फ़िरदौस ख़ान
आदिकाल से ही पुरुष स्वयं को श्रेष्ठ और ताक़तवर साबित करने के लिए महिलाओं पर ज़ुल्म करता आया है. उसने महिलाओं के दमन और शोषण के लिए अनेक कुप्रथाएं चलाई हैं. कभी नियोग के नाम पर, तो कभी देवदासी के नाम पर और कभी सती-प्रथा के नाम पर. सच तो यह है कि आज भी ये कुप्रथाएं किसी-न-किसी रूप में समाज में मौजूद हैं. यदि यह कहें कि पूरा समाज ही पुरुष मानसिकता से ग्रस्त है, तो शायद ग़लत न होगा. महिलाओं को इसलिए इंसाफ़ नहीं मिल पाता है, क्योंकि ज़ुल्म करने वाला पुरुष, इंसाफ़ दिलाने वाला पुरुष और इंसाफ़ देने वाला भी पुरुष ही होता है. देश में महिलाओं के प्रति यौन उत्पी़डन और हिंसा की लगातार ब़ढती घटनाएं इसी पुरुषवादी मानसिकता की देन हैं. तभी तो समाज के तथाकथित ठेकेदार जहां इन घटनाओं पर रोक लगाने के लिए कारगर क़दम उठाने की बजाय महिलाओं को ही कुसूरवार ठहराते हुए, उन पर तरह-तरह की अमानवीय पाबंदियां लगा देते हैं, और हैरानी की बात तो यह है कि अदालतों में भी उन्हें इंसाफ़ नहीं मिल पाता है. इस वजह से आपराधिक तत्वों को शय मिलती है और वे लगातार अमानवीय हिंसक घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं. पिछले साल दिसंबर माह में दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना इस बात का सबूत है. अनगिनत मामले सामने आ चुके हैं, जब अदालतों से पी़डितों को आंसू बहाते हुए बाहर आना प़डा है. ऐसा ही हुआ था आदिवासी ल़डकी मथुरा के साथ, जब उसे अंतत: अदालत से भी इंसाफ़ नहीं मिला. हुआ यूं कि 1972 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर में सोलह वर्षीय आदिवासी लड़की मथुरा के साथ पुलिस थाने में दो पुलिसर्मियों ने बलात्कार किया. पहले तो पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया, लेकिन मीडिया के दबाव की वजह से अंतत: पुलिस में केस दर्ज ज़रूर हो गया. 1974 में यह मामला सत्र न्यायालय के सामने आया, लेकिन अदालत ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया. अपने फ़ैसले के पक्ष में अदालत ने मथुरा के अतीत को आधार बनाते हुए कहा कि वह अपने पुरुष मित्र के साथ पहले भाग चुकी है, इसलिए उसे शारीरिक संबंधों की आदत है. शर्म की बात तो यह है कि अदालत ने दलील दी कि पुलिस थाने में उसके साथ जो कुछ भी हुआ, उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. उसके बाद 1979 में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, लेकिन वहां भी यही हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने भी सत्र अदालत के तर्क को आधार बनाते हुए आरोपियों को बेक़सूर क़रार दिया. इस फैसले के ख़िलाफ़ मीडिया सहित तमाम जनसंगठनों ने आवाज़ बुलंद की. सवाल यह उठा कि क्या अपनी मर्ज़ी से शारीरिक संबंध बनाने वाली महिला के साथ किसी को भी ज़बरदस्ती करने की छूट मिल जाती है? ख़ैर, जनविरोध की वजह से 1983 में सरकार को बलात्कार से जुड़े क़ानूनों में संशोधन करना पड़ा.

