वो रात
दिवाली की रात थी
हर सिम्त
रौशनी बिखरी थी
स्याह आसमान में
सितारे जगमगा रहे थे
और
ज़मीन पर
दीयों की जगमग थी
लगता था
क़ुदरत ने
मुट्ठी भर रौशनी
सारी कायनात में
छिटक दी हो
और
कायनात रौशनी का
त्यौहार मना रही हो
मगर
मेरे घर-आंगन में अंधेरा था
हमेशा की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान

डॊ. सौरभ मालवीय
भारत एक विशाल देश है. इसकी भौगोलिक संरचना जितनी विशाल है, उतनी ही विशाल है इसकी संस्कृति. यह भारत की सांस्कृतिक विशेषता ही है कि कोई भी पर्व समस्त भारत में एक जैसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, भले ही उसे मनाने की विधि भिन्न हो. ऐसा ही एक पावन पर्व है दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है. दशहरा भारत का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. विश्वभर में हिन्दू इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. यह अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के अवतार राम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी. रावण भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण करके लंका ले गया था. भगवान राम देवी दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन रावण का वध कर अपनी पत्नी को मुक्त कराया. दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है, जिनमें चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा भी सम्मिलित है. यह शक्ति की पूजा का पर्व है. इस दिन देवी दुर्गा की भी पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन लोग नया कार्य प्रारंभ करना अति शुभ माना जाता है. दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है. नवरात्रि में स्वर्ण और आभूषणों की खरीद को शुभ माना जाता है.

दशहरा नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है. देशभर में दशहरे का उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. जगह-जगह मेले लगते हैं. दशहरे से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता. इस दौरान नवरात्रि भी होती हैं. कहीं-कहीं रामलीला का मंचन होता है, तो कहीं जागरण होते हैं. दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है. इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं. कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और अग्नि बाण इन पुतलों को मारते हैं. पुतलों में पटाखे भरे होते हैं, जिससे वे आग लगते ही जलने लगते हैं.

समस्त भारत के विभिन्न प्रदेशों में दशहरे का यह पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. कश्मीर में नवरात्रि के नौ दिन माता रानी को समर्पित रहते हैं. इस दौरान लोग उपवास रखते हैं. एक परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं. यह मंदिर एक झील के बीचोबीच स्थित है.  हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित पहाड़ी लोग अपनी परंपरा के अनुसार अपने ग्रामीण देवता की शोभायात्रा निकालते हैं. इस दौरान वे तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े आदि वाद्य बजाते हैं तथा नाचते-गाते चलते हैं. शोभायात्रा नगर के विभिन्न भागों में होती हुई मुख्य स्थान तक पहुंचती है. फिर ग्रामीण देवता रघुनाथजी की पूजा-अर्चना से दशहरे के उत्सव का शुभारंभ होता है. हिमाचल प्रदेश के साथ लगते पंजाब तथा हरियाणा में दशहरे पर नवरात्रि की धूम रहती है. लोग उपवास रखते हैं. रात में जागरण होता है. यहां भी रावण-दहन होता है और मेले लगते हैं. उत्तर प्रदेश में भी दशहरा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यहां रात में रामलीला का मंचन होता है और दशहरे के दिन रावण दहन किया जाता है.

बंगाल, ओडिशा एवं असम में दशहरा दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है.  बंगाल में पांच दिवसीय उत्सव मनाया जाता है. ओडिशा और असम में यह पर्व चार दिन तक चलता है. यहां भव्य पंडाल तैयार किए जाते हैं तथा उनमें देवी दुर्गा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है. दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है. महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं. इसके पश्चात देवी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है. विसर्जन यात्रा में असंख्य लोग सम्मिलित होते हैं.

गुजरात में भी दशहरे के उत्सव के दौरान नवरात्रि की धूम रहती है. कुंआरी लड़कियां सिर पर मिट्टी के रंगीन घड़े रखकर नृत्य करती हैं, जिसे गरबा कहा जाता है. पूजा-अर्चना और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन किया जाता है. महाराष्ट्र में भी नवरात्रि में नौ दिन मां दुर्गा की उपासना की जाती है तथा दसवें दिन विद्या की देवी सरस्वती की स्तुति की जाती है. इस दिन बच्चे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मां सरस्वती की पूजा करते हैं.

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरे के उत्सव के दौरान लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है. पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन होता है. दूसरे दिन कला एवं विद्या की देवी सरस्वती-की अर्चना की जाती है तथा और अंतिम दिन शक्ति की देवी दुर्गा की उपासना की जाती है. कर्नाटक के मैसूर का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को प्रकाश से ससज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है. इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण का दहन का नहीं किया जाता.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरा का बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता है. यहां इस दिन देवी दंतेश्वरी की आराधना की जाती है. दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं. यहां यह त्यौहार 75 दिन यानी श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है. प्रथम दिन जिसे काछिन गादि कहते हैं, देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है. देवी कांटों की सेज पर विरजमान होती हैं, जिसे काछिन गादि कहा जाता है. यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं. बताया जाता है कि यह समारोह लगभग पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुआ था. काछिन गादि के बाद जोगी-बिठाई होती है, तदुपरांत भीतर रैनी (विजयदशमी) और बाहर रैनी (रथ-यात्रा) निकाली जाती है. अंत में मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है.इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है.

दशहरे के दिन वनस्पतियों का पूजन भी किया जाता है. रावण दहन के पश्चात शमी नामक वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.
इसके साथ ही अपराजिता (विष्णु-क्रांता) के पुष्प भगवान राम के चरणों में अर्पित किए जाते हैं. नीले रंग के पुष्प वाला यह पौधा भगवान विष्णु को प्रिय है.

दशहरे का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है.



-फ़िरदौस ख़ान
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ख़िराजे-अक़ीदत पेश करते हुए ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती फ़रमाते हैं-
शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन
दीन अस्त हुसैन, दीने-पनाह हुसैन
सरदाद न दाद दस्त, दर दस्ते-यज़ीद
हक़्क़ा के बिना, लाइलाह अस्त हुसैन...
इस्लामी कैलेंडर यानी हिजरी सन् का पहला महीना मुहर्रम है. हिजरी सन् का आग़ाज़ इसी महीने से होता है. इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस माह को अल्लाह का महीना कहा है. साथ ही इस माह में रोज़ा रखने की ख़ास अहमियत बयान की गई है. 10 मुहर्रम को यौमे आशूरा कहा जाता है. इस दिन अल्लाह के नबी हज़रत नूह (अ.) की किश्ती को किनारा मिला था.

कर्बला के इतिहास मुताबिक़ सन 60 हिजरी को यज़ीद इस्लाम धर्म का ख़लीफ़ा बन बैठा. सन् 61 हिजरी से उसके जनता पर उसके ज़ुल्म बढ़ने लगे. उसने हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन से अपने कुशासन के लिए समर्थन मांगा और जब हज़रत इमाम हुसैन ने इससे इनकार कर दिया, तो उसने इमाम हुसैन को क़त्ल करने का फ़रमान जारी कर दिया. इमाम हुसैन मदीना से सपरिवार कुफ़ा के लिए निकल पडे़, जिनमें उनके ख़ानदान के 123 सदस्य यानी 72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे शामिल थे. यज़ीद सेना (40,000 ) ने उन्हें कर्बला के मैदान में ही रोक लिया. सेनापति ने उन्हें यज़ीद की बात मानने के लिए उन पर दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने अत्याचारी यज़ीद का समर्थन करने से साफ़ इनकार कर दिया. हज़रत इमाम हुसैन सत्य और अहिंसा के पक्षधर थे. हज़रत इमाम हुसैन ने इस्लाम धर्म के उसूल, न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, सदाचार और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था को अपने जीवन का आदर्श माना था और वे उन्हीं आदर्शों के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार थे. यज़ीद ने हज़रत इमाम हुसैन और उनके ख़ानदान के लोगों को तीन दिनों तक भूखा- प्यास रखने के बाद अपनी फ़ौज से शहीद करा दिया. इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की तादाद 72 थी.

पूरी दुनिया में कर्बला के इन्हीं शहीदों की याद में मुहर्रम मनाया जाता है. दस मुहर्रम यानी यौमे आशूरा देश के कई शहरों में ताज़िये का जुलूस निकलता है. ताज़िया हज़रत इमाम हुसैन के कर्बला (इराक़ की राजधानी बग़दाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा क़स्बा) स्थित रौज़े जैसा होता है. लोग अपनी अपनी आस्था और हैसियत के हिसाब से ताज़िये बनाते हैं और उसे कर्बला नामक स्थान पर ले जाते हैं. जुलूस में शिया मुसलमान काले कपडे़ पहनते हैं, नंगे पैर चलते हैं और अपने सीने पर हाथ मारते हैं, जिसे मातम कहा जाता है. मातम के साथ वे हाय हुसैन की सदा लगाते हैं और साथ ही नौहा (शोक गीत) भी पढ़ते हैं. पहले ताज़िये के साथ अलम भी होता है, जिसे हज़रत अब्बास की याद में निकाला जाता है.

मुहर्रम का महीना शुरू होते ही मजलिसों (शोक सभाओं) का सिलसिला शुरू हो जाता है. इमामबाड़े सजाए जाते हैं. मुहर्रम के दिन जगह- जगह पानी के प्याऊ और शर्बत की छबीलें लगाई जाती हैं. हिंदुस्तान में ताज़िये के जुलूस में शिया मुसलमानों के अलावा दूसरे मज़हबों के लोग भी शामिल होते हैं.

विभिन्न हदीसों, यानी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के कथन व अमल (कर्म) से मुहर्रम की पवित्रता और इसकी अहमियत का पता चलता है. ऐसे ही हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बार मुहर्रम का ज़िक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना कहा है. इसे जिन चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि रमज़ान के अलावा सबसे अहम रोज़े (व्रत) वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं. यह फ़रमाते वक़्त नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बात और जोड़ी कि जिस तरह अनिवार्य नमाज़ों के बाद सबसे अहम नमाज़ तहज्जुद की है, उसी तरह रमज़ान के रोज़ों के बाद सबसे अहम रोज़े मुहर्रम के हैं.

मुहर्रम की 9 तारीख़ को जाने वाली इबादत का भी बहुत सवाब बताया गया है. सहाबी इब्ने अब्बास के मुताबिक़ हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख़ का रोज़ा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं और मुहर्रम के एक रोज़े का सवाब 30 रोज़ों के बराबर मिलता है.
मुहर्रम हमें सच्चाई, नेकी और ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है.
क़त्ले-हुसैन असल में मर्गे-यज़ीद है
इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद...


