर्फ इतना कहती है, “बेटा” वह फट से समझ जाता है और अपना बस्ता वहाँ से हटा देता है। फिर दौड़कर बाहर हाथ धोने चला जाता है। भूख के मारे बेहाल जल्द ही लौट आता है और आँख चुराते हुए बुदबुदाता है: “ माँफ करना माँ, मैं भूल गया था।”
जब सेहत और साफ-सफाई की बात आती है तो इसमें एक परवाह करनेवाली माँ का बहुत बड़ा हाथ होता है। मगर उसे पूरे परिवार के सहयोग की भी ज़रूरत होती है। मैक्स का उदाहरण दिखाता है कि सफाई के मामले में लंबे समय तक तालीम देना ज़रूरी है, क्योंकि साफ-सफाई में काफी मेहनत लगती है। और खासकर बच्चों को इस मामले में लगातार याद दिलाने की ज़रूरत होती है।
मैक्स की माँ को पता है कि खाना कई तरीकों से दूषित हो सकता है। इसलिए खाना छूने से पहले वह न सिर्फ अच्छी तरह से हाथ धोती है, बल्कि मक्खियों से बचाने के लिए खाना ढककर रखती है। खाने को ढककर रखने और घर को साफ-सुथरा रखने की वजह से उसे छछूँदरों, चूहों और तिलचट्टों से निजात मिलती है।
“बाइबल के मुताबिक परमेश्वर के लोगों को पवित्र होना चाहिए क्योंकि परमेश्वर पवित्र है।” (1 पतरस 1:16) बाइबल यह भी कहती है: “पवित्रता और साफ-सफाई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए मैं अपने घर को साफ-सुथरा रखना चाहती हूँ और चाहती हूँ कि मेरा परिवार भी साफ-सुथरा दिखे। मगर यह तभी मुमकिन है जब इसमें परिवार का हर सदस्य सहयोग दे।”
वैसे तो भारत में स्वच्छता अभियान को आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से भारत सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन किया था और पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) शुरू किया जिसको बाद में (1 अप्रैल 2012 को) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा निर्मल भारत अभियान (एनबीए) नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था।
निर्मल भारत अभियान (1999 से 2012 तक पूर्ण स्वच्छता अभियान, या टीएससी) भारत सरकार द्वारा शुरू की गई समुदाय की अगुवाई वाली पूर्ण स्वच्छता (सीएलटीएस) के सिद्धांतों के तहत एक कार्यक्रम था। इस स्थिति को हासिल करने वाले गांवों को निर्मल ग्राम पुरस्कार नामक कार्यक्रम के तहत मौद्रिक पुरस्कार और उच्च प्रचार प्राप्त हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट किया कि मार्च 2014 में यूनिसेफ इंडिया और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने भारत सरकार द्वारा 1999 में शुरू विशाल पूर्ण स्वच्छता अभियान के हिस्से के रूप में स्वच्छता सम्मेलन का आयोजन किया, जिसके बाद इस विचार को विकसित किया गया।
परन्तु १५ अगस्त २०१४ को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गाँधी के स्वप्न को दोहराते हुए इस देश को स्वच्छ रखने की बात कही और उसके बाद महात्मा गाँधी के जन्मदिवस 02 अक्टूबर 2014 को 'स्वच्छ भारत अभियान' आरंभ किया गया। स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा आरंभ किया राष्ट्रीय स्तर का अभियान है जिसका उद्देश्य गलियों, सड़कों तथा अधोसंरचना को साफ-सुथरा करना है।  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने देश को गुलामी से मुक्त कराया, परन्तु 'स्वच्छ भारत' का उनका सपना पूरा नहीं हुआ। महात्मा गांधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था।
स्वच्छ भारत का उद्देश्य व्यक्ति, क्लस्टर और सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के माध्यम से खुले में शौच की समस्या को कम करना या समाप्त करना है। स्वच्छ भारत मिशन लैट्रिन उपयोग की निगरानी के जवाबदेह तंत्र को स्थापित करने की भी एक पहल करेगा। सरकार ने 2 अक्टूबर 2019, महात्मा गांधी के जन्म की 150 वीं वर्षगांठ तक ग्रामीण भारत में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत (यूएस $ 30 बिलियन) के 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके खुले में शौच मुक्त भारत (ओडीएफ) को हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
स्वच्छ भारत अभियान के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने देश की सभी पिछली सरकारों और सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों द्वारा सफाई को लेकर किए गए प्रयासों की सराहना की। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारत को स्वच्छ बनाने का काम किसी एक व्यक्ति या अकेले सरकार का नहीं है, यह काम तो देश के 125 करोड़ लोगों द्वारा किया जाना है जो भारत माता के पुत्र-पुत्रियां हैं। उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आंदोलन में तब्दील करना चाहिए। लोगों को ठान लेना चाहिए कि वह न तो गंदगी करेंगे और न ही करने देंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक साफ-सफाई न होने के चलते भारत में प्रति व्यक्ति औसतन 6500 रुपये जाया हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इसके मद्देनजर  स्वच्छ भारत जन स्वास्थ्य पर अनुकूल असर डालेगा और इसके साथ ही गरीबों की गाढ़ी कमाई की बचत भी होगी, जिससे अंतत: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होगा। उन्होंने लोगों से साफ-सफाई के सपने को साकार करने के लिए इसमें हर वर्ष 100 घंटे योगदान करने की अपील की है। प्रधानमंत्री ने शौचालय बनाने की अहमियत को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि साफ-सफाई को राजनीतिक चश्में से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे देशभक्ति और जन स्वास्थ्य के प्रति कटिबद्धता से जोड़ कर देखा जाना चाहिए।
 रोजमर्रा के जीवन में हमें अपने बच्चों को साफ-सफाई के महत्व और इसके उद्देश्य को सिखाना चाहिये। स्वच्छता एक ऐसा कार्य नहीं है जो हम दबाव में करे बल्कि ये एक अच्छी आदत और स्वस्थ तरीका है हमारे अच्छे स्वस्थ जीवन के लिये। अच्छे स्वास्थ्य के लिये सभी प्रकार की स्वच्छता बहुत जरुरी है चाहे वो व्यक्तिगत हो, अपने आसपास की, पर्यावरण की, पालतु जानवरों की या काम करने की जगह (विद्यालय, महाविद्यालय आदि) हो। हम सभी को निहायत जागरुक होना चाहिये कि कैसे अपने रोजमर्रा के जीवन में स्वच्छता को बनाये रखना है। अपनी आदत में साफ-सफाई को शामिल करना बहुत आसान है। हमें स्वच्छता से कभी समझौता नहीं करना चाहिये, ये जीवन में पानी और खाने की तरह ही आवश्यक है। इसमें बचपन से ही कुशल होना चाहिये जिसकी शुरुआत केवल हर अभिभावक के द्वारा हो सकती है पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी है के रुप में।
स्वस्थ्य भारत के निर्माण हेतु बतौर प्रथम कदम राष्ट्र की तमाम गंदगियों को मिटा कर ही आगे बड़ा जा सकता है, तन की स्वच्छता की और विशेष ध्यान दे, फिर मन में बुरे विचारों को आने न दे यहीं मन में आतंक, धर्म , जाति  लिंगभेद, ऊँच -नीच का भाव न आने पाएं, जिससे मन स्वच्छ होगा, न रिश्वत लो न ही रिश्वत दो, न ही बिना कर चुकाए कालाधन रखे, जिससे धन भी स्वच्छ होगा, उसके बाद घर को स्वच्छ रखें, मोहल्ले को स्वच्छ रखें, ग्राम,नगर और प्रान्त के साथ-साथ राष्ट्र को स्वच्छ रखें, जिससे भारत स्थाई स्वस्थ्यता मिलेगी।स्वस्थ्य भारत के साथ ही भारत के पुनर्निर्माण हेतु प्रत्येक तरीके की स्वच्छता ही कारगार विकल्प है।
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'