मेरठ की माया त्यागी के साथ बाग़पत में पुलिसकर्मियों ने बलात्कार किया था. इस दौरान पुलिसकर्मियों ने उसके पति और दो साथियों की बेरहमी से हत्या कर दी. उस व़क्त माया त्यागी मामले की जांच के लिए नेशनल लोकदल के नेता चौधरी चरण सिंह ने एक आंदोलन चलाया. नतीजतन, उत्तर प्रदेश सरकार को एक न्यायिक जांच आयोग का गठन ही करना पड़ा. लेकिन इस मामले से जुड़े लोगों को ठेस तब पहुंची, जब इस आयोग की अंतिम जांच में सभी आरोपियों को बेक़सूर बताया गया. एक सच यह भी है कि उस व़क्त आरोपियों पर अपराध को साबित करने का सारा दबाव पी़डित पक्ष पर ही होता था, जिसकी वजह से आरोपी साफ़ बच निकलते थे. दरअसल, पुलिस बलात्कार पी़डिता के साथ अमानवीय बर्ताव करती है. पहले तो मामला ही दर्ज नहीं किया जाता, अगर किसी दबाव की वजह से मामला दर्ज हो भी जाए, तो पीड़िता की वक़्त पर चिकित्सकीय जांच नहीं कराई जाती, जिससे उसका मामला कमज़ोर पड़ जाता है, क्योंकि घटना के 24 घंटे बाद चिकित्सकीय जांच में बलात्कार की पुष्टि हो पाना पूरी तरह से मुश्किल हो जाता है, क्योंकि अदालत की पूरी कार्रवाई सबूतों के आधार पर ही होती है और 24 घंटे बाद सबूत ख़त्म हो जाते हैं. इतना ही नहीं, बलात्कार जांच में भी पीड़िता के साथ ग़लत बर्ताव किया जाता है. होना तो यह चाहिए कि जांच महिला चिकित्सक करे, लेकिन महिला चिकित्सकों की कमी की वजह से पुरुष चिकित्सक ही पीड़िता की जांच करते हैं. उनके जांच करने के तरीक़े भी आदिकाल के ही हैं, जिनके आधार पर वह रिपोर्ट तैयार करते हैं. इस तरह पीड़िता को दोहरे बलात्कार की तकलीफ़ सहनी पड़ती है. हालांकि इस पर भी बहस चल रही है.

एक निर्विवाद सत्य यह भी है कि देश की लचर क़ानून व्यवस्था भी आरोपियों के लिए वरदान साबित हो रही है. संगीन अपराध करके भी बलात्कारी मज़े की ज़िंदगी गुज़ारते हैं, जबकि पी़डितों को हर रोज़ तिल-तिल मरना प़डता है. राजस्थान की भंवरी देवी पिछले 19 बरसों से इंसाफ़ के लिए संघर्षरत हैं, लेकिन अभी तक उनकी कहीं कोई सुनवाई ही नहीं हुई. जयपुर के गांव भटेरी की भंवरी देवी के साथ 22 सितंबर, 1992 को गांव के गुर्जरों ने सामूहिक बलात्कार किया था. हमारे समाज में बलात्कारी तो सिर उठाकर चलते हैं, लेकिन पीड़ितों को मुंह छुपाकर जीना पड़ता है, क्योंकि समाज बलात्कारियों को सज़ा देने की बजाय पीड़ित महिलाओं को कलंकिनी या कुलटा की संज्ञा दे डालता है. ऐसी हालत में पीड़ित महिलाएं आत्महत्या तक कर लेती हैं. बलात्कार पीड़ितों द्वारा ख़ुद को जला लेने या फांसी लगाकर ख़ुदकुशी करने की घटनाएं आम हैं. पिछले साल पंजाब के पटियाला ज़िले के गांव बादशाहपुर की सामूहिक बलात्कार की शिकार 18 वर्षीय युवती ने