फ़िरदौस ख़ान
जब घर का चश्मो-चिराग कहीं खो जाता है, तो उसकी याद में किस तरह दिल तड़पता है और आंखें गंगा-जमुना की धारा बन जाती हैं, इसके तसव्वुर से ही रूह कांप उठती है। अगर जाने वाले को इसका अहसास हो तो कभी वह ख्वाब में भी अपने घर-परिवार को छोड़कर जाने की बात नहीं सोचेगा। उत्तर प्रदेश के  मुज़फ्फ़रनगर जिले के कस्बे बुढाना के 10 साल के मोहम्मद हसन की गुमशुदगी को चार साल होने वाले हैं। उसकी मां आयशा का रो-रोकर बुरा हाल है। उन्होंने अपने लाल को हर जगह तलाशा, मगर वो कहीं न मिला। सुबह सूरज की पहली किरण से ही पूरा घर अपने लाडले के इंतज़ार में पलकें बिछा लेता है, उम्मीद की एक लौ कायम रहती है कि कभी कोई तो आएगा, उनके बेटे की खबर लेकर, लेकिन जब रात ढलती है और हसन की कोई ख़बर नहीं आती तो दिल बुझने लगता है।

मोहम्मद हसन के पिता मोहम्मद फुरकान का कहना है कि उन्हें क्या पता था कि उनका बेटा उनसे बिछड़ जाएगा। वे तो बस इतना चाहते थे कि मदरसे से आने के बाद हसन यहां-वहां खेलकर वक्त बर्बाद करने के बजाय उनके काम में हाथ बंटाए, ताकि उसे काम करने की आदत पड़ जाए। वे कहते हैं कि हम तो खेती करने वाले लोग हैं। सुबह पौ फटने से लेकर देर रात तक खेतों में खून-पसीना बहाना पड़ता है तब कहीं जाकर घर-परिवार के गुजारे लायक आमदनी जुटा पाते हैं। हम बचपन से ही बच्चों को काम की आदत डालते हैं, ताकि बड़े होकर वे मेहनत-मजदूरी कर सकें। बस, खेत में काम करने की बात को लेकर ही बेटे पर उनका हाथ उठ गया और वह कहीं चला गया। अपनी इस गलती के लिए वे आज तक पछता रहे हैं। काश, उन्होंने अपने बेटे को मारने के बजाय प्यार से समझाया होता तो आज वह हमारे साथ ही होता। उन्होंने अपने बेटे को आसपास ही नहीं दूर-दराज तक के इलाकों में ढूंढा, मगर वह कहीं नहीं मिला। उन्होंने अपने सब रिश्तेदारों के यहां जाकर भी बेटे को तलाश किया।

बच्चे का मामू जान कारी मोहम्मद आरिफ साहब का कहना है कि मोहम्मद हसन अपने पिता मोहम्मद फुरकान से बहुत डरता था। उसके पिता उससे खेत में काम करने को कहते थे। इसी बात को लेकर कई बार वे अपने बेटे को पीट भी चुके हैं। इससे पहले दो बार वह अपने पिता की मार खाने के बाद अपने मामा के पास बंतीखेड़ा आ गया। बाद में वो उसे समझा-बुझाकर उसके घर छोड़कर आए। वे बताते हैं कि हसन पढ़ने में बहुत होशियार है। उसे पास के ही मदीना-उल-तुलूम मदरसे में कुरआन हिफ्ज यानि मुंह जबानी याद करने के लिए दाखिल कराया गया था। छोटी-सी उम्र में ही उसने तीन पारे अध्याय हिफ्ज कर लिए थे। उसे क्रिकेट खेलने का बहुत शौक है। नम आंखों से वे कहते हैं कि हसन जहां कहीं भी होगा, क्रिकेट जरूर खेलता होगा।

कारी साहब कहते हैं कि आज भी देहात के मुसलमानों में फोटो खिंचवाने का चलन नहीं है। जब कभी दस्तावेजों के लिए जरूरत पड़ती है, तभी लोग फोटो खिंचवाते हैं। एक दिन उन्होंने यूं ही मदरसे में बच्चों के साथ अपने भांजे हसन की फोटो खिंचवा ली थी, वरना आज उसकी तलाश के लिए एक तस्वीर तक उनके पास नहीं होती।

हसन का बड़ा भाई मोहम्मद मुबारक 15 साल का है। पोलियो की वजह से एक पैर से लाचार होने के बावजूद वे भी अपने भाई की तलाश में जगह-जगह भटकता रहता है। उसका कहना है कि बस उसे एक बार उसका भाई मिल जाए, वे उसे कहीं नहीं जाने देगा। हसन का छोटा भाई अब्दुल कादिर, बहनें आरिफा और मंतशा भी अपने भाई को देखने के लिए तरस रही हैं। वे दिन-रात यही दुआ करती हैं कि बस एक बार उनका भाई घर वापस आ जाए।

ध्यानार्थ : अगर किसी को इस गुमशुदा बच्चे के बारे में कोई सूचना हो तो वो हमें इत्तला करे. यह कॉलम हमने जनहित में शुरू किया है. पाठकों का सहयोग अपेक्षित है.


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-फ़िरदौस ख़ान
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी  सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.
भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा  उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. मातृ शक्ति को शत-शत नमन...     





-फ़िरदौस ख़ान
झूठ की बुनियाद पर बनाए गए रिश्तों की उम्र बस उस वक़्त तक ही होती है, जब तक झूठ पर पर्दा पड़ा रहता है. जैसे ही सच सामने आता है, वो रिश्ता भी दम तोड़ देता है. अगर किसी इंसान को कोई अच्छा लगता है और वो उससे उम्रभर का रिश्ता रखना चाहता है तो उसे सामने वाले व्यक्ति से झूठ नहीं बोलना चाहिए. जिस दिन उसका झूठ सामने आ जाएगा. उस वक़्त उसका रिश्ता तो टूट ही जाएगा, साथ ही वह हमेशा के लिए नज़रों से भी गिर जाएगा. कहते हैं- इंसान पहाड़ से गिरकर तो उठ सकता है, लेकिन नज़रों से गिरकर कभी नहीं उठ सकता. ऐसा भी देखने में आया है कि कुछ अपराधी प्रवृति के लोग ख़ुद को अति सभ्य व्यक्ति बताते हुए महिलाओं से दोस्ती गांठते हैं, फिर प्यार के दावे करते हैं. बाद में पता चलता है कि वो शादीशुदा हैं और कई बच्चों के बाप हैं. दरअसल, ऐसे बाप टाईप लोग हीन भावना का शिकार होते हैं. अपराधी प्रवृति के कारण उनकी न घर में इज्ज़त होती है और न ही बाहर. उनकी हालत धोबी के कुत्ते जैसी होकर रह जाती है यानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का. ऐसे में वे सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपना अच्छा सा प्रोफाइल बनाकर ख़ुद को महान साबित करने की कोशिश करते हैं. वह ख़ुद को अति बुद्धिमान, अमीर और न जाने क्या-क्या बताते हैं, जबकि हक़ीक़त में उनकी कोई औक़ात नहीं होती. ऐसे लोगों की सबसे बड़ी 'उपलब्धि' यही होती है कि ये अपने मित्रों की सूची में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को शामिल करते हैं. कोई महिला अपने स्टेट्स में  कुछ भी लिख दे, फ़ौरन उसे 'लाइक' करेंगे, कमेंट्स करेंगे और उसे चने के झाड़ पर चढ़ा देंगे. ऐसे लोग समय-समय पर महिलाएं बदलते रहते हैं, यानी आज इसकी प्रशंसा की जा रही है, तो कल किसी और की. लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बर नहीं चढ़ती. 

वक़्त दर वक़्त ऐसे मामले सामने आते रहते हैं. ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ऑनलाइन रोमांस के चक्कर में तक़रीबन दो लाख लोग धोखा खा चुके हैं. धोखा देने वाले लोग अपनी असली पहचान छुपाकर रखते थे और आकर्षक मॉडल और सेना अधिकारी की तस्वीर अपनी प्रोफाइल पर लगाकर लोगों को आकर्षित किया करते थे. ऐसे में सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करने वाले लोगों का उनके प्रति जुड़ाव रखना स्वाभाविक ही था, लेकिन जब उन्होंने झूठे प्रोफाइल वाले लोगों से मिलने की कोशिश की तो उन्हें सारी असलियत पता चल गई. कई लोग अपनी तस्वीर तो असली लगाते हैं, लेकिन बाक़ी जानकारी झूठी देते हैं. झूठी प्रोफाइल बनाने वाले या अपनी प्रोफाइल में झूठी जानकारी देने वाले लोग महिलाओं को फांसकर उनसे विवाह तक कर लेते हैं. सच सामने आने पर उससे जुड़ी महिलाओं की ज़िन्दगी बर्बाद होती है. एक तरफ़ तो उसकी अपनी पत्नी की और दूसरी उस महिला की जिससे उसने दूसरी शादी की है.

बीते माह मार्च में एक ख़बर आई थी कि अमेरिका में एक महिला ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर अपने पति की दूसरी पत्नी को खोज निकाला. फेसबुक पर बैठी इस महिला ने साइड में आने वाले पॉपअप ‘पीपुल यू मे नो’ में एक महिला को दोस्त बनाया. उसकी फेसबुक पर गई तो देखा कि उसके पति की वेडिंग केक काटते हुए फोटो थी. समझ में नहीं आया कि उसका पति किसी और के घर में वेडिंग केक क्यों काट रहा है? उसने अपने पति की मां को बुलाया, पति को बुलाया. दोनों से पूछा, माजरा क्या है? पति ने पहली पत्नी को समझाया कि ज़्यादा शोर न मचाये, हम इस मामले को सुलझा लेंगे. मगर इतने बड़े धोखे से आहत महिला ने घर वालों को इसकी जानकारी दी. उसने अधिकारियों से इस मामले की शिकायत की. अदालत में पेश दस्तावेज़ के मुताबिक़  दोनों अभी भी पति-पत्नी हैं. उन्होंने तलाक़ के लिए भी आवेदन नहीं किया. अब दोषी पाए जाने पर पति को एक साल की जेल हो सकती है. पियर्स काउंटी के एक अधिकारी के मुताबिक़, एलन ओनील नाम के इस व्यक्ति ने 2001 में एलन फल्क के अपने पुराने नाम से शादी की. फिर 2009 में पति ओनील ने नाम बदलकर एलन करवा लिया था और किसी दूसरी महिला से शादी कर ली थी. उसने  पहली पत्नी को तलाक़ नहीं दिया था.

दरअसल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के कारण रिश्ते तेज़ी से टूट रहे हैं. अमेरिकन एकेडमी ऑफ मैट्रीमोनियल लॉयर्स के एक सर्वे में भी यह बात सामने आई है. सर्वे के मुताबिक़ तलाक़ दिलाने वाले क़रीब 80 फ़ीसदी वकीलों ने माना कि उन्होंने तलाक़ के लिए सोशल नेटवर्किंग पर की गई बेवफ़ाई वाली टिप्पणियों को अदालत में एक साक्ष्य के रूप में पेश किया है. तलाक़ के सबसे ज़्यादा मामले फेसबुक से जुड़े हैं. 66 फ़ीसदी मामले फेसबुक से, 15 फ़ीसदी माईस्पेस से, ट्विटर से पांच फ़ीसदी और बाक़ी दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट्स से 14 फ़ीसदी मामले जुड़े हैं. इन डिजिटल फुटप्रिंट्स को अदालत में तलाक़ के एविडेंस के रूप में पेश किया गया. पिछले दिनों अभिनेत्री इवा लांगोरिया ने बास्केट बाल  खिलाड़ी अपने पति टोनी पार्कर का तलाक़ दे दिया. इवा का आरोप है कि फेसबुक पर उसके पति टोनी और एक महिला की नज़दीकी ज़ाहिर हो रही थी. ब्रिटेन में भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से तलाक़ के मामले तेज़ी से बढ़े हैं. अपने साथी को धोखा देकर ऑनलाइन बात करते हुए पकड़े जाने के कारण तलाक़ के मामलों में इज़ाफ़ा हुआ है. ब्रिटिश न्यूज पेपर 'द सन' के मुताबिक़, पिछले एक साल में फेसबुक पर की गईं आपत्तिजनक टिप्पणियां तलाक़ की सबसे बड़ी वजह बनीं. रिश्ते ख़राब होने और टूटने के बाद लोग अपने साथी के संदेश और तस्वीरों को तलाक़ की सुनवाई के दौरान इस्तेमाल कर रहे हैं.

सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जहां कुछ फ़ायदें हैं, वहीं नुक़सान भी हैं. इसलिए सोच-समझ कर ही इनका इस्तेमाल करें. अपने आसपास के लोगों को वक़्त दें, उनके साथ रिश्ते निभाएं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स के आभासी मित्रों से परस्पर दूरी बनाकर रखें.  कहीं ऐसा न हो कि आभासी फ़र्ज़ी दोस्तों के चक्कर में आप अपने उन दोस्तों को खो बैठें, जो आपके सच्चे हितैषी हैं.




कल्पना पालकीवाला 
घरों में पायी जाने वाली गौरैया के बारे में अनगिनत कविताएं, गीत, लोरियां, लोकगीतों और चित्रों की हमारी विशद परम्परा है लेकिन आज इस पक्षी का जीवन संकटमय हो गया है। एक लंबा समय बीत गया जब हमने गौरैया की चीं ची की ध्वनि और उसका नृत्य देखा हो ।
गुजरात के एक सेवानिवृत्त वन अधिकारी के इस गौरैया को बचाने की कोशिशों से प्रेरणा पाकर एक आंदोलन की शुरूआत हुयी है । इसमें लोगों ने इस पक्षी और तोतों एवं गिलहरियों के लिए घोंसलों का निर्माण किया । ये घोसलें मिट्टी या पुराने बक्सों की मदद से बनाए गए और इन्हें बाद में पेडों, खेतों, मैदानों यहां तक कि आवासीय बंगलों में टांग दिया गया । इंसानों के बनाए इन घोसलों में पानी और खाने के लिए दाने तक रख दिए गए।
विश्व भर में अपनी पहचान रखने वाली इस गौरैया का विस्तार पूरे संसार में देखने को मिलता है लेकिन पिछले कुछ सालों में इस चिड़िया की मौजूदगी रहस्यमय तरीके से कम हुयी है। पतझड़ का मौसम हो या सर्दियों का यह पक्षी हम सालों साल से अपने बगीचों में अक्सर देखने के आदी रहे हैं । लेकिन अब सप्ताह के हिसाब से समय बीत जाता है और इस भूरा पक्षी देखने को नहीं मिलता । इससे अनायास ही मुझे अपने विद्यालय के उन पुराने दिनों की याद ताजा हो जाती है जब मैनें महान हिन्दी कवियत्री महादेवी वर्मा की  गौरैया नामक कविता पढी थी । उस समय यह अजूबे से कम नही था क्योंकि कविता राजा या किसी महान नेता के बारे में नहीं बल्कि एक साधारण से पक्षी को केंद्र में रखकर लिखी गयी थी  । कवि सुब्रहमण्यम भारती ने भी कहा है ..आजादी की चिड़िया ।..
यह चिड़िया शहरों. घरेलू बगीचों. घरों में खाली पडी जगहों या खेतों में अपना घर बनाती है और वहीं प्रजनन भी करती है । यह पक्षी अब शहरों में देखने को नहीं मिलता हालांकि कस्बों और गांवों में इसे पाया जा सकता है । गौरैया को भले ही लोग अवसरवादी चिड़िया कहें लेकिन आज यह चिड़िया पूरे विश्व में अन्य पक्षियों के साथ अपने जीवन को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है । गौरैया की जनसंख्या नीदरलैंड में इतनी गिर चुकी है कि इसे अब रेड लिस्ट में डालने पर विवश होना पड़ा है ।
भारत में भी इस चिड़िया की जनसंख्या में हाल के वर्षो में भारी गिरावट दर्ज की गयी है । यूरोप महाद्वीप के कई जगहों पर पायी जाने वाली गौरैया की तादाद में  यूनाइटेड किंगडम. फ्रांस. जर्मनी. चेक गणराज्य. बेल्जियम .इटली और फिनलैंड में खासी कमी पायी गयी है ।
घरेलू गौरैया को एक समझदार चिड़िया माना जाता है और यह इसकी आवास संबंधी समझ से भी पता चलता है जैसे घोसलों की जगह. खाने और आश्रय स्थल के बारे में यह चिड़िया बदलाव की क्षमता रखती है । विश्वभर में गाने वाली  चिड़िया के नाम से मशहूर गौरैया एक सामाजिक पक्षी भी है तथा लगभग साल भर यह समूह में देखा जा सकता है । गौरैया का समूह 1.5 से दो मील तक की दूरी की उडान भरता है लेकिन भोजन की तलाश में यह आगे भी जा सकता है । गौरैया मुख्य रूप से हरे बीज. खासतौर पर खाद्यान्न को अपना भोजन बनाती है । लेकिन अगर खाद्यान्न उपलब्ध नहीं है तो इसके भोजन में परिवर्तन आ जाता है इसकी वजह यही है कि इसके खाने के सामानों की संख्या बहुत विस्तृत है । यह चिड़िया कीड़ो मकोड़ों को भी खाने में सक्षम है खासतौर पर प्रजनन काल के दौरान यह चिड़िया ऐसा करती है ।

घोंसला निर्माण       
घरेलू गौरैया को अपने  के आवास के निर्माण के लिए आम घर ज्यादा पसंद होते हैं । वे अपने घोंसलों को बनाने के लिए मनुष्य के किसी निर्माण को प्राथमिकता देती हैं । इसके अलावा ढंके खंभों अथवा घरेलू बगीचों या छत से लटकती किसी जगह पर यह पक्षी घोंसला बनाना पसंद करता है लेकिन घोंसला मनुष्य के आवास के निकट ही होता है । नर गौरैया की  यह जिम्मेदारी होती है कि वह मादा के प्रजननकाल के दौरान घोंसले की सुरक्षा करे  और अगर कोई अन्य प्रजाति का पक्षी गौरैया समुदाय के घोंसले के आसपास घोंसला बनाता है तो उसे गौरैया का  कोपभाजन बनना पडता है । गौरैया का घोंसला  सूखी पत्तियों व पंखों और डंडियों की मदद से बना होता है । इसका एक सिरा खुला होता है ।                                                                                                
घरेलू गौरेया  पास्सेर डोमेस्टिकस विश्व गौरैया  परिवार पास्सेराइडे का पुरानी सदस्य है । कुछ लोग मानते हैं कि यह वीबर फिंच परिवार की सदस्य है । इस पक्षी की कई अन्य प्रजातियां भी पायी जातीं हैं । इन्हें प्राय इसके आकार तथा गर्दन के रंग के आधार पर अलग किया जाता है । विश्व के पूर्वी भाग में पायी जाने वाली इस   चिड़िया के गाल   धवल तथा पश्चिमी भाग में भूरे होते हैं । इसके अलावा नर गौरैया की छाती का रंग अंतर के काम में लाया जाता है । दक्षिण एशिया की गौरैया     पश्चिमी गोलार्ध्द की तुलना में छोटी होती है । यूरोप में मिलने वाली गौरैया को पास्सेर डोमेस्टिकस. खूजिस्तान में मिलने वाली को पास्सेर पर्सीकस . अफगानिस्तान व तुर्कीस्तान में पास्सेर बैक्टीरियन . रूसी तुर्कीस्तान के पूर्वी भाग के सेमीयेरचेंस्क पर्वतों पर मिलने वाली  गौरैया को पास्सेर सेमीरेट्सचीन्सिस कहा जाता है । फिलीस्तीन और सीरिया में मिलने वाली  गौरैया की छाती का रंग हल्का होता है । भारत .श्रीलंका और हिमालय के दक्षिण में पायी जानी वाली  गौरैया को पास्सेर इंडिकस कहते हैं जबकि नेपाल से लेकर कश्मीर श्रीनगर में इस चिड़िया की पास्सेर परकीनी नामक प्रजाति पायी जाती है ।
भारत के हिन्दी पट्टी इलाके में इसका लोकप्रिय नाम गौरैया है तथा केरल एवं तमिलनाडु में इसे कुरूवी के नाम से जाना जाता है । तेलुगू में इसे पिच्चूका . कन्नड में गुब्बाच्ची . गुजराती में चकली .तथा मराठी में चिमनी. पंजाब में चिरी. जम्मू कश्मीर में चायर. पश्चिम बंगाल में चराई पाखी तथा उडीसा में घाराचटिया कहा जाता है । उर्दू भाषा में इसे चिड़िया और सिंधी भाषा में इसे झिरकी के नाम से पुकारा जाता है ।

लक्षण 
14 से 16 सेंटीमीटर लंबी इस पक्षी के पंखों की लंबाई 19 से 25 सेंटीमीटर तक होती है जबकि इसका वजन 26 से 32 ग्राम तक का होता है । नर  गौरैया का शीर्ष व गाल और अंदरूनी हिस्से भूरे जबकि गला. छाती का ऊपरी हिस्सा श्वेत होता है । जबकि मादा  गौरैया के सिर पर काला रंग नहीं पाया जाता बच्चों का रंग गहरा भूरा होता है ।
 गौरैया की आवाज की अवधि कम समय की और धात्विक गुण धारण करती है जब उसके बच्चे घोंसले में होते हैं तो वह लंबी सी आवाज निकालती है ।  गौरैया एक बार में कम से कम तीन अंडे देती है । इसके अंडे का रंग धवल पृष्ठभूमि पर काले .भूरे और धूसर रंग का मिश्रण होता है । अंडो का आकार अलग अलग होता है जिन्हें मादा  गौरैया सेती है । इसका  गर्भधारण काल 10 से 12 दिन का होता है । इनमें गर्भधारण की क्षमता उम्र के साथ बढती है और ज्यादा उम्र की चिड़िया का गर्भकाल का मौसम जल्द शुरू होता है ।

गिरावट के कारण 
इस चिडिया की जनसंख्या में गिरावट की कई वजहें बतायी गयी हैं । इनमें से एक प्रमुख वजह सीसे रहित पेट्रोल का प्रयोग होना है । इसके जलने से मिथाइल नाइट्रेट जैसे पदार्थ निकलते हैं । जो छोटे कीड़े के लिए जानलेवा होते हैं और ये कीड़े
ही  गौरैया के भोजन का मुख्य अंग हैं । दूसरी वजह के अनुसार खरपतवार या भवनों के नए तरह के डिजायन जिससे गौरेया को घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती है ।  पक्षी विज्ञानी और वन्य जीव विशेषज्ञों का अनुमान है कि कंक्रीट के भवनों की वजह से घोंसला बनाने में मुश्किल आती हैं इसके अलावा घरेलू बगीचों की कमी व खेती में कीटनाशकों के बढते प्रयोग के कारण भी इनकी संख्या में कमी आयी है । हाल के दिनों में इनकी जनसंख्या में गिरावट का मुख्य कारण मोबाइल फोन सेवा मुहैया कराने वाली टावरें हैं  । इनसे निकलने वाला विकिरण  गौरैया के लिए खतरनाक साबित हो रहा है । ये विकिरण कीड़ो  मकोड़ों और इस चिड़िया के अंडो के विकास के लिए हानिकारक साबित हो रहा है ।

