औषधीय पौधों की खेती

Posted Star News Agency Tuesday, December 03, 2013 ,

फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में हर्बल पदार्थों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ दुनिया की 80 फ़ीसद आबादी अपनी स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों के लिए औषधीय पौधों और पशुओं पर आश्रित है. अकेले अमेरिका में 33 फ़ीसद लोग हर्बल पद्धति में विश्वास करते हैं. अमेरिका में आयुर्वेद विश्वविद्यालय खुल रहे हैं और जर्मनी, जापान, ऒस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, नीदरलैंड, रूस और इटली में भी आयुर्वेद पीठ स्थापित हो रहे हैं. दुनियाभर में औषधीय पौधों की मांग लगातार बढ़ रही है. एक अनुमान के मुताबिक़ चीन 22 हज़ार करोड़ रुपये का औषधीय उत्पाद निर्यात करता है. भारत का निर्यात कारोबार महज़ 462 करोड़ रुपये का है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें, तो औषधीय वनस्पति और वनस्पति उत्पाद का वैश्विक बाज़ार साल 2050 तक पांच ट्रिलीयन अमेरिकी डॊलर तक पहुंच सकता है.  भारत औषधीय पौधों का भंडार है. एक अंदाज़ के मुताबिक़  दुनियाभर में औषधीय पौधों की 3.6 लाख प्रजातियां हैं. इनमें से 40 फ़ीसद भारत में हैं. आंकड़ों की बात की जाए, तो  यहां दस हज़ार से भी ज़्यादा प्रकार के औषधीय पौधे हैं. इनका इस्तेमाल विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की दवाएं बनाने में किया जाता है.  एक जानकारी के मुताबिक़ 1800 औषधीय पौधों का इस्तेमाल आयुर्वेद में, 4700 पारंपरिक चिकित्सा व्यवसाय में, 1100 सिद्ध औषधीय प्रणाली, 750 यूनानी, 300 होम्योपैथी में, 300 चीनी औषध प्रणाली में होता है, जबकि 100 पौधे एलोपैथी दवाएं बनाने में काम आते हैं.  भारत में तक़रीबन 70 फ़ीसद औषधीय पौधे पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, विंध्याचल, छोटानागपुर का पठार, अरावली, हिमालय की तराई में क्षेत्र और उत्तर पूर्व में फैले उष्ण कटिबंधीय जंगलों में पाए जाते हैं. पिछले कुछ बरसों में हर्बल उत्पादों की मांग बहुत बढ़ी है, जो कृषि,  रोज़गार और आमदनी के नज़रिये से अच्छी है. भारतीय उद्योग द्वारा तक़रीबन 90 फ़ीसद से ज़्यादा औषधीय पौधों का इस्तेमाल किया रहा है.  लेकिन चिंता की बात यह है कि औषधीय पौधों की बढ़ती मांग की वजह से इनका अत्यधिक दोहन हो रहा है. नतीजतन औषधीय पौधों की अनेक प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं.
एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 335 औषधीय पौधे ऐसे हैं, जो विलुप्त प्राय: पौधों की श्रेणी में दर्ज हैं. उनके नाम आईयूसीएन की श्रेणियों और मानदंड से संबद्ध लाल सूची में अत्यधिक विलुप्त प्राय: (सीआर), विलुप्त प्राय: (ईएन), और असुरक्षित (वीयू) से लेकर विलुप्त प्राय: होने के क़रीब (एनटी) जैसी श्रेणियों में दर्ज हैं. पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में उत्कृष्टता के केंद्र फाउंडेशन फॉर रिवाइटलाइजेशन ऑफ लोकल हेल्थ ट्रेडिशंस (एफआरएलएचटी) ने अपने अध्ययनों के आधार पर इन पौधों को लाल सूची का दर्जा दिया है. भारत सरकार द्वारा नवंबर, 2002 में गठित राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (एनएमपीबी) को औषधीय पौधों से जुड़े सभी मामलों, समर्थन नीतियों तथा व्यापार में वृध्दि, निर्यात, संरक्षण एवं संवर्धन के कार्यक्रमों के समन्वयन का प्राथमिक अधिकार प्राप्त है. एनएमपीबी ने साल 2008 में औषधीय पौधों के संरक्षण, विकास एवं सतत प्रबंध के लिए एक केंद्रीय क्षेत्र योजना शुरू की थी. इस योजना का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण औषधीय पौधों की सतत आपूर्ति सुनिश्चित करना, अनुसंधान एवं विकास, प्रशिक्षण एवं जागरूकता और घर-स्कूलों में हर्बल