फ़िरदौस ख़ान 
देश में कुछ संगठन ऐसे हैं, जो निस्वार्थ भाव से जन सेवा के काम में जुटे हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल भी एक ऐसा ही संगठन है, जो मुश्किल वक़्त में लोगों की मदद करता है. कहीं बाढ़ आए, सूखा पड़े या फिर कोई और मुसीबत आए, संगठन के कार्यकर्ता राहत के कामों में बढ़ चढ़कर शिरकत करते हैं. दरअसल, जंगे-आज़ादी के वक़्त वजूद में आए इस संगठन का मक़सद ही सामाजिक समरसता को बनाए रखना और देश के नवनिर्माण में योगदान देना है. समाज सेवा के साथ-साथ कांग्रेस को मज़बूत करने में भी इसने अपना अहम किरदार अदा किया है.

पिछले कुछ अरसे से कांग्रेस की अनदेखी के शिकार इस संगठन की गतिविधियां फिर से तेज़ हो गई हैं. कांग्रेस ने अब अपने आनुषांगिक संगठन सेवा दल पर तवज्जो देनी शुरू कर दी है. यह संगठन हर महीने के आख़िरी रविवार को देशभर के एक हज़ार क़स्बों, शहरों और महानगरों में ’ध्वज वंदन’ कार्यक्रम करेगा. इन कार्यक्रमों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी आदि के सिद्धांतों और विचारों को जनमानस के सामने रखा जाएगा और उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की जाएगी.

हाल में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने सेवा दल के प्रस्तावों को अपनी मंज़ूरी दी है. उन्होंने सेवा दल के पदाधिकारियों को यक़ीन दिलाया है कि पहले की तरह ही यह संगठन आज़ाद होकर काम करेगा. सेवा दल की कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में संगठन के पदाधिकारियों ने उनके समक्ष कई प्रस्ताव रखे थे, जिसे उन्होंने मंज़ूर कर लिया.

 सेवा दल के मुख्य संगठक लालजी भाई देसाई का कहना है कि सेवा दल अब पहले की तरह सक्रिय नहीं है. अब तो सेवा दल को कांग्रेस के कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी भी नहीं दी जाती है. मौजूदा हालात को देखते हुए सेवा दल को फिर से खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष के सामने कुछ सुझाव रखे गए.

ग़ौरतलब है कि डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर ने 1 जनवरी, 1924 को आंध्र प्रदेश के काकिनाडा में कांग्रेस सेवा दल की स्थापना की थी. इसके पहले अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे. देश को आज़ाद कराने की मुहिम में शामिल कांग्रेस के क़द्दावर नेता इस संगठन से जुड़े हुए थे. सीमाप्रांत और बलूचिस्तान के महान राजनेता ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के संगठन लाल कुर्ती का विलय भी सेवादल में किया गया था. आज़ादी की मुहिम में सेवा दल के अहम किरदार के मद्देनज़र साल 1931 में इसका आज़ाद वजूद ख़त्म करके इसे कांग्रेस का हिस्सा बना दिया गया. कहा जाता है कि ये फ़ैसला सरदार बल्लभ भाई पटेल की सिफ़ारिश पर किया गया था. उन्हें डर था कि सेवा दल कहीं अपने मातृ संगठन कांग्रेस को ही ख़त्म न कर दे. अपनी इस आशंका का ज़िक्र करते हुए उन्होंने महात्मा गांधी से कहा था कि ‘अगर सेवादल को आज़ाद छोड़ दिया गया, तो वह हम सबको लील जाएगा.’
पहले इसे हिन्दुस्तानी सेवा दल के नाम से जाना जाता था, बाद इसे कांग्रेस सेवा दल का नाम दिया. दरअसल, कांग्रेसियों ने महिला सेना का गठन किया था. इस पर कार्रवाई करते हुए साल 1932 में बिटिश शासकों ने सेवा दल पर पाबंदी लगा दी थी, बाद में कांग्रेस से तो पाबंदी हटा ली गई, लेकिन हिन्दुस्तानी सेवा दल पर पाबंदी जारी रही. बाद में यह संगठन कांग्रेस सेवा दल के नाम से वजूद में आया.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि देश को आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस हुकूमत में आ गई. कांग्रेस का सारा ध्यान सत्ता संभालने में लग गया. कांग्रेस के कई नये आनुषांगिक संगठन वजूद में आते गए और बदलते वक़्त के साथ-साथ सेवा दल की अनदेखी होने लगी. सेवा दल के कार्यकर्ताओं को मलाल है कि उन्हें महज़ रवायती बना दिया गया. कांग्रेस के समारोहों में उनकी ज़िम्मेदारी वर्दी पहनकर इंतज़ामों की देखरेख की रह गई.  जिस मक़सद से सेवा दल का गठन किया गया था, वह कहीं पीछे छूटने लगा. लेकिन इस सबके बावजूद सेवा दल के कार्यकर्ता अपने काम में लगे रहे. वे सामाजिक कार्यों में पहले की तरह ही बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते रहे, चाहे प्राकृतिक आपदाओं में पीडि़तों की मदद करनी हो या फिर महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों और महोत्सवों में श्रद्धालुओं के रहने और भोजन का इंतज़ाम करना हो. हर जगह इनकी मौजूदगी नज़र आती है.  

