लिमटी खरे

देश को ब्रितानियों के कब्जे से छुड़ाने में महती भूमिका अदा करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की वर्तमान निजाम श्रीमती सोनिया गांधी एक के बाद एक करके कांग्रेसियों को सुधरने की बात कहती जा रही हैं, वहीं मोटी चमड़ी वाले कांग्रेस के जनसेवकों को मानो सोनिया की बातों से कोई लेना देना ही नहीं रहा है। हाल ही में सोनिया ने मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को हिदायत दी है कि वे विवेकाधीन कोटे को समाप्त कर दें।
गौरतलब होगा कि इससे पहले भी कांग्रेस अध्यक्ष ने मंत्रियों विधायकों के साथ ही साथ कांग्रेसियों को तरह तरह की नसीहतें दी हैं। मंदी के दौर में सोनिया ने साफ कहा था कि कांग्रेस के हर जनसेवक को अपनी पगार का बीस फीसदी जमा कराना होगा। देश में कांग्रेस के विधायक, सांसद और अन्य जनसेवकों पर सोनिया गांधी के इस फरमान का कोई असर नहीं हुआ, किसी ने भी इसकी सुध नहीं ली,, यहां तक कि खुद सोनिया और उनकी मण्डली ने भी। इसी दरम्यान सोनिया गांधी ने सादगी बरतने का संदेष दिया। कांग्रेसियों ने इतनी सादगी बरती कि कांग्रेस के मंत्रियों ने दिल्ली में राज्यों के भवन होते हुए भी मंहगे आलीषान पांच या सात सितारा होटल में रातें रंगीन की, वह भी सरकारी खर्चे पर। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इन मंत्रियों से हिसाब पूछने का साहस नहीं जुटा पाए कि आखिर इन होटल्स का महंगा भोगमान किसने भोगा।

कांग्रेस के भद्रजनों को सादगी का पाठ पढ़ाने के लिए नेहरू गांधी परिवार की बहू सोनिया गांधी ने दिल्ली से मुंबई तक की यात्रा हवाई जहाज की इकानामी क्लास में कर डाली। उनके बेटे सांसद और महासचिव राहुल गांधी ने दिल्ली से चंडीगढ़ का सफर शताब्दी में किया। मीडिया ने इन दोनों ही घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर देष के सामने पेश किया। बाद में इन्हीं मंत्रियों में से कुछेक ने ‘‘ऑफ द रिकार्ड‘‘ कह डाला कि हवाई जहाज में बीस सीटों का किराया भरकर सोनिया गांधी ने, और शताब्दी की पूरी की पूरी एक बोगी बुक करवाकर राहुल गांधी ने कौन सी सादगी की मिसाल पेष की है।
कांग्रेस अध्यक्ष का विवेकाधीन कोटा समाप्त करने का डंडा किस कदर परवान चढ़ सकेगा कहना जरा मुश्किल ही है। कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को सोनिया की यह बात गले नहीं उतर रही है। दरअसल विवेकाधीन कोटा ही वह मलाई है, जिसे इनके द्वारा रेवडियों की तरह बांटा जाता है। अब जबकि सोनिया को अपनी नई टीम का गठन करना है, तथा केंद्र में मंत्रीमण्डल में फेरबदल मुहाने पर है तब मंत्रियों ने अवश्‍य ही सोनिया गांधी की चिट्ठी का जवाब देना आरंभ कर दिया है कि वे अपने विवेकाधीन कोटे का प्रयोग ही नहीं करते हैं। जैसे ही सोनिया की टीम और मंत्रीमण्डल फेरबदल पूरा होगा वैसे ही इन मंत्रियों के असली दांत अपने आप ही सामने आ जाएंगे।

वैसे देखा जाए तो कांग्रेस को इस वक्त महाराष्ट्र में सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्‍यकता है, क्योंकि यहां जमीन घोटाले में कांग्रेस को अपने एक मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की बली चढ़ानी पडी है। उनके स्थान पर भेजे गए पृथ्वीराज चव्हाण ने भी अभी तक सोनिया गांधी को यह नहीं बताया है कि वे अपने अधिकारों में कटौती करने की मंषा रख रहे हैं। देखा जाए तो महाराष्ट्र के अलावा राजस्थान, दिल्ली, हरियाण, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस सत्तारूढ़ है, फिर भी यहां के निजामों ने सोनिया गांधी के इस फरमान को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है।
हो सकता है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों द्वारा श्रीमति सोनिया गांधी को यह तर्क दे दिया जाए कि विवेकाधीन कोटा समाप्त करने से जरूरतमंद लोगों की मदद करना ही मुश्किल हो जाएगा। महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू आदि राज्यों में जमीन, प्लाट, फ्लेट आदि को गलत तरीके से आवंटित करने के आरोप तेजी से सियासी फिजां में तैर रहे हैं। नब्बे के दशक में मध्य प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री राजा दिग्जिवय सिंह ने एमपी की राजधानी भोपाल में पत्रकारों को भी तबियत से सरकारी मकान आवंटित किए थे, बाद में कोर्ट के हस्तक्षेप से यह मामला रूक पाया था। आज भोपाल के पत्रकारों पर सरकारी मकान खाली करवाने की तलवार लटक ही रही है।
एक समय था जब रसोई गैस और टेलीफोन कनेक्‍शन मिलना बहुत ही मुश्किल होता था। तब सांसदों को निश्चित मात्रा में रसोई गैस के कूपन मिला करते थे, इसके साथ ही साथ सांसदों को टेलीफोन कनेक्षन का कोटा भी निर्धारित था। अनेक सांसदों पर इस कोटे को बेचने के आरोप भी लगा करते थे। बाद में जब गैस और फोन की मारामारी समाप्त हुई तब इन्हें कोई नहीं पूछता है।
इसी तरह केंद्रीय विद्यालय में दाखिले के लिए उस जिले के जिलाधिकारी और क्षेत्रीय सांसद के पास दो सीट का कोटा हुआ करता है। जब इस कोटे में भी धांधलियों के आरोप आम हुए तब वर्तमान मानव संसाधन और विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने इस कोटे को ही समाप्त करने की घोषणा कर डाली। जैसे ही सिब्बल के मुंह से यह बात निकली वैसे ही सारे सांसदों ने सिब्बल को जा घेरा, मजबूरी में बाद में सिब्बल को अपनी बात वापस लेकर इस कोटे को बहाल ही करना पड़ा। एसा नहीं है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के कानों तक कांग्रेसियों की गफलतों की शिकायतें न जाती हों। सोनिया को सब पता है कि कौन सा मंत्री कितने फीसदी कमीशन लेकर काम कर रहा है, किस सूबे का कांग्रेस अध्यक्ष या महासचिव पैसा लेकर विधानसभा चुनावों की टिकिटें बेच रहा है? पर क्या करें सोनिया गांधी की मजबूरी है, चुप रहना। अगर सोनिया गांधी ने जरा भी आवाज तेज की, ये सारे कांग्रेसी ही सोनिया गांधी का महिमा मण्डन और स्तुतिगान बंद कर देंगे। इन परिस्थितियों में सोनिया गांधी की नसीहत या उनके फरमान को कांग्रेसी बहुत ज्यादा तवज्जो देने वाले नहीं। बेहतर होगा कि सोनिया गांधी इस तरह का प्रलाप करने के पहले सोचें, जब उनकी बात मानी ही नहीं जानी है तो फिर जुबान खराब करने से भला क्या फायदा।


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