फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की... गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूजरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद वह भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...

हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.

गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.

सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.

एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.

1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.

दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.

किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-

सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

कल्पना पालकीवाला
24 मार्च को विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में मनाया जाता है. सन् 1882 में इसी दिन, डॉ. रॉबर्ट कोच ने क्षय रोग की उत्पत्ति के कारण, क्षयरोग के दण्डाणु, माइकोबैक्टीरियम, की खोज की घोषणा की थी. क्षय रोग और फेफडे के रोगों के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूएटीएलडी) ने 1982 में 24 मार्च को आधिकारिक तौर पर विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में प्रस्तावित किया. इस दिवस का मक़सद क्षय रोग के प्रति ध्यान केंद्रित करना और इस बारे में जन जागरुकता फैलाना है हालांकि, क्षय रोग आज भी एक वैश्विक महामारी है जो कि खासतौर पर विकासशील देशों में, प्रति वर्ष कई मिलियन लोगों की मृत्यु का कारण है. विश्व क्षय रोग दिवस के प्रभाव में वृद्धि लाने के लिए,1996 में, विश्व स्वास्थय संगठन आईयूएटीएलडी और अन्य संबंधित संगठनों के साथ जुड़ा.

क्षय रोग दुनिया भर में रुग्णता और मृत्यु दर की एक प्रमुख वजह है क्योंकि क्षय रोग से प्रत्येक वर्ष 1.7 मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती है जिसका तात्पर्य है प्रत्येक बीस सेकण्ड में एक मौत. घटनाओं, कारणों और मृत्यु दर के हिसाब से भारत में क्षय रोग विश्व की विशालतम महामारी है और यह रोग 15 से 45 वर्ष के बीच के भारतीयों का सबसे बड़ा हत्यारा है. भारत में यह एक दिन में हज़ार से भी अधिक मौतों का कारण है. विश्व में क्षय रोग की घटनाओं का 1/5 भाग (किसी एक देश में सर्वाधिक) भारत में है. क्षय रोग के कीटाणु, संक्रमित लोगों के खांसने, छींकने, बातें करने और थूकने से हवा में घुलकर रोग को बढ़ाते हैं. किसी भी व्यक्ति की सांसों में घुलकर यह दण्डाणु उसे प्रभावित कर सकते हैं. सक्रिय क्षय रोग से संक्रमित प्रत्येक व्यक्ति, यदि उसका इलाज न हो, हर वर्ष औसतन 10 से 15 लोगों को संक्रमित कर सकता है. परन्तु यह आवश्यक नहीं कि क्षय रोग के दण्डाणु से संक्रमित प्रत्येक व्यक्ति इस रोग से ग्रसित हो जाए.

इस घातक बीमारी से बचने के लिए, विश्व स्वास्थय संगठन द्वारा प्रत्यक्ष निगरानी उपचार कोर्स, जिसे डॉट्स के नाम से जाना जाता है, की सिफारिश की गई है, यह बैक्टीरियोसाइडल और बैक्टीरियोस्टेटिक दवाओं की मिश्रित चिकित्सा पद्धति है जिसमें आइसोनियाज़िड, रिफैम्पिन, इथामब्युटोल और पाइरैज़िनामाइड शामिल है.

1950 के शुरुआती दौर में विकसित जीवाणु प्रतिजैविक आइसोनियाज़िड एक प्रोड्रग है जिसे सक्रिय होने के लिए एमटीबी कैटेलाइज पैरोक्सिडेज़ कैटजी की ज़रुरत होती है और यह एमटीबीआईएनएचए (इनॉयल एकाइल कैरियर प्रोटीन रिडक्टेज़) को बांधकर फैटी एसिड के संश्लेषण को प्रभावित करता है. एक अन्य जीवाण्विक रिफैम्पिन, जीवाणुओं की कोशिकाओं में डीएनए पर आश्रित आरएनए पॉलिमिरेज़ की बीटा उपइकाई के बदलाव को रोककर आनुवांशिक जानकारी के स्थानांतरण को लगातार प्रभावित करता है. इथामब्युटोल एक बैक्टीरियोस्टेटिक है जो कि एराबाइनोसिल ट्रांसफिरेस एंजाइम का अवरोधक बनकर एराबाइनोगैलेक्टमक कोशिका दीवार को प्रभावित करता है और प्रोड्रग पाइरैज़िनामाइड अधिक अम्लीय मैटाबोलाइट पाइज़ायनोइक अम्ल के ज़रिए एमटीबी फैटी एसिड सिंथेज़ में बदलाव लाता है. 6 से 9 महीने की लंबी उपचार अवधि डॉट्स की प्रमुख बाधाओं में से एक है जिसके परिणामस्वरूप रोगी इसका पालन नहीं करते जिससे यह रोग और अधिक घातक रूपों, जैसे बहु औषध प्रतिरोधी टीबी (एमडीआर टीबी) और बड़े पैमाने पर दवा प्रतिरोधी टीबी (एक्सडीआर-टीबी) के रूप में सामने आता है. द्वितीय पंक्ति की क्षय रोग प्रतिरोधी दवाओं के साथ बहु औषध प्रतिरोधी टीबी के उपचार में दो वर्ष तक का समय लग जाता है जिससे कभी-कभी दवाओं का प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ जाता है.

यह सभी प्रक्रिया नई दवाओं की खोज की ज़रुरत की ओर ध्यान दिलाती है. क्षय रोग की नई दवाओं की खोज के लिए सीएसआईआर ने मुक्त स्रोत दवा खोज (ओएसडीडी) परियोजना की पहल की थी, जिसे 15 सितंबर, 2008 में शुरु किया गया.
मुक्त स्रोत दवा खोज (ओएसडीडी 
ओएसडीडी ने वेब आधारित एक मंच की स्थापना की है, जिसके ज़रिए दुनिया भर के श्रेष्ठ दिमागों को एक साथ काम करने का मौका मिलता है. पिछले दो वर्षों में ओएसडीडी अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त उन्नत मॉडल के रूप में गतिशील रहा है. आज ओएसडीडी के पास 130 से भी अधिक देशों के 4500 से भी अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं. दवा की खोज के लिए अप्रयुक्त मानव क्षमता को बाहर लाने में ओएसडीडी ने इंटरनेट की विस्तृत शक्ति का लाभ उठाया है. ओएसडीडी का अंकुरन भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले युवा आकांक्षी वैज्ञानिकों और ऐसे राष्ट्र जहां वैज्ञानिक अवसरों की कमी है, वहां उच्च शिक्षा प्रदान करने के एक नए मॉडल के रूप में सामने आया है.

दवा की खोज में ओएसडीडी विज्ञान 2.0 को लाया. इसके वैज्ञानिक पोर्टल में आरडीएफ डाटा संचयन के संचालन के साथ वैज्ञानिक अर्थों को खोजने की क्षमता है. ओएसडीडी वैज्ञानिक अर्थों से परिपूर्ण एक ऐसी वेब संरचना का निर्माण करने में सफल रहा है जिससे मूल दवाओं की खोज में वैज्ञानिक परियोजनाओं के कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों के साथ सामाजिक नेटवर्किंग को एकीकृत बनाने के लिए सक्षम किया गया है. इस प्रकार से यह पोर्टल विविध प्रकार के कौशल और बुनियादी ढांचे की ज़रूरत वाली परियोजनाओं को सुविधाएं प्रदान करने के लिए पूरक विशेषज्ञता मे संबंध स्थापित करता है.

ऐसे छात्र और युवा शोधकर्ता जो किसी प्रकार के धन लाभ की बजाय चुनौतियों को हल करने की संतुष्टि के लिए स्वेच्छा से समस्याओं का हल ढूंढने के लिए तैयार हों उन्हें शामिल कर समूह-स्रोत मॉडल के इस्तेमाल के ज़रिए ओएसडीडी ने गहन डाटा वैज्ञानिक खोज को संभव बनाया. ओएसडीडी के समूह-स्रोत दृष्टिकोण ने एमटीबी पर सफलतापूर्वक सर्वाधिक व्यापक टिप्पणी की जो संभावित दवा लक्ष्यों की पहचान के लिए एक शुरूआती पहल बना. प्रकाशित आकलनों के मुताबिक इस उन्नत दृष्टिकोण ने लगभग 300 मानव वर्षों को चार महीनों में समेट दिया.

ओएसडीडी के निजी साझेदार गठजोड़ की परियोजनाओं, जैसे दो अणुओं के अनुकूलन में प्रसिद्ध अनुबंध अनुसंधान संगठनों (सीआरओएस) के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं.
ओएसडीडी ने इनसिलिको अथवा कंप्यूटर आधारित नज़रिए को वास्तविक प्रयोगशाला प्रयोगों के साथ एकीकृत किया है जिसमें शोधकर्ता मुक्त स्रोत मोड में कार्य करने के लिए खुले पोर्टल पर अपने डाटा को साझा करते हैं और एक मुक्त, सहयोगात्मक समुदाय से प्रतिक्रिया प्राप्त करते हैं.

जैविक अनुसंधान में अक्सर भौतिक जैविक सामग्री के उपयोग की आवश्यकता होती है. इस तरह की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ओएसडीडी ने एक कोष की स्थापना की है. यह क्लोनों आदि का एक जैविक भंडार है और छोटे अणुओं का एक रासायनिक भंडार.

ओएसडीडीः संबंध और बौद्धिक संपदा 
ओएसडीडी समुदाय कुछ नियमों के तहत निर्मित है जो कि एक अनुज्ञप्ति के ज़रिए गठजोड के बुनियादी सिद्धांतों को सामने रखता है. यह अनुज्ञप्ति ऑनलाइन वैज्ञानिक डाटा के आरोपण और साझेदारी को इस शर्त के साथ सौंपता है कि उसे समुदाय में सुधार लाने की प्रतिबद्धता के साथ वापस लौटाया जाए. बौद्धिक संपदा के प्रति इसका नज़रिया अत्यधिक अनूठा और अभिनव है. यह पेटेंट में विश्वास रखता है लेकिन पेटेंट का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए करता हैः

i. सामर्थ्य, यह सुनिश्चित करने के लिए कि दवाओं को किसी भी तरह से सीमित तौर पर अनुज्ञप्तित न किया जाए.

ii. दवा विनिर्माण में निचले स्तर पर गुणवत्ता नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए केवल उन्ही संस्थाओं को लाइसेंस दिया जाए जो गुणवत्ता की प्रक्रियाओं पर अमल करते हैं.

iii. मुक्त स्रोत में विकसित किसी मौजूदा पेटेंट में यदि बाद में कुछ नवीन परिवर्तन हो तो उसे भी विषाणु खंड के तहत मुक्त स्रोत में लाया जाए.

ओएसडीडी की नीति यह सुनिश्चित करने की है कि विकासशील देशों में अणु, गैर-विशिष्ट आधार पर मरीज़ों को उपलब्ध हो. यह दवाएं सामान्य दवा उद्योग द्वारा निर्मित होंगी. इस प्रकार से ओएसडीडी, रोगों के लिए बिना किसी बाज़ार के सतत नवाचार का एक मॉडल प्रस्तुत करता है.

