शीतलहर जारी !
सोच रहे हैं, कम्बल बांटें, फोटो ग़र छप जाए हमारी !!
पहला महाकुम्भ सदी का !
गंगा फिर से मैली होगी, ध्यान रखें उस महा नदी का !!
शब्दों की ताक़त !
परमाणु बम की भी इसके, आगे कोई नहीं हिमाक़त ??
बांग्लादेश !
कुछ विचार तो करने ही हैं, प्रत्यर्पण-संधि पर पेश !!
गुनाहगार !
बेगुनाह साबित करने का, मिले नहीं जिसको आधार !!
स्पीड ब्रेकर !
पर्वत जैसे बना दिए हैं, वाहन गिरें सवारी लेकर !!
धरना जारी !
जो मांगें हम भूल गए हैं, स्वीकारें वे सभी हमारी !!
मकर संक्रांति !
महंगाई ने छीन रखी है, हर त्यौहारी शान्ति !!
हेराफेरी !
इतनी रक़म भेज दे ऊपर, बाकी है फिर तेरी-मेरी !!
लोहड़ी !
महंगाई ने हालचाल, पूछे तो थोड़ा रो पड़ी !!
मुखबिर !
बिना किसी मूसल से डर के, रखे ओखली में अपना सिर !!
-अतुल मिश्र
मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की
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*फ़िरदौस ख़ान*
भौतिकवादी संस्कृति ने जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है,
वहीं मनुष्य का स्वास्थ्य भी इससे न अछूता रहा हो तो इसमें हैरानी की को...

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