पुलिस द्वारा कार्रवाई न किए जाने के कारण दुखी होकर आत्महत्या कर ली. देश में महिला पुलिसकर्मियों और महिला जजों की काफ़ी कमी है, इस वजह से जहां मामले की कार्रवाई महिला पुलिस अधिकारी नहीं कर पातीं, वहीं अदालतों में भी आरोपियों के वकील महिलाओं से अश्‍लील सवाल करके उन्हें मानसिक रूप से प्रता़डित करते हैं. बलात्कार की परिभाषा को लेकर भी अक्सर सवाल उठते रहे हैं. हालांकि 1983 में बलात्कार विरोधी क़ानून में संशोधन भी हुआ, जिसके तहत बलात्कार में शील भंग की जगह यौन हिंसा शब्द का इस्तेमाल किया गया. अफ़सोस की बात यह भी है कि क़ानून में प्राकृतिक यौनाचार को बलात्कार माना जाता है, जबकि किसी तरह के अप्राकृतिक यौनाचार को बलात्कार से मुक्त रखा गया है. ऐसी हालत में जो लोग किसी वस्तु के ज़रिये महिलाओं का यौन उत्पी़डन करते हैं, वे साफ़ बच निकलते हैं. सती प्रथा ने भी महिलाओं की ज़िंदगी को मौत में बदलने का काम किया. मीडिया की बदौलत ऐसे मामले भी कभी-कभी सामने आ जाते हैं. ग़ौरतलब है कि राजस्थान के गांव देवराला में रूप कंवर के सती होने के मामले को मीडिया ने ही उजागर किया था. रूप कुंवर के सती होने के तेरहवें दिन 16 दिसंबर, 1987 को जब चुनरी महोत्सव की तैयारियां शुरू हुईं, तो मीडिया ने इसे एक बहस का मुद्दा बना दिया. इसके बाद जगह-जगह आंदोलन शुरू हो गए और इसी वजह से सती निरोधक क़ानून को और सख्त बनाने की मांग की जाने लगी. जब यह मामला केंद्र सरकार के पास गया, तो महिला और बाल विकास मंत्रालय ने सती निरोधक क़ानून के तहत आरोपियों की सज़ा बढ़ाने के साथ-साथ समुदाय और उस गांव के प्रमुख को आरोपी बनाने की सिफ़ारिश की. लेकिन शर्म की बात यह रही कि संसद में बहस के दौरान राजस्थान के भाजपा नेताओं ने इस क़ानून में बदलाव करने का विरोध किया. उनका मानना था कि राजपूतों की इस परंपरा में क़ानून की दख़लंदाज़ी नहीं होनी चाहिए. हालांकि इस विरोध के बाद भी सती निरोधक क़ानून में संशोधन कर दिया गया. इसी तरह दहेज विरोधी क़ानून को सख्त बनाने में भी जनमानस की भूमिका महत्वपूर्ण रही. 1970 में दिल्ली में एक नवविवाहिता की हत्या कर दी गई थी. उस व़क्त सैक़डों लोगों ने मृतक महिला के ससुराल के सामने विरोध प्रदर्शन किया. इससे प्रेरित होकर लोगों ने दहेज हत्या के विरुद्ध आवाज़ उठानी शुरू कर दी. नतीजतन, 1982 में दहेज निषेध क़ानून को मज़बूत करने के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया गया. इसकी सिफ़ारिशों के आधार पर 1986 में दहेज निषेध क़ानून में बदलाव करके इसे और सख्त बना दिया गया, लेकिन पुरुष इसके विरोध में अक्सर लामबंद नज़र आते हैं, इसलिए यहां भी पुरुषों का विरोध झेलना पड़ा.