इंडियन क्रेन्स और वेटलैंडस वकिर्गं ग्रुप से जुडे के एस गोपी के अनुसार हालांकि इस बारे में कोई ठोस सुबूत या अध्ययन नहीं है जो इसकी पुष्टि कर सके पर एक बात निश्चित है कि इनकी जनसंख्या में गिरावट अवश्य आयी है । उनके अनुसार खेतों में प्रयोग होने वाले कीटनाशक आदि वजहों से  गौरैया का जीवन परिसंकटमय हो गया है ।

कोयम्बटूर के सालिम अली पक्षी विज्ञान केंद्र एवं प्राकृतिक इतिहास के डा. वी एस विजयन के अनुसार यह पक्षी विश्व के दो तिहाई हिस्सों में अभी भी पाया जाता है लेकिन इसकी तादाद में गिरावट आयी है । बदलती जीवन शैली और भवन निर्माण के तरीकों में आये परिवर्तन से इस पक्षी के आवास पर प्रभाव पड़ा है
आज मैं  गौरैया के शोर को याद करती हूं और उसके इस डाल से उस डाल तक फुदकने को भी स्मरण करती हूं । मुझे महादेवी वर्मा की कविता  गौरैया का भी ध्यान आता है जिसमें  गौरैया हाथ में रखे कुछ दानों को खा रही है और कंधों पर कूदती है तथा लुकाछिपी कर रही है । ये दृश्य मुझे इतने याद हैं कि जैसे यह मेरे सामने हो रहा हो। मैं उम्मीद करती हूं कि महादेवी वर्मा की कविता पन्नों में सिमट के नहीं रह जायेगी और  गौरैया हमेशा के लिए हमारे पास वापस आयेगी ।




-एम. वी. एस. प्रसाद / डॉ. के. परमेश्वरन 
विश्‍व प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस की स्‍थापना 1991 में यूनेस्‍को और संयुक्‍त राष्‍ट्र के जन सूचना विभाग ने मिलकर की थी। इससे पहले नामीबिया में विन्‍डहॉक में हुए सम्‍मेलन में इस बात पर जोर दिया गया था, कि प्रेस की आजादी को मुख्‍य रूप से बहुवाद और जनसंचार की आजादी की जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए। तब से हर साल 3 मई को विश्‍व प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने भी 3 मई को विश्‍व प्रेस स्‍वतंत्रता की घोषणा की थी। यूनेस्‍को महा-सम्‍मेलन के 26वें सत्र में 1993 में इससे संबंधित प्रस्‍ताव को स्‍वीकार किया गया था।
इस दिन के मनाने का उद्देश्‍य प्रेस की स्‍वतंत्रता के विभिन्‍न प्रकार के उल्‍लंघनों की गंभीरता के बारे में जानकारी देना है, जैसे प्रकाशनों की कांट-छांट, उन पर जुर्माना लगाना, प्रकाशन को निलंबित कर‍ देना और बंद कर‍देना आदि । इनके अलावा पत्रकारों, संपादकों और प्रकाशकों को परेशान किया जाता है और उन पर हमले भी किये जाते हैं। यह दिन प्रेस की आजादी को बढ़ावा देने और इसके लिए सार्थक पहल करने तथा दुनिया भर में प्रेस की आजादी की स्थिति का आकलन करने का भी दिन है।
और अधिक व्‍यावहारिक तरीके से कहा जाए, तो प्रेस की आजादी या मीडिया की आजादी, विभिन्‍न इलैक्‍ट्रोनिक माध्‍यमों और प्रकाशित सामग्री तथा फोटोग्राफ वीडियो आदि के जरिए संचार और अभिव्‍यक्ति की आजादी है। प्रेस की आजादी का मुख्‍य रूप से यही मतलब है कि शासन की तरफ से इसमें कोई दखलंदाजी न हो, लेकिन संवैधानिक तौर पर और अन्‍य कानूनी प्रावधानों के जरिए भी प्रेस की आजादी की रक्षा जरूरी है।
प्रेस की आजादी का मतलब
    मीडिया की आजादी का मतलब है कि किसी भी व्‍यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। इस आजादी में बिना किसी दखलंदाजी के अपनी राय कायम करने तथा किसी भी मीडिया के जरिए, चाहे वह देश की सीमाओं से बाहर का मीडिया हो, सूचना और विचार हासिल करने और सूचना  देने की आजादी शामिल है। इसका उल्‍लेख मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुछेद 19 में किया गया है। सूचना संचार प्रौद्योगिकी (विषय-वस्‍तु प्रसारण आदि) तथा सोशल मीडिया के जरिए थोड़े समय के अंदर ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक सभी तरह की महत्‍वपूर्ण ख़बरें पहुंच जाती हैं। यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया की सक्रियता से इसका विरोध करने वालों को भी स्‍वयं को संगठित करने के लिए बढ़ावा मिला है और दुनिया भर के युवा लोग अपनी अभिव्‍यक्ति के लिए और व्‍यापक रूप से अपने समुदायों की आकांक्षाओं की अभिव्‍यक्ति के लिए संघर्ष करने लगे हैं।
     इसके साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि मीडिया की आजादी बहुत कमजोर है। यह भी जानना जरूरी है कि अभी यह सभी की पहुंच से बाहर है। हालांकि मीडिया की सच्‍ची आजादी के लिए माहौल बन रहा है, लेकिन यह भी ठोस वास्तविकता है कि दुनिया में कई लोग ऐसे हैं, जिनकी पहुंच बुनियादी संचार प्रौद्योगिकी तक नहीं है। जैसे-जैसे ऑनलाइन पर ख़बरों और रिपोर्टिंग का सिलसिला बढ़ रहा है, ब्‍लॉग लेखकों सहित और ज्‍यादा ऑनलाइन पत्रकारों को परेशान किया जा रहा है और हमले किये जा रहे हैं। यूनेस्‍को ने यहां तक कि एक वेबपेज  - यूनेस्‍को रिमेम्‍बर्स एसेसिनेटड जर्नलिस्‍ट्स, इसके लिए शुरू किया है।
     राज्‍यों और सरकारों की भी यह जिम्‍मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि अभिव्‍यक्ति की आजादी के राष्‍ट्रीय कानून अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मान्‍य सिद्धांतों के अनुरूप हों, जिनका उल्‍लेख विन्‍डहॉक घोषणा और यूनेस्‍को के मीडिया विकास सूचकों में किया गया है। दोनों दस्‍तावेजों को स्‍वीकृति दी जा चुकी है।
प्रेस आजादी में दो कारणों से रुकावटें आ रही हैं। एक कारण है, कोई सं‍गठित सूचना प्रणाली न होना और दूसरा कारण है, सूचना तक पहुंचने, समझने और उसका मूल्‍यांकन करने के लिए बुनियादी कौशल और साक्षरता में कमी। समाज के कई वर्गों को न केवल सार्वजनिक तौर पर अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता, बल्कि वे सूचना प्राप्‍त करने के साधनों से भी वंचित हैं, जो उन्‍हें शिक्षित कर सकते हैं और सशक्‍त बना सकते हैं। एक ओर तो विश्‍वव्‍यापी वेबसाइटों का प्रसारण बढ़ रहा है और सूचना प्राप्‍त करने में आसानी होती जा रही है और दूसरी ओर सूचना के साधनों तक पहुंच में दूरी बनी हुई है, जो एक विरोधाभास जैसा लगता है।
अंतर्राष्‍ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) के अनुसार दुनिया भर में 60 प्रतिशत से अधिक घरों में अभी भी कम्‍प्‍यूटर नहीं है और दुनिया की आबादी के 35 प्रतिशत लोग ही अपने आपको इन्‍टरनेट उपभोक्‍ता समझते हैं। इस सर्वेक्षण में जिनको शामिल किया गया, उनमें अधिक संख्‍या विकासशील देशों के लोगों की थी। (ये आंकड़े यूनेस्‍को द्वारा आयोजित वैश्विक अध्‍ययन से लिये गए हें।)
यह मानते हुए कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार का और प्रेस की स्‍वतंत्रता का सूचना प्राप्‍त करने के अधिकार से गहरा संबंध है, यह जरूरी हो जाता है कि देशों के बीच और देशों के अंदर कम्‍प्‍यूटर आदि की उपलब्‍धता की कमी (डिजीटल डिवाइड) को दूर किया जाए। वास्‍तव में हाल में हुए 7वें यूनेस्‍को यूथ फोरम के सम्‍मेलन में भाग लेने वालों ने इस बात पर जोर दिया था कि सूचना संचार और प्रौद्योगिकी तक पहुंच को सुलभ बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती है। सभी की सूचना तक पहुंच हो, इसके लिए प्रयास किये जाने चाहिएं, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में और उन इलाकों में, जो अलग-थलग हैं।
भारतीय परिवेश  भारत में स‍ंविधान के अनुच्‍छेद 19(1)ए) में ‘’भाषण और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार’’ का उल्‍लेख है, लेकिन उसमें शब्‍द ‘’प्रेस’’ का जिक्र नहीं है, लेकिन उप-खंड (2) के अंतर्गत इस अधिकार पर पाबंदियां लगाई गई हैं। इसके अनुसार भारत की प्रभुसत्ता और अखंडता, राष्‍ट्र की सुरक्षा, विदेशों के साथ मैत्री संबंधों, सार्वजनिक व्‍यवस्‍था, शालीनता और नैतिकता के संरक्षण, न्‍यायालय की अवमानना, बदनामी या अपराध के लिए उकसाने जैसे मामलों में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर पाबंदियां लगाई जा सकती हैं।
     लोकतंत्र के सही तरीके से काम करने के लिए यह जरूरी है कि नागरिकों को देश के विभिन्‍न भागों की ख़बरों और यहां तक कि विदेशों की ख़बरों की जानकारी हो, क्‍योंकि तभी वे तर्क संगत राय कायम कर सकते हैं। यह निश्चित बात है कि किसी भी नागरिक से यह उम्‍मीद नहीं की जा सकती, कि वह अपनी राय तय करने के लिए स्‍वयं ख़बरें इक्‍ट्ठी करे । इस लिए लोकतंत्र में मीडिया की यह महत्‍वपूर्ण भूमिका है और वह लोगों के लिए खबरें इकट्ठी करने के लिए उनकी एक एजेंसी के रूप में काम करता है। यही कारण है कि सभी लोकतांत्रिक देशों में प्रेस की आजादी पर जोर दिया गया है, जबकि सामन्‍तवादी शासन व्‍यवस्‍था में इसकी अनुमति नहीं होती थी।
     भारत जैसे विकासशील देशों में मीडिया पर जातिवाद और सम्‍प्रदायवाद जैसे संकुचित विचारों के खिलाफ संघर्ष करने और ग़रीबी तथा अन्‍य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई में लोगों की सहायता करने की बहुत बड़ी जिम्‍मेदारी है, क्‍योंकि लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग पिछड़ा और अनभिज्ञ है, इसलिये यह और भी जरूरी है कि आधुनिक विचार उन तक पहुंचाए जाएं और उनका पिछड़ापन दूर किया जाए, ताकि वे सजग भारत का हिस्‍सा बन सकें। इस दृष्टि से मीडिया की बहुत बड़ी जिम्‍मेदारी है (उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायाधीश, न्यायमूर्ति श्री मार्कन्‍डेय काटजू)
सूचना का अधिकार कानून
    विश्‍व भर में सूचना तक सुलभ पहुंच के बारे में बढ़ती चिंता को देखते हुए भारतीय संसद द्वारा 2005 में पास किया गया सूचना का अधिकार कानून बहुत महत्‍वपूर्ण हो गया है। इस कानून में सरकारी सूचना के लिए नागरिक के अनुरोध का निश्चित समय के अंदर जवाब देना बहुत जरूरी है।
     इस कानून के प्रावधानों के अंतर्गत कोई भी नागरिक सार्वजनिक अधिकरण (सरकारी विभाग या राज्‍य की व्‍यवस्‍था) से सूचना के लिए अनुरोध कर सकता है और उसे 30 दिन के अंदर इसका जवाब देना होता है। कानून में यह भी कहा गया है कि सरकारी विभाग व्‍यापक प्रसारण के लिए अपना रिकॉर्डों का कम्‍प्‍यूटरीकरण करेंगे और कुछ विशेष प्रकार की सूचनाओं को प्रकाशित करेंगे, ताकि नागरिकों को औपचारिक रूप से सूचना न मांगनी पड़े। संसद में 15 जून, 2005 को यह कानून पास कर दिया था, जो 13 अक्‍तूबर, 2005 से पूरी तरह लागू हो गया।
     संक्षेप में, यह कानून प्रत्‍येक नागरिक को सरकार से सवाल पूछने, या सूचना हासिल करने, किसी सरकारी दस्‍तावेज की प्रति मांगने, किसी सरकारी दस्‍तावेज का निरीक्षण करने, सरकार द्वारा किये गए किसी काम का निरीक्षण करने और सरकारी कार्य में इस्‍तेमाल सामग्री के नमूने लेने का अधिकार देता है।
     सूचना का अधिकार कानून एक मौलिक मानवाधिकार है, जो मानव विकास के लिए महत्वपूर्ण‍है तथा अन्‍य मानवाधिकारों को समझने के लिए पहली जरूरत है। पिछले 7 वर्षों के अनुभव से, जबसे यह कानून लागू हुआ है, पता चलता है कि सूचना का अधिकार कानून आवश्‍यकता के समय एक मित्र जैसा है, जो आम आदमी के जीवन को आसान और सम्‍मानजनक बनाता है तथा उसे सफलतापूर्वक जन सेवाओं के लिए अनुरोध करने और इनका उपयोग करने का अधिकार देता है।