उपेक्षित रोगों के लिए दवाओं की खोज के लिए ओएसडीडी का नवाचार मॉडल जोखिमों को कम करता है. प्रारंभिक चरणों में यह दवा की खोज के लिए जोखिम को कम करता है जो कि इसके मुक्त गठजोड़ मॉडल के ज़रिए एक उच्च जोखिम प्रयास है. अंतिम चरणों में विकास का ओएसडीडी दृष्टिकोण सीआरओ की विशेषज्ञता और इस तरह के कौशल से परिपूर्ण प्रयोगशालाओं, जिन्होंने इस प्रकार के कार्यों में अपनी क्षमता दर्शायी है, उन्हें उपयोग करने का है. क्रियाकलापों में जोखिम कम करने के लिए नैदानिक परीक्षणों के लिए यह खुले तौर पर सार्वजनिक रूप से धन के योगदान की वकालत करता है.
निधिकोष की स्थिति 
11वीं योजना के दौरान भारत सरकार ने ओएडीडी परियोजना के लिए 46 करोड़ रूपए की राशि जारी की है. इसमें से अब तक 9.7 करोड़ रुपए का व्यय किया जा चुका है.

वित्तपोषण के लिए परियोजनाओं के मूल्यांकन के लिए ओएसडीडी खुली समीक्षा प्रणाली का अनुगमन करता है. परियोजनाओं को ओएसडीडी के पोर्टल (http://sysborg2.osdd.net) पर पोस्ट कर दिया जाता है और इन परियोजनाओं को वैज्ञानिक योग्यता और इसके लिए निधि की आवश्यकता इन दोनों ही आधारों पर समुदाय के समक्ष समीक्षा के लिए रख दिया जाता है. ओएडीडी समुदाय द्वारा सकारात्मक टिप्पणी प्राप्त परियोजनाओं को विशेषज्ञों की एक समीति के पास निधि की आवश्यकता की समीक्षा के लिए अनुमोदन हेतु भेज दिया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया की सभी टिप्पणी और जानकारियों को ऑनलाइन पोस्ट कर दिया जाता है जिसे समुदाय के सभी सदस्य देख सकते हैं. कार्य की प्रगति का यह ढांचा परियोजनाओं के अनुमोदन और इसके लिए धनराशि जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है.

डीबीटी की पहल
क्षय रोगों के निदान के विकास के लिए, उच्च क़िस्म के टीके, मौजूदा बीसीजी के टीके के लिए बूस्टर, दवाओं के विकास और उचित बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए, जैव प्रौद्योगिकी विभाग लगभग 120 अनुसंधानकर्ताओं को फंड देता है. इस अनुसंधान में क्षय रोगों की प्रतिरोधक मौजूदा दवाओं के प्रभाव/इलाज की दर में वृद्धि करने के लिए नैदानिक परीक्षण शामिल है. काफी मुश्किल इलाज वाले वर्ग ॥ के क्षय रोगियों में एटीटी की उपचार दर में वृद्धि लाने के लिए कुछ ज्ञात इम्युनो-मॉड्यूलेटरों जैसे कि माइकोबैक्टिरियम इंडीकस प्रानी (व्यवसायिक रूप में इम्युवैक नाम से उपलब्ध) के इस्तेमाल द्वारा नैदानिक परीक्षणों के लिए इम्युनो-मॉड्यूलेशन तरीके का डीबीटी समर्थन करती है. प्रारंभिक परिणामों ने उपचार दर में सुधार दर्शाया है. एक अन्य जाना हुआ इम्युनो-मॉड्यूलेटर जो कि विटामिन-डी और ज़िंक जैसे कोशिकीय स्तरों पर काम करता है उसे वर्ग I के क्षय रोगियों में एटीटी को कम करने के लिए नैदानिक रूप से परीक्षण किया जा रहा है, इसके शुरूआती परिणाम उत्साहवर्धक हैं. दिल्ली विश्विद्यालय के दक्षिणी परिसर (यूडीएससी) के वैज्ञानिकों ने खासतौर से माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस (एमटीबी) के विकास के दौरान उत्पन्न और उत्सर्जित होने वाले कुछ प्रोटीनों की पहचान की है. एमटीसीएजी कहे जाने वाले विशिष्ट एमटीबी प्रोटीन की पहचान के लिए उन्होंने उच्च संबंध वाले मोनोक्लोनल प्रतिरक्षी जोडों का विकास किया है. इन प्रतिरक्षियों का इस्तेमाल संदिग्ध क्षय रोगियों के नमूनों में दो एमटीसीएजी की उपस्थिति का पता लगाने वाले परीक्षण का विकास करना है. नमूनों में किसी एक या फिर दोनों विशिष्ट एमटीसी प्रतिजन की उपस्थिति एमटीबी की पुष्टि करता है. एमटीबी के विकास की पुष्टि के लिए नमूनों की आसान और शीघ्र जांच के लिए इस परीक्षण को शीघ्रता से इम्युनोक्रोमेटोग्राफिक स्वरूप में प्रारुपित किया गया है. इसे न्यूनतम परीक्षण के साथ किया जा सकता है और बीस मिनट से भी कम में यह परिणाम दे देता है. नमूनों में क्षय रोग के दण्डाणु की पहचान के लिए इस दृश्यगत परीक्षण का विकास किया गया है और यह ‘क्रिस्टल टीबी कन्फर्म’ के व्यावसायिक नाम से उपलब्ध है.

क्षय रोग की शोध में डॉ. कनूरी वी.एस. राव के नेतृत्व में आईसीजीईबी के वैज्ञानिकों के एक दल ने महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है. संक्रमण के शुरूआती चरणों में एमटीबी से उत्पन्न लगभग बीस उपस्थित प्रतिजनों की पहचान कर ली गई है और क्षय रोग के टीके के लिए अब उनकी क्षमता का आकलन किया जा रहा है. इसका औचित्य परिचारक की पूरक प्रतिरोधी स्मृति में सुरक्षात्मक प्रभाविक सुधार लाना है. माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस के जीव-विज्ञान और प्रतिरोधकता को समझकर आईसीजीईबी, नई दिल्ली, के वैज्ञानिकों का उद्देश्य इस ज्ञान का इस्तेमाल क्षय रोगों के लिए नवीन उपचारात्मक तरीकों का विकास करना है. इन सभी जानकारियों का इस्तेमाल मरीज़ों के लिए दवा बनाने में तब्दील करने के लिए वैज्ञानिक एक दवा कंपनी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं जिसका कि इस क्षेत्र में परीक्षण किया जा सके.


विश्व क्षय रोग दिवस 24 मार्च पर विशेष
मृदुल कुमार सिंह
क्षय तपेदिक अथवा टीबी एक घातक संक्रामक रोग है. तमाम प्रयास के बावजूद यह देश के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्या या कहें कि चुनौती बना हुआ है. हर साल इससे 18 लाख व्यक्ति ग्रसित और 3•76 लाख व्यक्ति असमय मरते हैं. यही नही एमडीआर के बाद यह अब और भयावह एक्सडीआर भी हो रहा है. ऐसे मे टीबी के प्रति बड़े जन-जागरण की आवश्यकता है और जन-जागरण के लिए हम-सब की.
क्षय संक्रामक रोग है. किसी को हो सकता है. फेफड़ों की टीबी से ग्रसित रोगी के खांसने छींकने या बोलने से इसका जीवाणु माइक्रोबैक्टेरिम टुबरकुलोसिस अन्य लोगों मे फैलता है. एड्स, कुपोषण और धूम्रपान जहां इसे फलने फूलने का पूरा मौका दे रहे हैं, वहीं मधुमेह सी बीमारी इसके इलाज मे आड़े आ रही है. 6 से 9 माह नियमित क्षय-निरोधक दवा खाने से यह ठीक हो जाता  है. शहर से लेकर दूर दराज के गाँव तक इसका इलाज डॉटस मुफ्त उपलब्ध है. फिर भी समाज इससे ग्रसित रोगी को बडी हीन दृष्टि से देखता है. इसलिए रोगी नहीं चाहता कि उसकी बीमारी का किसी को पता चले. वह पहले बीमारी को छुपाने का हर संभव प्रयास करता है. समय से इलाज नहीं लेता और अंततः लेता भी है तो सामने मौत खड़ी होती हैं. देश में क्षय रोग से मौत का यह भी एक बड़ा कारण है.

आमतौर पर निजी चिकित्सक भी क्षय रोगी को देखकर कहते हैं कि कुछ नहीं, साधारण खांसी बुखार है. सीना मे संक्रमण  है. पसलियों पर बलगम जमा  है या धब्बे हैं. दवा खाओ, ठीक हो जाओगे और दवा टीबी की देते हैं. रोगी को लाभ भी होता है, लेकिन वह बीमारी को गंभीरता से नहीं लेता और थोड़ा ठीक होते ही स्वयं दवा खाना बंद कर देता है. टीबी का इलाज लम्बा चलता है. ऊबकर तो कभी दवा के दुष्पभावों की वजह से क्षय रोगी बीच मे इलाज छोड़ देता है. कभी आर्थिक तंगी भी उसे दवा छोड़ने पर मजबूर कर देती है.
इस तरह बहुत से क्षयरोगी जाने-अनजाने नियमित और पूरा इलाज नहीं ले पाते. उनमें MULTI DRUG RESISTANT  या कहें कि मुख्य प्राथमिक क्षय-औषधि रिफाॅम्पिसिन और आईसोनियाजिड, क्षय जीवाणु पर अप्रभावी हो जाती है. एमडीआर टीबी का इलाज कम से कम दो वर्ष तक चलता है. इसमें दी जाने वाली दवाओं के दुष्प्रभाव ज्यादा होते हैं और उनकी कीमत भी बहुत अधिक होती है. 60-70 प्रतिशत रोगी इससे ठीक हो पाते हैं. सही इलाज न लेने पर, यह फिर और खौफनाक एक्सडीआर टीबी (EXTREMELY DRUG RESISTANT ) हो जाती है. इसमें द्वतीय स्तर की क्षय निरोधक औषधि भी अप्रभावी हो जाती है.

