सुरेश नौटियाल
संयुक्त राष्ट के कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि में आज दुनिया भर में जिस विषय पर यकायक चर्चा केन्द्रित हो गई है, वह विषय है तेजी से गरमाती धरती और वातावरण के कारण हो रहा जलवायु परिवर्तन। बाली से बार्सेलोना तक और ऋषिकेश से लेकर बेलम (ब्राजील) तक विभिन्न स्तरों पर जलवायु परिवर्तन का मसला गरम है। जलवायु परिवर्तन को लेकर एक बहस तो यह है कि 18 हजार वर्ष पहले ही यह चक्र शुरू हो गया था और अब एक लाख वर्ष लंबा हिमयुग आने से पहले धरती का तापमान अपने चरम पर पहुंच रहा है। चूंकि इस धारणा के अनुसार, धरती के गरमाने का चक्र लगभग 18-20 हजार वर्ष तक चलता है। इस धारणा में विश्वास करें तो अगले एक-दो हजार साल में धरती पर तमाम तरह का जीवन समाप्त हो जाएगा और साथ ही मानव सभ्यता और विकास के तमाम चिन्ह समाप्त हो जाएंगे। मानव का इतिहास, सामाजिक-सांस्कृतिक विकास, उन्नत प्रौद्योगिकी और विज्ञान से लेकर जीवनदर्शन जैसी तमाम उपलब्धियां समाप्त हो जाएंगी। एक लाख वर्ष के हिमयुग के बाद जब धरती पर फिर से जीवन किसी रूप में अंगड़ाई लेगा और मानव अथवा मानव जैसी किसी प्रजाति के विकास में लाखों-लाखों वर्ष लगने के बाद जब कभी उत्खनन होगा तब कॉर्बनडेटिंग जैसी किसी पद्वति से अनुमान लगाया जाएगा कि धरती पर पहले भी जीवन रहा होगा। हो सकता है कि धरती में एक लाख वर्ष की उथल-पुथल के बाद तब उत्खनन में ऐसे सूत्र हाथ लग जाएं जो मानव या मानव जैसी तब की प्रजाति की उन्नति तीव्रता से करने में सहायक हों, खैर!

जलवायु परिर्वतन को लेकर जो दूसरी और अधिक साक्ष्यपूर्ण बहस दिखाई देती है, वह यह धारणा है कि खास तौर पर यूरोप की औद्योगिक क्रांति के बाद ग्रीनहाऊस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से सौ डेढ़ सौ साल में धरती और वातावरण का तापमान बढ़ा है, जिस वजह से जलवायु परिवर्तन ने मानव जाति के साथ-साथ धरती के ऊपर-नीचे और सतह पर रहने वाले तमाम जीवों के लिए अब तक का सबसे बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।

यह मानकर हम विषय प्रवेश करते हैं कि 18-20 हजार साल तथा एक लाख वर्ष के जो चक्र हैं वे अब धरती पर नहीं होंगे और मानव सभ्यता धरती की तमाम जैव विविधता के साथ किसी न किसी रूप में जीवित और जीवंत रहेगी। जब हम इस धारणा पर विश्वास करते हैं, तब धरती के तमाम जैव विविधता वाले विशिष्ट क्षेत्रों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने की बात तो कर ही सकते हैं। इसी खतरे को भांपते हुए आज तमाम सरकारें और संगठन धरती के बढ़ते तापमान को शांत करने की कोशिशों में जुटे हैं। संयुक्तराष्ट्र इस दिशा में विशेष पहल कर रहा है और कोपेनहेगन सम्मेलन में कोशिश करेगा कि दुनिया के तमाम अमीर और विकाशील देश ग्लोबल वार्मिग के खतरों से लड़ने की साझा रणनीति बनाएं! वर्ष 2012 में क्योतो प्रोतोकॉल की अवधि समाप्त हो जाएगी इसलिए आगे की रणनीति के लिए कोपेनहेगन में किसी प्रकार का अंतर्राष्ट्रीय समझौता होना अत्यन्त आवश्यक है। अपेक्षा की जाती है कि अमेरिका जैसे प्रभावशाली देशों ने जिस प्रकार क्योतो प्रोतोकॉल से हाथ खींचे, वह कोपेनहेगेन में नहीं होगा ! धनी दुनिया के मुख्य प्रतिनिधि बराक ओबामा और अपने आप को विकासशील दुनिया का नेता समझने वाले मनमोहन सिंह तक ने कोपेनहेगन सम्मेलन में किसी सामूहिक समझौते पर पहुंचने की उम्मीद जताई है।