चांदनी
हुस्ने-क़त्ल असल में मर्गे-यज़ीद है,
इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद...
इस्लामी कैलेंडर यानि हिजरी सन् का पहला महीना मुहर्रम है. हिजरी सन् का आगाज़ इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है. अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस माह को अल्लाह का महीना कहा है. साथ ही इस माह में रोज़ा रखने की खास अहमियत बयान की गई है. 10 मुहर्रम को यौमे आशूरा कहा जाता है. इस दिन अल्लाह के नबी हज़रत नूह (अ.) की किश्ती को किनारा मिला था.

कर्बला के इतिहास मुताबिक़ सन 60 हिजरी को यजीद इस्लाम धर्म का खलीफा बन बैठा. सन् 61 हिजरी से उसके जनता पर उसके ज़ुल्म बढ़ने लगे. उसने हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन से अपने कुशासन के लिए समर्थन मांगा और जब हज़रत इमाम हुसैन ने इससे इनकार कर दिया तो उसने इमाम हुसैन को क़त्ल करने का फ़रमान जारी कर दिया. इमाम हुसैन मदीना से सपरिवार कुफा के लिए निकल पडे़, जिनमें उनके खानदान के 123 सदस्य यानी 72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे शामिल थे. यज़ीद सेना (40,000 ) ने उन्हें कर्बला के मैदान में ही रोक लिया. सेनापति ने उन्हें यज़ीद की बात मानने के लिए उन पर दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने अत्याचारी यज़ीद का समर्थन करने से साफ़ इनकार कर दिया. हज़रत इमाम हुसैन सत्य और अहिंसा के पक्षधर थे. हज़रत इमाम हुसैन ने इस्लाम धर्म के उसूल, न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, सदाचार और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था को अपने जीवन का आदर्श माना था और वे उन्हीं आदर्शों के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार थे. यज़ीद ने हज़रत इमाम हुसैन और उनके खानदान के लोगों को तीन दिनों तक भूखा- प्यास रखने के बाद अपनी फौज से शहीद करा दिया. इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की तादाद 72 थी.

पूरी दुनिया में कर्बला के इन्हीं शहीदों की याद में मुहर्रम मनाया जाता है. मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। 10 मुहर्रम को यौमे आशूरा कहा जाता है। उसके बाद से यह दिन कर्बला के शहीदों की यादगार मनाने का दिन बन गया और इसी शोक पर्व को भारत में मुहर्रम के नाम से जाना जाता है. इस दिन भारत के अधिकतर शहरों में ताज़िये का जुलूस निकलता है. ताजिया हज़रत इमाम हुसैन के कर्बला (इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा) स्थित रौज़े जैसा होता है. लोग अपनी अपनी आस्था और हैसियत के हिसाब से ताज़िये बनाते हैं और उसे कर्बला नामक स्थान पर ले जाते हैं. जुलूस में शिया मुसलमान काले कपडे़ पहनते हैं, नंगे पैर चलते हैं और अपने सीने पर हाथ मारते हैं, जिसे मातम कहा जाता है. मातम के साथ वे हाय हुसैन की सदा लगाते हैं और साथ ही कुछ नौहा (शोक गीत) भी पढ़ते हैं. पहले ताज़िये के साथ अलम भी होता है, जिसे हज़रत इमाम हुसैन के छोटे भाई हज़रत अब्बास की याद में निकाला जाता है.

मुहर्रम का महीना शुरू होते ही मजलिसों (शोक सभाओं) का सिलसिला शुरू हो जाता है. इमामबाड़ा सजाया जाता है. मुहर्रम के दिन जगह- जगह पानी के प्याऊ और शरबत की शबील लगाई जाती है. भारत में ताज़िये के जुलूस में शिया मुसलमानों के अलावा दूसरे मज़हबों के लोग भी शामिल होते हैं.

विभिन्न हदीसों, यानी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के कथन व अमल (कर्म) से मुहर्रम की पवित्रता और इसकी अहमियत का पता चलता है. ऐसे ही हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बार मुहर्रम का ज़िक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना कहा है. इसे जिन चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि रमज़ान के अलावा सबसे उत्तम रोज़े (व्रत) वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं. यह फ़रमाते वक़्त नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बात और जोड़ी कि जिस तरह अनिवार्य नमाज़ों के बाद सबसे अहम नमाज़ तहज्जुद की है, उसी तरह रमज़ान के रोज़ों के बाद सबसे उत्तम रोज़े मुहर्रम के हैं.

मुहर्रम की 9 तारीख को जाने वाली इबादत का भी बहुत सवाब बताया गया है. सहाबी इब्ने अब्बास के मुताबिक़ हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख का रोज़ा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं और मुहर्रम के एक रोज़े का सवाब 30 रोज़ों के बराबर मिलता है.
मुहर्रम हमें सच्चाई, नेकी और ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है.

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी फ़िलहाल अमेरिका के दौरे पर हैं. उन्होंने बुधवार रात न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक टाइम्स स्क्वायर के पास एक होटल में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित किया. ग़ौरतलब है कि वे इससे पहले प्रिंसटन और बर्कले यूनिवर्सिटी में भी भाषण दे चुके हैं. राहुल गांधी अपने भाषण में  जहां भारत से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं, वहीं उनका हल भी बता रहे हैं. वे बता रहे हैं कि किस तरह बेरोज़गारी और सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं से निपटा जा सकता है, किस तरह देश का विकास किया जा सकता है. किस तरह देश दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है.
टाइम्स स्क्वायर में अप्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा,
मैं मंच पर मौजूद सभी लोगों का स्वागत करता हूं और इस हॉल में मौजूद आप में से हर एक का स्वागत करता हूं.
आपको पता है कि कई साल पहले सैम भारत आए थे और उन्होंने अभी आपको इंदिरा गांधी जी द्वारा उनके प्रेजेंटेशन को सुनने की बात बताई. मुझे लगता है, सैम ने 1982- 1979 की बात है. मुझे लगता है कि आप दोबारा 1982 में आएं. तो वे 1982 में जब आए, तो उस वक़्त मैं 12 साल का था और एक सुबह मेरे पिता ने मुझसे कहा कि एक प्रेज़ेंटेशन होने वाला है और तुम्हें आना है.
तब प्रेज़ेंटेशन क्या होता है, मुझे ये नहीं पता था. मैंने सोचा कि मुझे कोई ईनाम मिलेगा. ख़ैर, मैं वहां गया और मेरी बहन और मैं कमरे में पीछे की तरफ़ चुपचाप बैठ गए. और हम वहां 6 घंटे तक बैठे रहे. और सैम और मेरे पिता कंप्यूटर पर चर्चा करते रहे. मुझे नहीं पता था कि ये कंप्यूटर क्या चीज़ है. हक़ीक़त में 1982 में कोई भी नहीं जानता था कि कंप्यूटर होता क्या है. मेरे लिए ये एक बॉक्स था, जिसमें टीवी स्क्रीन लगी हुई थी. मेरे लिए यह उस पर एक टीवी स्क्रीन के साथ एक छोटे से बॉक्स की तरह दिखता था. और सच कहूं तो मुझे वो प्रेज़ेंटेशन पसंद नहीं आया, क्योंकि बच्चे के तौर पर मुझे वहां 6 घंटे तक बैठना अच्छा नहीं लगा. और 4-5 साल बाद मैंने उस प्रेज़ेटेशन का नतीजा देखना शुरू किया. प्रधानमंत्री कार्यालय में टाईप राइटर होता था और हर कोई टाईप राइटर का इस्तेमाल करना चाहता था.
सैम और मेरे पिता ने पीएमओ में कहा कि अब हमें कंप्यूटर का इस्तेमाल करना होगा. और हर किसी ने उस वक़्त कहा,  नहीं. हमें अपना टाईप राइटर ही पसंद है, हमें कंप्यूटर नहीं चाहिए. तब सैम और मेरे पिता ने अपनी विशिष्ट शैली में कहा कि ठीक है. आप अपना टाईप राइटर रखें, लेकिन जो हम करना चाहते हैं, वो एक महीने के लिए टाईप राइटर की जगह कंप्यूटर का इस्तेमाल है. और एक महीने के बाद हम आपको आपका टाईप राइटर वापस दे देंगे. उन लोगों ने उन्हें एक महीने के लिए कंप्यूटर दिया और एक महीने बाद उन लोगों ने कहा कि ठीक है. अब हम आपको आपका टाईप राइटर वापस लौटा रहे हैं, तब हर किसी ने लड़ना शुरू कर दिया कि नहीं, हमें अब टाईप राइटर वापस नहीं चाहिए, हमें कंप्यूटर चाहिए.

