डॉ. एच. आर. केशवमूर्ति
 अंग दान और अंग  प्रत्यारोपण हर साल हजारों लोगों को नई जिंदगी देता है। अमीरों और गरीबों की बीच बढ़ती खाई, मानव अंगों की मांग और तकनीक की उपलब्धता ने अंगों के व्यापार को कुछ लोगों के लिए धन कमाने का साधन बना दिया है तो कुछ के लिए राहत की राह भी तैयार कर दी है। लेकिन अमूमन अंगों का व्यापार गरीबी में फंसे लोगों के शोषण का जरिया बन जाता है। पैसों की तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए वे अंग बेचने को मजबूर हो जाते हैं।

हर साल सैकड़ों भारतीय अंग प्रत्यारोपण के इंतजार में मर जाते हैं। इसकी वजह है अंग दान करने वालों और प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे लोगों के बीच जबर्दस्त असंतुलन। हर साल 2.1 लाख भारतीयों को गुर्दा प्रत्यारोपण की जरूरत होती है लेकिन सिर्फ 3000 से 4000 गुर्दा प्रत्यारोपण ही हो पाते हैं। हृदय प्रत्यारोपण के मामले में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। देश में हर साल 4000 से 5000 लोगों को हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है लेकिन अब तक सिर्फ 100 लोगों का ही हृदय प्रत्यारोपण हो सका है।

नेशनल प्रोग्राम ऑफ कंट्रोल ऑफ ब्लाइंडनेस- एनपीसीबी की 2012-13 की रिपोर्ट के मुताबिक 2012-13 के दौरान देश में 4,417 कॉर्निया उपलब्ध थे, जबकि हर साल 80,000 से 1,00,000 कॉर्निया की जरूरत होती है। देश में इस समय 120 प्रत्यारोपण केंद्र हैं, जहां हर साल 3500 से 4000 गुर्दा प्रत्यारोपण किए जाते हैं।  इनमें से चार केंद्रों पर 150 से 200 यकृत (लीवर) प्रत्यारोपण होते हैं। जबकि कुछ केंद्रों पर कभी-कभी एकाध हृदय प्रत्यारोपण हो जाता है।

अंग प्रत्यारोपण की दिशा में सबसे बड़ी दिक्कत अंग दान दाताओं का अभाव है। जागरूकता की कमी और अंग दान और प्रत्यारोपण के लिए पर्याप्त आधारभूत संरचना न होने की वजह से अंग प्रत्यारोपण की गति धीमी है। लोगों के बीच इसे लेकर कई सारे मिथक भी हैं और अंग प्रत्यारोपण की दिशा में आने वाली अड़चनों को खत्म करने के लिए इन्हें समाप्त किया जाना भी जरूरी है। बड़ी संख्या में भारतीयों का कहना है अंगों की कांट-छांट या उन्हें शरीर से अलग करना प्रकृति और धर्म के खिलाफ है। कुछ लोगों का मानना है कि अगर उन्हें अंग प्रत्यारोपण कराना हो तो अस्पताल के कर्मचारी उनकी जिंदगी बचाने के लिए मेहनत नहीं करेंगे। कुछ का मानना है कि मरने से पहले ही उन्हें मृत घोषित किया जा सकता है। इसके अलावा अंग दान की गतिविधियों का केंद्रीकृत रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था का न होने से भी लोगों को अंग दान करने वालों के बारे में आंकड़े नहीं मिल पाते हैं। इसके अलावा ब्रेन डेथ को प्रमाणित करने की समस्या भी पैदा होती है। अगर लोगों को ब्रेन डेथ के बारे में पता नहीं है तो मरीज के परिजनों को अंग दान करने के लिए समझाना मुश्किल होता है।

भारत में 1970 में गुर्दा प्रत्यारोपण शुरू हो गया था और इसके बाद यह एशियाई महाद्वीप में इस मामले में अग्रणी बना हुआ है। पिछले चार दशक के प्रत्यारोपण विकास के इतिहास के दौरान देश में अंग दान का कारोबार भी अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सरकार ने 1994 में मानव अंग प्रत्यारोपण (टीएचओ) अध्यादेश पारित किया था। इस कानून के तहत असंबद्ध प्रत्यारोपण को गैरकानूनी बना दिया और मस्तिष्क की मृत्यु (ब्रेन डेथ) की स्वीकृति मिलने के बाद मृतक के अंग दान को कानूनी करार दिया।

