सरफ़राज़ ख़ान
हिसार (हरियाणा). चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डा. आर. पी. नरवाल ने किसानों को सरसों की फसल पर फैल रहे चेपा रोग के बारे में सावधानी रखने को कहा है। डा. नरवाल ने कहा है कि आजकल सरसों की फसल पर चेपा (माहू या अल) का आक्रमण देखने में आया है। उन्होंने सरसों के फार्म और खेतों का मुआयना करके पाया है कि कई जगह हल्के हरे-पीले रंग का चेपे का कीट सरसों की पत्तियों की निचली सतह और फूलों की टहनियों पर समूह मे फैला हुआ है। उन्होंने कहा है कि 1.0 से 1.5 मिलीमीटर लम्बा उक्त कीट के प्रौढ़ एवं शिशु सरसों के पौधों एवम् फूल पत्तियों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा है कि इस कीट का प्रकोप मार्च तक बना रहता है।

डा. नरवाल ने कहा है कि उक्त कीट का लगातार आक्रमण रहने पर पौधों के विभिन्न भाग पिचचिपे हो जाते हैं, जिन पर काला कवक लग जाता है जिससे पौधों की भोजन बनाने की ताकत कम हो जाती है और इससे पैदावार में 10 से 80 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है। उन्होंने कहा कि कीट ग्रस्त पौधों की वृध्दि भी रुक जाती है जिसके कारण कभी-कभी तो फलियां भी नहीं लगती और यदि लगती हैं तो उनमें दाने चिपके एवं छोटे हो जाते हैं। इस प्रकार यह कीट सरसों फसल की पैदावार में भारी नुकसान पहुंचाता है। इस कीट का नियंत्रण करने के लिए उन्होंने वैज्ञानिकी सिफारिशें लागू करने को कहा है।

इस कीट के नियत्रण के लिए कीट वैज्ञानिक डा. एस. पी. सिंह ने कहा कि जब सरसों की फसल में कीटों का आक्रमण 20 प्रतिशत पौधों पर हो जाए या औसतन 13-14 कीट प्रति पौधा हो जाए तो आक्सीडिमेटान मिथाईल मैटासिस्टाक्स 25 ई. सी. या डाईमैथोस्ट, (रोगोर) 30 ई. सी. की 400 मिलीलीटर मात्रा को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ कीट ग्रस्त फसल पर छिड़काव करे। फसल पर कीट का प्रकोप रहने की अवस्था में उन्होंने दूसरा छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करने को कहा है। छिड़काव शाम के समय के समय जब फसल पर मधुमक्खियां कम होती हैं तब करने को कहा है। मौटर चालित पम्प में कीटनाशक दवाई की मात्रा उपर लिखित होगी, लेकिन पानी की मात्रा 20 से 40 लीटर प्रति एकड़ हो जाएगी।

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