-फ़िरदौस ख़ान
नील दुनिया की सबसे लंबी नदी नील है. क़ुरआन और बाइबल में भी इस नदी का ज़िक्र आता है. नबी और यहूदी धर्म के संस्थापक हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी मां ने नील नदी के हवाले कर दिया था. मिस्र के फ़िरऔन के ज़माने में जन्मे मूसा यहूदी माता-पिता के की औलाद थे, लेकिन मौत के डर से उनकी मां ने उन्हें नील नदी में बहा दिया था. उन्हें फ़िरऔन की पत्नी ने पाला और मूसा एक मिस्री शहज़ादे बने. बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वो यहूदी हैं और उनके यहूदी मुल्क को फ़िरऔन ने ग़ुलाम बना लिया है. हज़रत मूसा ने एक मिस्री व्यक्ति से एक यहूदी को पिटते देखा तो उन्हें ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने उस मिस्री को मार डाला और मदैन चले गए. वहां उन्होंने विवाह कर लिया और अपने ससुर के घर 10 साल तक रहकर उनकी ख़िदमत की. इसके बाद वह अपने परिवार सहित वहां से रवाना हो गए. एक पहाड़ पर उन्होंने आग जलती देखी. वह अकेले पहाड़ पर गए. यहां हज़रत मूसा की अल्लाह से मुलाक़ात हुई. अल्लाह के आदेश पर उन्होंने फ़िरऔन को हराकर यहूदियों को आज़ाद कराया और उन्हें मिस्र से इस्राईल पहुंचाया.

जब हज़रत मूसा अपने लोगों को आज़ाद कराकर मिस्र से रवाना हुए तो फ़िरऔन की फ़ौजों ने उनका पीछा किया. फ़ौज को आते देख हज़रत मूसा ने नील से रास्ता मांगा. और फिर नील नदी में रास्ता बन गया. सभी लोग नील को पार कर दूरी तरफ़ पहुंच गए, लेकिन जब फ़िरऔन की फौजें इस रस्ते पर आईं तो नील ने सबको गर्क कर दिया. रास्ते में इस्राईल संतति को अल्लाह की तरफ़ से दिव्य भोजन- 'मन्न', 'सल्वा' आता था. जब वह अल्लाह से बात करने और उसके आदेश लेने के लिए गए थे और अपने भाई हारून के ज़िम्मे इस्राईल संतति को कर गए थे. इस दौरान कुछ लोगों ने 'सामरी' के बहकावे में आकर एक बछड़ा बनाकर उसकी पूजा शुरू कर दी. सामरी ने जिब्राइल की धूलि से बछड़े में बोलने की शक्ति तक पैदा कर दी थी. जब हज़रत मूसा ने अल्लाह से बात की तो जवाब मिला - तू न देख सकेगा. अच्छा पहाड़ की तरफ़ देख. उस तेज़ को देख वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े. अल्लाह ने अपने आदेश को पट्टियों पर लिखकर उन्हें दिए. हज़रत मूसा ने इस्राईल को अल्लाह द्वारा मिले 'दस आदेश' दिए, जो आज भी यहूदी धर्म का प्रमुख स्तंभ है.

गौरतलब है कि नील नदी अफ्रीका की सबसे बड़ी झील विक्टोरिया से निकलकर सहारा मरुस्थल के पूर्वी हिस्से को पार करती हुई उत्तर में भूमध्यसागर में गिरती है. यह भूमध्य रेखा के निकट भारी वर्षा वाले क्षेत्रों से निकलकर दक्षिण से उत्तर क्रमशःयुगाण्डा, इथियोपिया, सूडान एवं मिस्र से होकर बहते हुए एक लंबी घाटी बनाती है, जिसके दोनों तरफ़ की ज़मीन पतली पट्टी के रूप में हरी-भरी नज़र आती है. यह पट्टी दुनिया का सबसे बड़ा मरूद्यान है. इसकी कई सहायक नदियां हैं, जिनमें श्वेत नील एवं नीली नील मुख्य हैं. अपने मुहाने पर यह 160 किलोमीटर लंबा और 240 किलोमीटर चौड़ा विशाल डेल्टा बनाती है. घाटी का सामान्य ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है. मिस्र की प्राचीन सभ्यता का विकास इसी नदी की घाटी में हुआ है. इसी नदी पर मिस्र देश का प्रसिद्ध अस्वान बांध बनाया गया है.

नील नदी की घाटी का दक्षिणी भाग भूमध्य रेखा के समीप स्थित है. यहां भूमध्यरेखीय जलवायु पाई जाती है. यहां साल भर तापमान ज़्यादा रहता है. सालाना बारिश का औसत 212 सेमी. है. इसी वजह से यहां भूमध्यरेखीय सदाबहार के वन पाए जाते हैं. नील नदी के मध्यवर्ती भाग में सवाना तुल्य जलवायु पाई जाती है. इस प्रदेश में सवाना नामक उष्ण कटिबन्धीय घास का मैदान है. यहां पाए जाने वाले गोंद देने वाले पेड़ों के कारण सूडान दुनिया का सबसे बड़ा गोंद उत्पादक देश है. उत्तरी भाग में वर्षा के अभाव में खजूर, कंटीली झाड़ियां और बबूल आदि मरुस्थलीय वृक्ष मिलते हैं. उत्तर के डेल्टा क्षेत्र में भूमध्यसागरीय जलवायु पाई जाती है. यहां वर्षा सर्दियों के मौसम में होती है...

नील नदी के बारे में लिखी मिस्र के प्रोफ़ेसर अहमद अल क़ादी की यह नज़्म याद आती है...
मिस्र की तरफ़ लौट आओ 
नील का पानी हम सबके लिए काफ़ी है...



साल 2008 की गर्मियों में भारत के बेहतरीन बॉक्सिंग कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित ओमप्रकाश भारद्वाज के फोन की घंटी बजी. फोन भारतीय खेल प्राधिकरण से आया था. उन्हें बताया गया कि 10 जनपथ से कोई उनसे संपर्क करेगा. कुछ समय बाद नेहरू-गांधी परिवार के निजी स्टाफ में दो दशकों से ज़्यादा समय से कार्यरत पी माधवन ने उन्हें फ़ोन किया और एक असामान्य-सी गुज़ारिश की- राहुल गांधी बॉक्सिंग सीखना चाहते हैं. क्या भारद्वाज उन्हें सिखाएंगे? ‘मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ.’ तब 70 की उम्र को छू रहे भारद्वाज बताते हैं. ‘राहुल बॉक्सिंग रिंग में उतरने की योजना तो नहीं ही बना रहे होंगे. मैंने सोचा वह शायद आत्मरक्षा के गुर सीखना चाहते होंगे.’ हाथ आया मौक़ा गंवाने से पहले ही भारद्वाज फ़ौरन राज़ी हो गए. फ़ीस के तौर पर वह कुल इतना चाहते थे कि उन्हें घर से लाने-ले जाने की व्यवस्था करवा दी जाए. कक्षाएं 12 तुगलक लेन में होनी थीं, जहां राहुल रहते थे. भारद्वाज के लिए यह राहुल को क़रीब से जानने-समझने का भी मौक़ा था. न सिर्फ़ बॉक्सिंग सीख रहे छात्र के रूप में, बल्कि उस शख्स के रूप में भी जिसे भारत का भावी प्रधानमंत्री कहा जा रहा था. ‘वह हमेशा ज़्यादा के लिए तैयार रहते थे. वार्म अप के लिए अगर मैंने लॉन का एक चक्कर लगाने को कहा, तो वे तीन चक्कर लगा लेते.’

बॉक्सिंग सत्र 12 तुगलक लेन के लॉन पर हफ्ते में तीन दिन होते. कभी-कभी प्रियंका और उनके बच्चे भी राहुल को मुक्केबाज़ी के हुनर सीखते देखने आते. कई बार सोनिया भी वहां बैठकर देखतीं. ‘एक दिन प्रियंका ने मुझसे कहा कि मुझे भी सिखाइए.’ भारद्वाज बताते हैं. उन्होंने उतनी ही चुस्त-दुरुस्त छोटी बहन को भी मुक्केबाज़ी  की कुछ चालें समझाईं और उनके एक पंच पर दंग रह गए. ‘यह बहुत ख़ूबसूरत पंच था, उस शख्स से तो इसकी उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी जो पहली बार मुक्केबाज़ी  में हाथ आज़मा रहा था.

जिस दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई, वह आख़िरी दिन जब राहुल और प्रियंका स्कूल गए. अगले पांच वर्ष उनकी पढ़ाई-लिखाई घर पर ही हुई. राजीव गांधी के शब्दों में ‘घूमने-फिरने और खेलकूद के शौक़ीन व्यक्ति होने के नाते राहुल ने खेलकूद में अपनी अभिरुचि को आगे बढ़ाने के रास्ते खोज लिए. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. अपने पिता की तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी का प्रशिक्षण लिया और हवाई जहाज़ उड़ाना भी सीखा. खेलों में अभिरुचि की वजह से ही 1989 में उन्हें दिल्ली के बेहतरीन सेंट स्टीफेंस कॉलेज में दाख़िला मिला. नंबरों के बल पर तो उन्हें इस कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल सका, अलबत्ता पिस्टल शूटिंग में अपने हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे में प्रवेश मिल गया. उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया. वह सुरक्षा गार्डो के साथ कॉलेज आते और अक्सर क्लास में पीछे बैठते. रैगिंग के दौरान वह काफ़ी मज़े लेते, लेकिन कॉलेज में बाक़ी समय बहुत कम मौक़ों पर ही बोलते. एक साल और तीन महीने बाद उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज छोड़ दिया. कॉलेज के प्रिंसीपल डॉ. अनिल विल्सन भी राहुल के अधबीच में कोर्स छोड़ देने के कारणों के बारे में अन्य लोगों की तरह सिर्फ़ अनुमान ही लगा पाते हैं.

