एस शिव कुमार
      1987 में 5 बिलियन लोगों ने 11 जुलाई को विश्‍व जनसंख्‍या दिवस के रूप में प्रतिष्ठित करने का निर्णय लिया था। अब 20 साल से अधिक समय से यह दिन जनसंख्‍या के रूख तथा इससे संबंधित मुद्दों के महत्‍व को दर्शाने का अवसर बन गया है। विचार-विमर्शों तथा चर्चाओं के माध्‍यम से इसके प्रति सजगता व्‍यक्‍त की जाती है। इस दिवस ने वार्षिक महत्‍व ग्रहण कर लिया है। वर्ष 2011 में विश्‍व जनसंख्‍या 7 बिलियन को पार करने का अनुमान था। यूएनएफपीए (युक्‍त राष्‍ट्र जनसंख्‍या कोष) और इसके सहयोगियों ने इसी दिन एक अभियान चलाया जिसे नाम दिया गया ''7 बिलियन एक्‍सन्‍स’’। वर्ष 2011 के मध्‍य तक नवीनतम आकड़ों के मुताबिक विश्‍व जनसंख्‍या 6,928,198,253 होने का अनुमान था।
यहां से आगे का रास्‍ता :
   मुख्‍य चिंता जनसंख्‍या को स्थिर करना है। जनसंख्‍या स्थिरता केवल संख्‍या न होकर संतुलित विकास है। इसे वृहद सामाजिक-आर्थिक विकास के परिप्रेक्ष्‍य में देखा जाना चाहिए। जरूरी नहीं कि स्थिरता की यह प्रक्रिया 2045 तक पूरी हो जाए, इसे 2050 या 2060 तक भी पूरा किया जा सकता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि हम जनसंख्‍या स्थिरता के मुद्दे तक कैसे पहुंचे।
     हर कोई जनसंख्‍या स्थिरता को लेकर चिंतित है क्‍योंकि इसके साक्ष्‍य मौजूद हैं कि महिलाएं अधिक बच्‍चे नहीं चाहती हैं। परिवार को सीमित करना अब उनकी प्राथमिकता है। वह अपने परिवेश में मौजूद परिस्थितियों से अपने आप को सशक्‍त बना रही हैं। वह चा‍हती हैं कि उनके बच्‍चे जीवित रहें और अच्‍छा करें। साथ ही परिवार नियोजन के तरीके तथा प्रजनन संबंधी स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं भी उन्‍हें आसानी से मिलें। ये सब सुविधाएं उनकी निजता और मर्यादा को बनाए रख कर ही प्राप्‍त हों। उनकी आय में वृद्धि के उपाय किये जाएं तथा आय पर उनका नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए जिससे काफी तब्‍दीली आएगी।

प्रोत्‍साहन का प्रश्‍न
     जनसंख्‍या नियंत्रण के लिए प्रोत्‍साहन और हतोत्‍साहन ने काफी हद तक सहयोग दिया है। क्‍या इस प्रकार के प्रोत्‍साहन या हतोत्‍साहन जरूरी हैं, क्‍या ये कारगर और न्‍यायसंगत हैं? क्‍या ये प्रोत्‍साहन और हतोत्‍साहन गुणात्मक सुधार लाने के साथ ही बराबरी की समस्‍या को इंगित करने तथा विशेषकर महिलाओं की स्‍वास्‍थ सेवाओं के लिए कारगर होगें? क्‍या यह समुदाय के सेवा प्रदाताओं को और जिम्‍मेदार बनाएंगे? प्रोत्‍साहन और हतोत्‍साहन कितने कारगर और प्रासांगिक हैं? ये किस प्रकार लोगों के अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं। अक्‍सर ऐसे कुछ सवाल बिना सटीक उत्‍तर दिए उठाए जाते हैं।

दो चरम और संतुलित अभिव्‍यक्ति
   प्रबुद्ध राजनेताओं और प्रशासकों ने शिक्षा के महत्‍व, स्‍वास्‍थ्‍य रक्षा सेवाओं तक पहुंच, अधिक जागरूकता और अधिक महत्‍वपूर्ण और समग्र आर्थिक विकास के महत्‍व को समझना शुरू कर दिया है जिससे जनसंख्‍या स्थिरता के लिए बेहद जरूरी परिवर्तन को प्राप्‍त करने में सहायता मिलेगी।