इस भयावह बीमारी पर काबू पाने के लिए देश मे 1997 से डॉटस कार्यक्रम चल रहा है. इसके परिणाम  अच्छे रहे हैं. इसके तहत रोगी को प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता की सीधी निगरानी मे सप्ताह  में तीन दिन टीबी की दवा खिलाई जाती है. टीबी रोग विशेषज्ञ रमन कक्कड की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने मरीजों को टीबी की दवा सप्ताह मे तीन दिन की जगह सात दिन खिलाने की व्यवस्था सुनिश्चित करने  के निर्देश केन्द्र सरकार को दिए हैं. रमन कक्कड ने याचिका मे कहा था कि सरकार ने पैसा बचाने के लिए मरीजों को सप्ताह मे तीन दिन दवा खिलाने की व्यवस्था की है, जबकि इसकी वजह से लोगों में टीबी की पुनरावृत्ति और उसके एमडीआर होने की संभावना बढ जाती है.
भारत मे दुनिया के सर्वाधिक क्षय रोगी हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो भारत मे 2014 मे दुनिया के  23% क्षय रोगी  थे,  2016 मे बढ़कर 27 प्रतिशत हो गए. भारत सरकार 2035 तक इस संख्या को 10 प्रतिशत करने के लिए प्रयत्नशील है. प्रधानमंत्री के निर्देश पर टीबी से जुड़े शोध और इलाज के विकास के लिए इंडिया टीबी रिसर्च एंड डेवलपमेंट कॊपरेशनका गठन किया गया है यह अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के सहयोग से चलेगा. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सलाहकार समूह ने कार्य करना शुरू कर दिया है. साथ ही केन्द्र सरकार देश भर में टीबी के मरीजों को प्रति दिन दवा खिलाने की नई व्यवस्था भी तेजी से कर रही है.
बहरहाल देश मे टीबी की भयावहता किसी तरह कम नहीं है. लेकिन अच्छी बात यह कि प्रधानमंत्री और शीर्ष अदालत भी इसको लेकर गंभीर है. आज क्षयरोगी से बच कर अपने आप को सुरक्षित समझना किसी के लिए ठीक नहीं. उसके रोग मुक्त होने मे ही हम तसबकी सुरक्षा है. फिर क्यों न हम उसे अपना समझ कर समय से नियमित और पूरा इलाज लेने के लिए प्रेरित करें, जिससे कि लाइलाज और जानलेवा होती टीबी पर जीत सुनिश्चित हो सके.

फ़िरदौस ख़ान
केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार नित नये ऐसे फ़ैसले ले रही है, जिससे सरकार का ख़ज़ाना भरता रहे. लोकसभा ने गत मंगलवार को शत्रु संपत्ति क़ानून संशोधन विधेयक-2017 को मंज़ूरी दी, जिसमें युद्धों के बाद पाकिस्तान और चीन चले गए लोगों द्वारा छोड़ी गई जायदाद पर उत्तराधिकार के दावों को रोकने के प्रावधान किए गए हैं. पिछले शुक्रवार को राज्यसभा ने विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में शत्रु संपत्ति क़ानून संशोधन विधेयक को पारित कर दिया था.

ग़ौरतलब है कि साल 1947 में देश के बंटवारे के वक़्त और साल 1962 में चीन, साल 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुई जंगों के दौरान या उसके बाद जो भारतीय नागरिक पाकिस्तान या चीन चले गए, उन्हें भारत सरकार शत्रु मानती है. इसलिए उनकी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति माना जाता है. इसके अलावा पाकिस्तान और चीन के अलावा दूसरे देशों की नागरिकता ले चुके लोगों और कंपनियों की संपत्ति भी शत्रु संपत्ति के दायरे में आती है. ऐसी संपत्तियों की देखरेख के लिए सरकार एक कस्टोडियन की नियुक्ति करती है. भारत सरकार ने साल 1968 में शत्रु संपत्ति अधिनियम लागू किया था, जिसके तहत शत्रु संपत्ति को कस्टोडियन में रखने की सुविधा दी की गई. केंद्र सरकार ने इसके लिए कस्टोडियन ऑफ़ एनिमी प्रॉपर्टी विभाग का गठन किया है, जिसे शत्रु संपत्तियों को अधिग्रहित करने का अधिकार है.
इस विधेयक के मुताबिक़ अब किसी भी शत्रु संपत्ति के मामले में केंद्र सरकार या कस्टोडियन द्वारा की गई किसी कार्रवाई के संबंध में किसी वाद या कार्यवाही पर विचार नहीं किया जाएगा. अगर शत्रु संपत्ति के मालिक का कोई उत्तराधिकारी भारत लौटता है, तो उसका इस संपत्ति पर कोई दावा नहीं होगा. एक बार कस्टोडियन के अधिकार में जाने के बाद शत्रु संपत्ति पर उत्तराधिकारी का कोई हक़ नहीं होगा. अगर शत्रु के उत्तराधिकारी भारतीय हों या शत्रु अपनी नागरिकता बदलकर किसी और देश का नागरिक बन जाए, तो ऐसे हालात में भी शत्रु संपत्ति कस्टोडियन के पास ही रहेगी. शत्रु संपत्ति अब उस हालात में संपत्ति के मालिक को वापस दी जाएगी, जबकि वह सरकार के पास आवेदन भेजेगा और संपत्ति शत्रु संपत्ति नहीं पाई जाएगी. कस्टोडियन को शत्रु संपत्ति को बेचने का अधिकार भी होगा, जबकि पिछले क़ानून के मुताबिक़ अगर संपत्ति के संरक्षण या रखरखाव के लिए ज़रूरी होने पर ही संपत्ति को बेचा जा सकता था. पिछले क़ानून के मुताबिक़ अगर शत्रु से उत्तराधिकारी भारतीय होते थे, तो वह इस शत्रु संपत्ति से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल कर पाते थे, लेकिन अब नये क़ानून में इस सुविधा को ख़त्म कर दिया गया है.

इस विधेयक के पास होने से उन लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं, जो देश से पलायन करने वाले लोगों की जायदादों के वारिस बने बैठे हैं. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक़ देशभर में 16000 संपत्तियां शत्रु संपत्ति कहलाती हैं, जिनकी  क़ीमत तक़रीबन एक लाख करोड़ रुपये है. इनमें पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री मोहम्मद अली जिन्ना, भोपाल के नवाब की संपत्ति, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की रियासतों की संपत्तियां भी शामिल हैं.
ग़ौरतलब है कि नये क़ानून से सबसे ज़्यादा जिन लोगों का नुक़सान होगा, जो नवाबों के वारिस हैं. महमूदाबाद के राजा काज़ी नसरुल्लाह के वारिस की जायदाद भी ख़तरे में है. काज़ी नसरुल्लाह बग़दाद के ख़लीफ़ा के मुख्य काज़ी थे. वह साल 1316 में दिल्ली आए. वह मुहम्मद तुग़लक की फ़ौज में कमांडर की तरह लड़े. इससे ख़ुश होकर मुहम्मद तुग़लक ने अवध में उन्हें जागीर दी, जो महमूदाबाद रिसायत कहलाई.
महमूदाबाद के राजा मुहम्मद आमिर मुहम्मद ख़ान के पिता मुहम्मद आमिर अहमद ख़ान साल 1957 में पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी पत्नी रानी कनीज़ आबिद अपने बेटे के साथ यहीं रहीं. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उनकी तक़रीबन 936 संपत्तियां हैं, जिनका मुक़दमा सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा था. मुहम्मद आमिर मुहम्मद ख़ान का कहना है कि वह और उनकी मां हमेशा से ही भारतीय नागरिक रहे हैं, इसलिए उनकी पुश्तैनी जायदाद को शत्रु संपत्ति नहीं माना जाना चाहिए.

ख़बरों की मानें, तो सैफ़ अली ख़ान की भोपाल स्थित संपत्ति पर भी असर पड़ेगा. सैफ़ के पिता मंसूर अली ख़ान पटौदी की मां साजिदा सुल्तान बेगम भोपाल के आख़िरी नवाब हमीदुल्लाह ख़ान की छोटी बेटी थीं. हमीदुल्ला ख़ान की दो बेटियां थीं. उनकी बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान 1950 में पाकिस्तान जाकर बस गई थीं, लेकिन हमीदुल्लाह और उनके परिवार के बाक़ी लोग भोपाल में ही रहे. साल 1960 में नवाब हमीदुल्लाह की मौत के बाद छोटी बेटी साजिदा को उनकी जायदाद मिली. फिर साल 1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने साजिदा को भोपाल रियासत का वारिस घोषित कर दिया. इस पर आबिदा ने भारतीय अदालत में साजिदा को वारिस बनाए जाने के ख़िलाफ़ याचिका दायर की. फ़िलहाल यह मामला अदालत में है. साल 1968 में सरकार शत्रु संपत्ति अधिनियम लेकर आई. इस क़ानून के तक़रीबन पांच दशक बाद पिछले साल कस्टोडियन ऑफ़ इनेमी प्रॉपर्टी ऑफ़िस ने नवाब की संपत्तियों को शत्रु संपत्ति घोषित किया था.
मुंबई स्थित जिन्ना हाउस भी इस क़ानून की ज़द में है. जिन्ना की इकलौती बेटी दीना वाडिया इस पर अपना हक़ जताती हैं. जिन्ना पाकिस्तान चले गए थे, इसलिए साल 1949 में भारत सरकार ने इसे अपने क़ब्ज़े में ले लिया था. हालांकि पाकिस्तान ने भी इस पर अपना दावा पेश किया था. जिन्ना ने अपनी वसीयत में इसे अपनी बहन फ़ातिमा जिन्ना को दिया था. फ़ातिमा ने शादी नहीं की और उनका कोई वारिस नहीं है. दीना वाडिया का कहना है कि जिन्ना की इकलौती बेटी होने की वजह से इस पर उनका हक़ है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि इस नये क़ानून से मुसलमान सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि मुसलमानों की करोड़ों की जायदाद शत्रु संपत्ति के दायरे में आ जाएगी. आज जो लोग करोड़ों के मालिक हैं, कल वे कंगाल हो जाएंगे.

मेरे महबूब !
होली
मुझे बहुत अज़ीज़ है
क्योंकि
इसके इंद्रधनुषी रंगों में
तुम्हारे इश्क़ का रंग भी शामिल है...
-फ़िरदौस ख़ान

खेतों के वैज्ञानिकों ने अपने खेतों में किए नवाचार-अनुसंधान, उनकी इन उपलब्धियों पर हुआ राष्ट्रीय मंथन
राजस्थान राज्य में अपनी किस्म के पहले और देश के ख्यातिप्राप्त किसान वैज्ञानिकों के साथ राज्य के कृषक-पशुपालकों और वैज्ञानिकों का दो दिवसीय राष्ट्रीय मंथन बीकानेर के राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (राजुवास) में 9-10 मार्च को सम्पन्न हुआ. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पर्यावरणविद पद्मश्री अनिल प्रकाश जोशी (उत्तराखंड) थे जबकि विशिष्ठ अतिथि पूर्व सिंचाई मंत्री देवीसिंह भाटी थे. इसके अलावा राजुवास कुलपति डॉ (कर्नल) अजयकुमार गहलोत, वरिष्ठ पत्रकार श्याम आचार्य, अमर उजाला समूह के सलाहकार यशवंत व्यास, स्वामी केशवानंद कृषि विवि के कुलपति प्रो. डॉ बीआर छीपा, महाराजा गंगासिंह विवि के कुलपति प्रो. भागीरथ सिंह, राजुवास के वित्त नियंत्रक अरविन्द बिश्नोई, आयोजन सचिव और प्रसार शिक्षा निदेशक प्रो. राजेश कुमार धूड़िया आदि मंच पर मौजूद थे.

अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ ही कार्यक्रम का आगाज हुआ. कार्यक्रम में खेती में नवाचार करने वाले देश के विभिन्न राज्यों से आए 25 किसान वैज्ञानिकों के साथ राज्य के 150 प्रगतिशील किसान और कृषि और पशुचिकित्सा वैज्ञानिकों ने सहभागिता की.  उद्घाटन सत्र में अतिथियों ने आयोजन को राजुवास की एक ऐतिहासिक पहल बताते हुए कृषि में पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान का एक अद्भुत सम्मेलन बताया. देश के किसान वैज्ञानिकों ने न्यूनतम शैक्षणिक स्तर के बावजूद खेतों में अपनी जरूरतों और प्रयोगों के आधार पर खेती-बाड़ी में नवाचार और मशीनरी को अनुकूल बनाकर उल्लेखनीय कार्य किए हैं, जिसे व्यावसयिक तौर पर अपनाकर आम लोगों तक पहुँचाने की जरूरत बताई गई, इसके लिये ‛दक्ष किसान संगठन’ बनाए जाने को लेकर सहमति बनी. समारोह के उद्घाटन सत्र में पूर्व सिंचाई मंत्री  देवीसिंह भाटी ने कहा कि समाज में हर जाति और कौम के लोगों में कौशल विकास में दक्षता रही है, लेकिन सहायता कार्यक्रमों पर निर्भरता बढ़ने के कारण समाज हाशिए पर आ गया है. कृषक वैज्ञानिकों ने अपनी प्रतिभा से कृषि और पशुपालन में उपयोगी नवाचार व अनुसंधान कर समाज को दिए हैं, ऐसे नवाचारों के समुचित प्रचार-प्रसार की जरूरत है. गांवों के विकास के लिए हमारे यहां प्रचलित शून्य आधारित अर्थ व्यवस्था भी कारगर रही है.

पर्यावरणविद् पद्मश्री अनिल प्रकाश जोशी ने  देश में कृषकों की दशा पर चिंता जताते हुए कहा कि देश में आर्थिकी का पहला व्यक्ति किसान है. प्राथमिक उत्पाद गांव से हैं अतः देश की तमाम प्रकार की जरूरतों और सुदृढ़ आर्थिक आधार के लिए इनका मजबूत होना जरूरी है. उन्होंने राष्ट्रीय मंथन में 25 कृषक वैज्ञानिकों के सम्मान को एक नई पहल बताया. उन्होंने दक्ष संगठन बनाने का प्रस्ताव किया, जिस पर राजुवास के कुलपति प्रो. गहलोत ने सहमति जताई. यह संगठन ऐसे नवाचार और अनुसंधानों को पूरे देश में व्यावसायिक रूप देने का कार्य करेगा. राजुवास और कृषि विश्वविद्यालय जैविक उत्पादों के पेटेन्ट और प्रसार का कार्य करेंगे. वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ए.के. गहलोत ने स्वागत भाषण में कृषक वैज्ञानिकों के नवाचार और कार्यों को एक अविस्मरणीय कार्यक्रम बताया. उन्होंने कहा कि इन किसानों ने बिना किसी औपचारिक शिक्षा के अपनी मेहनत और लगन से कृषि में उल्लेखनीय योगदान देकर पूरे देश में सम्मान और पुरस्कार जीतने में अग्रणी भूमिका निभाई है. उन्होेंने बताया कि राजुवास भी जमीन से जुडे़ अनुसंधान पर कार्य करते हुए राज्य के देशी गौवंश सहित पारंपरिक पशुपालन से अतंरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकी का पशुपालन में उपयोग कर रहा है.
नई दिल्ली से आये वरिष्ठ पत्रकार यशवंत व्यास ने बताया कि कृषक वैज्ञानिकों के कार्यों को देश और दुनिया में वेबसाईट पर पोर्टल बनाकर प्रसारित किया जायेगा. इसके अलावा इनके नवाचार और अनुसंधान पर 10 लोगों का क्रू बनाकर विशेष वृत चित्र भी बनाये जायेंगे. विश्लेषक-स्तंभ लेखक व पत्रकार श्याम आचार्य ने कहा कि पारिस्थितिकी संतुलन के लिये जीव-जंतु और वनस्पति में संतुलन जरूरी है. नई पीढी़ को भी इसमें जोड़ना होगा. उन्होंने राजुवास द्वारा पशुपालन के क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों को महत्वपूर्ण बताते हुए निजी-सार्वजनिक सहभागिता पर जोर दिया.

स्वामी केशवानंद कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.आर. छीपा ने कहा कि खेती-बाड़ी के क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई है. उन्होंने कृषकों को मृदा स्वास्थ्य के प्रति सतर्कता बरतते हुए शून्य आधारित खेती को अपनाने की सलाह दी. महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भागीरथ सिंह ने कहा कृषि में नवाचार, अनुसंधान और नवीन तकनीक जलवायु के अनुकूल होनी जरूरी है, जिससे इसे लाभदायक बनाये रखा जा सके. किसान आयोग के उपसचिव योगेश वर्मा ने कहा कि राज्य में कृषकों के द्वारा स्थापित नये आयामों और कार्य को आगे बढ़ाया जाएगा. राजस्थान सरकार द्वारा कृषि में नवाचारों को समुचित प्रोत्साहन हेतु राज्य किसान आयोग का गठन किया जाएगा. राष्ट्रीय मंथन कार्यक्रम के सूत्रधार और ‛खेतों के वैज्ञानिक’ पुस्तक के लेखक डॉ. महेन्द्र मधुप ने कहा कि भारत का किसान वैज्ञानिक दुनिया में किसी से कम नहीं है. अपनी पहली पुस्तक में उन्होंने नवाचार करके धूम मचाने वाले 24 किसान वैज्ञानिकों के कार्यों को प्रस्तुत किया है. ये सभी किसान बिना किसी बाहरी सहायता के खेती से अधिकतम लाभ ले रहे हैं. राजुवास के वित्त नियंत्रक अरविन्द बिश्नोई ने भी कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त किये.