बग़ीचे जैसी प्रोत्साहन गतिविधियां चलाते हुए पौधों पर आधारित स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देना है. देश के वैविध्यपूर्ण औषधीय पौधों के संरक्षण, सुरक्षा, संवर्धन, प्रचार, बेहतर फ़सल और संग्रहण गतिविधियों के अतिरिक्त पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने साल 2006 में 12 करोड़ 90 लाख रुपये की लागत से नौ राज्यों कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान में यूएनडीपी कंट्री कार्यक्रम का दायित्व संभाला था. यह कार्यक्रम इस जून, 2010 में संपन्न हो गया. इस परियोजना का मक़सद स्वास्थ्य एवं आजीविका सुरक्षा को व्यापक बनाने तथा इन्हें वानिकी एवं स्वास्थ्य क्षेत्र की वर्तमान नीतियों एवं कार्यक्रमों के साथ लागू करने के लिए औषधीय पौधों के संरक्षण एवं परम्परागत ज्ञान को बढ़ावा देना है. साल 2010  में मंत्रालय ने 'औषधीय पादप जैवविविधता के संरक्षण एवं सतत इस्तेमाल को मुख्यधारा में लाने' से संबद्ध जीईएफ-यूएनडीपी परियोजना नामक एक अन्य परियोजना शुरू की. इसे तीन राज्यों छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में लागू किया गया. जैव विविधता अधिनियम-2002 औषधीय पौधों सहित वानिकी संघटकों तक अपनी पहुंच विनियमित करता है. जैव विविधता अधिनियम-2002 की धारा-38 के मुताबिक़ केंद्र सरकार संबद्ध राज्य सरकार की सलाह के साथ विलुप्तता के क़गार पर पहुंच चुकी या निकट भविष्य में विलुप्तता के क़गार तक पहुंचने की आशंका वाली किसी भी प्रजाति को समय-समय पर अधिसूचित करेगी और उनके संग्रहण को प्रतिबंधित या विनियमित करेगी तथा इन प्रजातियों की पुन:स्थापना और संरक्षण करने के लिए भी समुचित क़दम उठाएगी. इसके आधार पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने विलुप्त प्राय: पौधों और प्राणियों की राज्यवार सूची तैयार करने के साथ भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण और भारतीय जीव विज्ञान सर्वेक्षण के परामर्श से उनके पुनर्वास के लिए दिशा-निर्देश भी तैयार किए हैं.
एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आंवला, अश्वगंधा, सैना, कुरु, सफ़ेद मूसली, ईसबगोल, अशोक, अतीस, जटामांसी, बनककड़ी, महामेदा, तुलसी, ब्राहमी, हरड़, बेहड़ा, चंदन, धीकवर, कालामेधा, गिलोय, ज्वाटे, मरूआ, सदाबहार, हरश्रृंगार, घृतकुमारी, पत्थरचट्टा, नागदौन, शंखपुष्पी, शतावर, हल्दी, सर्पगंधा, विल्व, पुदीना, अकरकरा, सुदर्शन, पुर्नवादि, भृंगराज, लहसुन, काला जीरा और गुलदाऊदी की बहुत मांग है.  हरियाणा में भी सरकार औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने पर ख़ास ज़ोर दे रही है. राज्य में शामलात भूमि पर औषधीय पौधे लगाए जा रहे हैं. इससे पंचायत की आमदनी में बढ़ोतरी होने के साथ-साथ किसानों को औषधीय पौधों की खेती की ओर आकर्षित करने में भी मदद मिलेगी. राज्य के यमुनानगर ज़िले के चूहड़पुर में चौधारी देवीलाल हर्बल पार्क स्थापित किया गया है. इसका उदघाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॊ. एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था. क़ाबिले-ग़ौर है कि डॊ.कलाम ने अपने कार्यकाल में राष्ट्रपति भवन में औषधीय पौधों का बग़ीचा तैयार करवाया था. हरियाणा में परंपरागत नग़दी फ़सलों की खेती करने वाले किसानों का रुझान अब औषधीय पौधों की खेती की तरफ़ बढ़ रहा है. कैथल ज़िले के गांव चंदाना निवासी कुशलपाल सिरोही अन्य फ़सलों के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती भी करते हैं. उनके खेत में लेमन ग्रास, गुलाब, तुलसी, अश्वगंधा, सर्पगंधा, धतूरा, करकरा और शंखपुष्पी जैसे अनेक औषधीय पौधे लगे हैं. उनका कहना है कि औषधीय पौधे ज़्यादा आमदनी देते हैं. गुलाब का असली अर्क तीन से चार लाख रुपये प्रति लीटर बिकता है.