उन्होंने पाया कि राहुल ज़मीन से जुड़े व्यक्ति थे और गांधी परिवार का सदस्य होने के नाज़-नख़रों से मुक्त थे. उन्हें लगा कि राहुल हर कहीं साये की तरह साथ चलती कड़ी सुरक्षा से असहज महसूस करते थे और संभवत: इसी वजह से उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी. सेंट स्टीफेंस कॉलेज छोड़ने के फ़ौरन बाद राहुल अमेरिका चले गए और इकॉनोमिक्स के छात्र के तौर पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया. वह बीस साल के थे. हार्वर्ड में अभी मुश्किल से एक साल ही बिताया था कि उनके पिता की हत्या हो गई. त्रासदी का असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा. राहुल हार्वर्ड छोड़कर लिबरल आर्ट्स के एक निजी संस्थान रॉलिन्स कॉलेज में पढ़ने के लिए विंटर पार्क, लोरिडा आ गए. इसकी वजह भी एक बार फिर सुरक्षा चिंताओं को ही बताया गया. अब तक सुरक्षा गार्डो की सतत पहरेदारी में ज़िन्दगी बिताते आ रहे नौजवान को इस उपनगरीय शहर ने, जिसे अमीर उद्योगपतियों ने प्रारंभ में रिसॉर्ट डेस्टिनेशन की तौर पर बसाया था, आदर्श माहौल मुहैया किया. यहां राहुल ने वह कोर्स पूरा किया, जिसमें दाख़िला लिया था और 1994 में कॉलेज में पढ़ाए जाने वाले छह मुख्य विषयों में से एक, इंटरनेशनल रिलेशंस में डिग्री के साथ ग्रेजुएट किया.

इसके बाद राहुल कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में पढ़ने गए. उनके परदादा जवाहरलाल नेहरू भी 1907 से 1910 तक इसी कॉलेज में पढ़े थे और क़ानून की डिग्री ली थी. राजीव गांधी ने भी ट्रिनिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी. राहुल ने डेवलपमेंट स्टडीज में एम फिल करने का विकल्प चुना, जिसे 1995 में पूरा किया.

ट्रिनिटी कॉलेज से उत्तीर्ण होकर राहुल फौरन भारत नहीं लौटे. वह लंदन चले गए, जहां उन्होंने एक ग्लोबल मैनेजमेंट एंड स्ट्रैटजी कंसल्टेंसी फर्म, मॉनीटर ग्रुप, में काम किया. इसके सह-संस्थापक थे हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर माइकल यूजीन पोर्टर, जिन्हें ब्रैंड स्ट्रैटजी का अग्रणी आधिकारिक विद्वान माना जाता है. राहुल ने वहां तीन साल काम किया, लेकिन फ़र्ज़ी नाम से. उनके सहयोगियों को अंदाज़ तक नहीं था कि इंदिरा गांधी का पौत्र उनके बीच काम कर रहा है. प्रायवेसी की ज़रूरत के बारे में, जिससे वह हमेशा वंचित रहे, राहुल ने कहा, ‘अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया  और अपने सुरक्षा गार्डो से छुटकारा पा लिया, ताकि इंग्लैंड में सामान्य ज़िन्दगी बिता सकूं.’ उनके पिता ने भी कभी ऐसी ही ज़रूरत महसूस की थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद जब अपने और परिवार के लिए वक़्त निकालना मुश्किल हो गया और राजनीति की रफ़्तार ने उड़ान के जज़्बे को नेपथ्य में धकेल दिया, तब उन्होंने कहा था, ‘कभी-कभी मैं कॉकपिट में चला जाता हूं, बिल्कुल अकेला, और दरवाज़ा  बंद कर लेता हूं. मैं उड़ भले न सकूं, कम से कम कुछ देर के लिए दुनिया से अपने को अलग तो कर पाता हूं.’

उधर, राहुल इंग्लैंड में सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे थे, इधर भारत में उनकी मां सोनिया गांधी राजनीति में गहरे और गहरे उतरती जा रही थीं. 1997 में राजनीति में प्रवेश के बाद अब वह कांग्रेस का नेतृत्व कर रही थीं. इस दौरान प्रियंका उनके साथ खड़ी थीं, शक्तिस्रोत बनकर. कांग्रेस के भीतर शोर-शराबा बढ़ रहा था कि प्रियंका पार्टी में शामिल हों. राहुल को देश से बाहर रहते दस साल से ज़्यादा हो चुके थे, लेकिन राजनीति उन्हें पुकार रही थी और यह संकेत था कि उनके लौटने का वक़्त आ गया है. वह लौटे, 2002 में. भारत में आउटसोर्सिग इंडस्ट्री उछाल पर थी. पश्चिम की मल्टीनेशनल कंपनियां भारत का रुख़ कर रही थीं, ताकि काम तेज़ी से और सस्ते में करवाए जा सके.  राहुल ने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में एक इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिग फर्म,   बेकॉप्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, बनाई. इस बीपीओ उद्यम में सिर्फ़ आठ लोग काम करते थे और रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में दर्ज आवेदन के मुताबिक़ इसका लक्ष्य था घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सलाह व सहायता मुहैया करना, सूचना प्रौद्योगिकी में परामर्शदाता और सलाहकार की भूमिका निभाना और वेब सॉल्यूशन देना. राहुल, अपने पारिवारिक मित्र मनोज मट्टू के साथ, इसके निदेशकों में से एक थे. अन्य दो निदेशक थे - कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामेश्वर ठाकुर के बेटे अनिल ठाकुर और दिल्ली में रहने वाले रणवीर सिन्हा. दोनों ने 2006 में ‘निजी कारणों’ का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा  दे दिया. 2004 के आम चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हलफ़नामे के मुताबिक़ बेकॉप्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड में राहुल की हिस्सेदारी 83 फ़ीसदी थी. कंपनी की बैलेंस शीट से पता चलता था कि यह एक छोटा व्यावसायिक उद्यम था.

2004 में राहुल के राजनीति में प्रवेश के कुछ समय बाद उनकी कंपनी ने सीईओ की तलाश के लिए विज्ञापन निकाला. ‘हम एक सीईओ की खोज में हैं, हालांकि मैं समय-समय पर कर्मचारियों के साथ मीटिंग करता हूं और बड़े मुद्दे सुलझाता हूं.’ जून 2004 में राहुल ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा था. उस वक़्त कंपनी के पास तीन विदेशी ग्राहक थे और राहुल ने माना कि पहले साल कोई रेवन्यू नहीं आया. 2009 में, लोकसभा चुनाव से कुछ पहले, राहुल ने अपने को इस उद्यम से बाहर कर लिया. कांग्रेसियों के मुताबिक़ राजनीति के तक़ाज़ों में उन्हें बिजनेस चलाने के लिए वक़्त ही नहीं मिलता था.

राहुल की पढ़ाई-लिखाई में जैसे अवरोध आए, वैसे ही उनके कॅरियर में भी. लेकिन शारीरिक चुस्ती और रोमांचक खेलों को लेकर उनके जज़्बे में कभी कमी नहीं आई. दिन में कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, वह व्यायाम के लिए वक़्त निकाल ही लेते. जिस साल उन्होंने बॉक्सिंग में क्रैश कोर्स किया, उसी साल पैराग्लाइडिंग में भी हाथ आज़माया.  अपनी मैनेजमेंट ट्रेनिंग का अच्छा इस्तेमाल करते हुए वह अमेठी से सात-आठ लोगों की एक टीम को महाराष्ट्र के कामशेट स्थित निर्वाणा एडवेंचर्स नामक एक लाइंग क्लब में ले गए. यह तीन दिनों का पैराग्लाइडिंग कोर्स था, जो 28 से 30 जनवरी 2008 तक चला. इसने टीम बिल्डिंग का भी काम किया. पश्चिमी घाट में पुणो से 85 किलोमीटर दूर कामशेट ऐसी जगह नहीं थी, जहां कोई राजनीतिज्ञ अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ एकत्र हो और काम पर चर्चा करे. लेकिन राजनीतिज्ञों की बंधी-बधाई लीक से हटकर चलने वाले राहुल के लिए असामान्य बात नहीं थी. सरसों के खेतों, शांत झीलों और प्राचीन बौद्घ गुफ़ा मंदिरों से सजी-धजी पहाड़ियों के बीच राहुल की अमेठी टीम सुबह पैराग्लाइडिंग के पाठ सीखती और शामें धुआंधार बहसों में बीततीं. कामशेट में उन्हें देखने वाले बताते हैं कि चर्चाएं हरेक के साथ सीधे होतीं. कौन छोटा है और कौन बड़ा यह सिर्फ़ तब पता चलता जब टीम राहुल को संबोधित करती. सभी उन्हें राहुल भैया कहते. राहुल और उनकी टीम के कामशेट पहुंचने से पहले उनकी मेज़बान एस्ट्रिड राव अपने इस शांत और मनोरम अंचल में एक हाईप्रोफाइल राजनेता के आगमन को लेकर ख़ासी आशंकित थीं. अपने शौहर संजय राव के साथ मिलकर निर्वाणा एडवेंचर्स की स्थापना करने वाली एस्ट्रिड मुतमईन थीं कि इस आगमन से इलाक़े की शांति भंग हो जाएगी. उन्होंने कहा, ‘मुझे यक़ीन था कि राहुल के साथ आने वाली कड़ी सुरक्षा व्यवस्था पूरे इलाक़े की घेराबंदी कर देगी.’ ऐसा कुछ नहीं हुआ. ‘हमारे कहे बग़ैर राहुल ने सुनिश्चित कर दिया कि गेस्ट हाउस के आसपास कोई भी वर्दीधारी या बंदूक़ धारी दिखाई न दे.

उनकी मौजूदगी से एक बार भी हमारी दिनचर्या में ख़लल नहीं पड़ा.’ वे किसी भी दूसरे मेहमान की तरह वहां रहे. पहली रात राव दंपती ने आगंतुकों के लिए मेमना पकाया. बुफ़े सजा दिया गया. एस्ट्रिड बताती हैं, ‘मुझे देखकर ताज्जुब हुआ कि राहुल अपने साथियों को प्लेटें दे रहे थे. अपनी प्लेट भी वह ख़ुद किचन में रखकर आए.’ अगले दिन खाने के वक़्त राहुल रसोइये के पास गए और पूछा कि क्या कल रात का मेमना बचा हुआ है. कोच भारद्वाज भी राहुल को ग़ुरूर से मुक्त बताते हैं. ‘जब मैंने उन्हें सिखाना शुरू किया, मैं उन्हें सर या राहुल जी कहता.’ लेकिन दो दिन बाद राहुल ने अपने कोच से गुज़ारिश की, ‘मुझे सर मत कहिए. राहुल कहिए. मैं आपका शिष्य हूं.’ भारद्वाज बताते हैं, एक बार उन्होंने राहुल से कहा कि वह पानी पीना चाहते हैं. ‘पास ही सेवक खड़े थे, लेकिन उन्हें बुलाने की बजाय राहुल ख़ुद किचन में गए और गिलास में मुझे पानी लाकर दिया.’ और सीखने के बाद वह अपने गुरु को गेट तक छोड़ने आते.