आयोजन सचिव और प्रसार शिक्षा निदेशक प्रो. आर.के. धूड़िया ने बताया कि राज्य के 15 जिलों के 150 से भी अधिक प्रगतिशील कृषक और पशुपालक भी इस आयोजन में सहभागी रहे हैं. उन्होंने सभी का आभार जताया. अतिथियों ने डॉ. महेन्द्र मधुप द्वारा लिखित ‛खेतों के वैज्ञानिक’ पुस्तक और प्रसार शिक्षा निदेशालय की मासिक पत्रिका ‛पशुपालन नये आयाम’ के नवीन अंक का विमोचन किया. समारोह में अतिथियों ने 25 कृषक वैज्ञानिकों को शॉल, श्रीफल और स्मृतिचिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया. कार्यक्रम का संचालन डॉ. अशोक गौड़ और डॉ. प्रतिष्ठा शर्मा ने किया. समारोह में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों, कृषि, वेटरनरी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और संभ्रान्त के नागरिकों ने भाग लिया.
ये हैं खेतों के वैज्ञानिक
1. ईश्वरसिंह कुण्डू
गांव कैलरम, जिला-कैथल, हरियाणा. जैविक खेती में शोध के लिए प्रतिष्ठित. 2013 में महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा द्वारा 44 लाख रूपये की सहायता अनुदान से सम्मानित विश्व के पहले किसान. ‛कमाल-505’ उत्पाद के लिए राष्ट्रपति भवन में डॉ कलाम से सम्मानित. बीसियों सम्मान. लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में नाम दर्ज. आईसीएआर द्वारा वर्ष 2011 में जगजीवनराम सम्मान.
2. धर्मवीर कम्बोज
गांव दामला, जिला- यमुनानगर, हरियाणा.
उत्पाद प्रसंस्करण मशीन सहित कई मशीनें विकसित की हैं. 2014 में किसान वैज्ञानिक के रूप में राष्ट्रपति भवन में 20 दिन मेहमान रहे हैं. साधारण निर्धन किसान और रिक्शा चालक से ढाई दशक में एक करोड़ रूपये की मशीनें बेचने वाले किसान वैज्ञानिक के रूप में लोकप्रिय.
3. गुरमेलसिंह धौंसी
पदमपुर, जिला-श्रीगंगानगर, राजस्थान.
करीब दो दर्जन कृषि यंत्र विकसित किये हैं. 2014 में राष्ट्रपति भवन में बीस दिन मेहमान रहे हैं. 2012 में राष्ट्रपति भवन में एनआईएफ का 5 लाख रूपये का पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके हैं.
4. रायसिंह दहिया
जयपुर, राजस्थान. दहिया ने बायोमास गैसीफायर विकसित किया है. 2016 में राष्ट्रपति भवन में 15 दिन मेहमान रहे हैं. 2009 में राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय स्तर का द्वितीय वर्मा पुरस्कार मिला.
5. सुंडाराम वर्मा
गांव दांता, जिला-सीकर, राजस्थान.
एक लीटर पानी से एक पेड़ विकसित करने की प्रणाली की खोज करने वाले इकलौते किसान. अनेकों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार. जिनेवा में वैश्विक सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. आईसीएआर द्वारा भी सम्मानित हो चुके हैं.
6. हरिमन शर्मा
गांव-पनियाला, जिला-बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश.
तपती धरती पर सेब उत्पादन में सफलता प्राप्त की. राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने 04 मार्च 2017 को 3 लाख रूपये का द्वितीय राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया.
7. श्रवण कुमार बाज्या
गांव-गिरधारीपुरा, जिला-सीकर, राजस्थान.
खरपतवार हटाने की मशीन सहित 6 मशीनें विकसित की हैं. 04 मार्च 2017 को राष्ट्रपति भवन में एनआईएफ का 3 लाख रूपये का पुरस्कार प्रदान प्राप्त कर चुके हैं.
8. राजकुमार राठौर
गांव-जमोनिया टेंक, जिला- सिहोर, मध्यप्रदेश.
अरहर की बारहमासी किस्म ‛ऋचा 2000’ विकसित की है. मोतियों वाले राजकुमार के नाम से भी जाने जाते हैं. राष्ट्रपति भवन में सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं.
9. चौधरी परमाराम
तहसील-सुन्दरनगर, जिला-मंडी, हिमाचल प्रदेश.
2006 में बहुउद्देश्य टीलर कम पुडलर बनाया. 2014 में आईसीएआर ने जगजीवनराम अभिनव पुरस्कार प्रदान किया.
10. इस्हाक़ अली
गांव- कछोली, जिला- सिरोही, राजस्थान.‛आबू सौंफ-440’ विकसित की. आईसीएआर द्वारा जगजीवनराम अभिनव पुरस्कार से सम्मानित. ‛सिटा’ द्वारा ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं.
11. मदनलाल कुमावत
गांव- दांता, जिला- सीकर, राजस्थान.
पुराने ट्रैक्टर पर बनाया लोडर. बहु फसल थ्रेसर विकसित किया. राष्ट्रपति द्वारा 04 मार्च 2017 को राष्ट्रपति भवन में सम्मानित. कई राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय सम्मान प्राप्त कर चुके हैं. पहले किसान हैं जिनका नासम 'फोर्ब्स' मैगज़ीन में छप चूका है.
12.  जितेन्द्र मलिक 
गांव- सींख, जिला- पानीपत, हरियाणा.
मशरुम टर्निंग मशीन विकसित की है. 2015 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने एनआईएफ का 3 लाख रूपये का पुरस्कार प्रदान किया.
13. राजेश खेड़ी 
गांव-खेड़ी, जिला- कैथल, हरियाणा.
जैविक खेती में नवाचारों से राष्ट्रीय पहचान बना चुके हैं. आईसीएआर द्वारा ’जैविक हलधर पुरस्कार-2015’ व 2016 में प्रदान किया गया है.
14. भगवती देवी
गांव-दांता, जिला-सीकर, राजस्थान.
फसल को दीमक से बचाने का नुस्खा विकसित किया है. ‛सिटा’ द्वारा 2011 में  ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं. महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा ने ‛इण्डिया एग्री अवार्ड-2011’ प्रदान किया है.
15. मोहम्मद मकबूल रैना
गांव- थन्ना मण्डी, जिला- राजौरी, जम्मू कश्मीर.
कृषि नवाचारों से युवाओं को आतंकवादी बनने से रोका है. इनका कहना है कि ‛गन से नहीं हल से मिलेगी आतंकवाद से मुक्ति’. 2011 में ‛सिटा’ द्वारा ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान प्राप्त किया है.
16. अरविन्द सांखला
मारवाड़- मथानिया, जिला-जोधपुर, राजस्थान.
गाजर धुलाई मशीन, मिर्ची ग्रेडिंग एवं सफाई मशीन, जमीन से लहसुन निकालने के लिये ‛कुली’ मशीन आदि विकसित कर चुके हैं. ‛सिटा’ द्वारा ‛खेतों के वैज्ञानिक’ राष्ट्रीय सम्मान से भी सम्मानित हैं.
17. जसवीर कौर
गांव-प्रेमपुरा, जिला- हनुमानगढ़, राजस्थान.
एक साथ सात काम करने वाला उपकरण विकसित किया है. खेती में कई प्रयोग किये हैं. ‛सिटा’ द्वारा ‛खेतों के वैज्ञानिक’ और एनआईएफ द्वारा सम्मानित. इन्होने शारीरिक अशक्तता को शोध में आडे नहीं आने दिया.
18. सुशील कुमार कुंडू
ताखरवाली, पोस्ट-रंगमहल, तहसील- सूरतगढ़, जिला गंगानगर, राजस्थान.
बंजर भूमि को नवाचारों से जैविक किसानों के लिये पर्यटन स्थल बना दिया है. जैविक खेती में निरंतर नये प्रयोग करते रहे हैं. ‛सिटा’ द्वारा ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान प्राप्त कर चुके हैं.
19. सुरेन्द्र सिहं 
गांव-धिंगनवाली, तहसील- अबोहर, जिला-फिरोजपुर, पंजाब.
खेती और डेयरी उत्पाद पूरी तरह जैविक हों  इस अभियान से पंजाब में विषिष्ट पहचान बनाई है. निरंतर नित नए नये प्रयोग करते रहते हैं.
20. कैलाश चौधरी
गांव-कीरतपुरा, तहसील-कोटपूतली, जिला-जयपुर, राजस्थान.
जैविक खेती और आंवला प्रसंस्करण के लिये राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त किसान हैं. 2016 में राजस्थान सरकार ने 1 लाख रूपये का पुरस्कार प्रदान किया था. आईसीएआर ने भी पुरस्कार देने की घोषणा की है. आईसीएआर ने इन्हें जैविक खेती के 5 प्रशिक्षणों के लिये भी चयनित किया है.
21. मोटाराम शर्मा
जिला-सीकर, राजस्थान.
हाल ही में दसवीं पास की है. मशरुम उत्पादन और प्रसंस्करण में नवाचारों के कारण देशभर में पहचान बना चुके हैं. 2010 में राजस्थान सरकार ने ’कृषि रत्न’ और 50 हजार रूपये सम्मान राशि प्रदान की. 2010 में ‛सिटा’ ने ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान प्रदान किया.
22. जगदीश प्रसाद पारीक
तहसील अजीतगढ, जिला-सीकर, राजस्थान.
फूलगोभी की  ‛अजीतगढ़ सलेक्शन’ किस्म विकसित की है. हाल ही में 25 किलो की फूलगोभी मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे को भेंट की, विश्व रिकार्ड 26 कि. ग्रा. की गोभी का है. इन्होनें कई मशीनें भी विकसित की हैं. एनआईएफ और सिटा द्वारा सम्मानित हो चुके हैं.
23. झाबरमल पचार
झीगर बड़ी, पोस्ट- झीगर छोटी, जिला- सीकर, राजस्थान.
सलेक्शन पद्धति से तीन फीट लम्बी देशी काली गाजर विकसित की है. एनआईएफ ने इनके बीज को कारगर माना है. इस गाजर की मिठास शक्कर जैसी है. इनकी पत्नी  संतोष पचार 15 दिनों तक किसान वैज्ञानिक के रूप में राष्ट्रपति भवन में मेहमान हैं.
24. प्रिन्स कम्बोज
ग्राम एवं पोस्ट- दामला, जिला यमुनानगर, हरियाणा.
किसान-वैज्ञानिक पिता धर्मवीर कम्बोज के साथ किसान- वैज्ञानिक की भूमिका में सक्रीय हैं. कृषि प्रसंस्करण में कई नये प्रयोग किये हैं. इण्डिया-अफ्रीका सबमिट-2015 में नवाचारी किसान शोधकर्ता के रूप में भाग ले चुके हैं. आदिवासियों के लिये सस्ती मशीने बनाने में जुटे हैं. ‛सिटा’ द्वारा ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान प्राप्त कर चुके हैं.
25. कुमारी राज दहिया
जयपुर, राजस्थान की रहने वाली युवा किसान वैज्ञानिक हैं. पिता रायसिंह दहिया द्वारा विकसित बायोमास गैसीफायर का वर्तमान स्वरूप विकसित करने में राज दहिया की महत्वपूर्ण सह-भूमिका रही है. राज ने बायोमास कुक स्टोव विकसित किया है. ‛सिटा’ द्वारा ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं.
26. भंवरसिंह पीलीबंगा
जयपुर, राजस्थान ने जैविक खेती एवं उसके प्रसंस्करण में नवाचारों से अलग पहचान बनाई है. अपने तरीके से ग्रीन हाऊस का मॉडल बनाया है. इसमें बेल वाले टमाटर पर शोध किया. ऑर्गेनिक टमाटर की ऊंचाई 15 फीट है. जैविक खेती के लिये किसानों के बुलाने पर जाकर बिना शुल्क मार्गदर्शन करते हैं.
प्रस्तुति : मोईनुद्दीन चिश्ती, लेखक ख्याति प्राप्त कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं.


फ़िरदौस ख़ान
हिन्दुस्तानी त्योहार हमें बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं, क्योंकि ये त्योहार मौसम से जुड़े होते हैं, प्रकृति से जुड़े होते हैं. हर त्योहार का अपना ही रंग है, बिल्कुल मन को रंग देने वाला. बसंत पंचमी के बाद रंगों के त्योहार होली का उल्लास वातावरण को उमंग से भर देता है. होली से कई दिन पहले बाज़ारों, गलियों और हाटों में रंग, पिचकारियां सजने लगती हैं. छोटे क़स्बों और गांवों में होली का उल्लास देखते ही बनता है. महिलाएं कई दिन पहले से ही होलिका दहन के लिए भरभोलिए बनाने लगती हैं. भरभोलिए गाय के गोबर से बने उन उपलों को कहा जाता है, जिनके बीच में छेद होता है. इन भरभेलियों को मूंज की रस्सी में पिरोकर माला बनाई जाती है. हर माला में सात भरभोलिए होते हैं. इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमाने के बाद होलिका दहन में डाल दिया जाता है. होली का सबसे पहला काम झंडा लगाना है. यह झंडा उस जगह लगाया जाता है, जहां होलिका दहन होना होता है. मर्द और बच्चों चैराहों पर लकड़िया इकट्ठी करते हैं. होलिका दहन के दिन दोपहर में विधिवत रूप से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है. महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए घरों में पकवानों का भोग लगाती हैं. रात में मुहूर्त के समय होलिका दहन किया जाता है. किसान गेहूं और चने की अपनी फ़सल की बालियों को इस आग में भूनते हैं. देर रात तक होली के गीत गाए जाते हैं और लोग नाचकर अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं.
होली के अगले दिन को फाग, दुलहंदी और धूलिवंदन आदि नामों से पुकारा जाता है. हर राज्य में इस दिन को अलग नाम से जाना जाता है. बिहार में होली को फगुआ या फागुन पूर्णिमा कहते हैं. फगु का मतलब होता है, लाल रंग और पूरा चांद. पूर्णिमा का चांद पूरा ही होता है. हरित प्रदेश हरियाणा में इसे धुलैंडी कहा जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पल्लू में ईंट आदि बांधकर अपने देवरों को पीटती हैं. यह सब हंसी-मज़ाक़ का ही एक हिस्सा होता है. महाराष्ट्र में होली को रंगपंचमी और शिमगो के नाम से जाना जाता है. यहां के आम बाशिंदे जहां रंग खेलकर होली मनाते हैं, वहीं मछुआरे नाच के कार्यक्रमों का आयोजन कर शिमगो मनाते हैं. पश्चिम बंगाल में होली को दोल जात्रा के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा की मूर्तियों का मनोहारी श्रृंगार कर शोभा यात्रा निकाली जाती है. शोभा यात्रा में शामिल लोग नाचते-गाते और रंग उड़ाते चलते हैं. तमिलनाडु में होली को कामान पंडिगई के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन कामदेव की पूजा की जाती है. किवदंती है कि शिवजी के क्रोध के कारण कामदेव जलकर भस्म हो गए थे और उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर उन्हें दोबारा जीवनदान मिला.
इस दिन सुबह से ही लोग रंगों से खेलना शुरू कर देते हैं. बच्चे-बड़े सब अपनी-अपनी टोलियां बनाकर निकल पड़ते हैं. ये टोलियां नाचते-गाते रंग उड़ाते चलती हैं. रास्ते जो मिल जाए, उसे रंग से सराबोर कर दिया जाता है. महिलाएं भी अपने आस पड़ोस की महिलाओं के साथ इस दिन का भरपूर लुत्फ़ उठाती हैं. इस दिन दही की मटकियां ऊंचाई पर लटका दी जाती हैं और मटकी तोड़ने वाले को आकर्षक इनाम दिया जाता है. इसलिए युवक इसमें बढ़-चढ़कर शिरकत करते हैं.
रंग का यह कार्यक्रम सिर्फ़ दोपहर तक ही चलता है. रंग खेलने के बाद लोग नहाते हैं और भोजन आदि के बाद कुछ देर विश्राम करने के बाद शाम को फिर से निकल पड़ते हैं. मगर अब कार्यक्रम होता है, गाने-बजाने का और प्रीति भोज का. अब तो होली से पहले ही स्कूल, कॊलेजों व अन्य संस्थानों में होली के उपलक्ष्य में समारोहों का आयोजन किया जाता है. होली के दिन घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें खीर, पूरी और गुझिया शामिल है. गुझिया होली का ख़ास पकवान है. पेय में ठंडाई और भांग का विशेष स्थान है.
होली एक ऐसा त्योहार है, जिसने मुग़ल शासकों को भी प्रभावित किया. अकबर और जहांगीर भी होली खेलते थे. शाहजहां के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी और आब-ए-पाशी के नाम से पुकारा जाता था. पानी की बौछार को आब-ए-पाशी कहते हैं. आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी होली मनाते थे. इस दिन मंत्री बादशाह को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं देते थे. पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक सफ़रनामे मे होली का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया है. हिन्दू साहित्यकारों ही नहीं मुस्लिम सूफ़ियों ने भी होली को लेकर अनेक कालजयी रचनाएं रची हैं. अमीर ख़ुसरो साहब कहते हैं-
मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब ऐ इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरबी रख ले
आन परी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे...
होली के दिन कुछ लोग पक्के रंगों का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसके कारण जहां उसे हटाने में कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है, वहीं इससे एलर्जी होने का ख़तरा भी बना रहता है. हम और हमारे सभी परिचित हर्बल रंगों से ही होली खेलते हैं. इन चटक़ रंगों में गुलाबों की महक भी शामिल होती है. इन दिनों पलाश खिले हैं. इस बार भी इनके फूलों के रंग से ही होली खेलने का मन है.


