स्टार न्यूज़ एजेंसी
हार्ट फेलियर के शिकार मरीजों में दो तरह स्लीप डिसॉर्डर काफी आम होते हैं. इनमें खर्राटे से संबंधित रुकावट डालने वाली स्लीप एप्निया-हाइपोएप्निया (ओएसएएच) और दूसरा खर्राटों से संबंध नहीं रखने वाली शेनी-स्टोक्स ब्रीदिंग (सीएसबी).
 
हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल के मुताबिक़ ओश में नींद के दौरान सांस लेने में रुकावट आती है न कि हर समय सांस लेने में तकलीफ होती है. ऐसा श्वसन तंत्र के ऊपरी हिस्से में रुकावट के चलते होता है जो कि खर्राटों से संबंधित है. सीएसबी में जाग्रत अवस्था और नींद के दौरान सांस लेने में लगने वाला जोर घटता- बढ़ता रहता है. इसमें श्वास नली के ऊपरी हिस्से में रुकावट नहीं होती ऐसे में कई बार नींद के दौरान सांस रुक भी सकती है, जिसे सेंट्रल स्लीप एप्निया सिंड्रोम के नाम से जानते हैं.

रात के समय की एंजाइना (छाती में दर्द) और रेकरेंट रिफ्रैक्टिव एरिदमिया (दिल की धाड़कनों का अनियमित होना) एसडीबी के साथ भी प्रकट हो सकता है. हार्ट फेलियर के मरीजों की जांच के दौरान एसडीबी के लक्षणों के बारे में भी उससे पूछना चाहिए. जो मरीज खर्राटे, दिन के समय काफी ज्यादा थकान, ढंग से नींद न आने की शिकायत करते हैं उनके लिए स्लीप लैब असेसमेंट ज्यादा कारगर साबित हो सकता है. हार्ट फेलियर के उन मरीजों का भी स्लीप टेस्ट किया जाना चाहिए, जिनमें रात के समय एंजाइना, धाड़कनों की अनियमितता और रिफ्रैक्टिव हार्ट फेलियर के लक्षण होते हैं.

हार्ट फेलियर के उन मरीजों की स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है, जिनमें इसके साथ-साथ एसडीबी की समस्या भी है. एसडीबी के साथ हार्ट फेलियर वाले मरीजों के इलाज में ज्यादा विशेषज्ञ देखभाल की जरूर होती है, क्योंकि एसडीबी की वजह से इसमें जटिलताएं बढ़ जाती हैं. अगर शुरुआती दौर में सही इलाज नहीं हुआ, तो एसडीबी की समस्या और बढ़ सकती है. एसडीबी वाले हार्ट फेलियर के मरीजों में अगर सीपीएपी मशीन से श्वास नलियों में हवा का बहाव बढ़ाया जाए, तो उसके कार्डिएक फंक्शन, ब्लड प्रेशर और व्यायाम की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे कि लाइफ की क्वॉलिटी बढ़ जाती है.

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