कांग्रेस के अग्रिम संगठनों में सेवा दल का अनुशासन और निष्ठा इसे और भी ख़ास बनाती है. बिल्कुल फ़ौज की तरह इसका संचालन किया जाता है. एक दौर वह भी था जब सेवा दल में प्रशिक्षण लेने के बाद ही किसी को कांग्रेस में शामिल किया जाता था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने अपने बेटे राजीव गांधी को कांग्रेस में शामिल करने से पहले सेवा दल का प्रशिक्षण दिलाया था, ताकि वे पार्टी की नीतियों को बेहतर तरीक़े से समझ पाएं. निस्वार्थ सेवा और सहयोग भाव की वजह से ही सेवा दल को कांग्रेस का सच्चा सिपाही कहा जाता है.

फ़िलवक़्त देश के 700 ज़िलों और शहरों में सेवा दल की इकाइयां हैं. सेवा दल की एक युवा इकाई शुरू करने की योजना है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को इससे जोड़ा जा सके. आज जब कांग्रेस अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने और पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए जद्दोजहद कर रही है, ऐसे में सेवा दल कांग्रेस के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है, बस इस पर ख़ास तवज्जो देने की ज़रूरत है. देश में फैले अराजकता और अविश्वास के माहौल को देखते हुए भी सेवा दल जैसे संगठनों की बेहद ज़रूरत है, जो सांप्रदायिक सौहार्द्र, सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने का काम करते हैं.

भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक इकाई का वृहद ढांचा इस राष्ट्र के संस्कार और सचेतक समाज से हैं | विस्तृत धर्म ग्रन्थ और उपनिषद जो जीवन जीने की कलाओं के साथ संस्कारों के संरक्षण की गाथा कहते है। योग,जीवन जीने की इन्ही कलाओं में एक है।
योग भारत में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बंधित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत्‌ में लोग इससे परिचित हैं।
प्रतिष्ठित धर्म ग्रंथ भगवद्गीता में योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं पतंजलि योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। पाशुपत योग और माहेश्वर योग जैसे शब्दों के भी प्रसंग मिलते है। इन सब स्थलों में योग शब्द के जो अर्थ हैं वह एक दूसरे के विरोधी हैं परंतु इस प्रकार के विभिन्न प्रयोगों को देखने से यह तो स्पष्ट हो जाता है, कि योग की परिभाषा करना कठिन कार्य है।
‘योग’ शब्द ‘युज समाधौ’ आत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में ‘घं’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध। वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योग’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा। आगे योग में हम देखेंगे कि आत्मा और परमात्मा के विषय में भी योग कहा गया है।
गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है 'योग: कर्मसु कौशलम्‌' (योग से कर्मो में कुशलता आती हैं) पंतजलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं।पतंजलि, व्यापक रूप से औपचारिक योग दर्शन के संस्थापक माने जाते है। पतंजलि के योग, बुद्धि का नियंत्रण के लिए एक प्रणाली है,राज योग के रूप में जाना जाता है। पतंजलि उनके दूसरे सूत्र मे "योग" शब्द का परिभाषित करते है,जो उनके पूरे काम के लिए व्याख्या सूत्र माना जाता है।
तीन संस्कृत शब्दों के अर्थ पर यह संस्कृत परिभाषा टिका है। अई.के.तैम्नी इसकी अनुवाद करते है की,"योग बुद्धि के संशोधनों का निषेध है" । योग का प्रारंभिक परिभाषा मे इस शब्द nirodhaḥ का उपयोग एक उदाहरण है कि बौद्धिक तकनीकी शब्दावली और अवधारणाओं, योग सूत्र मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है; इससे यह संकेत होता है कि बौद्ध विचारों के बारे में पतंजलि को जानकारी थी और अपने प्रणाली मे उन्हें बुनाई। स्वामी विवेकानंद इस सूत्र को अनुवाद करते हुए कहते है,"योग बुद्धि (चित्त) को विभिन्न रूपों (वृत्ति) लेने से अवरुद्ध करता है। पतंजलि का लेखन 'अष्टांग योग"("आठ-अंगित योग") एक प्रणाली के लिए आधार बन गया।
योग की प्रसिद्धि भारत में स्वामी रामदेव के कारण ज्यादा हुई इसे कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, इसके बाद पहली बार ११ दिसंबर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है।
योग का जीवन में बहुत महत्व हैं तन की तंदरुस्ती, मन की शांति और वर्तमान में तो आय का जरिया भी हैं। प्रतिदिन योग करने से तन-मन के विकारों का समूल नाश होता हैं, जीवन के निर्बाध चलने के लिए स्वास्थ्य लाभ होना आवश्यक है। यदि आप का तन स्वस्थ है तो आप जीवन के सभी सुख जी पाएंगे अन्यथा ढाक के तीन पात।  ज्ञानी कहते है कि 'पहला सुख निरोगी काया' और निरोगी काया के लिए 'मन चंगा तो कठोती में गंगा'  और मन की निर्मलता के लिए योग और योगी मुद्रा का होना आवश्यक हैयोग और योगी द्वारा ही भारतीय मनीषा में जाग्रति और शांति के साथ संवर्धन का महत्व स्थापित हो पायेगा।
वर्तमान में योग से आय भी प्राप्त की जा सकती है इस बात को बल दिया है, पतंजलि योग पीठ के स्वामी रामदेव जी ने। वे अपने संस्थान के माध्यम से राष्ट्र को निरोगी बनाने के लिए भारत के प्रत्येक ग्राम, नगर और प्रान्त में योग प्रचारकों की नियुक्ति कर रहे हैं, उन प्रचारकों का दायित्व होगा लोगों में योगक्रांति का सूत्रपात करना,योग सीखना और इसके एवज में पतंजलि ट्रस्ट द्वारा योग प्रचारकों को मानदेय भी दिया जायेगा। यदि वहां न जुड़ना चाहे तो निजी योग कक्षाओं का संचालन करके भी आमदनी प्राप्त की जा सकती है। अर्थात तन-मन-धन के लिए लाभप्रद है योग।
योग का जीवन में स्वास्थ्यगत महत्व तो है ही साथ में आर्थिक सुधार हेतु भी योग महत्वपूर्ण है। हमें अपने जीवन में नियमित योग से जुड़े रहना चाहिए और योग द्वारा शरीर को स्वस्थ रखना ही चाहिए क्योंकि एक तंदरुस्ती हजार नियामत है।  
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'

फ़िरदौस ख़ान
राहुल गांधी देश और राज्यों में सबसे लम्बे अरसे तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. वे एक ऐसे ख़ानदान के वारिस हैं, जिसने देश के लिए अपनी जानें क़ुर्बान की हैं. राहुल गांधी के लाखों-करोड़ों चाहने वाले हैं. देश-दुनिया में उनके प्रशंसकों की कोई कमी नहीं है. लेकिन इस सबके बावजूद वे अकेले खड़े नज़र आते हैं. उनके चारों तरफ़ एक ऐसा अनदेखा दायरा है, जिससे वे चाहकर भी बाहर नहीं आ पाते.  एक ऐसी दीवार है, जिसे वे तोड़ नहीं पा रहे हैं. वे अपने आसपास बने ख़ोल में घुटन तो महसूस करते हैं, लेकिन उससे निकलने की कोई राह, कोई तरकीब उन्हें नज़र नहीं आती.

बचपन से ही उन्हें ऐसा माहौल मिला, जहां अपने-पराये और दोस्त-दुश्मन की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो गया था. उनकी दादी इंदिरा गांधी और उनके पिता राजीव गांधी का बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया. इन हादसों ने उन्हें वह दर्द दिया, जिसकी ज़रा सी भी याद उनकी आंखें भिगो देती है. उन्होंने कहा था,  "उनकी दादी को उन सुरक्षा गार्डों ने मारा, जिनके साथ वे बैडमिंटन खेला करते थे."
वैसे राहुल गांधी के दुश्मनों की भी कोई कमी नहीं है. कभी उन्हें जान से मार देने की धमकियां मिलती हैं, तो कभी उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके जाते हैं. गुज़शता अप्रैल में उनका जहाज़ क्रैश होते-होते बचा. कर्नाटक के हुबली में उड़ान के दौरान 41 हज़ार फुट की ऊंचाई पर जहाज़ में तकनीकी ख़राबी आ गई और वह आठ हज़ार फ़ुट तक नीचे आ गया. उस वक़्त उन्हें लगा कि जहाज़ गिर जाएगा और उनकी जान नहीं बचेगी.  लेकिन न जाने किनकी दुआएं ढाल बनकर खड़ी हो गईं और हादसा टल गया. कांग्रेस ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का इल्ज़ाम लगाया.
किसी अनहोनी की आशंका की वजह से ही राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. बचपन में भी उन्हें गार्डन के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की इजाज़त नहीं थी. खेलते वक़्त भी सुरक्षाकर्मी किसी साये की तरह उनके साथ ही रहा करते थे. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं." लेकिन ऐसा ज़्यादा वक़्त नहीं हो पाया और वे फिर से सुरक्षाकर्मियों के घेरे में क़ैद होकर रह गए.

हर वक़्त कड़ी सुरक्षा में रहना, किसी भी इंसान को असहज कर देगा, लेकिन उन्होंने इसी माहौल में जीने की आदत डाल ली. ख़ौफ़ के साये में रहने के बावजूद उनका दिल मुहब्बत से सराबोर है. वे एक ऐसे शख़्स हैं, जो अपने दुश्मनों के लिए भी दिल में नफ़रत नहीं रखते. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया.” अपने पिता की सीख को उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ढाला. इसीलिए उन्होंने अपने पिता के क़ातिलों तक को माफ़ कर दिया. उनका कहना है, "वजह जो भी हो, मुझे किसी भी तरह की हिंसा पसंद नहीं है. मुझे पता है कि दूसरी तरफ़ होने का मतलब क्या होता है. ऐसे में जब मैं जब हिंसा देखता हूं चाहे वो किसी के भी साथ हो रही हो, मुझे पता होता है कि इसके पीछे एक इंसान, उसका परिवार और रोते हुए बच्चे हैं. मैं ये समझने के लिए काफ़ी दर्द से होकर गुजरा हूं. मुझे सच में किसी से नफ़रत करना बेहद मुश्किल लगता है."
उन्होंने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण का ज़िक्र करते हुए कहा था, "मुझे याद है जब मैंने टीवी पर प्रभाकरण के मुर्दा जिस्म को ज़मीन पर पड़ा देखा. ये देखकर मेरे मन में दो जज़्बे पैदा हुए. पहला ये कि ये लोग इनकी लाश का इस तरह अपमान क्यों कर रहे हैं और दूसरा मुझे प्रभाकरण और उनके परिवार के लिए बुरा महसूस हुआ."

राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल गांधी का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है. उन्होंने जब सुना कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दाख़िल कराए गए हैं, तो वे उनका हालचाल जानने के लिए अस्पताल पहुंच गए. वे इंसानियत को सर्वोपरि मानते हैं. अपने पिता की ही तरह अपने कट्टर विरोधियों की मदद करने में भी पीछे नहीं रहते. विभिन्न समारोहों में वे लाल्कृष्ण आडवाणी का भी ख़्याल रखते नज़र आते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है.
वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."

कहते हैं कि सच के रास्ते में मुश्किलें ज़्यादा आती हैं और राहुल गांधी को भी बेहिसाब मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. बचपन से ही उनके विरोधियों ने उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रचनी शुरू कर दी थीं.   उन पर लगातार ज़ाती हमले किए जाते हैं. इस बात को राहुल गांधी भी बख़ूबी समझते हैं, तभी तो उन्होंने विदेश जाने से पहले ट्वीट करके अपने विरोधियों से कहा था, "कुछ दिन के लिए देश से बाहर रहूंगा. भारतीय जनता पार्टी की सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के दोस्तों, ज़्यादा परेशान मत होना. मैं जल्द ही वापस लौटूंगा."

राहुल गांधी एक नेता हैं, जो पार्टी संगठन को मज़बूत करने के लिए, पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी के लोग ऐन चुनावों के मौक़ों पर ऐसे बयान दे जाते हैं, ऐसे काम कर जाते हैं, जिससे विरोधियों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा मिल जाता है. इन लोगों में वे लोग भी शामिल हैं, जो उनकी दादी, उनके पिता के क़रीबी रहे हैं. ताज़ा मिसाल पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की है, जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में शिरकत करके सियासी बवाल पैदा कर दिया.

बहरहाल, राहुल गांधी तमाम अफ़वाहों और अपने ख़िलाफ़ रची जाने वाली तमाम साज़िशों से अकेले ही जूझ रहे है, मुस्कराकर उनका सामना कर रहे हैं.

मेरे महबूब !
आज तुम्हारी सालगिरह है... ये दिन मेरे लिए भी बहुत ख़ास है...बिलकुल ईद की तरह... क्योंकि अगर तुम न होते तो...मैं भी कहां होती... तुम्हारे दम से ही मेरी ज़िन्दगी में मुहब्बत की रौशनी है...और अगर ये रौशनी न होती, तो ज़िन्दगी कितनी अधूरी होती, लाहासिल होती...