हम इसी उम्मीद के सूत्र को मानकर आगे बढ़ते हैं और यह मानकर विषय प्रवेश करते हैं कि 18-20 हजार साल तथा एक लाख वर्ष के जो चक्र हैं वे अब धरती पर नहीं होंगे और मानव सभ्यता धरती की तमाम जैव विविधता के साथ किसी न किसी रूप में जीवित और जीवंत रहेगी। जब हम इस धारणा पर विश्वास करते हैं, तब धरती के तमाम जैव विविधता वाले विशिष्ट क्षेत्रों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने की बात तो कर ही सकते हैं।

आइए चलें सीधे संपूर्ण हिमालय क्षेत्र की बात करें! मध्य एशिया के कराकोरम के पड़ोस से लेकर यह क्षेत्र म्यांमार तक जाता है। इसकी लम्बाई 2500 किमी. से ज्यादा और चैड़ाई 300-400 किमी. तक की है। भौगोलिक दृष्टि से पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र की लंबाई और चैड़ाई वास्तव में कई गुना ज्यादा हो, सामान्य भाषा में जब हम लंबाई-चौड़ाई नापते हैं, तब पर्वतीय क्षेत्रों के ढ़लानों और चट्टानों को भूल जाते हैं। सरल शब्दों में कहें तो यदि किसी मुड़ी-तुड़ी चादर को ठीक से फैलाकर बिछा दिया जाए तो उसका आकार कई गुना बढ़ जाता है। तो इतने विशाल क्षेत्र में रहने वाली करोड़ों की आबादी और जैव-विविधता के साथ-साथ इस क्षेत्र के हिमनदों और उनसे निकलने वाली एशिया की 10 बड़ी नदियों का अस्तित्व बचाने का प्रश्न हमारे सामने है। समय से वर्षा न होने के कारण खेतीबाड़ी तो नष्ट हुई है, साथ ही विभिन्न प्रजाति के पेड़-पौधों का मिजाज भी बदल गया हैं।

बुरांस के फूलों का समय से कई महीनों पहले खिल जाना इसका एक उदाहरण है। आज हमने कुल मिलाकर धरती को ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर दिया है जहां से कोई रास्ता निकलना नजर नहीं आ रहा है। हमें धुंध को छांटते हुए रास्ता तो खोजना ही होगा क्योंकि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। हिमालय क्षेत्र पर यह जिम्मेदारी ज्यादा है क्योंकि इसे तमाम जीवों के लिए पानी और ऑक्सीजन से लेकर विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक धरोहरें उपलब्ध करनी हैं। यह तभी संभव होगा, जब संपूर्ण हिमालय के लिए सभी देश मिलकर साझा नीति बनाएं। इस नीति को बनाने में भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान की विशेष भूमिका हो सकती है।