विचारों को भारत में आने में वक़्त लगता है, लेकिन जब विचार अच्छा हो, तो भारत उसे तेज़ी से समझता है और उसे तेज़ी से अपनाता है. और दुनिया को दिखा देता है कि इसका बेहतर ढंग से इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. मैं कार में सैम से बात कर रहा था और मैंने उन्हें एक बात कही और उन्होंने कहा कि ओह !
मैंने तो इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं. आप सभी एनआरआई हैं. कांग्रेस आंदोलन, मूल कांग्रेस आंदोलन, एक एनआरआई आंदोलन था.  महात्मा गांधी एक प्रवासी भारतीय थे.  जवाहरलाल नेहरू इंग्लैंड से वापस लौटे थे. अम्बेडकर,  आज़ाद, पटेल ये सभी एनआरआई थे. उनमें से हर कोई बाहरी दुनिया में गया था. बाहरी दुनिया को देखा था.  भारत वापस लौट आया और जो कुछ विचार उन्हें हासिल हुआ, उससे भारत को बदल दिया. मैं इससे भी आगे जाऊंगा. भारत में सबसे बड़ी कामयाबी, हालांकि भाजपा के मित्र कहते हैं कि कुछ भी नहीं हुआ, लेकिन भारत में हमारी सबसे बड़ी सफ़लताओं में से एक दुग्ध क्रांति है. भारत में अधिकांश लोग दूध पीते हैं, उसे कुरियन नाम के व्यक्ति जो खुद एनआरआई थे, ने मुमकिन कर दिखाया. वे अमेरिका से वापस आए और उन्होंने भारत को बदल दिया.
सैम एक और मिसाल हैं. और इस तरह की हज़ारों-हज़ार मिसालें हैं, जिनके बारे में हमें पता नहीं है. तो इससे पहले कि मैं अपने भाषण की गहराई में जाऊं.  मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं सेंट फ्रांसिस्को, लॉस एंजिल्स, वाशिंगटन, न्यूयॉर्क में गया. मैंने प्रिंसटन और बर्कले में लोगों को संबोधित किया और जहां भी मैं गया, आप लोगों की वजह से मुझे एक हिन्दुस्तानी होने पर गर्व महसूस हुआ. इस देश में आप लोग हर जगह हैं. यहां भारतीय व्यक्ति है, जो अमेरिका के लिए काम कर रहा है. भारत के लिए काम कर रहा है, शांति से रह रहा है और इस देश और भारत देश का निर्माण कर रहा है.
तो मैं आपको यह बताकर अपनी बात की शुरुआत करना चाहता हूं कि हक़ीक़त में आप हमारे देश की रीढ़ हैं.
कुछ लोग भारत को एक भौगोलिक संरचना के तौर पर देखते हैं. वे भारत को ज़मीन के एक टुकड़े के रूप में देखते हैं. मैं भारत को ज़मीन के एक टुकड़े के रूप में नहीं देखता. मैं भारत को विचारों के एक समूह के तौर पर देखता हूं. तो मेरे लिए, कोई भी व्यक्ति, जो भारत के विचारों को तैयार करता है, वह भारतीय है. हमारे देश में कई सारे मज़हब हैं. हमारे देश में कई सारी अलग-अलग भाषाएं हैं. उनमें से हर कोई मिलजुल कर ख़ुशी से रहता है. और वे ऐसा करने में इसलिए कामयाब हुए हैं, क्योंकि इसकी वजह कांग्रेस पार्टी के विचार हैं.
सैम पित्रोदा ने अभी कहा कि कांग्रेस 130 साल पुरानी है. ये सही बात है. कांग्रेस का संगठन 100 साल से थोड़ा ज़्यादा पुराना है. लेकिन भारत में कांग्रेस के विचार हज़ारों साल पुराने हैं.
सैम ! हम सिर्फ़ एक संगठन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि हम एक दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हज़ारों साल पुराना है. और मैं आपको थोड़ा बताता हूं कि वो दर्शन क्या है? गांधी जी ने हक़ीक़त में किसके लिए लड़ाई लड़ी? हमारा स्वतंत्रता संग्राम किस लिए था? कुरियन जी ने क्या काम किया?
सैम पित्रोदा ने क्या किया और हज़ारों प्रवासी भारतीयों ने क्या किया? ये सभी सच के लिए खड़े हुए. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनके सामने क्या खड़ा है. जब वे किसी चीज़ पर भरोसा करते हैं और उन्हें यक़ीन होता है कि ये सच है, तो वे इसके लिए खड़े हो जाते हैं और इसके लिए उन्हें क़ीमत चुकानी पड़ती है. यही कांग्रेस का विचार है.
मेरे इस सफ़र के दौरान मैंने काफ़ी बातचीत की. मैं प्रशासन के काफ़ी लोगों से मिला. मैंने डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों के लोगों से मुलाक़ात की. मैं कई दोस्तों से मिला.  एनआरआई दोस्तों से मिला. और मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं हैरान रह गया, क्योंकि इससे पहले कि मैं उन्हें कुछ बता पाता कि मैं किस बारे में चिंतित हूं, उन लोगों ने मुझे ठीक वही बात कह दी. और सबसे बड़ी बात ये थी कि ज़्यादातर लोगों ने मुझे बताया कि भारत में प्रबल रहने वाली सहिष्णुता का क्या हुआ? भारत में सद्भावना का क्या हुआ?
कई सारी चुनौतियां हैं, जिनका भारत को सामना करना पड़ रहा है. सबसे बड़ी चुनौती, और मैं आपको इसके आंकड़े दूंगा. हर दिन 30 हज़ार युवा नौकरी बाज़ार में शामिल होते हैं.इसका मतलब है कि 24 घंटे में 30 हज़ार नये भारतीय नौकरी के लिए बाज़ार में आते हैं. आज उनमें से केवल 450 को ही नौकरी मिल रही है. मैं बेरोज़गारों के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. मैं बता रहा हूं कि हर एक दिन 30 हज़ार नये लोग आते हैं और सिर्फ़ 450 लोगों को ही नौकरी मिलती है. हमारे देश के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है. और इस चुनौती को लोगों को एकजुट करने और इस समस्या का समाधान करके एकीकृत दृष्टिकोण के निर्माण से संबोधित किया जा सकता है.
हम भारत में हर किसी चीज़ पर चर्चा करते हैं. भारत में बांटने वाली राजनीति चल रही है, लेकिन भारत का सामना जिस असली चुनौती से है, वो नौकरी के लिए आने वाले 30 हज़ार युवाओं और उनमें से केवल 450 को नौकरी मिलने को लेकर है.
अगर ऐसे ही चलता रहा, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या नतीजे होंगे. भारत अगर अपने युवाओं को रोज़गार नहीं दे पाता, तो वो उन्हें कोई दृष्टिकोण नहीं दे सकता. इस समस्या को हल करने के लिए कांग्रेस पार्टी के पास दूरदृष्टि है. और मैं इस विज़न के बारे में थोड़ा आपको बताना चाहता हूं.
इस वक़्त पूरा फ़ोकस 50-60 काफ़ी बड़ी कंपनियों पर है. मेरा मानना है कि अगर आपको भारत में लाखों-करोड़ों रोज़गार पैदा करने हैं, तो ये छोटे और मध्यम कारोबार को सशक्त बनाकर ही किया जा सकता है. ये काम उद्यमियों को सशक्त बनाकर किया जा सकता है. दूसरा, मैं आपको एक और आंकड़ा बताता हूं. भारत में 40 फ़ीसद सब्ज़ियां सड़ जाती हैं. कृषि को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. यहां पंजाब के लोग भी हैं.
आप समझ सकते हैं कि मैं हक़ीक़त में क्या कह रहा हूं. कृषि हमारी सामरिक संपत्ति है. हमें कृषि का विकास करने की ज़रूरत है. हमें शीत भंडारण श्रृंखला विकसित करने की ज़रूरत है. हमें खेतों के पास फ़ूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की ज़रूरत है और हमें भारतीय कृषि को सशक्त बनाने की ज़रूरत है. अगर हम अपने किसानों को सशक्त बनाते हैं, तो हमें लाखों नौकरियां मिल सकती हैं.
स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं बदलने वाली हैं और बर्कले में मैंने अपने भाषण में ये बात कही थी. आज स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी सभी जानकारियां डॉक्टरों को याद हैं. आने वाले कल में ये सारी जानकारियां कंप्यूटर पर होने जा रही हैं. भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. हम हृदय शल्य चिकित्सा, नेत्र शल्य चिकित्सा सहित काफ़ी तादाद में शल्य क्रियाएं करते हैं. हमें इन सबकी गहरी समझ है कि इन्हें कैसे किया जा सकता है. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भारत के लिए बड़ा मौक़ा है. हम दुनिया के स्वास्थ्य सेवा केंद्र बन सकते हैं. लेकिन हमें आज इसके लिए योजना बनानी होगी. और मैं केवल स्वास्थ्य पर्यटन के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. मैं ऐसी मान्यता प्रणाली के निर्माण के बारे में बात कर रहा हूं, जिससे भविष्य में चिकित्सा प्रक्रियाओं का बड़ा हिस्सा हमारे देश में किया जाएगा.
मैं आईआईटी के लिए भी इसी तरह का दृष्टिकोण आपको बता सकता हूं. मैं बर्कले में गया. कल मैं प्रिंस्टन में था. अमेरिकी विश्वविद्यालय ज्ञान नेटवर्क हैं. सूचनाएं उनके भीतर दौड़ती हैं. वे कारोबार से जुड़े हुए हैं, वे अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं. हमारे आईआईटी शानदार संस्थान हैं, लेकिन वे नेटवर्क नहीं हैं. अगर हम अपने आईआईटी को अपने उद्योगों से जोड़ते हैं, अगर हम अपने आईआईटी को दुनियाभर के कारोबारों से जोड़ते हैं, तो वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा करना शुरू कर देंगे. ये सारी चीज़एं हैं, जो की जा सकती हैं.
लेकिन मैं वापस अपने भाषण की शुरुआत में जाना चाहता हूं. आपको शामिल होने की ज़रूरत है. आपके पास ज़बरदस्त ज्ञान है, आपके पास शानदार समझ है, आप विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं. मैं आपको आगे आने और आगे बढ़ने के दृष्टिकोण पर कांग्रेस पार्टी के साथ काम करने के लिए आमंत्रित करना चाहता हूं. हम आपकी मदद लेना चाहते हैं और देखिए, सैम पित्रोदा ने अकेले दूरसंचार उद्योग को बदल कर रख दिया.हम एक सैम पित्रोदा को नहीं चाहते. हम कम से कम 10-15 सैम पित्रोदा चाहते हैं, क्योंकि भारत में काफ़ी काम करना है. अख़िर में मैं आपसे कहना चाहता हूं कि भारत ने हमेशा दुनिया को दिखाया है कि भाईचारे के साथ कैसे रहना है.
भारत हज़ारों सालों से एकता और शांति के साथ रहने के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. इसे चुनौती दी जा रही है. हमारे देश में ऐसी ताक़तें हैं, जो देश को बांट कर रही हैं और देश के लिए यह बहुत ख़तरनाक है. और ये विदेशों में हमारी साख को बर्बाद कर रही हैं.
डेमोक्रेटिक पार्टी के, रिपब्लिकन पार्टी के काफ़ी सारे लोगों ने मुझसे पूछा कि हमारे देश में क्या हो रहा है. हम हमेशा विश्वास करते थे कि आपका देश एकजुटता से काम करता है. हम हमेशा मानते थे कि आपका देश शांतिपूर्ण है, आपके देश में क्या हो रहा है? और इसी चीज़ के ख़िलाफ़ हमें लड़ना है. दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बेहद अहम है. दुनिया बदल रही है और लोग हमारी तरफ़ देख रहे हैं. चीन उभर रहा है, अमेरिका के साथ हमारे संबंध हैं. हिंसक दुनिया के कई देश भारत की तरफ़ देख रहे हैं, और कह रहे हैं कि इक्कीसवीं सदी में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का जवाब भारत दे सकता है. इसलिए हम अपनी सबसे ताक़तवर संपत्ति खो नहीं सकते. हमारी सबसे बड़ी संपत्ति ख़ुशी, शांति और प्यार से रहने वाली 130 करोड़ जनता है. और पूरी दुनिया ने हमें इस चीज़ के लिए सम्मान दिया है. और यही वो चीज़ है, जिसे हम कांग्रेस के लोग, हममें से हर एक को बचाना है.एक देश के रूप में भारत सभी लोगों के लिए है. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कौन हैं, मैं अपने सिख भाइयों को देख सकता हूं, मैं विभिन्न राज्यों के लोगों को देख सकता हूं.
भारत अकेले आप में से किसी से संबंधित नहीं है, बल्कि भारत इस पूरे कमरे से जुड़ा हुआ है. भारत का रिश्ता हम सभी से है और यही कांग्रेस पार्टी है. मैं एक बार फिर से आप सभी का बहुत धन्यवाद करना चाहता हूं.
और मैंने सैम को बताया है, सैम ! आप जब भी चाहें कि मैं अमेरिका आऊं, आप जहां कहीं भी मुझे बुलाना चाहें बस मुझे एक फ़ोन कर दें, मैं हाज़िर हो जाऊंगा. और आख़िरी बात मैंने आज सैम को बताया.
उन्होंने तस्वीरों के बारे में कहा और मैंने कुछ सीखा है. सैम, हमारे यहां व्यक्तिगत तस्वीरें चलती हैं, तो मुझे लगता है कि अगली बार हमारे पास काफ़ी वक़्त होगा, ताकि हम एक दूसरे के साथ सेल्फ़ी और फ़ोटो ले सकें.
आपका बहुत धन्यवाद.
आप सभी को शुभकामनाएं


फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की... गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूजरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद वह भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...

हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.

गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.

सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.

एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.

1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.

दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.

किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-

सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

प्रियदर्शी दत्ता
14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने एक लंबी और सजीव बहस के बाद देवनागरी लिपि में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में अपनाया था। भारतीय संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 343 से 351 तक इसी विषय के बारे में है। अनुच्‍छेद 343 (1) में यह घोषणा की गई है कि देवनागरी लिपि में हिंदी संघ की राजभाषा होगी। लेकिन अनुच्छेद 343 (2) और उसके बाद के अनुच्‍छेदों को पढ़ने से पता चलता है कि भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में राजभाषा के मुद्दे को बहुत कठिन और जटिल रास्‍ते से होकर गुजरना है क्‍योंकि देश के सरकारी संस्‍थानों में अंग्रेजी में निर्धारित कानूनों, नियमों और विनियमों का ही वर्चस्व है।



इसका एक समझौता के रूप में वर्णन किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियां, संसद और राज्य विधानसभाओं में पेश किए जाने वाले या पारित सभी विधेयकों और अधिनियमों के अधिकृत पाठ, संविधान के तहत पारित सभी आदेश / नियम / कानून और विनियमों को अंग्रेजी में ही होना चाहिए (जैसा औपनिवेशिक भारत में था)। 17 फरवरी, 1987 को संविधान (58वां) संशोधन अधिनियम के पारित होने तक संविधान (संशोधनों में शामिल) का कोई अद्यतन संस्करण संशोधनों के साथ हिंदी में जारी नहीं किया जा सकता था। विभिन्न कारणों से एक राजभाषा के रूप में हिंदी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा है। यही कारण है कि 70 वर्षों के बाद भी हिन्‍दी अंग्रेजी की जगह लेती हुई कहीं भी दिखाई नहीं दे रही है। हमारे संविधान निर्माताओं ने इस कार्य के लिए केवल 15 साल का समय दिया था।

 राजभाषा की अवधारणा राज्य के विभिन्न अंगों जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और सशस्त्र बलों आदि से संबंधित है। हालांकि, देश अपने सरकारी संस्थानों से कहीं बड़ा है। भारत में महात्मा गांधी ने जो जन जागरण किया वह संस्‍थानों से बाहर हुआ था। उनका असहयोग आंदोलन या भारत सरकार अधिनियम 1 9 1 9 के तहत कांग्रेस का चुनाव में भाग लेने के उनके विरोध से यह पता चलता है कि उन्‍होंने देश की अपने संस्‍थानों पर निर्भरता को नकार दिया था। गांधीजी औपनिवेशिक भारत में उसके राज्य तंत्र के बीच की खाई और उसके लाखों लोगों के बारे में पूरी तरह जागरूक थे। वे भारत की बजाय भारतीय राष्ट्र को संबोधित करना चाहते थे। गांधीजी ने ऐसा करने के लिए अंग्रेजी की बजाय लोगों की भाषा का उपयोग करने का तरीका अपनाया।

भाषा का यह प्रश्‍न गांधीजी के स्वदेशी अभियान का अभिन्न अंग था। उन्‍होंने यह समझ लिया था कि लोग अपनी भाषा के जरिए ही स्वराज के मिशन में शामिल हो सकते हैं। इसलिए 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद, गांधी ने हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के अधिक से अधिक उपयोग पर जोर दिया। प्रताप (हिन्‍दी) में 28 मई, 1917 को प्रकाशित उनके लेख में हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार करने की वकालत की गई थी।



इसमें उन्होंने कहा था कि ज्यादातर भारतीय, जिन्हें न तो हिंदी आती है और न ही अंग्रेजी, उनके लिए हिन्‍दी सीखना अधिक आसान होगा। उन्‍होंने कहा कि केवल डरपोक होने के कारण ही भारतीयों ने अपना राष्ट्रीय कार्य व्यापार हिंदी में करना शुरू नहीं किया है। अगर भारतीयों इस कायरता को छोड़ दे और हिंदी में विश्वास जताएं तो राष्ट्रीय और प्रांतीय परिषदों का कार्य भी इस भाषा में किया जा सकता है।

      इसी लेख में गांधीजी ने पहली बार दक्षिण भारत में हिंदी मिशनरियों को भेजने का विचार प्रस्‍तुत किया। उन्‍हीं के विचार ने 1923 में स्‍थापित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के रूप में मूर्त रूप लिया। 20 अक्‍टूबर 1917 को भरूच में दूसरे गुजरात शिक्षा सम्‍मेलन में दिया गांधीजी का भाषण महत्‍वपूर्ण समझा जाता है। इस भाषण में उन्‍होंने हिंदी को लोकप्रिय बनाने में स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती के अग्रणी प्रयासों की सराहना की।

   स्‍वामी दयानंद (1824-1883) गांधीजी की तरह ही गुजरात के रहने वाले थे। वे धार्मिक बहस और शिक्षण के माध्‍यम के तौर पर संस्‍कृ‍त का उपयोग करते थे। हिमालय क्षेत्र और उत्‍तर भारत में दशकों तक रहने के बावजूद उन्‍होंने कभी भी हिंदी सीखने का प्रयास नहीं किया। लेकिन 1873 में, जब वे कोलकाता की यात्रा पर गए, तो उनकी भेंट ब्रह्म समाज के केशब चन्‍द्र सेन से हुई। सेन ने उन्‍हें सलाह दी कि वे जनता तक पहुंच बनाने के लिए संस्‍कृत की जगह हिंदी का उपयोग करें। दिलचस्‍प बात यह है कि स्‍वामी दयानंद और केशब चन्‍द्र सेन दोनों में से कोई भी मूल रूप से हिंदी भाषी नहीं था। उन्‍होंने इस मैत्रीपूर्ण परामर्श को स्‍वीकार कर लिया और थोड़े ही समय में हिंदी में महारत हासिल कर ली। उन्‍होंने अपनी महान कृति सत्‍यार्थ प्रकाश (1875) की रचना भी हिंदी में ही की। उनके द्वारा स्‍थापित आर्य समाज ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने की सशक्‍त एजेंसी के रूप में कार्य किया।

इस प्रकार गांधीजी ने हिंदी की मशाल उस जगह से अपने हाथ में थामी, जहां स्‍वामी दयानंद ने उसे छोड़ा था। जहां एक ओर स्‍वामी दयानंद का मिशन धार्मिक था, वहीं दूसरी ओर गांधीजी का मिशन राष्‍ट्रीय था। गांधीजी ने हिंदी को भारतीय मानस को ‘उपनिवेशवाद से मुक्‍त’ कराने के साधन के रूप में देखा। हिंदी को लोकप्रिय बनाने के उनके मिशन को दक्षिण भारत में कई लोगों ने आगे बढ़ाया।

जी. दुर्गाबाई (1909-1981) जो आगे चलकर संविधान सभा की सदस्‍य भी बनीं, ने किशोरावस्‍था में काकीनाडा (आंध्र प्रदेश), में लोकप्रिय बालिका हिंदी पाठशाला का संचालन किया। बालिका हिंदी पाठशाला का दौरा करने वालों में सी.आर. दास, कस्‍तूरबा गांधी, मौलाना शौकत अली, जमना लाल बजाज और सी.एफ. एंड्रयूज शामिल थे। वे यह देखकर हैरत में पड़ गये कि कुछ सौ महिलाओं को हिंदी का ज्ञान प्रदान करने वाली पाठशाला का संचालन एक किशोरी द्वारा किया जा रहा है।

लेकिन दुर्गाबाई के संविधान सभा तक पहुंचते-पहुंचते दक्षिण भारत में हिंदी के हालात बदल चुके थे। उन्‍होंने महसूस किया कि मूल हिंदी भाषियों द्वारा हिंदी के पक्ष में जोशोखरोश से किये गये प्रचार ने अन्‍य भाषाओं के लोगों को बेगाना कर दिया। स्‍वयं सेवियों ने जो उपलब्धि हासिल की थी, उत्‍साही गुमराह लोग उसे नष्‍ट कर रहे थे। इसीलिए उन्‍होंने 14 सितंबर, 1949 को अपने भाषण में कहा, ‘इस सदी के आरंभिक वर्षों में हमने जिस उत्‍साह के साथ हिंदी को आगे बढ़ाया था, उसके विरूद्ध इस आंदोलन को देखकर मैं स्‍तब्‍ध हूं।…. श्रीमान, उनकी ओर से बढ़चढ़कर किया जा रहा प्रचार का दुरूपयोग मेरे जैसे हिंदी का समर्थन करने वाले लोगों का समर्थन गंवाने का जिम्‍मेदार है और जिम्‍मेदार होगा। ’