डॊ. सौरभ मालवीय
फागुन आते ही चहुंओर होली के रंग दिखाई देने लगते हैं. जगह-जगह होली मिलन समारोहों का आयोजन होने लगता है. होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं.  विदेशी लोग भी होली खेलते हैं. सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

पुरातन धार्मिक पुस्तकों में होली का वर्णन अनेक मिलता है. नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख है. विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी होली का उल्लेख किया गया है. होली के पर्व को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु भक्त प्रह्लाद की है. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को भगवान मानने लगा था.  उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई भगवान का नाम लेता, उसे दंडित किया जाता था. हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था. प्रह्लाद की प्रभु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भक्ति के मार्ग का त्याग नहीं किया. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि कुंड में बैठे. अग्नि कुंड में बैठने पर होलिका तो जल गई, परंतु प्रह्लाद बच गया. भक्त प्रह्लाद की स्मृति में इस दिन होली जलाई जाती है. इसके अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी संबंधित है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इससे प्रसन्न होकर गोपियों और ग्वालों ने रंग खेला था.

देश में होली का पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. ब्रज की होली मुख्य आकर्षण का केंद्र है. बरसाने की लठमार होली भी प्रसिद्ध है. इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं. मथुरा का प्रसिद्ध 40 दिवसीय होली उत्सव वसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है. श्री राधा रानी को गुलाल अर्पित कर होली उत्सव शुरू करने की अनुमति मांगी जाती है. इसी के साथ ही पूरे ब्रज पर फाग का रंग छाने लगता है. वृंदावन के शाहजी मंदिर में प्रसिद्ध वसंती कमरे में श्रीजी के दर्शन किए जाते हैं. यह कमरा वर्ष में केवल दो दिन के लिए खुलता है. मथुरा के अलावा बरसाना, नंदगांव, वृंदावन आदि सभी मंदिरों में भगवान और भक्त पीले रंग में रंग जाते हैं. ब्रह्मर्षि दुर्वासा की पूजा की जाती है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी वसंत पंचमी से ही लोग होली खेलना प्रारंभ कर देते हैं. कुल्लू के रघुनाथपुर मंदिर में सबसे पहले वसंत पंचमी के दिन भगवान रघुनाथ पर गुलाल चढ़ाया जाता है, फिर भक्तों की होली शुरू हो जाती है. लोगों का मानना है कि रामायण काल में हनुमान ने इसी स्थान पर भरत से भेंट की थी. कुमाऊं में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं. बिहार का फगुआ प्रसिद्ध है. हरियाणा की धुलंडी में भाभी पल्लू में ईंटें बांधकर देवरों को मारती हैं. पश्चिम बंगाल में दोल जात्रा निकाली जाती है. यह पर्व चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. शोभायात्रा निकाली जाती है. महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेला जाता है. गोवा के शिमगो में शोभा यात्रा निकलती है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्ख शक्ति प्रदर्शन करते हैं. तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंत का उत्सव है. मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है, जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है. दक्षिण गुजरात के आदिवासी भी धूमधाम से होली मनाते हैं. छत्तीसगढ़ में लोक गीतों के साथ होली मनाई जाती है.  मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी भगोरिया मनाते हैं. भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी होली मनाई जाती है.

होली सदैव ही साहित्यकारों का प्रिय पर्व रहा है. प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली का उल्लेख मिलता है. श्रीमद्भागवत महापुराण में रास का वर्णन है. अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है. इनमें हर्ष की प्रियदर्शिका एवं रत्नावली और कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् सम्मिलित हैं. भारवि एवं माघ सहित अन्य कई संस्कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में वसंत एवं रंगों का वर्णन किया है. चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का उल्लेख है. भक्तिकाल तथा रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली विशिष्ट उल्लेख मिलता है. आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि कवियों ने होली को विशेष महत्व दिया है. प्रसिद्ध कृष्ण भक्त महाकवि सूरदास ने वसंत एवं होली पर अनेक पद रचे हैं. भारतीय सिनेमा ने भी होली को मनोहारी रूप में पेश किया है. अनेक फिल्मों में होली के कर्णप्रिय गीत हैं.

होली आपसी ईर्ष्या-द्वेष भावना को बुलाकर संबंधों को मधुर बनाने का पर्व है, परंतु देखने में आता है कि इस दिन बहुत से लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, लड़ाई-झगड़े करते हैं. रंगों की जगह एक-दूसरे में कीचड़ डालते हैं. काले-नीले पक्के रंग एक-दूसरे पर फेंकते हैं. ये रंग कई दिन तक नहीं उतरते. रसायन युक्त इन रंगों के कारण अकसर लोगों को त्वचा संबंधी रोग भी हो जाते हैं. इससे आपसी कटुता बढ़ती है. होली प्रेम का पर्व है, इसे इस प्रेमभाव के साथ ही मनाना चाहिए. पर्व का अर्थ रंग लगाना या हुड़दंग करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ आपसी द्वेषभाव को भुलाकर भाईचारे को बढ़ावा देना है. होली खुशियों का पर्व है, इसे शोक में न बदलें.

सिराज केसर
फाल्गुन आते ही फाल्गुनी हवा मौसम के बदलने का अहसास करा देती है। कंपकपाती ठंड से राहत लेकर आने वाला फाल्गुन मास लोगों के बीच एक नया सुख का अहसास कराता है। फाल्गुन मास से शुरू होने वाली बसंत ऋतु किसानों के खेतों में नई फसलों की सौगात देता है। पतझड़ के बाद धरती के चारों तरफ हरियाली की एक नई चुनरी ओढ़ा देता है बसंत, हर छोटे–बड़े पौधों में फूल खिला देता है बसंत, ऐसा लगता है एक नये सृजन की तैयारी लेकर आता है बसंत। ऐसे में हर कोई बसंत में अपनी जिंदगी में भी हँसी, खुशी और नयापन भर लेना चाहता हैं। इसी माहौल को भारतीय चित्त ने एक त्योहार का नाम दिया होली। जैसे बसंत प्रकृति के हर रूप में रंग बिखेर देता है। ऐसे ही होली मानव के तन-मन में रंग बिखेर देती है। जीवन को नये उल्लास से भर देती है।

होली नई फसलों का त्योहार है, प्रकृति के रंगो में सराबोर होने का त्योहार है। मूलतः होली का त्योहार प्रकृति का पर्व है। इस पर्व को भक्ति और भावना से इसीलिए जोड़ा जाता है कि ताकि प्रकृति के इस रूप से आदमी जुड़े और उसके अमूल्य धरोहरों को समझे जिनसे ही आदमी का जीवन है।

होली के इस अवसर पर, होली के दिन दिल पर पत्थर रखकर हमें दुखी मन से पानी बचाने की अपील करनी पड़ रही है। पानी की कमी से रंगो की होली की जगह खून की होली होना आये दिन सुनने और पढ़ने को मिल रही है पिछले एक साल के अंदर मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में दर्जनों लोगों की मौत पानी के कारण हुए झगड़ों में हुई। संभ्रात शहरियों ने अपने झील, तालाब को निगल डाले हैं। तालाबों को लील चुकीं ये बड़ी इमारतें बेहिसाब धरती की कोख का पानी खाली कर रही हैं। अंधाधुंध दोहन से पीने के पानी में आर्सेनिक, युरेनियम, फ्लोराइड तमाम तरह के जहर पानी जैसे अमृत तत्व में घुल चुके हैं। भावी भविष्य के समाज के जीवन में पानी का हम कौन सा रंग भरना चाहते हैं। क्या हमको यह हिसाब लगाने की जरूरत नहीं है। होली के नाम पर जल स्रोतों में सैंकड़ो टन जहरीले केमिकल हम डाल देंगें। क्या यह उन लोगों के साथ जो खरीद कर पानी नहीं पी सकते अत्याचार नहीं है। बेहिसाब पानी की बर्बादी प्रकृति के अमूल्य धरोहरों की बर्बादी हैं। सत्य यही है कि पंच तत्वों से बनी मानव जाति यदि पानी खो देगी तो अपना अस्तित्व भी खो देगी।

प्रतिदिन हम बगैर सोचे-समझे पानी का उपयोग और उपभोग करते जाते हैं। यह एक अवसर है कि हम अपने भीतर झाँकें और अपना अन्तर्मन टटोलें कि रंगों के इस शानदार त्योहार पर हम पानी की बर्बादी न करें…

बिना पानी के एक दिन गुज़ारने की कल्पना करें तो हम काँप उठेंगे। इस होली पर अपने जीवन में रंगों को उतारें जरूर, लेकिन साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि हमारे आसपास की दुनिया में जलसंकट तेजी से पैर पसार रहा है। इसलिये त्योहार की मौजमस्ती में हम कुछ बातें याद रखें ताकि प्रकृति की इस अनमोल देन को अधिक से अधिक बचा सकें…

होली पर पानी बचाने हेतु कुछ नुस्खे…
• होली खेलने के लिये आवश्यकतानुसार पानी की एक निश्चित मात्रा तय कर लें, उतना पानी स्टोर कर लें फ़िर सिर्फ़ और सिर्फ़ उतने ही पानी से होली खेलें, अधिक पानी खर्च करने के लालच में न पड़ें…

• सूखे रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करें।
• सम्भव हो तो प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें, क्योंकि वे आसानी से साफ़ भी हो जाते हैं।
• गुब्बारों में पानी भरकर होली खेलने से बचें।
• जब होली खेलना पूरा हो जाये तभी नहाने जायें, बार-बार नहाने अथवा हाथ-मुँह धोने से पानी का अपव्यय होता है।

