शेष नारायण सिंह 
आर एस एस के एक बड़े नेता पर अजमेर के धमाकों में शामिल होने की साज़िश में मुक़दमा चलेगा. हालांकि इस बात में कीई को शक़ नहीं था कि आर एस एस हिंसा को राजनीतिक का हथियार बनाता रहता है लेकिन आम तौर पर माना जाता है कि उनके बड़े नेता कभी भी सीधे तौर पर किसी भी हमले की साज़िश में शामिल नहीं होते. पूरे देश में आर एस एस के अधीन काम करने वाले करीब साढ़े तीन हज़ार ऐसे संगठन हैं जो सक्रिय रूप से संघी एजेंडे को लागू करने के लिए काम करते हैं . आम तौर जिन कामों में आपराधिक मुक़दमा चल सकता हो , उसमें आर एस एस के बदेनेता खुद शामिल नहीं होते. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि केंद्र में सरकार बना लेने के बाद आर एस एस वाले यह संकोच भी भूल गए हैं . गुजरात का नरसंहार, मालेगांव बम विस्फोट, हैदराबाद के धमाके कुछ ऐसे काम हैं जिनमें आर एस एस के वरिष्ठ नेता खुद ही शामिल पाए गए हैं .मालेगाँव की मस्जिद में बम विस्फोट करने की अपराधी ,साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और उनके गिरोह के बाकी आतंकवादियों के ऊपर महाराष्ट्र में संगठित अपराधों को कंट्रोल करने वाले कानून, मकोका के तहत मुक़दमा चलाया जायेगा. मालेगांव के धमाकों के गिरोह को उस वक़्त के महाराष्ट्र के एंटी टेररिस्ट स्क्वाड के प्रमुख, शहीद हेमंत करकरे ने पकड़ा था . जब करकरे ने हिंदुत्ववादी संगठनों के आंतंकवादी गिरोहों को पकड़ना शुरू किया तो आर एस एस और उस से सम्बद्ध लोगों में हडकंप मच गया था. गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी घबडा गए थे और हेमंत करकरे को हटाने की माग को लेकर बहुत सक्रिय हो गए थे. बाकी देश में भी संघी लोग खासे परेशान हो गए थे लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था और हेमंत करकरे को मुंबई हमलों के दौरान उनके दुश्मनों ने मार डाला. शहीद हेमंत करकरे की मौत के बाद हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों को थोडा सांस लेने का मौक़ा मिल गया वरना स्वर्गीय करकरे के काम की रफ़्तार को देख कर तो लगता था कि बहुत जल्दी वे हिन्दुत्ववादी संगठनों के आतंक को काबू में कर लेगें. 

साध्वी प्रज्ञा और उनके साथियों की गिरफ्तारी भारतीय न्याय प्रक्रिया के इतिहास में एक संगमील माना जाएगा . प्रज्ञा ठाकुर और ले कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित की मालेगांव धमाकों के मामले में गिरफ्तारी ने देश की एकता और अखंडता की रक्षा के मामले में एक अहम भूमिका निभाई थी. मुसलमानों के खिलाफ चल रही संघी ब्रिगेड की मुहिम के तहत संघी भाई कहते फिरते थे कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं . जब इन संघी आतंकवादियों को पकड़ा गया तो संघ का मुसलमानों के खिलाफ जारी प्रचार रुक गया था. और एल के आडवाणी सहित सभी संघी जीव बैकफुट पर आ गए थे. दर असल संघी आतंकवाद से भी बड़े एक नए किस्म को भी शहीद हेमंत करकरे ने देश के सामने ला कर खड़ा कर दिया था . मालेगांव धमाकों के अभियुक्तों में ले कर्नल श्रीकांत पुरोहित के शामिल होने के बाद यह पता लग गया था कि संघी आतंकवाद ने मिलटरी इंटेलिजेंस को भी नहीं बख्शा है और अब आतंकवाद ने सेना में भी घुसपैठ कर ली है .. अब बम्बई हाई कोर्ट के आदेश के बाद उन सभी ग्यारह आतंकवादियों पर मकोका कोर्ट में मुक़दमा चलाया जाएगा जिन्हें स्व हेमंत करकरे ने पकड़ा था. इन ग्यारह आतंकवादियों में ए बी वी पी का एक नेता, अभिनव भारत का एक नेता, और सेना का एक अवकाश प्राप्त मेजर शामिल हैं . कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर तो मुख्य अभियुक्त हैं ही. 

