स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. औषध निर्माण कंपनियों से उनके द्वारा निर्मित औषधों दवाइयों पर मूल्य नियंत्रण के संबंध में समय-समय पर प्राप्त होने वाले विभिन्न अभ्यावेदनों पर औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 1995 (डीपीसीओ, 1995) के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जाती है। जहां तक कलैंडर वर्ष अथवा वित्त वर्ष में मूल्यों में घट-बढ पर विचार करने से संबंधित मुद्दे का संबंध है, यह उल्लेखनीय है कि गैर -अनुसूचित फार्मूलेशनों दवाइयों (मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं आने वाली औषधें) के मूल्यों की निगरानी राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) द्वार नियमित आधार पर की जाती है।

रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री श्रीकांत कुमार जेना ने आज राज्यसभा में बताया कि जिन मामलों में एक वर्ष में गैर अनुसूचित फार्मूलेशन के मूल्यों में दस प्रतिशत से अधिक वृध्दि हो और फार्मूलेशन पैक का कुल वार्षिक कारोबार एक करोड़ रुपए से अधिक हो उनमें निर्धारित मानदंडों के अनुसार एनपीपीए द्वारा कम्पनियों की छंटाई की जाती है। इसके अतिरिक्त यह अपेक्षा है कि फार्मूलेशन के उस क्षेत्र में फार्मूलेटर का अंश बाजार का कम से कम बीस प्रतिशत हो अथवा दवाई उस ग्रुप की पहली तीन शीर्ष ब्रांडों में से हो। उच्च कारोबार तथा दस प्रतिशत मूल्य वृध्दि वाले जो मानदंड हैं वे इस उद्देश्य से तैयार किए गए हैं, ताकि बहु खपत मामलों का पता लगाया जा सके और औषध (मूल्य नियंत्रण), आदेश 1995 (डीपीसीओ, 1995) के पैरा 10 (ख) में उल्लिखित जनहित की शर्त पूरी हो सके। जहां कहीं असाधारण मूल्य वृध्दि का पता चलता है वहां आवश्यक कार्रवाई की जाती है। यह सतत प्रक्रिया है। पूर्ववर्ती बारह महीनों की अवधि को देखते हुए इस प्रयोजन हेतु मूल्यों में घट बढ़ का आकलन हर महीने किया जाना होता है और इस प्रकार मूल्यों में परिवर्तन की निगरानी हेतु तथा इस संबंध में और आगे कार्रवाई करने के लिए कलैंडर वर्ष अथवा वित्त वर्ष संगत नहीं होगा।

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