फ़िरदौस ख़ान
बिहार के किशनगंज ज़िले के टप्पू नामक अति पिछड़े ग़ांव में स्थित मिल्ली गर्ल्स स्कूल साम्प्रदायिक सद्भावना की एक ज़िंदा मिसाल है। दिल्ली की ऑल इंडिया तालिमी वा मिल्ली फ़ाउंडेशन द्वारा स्थापित इस स्कूल के निर्माण में मुसलमान ही नहीं, हिन्दुओं की भी अहम भूमिका रही। दिलचस्प बात यह है कि स्कूल के लिए फ़ाउंडेशन को एक इंच भी ज़मीन ख़रीदनी नहीं पड़ी। ग़ांव के बाशिंदे अब्दुल हफ़ीज़, मेरातुल हक़, गुलतनलाल पंडित, मास्टर सुखदेव और मुखिया किशनलाल दास ने फ़ाउंडेशन को यह भूमि दान में दी। क़रीब 35 लाख रुपए से साढ़े तीन एकड़ में बने इस स्कूल में खेल का मैदान भी है। स्कूल की इमारत के समीप ही दो मंज़िला हॉस्टल और स्टाफ क्वार्टर भी बनाए गए हैं।

आठ दिसंबर 2002 को इस स्कूल की विधिवत् शुरुआत की गई। उस समय स्कूल में केवल 35 छात्राएं थीं, लेकिन अब इनकी तादाद बढ़कर 355 हो गई है। स्कूल में हिन्दू लडक़ियां भी पढ़ रही हैं। दूर-दराज के इलाकों से यहां आकर शिक्षा ग्रहण करने वाली 160 छात्राएं हॉस्टल में रहती हैं जिनमें नौ हिन्दू लडक़ियां शामिल हैं। सीबीएससी से मान्यता प्राप्त सातवीं कक्षा तक के इस स्कूल का उद्देश्य गरीब लड़कियों को शिक्षित करना है। इसलिए हर छात्रा से ट्यूशन फीस के मात्र एक सौ रुपए लिए जाते हैं और हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं से सात सौ रुपए लिए जाते हैं। जिनके अभिभावक यह फीस देने में समर्थ नहीं होते उन लडक़ियों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। इस समय स्कूल में 109 ऐसी छात्राएं हैं, जिनसे फीस नहीं ली जाती। स्कूल में लडक़ियों के स्वास्थ्य का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। नाश्ते और भोजन में पौष्टिक तत्वों से भरपूर व्यंजन दिए जाते हैं। हफ्ते में एक दिन मांसाहारी भोजन परोसा जाता है जिसमें अंडा, मछली, चिकन और मटन शामिल है। चूंकि हॉस्टल में हिन्दू लडक़ियां भी रहती हैं, इसलिए 'बड़े' का मीट यहां वर्जित है। स्कूल में शिक्षा के साथ सांस्कृतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया जाता है।

दिल्ली की संस्था ने स्कूल बनाने के लिए आखिर इतनी दूर बिहार के किशनगंज ज़िले के टप्पू गांव को ही क्यों चुना? इसकी भी एक रोचक दास्तां है। फाउंडेशन के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद इसरारुल हक़ कासिमी बताते हैं कि 1996 में मुसलमानों में शिक्षा की हालत को लेकर एक सर्वे आया था जिसके मुताबिंक बिहार के मुसलमानों में शिक्षा का प्रतिशत बहुत कम था। सर्वे में कहा गया था कि किशनगंज ज़िले में मुसलमानों की आबादी क़रीब 65 फ़ीसदी है। एक बड़ा वोट बैंक होने के कारण अमूमन सभी सियासी दल यहां से मुसलमानों को ही अपना उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारते हैं।

नतीजतन, यहां से मुसलमान ही सांसद चुने जाते रहे हैं। इसके बावजूद यहां के मुसलमानों की हालत बेहद दयनीय है। रिपोर्ट के मुताबिक़ यहां केवल 37 फ़ीसदी मुसलमान ही शिक्षित थे। इनमें भी अधिकांश प्राइमरी स्तर तक ही शिक्षा हासिल करने वाले थे, जबकि दसवीं तक आते-आते यह आंकड़ा इकाई अंक तक नीचे आ गया। इनमें सबसे बुरी हालत महिलाओं की थी। यहां सिंर्फ 0.2 फ़ीसदी यानि एक फ़ीसद से भी कम महिलाएं साक्षर थीं। यहां महिलाओं में उच्च शिक्षा की कल्पना करना तो अमावस की रात में सूरज तलाशने जैसा था।

बस, इसी सर्वे की रिपोर्ट को पढक़र मौलाना साहब के ज़ेहन में किशनगंज के किसी गांव में ही स्कूल खोलने का विचार आया। मगर धन के अभाव में वे ऐसा नहीं कर पाए। वर्ष 2000 में उन्होंने ऑल इंडिया तालिमी वा मिल्ली फ़ाउंडेशन का गठन कर शिक्षा के क्षेत्र में काम शुरू किया। फ़ाउंडेशन को लोगों का भरपूर सहयोग मिला। फाउंडेशन ने जगह-जगह स्कूल खोले। इस समय बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में फ़ाउंडेशन 63 स्कूल चला रही है। उनकी योजना स्कूल को बारहवीं कक्षा तक करने की है। इसके अलावा शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े इलाकों में इसी तरह के तीन और स्कूल खोलने के प्रयास जारी हैं।

फ़ाउंडेशन की यह कोशिश अशिक्षा के अंधेरे में रौशनी की किरण बनकर फूटी है। इसी तरह ज्ञान के दीप जलते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इस इलाके से निरक्षरता का अभिशाप हमेशा के लिए मिट जाएगा और हर तरफ़ शिक्षा का उजाला होगा।

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