आयुर्वेद की पढ़ाई करने वाले यमुनानगर ज़िले के गांव रुलेसर निवासी इरशाद अहमद ने अपने खेत में रुद्राक्ष, चंदन और दारूहरिद्रा के अनेक पौधे लगाए हैं. ख़ास बात यह है कि जहां रूद्राक्ष के वृक्ष चार साल के बाद फल देना शुरू करते हैं, वहीं उनके पौधे महज़ ढाई साल के कम अरसे में ही फलों से लद गए हैं. इरशाद अहमद के मुताबिक़ रूद्राक्ष के पौधों को पालने के लिए उन्होंने देसी पद्धति का इस्तेमाल किया है. उन्होंने गोबर और घरेलू जैविक खाद को पौधों की जड़ों में डाला और गोमूत्र से इनकी सिंचाई की. दीमक व अन्य हानिकारक कीटों से निपटने के लिए उन्होंने पौधों पर हींग मिले पानी का छिड़काव किया. उनका कहना है कि जिन लोगों के पास थोड़ी-सी भी कृषि भूमि है, वे औषधीय पौधों की खेती करके अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं.
रूद्राक्ष व्यापारी राजेश त्रिपाठी कहते हैं कि रूद्राक्ष एक फल की गुठली है. फल की गुठली को साफ़ करने के बाद इसे पालिश किया जाता है, तभी यह धारण करने योग्य बनता है. गले का हार या अन्य अलंकरण बनाने के लिए इन पर रंग किया जाता है. आमतौर पर रूद्राक्ष का आकार 1.3 सेंटीमीटार तक होता है. ये गोल या अंडाकार होते हैं. इनकी क़ीमत इनके मुखों के आधार पर तय होती है. अमूमन रूद्राक्ष एक से 21 मुख तक का होता है. लेकिन 1, 18, 19, 20, और 21 मुख के रूद्राक्ष कम ही मिलते हैं. असली रूद्राक्ष की क़ीमत हज़ारों से लेकर लाखों रुपये तक आंकी जाती है. इनमें सबसे ज़्यादा क़ीमती रूद्राक्ष एक मुख वाला होता है. रूद्राक्ष की बढ़ती मांग की वजह से आजकल बाज़ार में नक़ली रूद्राक्षों की भरमार है. नक़ली रूद्राक्ष लकड़ी के बनाए जाते हैं. इनकी पहचान यह है कि ये पानी में तैरते हैं, जबकि असली रूद्राक्ष पानी में डूब जाता है. ग़ौरतलब है कि भारतीय संस्कृति से रूद्राक्ष का गहरा संबंध है. आध्यात्मिक दृष्टि से भी इसे बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. यहां के समाज में मान्यता है कि रूद्राक्ष धारण करने से अनेक प्रकार की बीमारियों से निजात पाई जा सकती है. रूद्राक्ष के प्राकृतिक वृक्ष उत्तर-पूर्वी भारत और पश्चिमी तटों पर पाए जाते हैं. नेपाल में इसके वृक्षों की संख्या सबसे ज़्यादा है. ये मध्यम आकार के होते हैं. मई और जून के महीने में इस पर सफ़ेद फूल लगते हैं और सितंबर से नवंबर के बीच फल पकते हैं. अब मैदानी इलाक़ों में भी इसे उगाया जाने लगा है.
