चेहरा मेरा था निगाहें उस की
ख़ामोशी में भी वो बातें उस की

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईं
शेअर कहती हुई आंखें उसकी

शोख़ लम्हों का पता देने लगीं
तेज़ होती हुई सांसें उसकी

ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी

ध्यान में उस के ये आलम था कभी
आंख महताब की यादें उसकी

फ़ैसला मौज-ए-हवा ने लिक्खा
आंधियां मेरी बहारें उसकी

नींद इस सोच से टूटी अकसर
किस तरह कटती हैं रातें उसकी

दूर रहकर भी सदा रहती हैं
मुझ को थामे हुए बाहें उसकी
-परवीन शाकिर

एक नज़र

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