तुम्हारे लिए एक दुआ...
मेरे महबूब !
तुम्हारी ज़िन्दगी में
हमेशा मुहब्बत का मौसम रहे...
मुहब्बत के मौसम के
वही चम्पई उजाले वाले दिन
जिसकी बसंती सुबहें
सूरज की बनफ़शी किरनों से
सजी हों...
जिसकी सजीली दोपहरें
चमकती सुनहरी धूप से
सराबोर हों...
जिसकी सुरमई शामें
रूमानियत के जज़्बे से
लबरेज़ हों...
और
जिसकी मदहोश रातों पर
चांदनी अपना वजूद लुटाती रहे...
तुम्हारी ज़िन्दगी का हर साल
और
साल का हर दिन
और
हर दिन का हर लम्हा
मुहब्बत के नूर से रौशन रहे...
यही मेरी दुआ है
तुम्हारे लिए...
-फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान
देश में भूख से मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश झारखंड से भूख से मरने की ख़बरें आईं. चतरा ज़िले के इतखोरी में मीना मुसहर नामक एक महिला की मौत हो गई. उसके बेटे का कहना है कि उसकी मां ने चार दिनों से अन्न का एक दाना तक नहीं खाया था. हालत बिगड़ने पर वह अपनी मां को अस्पताल ले गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. महिला कचरा बीनकर अपना गुज़ारा करती थी. इससे पहले शनिवार को गिरीडीह ज़िले के मनगारगड्डी की सावित्री देवी मौत हो गई थी. ग्रामीणों के मुताबिक़ महिला ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था. वह भीख मांग कर अपना पेट भरती थी. भूख से मौत के ये पहले मामले नहीं हैं. ऐसे मामले सामने आते रहते हैं और सरकारें इन मामलों को गंभीरता से लेने की बजाय ख़ुद को बचाने के लिए लीपा-पोती में लग जाती हैं, जो बेहद शर्मनाक है.

दरअसल, भूख से मौत की समस्या सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं है, बल्कि यह आज पूरी दुनिया में फैली हुई है. भोजन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. इस मुद्दे को सबसे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रेंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने एक व्याख्यान में उठाया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया और 1948 में आर्टिकल 25 के तहत भोजन के अधिकार के रूप में इसे मंज़ूर किया. साल 1976 में संयुक्त राष्ट्र परिषद ने इस अधिकार को लागू किया, जिसे आज 156 राष्ट्रों की मंज़ूरी हासिल है और कई देश इसे क़ानून का दर्जा भी दे रहे हैं. इस क़ानून के लागू होने से भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकेगा.

लेकिन तमाम कोशिशों और तमाम दावों के बावजूद लोगों को भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा है. हालत ये है कि दुनियाभर में भूख से जूझने वाले लोगों की वालों की तादाद  12 करोड़ 40 लाख हो गई. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी के प्रमुख डेविड बीसली के मुताबिक़ भूख से जूझ रहे तक़रीबन तीन करोड़ 20 लाख लोग चार देशों सोमालिया, यमन, दक्षिण सूडान और उत्तर पूर्व नाइजीरिया में हैं. दुनियाभर में भुखमरी का दंश झेल रहे  81 करोड़ 50 लाख लोगों में से 60 फ़ीसद लोग ऐसे संघर्षरत इलाकों में रहते हैं, जहां उन्हें यह तक मालूम नहीं होता कि उन्हें अगली बार खाना कब से मिलेगा.

एक अन्य रिपोर्ट की मानें, तो भूख और ग़रीबी की वजह से रोज़ाना 25 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है. 85 करोड़ 40 लाख लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोपियन संघ की जनसंख्या से ज़्यादा है. भुखमरी के शिकार लोगों में 60 फ़ीसद महिलाएं हैं. दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों में हर साल 40 लाख लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है. हर पांच सेकेंड में एक बच्चा भूख से दम तोड़ता है. 18 साल से कम उम्र के तक़रीबन 35.8 से 45 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं. विकासशील देशों में हर साल पांच साल से कम उम्र के औसतन 10 करोड़ 90 लाख बच्चे मौत का शिकार बन जाते हैं. इनमें से ज़्यादातर मौतें कुपोषण और भुखमरी से जनित बीमारियों से होती हैं. कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए सालाना राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर है. विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है. यह संख्या तक़रीबन एक करोड़ 46 लाख है.

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाज़ार में पड़ी गली-सड़ी सब्ज़ियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं. महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूडे़दानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है. रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार की वजह से कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से अब तक ग़रीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफ़ीताशाही की वजह से वे महज़ काग़ज़ों तक ही सिमट कर रह गईं. एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ भूख से लोग मर रहे होते हैं. ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है? भुखमरी के स्थायी समाधान के लिए लोगों को रोज़गार मुहैया कराना होगा. केंद्र की पिछली यूपीए सरकार ने लोगों को बेहद मामूली दामों में अनाज मुहैया कराने की योजना बनाई थी. इसके तहत परिवार के प्रति सदस्य को सात किलो खाद्यान्न यानी 3 रुपये किलो गेहूं, 2 रुपये किलो चावल और एक रुपये किलो की दर से मोटा अनाज दिया जाना था. इस योजना का फ़ायदा हर ज़रूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचे सरकार यह सुनिश्चित करना होगा.

ग़ौरतलब है कि पिछले साल  कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य को भूखमरी मुक्त बनाने के मक़सद से लोगों को सस्ता भोजन मुहैया कराने की एक सराहनीय योजना शुरू की थी. 16 अगस्त, 2017 को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु के जयनगर वॉर्ड में इंदिरा कैंटीन का उद्घाटन किया था. तमिलनाडु के अम्मा कैंटीन के तर्ज़ पर बने इस इंदिरा कैंटीन में 5 रुपये में नाश्ता और 10 रुपये में दिन और रात का खाना मिलता है.  राहुल गांधी ने कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की इस पहल को ‘सभी को भोजन’ के कांग्रेस के संकल्प की ओर एक और क़दम बताया था.  उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में बहुत से लोग बड़े घरों में रहते हैं और महंगी कारों से चलते हैं. उनके लिए खाना बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन यहां लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़्यादा पैसा नहीं है. इंदिरा कैंटीन इनकी सेवा करेगी. हम चाहते हैं कि शहर के सबसे ग़रीब और कमज़ोर तबक़े के लोग जानें कि वे भूखे नहीं रहने वाले. कैंटीन के भोजन की गुणवत्ता को परखने के लिए  उद्घाटन के बाद राहुल गांधी ने कैंटीन जाकर खाना भी खाया.

जिस देश में भूख से लोगों की मौतें होती हों, जहां करोड़ों लोग आज भी भूखे पेट सोते हों, ऐसे देश में सस्ता खाना मुहैया कराना बेहद ज़रूरी है. तमिलनाडु के ’अम्मा कैंटीन’ की तर्ज़ पर देश भर में कैंटीन खोले जाने चाहिए, ख़ासकर देश के उन हिस्सों में जो ग़रीबी की मार से बुरी तरह जूझ रहे हैं और जहां से बार-बार भूख और कुपोषण से लोगों के मरने की ख़बरें आती रहती हैं. दरअसल, देशभर में इस तरह की योजनाएं लागू करने की बेहद ज़रूरत है.