होली खेलने के दौरान पानी की बचत के टिप्स
• किसी अलग जगह अथवा किसी बगीचे में होली खेलें, पूरे घर में होली खेलने से घर गन्दा होगा तथा उसे धोने में अतिरिक्त पानी खर्च होगा।
• पुराने और गहरे रंगों वाले कपड़े पहनें ताकि बाद इन्हें आसानी से धोया जा सकता है।
• होली खेलने से पहले अपने बालों में तेल लगा लें, यह एक तरह से बचाव परत के रूप में काम करता है। इसकी वजह से चाहे जितना भी रंग बालों में लगा हो एक ही बार धोने पर निकल जाता है।
• इसी तरह अपनी त्वचा पर भी कोई क्रीम या लोशन लगाकर बाहर निकलें, इससे आपकी त्वचा रूखेपन और अत्यधिक बुरे रासायनिक रंगों के इस्तेमाल की वजह से खराब नहीं होगी।
• अपने नाखूनों पर भी नेलपॉलिश अवश्य कर लें ताकि रंगों और पानी से वे खराब होने से बचें और होली खेलने के बाद भी अपने पहले जैसे स्वरूप में रहें।
• मान लें कि आप बालों में तेल और त्वचा पर क्रीम लगाना भूल भी गये हों तो होली खेलने के तुरन्त बाद शावर अथवा पानी से नहाना न शुरु करें, बल्कि रंग लगी त्वचा और बालों पर थोड़ा नारियल तेल हल्के-हल्के मलें, रंग निकलना शुरु हो जायेंगे और फ़िर कम से कम पानी में ही आपका काम हो जायेगा।
• यदि आप घर के अन्दर अथवा छत पर होली खेल रहे हों, तो कोशिश करें कि फ़र्श पर एक तारपोलीन की शीट बिछा लें, जब होली के रंग का काम समाप्त हो जाये तो वह तारपोलीन आसानी से कम पानी में धोया जा सकता है, जबकि फ़र्श अथवा छत के रंग छुड़ाने में अधिक पानी और डिटर्जेण्ट लगेगा।

पानी के कम से कम उपयोग द्वारा घर की सफ़ाई हेतु टिप्स -
दिन भर होली खेलने के बाद घर-आँगन और छत की धुलाई एक बड़ा काम होता है, लेकिन हमें इस काम में कम से कम पानी का उपयोग करना चाहिये। इस हेतु निम्न सुझाव हैं -

1. दो बाल्टी पानी भर लें, एक बाल्टी में साबुन / डिटर्जेण्ट का पानी लें और दूसरी में सादा-साफ़ पानी लें।
2. दो स्पंज़ के बड़े-बड़े टुकड़े लें।
3. फ़र्श अथवा घर के जिस हिस्से में सबसे अधिक रंग लगे हों वहाँ साबुन के पानी वाले स्पंज से धीरे-धीरे साफ़ करें।
4. इसके बाद साफ़ पानी वाले स्पंज से उस जगह को साफ़ कर लें।
5. सबसे अन्त में एक बार साफ़ पानी से उस जगह को धो लें।
6. सबसे अन्त में सूखे कपड़े अथवा वाइपर से जगह को सुखा लें।

इस विधि से पानी की काफ़ी बचत होगी ही साथ ही रंग साफ़ करने में मेहनत भी कम लगेगी। अधिक गहरे रंगों को साफ़ करने के लिये वॉशिंग सोडा भी उपयोग करें यह अधिक प्रभावशाली होता है, लेकिन इसका उपयोग बहुत कम मात्रा में होना चाहिये वरना अधिक झाग की वजह से पानी अधिक भी लग सकता है। यह करते समय दस्ताने अथवा प्लास्टिक या रबर हाथों में पहनना न भूलें, क्योंकि सोडा अथवा साबुन के लिक्विड आदि हाथों की त्वचा के लिये खतरनाक हो सकते हैं।

पर्यावरण बचाने में सहयोग करें -
यह संयोग ही है कि मार्च के महीने में ही होली और विश्व जल दिवस एक साथ आ रहे हैं। समूचे विश्व और भारत के बढ़ते जलसंकट के मद्देनज़र हमें पानी बचाने के लिये एक साथ मिलकर काम करना चाहिये और होली जैसे अवसर पर पानी की बर्बादी रोकना चाहिये। इस धरती पर लगभग 6 अरब की आबादी में से एक अरब लोगों के पास पीने को भी पानी नहीं है। जब मनुष्य इतनी बड़ी आपदा से जूझ रहा हो ऐसे में हमें अपने त्योहारों को मनाते वक्त संवेदनशीलता दिखानी चाहिये। इस होली पर जितना सम्भव हो अधिक से अधिक पानी बचाने का संकल्प लें…


नज़्म
मेरे महबूब !
मैं हर रोज़
पढ़ती हूं
अल्लाह के निन्यानवे नाम
और
फिर पढ़ती हूं
अल्लाह के नबी
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
के निन्यानवे नाम
और
इन सब नामों में
ढूंढा करती हूं तुम्हारा नाम...
जान !
मुझे कहीं भी
तुम्हारा नाम नहीं मिलता
लेकिन
हर नाम में
तुम ही नज़र आते हो...
-फ़िरदौस ख़ान

नई दिल्ली. 1 मार्च से बैंकों ने कैश ट्रांजेक्शन पर बड़े चार्ज लगाने का ऐलान कर दिया है जिसके बाद जाहिर तौर पर आपकी चिंताएं बढ़ गई होंगी. बैंकों ने अब नकद लेनदेन (जमा-कैश निकालने) पर कई तरह का चार्ज लगा दिए हैं. लेकिन अगर आप यहां बताई बातों पर अमल करेंगे तो आपको कोई चार्ज नहीं देना पड़ेगा जानें किस तरह आप कैश ट्रांजेक्शन करने के बावजूद पैसे बचा सकते हैं.
ट्रांजेक्शन चार्ज से बचने के उपाय 
नए नियमों के मुताबिक बैंक की शाखा और एटीएम से मिलाकर 1 महीने में 9-10 लेनदेन मुफ्त होते हैं. 5 बार एटीएम से और और 4 बार बैंकों में पैसे निकालने पर आपको कोई चार्ज नहीं लगेगा. तो कुल मिलाकर 9 बार के कैश ट्रांजेक्शन आप फ्री कर सकते हैं और ये काफी हैं. बैंकों ने भी यही दलील दी है कि सामान्य सेविंग्स अकाउंट में इससे ज्यादा लेन-देन नहीं होता. लिहाजा ट्रांजैक्शन फीस से बड़ी तादाद में लोग प्रभावित नहीं होंगे.इसके लिए सबसे बड़ा सुझाव तो ये भी है कि आप कैश में ट्रांजेक्शन करने से बचें और ज्यादातर ऑनलाइन पैसे भेजें या प्राप्त करें. अगर आपको कैश में काम करने की आदत ज्यादा है भी तो भी एक महीने में 5 बार से ज्यादा एटीएम से पैसे ना निकालें. हर बार थोड़ा-थोड़ा कैश निकालने से बेहतर है आप एक बार में ज्यादा कैश निकालें और उसका इस्तेमाल करें.सरकार ने भीम एप और यूपीआई के जरिए ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए डिजी स्कीम भी लॉन्च की हुई है तो इसके जरिए फ्री में ट्रांजेक्शन भी करें और ईनाम भी जीतें. अब तक हजारों लोग करोड़ रुपये के कैश ईनाम डिजी स्कीम के जरिए जीत चुके हैं. तो आप ऑनलाइन लेनदेन करते हैं तो पेटीएम, फ्रीचार्ज से हटकर सोचें और सरकारी ऑनलाइन पेमेंट सर्विसेज का इस्तेमाल करें.4 ट्रांजेक्शन के बाद 150 रुपये का चार्ज सिर्फ निजी बैंकों ने तय किया है. सरकारी बैंकों में सिर्फ एसबीआई ने ऐसी घोषणा की है और बाकी बैंकों में अभी भी पहले के ही नियम लागू हैं और को-ऑपरेटिव बैंकों में भी आपको फ्री ही कैश जमा करने और निकालने की सुविधा पहले की तरह बदस्तूर मिल रही है तो इन बैंकों में आपके खाते हैं तो उनका ज्यादा इस्तेमाल करें. जानें अलग-अलग बैंकों किस तरह के चार्ज वसूल रहे हैं?
आईसीआईसीआई बैंक के चार्ज
आईसीआईसीआई बैंक में एक एक महीने में पहले चार लेन-देन के लिए कोई शुल्क नहीं लगेगा. उसके बाद प्रति 1,000 रुपये पर 5 रुपये का शुल्क लगाया जाएगा. यह समान महीने के लिए न्यूनतम 150 रुपये होगा. थर्ड पार्टी ट्रांजैक्शन के मामले में सीमा 50,000 रुपये प्रतिदिन होगी. होम ब्रांच के अलावा अन्य शाखाओं के मामले में आईसीआईसीआई बैंक एक महीने में पहली नकद निकासी के लिए कोई शुल्क नहीं लेगा. लेकिन उसके बाद प्रति 1,000 रुपये पर 5 रुपये का शुल्क लेगा. इसके लिए न्यूनतम शुल्क 150 रुपये रखा गया है.
एचडीएफ़सी बैंक के चार्ज
एचडीएफसी बैंक से 4 बार से ज्यादा कैश निकालने पर 150 रुपए फीस अदा करनी होगी. बैंक ने होम ब्रांचेज में भी फ्री कैश ट्रांजैक्शन 2 लाख रुपये की लिमिट लगा दी है. इसके ऊपर कस्टमर्स को न्यूनतम 150 रुपये या 5 रुपये प्रति 1000 रुपये का पेमेंट करना होगा. नॉन-होम ब्रांचेज में मुफ्त लेन-देन 25,000 रुपये है. उसके बाद चार्ज उसी स्तर पर लागू होगा. हालांकि बुजुर्गों और बच्चों के खातों पर किसी तरह का चार्ज नहीं लगाया है और इनमें जमा पर भी कोई चार्ज नहीं लगेगा. कोई दूसरा व्यक्ति यदि आपके खाते में नगद जमा कराना चाहे या निकालना चाहे तो उसके लिए 25 हजार रुपये की सीमा है और वो भी कम से कम 150 रुपये की फीस के साथ
एक्सिस बैंक के चार्ज
कस्टमर्स को हर महीने 5 ट्रांजैक्शन्स फ्री दिए गए हैं. इसके बाद छठे लेनदेन पर कम से कम 95 रुपए प्रति लेनदेन की दर से चार्ज लगाया जाएगा. नॉन-होम ब्रांच के 5 ट्रांजैक्शन फ्री हैं. बैंक ने एक दिन में कैश जमा करने की सीमा 50,000 रुपये फिक्स की है और इससे ज्यादा के डिपॉजिट पर या 6ठें ट्रांजेक्शन पर हरेक 1000 रुपये पर 2.50 रुपये की दर से या प्रति ट्रांजैक्शन 95 रुपये में से जो भी ज्यादा होगा, चार्ज लिया जाएगा.
एसबीआई के चार्ज
सबसे बड़ा सरकारी बैंकएसबीआई भी एक महीने में 3 बार से ज्यादा कैश ट्रांजेक्शन पर सर्विस चार्ज वसूलेगी. साथ ही बैंक ने तय किया है कि वह व्यावसायिक प्रतिनिधि और पीओएस से नकदी निकालने पर निर्धारित सीमा के बाद चार्ज लेगा. होम ब्रांच के सेविंग खाते के एटीएम से ग्राहक महीने में 3 बार ही कैश ट्रांजेक्शन फ्री कर पाएंगे. इससे ऊपर के हर ट्रांजेक्शन पर 50 रुपये सर्विस चार्ज लगेगा.
सरकारी बैंकों में अभी भी नहीं है कोई चार्ज
दो प्रमुख सरकारी बैंक पंजाब नेशनल बैंक और बैंक  ऑफ बड़ौदा के अधिकारियों ने साफ किया है कि उनके यहां नगद लेन-देन पर कोई ट्रांजैक्शन फीस नही है. कोई भी बैंक जितना चाहे, जितनी बार चाहे, नगद जमा करा सकता है. 13 मार्च से पैसा निकालने पर कोई पाबंदी नही रहेगी. वहीं केनरा बैंक ने भी कहा है कि वह अपने कस्टमर्स से किसी तरह का चार्ज नहीं वसूलेगा. तो आप चाहें तो इन बैंकों में फभी सेविंग खाता है तो इनका इस्तेमाल कर सकते हैं या नया खाता भी खुलवा सकते हैं.

