बीस घरों के राग रंग में अस्सी चूल्हे बन्द हुए क्यों?
लोकतंत्र के प्रायः प्रहरी इतने आज दबंग हुए क्यों?
दुबक गए घर बुद्धिजीवी खुद को मान सुरक्षित।
चहुं ओर है धुंआ-धुंआ ही यह क्यों नहीं परिलक्षित?
दग्ध हुई मानवता जिसको मिलकर नहीं सहलायेंगे।
तो इस आग में हम भी जल जायेंगे।।

जन के ही सर पग धर कोई लोकतंत्र के मंदिर जाता।
पद पैसा प्रभुता की खातिर अपना सुर और राग सुनाता।
उनकी चिन्ता किसे सताती जो जन राष्ट्र की धमनी है।
यही व्यवस्था की निष्ठुरता उग्रवाद की जननी है।
राष्ट्रवाद उपहास बनेगा गर कुछ न कर पायेंगे।
तो इस आग में हम भी जल जायेंगे।।

बना हिन्द बाजार जहां नित गिद्ध विदेशी मंडराते हैं
यहीं के श्रम और साधन से परचम अपना फहराते हैं।
विश्व-ग्राम नहीं छद्म-गुलामी का लेकर आया पैगाम।
आजादी के नव-विहान हित अलख जगायें हम अविराम।
सजग रहे माली उपवन का तभी सुमन खिल पायेंगे।
या इस आग में हम भी जल जायेंगे।।
-श्यामल सुमन

(श्यामल सुमन टाटा स्टील, जमशेदपुर में प्रशासनिक पदाधिकारी हैं)

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