महिलाएं घरेलू हिंसा और वैवाहिक बलात्कार झेलने को भी भी मजबूर हैं. क़ानून विवाहित महिलाओं के साथ पतियों द्वारा किए गए बलात्कार को अपराध नहीं मानता है. इससे यही लगता है कि महिलाएं अपने पतियों की शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने वाली ग़ुलाम हैं और विवाह पुरुषों को अपनी पत्नियों के साथ बलात्कार करने का लाइसेंस है. हालांकि पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध को बलात्कार माना जाता है, लेकिन इसके लिए क़ानून में बालिग़ होने की हालत में कहीं साफ़-साफ़ ज़िक्र नहीं है. हैरत की बात तो यह है कि महिलाओं पर अत्याचार होते हैं और सज़ा भी उन्हें ही भुगतनी पड़ती है. बीते फ़रवरी माह में बिहार के सीवान ज़िले के गांव मखनपुर में तीन लड़कियों के कथित अपहरण के बाद ग्रामीणों ने लड़कियों को जींस,  टी-शर्ट पहनने और मोबाइल फ़ोन रखने पर पाबंदी लगा दी. फ़रमान नहीं मानने पर लड़कियों के अभिभावकों से जुर्माने के तौर पर 10 हज़ार रुपये वसूलने की बात भी कही. इतना ही नहीं, ल़डकियों पर नज़र रखने के लिए रातों-रात 11 सदस्यीय निगरानी समिति का गठन तक कर दिया. ऐसे कितने ही मामले हैं, जब समाज के ठेकेदारों ने दोषियों को खुली छूट देते हुए महिलाओं पर ही पाबंदियां लगाई हैं. मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री बाबू लाल गौर ल़डकियों के पहनावे पर सवाल खड़ा कर चुके हैं. पिछले साल दिसंबर माह में मध्य प्रदेश में जैन समाज ने सरकार से जींस-टॉप और पारदर्शी परिधान पर रोक लगाने की मांग की थी. मध्य प्रदेश के दमोह के पथरिया में आयोजित जैन समाज के सिद्धचक्र महामंडल में मृदुमति माता और ब्रह्मचारी प्रदीप भैया ने युवतियों के जींस व टॉप के पहनने को अनुचित क़रार दिया. वहीं दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार कांड पर टिप्पणी करते हुए आसाराम बापू ने पीड़िता को भी बराबर का ज़िम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, दोनों हाथों से बजती है. उन्होंने कहा कि बलात्कार के लिए लड़की का भी दोष है. वह चाहती, तो आरोपियों को भाई कहकर, उनके हाथ-पैर जोड़ सकती थी, जिससे वह बच जाती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. महिलाओं के ख़िलाफ़ टिप्पणियां करने में उच्च पदों पर बैठे लोग भी पीछे नहीं हैं. केंद्रीय मंत्री व्यालार रवि ने 1996 सूर्यनेल्ली सामूहिक बलात्कार मामले में फंसे राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन से जुड़ा सवाल पूछने वाली महिला पत्रकार से पूछा कि क्या कभी आपका रेप हुआ? विवादित बयान देने में पश्‍चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पीछे नहीं हैं. उनका कहना है कि पहले लड़के-लड़कियां अगर एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते थे, तो उनके माता-पिता उन्हें पकड़ लेते थे, डांटते थे, लेकिन अब सब कुछ खुला है. खुले बाज़ार में खुले विकल्पों की तरह. तृणमूल कांग्रेस नेता काकोली घोष ने पश्‍चिम बंगाल के पार्क स्ट्रीट बलात्कार मामले के बारे में कहा कि यह मामला बलात्कार का नहीं है, बल्कि महिला और क्लाइंट के  बीच विवाद का नतीजा है, यानी घोष के  कहने का मतलब यह था कि बलात्कार की शिकार लड़की जिस्मफ़रोशी करती है. हैरानी की बात तो यह है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी भी ऐसा ही विवादित बयान दे चुके हैं. उन्होंने कहा कि पहले कैंडल मार्च निकाला जाता है और उसके बाद प्रदर्शनकारी डिस्को चले जाते हैं. सीपीएम के विधायक अनीसउर्रहमान ने दीनापुर में एक रैली में बलात्कार के बढ़ते मामलों का ज़िक्र करते हुए प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भद्दी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी, अगर तुम्हारा बलात्कार हो जाए, तो तुम कितना पैसा लोगी? टीवी पर लाइव बहस के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संजय निरुपम ने भाजपा नेता और अभिनेत्री स्मृति