अतुल मिश्र  
 कल हेनरी क्लिंटन ने और आज जब ओबामा ने बताया कि हम दुनिया की उभरती हुई ताक़त बन गए हैं तो गर्व से सीना तो तना, मगर फिर यह भी लगा कि अब कल ओबामा यह ना कह बैठें कि " अब जाओ, और अफगानिस्तान से लेकर उन तमाम इलाकों की शान्ति बहाल करो, जिनके तमाम रास्ते  पाकिस्तान से होकर ही गुज़रते हैं. "  ज़्यादा ताक़तवर बनना भी इन दिनों ख़तरनाक हो गया है. कौन, कब, किससे भिड़ने के हौंसलों की याद दिला दे, कुछ नहीं कहा जा सकता. बकरों की बलि देने से पहले भी लोग रस्म अदायगी के तौर पर बकरे के कान में ऐसा ज़रूर कहते होंगे कि " दोस्त क्या करें, तुम्हारे अन्दर ताक़त कुछ ज़्यादा ही आ गयी थी, इसलिए मज़बूर हैं. " खुद को हमेशा कमज़ोर और किसी के भी काम ना आ सकने वाला दिखा देना ज़्यादा मुनासिब रहता है. कोई अगर कहे भी कि भाई, आप तो बड़े ताक़तवर हैं, तो फ़ौरन उसकी यह ग़लत फहमी दूर कर देनी चाहिए कि नहीं, हुज़ूर, आप ज़्यादा  ताक़त रखते हैं और हम तो नाचीज़ हैं. कमज़ोर बनना बुरा नहीं है, ताक़तवर बनना ज़्यादा घातक है.
भारत और अमेरिका के ताल्लुकातों में तब अचानक ही करीबी आ गयी, जब हिलेरी क्लिंटन ने हमारे विदेश मंत्री को चने के उस झाड़ पर चढ़ा दिया, जो केवल इंडिया में ही होता है और जिस पर चढ़ना मीडिया में आने के लिहाज़ से सही रहता है. अमेरिका नहीं चढ़ाता तो कोई और चढ़ा देता. हम छीन  या रूस चले जाते और वहाँ से अपनी उभरती हुई ताक़त का ऐलान करवा देते कि हम अब उभरने जा रहे हैं. किसी की बातों पर यूं ही भरोसा नहीं कर लेना चाहिए कि हम ताक़तवर हैं और हर ख़तरे से निपटने  के लिए तैयार हैं. पहले अपनी आजमाइश करनी चाहिए कि सामने वाला जो कह रहा है, वह वाक़ई सही है भी या नहीं ? जिस मुल्क में  सरकारी कारतूसों की सप्लाई अपने दुश्मनों को की जा रही हो, वहाँ बंदूकें भी अक्सर धोखा दे जाती  हैं कि हमने कौन से बुरे कर्म किये थे, जो अब हम नहीं बिक सकते ?
 हमें दुनिया की उभरती हुई ताक़त होने का पूरा भरोसा दिलाने की ग़रज़ से अब ओबामा इंडिया भी आ रहे हैं, ताकि यहां की आवाम भी समझ ले कि चुनावी दिनों में उसे क्या करना है ? हमें हमेशा दूसरों की ताक़त पर भरोसा करना चाहिए और खुद के बारे में अगर कोई बोले तो उसे वक़्त आने पर दिखा देने की तसल्ली देकर साठ के दशक में बनी ' वक़्त ' पिक्चर की तरह, उसे  वक़्त पर ही छोड़ देनी  चाहिए. ऐसा ही शास्त्र-सम्मत है और यही देशी रणनीति है. अमेरिका अगर हमारी उभरती ताक़त को अपनी रणनीति बना सकता है, तो हम क्यों ना अपनी एक ऐसी रणनीति बना लें, जो " इधर से सुनो और उधर से निकाल दो, " जैसे सुखकारक सिद्धांतों पर आधारित हो.

कोई अगर यह कहे कि आप बहुत ज़िम्मेदारी से लड़ाई करने की क्षमता रखते हैं तो कभी भी इस पर ऐतवार ना करें. माना कि हम पर ताक़त है और जो अभी तक उभरती हुई ही है, मगर यह कौन सी तुक है कि अखाड़े के धुरंदर पहलवानों के सामने कोई हमारा हाथ उठाकर यह ऐलान करे कि  " देखो, एक ये भी हैं, जो अभी उभरे हैं. है कोई इनसे निपटने वाला ? " यह बात ग़लत है. आपको हमसे कहना है या इस पूरी दुनिया से कहना है कि हम उभरती हुई ताक़त हैं ? क्या ज़रुरत है कि अपनी रणनीति के हिस्सों में हमें और हमारी उभरती हुई खानदानी शफाखाने की  ताक़त को शामिल किया जाये ? आप जब खुद को उभरा हुआ मान कर हमें उभरने वाली ताक़त बता रहे हैं तो ऐसा क्यों नहीं करते कि अपनी रण नीति में खुद की उभर चुकी ताक़त को शामिल कर लें और उसी से काम चलायें ? हमें चने के झाड़ पर चढ़ाना ज़रूरी है ?   

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