बैंकों का कहना है कि देश में लेसकैश को बढ़ाने यानी नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए ही नियम बनाए हैं और कि ट्रांजैक्शन फीस का नोटबंदी से कोई लेन-देना नहीं है, ये पहले से ही लागू हैं. सरकार का मानना है कि एटीएम से नकदी निकासी की लागत प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि लोगों को नकदी में लेनदेन की इनबिल्ट कॉस्ट यानी लागत नहीं पता चलती है और कैश में लेनदेन करते रहते हैं जिससे बैंकिंग सिस्टम की भी लागत बढ़ती है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने एडीशनल ट्रांजेक्‍शन करने के तौर पर 20 रुपये प्‍लस टैक्‍स को सभी सेंट्रल बैंकों पर लागू किया गया। जिससे कि उनकी सीमा को बढ़ाया जा सके.

फ़िरदौस ख़ान
फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के वह शायर हैं, जो जंगे-आज़ादी से लेकर प्रगतिशील आंदोलन तक से जुडे रहे. उनकी ज़ाती ज़िंदगी बेहद कड़वाहटों से भरी हुई थी, इसके बावजूद उन्होंने अपने कलाम को इश्क़ के रंगों से सजाया. वह कहते हैं-
तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ
इस एक चिराग़ से कितने चिराग़ जल उठे फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनका असली नाम रघुपति सहाय था, लेकिन उन्होंने फ़िराक़ गोरखपुरी नाम से लेखन किया. उन्होंने एमए किया और आईसीएस में चुने गए. 1920 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी स्वराज आंदोलन में शामिल हो गए. वह डेढ़ साल तक जेल में भी रहे और यहां से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू के कहने पर अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ़्तर में अवर सचिव बना दिए गए. नेहरू के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और 1930 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बन गए. उन्होंने 1959 तक यहां अध्यापन कार्य किया.

फ़िराक़ गोरखपुरी को 1968 में पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से नवाज़ा गया. अगले साल 1969 में उन्हें साहित्य का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया. फिर 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी का मनोनीत सदस्य नियुक्त किया गया. 1981 में उन्हें ग़ालिब अकादमी अवॉर्ड दिया गया. उनकी प्रमुख कृतियों में गुले-नग़मा, गुले-राना, मशाल, रूहे-कायनात, रूप, शबिस्तां, सरगम, बज़्मे-ज़िंदगी रंगे-शायरी, धरती की करवट, गुलबाग़, रम्ज़ कायनात, चिराग़ां, शोला व साज़, हज़ार दास्तान, और उर्दू की इश्क़िया शायरी शामिल हैं. उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियां भी लिखीं. उनकी उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुईं.

आम तौर पर ख़्याल किया जाता है कि फ़नकार को ऐसी बुनियाद और कमज़ोर हालात से बेनियाज़ होना चाहिए. ग़ालिब ज़िंदगी भर परेशान रहे, अपनी बीवी की शिकायत करते रहे. अपनी तमाम मुस्कराहटों के साथ जीवन पद्धति निभाते रहे. इसलिए मुश्किलें आसान लगने लगीं. मंटों ने तो हंस-हंस कर जीना सीखा था. ज़िंदगी की सारी तल्ख़ियां अपनी हंसी में पी गया और भी अच्छे फ़नकारों ने कुछ ऐसे ही जिया होगा.

29 जून, 1914 को उनका विवाह ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी हुआ, लेकिन वह पत्नी को पसंद नहीं करते थे. इसका उनकी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ा. बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी, एक साहब ने मेरी शादी एक ऐसे ख़ानदान और एक ऐसी लड़की से कर दी कि मेरी ज़िंदगी एक नाक़ाबिले-बर्दाश्त अज़ाब बन गई. पूरे एक साल तक मुझे नींद न आई. उम्र भर मैं इस मुसीबत को भूल नहीं सका. आज तक मैं इस बात के लिए तरस गया कि मैं किसी को अपना कहूं ओर कोई मुझे अपना समझे.

फ़िराक़ के इश्क़ और मोहब्बत के चर्चे आम रहे. वह इस क़िस्म की शौहरत चाहते भी थे. कभी-कभी ख़ुद भी क़िस्सा बना लिया करते थे, ताकि ज़माना उन्हें एक आदर्श आशिक़ समझे. वह ख़ुद लिखते हैं-इन तकली़फ़देह और दुख भरे हालात में मैंने शायरी की ओर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी आवाज़ को पाने लगा. अब जब शायरी शुरू की तो मेरी कोशिश यह हुई कि अपनी नाकामियों और आने ज़ख्मी ख़ुलूस के लिए अशआर के मरहम तैयार करूं. मेरी ज़िंदगी जितनी तल्ख़ हो चुकी थी, उतने ही पुरसुकून और हयात अफ़ज़ा अशआर कहना चाहता था. फ़िराक़ का ख़्याल है कि इस उलझन, द्वंद्व और टकराव से बाहर निकलने में सिर्फ़ एक भावना काम करती है और वह है इश्क़.

इश्क़ अपनी राह ले तो दिल क्या पूरी दुनिया जीत सकता है, बस इन दर्जों और हालात के ज्ञान की ज़रूरत हुआ करती है. फ़िराक़ का इश्क़, इस दर्जे का इश्क़ न सही जहां ख़ुदा और बंदे का फ़र्क़ उठ जाया करता है. फ़िराक़ का वह रास्ता न था. वह भक्ति और ईश्वर प्रेम की दुनिया के आदमी न थे. वह शमा में जलकर भस्म हो जाने पर यक़ीन भी नहीं रखते थे, बल्कि वह उस दुनिया के आशिक़ थे, जहां इंसान बसते हैं और उनका ख़्याल है कि इंसान का इंसान से इश्क़ ज़िंदगी और दुनिया से इश्क़ की बुनियाद जिंस (शारीरिक संबंध) है. किसी से जुनून की हद तक प्यार, ऐसा प्यार जो हड्डी तक को पिघला दे, जो दिलो-दिमाग़ में सितारों की चमक, जलन और पिघलन भर दे. फिर कोई भी फ़लसफ़ा हो, फ़लसफ़ा-ए-इश्क़ से आगे उसकी चमक हल्की रहती है. हर फ़लसफ़ा इसी परिपेक्ष्य, इसी पृष्ठभूमि को तलाश करता रहता है. फ़िराक़ ने जब होश व हवास की आंखें खोलीं दाग़ और अमीर मीनाई का चिराग़ गुल हो रहा था. स़िर्फ उर्दू शायरी में ही नहीं, पूरी दुनिया में एक नई बिसात बिछ रही थी. क़ौमी ज़िंदगी एक नए रंग रूप से दो चार थी. समाजवाद का बोलबाला था. वह समाजवाद से प्रभावित हुए. प्रगतिशील आंदोलन से जु़डे. वह स्वीकार करते हैं इश्तेराकी फ़लसफ़े ने मेरे इश्क़िया शायरी और मेरी इश्क़िया शायरी को नई वुस्अतें (विस्तार) और नई मानवियत (अर्थ) अता की.
अब उनकी शायरी में बदलाव देखने को मिला. बानगी देखिए-

तेरा फ़िराक़ तो उस दम तेरा फ़िराक़ हुआ
जब उनको प्यार किया मैंने जिनसे प्यार नहीं

फ़िराक़ एक हुए जाते हैं ज़मानों मकां
तलाशे दोस्त में मैं भी कहां निकल आया

तुझी से रौनक़े-बज़्मे-हयात है ऐ दोस्त
तुझी से अंजुमने-महर व माह है रौशन

ज़िदगी को भी मुंह दिखाना है
रो चुके तेरे बेक़रार बहुत

हासिले हुस्नो-इश्क़ बस है यही
आदमी आदमी को पहचाने

इस दश्त को नग़मों से गुलज़ार बना जाएं
जिस राह से हम गुज़रें कुछ फूल खिला जाएं

अजब क्या कुछ दिनों के बाद ये दुनिया भी दुनिया हो
ये क्या कम है मुहब्बत को मुहब्बत कर दिया मैंने

क्या है सैर गहे ज़िंदगी में रुख़ जिस सिम्त
तेरे ख़्याल टकरा के रह गया हूं मैं

फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे- शायरी उस हैजान (अशांति) का नाम है, जिसमें सुकून के सिफ़ात (विशेषता) पाए जाएं. सुकून से उनका मतलब रक़्स की हरकतों में संगीत के उतार-च़ढाव से है.उनके कुछ अशआर देखिए-
रफ़्ता-रफ़्ता इश्क़ मानूसे-जहां होता गया
ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम

मेहरबानी को मुहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह अब मुझसे तेरी रंजिशें बेजा भी नहीं

बहुत दिनों में मुहब्बत को यह हुआ मालूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वह रात, रात हुई

इश्क़ की आग है वह आतिशे-सोज़ फ़िराक़
कि जला भी न सकूं और बुझा भी न सकूं

मुहब्बत ही नहीं जिसमें वह क्या दरसे-अमल देगा
मुहब्बत तर्क कर देना भी आशिक़ ही को आता है

एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

तेरी निगाहों से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया है रगे जां में नश्तर फिर भी

फ़िराक़ गोरखपुरी का देहांत 3 मार्च, 1982 को नई दिल्ली में हुआ. बेशक वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जनमानस को अपनी शायरी के ज़रिये ज़िंदगी की दुश्वारियों में भी मुस्कुराते रहने का जो पैग़ाम दिया, वह हमेशा मायूस लोगों की रहनुमाई करता रहेगा. बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी-
अब तुमसे रुख़्सत होता हू, आओ संभालो साज़े-ग़ज़ल
नये तराने छेड़ो, मेरे नग़मों को नींद आती है...
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)


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