जिस देश में, जिस समाज में भूख से तड़प-तड़प कर किसी की मौत हो जाए. क्या उस देश का शासन-प्रशासन ख़ुद को जनहितैषी कह सकता है ? क्या वह समाज ख़ुद को सभ्य कह सकता है ? क्या इसके लिए सिर्फ़ सरकार और शासन-प्रशासन दोषी है ? क्या इसके लिए सिर्फ़ समाज को दोष देकर अपना दामन बचाया जा सकता है ? नहीं, बिल्कुल नहीं, क्योंकि हम सब भी इसके लिए बराबर के ज़िम्मेदार हैं. व्यक्ति से परिवार बनता है और परिवार से समाज. समाज से ही देश बनता है. भूख से सिर्फ़ इंसान नहीं, इंसानियत भी मरती है.


“कानपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका प्रभा में सन 1923 में प्रेमचंद का एक लेख हज़रत अली शीर्षक से प्रकाशित हुआ था. यह लेख अब तक असंकलित है.”
ज़रत अली की कीर्ति जितनी उज्ज्वल और चरित्र जितना आदर्श है उतना और किसी का न होगा. वह फ़क़ीर, औलिया नहीं थे. उनकी गणना राजनीतिज्ञों या विजेताओं में भी नहीं की जा सकती. लेकिन उन पर जितनी श्रद्धा है, चाहे शिया हो चाहे सुन्नी, उतनी और किसी पर नहीं. उन्हें सर्वसम्मति ने 'शेरे-ख़ुदा’, 'मुश्किल कुशा’ की उपाधियां दे रखी हैं. समरभूमि में मुस्लिम सेना धावा करती है, तो 'या अली’ कहकर. उनकी दीन-वत्सलता की सहस्त्रों किवदंतियां प्रचलित हैं. इस सर्वप्रियता, भक्ति का कारण यही है कि अली शांत प्रकृति, गंभीर,  धैर्यशील और उदार थे.

हज़रत अली हज़रत मुहम्मद के दामाद थे. विदुषी फ़ातिमा का विवाह अली से हुआ था. वह हज़रत मुहम्मद के चचेरे भाई थे. मर्दों में सबसे पहले वही हज़रत मुहम्मद पर विश्वास लाए थे. इतना ही नहीं मुहम्मद का पालन-पोषण उन्हीं के पिता अबूतालिब ने किया था. मुहम्मद साहब को उनसे बहुत प्रेम था और उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनके बाद अली ही ख़िलाफ़त की मसनद पर बिठाए जाएं. पर नियम से बंधे होने के कारण वह इसे स्पष्ट रूप से न कह सकते थे. अली में अमर, अधिकार-भोग की लालसा होती, तो वह मुहम्मद के बाद अपना हक अवश्य पेश करते, लेकिन वह तटस्थ रहे और जनता ने अबूबक्र को ख़लीफ़ा चुन लिया. अबूबक्र के बाद उमर फ़ारूक़ ख़लीफ़ा हुए, तब भी अली ने अपना संतोष-व्रत न छोड़ा. फ़ारूक़ के बाद उस्मान की बारी आई. उस वक़्त अली के ख़लीफ़ा चुने जाने की बहुत संभावना थी, किंतु यह अवसर भी निकल गया, पक्ष बहुत बलवान होने पर भी ख़िलाफ़त न मिल सकी. इस घटना का स्पष्टीकरण इतिहासकारों ने यों किया कि जब निर्वाचक मंडल के मध्यस्थ ने अली से पूछा, 'आप पर ख़लीफ़ा होकर शास्त्रानुसार शासन करेंगे न?’ अली ने कहा, 'यथासाध्य.’ मध्यस्थ ने यही प्रश्न उस्मान से भी किया. उस्मान ने कहा,  'ईश्वर की इच्छा से, अवश्य करूंगा।’ मध्यस्थ ने उस्मान को ख़लीफ़ा बना दिया. मगर अली को अपने असफल होने का लेशमात्र भी दुख नहीं हुआ. वह राज्य कार्य से पृथक रहकर पठन पाठन में प्रवृत्ति हो गए. इतिहास और धर्मशास्त्र में वह पारंगत थे. साहित्य के केवल प्रेमी ही नहीं, स्वयं अच्छे कवि थे. उनकी कविता का अरबी भाषा में आज भी बड़ा मान है, किंतु राज्यकार्य से अलग रहते हुए भी वह ख़लीफ़ा उस्मान को कठिन अवसरों पर उचित परामर्श देते रहते थे.

अरब जाति को इस बात का गौरव है कि उसने जिस देश की विजय की सबसे पहले कृषकों की दशा सुधारने का प्रयत्न किया. ईराक, शाम, ईरान सभी देशों में कृषकों पर भूपतियों के अत्याचार होते थे. मुसलमानों ने इन देशों में पदार्पण करते ही प्रजा को भूपतियों की निरकुंशता से निवृत्त किया. यही कारण था कि प्रजा मुसलमान विजेताओं को अपना उद्धारक समझती थी और सहर्ष उनका स्वागत करती थी. यही लोग पहुंचते ही नहरे बनवाते थे, कुएं खुदवाते थे, भूमि कर घटाते थे और भांति-भांति की बेगारों की प्रथा को मिटा देते थे. यह नीति ख़लीफ़ा अबूबक्र और ख़लीफ़ा उमर दोनों ही के शासनकाल में होती रही. यह सब अली के ही सत्परामर्शों का फल था. वह पशुबल से प्रजा पर शासन करना पाप समझते थे. उनके हृदयों पर राज्य की भित्ति बनाना ही उन्हें श्रेयस्कर जान पड़ता था.