ईरानी पर टिप्पणी करते हुए कहा, तू तो टीवी पर ठुमके लगाती थी और चुनाव विश्‍लेषक बन गई है. हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य धर्मवीर गोयत ने कहा कि हरियाणा में सामने आए बलात्कार के ज़्यादातर मामले दरअसल सहमति से सेक्स के मामले हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बलात्कार पी़डितों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया था, जिस पर काफ़ी बवाल मचा था. ऐसा नहीं है कि महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियां भारत में ही होती हैं, कमोबेश अन्य देशों का भी यही हाल है, क्योंकि वहां तो पुरुषवादी मानसिकता ही काम करती है. पिछले दिनों इंडोनेशिया के सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होने के आकांक्षी एक न्यायाधीश से जब पूछा गया कि बलात्कार के लिए मौत की सज़ा होनी चाहिए या नहीं, तो उन्होंने साफ़ कहा कि हो सकता है कि बलात्कारी और पीड़िता ने इसका मज़ा लिया हो, ऐसे में मौत की सज़ा देने से पहले हमें दो बार सोचना चाहिए. हालांकि बाद में उन्होंने इसे मज़ाक़ बताते हुए माफ़ी भी मांग ली. इसी तरह अमेरिकी सीनेट के लिए मिसौरी से रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार कांग्रेस सदस्य टॉड एकीन से जब पूछा गया था कि क्या वह उन महिलाओं के लिए गर्भपात का समर्थन करेंगे, जिनके साथ बलात्कार हुआ होगा, तो उन्होंने कहा कि चिकित्सकों से जो कुछ भी मैंने समझा, उससे मुझे यही लगता है कि ऐसा विरले ही होता है. अगर यह वैध बलात्कार है, तो महिला के शरीर में ऐसे उपाय हैं कि वह पूरी चीज़ से बच सकती है. जब उनके इस बयान का भारी विरोध हुआ, तो उन्हें भी माफ़ी मांगनी प़डी. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इस बयान की निंदा की. दरअसल, महिलाओं के प्रति ब़ढते अपराध की ज़ड न केवल पुरुषवादी मानसिकता है, बल्कि इसके साथ ही जिस तरह से महिलाओं को वस्तु के रूप में पेश किया जा रहा है, उसने भी महिलाओं को इंसान की बजाय ज़रूरत पूरी करने का सामान बनाकर रख दिया है. इसमें कोई दो राय नहीं कि अख़बारों, पत्रिकाओं और छोटे से लेकर बड़े पर्दे तक परोसी जा रही अश्‍लीलता ने समाज की नैतिकता पर गहरा आघात किया है.

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आज जब महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रही हैं, अपने साथी पुरुषों से कहीं ज़्यादा कामयाबी हासिल कर रही हैं, तो ऐसी स्थिति में पुरुषों में भी हीन भावना पनपने लगी है, क्योंकि उनका पौरुषत्व उन्हें यह सहन नहीं करने देता कि कोई महिला उनसे आगे बढ़े, इसलिए हताशा में आकर वे महिलाओं के प्रति हिंसक हो उठते हैं. कभी-कभी मानसिक बीमारियां भी ऐसे अपराधों का कारण बनती हैं. मनोचिकित्सक डॉ. अरुणा ब्रूटा कहती हैं कि एक सामान्य व्यक्ति कभी बलात्कार नहीं करता. एक मानसिक रोगी ही इस तरह का अपराध करता है. वह कहती हैं कि इस तरह के अपराधों के लिए आज का खुला माहौल भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है. एक आठ साल का बच्चा मेरे पास आता है, जिसे मोबाइल एडिक्शन है, जो सारी-सारी रात मोबाइल पर पोर्नोग्राफिक साइट्स देखता है. इसी तरह एक चौदह साल का बच्चा है, जिसने अपनी मां से कहा कि तू अपने कप़डे उतार, मैं एक औरत का शरीर देखना चाहता हूं  कि वह कैसा होता है? ये मानसिक रोग हैं, क्योंकि ये बच्चे न तो पागल हैं और न ही चरित्रहीन. एक ग्यारह साल का बच्चा वेश्या के पास से पकड़ा गया. उसका कहना था कि वह देखना चाहता था कि फिल्मों में जो दिखाते हैं क्या वह सच में होता है. दरअसल, आपराधिक प्रवृत्ति की शुरुआत यहीं से होती है.

बहरहाल, समाज की मानसिकता में बदलाव लाना होगा, ताकि लोग महिलाओं के साथ गरिमामय बर्ताव करें, क्योंकि जब तक महिलाओं के प्रति पुरुषों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोक पाना नामुमकिन है.

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