जिन मरीजों के मस्तिष्क की मृत्यु हो चुकी थी उनकी संख्या को इकट्ठा कर अंगों की कमी की चुनौती से पार पाने और असंबद्ध प्रत्यारोपण गतिविधियों को रोकने की उम्मीद लगाई गई थी। लेकिन टीएचओ कानून से न तो अंगों का व्यापार रूका और न ही वैसे मरीजों की संख्या बढ़ी जिन्होंने मस्तिष्क की मृत्यु की स्थिति में अंग दान कर दिया हो। दरअसल मरीज की मस्तिष्क की मृत्यु (ब्रेन डेथ) की अवधारणा को न तो कभी बढ़ावा मिला और न ही इसे व्यापक तौर पर प्रचारित किया गया। इस समय प्राधिकार कमेटी की मंजूरी के बाद ज्यादातर असंबद्ध प्रत्यारोपण किए जा रहे हैं।

सरकार ने 2011 में मानव अंग प्रत्यारोपण से संबंधित संशोधन कानून लागू किया, जिसमें अंग दान की प्रक्रियाओं को सरल बनाने के प्रावधान मौजूद थे। कानून के प्रावधानों में अंग दान करने वाले मृतक से अंग हासिल करने के केंद्र और निबंधन कार्यालय बनाने की व्यवस्था शामिल हैं। साथ ही अंगों की अदला-बदली रजिस्टर्ड चिकित्सक की ओर से प्रत्यारोपण समन्वयक (को-ऑर्डिनेटर, अगर कोई हो तो) से सलाह-मशविरा कर अनिवार्य करने का नियम शामिल है। निकट रिश्तेदारों से भी सलाह-मशविरा और सघन चिकित्सा केंद्र में भर्ती संभावित दानदाता और अगर वे राजी हों तो उन्हें अंग दान के विकल्प के बारे में जानकारी देना जैसा नियम भी शामिल है। इसके अलावा दानदाताओं को अंग निकाले जाने वाले केंद्रों के बारे में जानकारी देना का नियम भी शामिल है।

भारत में मृतक की ओर से अंग दान की भारी संभावना है क्योंकि यहां भारी संख्या में जानलेवा सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। किसी भी समय हर प्रमुख शहर के सघन चिकत्सा केंद्रों में आठ से दस ब्रेन डेथ के मामले होते ही हैं। अस्पतालों में होने वाली मौतों के मामले में चार से छह फीसदी ब्रेन डेथ के ही होते हैं। भारत में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में 14 लाख लोगों की मौत हो जाती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के अध्ययन के मुताबिक इनमें से 65 प्रतिशत लोगों के मस्तिष्क में चोट लगी होती है। इसका मतलब यह है कि 90,000 लोग मामले ब्रेन डेथ के हो सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि भारत में लोग अंग दान नहीं करना चाहते लेकिन अस्पतालों में ब्रेन डेथ की पहचान करना और उनके प्रमाणन का कोई तंत्र मौजूद नहीं है। इसके अलावा कोई भी मृतक के रिश्तेदारों को मरीज के अंग को दान देकर अन्य लोगों की जीवन रक्षा का अधिकार नहीं देता। कोई भी व्यक्ति, बच्चे से से लेकर बड़े तक अंग दान कर सकता है। जिस व्यक्ति की मस्तिष्क की मृत्यु हो चुकी हो और जिसे मृत्यु बाद अंग दान कहा जाता है वह अभी भारत में बहुत कम है। स्पेन में  प्रति दस लाख लोगों पर अंग दान करने वाले 35 लोग हैं। ब्रिटेन में यह संख्या प्रति दस लाख लोगों पर 27, अमेरिका में 11 है। लेकिन भारत में प्रति दस लाख लोगों में अंगर दान करने वाले सिर्फ 0.16 व्यक्ति हैं।