कामशेट के पैराग्लाइडिंग स्कूल में राहुल ने पहला दिन लाइट ट्रैनर संजय राव के साथ बिताया, जिन्होंने उन्हें मैदानी प्रशिक्षण दिया. असली लाइट बाद के दो दिनों में सिखाई गई. ‘राहुल का परफॉर्मेस बहुत अच्छा था. उन्होंने ग्लाइडर उठाया और बस उड़ गए.’ संजय ने बताया. वह राहुल को अपने टॉप 10 फ़ीसदी छात्रों में शुमार करते हैं. ‘वह बहुत ध्यान से सुनते हैं, इसीलिए तेज़ी से सीखते हैं.’ जिन्होंने उन्हें देखा है, वे उन्हें ऐसा शख्स बताते हैं जो ‘हमेशा अपना एंटीना खुला रखता है.’ कामशेट में रहने के दौरान राहुल पड़ोस की झील में तैरने जाना चाहते थे, लेकिन उनके सुरक्षा गार्डो ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी. उन्होंने उनकी बात मानी. ‘यह बड़े दुख की बात थी, ख़ासकर जब वह बहुत एथलेटिक शख्स हैं और रोज़ 10 किलोमीटर जॉगिंग करते हैं.’ एस्ट्रिड बताती हैं.
वह ऐसे शख्स भी नहीं हैं, जो वादा करके भूल जाएं. एस्ट्रिड को यह बात राहुल और उनकी टीम के कामशेट से जाने के एक महीने बाद पता चली. जब वह उन्हें अपना बगीचा दिखा रही थीं, राहुल ने उनसे कहा कि उनकी मां को भी बाग़वानी बहुत प्रिय है. उन्होंने बताया कि सोनिया के पास एक ख़ास किताब है जिसका वह अकसर  ज़िक्र करती हैं, लेकिन उस वक़्त वह उसका नाम याद नहीं कर सके. उन्होंने वादा किया कि दिल्ली जाकर वह किताब भेजेंगे. एक महीने बाद एस्ट्रिड को एक अप्रत्याशित पार्सल मिला. इसमें बाग़वानी की वही किताब थी, जिसकी राहुल ने चर्चा की थी. राहुल न तो भूलते नहीं हैं और न ही वह माफ़ करते हैं. यह बात कुछ पत्रकारों को ख़ासी क़ीमत चुकाकर समझ आई. 22 जनवरी 2009 को एनएसयूआई ने राहुल के कहने पर पुलिस में एक शिकायत दर्ज की. दरअसल एक सभा स्थल से लंच ब्रेक के दौरान राहुल के भाषण और प्रेजेंटेशन के लिए तैयार नोट्स ग़ायब हो गए थे. घटना दिल्ली के कॉंस्टिट्यूशन क्लब में घटी, जहां पार्टी की एक वर्कशॉप आयोजित की गई थी. शक एक टीवी क्रू के सदस्यों पर था जो उस वक़्त हॉल में दाख़िल हुए थे, जब बाक़ी सब लोग खाना खाने चले गए थे. वहां क़रीब पच्चीस पत्रकार मौजूद थे. एनएसयूआई प्रमुख हिबी ईडन ने पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की. कहा जाता है कि यह क़दम  तभी उठाया गया जब राहुल ने ज़ोर डाला कि मामला पुलिस में दिया जाए. पत्रकार ज़्यादा से ज़्यादा सूचनाएं जुटाने के लिए अक्सर किसी भी हद तक चले जाते हैं, लेकिन सार्वजनिक नहीं की गई जानकारी हासिल करने की ग़रज़ से किसी के काग़ज़ उठा लेना, राहुल के लिए यह चोरी से कम नहीं था. दो दिनों तक पुलिस ने अलग-अलग चैनलों के तीन पत्रकारों को बुलाकर ग़ायब काग़ज़ों  के बारे में पूछताछ की. हालांकि राहुल की टीम के सदस्यों ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की कि आख़िरकार ये प्रेजेंटेशन के काग़ज़ात कागजात ही थे और उनमें कोई गोपनीय जानकारी नहीं थी, लेकिन वह पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर ज़ोर देते रहे.

19 जून 2011 को राहुल इकतालीस साल के हो गए. राजनेता की व्यस्त ज़िन्दगी जीने के बावजूद वह अपने शौक़ पूरे करते हैं और अपने माता-पिता की तरह सामान्य जीवन बिताने के रास्तों की तलाश में रहते हैं. जब उनके पति पायलट थे और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तब सोनिया को अक्सर दिल्ली की खान मार्केट में सब्ज़ियां ख़रीदते देखा जाता था. उन्हें खाना पकाना बहुत प्रिय था. प्रियंका भी इसी बाज़ार से अपनी ख़रीदारी करना पसंद करती हैं. दुनिया की सबसे महंगी खुदरा हाई स्ट्रीट में शुमार खान मार्केट दिल्ली में राहुल का भी सबसे प्रिय हैंगआउट है. उन्हें बरिस्ता में कॉफी पीते या बाज़ार की बाहरी तरफ़ बुक शोप्स में किताबें पलटते देखा जा सकता है. उन्हें अपनी भांजी, मिराया और भांजे रेहान के साथ वक़्त बिताना भी बहुत अच्छा लगता है. 'ज़ाहिर तौर पर वह प्रियंका के बच्चों को बहुत स्नेह करते हैं.' कामशेट में उनके मेज़बान बताते हैं. पैराग्लाइडिंग यात्रा के दौरान वह हमेशा उनके और प्रियंका के बारे में बात करते थे. एस्ट्रिड बताती हैं, ‘वह अक्सर कहते थे कि प्रियंका को यहां आना चाहिए, लेकिन वह आलसी है.’

ख़ामोश शामें राहुल को जितनी अपील करती हैं, उतना ही फास्ट ट्रैक जीवन. यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह के साथ घनिष्ठ रूप से काम कर चुके एक अधिकारी ने कहा कि हाई-ऑ टेन ग्रां प्री सीजन के दौरान जब सिंगापुर की सड़कें फॉर्मूला वन रेसिंग ट्रैक में बदल जातीं, तब राहुल चुपचाप वहां के लिए उड़ जाते. वे दिनभर संगीत सभाओं और पार्टियों में शिरकत करते. उत्सुक बाइकर होने के साथ-साथ राहुल को अपने क़रीबी दोस्तों के समूह के साथ गो-कार्टिंग में भी बहुत आनंद आता है. अप्रैल 2011 में मुंबई में वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच के दौरान एक दोपहर 1.30 बजे के आसपास राहुल पिज्जा, पास्ता और मैकिसकन  तोस्तादा सलाद की दावत के लिए चौपाटी बीच पर न्यू यॉर्कर रेस्त्रां पहुंच गए. उन्होंने वेटर से गपशप की और खाने का ख़र्च वहन करने के मैनेजर के आग्रह को ठुकरा दिया. फिर राहुल और उनके दोस्तों ने 2,233 रुपये का बिल आपस में बांट लिया.
(साभार भास्कर)  



अम्बरीश कुमार
अन्ना हजारे अपनी टीम से निजात तो नहीं पाना चाहते है, यह आशंका उन ताकतों को है जो शुरूआती दौर में में अन्ना हजारे के आंदोलन से जुडी थी। इन ताकतों में जयप्रकाश आंदोलन के कार्यकर्ताओं से लेकर गाँधीवादी कार्यकर्त्ता शामिल है। खास बात यह है कि ये सब अब बाबा रामदेव के आंदोलन की तरफ काफी उम्मीद से देख रही है और सक्रिय पहल भी कर चुकी है। बाबा रामदेव को उत्तर प्रदेश से कई जन संगठनों और कार्यकर्ताओं का समर्थन मिलता नजर आ रहा है दूसरी तरफ अन्ना हजारे का उत्तर प्रदेश का न तो कोई कार्यक्रम है और न ही भविष्य की कोई योजना। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े सर्व सेवा संघ के मंत्री राम धीरज ने कहा -दिल्ली में जो हो रहा है उससे इसी तरह का संकेत मिल रहा है खासकर मीडिया में जिस तरह की खबरे आई है ।

गौरतलब है कि अन्ना हजारे ने बाबा रामदेव के साथ आंदोलन का एलान अपनी टीम को साथ लेकर नहीं किया जिसके बाद यह मामला सार्वजनिक हुआ पर परदे के पीछे यह पहले से चल रहा था जिसकी एक नहीं कई वजहें बताई जा रही है। बाबा रामदेव के साथ जाने का फैसला जिस तरह अन्ना ने अकेले किया उसी तरह उन्होंने आगे का फैसला भी अपनी मर्जी से किया है । ध्यान रहे अब अन्ना हजारे एक मई से महाराष्ट्र के शिर्डी से यात्रा की शुरुआत करेंगे। अन्ना महाराष्ट्र के 35 जिलों का दौरा करेंगे। इसके आलावा वे देश में कई जगहों पर बाबा रामदेव के साथ सभा करेंगे। महाराष्ट्र में अन्ना हजारे को टीम के किसी सदस्य की जरुरत भी नहीं है क्योकि वहा उनका खुद का आधार रहा है है और वे मराठी के जरिए इस आंदोलन को व्यापक बनाएंगे। ऐसे में महाराष्ट्र में भूमिका बनेगी भी तो सिर्फ अन्ना हजारे की किसी और की नहीं । इसका राजनैतिक संदेश समझा जा सकता है। दरअसल कुछ महत्वकांक्षी सदस्य हजारे के जन आंदोलन से अपनी राजनैतिक जमीन तलाशने लगे थे और दो ने तो लोकसभा की सीट भी चिन्हित कर ली । पर अब आंदोलन का जो हाल है वही हाल उनकी राजनैतिक संभावनाओं का भी हो गया है।

दूसरी तरफ बाबा रामदेव की तैयारी ज्यादा व्यापक और ठोस है। दिक्कत सिर्फ यह है कि उनके आंदोलन पर दक्षिण पंथी ताकतों का ठप्पा न लग जाए वर्ना उसे ज्यादा बड़ा समर्थन मिल सकता है। जयप्रकाश आंदोलन के कार्यकर्त्ता राम धीरज ने आगे कहा -बाबा रामदेव की तैयारी कई मायनों में महत्वपूर्ण है। वे नौजवानों से लेकर महिलाओं को अलग अलग संगठित कर रहे है इनमे आंदोलन वाली जमात भी शामिल है। दूसरे काला धन का मुद्दा ऐसा है जिसमे राजनैतिक दल से लेकर राष्ट्रिय अंतराष्ट्रीय मीडिया का भी समर्थन मिल सकता है। इस मामले में यह ज्यादा व्यापक आंदोलन बन सकता है।

गौरतलब है कि बाबा रामदेव की तैयारी सिर्फ तीन जून तक की ही नहीं है, बल्कि उसका विस्तार 2014  का चुनाव है जो पहले भी हो सकता है। पर उनकी राजनैतिक ताकत जून से लेकर अगस्त तक दिख जाएगी। दूसरी तरफ अब बाबा रामदेव के साथ अन्ना हजारे के आ जाने से हजारे टीम के उन सदस्यों की दिकत बढ़ सकती है जो रामदेव के विरोधी रहे है। हजारे आंदोलन से जुड़े एक नेता ने कहा -टीम अन्ना के लोग यह बात कभी समझ ही नहीं पाए कि जब तक आप खुद की कोई व्यवस्था नहीं बना सकते तो बड़ी व्यवस्था का सपना कैसे देखेंगे। न कोई संगठन न कोई कार्यक्रम खाली मीडिया का ग्लैमर कबतक चलेगा । कुछ्ह देर चल भी जाए पर जिस अहंकार से ये लोग बोलते है उससे कोई आंदोलन नहीं चल सकता एनजीओ ही चल सकता है।
(लेखक जनसत्ता से जुड़े हैं)