राजस्थान में भी औषधीय पौधों की खेती ख़ूब हो रही है. देसी-विदेशी आयुर्वेदिक दवा कंपनियां किसानों को औषधीय फ़सलों के वाजिब दाम दे रही हैं.  इतना ही नहीं, ये कंपनियां किसानों को औषधीय पौधों की खेती के लिए विशेषज्ञों से प्रशिक्षण भी दिलवा रही हैं.  राजस्थान के जयपुर, अलवर, जोधपुर, कोटा, सीकर, श्रीगंगानगर सहित कई ज़िलों में किसान औषधीय पौधों की खेती करके अच्छा मुनाफ़ा कमा रहे हैं.  वे घृत कुमारी, काला धतूरा, अडूसा, वन तुलसी, अश्वगंधा, पनीरबंध और गुड़मार की खेती कर रहे हैं.  दवा निर्माता कंपनियां किसानों से कई बरसों का क़रार भी कर रही हैं.  जोधपुर स्थित मरु वानिकी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक औषधीय गुणों वाली व विलुप्त हो रही प्रजातियों के पौधों को संरक्षित कर रहे हैं. यहां के वैज्ञानिकों ने पांच साल में ऐसी करीब 70 प्रजातियों के पौधों का संग्रहण और संरक्षण किया है. यहां नर्सरियों में औषधीय पौधों की पौध भी तैयार की जा रही है.
बिहार में भी किसान औषधीय पौधों की खेती कर रहे है. शेखपुरा ज़िले के गांव केवटी के अभिनव वशिष्ठ ने भी एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करने की बजाय अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर औषधीय पौधों की खेती शुरू कर दी. उन्होंने शुरुआत चार एकड़ भूमि से की थी, जो अब बढ़कर 20 एकड़ से ज़्यादा गई है.  उनकी देखादेखी आसपास के गांवों के दो सौ किसानों ने भी औषधीय पौधों की खेती शुरू कर दी. अभिनव वशिष्ठ ने अपनी पढ़ाई के दौरान देहरादून में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान औषधीय पौधों की खेती के बारे में जानकारी हासिल की थी, जो बाद में उनके काम आई. उन्हें साल 2007 में सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में 'किसान श्री' का पुरस्कार मिल चुका है. वह तुलसी और लेमन ग्रास की खेती कर रहे हैं. 
क़ाबिले-ग़ौर है कि राष्ट्रीय औषधीय पौध मिशन के तहत किसानों को औषधीय पौधों की खेती के लिए सरकार की तरफ़ से अनुदान दिया जाता है. यह औषधीय बग़ीचों की स्थापना पर फ़सल के अनुसार अनुदान निर्धारित किया जाता है,  मसलन मुलैठी के लिए 50 हज़ार रुपये का अनुदान दिया जाता है. इसी तरह सर्पगंधा की खेती के लिए 31250 रुपये, बेल के लिए 20,000 रुपये आंवले के लिए 13000 रुपये, सतावरी के लिए 12500,  एलोवेरा के लिए 8500 रुपये, ब्राह्मी के लिए 8000 रुपये, नीम के लिए 7500,  कलिहारी के लिए 68750 रुपये, तुलसी के लिए 6000,  गिलोय के लिए 5500 रुपये और कालमेध के लिए 5000 रुपये का अनुदान दिया जाता है.
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (एनएमपीबी) ने भारतीय जलवायु के मद्देनज़र 32 प्रकार के ऐसे औषधीय पौधों की सूची बनाई है, जिनकी खेती करके किसान ज़्यादा आमदनी हासिल कर सकते हैं. इस प्रकार इन औषधीय पौधों की एक ओर उपलब्धता बढ़ेगी, तो दूसरी ओर उनके लुप्त होने का ख़तरा भी नहीं रहेगा. बढ़ती आबादी और घटती कृषि भूमि ने किसानों की हालत बद से बदतर कर दी है. लेकिन ऐसी हालत में जड़ी-बूटी आधारित कृषि किसानों के लिए आजीविका कमाने का एक नया रास्ता खोलती है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि औषधीय पौधों की खेती करके किसान प्रति एकड़ दो से ढाई लाख रुपये सालाना कमा सकते हैं. बस, ज़रूरत है किसानों को थोड़ा-सा जागरूक करने की. इसमें कृषि विभाग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. गांवों में कार्यशालाएं आयोजित करके किसानों को औषधीय पौधों की खेती की जानकारी दी जा सकती है. उन्हें बीज और पौधे आदि उपलब्ध कराने के अलावा पौधों की समुचित देखभाल का तरीक़ा भी बताया जाना चाहिए. इसके साथ ही यह भी ज़रूरी यह है कि किसानों की फ़सल को सही दामों पर बेचने की व्यवस्था करवाई जाए. 

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