गिरफ्तार होने के बाद मीडिया में मौजूद अपने साथियों की मदद से इस गिरोह के मालिकों ने बहुत हल्ला गुल्ला मचाया लेकिन केस इन मज़बूत था कि किसी की एक नहीं चली. शुरू में तो यह लगा था कि यह अति उत्साही टाइप कुछ लोगों की साज़िश भर है लेकिन बाद में जब अजमेर के धमाकों में भी आर एस एस के फुल टाइम कार्यकर्ता और बड़े नेता ,इन्द्रेश कुमार पकडे गए तो साफ़ हो गया कि आर एस एस ने बाकायदा आतंकवाद के लिए एक विभाग बना रखा है. अब बहुत सारे आतंकी मामलों में आर एस और उस से जुड़े संगठनों के शामिल होने की बात के उजागर हो जाने के बाद आर एस एस के नेता लोग घबडाए हुए हैं . अब उन्होंने अपने लोगों को सख्त हिदायत दे दी है कि आतंकवादी गतिविधियों से दूर रहें .यह सख्ती पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के कुछ ज़िम्मेदार संघ प्रचारकों से सी बी आई की पूछताछ के बाद अपनाई गयी है. कानपुर में अशोक बेरी और अशोक वार्ष्णेय से दिनों सी बी आई ने कड़ाई से पूछ ताछ की थी. अशोक बेरी आर एस एस के क्षेत्रीय प्रचारक हैं और आधे उत्तर प्रदेश के इंचार्ज हैं . वे आर एस एस की केंदीय कमेटी के भी सदस्य हैं .अशोक वार्ष्णेय उनसे भी ऊंचे पद पर हैं . वे कानपुर में रहते हैं और प्रांत प्रचारक हैं .. उनके ठिकाने पर कुछ अरसा पहले एक भयानक धमाका हुआ था. बाद में पता चला कि उस धमाके में कुछ लोग घायल भी हुये थे. घायल होने वाले लोग बम बना रहे थे. सी बी आई के सूत्र बताते हैं कि उनके पास इन लोगों के आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के पक्के सबूत हैं और हैदराबाद की मक्का मस्जिद , अजमेर और मालेगांव में आतंकवादी धमाके करने में जिस गिरोह का हाथ था, उस से उत्तर प्रदेश के इन दोनों ही प्रचारकों के संबंधों की पुष्टि हो चुकी हैं . इसके पहले आर एस एस ने तय किया था कि अगर अपना कोई कार्यकर्ता आतंकवादी काम करते पकड़ा गया तो उस से पल्ला झाड़ लेगें . इसी योजना के तहत अजमेर में २००७ में हुए धमाके के लिए जब देवेन्द्र गुप्ता और लोकेश शर्मा पकडे गए थे तो संघ ने ऐलान कर दिया था कि उन लोगों की आतंकवादी गतिविधियों से आर एस एस को कोई लेना देना नहीं है . वह काम उन्होंने अपनी निजी हैसियत में किया था और नागपुर वालों ने उनके खिलाफ चल रही जांच में पुलिस को सहयोग देने का निर्णय ले लिया था. लेकिन अब वह संभव नहीं है . क्योंकि अशोक बेरी और अशोक वार्ष्णेय कोई मामूली कार्यकर्ता नहीं है , वे संगठन के आलाकमान के सदस्य हैं . वे उस कमेटी की बैठकों में शामिल होते हैं जो संगठन की नीति निर्धारित करती है . उनसे पल्ला झाड़ना संभव नहीं है. इसके कारण हैं . वह यह कि अगर इनके साथ आर एस एस की लीडरशिप धोखा करेगी तो कहीं यह लोग बाकी लोगों की पोल-पट्टी भी न खोल दें . इन्द्रेश कुमार से पल्ला झाड़ना आर एस एस के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि वे उनकी संगठन के सर्वोच्च पदाधिकारियों में से एक हैं . उनके ऊपर लगी चार्जशीट से यह साबित हो गया है कि आर एस एस की टाप लीडरशिप आतंकवाद की राजनीति पर ही चलती है

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