भारत सरकार द्वारा उठाए गए क़दम   
केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद ने कहा कि बढ़ती जनसंख्‍या के कारण विकास का पर्याप्‍त लाभ प्राप्‍त नहीं रहा है। उन्‍होंने कहा कि अधिक उम्र में विवाह तथा दो बच्‍चों में उचित अंतर को बढ़ती हुई जनसंख्‍या के सम्‍भावित समाधान के रूप में विशेष महत्‍व दिया जाना चाहिए। परिवार नियोजन को प्रोत्‍साहन देने के लिए दबाव न बनाया जाए बल्कि छोटे परिवार के लिए वैश्विक स्‍वीकृति की आवश्‍यकता है।
   
गत वर्ष स्‍वास्‍थ्य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय तथा जनसंख्‍या स्थिरता कोष द्वारा आयोजित कार्यक्रम में तीसरी कक्षा की छात्रा रेखा कालिंदी को सम्‍मानित किया गया था, जिसने दस वर्ष की उम्र में शादी करने से इंकार किया था। राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के अनुसूचित जाति तथा जनजाति के दम्‍पत्तियों को भी परिवार नियोजन के प्रतिमान के रूप में सम्‍मानित किया गया था। इन दम्‍पत्तियों को प्रेरणा पुरस्‍कार भी दिए गए थे। आशा (एक्रेडिटिड सोशल हेल्‍थ एक्टिविस्‍ट) के कार्यकर्ताओं द्वारा ग्रामीणों को शिक्षित करने में उनकी भूमिका के लिए विशेष उल्‍लेख किया जाना आवश्‍यक है। अत: विश्‍व जनसंख्‍या दिवस को प्रत्‍येक गांव, ब्‍लॉक‍और जिला स्‍तर पर आयोजित किया जाना चाहिए ताकि यह जन-आंदोलन का रूप ले सके।
   
देश बढ़ती हुर्इ जनसंख्‍या की एक जटिल समस्‍या से ग्रस्‍त है और यह समस्‍या आगे भी जारी रहेगी। जागरूकता भागीदारी तथा जनसंख्‍या नियंत्रण सेवाओं की उपलब्‍धता के साथ-साथ कड़ी सर्तकता और पारदर्शिता से इसकी गंभीरता को कम करने में मदद मिलेगी। जिससे हम सबको सेवा प्रदाताओं और नौकरशाही के रवैये में बदलाव का भी सुझाव दिया गया जो बहुत जरूरी है। यह खुशी की बात है कि लगभग 50 वर्षों के एकतरफा संवाद के बाद सरकार ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस का स्‍वागत किया है।

वैश्विक स्थिति 
      विश्‍व रिपोर्ट में पश्चिम अफ्रीकी देश नाईजर का उल्‍लेख किया गया है जहां पिछले 30 वर्षों में जीवन की प्रत्‍याशा बढ़ी है लेकिन प्रत्‍येक 20 वर्षों में इसकी जनसंख्‍या दुगनी हुई है। वर्ष 2050 तक इसकी कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में 3.9 प्रतिशत की गिरावट आएगी जो एक सकारात्‍मक रूख को दर्शाता है। वर्ष 2050 तक जनसंख्‍या 15.5 से बढ़कर 55.5 मिलियन हो जाएगी। भविष्‍य में नाईजर में भी जनसंख्‍या वृद्धि खाद्य और आवश्‍यक वस्‍तुओं के उत्‍पादन से अधिक होने की संभावना है।

रिपोर्ट के अंत में यह चेतावनी दी गई है कि : ''पृ‍थ्‍वी पर इतनी अधिक जनसंख्‍या कभी नहीं थी। इसकी खपत का  स्‍तर अप्रत्‍याशित है और पर्यावरण में काफी बड़े परिवर्तन भी हो रहे हैं। हमें यह चुनना होगा कि हम संसाधनों का समतामूलक उपयोग करें या इस बारे में कुछ भी न करें और ऐसा करते हुए हम आर्थिक और पर्यावरण की उत्‍तरोत्‍तर बढ़ती समस्‍याओं की गर्त में समाकर, अधिक असमान और असह्य भविष्‍य की ओर बढ़ते चले जाएं’’।

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