जी. दुर्गाबाई द्वारा अपने भाषण में जिस कशमकश की बात की है वह 70 साल बाद आज भी प्रासांगिक है। भाषा के कानूनी दर्जे को लागू करने वालों की तुलना में गैर हिंदी भाषी अपने स्‍वैच्छिक प्रयासों के बल पर हिंदी के प्रति ज्‍यादा जिम्‍मेदार होंगे। संवर्द्धित साक्षरता तथा हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं के बीच सांस्‍कृतिक संपर्क हिंदी के उद्देश्‍य के लिए ज्‍यादा मददगार होंगे। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के करिश्‍मे ने हिंदी की एक विनीत चलन के रूप में सहायता की है। लक्ष्‍य अधिकतम लोगों तक ऐसी भाषा में पहुंच बनाने का होना चाहिए, जिसे वे समझ सकते हों।

प्रदीप सरदाना
टेलीविजन का आविष्कार यूँ तो जॉन एल बिलियर्ड ने 1920 के दौर में ही कर दिया था।  लेकिन भारत में यह टीवी तब पहुंचा जब 15 सितम्बर 1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने दिल्ली में एक प्रसारण सेवा दूरदर्शन का उद्घाटन किया। हालांकि तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह दूरदर्शन, यह टीवी आगे चलकर जन जन की जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाएगा। आज यह टीवी रोटी कपड़ा और मकान के बाद लोगों की चौथी ऐसी जरुरत बन गया है कि जिसके बिना जिंदगी मुश्किल और सूनी सी लगती है।

अब वही दूरदर्शन अपने जीवन के 58 बरस पूरे कर चुका है. इतने बरसों में दूरदर्शन का,टीवी का अपने देश में इतना विकास हुआ है कि इसे देखना जीवन की एक आदत ही नहीं जरुरत बन गया है। हालांकि शुरूआती बरसों में दूरदर्शन का विकास बहुत धीमा था. शुरूआती बरसों में इस पर आधे घंटे का नाम मात्र प्रसारण होता था। पहले इसे स्कूली शिक्षा के लिए स्कूल टेलीविजन के रूप में शुरू किया गया।  लेकिन इसका 500 वाट का ट्रांसमीटर दिल्ली के मात्र 25 किमी क्षेत्र में ही प्रसारण करने में सक्षम था।  तब सरकार ने दिल्ली के निम्न और माध्यम वर्गीय क्षेत्र के 21 सामुदायिक केन्द्रों पर टीवी सेट रखवाकर इसके प्रसारण की विशेष व्यवस्था करवाई थी। ऐसे में तब दूरदर्शन से कोई बड़ी उम्मीद भला कैसे रखी जा सकती थी। हालाँकि जब 15 अगस्त 1965 को दूरदर्शन पर समाचारों का एक घंटे का नियमित हिंदी बुलेटिन आरम्भ हुआ तब दूरदर्शन में लोगों की कुछ दिलचस्पी बढती दिखाई दी। इसके बाद दूरदर्शन पर 26 जनवरी 1967 को किसानों को खेती बाड़ी आदि की ख़ास जानकारी देने के लिए दूरदर्शन पर ‘कृषि दर्शन’ नाम से एक कार्यक्रम शुरू किया गया। इसी दौरान दूरदर्शन पर नाटकों का प्रसारण भी शुरू किया गया। लेकिन दूरदर्शन की लोकप्रियता में बढ़ोतरी तब हुई जब इसमें शिक्षा और सूचना के बाद मनोरंजन भी जुड़ा।

असल में जब 2 अक्टूबर 1972 को दिल्ली के बाद मुंबई केंद्र शुरू हुआ तो मायानगरी के कारण इसका फिल्मों से जुड़ना स्वाभाविक था। मनोरंजन के नाम पर दूरदर्शन पर 70 के दशक की शुरुआत में ही एक एक करके तीन शुरुआत हुईं। एक हर बुधवार आधे घंटे का फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम चित्रहार शुरू किया गया। दूसरा हर रविवार शाम एक हिंदी फीचर फिल्म का प्रसारण शुरू हुआ। साथ ही एक कार्यक्रम ‘फूल खिले हैं गुलशन गुलशन’ भी शुरू किया गया। इस कार्यक्रम में फिल्म अभिनेत्री तब्बसुम फिल्म कलाकारों के इंटरव्यू लेकर उनकी जिंदगी की फ़िल्मी बातों के साथ व्यक्तिगत बातें भी दर्शकों के सामने लाती थीं। तब देश में फिल्मों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ चुकी थी। लेकिन सभी के लिए सिनेमा घर जाकर सिनेमा देखना संभव नहीं था,ऐसे में जब यह सब दूरदर्शन पर आया तो दर्शकों की मुराद घर बैठे पूरी होने लगी। यूँ यह वह दौर था जब 1970 में देश भर में मात्र 24838 टीवी सेट थे। जिनमें सामुदायिक केन्द्रों में सरकारी टीवी सेट के साथ कुछ अधिक संपन्न व्यक्तियों के घरों में ही टीवी होता था। ऐसे में तब अधिकांश मध्यम वर्ग के लोग भी अपने किसी संपन्न पडोसी या रिश्तेदार के यहाँ जाकर बुधवार का चित्रहार और रविवार की फिल्म देखने का प्रयास करते थे।
सीरियल युग से आई टीवी में क्रांति
समाचार, चित्रहार और फिल्मों के बाद दूरदर्शन में दर्शकों की दिलचस्पी तब बढ़ी जब दूरदर्शन पर सीरियल युग का आरम्भ हुआ। यूँ तो दूरदर्शन पर कभी कभार सीरियल पहले से ही आ रहे थे।  लेकिन सीरियल के इस नए मनोरंजन ने क्रांति का रूप तब लिया जब 7 जुलाई 1984 को ‘हम लोग’ का प्रसारण शुरू हुआ।  निर्मात्री शोभा डॉक्टर, निर्देशक पी कुमार वासुदेव और लेखक मनोहर श्याम जोशी के ‘हम लोग’ ने दर्शको पर अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि हमारे सामाजिक परिवेश, दिनचर्या और आदतों तक में यह बड़ा परिवर्तन साबित हुआ, जिससे हम सब की दुनिया ही बदल गयी। ‘हम लोग’ के कुल 156 एपिसोड प्रसारित हुए लेकिन इसका आलम यह था कि जब इसका प्रसारण होता था तब कोई मेहमान भी किसी के घर आ जाता था था तो घर वाले उसकी परवाह न कर अपने इस सीरियल में ही मस्त रहते थे। लोग शादी समारोह में जाने में देर कर देते थे लेकिन ‘हम लोग’ देखना नहीं छोड़ते थे।   ‘हम लोग’ और दूरदर्शन की लोकप्रियता का प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि सन 1970 में देश में जहाँ टीवी सेट की संख्या 24838 थी ‘हम लोग’ के बाद 1984 में वह संख्या 36,32,328 हो गयी।

‘हम लोग’ का दर्शकों पर जादू देख दूरदर्शन ने 1985 में ही हर रोज शाम का दो घंटे का समय विभिन्न सीरियल के नाम कर दिया। जिसमें आधे आधे घंटे के 4 साप्ताहिक सीरियल आते थे। सभी सीरियल को 13 हफ्ते यानी तीन महीने का समय दिया जाता था। उसके बाद वह जगह किसी नए सीरियल को दे डी जाती थी। सिर्फ किसी उस सीरियल को कभी कभार 13 और हफ़्तों का विस्तार दे दिया जाता था, जो काफी लोकप्रिय होता था या फिर जिसकी कहानियां कुछ लम्बी होती थीं। इस दौरान दूरदर्शन पर बहुत से ऐसे सीरियल आये जिन्होंने दर्शकों पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। लेकिन दूरदर्शन की इस लोकप्रियता को तब और भी पंख लग गए जब दूरदर्शन ने 1987 में ‘रामायण’ महाकाव्य पर सीरियल शुरू किया। फिल्म निर्माता रामानंद सागर द्वारा निर्मित निर्देशित ‘रामायण’ सीरियल ने टीवी की लोकप्रयता को एक दम एक नया शिखर प्रदान कर दिया। जब रविवार सुबह ‘रामायण’ का प्रसारण होता था तो सभी सुबह सवेरे  उठकर, नहा धोकर टीवी के सामने ‘रामायण’ देखने के लिए ऐसे बैठते थे जैसे मानो वे मंदिर में बैठे हों। ‘रामायण’ के उस प्रसारण के समय सभी घरों में टीवी के सामने होते थे तो घरों के बाहर सुनसान और कर्फ्यू जैसे नज़ारे दिखते थे। बाद में ‘रामायण’ की लोकप्रियता से प्रभावित होकर दूरदर्शन ने अगले बरस एक और महाकाव्य ‘महाभारत’ का प्रसारण शुरू कर दिया। फिल्मकार बीआर चोपड़ा द्वारा बनाए गए इस सीरियल ने भी जबरदस्त लोकप्रियता पायी।