ख़लीफ़ा उस्मान धर्मपरायण पुरुष थे, किंतु उनमें दृढ़ता का अभाव था. वह निष्पक्षभाव से शासन करने में समर्थ न थे. वह शीघ्र ही अपने कुल वालों के हाथ की कठपुतली बन गए. विशेषत: मेहवान नाम के एक पुरुष ने उन पर अधिपत्य जमा लिया. उस्मान उसके हाथों में हो गए. सूबेदारों ने प्रांतों में प्रजा पर अत्याचार करने शुरू किए. उन दिनों शाम (सीरिया) की सूबेदारी पर मुआविया नियत थे, जो आगे चलकर अली के बाद ख़लीफ़ा हुए. मुआविया के कर्मचारियों ने प्रजा को इतना सताया कि समस्त प्रांत में हाहाकार मच गया. प्रजावर्ग के नेताओं ने ख़लीफ़ा के यहां आकर शिकायत की. मेहवान ने इन लोगों का अपमान किया और उन पर राज-विद्रोह का लांछन लगाया. लेकिन दूतों ने कहा कि जब तक हमारी फ़रियाद न सुनी जाएगी और हमको अत्याचारों से बचाने का वचन न दिया जाएगा हम यहां से कदापि न जाएंगे. ख़लीफ़ा उस्मान को भी ज्ञात हो गया कि समस्या इतनी सरल नहीं है, दूतगंग असंतुष्ट होकर लौटेंगे तो संभव है, समस्त देश में कोई भीषण स्थिति उत्पन्न हो जाए. उन्होंने हज़रत अली से इस विषय में सलाह पूछी. हज़रत अली ने दूतों का पक्ष लिया और ख़लीफ़ा को समझाया कि इन लोगों की विनय-प्रार्थना को सुनकर वास्तविक स्थिति का अन्वेषण करना चाहिए और यदि सूबेदार और उस के कर्मचारियों का अपराध सिद्ध हो जाए, तो धर्मशास्त्र के अनुसार उन्हें दंड देना चाहिए. हम यह कहना भूल गए कि उस्मान बनू उस्मानिया वंश के पूर्व पुरुष थे. इस वंश में चिरकाल तक ख़िलाफ़त रही. लेकिन यह वंश बनू हाशिमिया का सदैव से प्रतिद्वंद्वी था जिसमें हज़रत मुहम्मद उमर अली आदि थे. अतएव उस्मान के अधिकांश सूबेदार सेनानायक बनू उस्मिया वंश के ही थे और वह सब हज़रत अली को सशंक नेत्रों से देखते थे और मन ही मन द्वेष भी रखते थे. हज़रत अली की सलाह इन लोगों को पक्षपातपूर्ण मालूम हुई और वह इस की अवहेलना करना चाहते थे, किंतु ख़लीफ़ा को अली पर विश्वास था, उनकी सलाह मान ली, नेताओं को आश्वासन दिया कि हम शीघ्र ही सूबेदार के अत्याचारों की तहक़ीक़ात करेंगे और तुम्हारी शिकायतें दूर कर दी जाएंगी. उस्मान के बाद हज़रत अली ख़लीफ़ा चुने गए. यद्यपि उन्हें हज़रत मुहम्मद के बाद ही चुना जाना चाहिए था.

ख़िलाफ़त की बागडोर हाथ में लेते ही अली ने स्वर्गवासी उस्मान के नियत किए हुए सूबेदारों को, जो प्रजा पर अभी तक अत्याचार कर रहे थे, पदच्यूत कर दिया और उनकी जगह पर धर्मपरायण पुरुषों को नियुक्त किया. कितनों की ही जागीरें ज़बरदस्ती कर प्रजा को दे दीं, कई कर्मचारियों के वेतन घटा दिए.

मुआविया ने शाम में बहुत बड़ी शक्ति संचित कर ली थी. इसके उपरांत वह सभी आदमी जो परलोकवासी ख़लीफ़ा उस्मान के ख़ून का बदला लेना चाहते थे और हज़रत अली को इस हत्या का प्रेरक समझते थे, मुआविया के पास चले गए थे. 'आस’ का पुत्र 'अमरो’ इन्हीं द्वेषियों में था. अतएव जब अली शाम की तरफ़ बढ़े तो मुआविया एक बड़ी सेना से उनका प्रतिकार करने को तैयार था. हज़रत अली की सेना में कुल 8 हज़ार योद्धा थे. जब दोनों सेनाएं निकट पहुंच गईं, तो ख़लीफ़ा ने फिर 'मुआविया’ से समझौता करने की बातचीत की. पर जब विश्वास हो गया कि लड़ाई के बग़ैर कुछ निश्चय न होगा, तो उनने 'अशतर’ को अपनी सेना का नायक बना कर लड़ाई की घोषणा कर दी. यह शत्रुओं की लड़ाई नहीं, बंधुओं की लड़ाई थी. मुआविया की सेना ने फ़रात नदी पर अधिकार प्राप्त कर लिया और ख़लीफ़ा की सेना को प्यासा मार डालने की ठानी. अशतर ने देखा पानी के बिना सब हताश हो रहे हैं, तो उसने कहला भेजा, 'पानी रोकना युद्ध के नियमों के अनुकूल नहीं है, तुम नदी किनारे से सेना हटा लो.’ मुआविया की भी राय थी कि इतनी क्रूरता न्याय विहीन है, पर उसके दरबारियों ने जिनमें 'आस’ का बेटा 'अमरो’ प्रधान था, उस का विरोध किया. अंत में अशतर ने विकट संग्राम के बाद शत्रुओं को जल तट से हटा कर अपना अधिकार जमा लिया. अब इन लोगों की भी इच्छा हुई कि शत्रुओं को पानी न लेने दें पर हज़रत अली ने इस पाशविक रणनीति का तिरस्कार किया और अशतर को जल तट से हटने की आज्ञा दी.

इसके बाद मुहर्रम का पवित्र मास आ गया. इस महीने में मुसलमान जाति के लड़ाई करना निषिद्ध है. हज़रत अली ने तीन बार अपने दूत भेजे, लेकिन मुआविया ने हर बार यही जवाब दिया कि अली ने उस्मान की हत्या कराई है. वह ख़िलाफ़त छोड़ दें और उस्मान के घातकों को मेरे सुपुर्द कर दें. मुआविया वास्तव में इस बहाने से स्वयं ख़लीफ़ा बनना चाहता था. वह अली के मित्रों को भांति-भांति के प्रलोभनों से फोड़ने की चेष्टा किया करता था. जब मुहर्रम का महीना यों ही गुज़र गया, तो ख़लीफ़ा ने रिसालों की तैयारी की अज्ञा दी और सेना को उपदेश किया कि जब तक वे लोग तुम से न लड़े तुम उन पर कदापि आक्रमण न करना. जब वह पराजित हो जाए, तो भागने वालों का पीछा न करना और न ही उनका वध करना. घायलों का धन न छीनना, किसी को नग्न मत करना और न किसी स्त्री का सतीत्व भ्रष्ट करना, चाहे वे तुम लोगों को गालिया भी दें. दूसरे ही दिन लड़ाई शुरू हुई और 20 दिनों तक जारी रही. एक बार वह शाम की सेना की सफ़ों को चीरते हुए मुआविया के पास जा पहुंचे और उसे ललकार कर कहा, ञ्चयों व्यर्थ दोनों तरफ़ के वीरों का रक्त बहाते हो, आओ हम और तुम अकेले आपस में निपट लें. पर मुआविया अली के बाहुबल को ख़ूब जानता था. अकेले निकलने का साहस न हुआ.

