सभी संतों ने सिखलाया, प्रभु का नाम है जपना।
सुनहरे कल भी आयेंगे, दिखाते रोज एक सपना।
वतन आजाद वर्षों से बढ़ी जनता की बदहाली,
भले छत हो न हो सर पे, ये सारा देश है अपना।।

कोई सुनता नहीं मेरी, तो गाकर फिर सुनाऊं क्या?
सभी मदहोश अपने में, तमाशा कर दिखाऊं क्या?
बहुत पहले भगत ने कर दिखाया था जो संसद में,
ये सत्ता हो गयी बहरी, धमाका कर दिखाऊं क्या?

मचलना चाहता है मन, नहीं फिर भी मचल पाता।
जमाने की है जो हालत, कि मेरा दिल दहल जाता।
समन्दर डर गया है देखकर आंखों के ये आंसू,
कलम की स्याह धारा बनके, शब्दों में बदल जाता।।

लिखूं जन-गीत मैं प्रतिदिन, ये सांसें चल रहीं जबतक।
कठिन संकल्प है देखूं, निभा पाऊंगा मैं कबतक।
उपाधि और शोहरत की ललक में फंस गई कविता,
जिया हूं बेचकर श्रम को, कलम बेची नहीं अबतक।।

खुशी आते ही बाहों से, न जाने क्यों छिटक जाती?
मिलन की कल्पना भी क्यों, विरह बनकर सिमट जाती?
सभी सपने सदा शीशे के जैसे टूट जाते क्यों?
अजब है बेल कांटों की सुमन से क्यों लिपट जाती?
-श्यामल सुमन


(श्यामल सुमन टाटा स्टील, जमशेदपुर में प्रशासनिक पदाधिकारी हैं)

1 Responses to काव्य : कोई सुनता नहीं मेरी, तो गाकर फिर सुनाऊं क्या

  1. खुशी आते ही बाहों से, न जाने क्यों छिटक जाती?
    मिलन की कल्पना भी क्यों, विरह बनकर सिमट जाती?
    सभी सपने सदा शीशे के जैसे टूट जाते क्यों?
    अजब है बेल कांटों की सुमन से क्यों लिपट जाती?
    -

    -सुन्दर गीत!!

     

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22 रबी अल-अव्वल, हिजरी सन् 1431, 10 मार्च 2010 बुधवार. तिथि संवत : चैत्र कृष्ण दशमी, संवत् 2066, शाके- 1931, रवि उत्तरायने, वसंत ऋतु. सूर्योदय कालीन नक्षत्र : पूर्वाषाढ़ा अपराह्न् 4.12 तक, पश्चात उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, वरियान योग तथा विष्टि करण. ग्रह विचार : सूर्य, बुध, गुरु-कुंभ, शुक्र-मीन, केतु-मिथुन, मंगल-कर्क, शनि-कन्या तथा चंद्र, राहु-धनु में. चौघड़िया मुहूर्त : प्रात: 6.40 से 8.09 तक लाभ, प्रात: 08.09 से 9.39 तक अमृत, प्रात: 11.08 से 12.37 तक शुभ, अपराह्न् 3.35 से 5.04 तक चंचल, सायं 5.04 से 6.34 तक लाभ, रात्रि 9.35 से 11.06 तक अमृत. राहुकाल : दोपहर 12.37 से 2.06 तक. शुभ अंक- 9, शुभ रंग- गुलाबी

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