अहमद नूर खान
विकास के प्रति अपने मौजूदा दृष्टिकोण से हमने मूल वनों को साफ करने, आर्द्र भूमि को नष्ट करने, मत्स्य भंडार के तीन चौथाई को निगलने तथा आगामी कई शताब्दियों तक इस ग्रह को गर्म रखने वाली गैसों का उत्सर्जन किया है।

फलस्वरूप, हम अपने अस्तित्व की आधारशिला को ही नुकसान पहुंचाकर उसे खतरे में डाल रहे हैं। हमारे ग्रह पर जीवन की विविधता, जिसे जैवविविधता के नाम से जाना जाता है, से हमे भोजन, कपड़े, ईंधन, दवाइयां और उससे भी कहीं ज्यादा चीजें मिलती हैं। जीवन के इस जटिल जाल से जब एक भी प्रजाति बाहर निकाल ली जाती है तो उसका परिणाम बहुत भयावह हो सकता है। इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2010 को जैव विविधता वर्ष घोषित किया है और दुनियाभर में लोग अहस्तांतरणीय प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा एवं जैवविविधता क्षय को कम करने में जुटे हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस 2010 की मेजबानी रवांडा करेगा और यह समारोह वहां के न्न क्विता इजिना (बेबी गोरिल्ला का नामकरण)न्न समारोह के साथ मनाया जाएगा। इसका ध्येयवाक्य न्न कई प्रजातियां, एक ग्रह, एक भविष्य न्न है और यह कार्यक्रम विरूंगा पहाड़ियों के पास मनाया जाएगा जो रवांडा, डीआरसी और उगांडा तीनों क्षेत्रों में स्थित है। रवांडा दुनिया के 750 संकटापन्न पहाड़ी गोरिल्लों के एक तिहाई हिस्से का आवास है। सन् 2005 से अबतक 103 गोरिल्लों को नाम दिया गया है और इस दिवस के अवसर पर 11 गोरिल्ला को नाम दिया जाएगा।

जैविक विविधता में पेड़ों, जीव-जंतुओं एवं सूक्ष्मजीवों की सभी प्रजातियां, पारिस्थितिकी तंत्र तथा पारिस्थितिकी प्रक्रियाएं, जिनका वे हिस्सा हैं, आती हैं। यह पृथ्वी पर जीवन का आधार प्रदान करती हैं। इन संसाधनों के मौलिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्व को धर्म, कला और अबतक के साहित्यों में स्वीकार किया गया है। जंगली प्रजातियों और इनकी जेनेटिक विविधता कृषि, औषधि एवं उद्योग के विकास में अहम योगदान देती हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से कई प्रजातियां जलवायु परिवर्तन के स्थिरीकरण, आर्द्रक्षेत्रों की सुरक्षा, नर्सरियों एवं प्रजनन आधार की सुरक्षा में काफी मायने रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि विश्व के मौजूदा सूक्ष्मजीव संसाधनों जैसे शैवाल, बैक्टीरिया, कवक, लाइकन, विषाणु और प्रोटोजोवा के मात्र 13 प्रतिशत हिस्से ही ज्ञात हैं। सूक्ष्मजीवों की जैवविविधता का संरक्षण कल्चर संग्रहण के माध्यम से किया जाता है और यह धातुओं के खान, कोयला खानों से मिथेन निकालने, ऑयल रिसाव को दूर करने, इत्र बनाने, वायु प्रदूषण की निगरानी, कीट और पतंगों पर नियंत्रण और जमीन में कीटनाशक को नष्ट करने आदि कार्यों में काफी उपयोगी है।

इसके बाद भी, देश की तीन से पांच करोड़ प्रजातियों में 100 प्रजातियां हर दिन कृषि योजनाओं,  शहरों, औद्योगिक विकास और बांधों के निर्माण या प्रदूषण या अपरदन आदि में नष्ट हो जाती हैं। फिलहाल 17,291 प्रजातियों के बारे में कहा जा रहा है कि वे विलुप्त होने के कगार पर हैं, इनमें बहुत कम ज्ञात पेड़ों और कीटों से लेकर पक्षी और स्तनधारी शामिल हैं। कुछ ऐसी भी प्रजातियां हैं जो पता चलने से पहले ही विलुप्त हो गयीं। मानव उन गिनी चुनी प्रजातियों में से है जिनकी जनसंख्या बढती ज़ा रही है, जबकि अधिकतर जीव जंतु और पेड़ पौधे दुर्लभ और घटते जा रहे हैं।

मानव को हमेशा से जैवविविधता आकर्षित करती रही है। आदिम काल में शिकारी मानव गुफाओं में तस्वीर बनाते थे। गौतम बुध्द का जन्म पवित्र शाल वन में हुआ था और उन्हें पीपल पेड़ के नीचे ध्यान योग से ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। राजस्थान के बिश्नोई समुदाय ने हिरण को अपना भाई समझकर उनके संरक्षण की योजना चलाई और राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने नेशनल पार्कों के माध्यम से अमेरिकी वन्यभूमि के संरक्षण का अभियान चलाया। इसके साथ ही लोगों ने विविध प्रकार के जीवों का बड़ी निर्दयता से सफाया भी कर दिया। अंतिम हिम युग के दौरान शिकारी मानव ने विशालकाय हाथी को समूल नष्ट कर दिया और श्वेत वासियों ने अमेरिकी प्रेयरियों से गवल का सफाया कर दिया।

लोगों ने युगों तक जैवविविधता का उपयोग और दुरूपयोग दोनों किया लेकिन विविधता पर दुनियाभर में कभी भी उपयुक्त ध्यान नहीं दिया गया। वैश्विक समुदाय में धनी और शक्तिशाली ने इसके व्यापक आर्थिक क्षमता का पूरा दोहन किया।

प्राचीन ग्रंथों में सभी जीवों के अस्तित्व के बारे में सर्वत्र कहा गया और उसे उचित ठहराया गया है। सम्राट अशोक की पर्यावरण के प्रति चेतना, राजस्थान के बिश्नोई समुदाय की परंपरा तथा चिपको आंदोलन की भावना ये सभी आम आदमी की जागरूकता प्रदर्शित करती हैं। हालांकि लोगों की पर्यावरण जागरूकता पर अक्सर गरीबी और जीवन जीने की मूल आवश्यकताओं का प्रतिकूल असर भी पड़ता है। उनकी ईंधन की दैनन्दिन आवश्यकता के कारण वनों की कटाई होती है। बाघ, हिरण, मगरमच्छ, रिनसेरा तथा अन्य वन्यजीव नष्ट होते जा रहे हैं।  संकटापन्न जीवों का व्यापार कुछ लोगों की संजने संवरने की इच्छा की वजह से लगातार जारी है।

जैवविविधता पर लगातार बढता दबाव मानव की बढती ज़नसंख्या को परिलक्षित करता है। जबतक जनसंख्या स्थिर न हो जाती , तबतक यह दबाव बढता ही रहेगा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सन् 2050 से सन् 2070 के बीच जनसंख्या का 10 अरब पर स्थिर हो जाने का अनुमान है। यह स्थिरीकरण तभी हासिल किया जा सकता है जब जनसंख्या वृध्दि को रोकने का मौजूदा प्रयास पूरे लगने से जारी रहे।

विश्व पर्यावरण दिवस-2010 का ध्येयवाक्य कई प्रजातियां, एक ग्रह, एक भविष्य हमारे ग्रह पर जीवन की विविधता के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है। जैवविविधता के बगैर दुनिया का भविष्य  बहुत ही क्षीण है। इस ग्रह पर लाखों लोग तथा प्रजातियां रहती हैं और साथ मिलकर ही हम सुरक्षित एवं समृध्द भविष्य की आशा कर सकते हैं।