दानदाता कार्ड
अगर अंग दान करने की इच्छा तो इस दिशा में दानदाता कार्ड पर हस्ताक्षर करना पहला कदम है। दानदाता कार्ड कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है लेकिन यह किसी व्यक्ति के अंग दान की इच्छा को दर्शाता है। जब कोई व्यक्ति अंग दान दाता कार्ड पर हस्ताक्षर करता है तो यह उसके अंग दान की इच्छा को जाहिर करता है और इस बारे में उसके निर्णय को उसके परिवार के लोगों या दोस्तों को बताना महत्वपूर्ण है। क्योंकि अंग दान के लिए परिवार के सदस्यों को सहमति देने के लिए कहा जाएगा। मस्तिष्क की मृत्यु होने की स्थिति में महत्वपूर्ण अंग जैसे यकृत, फेफड़ा, गुर्दा, अग्नयाश्य, आंत, उत्तक जैसे कॉर्निया,, हृद्य के वाल्व, त्वचा, हड्डी, अस्थि संधि, शिरा और नस को दान किया जा सकता है।

अधिसूचित मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण नियम
अधिसूचित मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण नियम (टीएचओटी) नियम, 2014 के  नियमों के तहत अंग दान की दिशा में आने वाली कई बाधाओं को दूर करने के साथ, मानव अंग दान का दुरुपयोग और नियमों की गलत व्याख्या को रोकने के कई प्रावधान मौजूद हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
· कानून के तहत जो डॉक्टर अंग प्रत्यारोपण के लिए किए जाने वाले ऑपरेशन दल का सदस्य होगा वह प्राधिकार समिति का सदस्य नहीं होगा।
· अंग दान करने वाले प्रस्तावित दानदाता या इसे प्राप्त करने वाले दोनों अगर भारतीय नागरिक न हों चाहे वे निकट संबंधी ही क्यों या और क्यों न हों तो ऐसे मामले में प्रत्यारोपण के अनुरोध पर प्राधिकार समिति फैसला करेगी। ऐसे मामले में अगर अंग दान हासिल करने वाला विदेशी नागरिक हो और दानदाता भारतीय तो बगैर निकट रिश्तेदारी के संबंध के प्रत्यारोपण की अनुमति नहीं मिलेगी।
· जब प्रस्तावित अंग दान दाता और इसे प्राप्त करने वाले करीब के संबंधी न हो तो प्राधिकार समिति यह मूल्यांकन करेगी कि दान दाता और प्राप्त करने वाले व्यक्ति के बीच किसी भी तरह का व्यवसायिक लेन-देन न हो और किसी अन्य व्यक्ति अथवा दान दाता को किसी भी तरह का भुगतान देने अथवा उसका वादा न किया गया हो।
· उपधारा के अंतर्गत निर्दिष्ट किये गये स्वैप दान के मामलों को अस्पताल की प्राधिकार समिति अथवा जिला अथवा राज्य द्वारा स्वीकृति दी जाएगी, जिसमें प्रत्यारोपण किया जाना प्रस्तावित है और अंगों का दान स्वैप प्राप्त करने वालों के करीबी रिश्तेदारों से अनुमति के बाद ही किया जाएगा।
· यदि अंग प्राप्त करने वाला गंभीर अवस्था में है और उसे एक सप्ताह के भीतर जीवन रक्षक अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता है तो दान दाता अथवा प्राप्त करने वाला प्राधिकार समिति की शीघ्रता से जांच के लिए अस्पताल के प्रभारी से संपर्क कर सकते हैं।
· प्राधिकार समिति की निर्दिष्ट संख्या न्यूनतम 4 होनी चाहिए और यह प्रक्रिया अध्यक्ष, सचिव (स्वास्थ्य) अथवा मनोनीत व्यक्ति अथवा स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक की भागीदारी के बिना पूर्ण नहीं होगी।
o प्रत्येक अधिकृत प्रत्यारोपण केन्द्र की अपनी स्वयं की वेबसाइट होनी चाहिए। प्राधिकार समिति प्रत्यारोपण की अनुमति अथवा अस्वीकृति देने के लिए की गई बैठक के 24 घंटों के भीतर अपना अंतिम निर्णय लेगी और प्राधिकार समिति के निर्णय को अस्पताल के नोटिस बोर्ड पर और वेबसाइट पर 24 घंटे के भीतर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। प्रत्यारोपण केन्द्र की वेबसाइट को अंगों की खरीद, साझा करने और प्रत्यारोपण के लिए ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से राज्य/क्षेत्रीय/राष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ा होना चाहिए।
o केन्द्र में एक सर्वोच्च राष्ट्रीय नेटवर्किंग संगठन भी होगा। बड़ी संख्या में अंगों अथवा ऊतकों के प्रत्यारोपण होने वाले संगठनों में एक क्षेत्रीय और राज्य स्तर का नेटवर्किंग संगठन होना चाहिए। ऐसे नेटवर्कों को खरीद, भंडारण, परिवहन, मिलान, आवंटन और अंगों/ऊतकों के प्रत्यारोपण में सहयोग देना होगा और संचालन प्रक्रिया के मानकों और मानदंडों को अपनाना होगा।
o राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और राज्य स्तर की सुविधाओं से युक्त एक समर्पित वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन उपलब्ध मानव अंगों और ऊतकों के दान दाताओं और प्राप्तकर्ताओं पर एक राष्ट्रीय पंजीकरण प्रभाव में आएगा। राष्ट्रीय/क्षेत्रीय पंजीकरण राज्य स्तर पर ऐसे ही समान पंजीकरणों पर आधारित होगा। डाटाबेस में उपलब्ध लोगों की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।

राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ)
राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के अंतर्गत गठित एक राष्ट्रीय स्तर का संगठन है। यह संगठन नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में स्थित है। राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) की वेबसाइट का हाल ही में शुभारंभ किया जा चुका है।

एनओटीटीओ के निम्मलिखित दो प्रभाग है-
· राष्ट्रीय मानव अंग और ऊतक निष्कासन एवं भंडारण नेटवर्क
मानव अंग प्रत्यारोपण (संशोधन) अधिनियम, 2011 के अनुसार इसे अनिवार्य किया गया है। यह नेटवर्क प्रारंभिक तौर पर दिल्ली के लिए स्थापित किया जाएगा और इसके पश्चात इसका विस्तार देश के अन्य राज्यों और क्षेत्रों में किया जाएगा। एनओटीटीओ का राष्ट्रीय प्रभाग देश में अंगों और ऊतकों की खरीद के नेटवर्क अथवा वितरण के साथ-साथ अंगों और ऊतक दान एवं प्रत्यारोपण के पंजीकरण में सहयोग जैसी अखिल भारतीय गतिविधियों के लिए सर्वोच्च केन्द्र के तौर पर कार्य करेगा।
राष्ट्रीय बॉयोमैटीरियल केन्द्र (राष्ट्रीय ऊतक बैंक)
इस केन्द्र को स्थापित करने का मुख्य आधार और उद्देश्य विभिन्न ऊतकों की उपलब्धता में गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के साथ-साथ मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को भरना है।

अंगों को एक वस्तु बनाना सामाजिक, नैतिक और नीतिपरक मूल्यों के अपक्षरण के समान है और यह एक विकल्प नहीं हो सकता जिसे एक सभ्य समाज में अंगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वीकार किया जा सकता हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अंगों की बिक्री पर दिये गये अपने एक वक्तव्य में स्पष्ट रूप से कहा है कि यह मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के साथ-साथ अपने स्वयं के सविधान का भी उल्लंघन करता हैः "शरीर और इसके अंग वेबसाइट कारोबार के विषय नहीं हो सकते। इसी प्रकार से अंगों के लिए धनराशि का भुगतान करना अथवा प्राप्त करना निषेध किया जाना चाहिए।" अंगों को दान करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन देने के लिए उनके बीच जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। इसमें नागरिक समाज, धार्मिक नेताओं और सृजनात्मक जागरूकता में अन्य हितधारकों के शामिल होने की आवश्यकता है।
[लेखक पत्र सूचना कार्यालय, कोलकाता में निदेशक (मीडिया एवं संचार) हैं]

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