हिमालय के अन्य क्षेत्रों की परिस्थितियां चूंकि अधिक भिन्न नहीं हैं और हिमालय बचाने को लेकर जनता का मौलिक चिंतन भी एक जैसा है। लिहाजा हिमालय बचाने के लिए हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को बचाने की बात सबसे पहले होनी चाहिए। लोग बचेंगे तो वे प्रकृति की जैव-विविधता को अधिक संपन्न बनाने के प्रयास करेंगे और अपने मौलिक, पारंपरिक ज्ञान के आधार पर हिमालय बचाने की कोशिश भी करेंगे। वर्तमान में उत्तराखंड में 65 प्रतिशत भूभाग को वन क्षेत्र कहा जाता है लेकिन जंगल मात्र 30-35 प्रतिशत क्षेत्र में ही है। अर्थात् शेष 30-35 प्रतिशत वन क्षेत्र को किसी न किसी रूप में कृषि या बागवानी के लायक बनाए जाने की संभावनाएं दिखाई देती हैं। राज्य सरकार को कानून बनाकर यह किसानों को सौंप देनी चाहिए। दुर्भाग्यवश अभी तक ऐसा नही हो पाया है। पिछले दिनों इस लेखक ने प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा से ऐसा ही एक कचोटता सवाल पूछा कि जब आप टिहरी बांध बनाने से सरकार को नहीं रोक पाए, तब आपने उसी सरकार से पद्म विभूषण जैसा पुरस्कार ग्रहण क्यों किया? बहुगुणा जी का जवाब था कि वह स्वयं भी पुरस्कारों से दूर रहते हैं और इस पुरस्कार को लेने के लिए भी वह निजी तौर पर इच्छुक नहीं थे लेकिन उन्होंने हिमालय के लिए एक समग्र नीति के निर्धारण के बड़े उद्देश्य के लिए इसे स्वीकारा है। ऐसी कोशिशों से हिमालय की नीति कब और कैसे बनेगी? यह तो नहीं मालूम, लेकिन इतना कहना जरूरी है कि हिमालयी क्षेत्रों को बचाने के लिए एक समग्र नीति का बनना समय की मांग है।

विश्व बांध आयोग के हिसाब से 15 मीटर से अधिक ऊंचाई वाला हर बांध बड़ा बांध कहलाता है और हालत यह है कि हिमालय क्षेत्र में शायद ही कोई बांध पंद्रह मीटर से कम ऊंचाई वाला हो। वस्तुतः हिमालय बचाने की नीति बनाते समय इस क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों के बारे में चिंता होनी चाहिए। जब हम धरती पर या उसके किसी हिस्से को बचाने की बात करते हैं, तब उसके केन्द्र में सर्वप्रथम प्राकृतिक धरोहरें और मनुष्य होने चाहिए। मनुष्य और अन्य जीवजन्तु! नीति जो भी हो वह स्पष्ट हो और समग्र भी। जल, जंगल, जमीन और आजीविका के लिए हिमालय नीति लिहाजा एक ही हो सकती है इसके लिए अलग-अलग से नीतियां नहीं बनाई जानी चाहिए।

इसे बनाते समय एक और महत्वपूर्ण बात जो ध्यान में रखनी होगी, वह है प्रकृति और मानव का आपसी संबंध। दोनों एक-दूसरे को दें तो यह रिश्ता परिपूर्ण और निरंतर बना रहता है। इसमें किसी भी तरह की ऐंठन आने से समरसता और एक-दूसरे पर निर्भरता का चक्र टूट जाता है।