दसवें दिन सारी रात लड़ाई होती रही. शुक्र का दिन था. मध्याह्न काल बीत गया, किंतु दोनों सेनाएं युद्धस्थल में अचल खड़ी थीं. सहसा अशतर ने अपनी समग्र शक्ति को एकत्र करके ऐसा धावा किया कि शामी सेना के क़दम उखड़ गए. इतने में आस के बेटे अमरो को एक उपाय सूझा. उसने मुआविया से कहा अब क्या देखते हो, मैदान तुम्हारे हाथ से जाना चाहता है, लोगों को हुक्म दो कि क़ुरान शरीफ़ अपने भालों पर उठाएं और उच्च स्वर से कहें, 'हमारे और तुक्वहारे बीच में क़ुरान है.’ अगर वह लोग क़ुरान की मर्यादा रखेंगे, तो यह मारकाट इसी दम बंद हो जाएगी. अगर न मानेंगे, तो उनमें मतभेद अवश्य हो जाएगा. इसमें भी हमारा ही फ़ायदा है. क़ुरान नेज़ों पर उठाए गए. अली समझ गए कि शत्रुओं ने चाल चली. सिपाहियों ने आगे बढ़ने से इनकार किया और कहने लगे हमको हार जीत की चिंता नहीं है, हम तो केवल न्याय चाहते हैं. यदि वह लोग न्याय करना चाहते हैं, तो हम तैयार हैं. अशतर ने सेना को समझाया, मित्रों, यह शत्रुओं की कपटनीति है, इनमें से एक भी क़ुरान का व्यवहार नहीं करता, इन्होंने केवल अपनी प्राण रक्षा के लिए यह उपाय किया है. किंतु कौन सुनता.

जब चारों ओर शांति छा गई, तो कीस के बेटे 'आशअस’ ने हज़रत अली से कहा कि अब मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं जाकर मुआविया से पूछूं कि तुमने क्यों शरण मांगी है. जब वह मुआविया के पास आए, तो उसने कहा, मैंने इसलिए शरण मांगी है कि हम और तुम दोनों अल्लाहताला से न्याय की प्रार्थना करें. दोनों तरफ़ से एक-एक मध्यस्थ चुन लिया जाए. लोगों ने 'अबूमूसा अशअरी’ को चुना. अली ने इस निर्वाचन को अस्वीकार किया और कहा मुझे उन पर विश्वास नहीं है, वह पहले कई बार मेरी अमंगल कामना कर चुके हैं. पर लोगों ने एक स्वर से अबूमूसा को ही चुना. निदान अली को भी मानना पड़ा. दोनों मध्यस्थों में बड़ा अंतर था. आस का बेटा अमरो बड़ा राज-नीति कुशल दांव-पेंच जानने वाला आदमी था. इसके प्रतिकूल अबूमूसा सीधे-सादे मौलवी थे और मन में अली से द्वेष भी रखते थे. अभी यहां यह विवाद हो ही रहा था कि अमरो ने आकर पंचायतनामे की लिखा-पढ़ी कर ली. फ़ैसला सुनाने का समय और स्थान निश्चित कर दिया गया और हज़रत अली अपनी सेना के साथ कूफ़ा को चले. इस अवसर पर एक विचित्र समस्या आ खड़ी हुई, जिसने अली की कठिनाइयों को द्विगुण कर दिया. वही लोग लड़ाई बंद करने के पक्ष में थे, अब कुछ सोच-समझ कर लड़ाई जारी रखने पर आग्रह करने लगे. पंचों की नियुक्ति भी उन्हें सिद्धांतों के विरुद्ध जान पड़ती थी, लेकिन ख़लीफ़ा अपने वचन पर दृढ़ रहे. उन्होंने निश्चय रूप से कहा कि जब लड़ाई बंद कर दी गई, तो वह किसी प्रकार जारी नहीं रखी जा सकती. इस पर उनकी सेना के कितने ही योद्धा रुष्ट होकर अलग हो गए. उन्हें ’ख़ारिजी’ कहते हैं. इन ख़ारीजियों ने आगे चलकर बड़ा उपद्रव किया और हज़रत अली की हत्या के मुख्य कारण हुए.

इधर ख़ारिजीन ने इतना सिर उठाया कि ख़लीफ़ा ने जिन महानुभावों को उनको समझाने-बुझाने भेजा, उन्हें कत्ल कर दिया. इस पर अली ने उन्हें दंड देना आवश्यक समझा. नहरवां की लड़ाई में उनके सरदार मारे गए और बचे हुए लोग ख़लीफ़ा के प्रति कट्टïर बैरभाव लेकर इधर-उधर जा छिपे. अब अली ने शाम पर आक्रमण करने की तैयारी की, लेकिन सेना लड़ते-लड़ते हतोत्साहित हो रही थी. कोई साथ देने पर तैयार न हुआ. उधर मुआविया ने मिस्र देश पर भी अधिकार प्राप्त कर लिया. ख़लीफ़ा की तरफ़ से 'मुहक्वमद बिन अबी बक्र’ नियुक्त थे. मआविया ने पहले उसे रिश्वत देकर मिलाना चाहा, लेकिन जब इस तरह दाल न गली, तो अमरो को एक सेना देकर मिस्र की ओर भेजा. अमरो ने मिस्र के स्थायी सूबेदार को निर्दयता से मरवा डाला.

अली की सत्यप्रियता ने उनके कितने ही मित्रों और अनुगामियों को उनका शत्रु बना दिया. यहां तक कि इस महासंकट के समय उनके चचेरे भाई 'अबदुल्लाह’ के बेटे भी जो उनके दाहिने हाथ बने रहते थे, उनसे नाराज होकर मक्का चले गए. अबदुल्लाह के चले जाने के थोड़े ही दिन बाद ख़ारीजियों ने अली की हत्या करने के लिए एक षड्यंत्र रचा. मिस्र निवासी एक व्यक्ति जिसे मलजम कहते थे, अली को मारने का बीड़ा उठाया. इनका इरादा अली और मुआविया दोनों को समाप्त कर कोई दूसरा ख़लीफ़ा चुनने का था.

शुक्र का दिन दोनों हत्याओं के लिए निश्चित किया गया. थोड़ी रात गई थी. अली मस्जिद में नियमानुसार नमाज़ पढ़ाने आए. मलजम मसजिद के द्वार पर छिपा बैठा था. अली को देखते ही उन पर तलवार चलाई. माथे पर चोट लगी. वहीं गिर पड़े. मलजम पकड़ लिया गया. ख़लीफ़ा को लोग उठाकर मकान पर लाए. मलजम उनके सम्मुख लाया गया. अली ने पूछा तुमने किस अपराध के लिए मुझे मारा? मलजम ने कहा, तुमने बहुत से निरपराध मनुष्यों को मारा है. तब अली ने लोगों से कहा कि यदि मैं मर जाऊं तो तुम भी इसे मार डालना, लेकिन इसी की तलवार से और एक ही वार करना. इसके सिवा और किसी को क्रोध के वश होकर मत मारना. इसके बाद उन्होंने अपने दोनों पुत्रों हसन और हुसैन को सदुपदेश दिया और थोड़ी देर बाद परलोक सिधारे. उन्होंने अपने पुत्रों में से किसी को अपना उत्तराधिकारी बनाने की चेष्टा तक न की.
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