दूरदर्शन के पुराने लोकप्रिय सीरियल को याद करें तो हम लोग, रामायण और महाभारत के अतिरिक्त ऐसे बहुत से सीरियल रहे जिन्होंने सफलता,लोकप्रियता का नया इतिहास लिखा। जैसे यह जो है जिंदगी, कथा सागर, बुनियाद, वागले की दुनिया,खानदान, मालगुडी डेज़, करमचंद, एक कहानी,श्रीकांत, नुक्कड़, कक्का जी कहिन, भारत एक खोज, तमस, मिर्ज़ा ग़ालिब,निर्मला, कर्मभूमि, कहाँ गए वो लोग, द सोर्ड ऑफ़ टीपू सुलतान, उड़ान, रजनी, चुनौती, शांति, लाइफ लाइन ,नींव, बहादुर शाह ज़फर, जूनून, स्वाभिमान, गुल गुलशन गुलफाम, नुपूर, झरोखा, जबान संभाल के, देख भाई देख,तलाश और झांसी की रानी आदि।
एक ही चैनल ने बरसों तक बांधे रखा
यह निश्चय ही सुखद और दिलचस्प है कि आज चाहे देश में कुल मिलाकर 800 से अधिक उपग्रह-निजी चैनल्स का प्रसारण हो रहा है। जिसमें मनोरंजन के साथ समाचार चैनल्स भी हैं तो संगीत, सिनेमा, खेल स्वास्थ्य, खान पान, फैशन, धार्मिक, आध्यात्मिक और बच्चों के चैनलस भी हैं तो विभिन्न भाषाओँ और प्रदेशों के भी। लेकिन एक समय था जब अकेले दूरदर्शन ने यह सारा ज़िम्मा उठाया हुआ था। दूरदर्शन का एक ही चैनल समाचारों से लेकर मनोरंजन और शिक्षा तक की सभी कुछ दिखाता था। जिसमें किसानों के लिए भी था बच्चों और छात्रों के लिए भी, नाटक और फ़िल्में भी थीं तो स्वास्थ्य और खान पान की जानकारी के साथ कवि सामेलन भी दिखाये जाते थे और नाटक भी। मौसम का हाल होता था और संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम भी। क्रिकेट, फुटबाल सहित विभिन्न मैच का प्रसारण भी होता था तो स्वंत्रता और गणतंत्र दिवस का सीधा प्रसारण भी। धरती ही नहीं अन्तरिक्ष तक से भी सीधा प्रसारण दिखाया जाता था जब प्रधानमन्त्री के यह पूछने पर कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है, तब भारतीय अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के ‘सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दुस्तान हमारा, कहने पर पूरा देश गर्व से रोमांचित हो गया था। बड़ी बात यह है कि दूरदर्शन के इस अकेले चैनल ने सही मायने में सन 1990 के बाद के कुछ बरसों तक भी अपना एक छत्र राज बनाए रखा। यूँ कहने को दूरदर्शन का एक दूसरा चैनल 17 सितम्बर 1984 को शुरू हो गया था। लेकिन सीमित अवधि और सीमित कार्यक्रमों वाला यह चैनल दर्शकों पर अपना प्रभाव नहीं जमा पाया जिसे देखते हुए इसे कुछ समय बाद बंद कर देना पड़ा। बाद में 2 अक्टूबर 1992 में जहाँ जी टीवी से उपग्रह निजी हिंदी मनोरंजन चैनल की देश में पहली बड़ी शुरुआत हुई वहां 1993 में दूरदर्शन ने मेट्रो चैनल की भी शुरुआत की। तब निजी चैनल्स के साथ मेट्रो चैनल को भी बड़ी सफलता मिली और दर्शकों को नए किस्म के नए रंग के सीरियल आदि काफी पसंद आये। लेकिन उसके बाद देश में सभी किस्म के चैनल्स की बाढ़ सी आती चली गयी। इससे दूरदर्शन को कई किस्म की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। पहली चुनौती तो यही रही कि एक पब्लिक ब्रॉडकास्टर होने के नाते दूरदर्शन के सामजिक जिम्मेदारियां हैं। दूरदर्शन मनोरंजन के नाम पर निजी चैनल्स की तरह दर्शकों को कुछ भी नहीं परोस सकता।

दूरदर्शन की महानिदेशक सुप्रिया साहू भी कहती हैं- यह ठीक है कि दूरदर्शन एक पब्लिक ब्रोडकास्टर है लेकिन मैं समझती हूँ कि यह सब  होते हुए भी दूरदर्शन अपनी भूमिका अच्छे से निर्वाह कर रहा है। दूरदर्शन का आज भी दर्शकों में अपना अलग प्रभाव है, दूरदर्शन अपने दर्शकों को साफ सुथरा और उद्देश्य पूर्ण मनोरंजन तो प्रदान कर ही रहा है लेकिन दर्शकों को जागरूक करने की भूमिका में दूरदर्शन सभी से आगे है। बड़ी बात यह है देश में कुछ निजी चैनल्स मनोरंजन और समाचारों के नाम पर जो सनसनीखेज वातावरण तैयार करते हैं दूरदर्शन हमेशा इससे दूर रहकर स्वस्थ और सही प्रसारण को महत्व देता है। हाँ  दूरदर्शन के सामने जो चुनौतियाँ हैं उनसे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन दूरदर्शन के इस 58 वें स्थापना दिवस पर मैं सभी को यह विश्वास दिलाती हूँ कि आज दूरदर्शन अपनी सभी किस्म की चुनौतियों से निबटने के लिए स्वयं सक्षम है। आज हमारे पास विश्व स्तरीय तकनीक है हम दुनियाभर में जाकर अपने एक से एक कार्यक्रम बनाते हैं और दिखाते हैं.निजी चैनल जिन मुद्दों पर उदासीन रहते हैं वहां हम उस सब पर बहुत कुछ दिखाते हैं, जैसे किसानों पर, स्वच्छता पर, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर। कला पर संस्कृति पर। आज दूरदर्शन के देश में कुल 23 चैनल्स हैं जिनमें 16 सेटेलाइट्स चैनल हैं और 7 नेशनल चैनल्स। जिससे दूरदर्शन आज महानगरों से लेकर छोटे नगरों,कस्बों और गाँवों तक पूरी तरह जुड़ा हुआ है। हमारे कार्यक्रम तकनीक और कंटेंट दोनों में उत्तम हैं। इस सबके बाद भी यदि कहीं कोई कमी मिलती है तो हम उसे दूर करेंगे। समय के साथ अपने कार्यक्रमों की निर्माण गुणवत्ता में जो आधुनिकीकरण करना पड़ेगा, उसे भी हम करेंगे। कुल मिलाकर उद्देश्य यह है कि हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से भी पीछे नहीं हटेंगे और दर्शको का दूरदर्शन में भरोसा भी कायम रखेंगे।”

दूरदर्शन में दर्शकों का भरोसा कायम रहे इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। मेरा तो दूरदर्शन से अपना भी व्यक्तिगत लगाव है। पहला तो इसलिए ही कि मैं भी देश के लाखों करोड़ों लोगों की तरह  बचपन से दूरदर्शन को देखते हुए बड़ा हुआ हूँ। लेकिन इसके साथ दूरदर्शन से मेरा विशेष और अलग लगाव इसलिए भी है कि मैंने ही देश में सबसे पहले दूरदर्शन पर नियमित पत्रकारिता शुरू की। सन 1980 के दशक के शुरुआत में ही मुझे इस बात का अहसास हो गया था कि दूरदर्शन जल्द ही घर का एक सदस्य बन जाएगा। जब दूरदर्शन पर ‘हम लोग’ से भी पहले ‘दादी माँ जागी’ नाम से देश का पहला नेटवर्क सीरियल शुरू हुआ तो मैंने उसकी चर्चा देश के विभिन्न हिस्सों में दूर दराज तक होते देखी। मुझे लगा कि एक सीरियल एक ही समय में पूरे देश में यदि देखा जाएगा तो यह टीवी मीडिया क्रांति ला देगा। तब हम कोई फिल्म देखते थे तो वह अलग अलग समय में अलग अलग दिनों में देखते थे मगर रात 8 या 9 बजे राष्ट्रीय प्रसारण वाला सीरियल एक साथ एक ही समय में पूरा देश देख लेता था। उसके बाद उसमें दिखाए दृश्य अगले दिन सभी की चर्चा का विषय बने होते थे। यह ठीक है कि अब अलग अलग सैंकड़ों चैनल्स आने से स्थितियों में बदलाव हुआ है लेकिन दूरदर्शन ने देश को एक साथ जोड़ने, लोगों को जागरूक करने, शिक्षित करने और उन्हें मनोरंजन प्रदान करने का जो कार्य किया है उसका आज भी कोई सानी नहीं है।



फ़िरदौस ख़ान
देश की आज़ादी को सात दशक होने वाले हैं. इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है. यह बात अलग है कि हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है. हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते.

ग़ौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है. यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है. इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है. भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं.

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है. हिन्दी हमारी राजभाषा है. राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क है. जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय भाषा कहते हैं. मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है. इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है.

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है. भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है. यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है. संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है. संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे. विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए.

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है. मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है. इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है. उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है.

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था. देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं. दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है. दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते. 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे. उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए.

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था. तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसीलिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी. साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा. संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं. संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है. यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा अधिनियम 1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है.

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है. अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है. लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है. हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं. इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं. अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है, तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा. आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है. अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है. इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं. आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं. अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है. अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है.

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है. इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है. मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है. छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं. हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं. आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है.

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है. साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर माना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है. इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए.

फ़िरदौस ख़ान
प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा की गिनती हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है. होली के दिन 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश क्र फ़र्रूख़ाबाद में जन्मी महादेवी वर्मा को आधुनिक काल की मीराबाई कहा जाता है. वह कवयित्री होने के साथ एक विशिष्ट गद्यकार भी थीं. उनके काव्य संग्रहों में नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्य गीत, दीपशिखा, यामा और सप्तपर्णा शामिल हैं. गद्य में अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी और मेरा परिवार उल्लेखनीय है. उनके विविध संकलनों में स्मारिका, स्मृति चित्र, संभाषण, संचयन, दृष्टिबोध और निबंध में श्रृंखला की कड़ियां, विवेचनात्मक गद्य, साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध शामिल हैं. उनके पुनर्मुद्रित संकलन में यामा, दीपगीत, नीलाम्बरा और आत्मिका शामिल हैं. गिल्लू उनका कहानी संग्रह है. उन्होंने बाल कविताएं भी लिखीं. उनकी बाल कविताओं के दो संकलन भी प्रकाशित हुए, जिनमें ठाकुर जी भोले हैं और आज ख़रीदेंगे हम ज्वाला शामिल हैं.

ग़ौरतलब है कि महादेवी वर्मा ने सात साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. उनके काव्य का मूल स्वर दुख और पीड़ा है, क्योंकि उन्हें सुख के मुक़ाबले दुख ज़्यादा प्रिय रहा. ख़ास बात यह है कि उनकी रचनाओं में विषाद का वह भाव नहीं है, जो व्यक्ति को कुंठित कर देता है, बल्कि संयम और त्याग की प्रबल भावना है.
मैं नीर भरी दुख की बदली
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा कभी न अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी थी कल मिट आज चली
उन्होंने ख़ुद लिखा है, मां से पूजा और आरती के समय सुने सुर, तुलसी तथा मीरा आदि के गीत मुझे गीत रचना की प्रेरणा देते थे. मां से सुनी एक करुण कथा को मैंने प्राय: सौ छंदों में लिपिबद्ध किया था. पड़ोस की एक विधवा वधु के जीवन से प्रभावित होकर मैंने विधवा, अबला शीर्षकों से शब्द चित्र लिखे थे, जो उस समय की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे. व्यक्तिगत दुख समष्टिगत गंभीर वेदना का रूप ग्रहण करने लगा. करुणा बाहुल होने के कारण बौद्ध साहित्य भी मुझे प्रिय रहा है.