एम एल धर
जम्मू और कश्‍मीर में करीब दो लाख खानाबदोश गुज्जर और बकरवाल परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के अंतर्गत लाया जा रहा है। राज्य के उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री कमर अली अख्खून ने बताया कि उनको अस्थाई राशनकार्ड जारी किए जाएंग़े ताकि एक स्थान से दूसरी जगह जाने के दौरान उन्हें बिना किसी कठिनाई के राषन मिल सके। मंत्री महोदय ने कहा कि अपनी प्रवासी प्रवृत्ति के कारण वे बीपीएल परिवारों के लिए शुरू की गईं सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे थे, इससे उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी होगी।
इन खानाबदोश लोगों के प्रवास के दौरान खाद्य वस्तुओं की कमी ही सबसे प्रमुख समस्या रही है। उन्हें पीडीएस के अंतर्गत लाने से प्रवास के दौरान उनकी यह समस्या काफी हद तक कम होगी।
वर्तमान में, जम्मू और कश्‍मीर में गुज्जरों और बकरवालों की एक बड़ी जनसंख्या मौसमी प्रवास के दौरान हिमालय की उत्तरपश्चिमी ऊंची चोटियों से पैदल ही जम्मू क्षेत्र के मैदानी इलाकों में आती हैं। आजकल के दिनों में उन्हें अपने पशुओं के झुंड के साथ विभिन्न राजमार्गो और सड़कों पर चलते हुए देखना एक आम नजारा है। ऐसा माना जाता है कि मूल रूप से गुज्जर और बकरवाल राजपूत हैं जो विभिन्न कारणों से गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से कश्‍मीर में चले गये थे। प्राचीन कश्‍मीर के इतिहास कल्हाना में, राजतरंगणिनी में इन लोगों का 9वीं और 10वीं शताब्दी में कश्‍मीर की सीमा पर रहने का उल्लेख मिलता है। यह कहा जाता है कि कुछ शताब्दी पहले उन्होंने मुस्लिम धर्म को स्वीकार कर लिया और फिर वे दो अलग-अलग सम्प्रदायों गुज्जर और  बकरवाल में विभाजित हो गए। गुज्जरों के पुंछ में उच्च अधिकारी बनने से पूर्व 17वीं शताब्दी तक वे गुमनामी में रहे। इन अधिकारियों में से एक राह-उल्लाह-खान ने इस क्षेत्र में 18वीं शताब्दी में गुज्जरों के सांगो राजवंष की स्थापना की लेकिन यह भी अल्पकालिक रही।
जनसंख्या
गुज्जर और बकरवाल जम्मू और कश्‍मीर में तीसरा सबसे बड़ा जातीय समूह है जो राज्य की 20 प्रतिषत से ज्यादा जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। 2001 की जनगणना के अनुसार, 7,63,806 की जनसंख्या के साथ वे राज्य की सबसे अधिक आबादी वाली अनुसूचित जनजाति है। उनका प्रवास अधिकतर अनंतनाग, उधमपुर, डोडा, राजौरी और पुंछ सीमावर्ती जिलों में केन्द्रित रहा है। गुज्जरों और बकरवालों के बीच आपसी विवाह संबंध आम हैं।
बकरवाल और गुज्जर अपनी स्वयं की समाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान लिए हुए हैं। वे गर्मी के अधिकांश मौसम में अपना बसेरा ऊंची पीर पंजाल पहाड़ियों के प्राकृतिक हरे-भरे सुरम्य पहाड़ी मैदानों और खूबसूरत पर्वतमालाओं के बीच डालते हैं। हालांकि दूर-दराज और दुर्गम क्षेत्रों में रहने से उनका सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरणप्रभावित होता है और यह उन्हें पिछड़ेपन की ओर भी ले जाता है।
जीवन शैली     
अधिकांश गुज्जर भैंसों के चरवाहे हैं। उनमें से कुछ की पहाड़ों की तलहटी में कुछ भूमि भी है। उनमें से बहुतों के ऊंची पहाड़ियों पर लकड़ी के लठ्ठों से बने बैरक टाईप के घर भी है जिन्हें धोक्स कहा जाता है। बकरवाल भी ऐसी ही दिनचर्या के साथ आमतौर पर अपनी आजीविका के लिए भेड़ और बकरियों पर निर्भर हैं। भूमिहीन और बेघर होने के कारण वे हरे भरे मैदानों की तलाश में अपने खूंखार कुत्तों की देखरेख में अपनी बकरियों और भेड़ों के झुंड के साथ घोड़ों पर अपने साजो-सामान को लिए खानाबदोशी का जीवन जीते हैं। पं. जवाहरलाल नेहरू ने दक्षिण कष्मीर के पहलगांव में बकरवालों के एक झुंड को देखकर उन्हें जंगल का राजा के रूप में वर्णित किया था।
केन्द्र सरकार ने 1991 में जम्मू और कश्‍मीर के गुज्जरों और बकरवालों को अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया । आरक्षण के विशेष लाभ के साथ समान अवसर मिलने से उन्हें शैक्षिक और आर्थिक रूप से सशक्त करने में काफी मदद मिली ताकि वे अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक पिछड़ेपन से मुकाबला कर सकें। सरकार इन खानाबदोश समुदायों को आरक्षण का लाभ उठाने में समर्थ बनाने हेतु उनके बच्चों को  ज्ञान से परिपूर्ण करने के लिए शिक्षा दिलाने की पहल कर चुकी है। गुज्जरों और बकरवालों के लिए 12वीं कक्षा तक नि:शुल्क आवास और सुविधाओं से युक्त हॉस्टल जिला स्तर पर प्रदान कर चुकी है। बहुत सी सुविधाएं पूर्ण होने को हैं। गुज्जर और बकरवाल छात्र शैक्षिक रूप से पिछड़े इलाकों में स्थापित लड़कियों के छात्रावास और मॉडल विद्यालयों से भी लाभ उठा रहे हैं। पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान केन्द्र द्वारा 4206 अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्राओं को 3000 रूपए की छात्रवृत्ति दी गई। रोजगार और पेशेवर संस्थानों में आरक्षण का लाभ वे तभी उठा सकते हैं जब वे शैक्षिक रूप से समर्थ हों।
इससे अलावा, इसने गुज्जर पहचान को बनाए रखने में उनकी मदद भी की है। आधिकारिक और गैर-आधिकारिक दोनों स्तरों पर दशकों से गोजरी भाषा को बढ़ावा देने के प्रयासों को भी उल्लेखनीय योगदान मिला है। गोजरी को 12वीं कक्षा तक के विद्यालयों के पाठयक्रमों में शामिल कर लिया गया है। जम्मू और कश्‍मीर सांस्कृतिक अकादमी और रेडियो कश्‍मीर के गोजरी कार्यक्रमों के अतिरिक्त, गुर्जर देश चैरिटेबल ट्रस्ट, जनजातीय फाउंडेशन, सांस्कृतिक विरासत के लिए गुज्जर केन्द्र और अन्य गुज्जर संगठनों जैसे गैर-सरकारी संगठनों के दीर्घकालीन योगदान ने जम्मू और कश्‍मीर में गुज्जरों की जातीय और भाषाई पहचान के संरक्षण और प्रोत्साहन में अहम योगदान दिया है।
लेकिन इसके समकक्ष पाक अधिकृत कश्‍मीर (पीओके) में इस मामले में ऐसा नहीं है। नवम्बर, 2005 से पुंछ और उरी सैक्टरों में लोगों से लोगों के संपर्क के लिए नियंत्रण रेखा खोलने के बाद, पीओके में रहने वाले गुज्जर समुदाय के सदस्यों की भारतीय क्षेत्र में रह रहे अपने परिजनों से मिलने के लिए हुई यात्रा के बाद यह तथ्य सामने आया। पीओके के त्रार- खाल से आये आगन्तुकों में से एक अब्दुल गनी ने बताया कि जम्मू और कष्मीर में सरकारी और राजनीतिक दलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे अपने परिजनों को देखकर मैं बहुत खुश हूं। त्रार खाल से ही एक अन्य गुज्जर चौधरी मौहम्मद शरीफ  ने कहा कि हमारी संस्कृति के प्रतीक जैसे लोक गीत, लोक संगीत, परम्पराएं और सदियों पुरानी हमारी रस्में हमारी तरह खो चुकी हैं जबकि यह जम्मू और कश्‍मीर में दिखाई पड़ती हैं।
गुज्जर और बकरवाल बहादुर और साहसी लोग हैं और इन्होंने हमेशा से भारतीय सेना की मदद की है। 1965 में, कश्‍मीर घाटी में तंगमार्ग क्षेत्र के निकट तोसमैदान इलाके का एक गुज्जर मौ. दीन पहला व्यक्ति था जिसने अधिकारियों को पाकिस्तानी घुसपैठियों की उपस्थिति की जानकारी दी थी। उनकी भूमिका की प्रषंसा करते हुए यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि गुज्जर 1965 और 1971 के युध्दों के दौरान पहले ही जंग लड़ चुके हैं और आज वे जम्मू और कश्‍मीर में आतंकवाद और तोड़फोड़ के खिलाफ लड़ रहे हैं। 


फ़िरदौस ख़ान
'कुछ लोगों' की वजह से पूरी मुस्लिम क़ौम को शक की नज़र से देखा जाने लगा है... इसके लिए जागरूक मुसलमानों को आगे आना होगा... और उन बातों से परहेज़ करना होगा जो मुसलमानों के प्रति 'संदेह' पैदा करती हैं... कोई कितना ही झुठला ले, लेकिन यह हक़ीक़त है कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने भी देश के लिए अपना खून और पसीना बहाया है. हिन्दुस्तान मुसलमानों को भी उतना ही अज़ीज़ है, जितना किसी और को... यही पहला और आख़िरी सच है... अब यह मुसलमानों का फर्ज़ है कि वो इस सच को 'सच' रहने देते हैं... या फिर 'झूठा' साबित करते हैं...

इस देश के लिए मुसलमानों ने अपना जो योगदान दिया है उसे किसी भी हालत में नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। कितने ही शहीद ऐसे हैं जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी, लेकिन उन्हें कोई याद तक नहीं करता। हैरत की बात यह है कि सरकार भी उनका नाम तक नहीं लेती। इस हालात के लिए मुस्लिम संगठन भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. वे भी अपनी क़ौम और वतन से शहीदों को याद नहीं करते.

हमारा इतिहास मुसलमान शहीदों की कुर्बानियों से भरा पड़ा है। मसलन, बाबर और राणा सांगा की लडाई में हसन मेवाती ने राणा की ओर से अपने अनेक सैनिकों के साथ युध्द में हिस्सा लिया था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की दो मुस्लिम सहेलियों मोतीबाई और जूही ने आखिरी सांस तक उनका साथ निभाया था। रानी के तोपची कुंवर गुलाम गोंसाई ख़ान ने झांसी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी। कश्मीर के राजा जैनुल आबदीन ने अपने राज्य से पलायन कर गए हिन्दुओं को वापस बुलाया और उपनिषदों के कुछ भाग का फ़ारसी में अनुवाद कराया। दक्षिण भारत के शासक इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने सरस्वती वंदना के गीत लिखे। सुल्तान नांजिर शाह और सुल्तान हुसैन शाह ने महाभारत और भागवत पुराण का बंगाली में अनुवाद कराया। शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह ने श्रीमद्भागवत और गीता का फ़ारसी में अनुवाद कराया और गीता के संदेश को दुनियाभर में फैलाया।

गोस्वामी तुलसीदास को रामचरित् मानस लिखने की प्रेरणा कृष्णभक्त अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना से मिली। तुलसीदास रात को मस्जिद में ही सोते थे। 'जय हिन्द' का नारा सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज के कप्तान आबिद हसन ने 1942 में दिया था, जो आज तक भारतीयों के लिए एक मंत्र के समान है। यह नारा नेताजी को फ़ौज में सर्वअभिनंदन भी था।

छत्रपति शिवाजी की सेना और नौसेना के बेड़े में एडमिरल दौलत ख़ान और उनके निजी सचिव भी मुसलमान थे। शिवाजी को आगरे के क़िले से कांवड़ के ज़रिये क़ैद से आज़ाद कराने वाला व्यक्ति भी मुसलमान ही था। भारत की आजादी के लिए 1857 में हुए प्रथम गृहयुध्द में रानी लक्ष्मीबाई की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनके पठान सेनापतियों जनरल गुलाम गौस खान और खुदादा खान की थी। इन दोनों ही शूरवीरों ने झांसी के क़िले की हिफ़ाज़त करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। गुरु गोबिन्द सिंह के गहरे दोस्त सूफी बाबा बदरुद्दीन थे, जिन्होंने अपने बेटों और 700 शिष्यों की जान गुरु गोबिन्द सिंह की रक्षा करने के लिए औरंगंजेब के साथ हुए युध्दों में कुर्बान कर दी थी, लेकिन कोई उनकी कुर्बानी को याद नहीं करता। बाबा बदरुद्दीन का कहना था कि अधर्म को मिटाने के लिए यही सच्चे इस्लाम की लडाई है।

अवध के नवाब तेरह दिन होली का उत्सव मनाते थे। नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में श्रीकृष्ण के सम्मान में रासलीला का आयोजन किया जाता था। नवाब वाजिद शाह अली ने ही अवध में कत्थक की शुरुआत की थी, जो राधा और कृष्ण के प्रेम पर आधारित है। प्रख्यात नाटक 'इंद्र सभा' का सृजन भी नवाब के दरबार के एक मुस्लिम लेखक ने किया था। भारत में सूफी पिछले आठ सौ बरसों से बसंत पंचमी पर 'सरस्वती वंदना' को श्रध्दापूर्वक गाते आए हैं। इसमें सरसों के फूल और पीली चादर होली पर चढ़ाते हैं, जो उनका प्रिय पर्व है। महान कवि अमीर ख़ुसरो ने सौ से भी ज्यादा गीत राधा और कृष्ण को समर्पित किए थे। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की बुनियाद मियां मीर ने रखी थी। इसी तरह गुरु नानकदेव के प्रिय शिष्य साथी मियां मरदाना थे, जो हमेशा उनके साथ रहा करते थे। वह रबाब के संगीतकार थे। उन्हें गुरुबानी का प्रथम गायक होने का श्रेय हासिल है। बाबा मियां मीर गुरु रामदास के परम मित्र थे। उन्होंने बचपन में रामदास की जान बचाई थी। वह दारा शिकोह के उस्ताद थे। रसखान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्तों में से एक थे जैसे भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी आदि। रसखान अपना सब कुछ त्याग कर श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन हो गए। श्रीकृष्ण की अति सुंदर रासलीला रसखान ने ही लिखी। श्रीकृष्ण के हज़ारों भजन सूफ़ियों ने ही लिखे, जिनमें भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी, अमीर ख़ुसरो, रहीम, हज़रत सरमाद, दादू और बाबा फरीद शामिल हैं। बाबा फ़रीद की लिखी रचनाएं बाद में गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा बनीं।

बहरहाल, मुसलमानों को ऐसी बातों से परहेज़ करना चाहिए, जो उनकी पूरी क़ौम को कठघरे में खड़ा करती हैं...
जान हमने भी गंवाई है वतन की ख़ातिर,
फूल सिर्फ़ अपने शहीदों पे चढ़ाते क्यों हो...

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