अब बहस को उत्तराखंड हिमालय तक सीमित करें। इस राज्य में हिमालय बचाने के मकसद से विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन चल रहे हैं। इनकी धारा और प्रकृति अलग-अलग हो सकती है लेकिन उद्देश्य समान हैं। हिमालय बचाने की बातचीत के दौरान यह बात बार-बार सामने आती है कि उत्तराखंड सरकार के पास हिमालय को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। लोगों में यह गुस्सा देखा जा सकता है कि राष्ट्रीय पार्कों, अभ्यारण्यों और संरक्षित वन क्षेत्रों के नाम पर लोगों को उनके पारंपरिक हक-हकूकों से वंचित किया जा रहा है। लोगों में गुस्सा इतना है कि वे जनविरोधी पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करने की बातें करने लगे हैं। बढ़ती आबादी के कारण खेतीबाड़ी की जमीनें बढ़ाई जाने की मांग भी उग्र होती जा रही है। लोग सवाल करने लगे हैं कि जिन हक-हकूकों पर क्रूर गोरखा शासकों से लेकर अंग्रेज शासकों तक ने अतिक्रमण नहीं किया, उन पर क्यों आज की निर्वाचित सरकारें डाका डाल रही हैं। जनता का सीधा सवाल यह है कि तथाकथित लोकतंत्र में क्यों ‘लोक’ पर तंत्र हावी हो रहा है? क्या जन विरोधी नीतियां बनाकर राज्य को जनहीन करने की कोई गहरी साजिश है? संक्षेप में कहें तो यह बात तो सरकार से पूछी ही जानी चाहिए कि अपनी तमाम परियोजनाओं को आनन-फानन में मंजूरी देने में तो वह विशेष रुचि दिखाती है और अपने ही कानूनों की धज्जियां उड़ा देती है जबकि जनता की न्यायोचित मांगों को पर्यावरणीय मंजूरी के नाम पर लटका देती है। रामनगर के पास कंडी मार्ग इसका एक उदाहरण है। कंडी मार्ग को लेकर आंदोलन करने वालों पर मुकदमे तो चला दिए जाते हैं लेकिन यह समझने की कोशिश नहीं की जाती कि कंडी मार्ग आम जनता के लिए खोल देने से कितना भला होगा?

हिमालय के अन्य क्षेत्रों की परिस्थितियां चूंकि अधिक भिन्न नहीं हैं और हिमालय बचाने को लेकर जनता का मौलिक चिंतन भी एक जैसा है। लिहाजा हिमालय बचाने के लिए हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को बचाने की बात सबसे पहले होनी चाहिए। लोग बचेंगे तो वे प्रकृति की जैव-विविधता को अधिक संपन्न बनाने के प्रयास करेंगे और अपने मौलिक, पारंपरिक ज्ञान के आधार पर हिमालय बचाने की कोशिश भी करेंगे। वर्तमान में उत्तराखंड में 65 प्रतिशत भूभाग को वन क्षेत्र कहा जाता है लेकिन जंगल मात्र 30-35 प्रतिशत क्षेत्र में ही है। अर्थात् शेष 30-35 प्रतिशत वन क्षेत्र को किसी न किसी रूप में कृषि या बागवानी के लायक बनाए जाने की संभावनाएं दिखाई देती हैं। राज्य सरकार को कानून बनाकर यह किसानों को सौंप देनी चाहिए। ऐसा होने से पर्यावरण को ही लाभ होगा और साथ ही पलायन पर कुछ रोक लगेगी। हिमालय संरक्षण के लिए समग्र नीति के तहत यह भी आवश्यक है कि वे तमाम कानून समाप्त कर दिए जाएं, जिनसे लोगों की तकलीफें बढ़ती हों। इनके बदले हिमालयी जनता से विचार-विमर्श के बाद ऐसी नीतियां और कानून बनें, जो सर्वमान्य हों। सर्वमान्य कानून होंगे तो सरकारी जंगलों में लगी आग को लोग चुपचाप भड़कते नहीं देखेंगे। बड़े बांधों पर भी अंकुश परम आवश्यक है। छोटे बांध बनें पर उनका निर्माण नदी जल प्रवाह (रन आफ द रिवर) के अनुरूप हो। पारंपरिक घराटों के साथ ऊर्जा और पवन ऊर्जा का उपयोग भी बढ़े। ऐसा न हो कि बांध, बिजली और विकास के बजाय विनाश का पर्याय बने रहें। टिहरी बांध बनने से पैदा हुई समस्या इस वक्तव्य को पुष्ट करती है। कुल मिलाकर सरकारों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और समाज के अग्रणी लोगों को मिल-जुलकर उत्तराखंड हिमालय के लिए सर्वमान्य नीति बनानी ही होगी। इसमें किसी भी तरह का विलंब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को ही बढ़ाएगा और यह नीति जनता के पक्ष में होगी तो भारत के शेष हिमालयी राज्य ही नहीं, बल्कि तमाम दूसरे ऐसे देश भी इसे अपना लेंगे जिनके पास हिमालय होने का गौरव हासिल है।

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