उन्होंने 1955 में इलाहाबाद में साहित्यकार संसद की स्थापना की. उन्होंने पंडित इला चंद्र जोशी की मदद से संस्था के मुखपत्र साहित्यकार के संपादक का पद संभाला. देश की आज़ादी क बाद 1952 में वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य चुनी गईं. 1956 में भारत सरकार ने उनकी साहित्यिक सेवा के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया. 1969 में विक्रम विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि दी. इससे पहले उन्हें नीरजा के 1934 में सक्सेरिया पुरस्कार और 1942 में स्मृति की रेखाओं के लिए द्विवेदी पदक प्रदान किया गया. 1943 में उन्हें मंगला प्रसाद पुरस्कार और उत्तर प्रदेश के भारत भारती पुरस्कार से भी नवाज़ा गया. यामा नामक काव्य संकलन के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप भी प्रदान की गई.

उन्होंने एक आम विवाहिता का जीवन नहीं जिया. 1916 में उनका विवाह बरेली के पास नवाबगंज क़स्बे के निवासी वरुण नारायण वर्मा से हुआ. महादेवी वर्मा को विवाहित जीवन से विरक्ति थी, इसलिए पति से उनका कोई वैमनस्य नहीं था. वह एक संन्यासिनी का जीवन गुज़ारती थीं. उन्होंने पूरी ज़िंदगी सफ़ेद कपड़े पहने. वह तख़्त सोईं. कभी श्रृंगार नहीं किया. 1966 में पति की मौत के बाद वह स्थाई रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं. 11 सितंबर, 1987 को प्रयाग में उनका निधन हुआ. बीसवीं सदी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार रहीं महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य में धुव्र तारे की तरह प्रकाशमान हैं.


सूर्यकांत द्विवेदी
ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम'
 हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए।
आज से पितर हमारे घर में वास करेंगे।  श्राद्ध यानी पितृ पक्ष का पहला श्राद्ध बुधवार को पूर्णिमा के साथ प्रारम्भ हो रहे हैं। इस बार भी सोलह के स्थान पर पन्द्रह दिन के ही श्राद्ध हैं। पिछले साल भी पन्द्रह ही श्राद्ध हुए थे। सोलह श्राद्ध 2020 में पड़ेंगे। पन्द्रह दिन के लिए हमारे पितृ घर में होंगे और तर्पण के माध्यम से तृप्त होंगे। यह अवसर अपने कुल, अपनी परंपरा, पूर्वजों के श्रेष्ठ कार्यों का स्मरण करने और उनके पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लेने का है।
श्राद्ध क्या है
व्यक्ति का अपने पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन यही श्राद्ध कहलाता है। देव, ऋषि और पितृ ऋण के निवारण के लिए श्राद्ध कर्म है। अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके मार्ग पर चलने और सुख-शांति की कामना ही वस्तुत: श्राद्ध कर्म है।

कब होता है पितृ पक्ष
भाद्र पक्ष की पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर श्राद्ध पक्ष आश्विन मास की अमावस्या तक होता है। पूर्णिमा का श्राद्ध उनका होता है, जिनकी मृत्यु वर्ष की किसी पूर्णिमा को हुई हो। वैसे, ज्ञात, अज्ञात सभी का श्राद्ध आश्विन अमावस्या को किया जाता है।
यूं होते हैं सोलह दिन के श्राद्ध
पंडित केदार मुरारी और श्री हरि ज्योतिष संस्थान के ज्योतिर्विद पंडित सुरेंद्र शर्मा कहते हैं कि सूर्य अपनी प्रथम राशि से भ्रमण कर कन्या राशि में एक माह के लिए भ्रमण करते हैं। तभी यह सोलह दिन का पितृपक्ष मनाया जाता है। इन सोलह दिनों के लिए पितृ आत्मा को सूर्य देव पृथ्वी पर अपने परिजनों के पास भेजते हैं। पितृ अपनी तिथि को अपने वंशजों के घर जाते हैं। पक्ष पन्द्रह दिन का ही होता है लेकिन जिनका निधन पूर्णिमा को हुआ है, उनका भी तर्पण होना चाहिए। इसलिए पूर्णिमा को भी इसमें शामिल कर लिया जाता है और श्राद्ध 16 दिन के होते हैं।


मृत्यु के एक साल तक होता है प्रतीक्षा काल
मृत्यु से एक साल की अवधि प्रतीक्षा काल होती है। जब किसी का देहावसान होता है तो हमको पता नहीं होता कि वह किस योनि में गया है या उनको मोक्ष मिला या नहीं। शास्त्रों के मुताबिक कभी-कभी प्रतीक्षा काल लंबा भी हो जाता है। आमतौर पर मृत्यु के एक साल की अवधि ( बरसी) तक हम मोक्ष की कामना करते हुए श्राद्ध कर्म करते हैं। इस एक साल के बाद हमारे पितृ देवताओं की श्रेणी में आ जाते हैं। श्राद्ध पक्ष वस्तुत: अपने पितरों को जल, तिल और कुश के माध्यम से आहार प्रदान करना है।
जल और तिल ही क्यों
श्राद्ध पक्ष में जल और तिल ( देवान्न) द्वारा तर्पण किया जाता है। जो जन्म से लय( मोक्ष) तक साथ दे, वही जल है।  तिलों को देवान्न कहा गया है। एसा माना जाता है कि इससे ही पितरों को तृप्ति होती है।
तीन पीढ़ियों तक का ही श्राद्ध
श्राद्ध केवल तीन पीढ़ियों तक का ही होता है। धर्मशास्त्रों के मुताबिक सूर्य के कन्या राशि में आने पर परलोक से पितृ अपने स्वजनों के पास आ जाते हैं। देवतुल्य स्थिति में तीन पीढ़ी के पूर्वज गिने जाते हैं। पिता को वसु के समान, रुद्र दादा के समान और परदादा आदित्य के समान माने गए हैं। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि मनुष्य की स्मरण शक्ति केवल तीन पीढ़ियों तक ही सीमित रहती है।
कौन कर सकता है तर्पण
पुत्र, पौत्र, भतीजा, भांजा कोई भी श्राद्ध कर सकता है। जिनके घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं है लेकिन पुत्री के कुल में हैं तो धेवता और दामाद भी श्राद्ध कर सकते हैं। यह भी कहा गया है कि किसी पंडित द्वारा भी श्राद्ध कराया जा सकता है।
महिलाएं भी कर सकती हैं श्राद्ध
महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती हैं बशर्ते घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं हो। लेकिन नवीन मान्यताओं के अनुसार अपने पितृ और मातृ तुल्य लोगों का श्राद्ध महिलाएं कर सकती हैं। यदि घर में कोई बेटा नहीं है तो पुत्रवत किसी के भी द्वारा महिलाएं श्राद्ध करा सकती हैं।
कौआ, कुत्ता और गाय
इनको यम का प्रतीक माना गया है। गाय को वैतरिणी पार करने वाली कहा गया है। कौआ भविष्यवक्ता और कुत्ते को अनिष्ट का संकेतक कहा गया है।इसलिए, श्राद्ध में इनको भी भोजन दिया जाता है। पंडित आशुतोष त्रिवेदी कहते हैं कि चूंकि हमको पता नहीं होता कि मृत्यु के बाद हमारे पितृ किस योनि में गए, इसलिए प्रतीकात्मक रूप से गाय, कुत्ते और कौआ को भोजन कराया जाता है।

कैसे करें श्राद्ध
पहले यम के प्रतीक कौआ, कुत्ते और गाय का अंश निकालें ( इसमें भोजन की समस्त सामग्री में से कुछ अंश डालें)
- फिर किसी पात्र में दूध, जल, तिल और पुष्प लें। कुश और काले तिलों के साथ तीन बार तर्पण करें। ऊं पितृदेवताभ्यो नम: पढ़ते रहें।
-वस्त्रादि जो भी आप चाहें पितरों के निमित निकाल कर दान कर सकते हैं।

यदि ये सब न कर सकें तो
-दूरदराज में रहने वाले, सामग्री उपलब्ध नहीं होने, तर्पण की व्यवस्था नहीं हो पाने पर एक सरल उपाय के माध्यम से पितरों को तृप्त किया जा सकता है। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके खड़े हो जाइए। अपने दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की ओर करिए। 11 बार पढ़ें..ऊं पितृदेवताभ्यो नम:। लेकिन इनको पितृ अमावस्या के दिन अवश्य तर्पण करना चाहिए।
पितृ अमावस्या
जिनकी मृत्यु तिथि याद नहीं रहती या किन्ही कारण से हम श्राद्ध नहीं कर पाते, एसे ज्ञात-अज्ञात सभी लोगों का श्राद्ध पितृ अमावस्या को किया जा सकता है। इस दिन श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए। इसके बाद ही पितृ हमसे विदा लेते हैं।
क्यों नहीं होते शुभ कर्म
यह सोलह या 15 दिन शोक के होते हैं। अपने पितरों को याद करने के होते हैं। इसलिए,इन दिनों मांगलिक कार्य, गृह प्रवेश, देव स्थापना के कार्य वर्जित हैं।
-ज्योतिर्विद पंडित सुरेद्र शर्मा
सीता जी ने भी किया था श्राद्ध
ज्योतिषाचार्य वीके सक्सेना के अनुसार महिलाओं का श्राद्ध करना निषेध नहीं है। भगवान राम गया जी में अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने गए। श्राद्ध करने में देरी हो गई। तभी राजा दशरथ ने दोनों हाथ फैलाकर कहा कि मेरा तर्पण कब होगा। सीता जी उस वक्त वहां थी। सीता जी ने कहा कि वह आपका श्राद्ध महिला होने के नाते कैसे कर सकती हैं? राजा दशरथ ने कहा कि महिलाएं श्राद्ध कर सकती हैं। मिट्टी उठाओ और मेरा पिंडदान करो। इससे साबित होता है कि महिलाएं श्राद्ध कर सकती हैं। सक्सेना ने कहा कि श्राद्ध अपने संसाधनों से करना चाहिए। इसको बोझ नहीं बनाना चाहिए। न ही उधार लेकर श्राद्ध करना चाहिए।
श्राद्ध: टूट रही हैं वर्जनाएं
मुरादाबाद। पितृ पक्ष को लेकर अब वर्जनाएं भी टूट रही हैं। पहले यह माना जाता था कि यह कर्मकांड केवल पुरुषों तक ही सीमित है। पुरुष ही इस कार्य को कर सकते हैं।महिलाओंं को श्राद्ध कर्म करने की छूट नहीं थी। ठीक इसी प्रकार जैसे दाह संस्कार करना महिलाओं के लिए वर्जित था।
हाल फिलहाल में महिलाएं या बेटियां आगे बढ़कर अपने पिता और पति का दाह संस्कार करती हैं। यही नहीं, श्राद्ध कर्मकांड भी करने लगी हैंं। यह महिला सशक्तिकरण का ही एक प्रतीक है। अब पंडितोंं ने भी इनके लिए भी रास्ते खोल दिए हैं।
नर से नारायण सेवा
श्राद्ध में पंडितों को भोजन कराने की परंपरा है। इसमें भी सदियों से चली आ रही परिपाटी टूट रही है। लोग पंडितोंं के स्थान पर गरीब और असहाय लोगों को भोजन कराते हैं। अनाथालय जाते हैं और वहां पितरों के नाम पर किताबें, वस्त्रादि देते हैं। श्राद्ध में पितरों को उऩकी प्रिय चीजें दान देने की परपंरा है। अब ये प्रिय चीजेंं समाज के उपेक्षित वर्ग को दी जाने लगी हैं ताकि इनका सदुपयोग हो सके।

