अतुल मिश्र
रोडवेज़ की बस शायद शर्मिन्दगी की वजह से अपने हिसाब से बस स्टैंड के बाहर खड़ी थी! जिन्हें कहीं जाना था, वे सब उसमें चढ़ रहे थे और जिन्हें कहीं नहीं जाना था, वे सब बस और उसके चालक को मात्र-सूचक गालियां देते हुए उतर रहे थे! बातचीत जारी थी...
"बीस मर्तबा कहा है कि रोडवेज़ की बसों से आना-जाना बंद करो,मगर तुम हो कि सुनते ही नहीं!" एक महिला-यात्री अपने शौहर जैसे लग रहे सहयात्री को झाड़ रही थी!
"तुम ही तो ज़ल्दी कर रही थीं कि जीजाजी इंतज़ार कर रहे होंगे, जो भी बस मिले उसी में चढ़ लो!" शौहरनुमा आदमी ने अपने सिर की धुल झाड़ते हुए कहा!
"जो भी बस मिले से ऐसी बस से तो नहीं था, जिसे स्टार्ट करने के लिए भी धक्के लगाने पड़ें! इसके तो सारे अंजर-पंजर तुम्हारी तरह हिले पड़े हैं और हैड लाईट भी आगे लटक रही है!" अपने अस्थि-पंजरों की मार्फ़त मात्र अपने जीवित रहने की सूचना देने वाले सहयात्री की ओ़र हिकारत की निगाह से देखते हुए महिला ने कहा और आगे बढ गयी!
"ओय कंडक्टर, पूरे रुपये वापस कर! बीस किलोमीटर के सफ़र में तीस जगह गाड़ी खड़ी की है, तूने! साली इतना हिल रही थी कि खड़े होना तो अलग, बैठना भी मुश्किल हो गया!" हर किस्म की व्यवस्था से हर वक़्त परेशान रहने वाले किसी यात्री ने अपना गुस्सा व्यक्त किया!
"क्या करें, साब, जो गाड़ी मिल जाती है,वही लेकर चल दिए! अब नई-नवेली बहू जैसी बसें कहां रहीं! इस रूट के लिए ऐसी ही बसें मंज़ूर हुई हैं!" बस-कंडक्टर ने पूरी ईमानदारी का परिचय देते हुए यह सार्वजनिक सूचना जारी कर दी ताकि किसी और को इसी किस्म की कोई शिकायत हो तो वह चुप रह कर निकल ले और विधान-सभा में मौजूद विधायकों की तरह कोई गाली-वाली ना दे!
बस में सवारियों का आना-जाना शुरू हो गया! कंडक्टर ने अपने दायित्व का पूर्ण निर्वाह करते हुए मुंह में लगी सींटी को जोरदार फूंक मारी,मगर सीटी नहीं बजी! किसी यात्री के मुंह से निकला, "सीटी तक तो बजा नहीं पा रहा यह, गाड़ी क्या ख़ाक चलाएगा?

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

Loading...

ई-अख़बार

Like On Facebook

Blog

  • दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है... - एक सवाल अकसर पूछा जाता है, दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...? अमूमन लोग इसका जवाब भी जानते हैं... कई बार हम जानते हैं, और समझते भी हैं, ...
  • दस बीबियों की कहानी - *बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम* कहते हैं, ये एक मौजज़ा है कि कोई कैसी ही तकलीफ़ में हो, तो नीयत करे कि मेरी मुश्किल ख़त्म होने पर दस बीबियों की कहानी सुनूंगी, त...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

एक झलक

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं