सरफ़राज़ ख़ान
नई दिल्ली. हीट स्ट्रोक के बढ़ने और गर्मी से होने वाली अन्य समस्याएं सिर्फ तापमान पर निर्भर नहीं होती बल्कि उनका सम्बंध आद्रता यानी ह्यूमिडिटी से होता है.

हार्ट केयर फाउंडेशन  ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल के मुताबिक़ 44 डिग्री सेंटीग्रेट या 110 डिग्री फारेनहाइट से अधिक तापमान पर जब आपका लगातार सूर्य की रौशनी से साबका हो, तो हीट स्ट्रोक हो सकता है. 40 फीसद की आद्रता के साथ 110 डिग्री फारेनहाइट में 130 डिग्री फारेनहाइट का अहसास होता है और इसे हाई रिस्क रेड जोन के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

जब समान तापमान पर आद्रता 30 से 40 फीसद के बीच होती है तब लोग सन स्ट्रोक, हीट स्ट्रोक और हीट एग्जाशन के शिकार होते हैं. फिर भी हीट स्ट्रोक लम्बे समय तक धूप में रहने या शारीरिक काम करने पर भी हो सकता है.

जब तक तापमान 85 डिग्री फारेनहाइट से कम नहीं हो जाता, तब तक ही क्रैम्प, हीट एग्जाशन और हीट स्ट्रोक से निजात मिलने में कमी नहीं आएगी. ऐसी स्थिति में सिर्फ थकान संभव है जो कि लम्बे समय तक खुले में रहने या शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने से होती है.

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति गमी से जुड़ी समस्या का षिकार होता है, तो उसे तरल पदार्थ (जिसमें नींबू पानी नमक के साथ शामिल है) 4 से 8 लीटर तक दिया जाना चाहिए। हीट स्ट्रोक और हीट एग्जाशन में मुख्य फर्क यह है कि हीट स्ट्रोक में पसीना नहीं आता. उच्च तापमान के साथ ही पसीना आने की स्थिति में व्यक्ति को आपातकालीन में दाखिल किया जाना चाहिए, ताकि उसके आंतरिक अंगों को झुलसने से बचाया जा सके.

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