(लेखक मुरादाबाद में दैनिक हिन्दुस्तान के स्थानीय संपादक हैं)


फ़िरदौस ख़ान
नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से देश में हर साल करोड़ों रुपये की फ़सलें तबाह हो जाती हैं. इससे किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, किसान क़र्ज़ लेकर फ़सलें उगाते हैं, फ़सलों को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशक कीटों पर प्रभावी नहीं होते, जिससे कीट और पौधों को लगने वाली बीमारियां फ़सल को नुक़सान पहुंचाती हैं. इसकी वजह से उत्पादन कम होता है या कई बार पूरी फ़सल ही ख़राब हो जाती है. ऐसे में किसानों के सामने अंधेरा छा जाता है. कई मामले तो ऐसे भी सामने आ चुके हैं कि जब किसानों ने फ़सल बर्बाद होने पर आत्महत्या तक कर ली. खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान किसानों की मौतें होने की ख़बरें भी आए-दिन सुनने को मिलती रहती हैं.

मगर अफ़सोस की बात यह है कि नक़ली कीटनाशक और उर्वरक माफ़िया के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, जिसकी वजह से नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़, इस कारोबार में हर साल तक़रीबन 20 फ़ीसद की बढ़ोतरी हो रही है. देश में कीटनाशकों के इस्तेमाल पर नज़र रखने वाली नई दिल्ली की एग्रोकेमिकल्स पॉलिसी ग्रुप (एपीजी) के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2009 में 1400 करोड़ रुपये के कीटनाशकों की बिक्री हुई, जिसकी वजह से सात हज़ार करोड़ रुपये की फ़सलें तबाह हो गईं. इससे किसानों की हालत बद से बदतर हो गई. नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रिकल्चरल साइंसेज के मुताबिक़, देश में हर साल औसतन तीन हज़ार करोड़ रुपये के नक़ली कीटनाशक बेचे जाते हैं, जबकि कीटनाशकों का कुल बाज़ार क़रीब सात हज़ार करोड़ रुपये का है. यहां हर साल तक़रीबन 80 हज़ार टन कीटनाशक बनाए जाते हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रिकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की मानें तो देश में इस्तेमाल होने वाले कुल कीटनाशकों में तक़रीबन 40 फ़ीसद हिस्सा नक़ली है. क़ाबिले-ग़ौर है कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र आदि राज्यों में नक़ली कीटनाशक बनाने का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है. ये कारोबारी नामी गिरामी कंपनियों के लेबल का इस्तेमाल करते हैं. अधिकारियों की मिलीभगत के कारण इन कारोबारियों के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती है. कभी-कभार निरीक्षण के नाम पर कार्रवाई होती भी है तो इसे छोटे कारोबारियों तक ही सीमित रखा जाता है. अनियमितता पाए जाने पर कीटनाशक और उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वे फिर से लाइसेंस बनवा लेते हैं या बिना लाइसेंस के अपना कारोबार करते हैं. इस तरह यह धंधा बदस्तूर जारी रहता है.

दरअसल, उर्वरक ऐसे यौगिक हैं, जो पौधों के विकास में सहायक होते हैं. उर्वरक दो प्रकार के होते हैं, जैविक और अजैविक. जैव उर्वरक कार्बन पर आधारित होते हैं, जिनमें पत्तियों और गोबर के यौगिक शामिल होते हैं. अजैविक उर्वरक में अमूमन अजैविक रसायन होते हैं. उर्वरकों में मौजूद कुछ सामान्य पोषक नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम हैं. इनमें कैल्शियम, सल्फर और मैगनेशियम जैसे तत्व भी होते हैं. कुछ खास उर्वरकों में बोरोन, क्लोरीन, मैंगनीज, लौह, जिम, तांबा और मोलिबडीनम आदि शामिल होते हैं. उर्वरक पौध की वृद्धि में मदद करते हैं, जबकि कीटनाशक कीटों से पौध की रक्षा करते हैं. कीटनाशकों में रासायनिक पदार्थ या वायरस, बैक्टीरिया आदि होते हैं. इसमें फासफैमीडोन, लिंडेन, फ्लोरोपाइरीफोस, हेप्टालक्लोथर और मैलेथियान जैसे रासायनिक पदार्थ होते हैं. बहुत से कीटनाशक इंसानों के लिए खतरनाक होते हैं. सरकार ने कुछ कीटनाशकों पर पाबंदी लगाई है, इसके बावजूद देश में इनकी बिक्री बेरोकटोक चल रही है.

कीटनाशक विके्रता राजेश कुमार कहते हैं कि किसानों को असली और नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों की पहचान नहीं होती. इसलिए वे विक्रेता पर भरोसा करके कीटनाशक ख़रीद लेते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी विक्रेता नक़ली कीटनाशक बेचते हैं, जिन विक्रेताओं को बाज़ार में अपनी पहचान क़ायम रखनी है, वे सीधे कंपनी से माल ख़रीदते हैं. ऐसे कीटनाशक विक्रेताओं की भी कमी नहीं है, जो किसी बिचौलिये से माल ख़रीदते हैं. दरअसल, बिचौलिये ज़्यादा मुना़फ़ा कमाने के फेर में विक्रेताओं को असली की जगह नक़ली कीटनाशक बेचते हैं. नक़ली कीटनाशकों की पैकिंग बिल्कुल ब़डी कीटनाशक कंपनियों की तरह होती है. लेकिन इनकी क़ीमत में फ़र्क़ होता है, जैसे जो असली कीटनाशक तीन सौ रुपये में मिलता है, वही नक़ली कीटनाशक बाज़ार में 150 से 200 रुपये तक में मिल जाता है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए. इससे मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं. किसान ज़्यादा उपज पाने के लालच में अंधाधुंध कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह से जहां भूमि की उपजाऊ शक्ति ख़त्म हो रही है, वहीं खाद्यान्न भी ज़हरीला हो रहा है. हालत यह है कि फल, सब्ज़ियों से लेकर अनाज तक में रसायनों की मात्रा पाई जा रही है, जो सेहत के लिए बेहद ऩुकसानदेह है. नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों तथा उर्वरकों की वजह से कई बार किसानों की मेहनत से उगाई गई फ़सल भी बर्बाद हो जाती है. विश्वविद्यालय द्वारा समय-समय पर शिविर लगाकर किसानों को कीटनाशकों और उर्वरकों के सही इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है.

किसानों का कहना है कि वे जितने रुपये के कीटनाशक फ़सलों में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें उसका तक़रीबन पांच गुना फ़ायदा मिलता है, लेकिन नक़ली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से उनकी फ़सल बर्बाद हो जाती है. हिसार के किसान राजेंद्र कुमार का कहना है कि बढ़ती आबादी और घटती ज़मीन ने भी किसानों को रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल के लिए मजबूर किया है. पीढ़ी दर पीढ़ी ज़मीन का बंटवारा होने की वजह से किसानों के हिस्से में कम ज़मीन आ रही है. किसान को अपने परिवार का भरण-पोषण करना है, ऐसे में अगर वह ज़्यादा उत्पादन चाहता है, तो इसमें ग़लत क्या है. साथ ही वह यह भी कहते हैं कि बंजर भूमि की समस्या को देखते हुए किसानों को वैकल्पिक तरीक़ा अपनाना चाहिए, जिससे लागत कम आए और उत्पादन भी अच्छा हो. कैथल ज़िले के चंदाना गांव के किसान कुशलपाल सिरोही का मानना है कि जैविक खेती को अपनाकर किसान अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं. केंद्रीय उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण तथा प्रशिक्षण संस्थान (सीएफक्यूसीटीआई) मुख्य संस्थान है, जो उर्वरक की गुणवत्ता का परीक्षण करता है. हरियाणा के फ़रीदाबाद ज़िले में स्थित इस संस्थान की तीन क्षेत्रीय उर्वरक नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं, जो मुंबई, चेन्नई और कल्याणी में हैं. वैसे इस वक़्त देश में तक़रीबन 67 उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाएं हैं. हर साल तक़रीबन 1,25,205 नमूनों की जांच की जाती है. अमूमन राज्यों में एक या इससे ज़्यादा प्रयोगशालाएं होती हैं. पुडुचेरी को छोड़कर अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, दिल्ली, गोवा और सभी संघ शासित राज्यों में एक भी प्रयोगशाला नहीं है. ये राज्य केंद्रीय सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं.

बहरहाल, नक़ली कीटनाशकों और उर्वरकों के मामले में बड़ी कंपनियों को भी आगे आना चाहिए, ताकि उनके नाम पर चल रहे गोरखधंधे पर रोक लगाई जा सके. किसानों को भी जागरूक होने की ज़रूरत है, ताकि वे असली और नक़ली में पहचान कर सकें. इसके अलावा किसानों को वैकल्पिक खेती अपनाने पर भी ज़ोर देना चाहिए, ताकि भूमि की उर्वरता बनाए रखने के साथ ही वे अच्छा उत्पादन हासिल कर पाएं.

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