फ़िरदौस ख़ान
हरियाणा में जनता ने भाजपा को अच्छे दिनों के नाम पर वोट क्या दिए कि उनके बुरे दिन शुरू हो गए. हरियाणा में बिजली बिलों के ज़रिये अवाम को ख़ूब लूटा जा रहा है. हरियाणा की भाजपा सरकार ने एक ही साल के भीतर मासिक बिजली दरों में 42 फ़ीसद का इज़ाफ़ा करके पहले ही महंगाई की मार से हल्कान जनता की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. क़ाबिले-ग़ौर है कि कांग्रेस सरकार ने दस साल में 44 फ़ीसद की बढ़ोतरी की थी. इतना ही नहीं, बड़ी बेशर्मी से राज्य का बिजली निगम दूसरे राज्यों से कम रेट होने का दावा भी कर रहा है. जबकि सच्चाई यही है कि हरियाणा में बिजली राजस्थान, हिमाचल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और चंडीगढ़ से ज़्यादा महंगी है. हरियाणा में 50 यूनिट मासिक बिजली खपत पर 3.95 रुपये चुकाने पड़ते हैं, जबकि राजस्थान में यह दर प्रति यूनिट 3.25 रुपये, हिमाचल में 2.85 रुपये, दिल्ली में 2.52 रुपये, उत्तर प्रदेश में 2.20 रुपये, बिहार में 2.10 रुपये और चंडीगढ़ में 1.25 रुपये, प्रति यूनिट है. इतना ही नहीं, हरियाणा में एफ़एसए 2010 से ख़त्म होने के बाद भी प्रति यूनिट 1.19 रुपये से लेकर 1.74 रुपये तक वसूले जा रहे हैं. कहने भर के लिए हरियाणा विद्युत नियामक आयोग ने बिजली कंपनियों के लिए बिजली ख़रीद की कीमत 3.90 रुपये प्रति यूनिट तय की हुई है. इसके बावजूद फ़्यूल सरचार्ज एरियर (एफ़एसए) समेत उपभोक्ताओं को 9 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिल चुकाना पड़ रहा है.  अमानवीयता की हद तो ये है कि बिजली कंपनियों ने बहुत महंगी बिजली होने के बावजूद नियामक आयोग में दरों में 15 फ़ीसद बढ़ोतरी पर पुनर्विचार करने की एक याचिका भी दाख़िल कर रखी है.

इतना ही नहीं, स्लैब में हुए बदलाव से भी लोग बुरी तरह  प्रभावित हुए हैं.  दरअसल, टेलीस्कोपिक स्लैब प्रणाली को नॉन-टेलीस्कोपिक प्रणाली में बदल दिया गया. पहले 0 से 40, 41 से 250, 251 से 500, 501 से 800 यूनिट प्रतिमाह टेलीस्कोपिक बिल आता था, जिससे हर स्लैब की दरों का 800 यूनिट तक फ़ायदा होता था. लेकिन अब 0 से 50, 51 से 100 स्लैब के बाद सीधा 0 से 250 व 251 से 500 और 500 के बाद स्लैब प्रणाली बिल्कुल ख़त्म कर दी गई. 101 यूनिट मासिक खपत पर पहले 4.88 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिल चुकाना पड़ता था, लेकिन अब यह दर 6.52 रुपये प्रति यूनिट हो गई, जो 33.60 फ़ीसद ज़्यादा है. 100 यूनिट का कुल बिल 511.40 रुपये होगा, जबकि 101 यूनिट का बिल 147 रुपये से बढ़कर 658.55 रुपये हो गया है. सिर्फ़ एक यूनिट ज़्यादा खपत करने से 147 रुपये का फ़र्क़ पड़ गया है. पहले 250 प्रति यूनिट प्रति माह बिजली की दर 5.23 रुपये थी, जिसमें 23.12 फ़ीसद की बढ़ोतरी हो गई और  रेट 6.43 रुपये प्रति यूनिट हो गया. इसी तरह 501 यूनिट पर बिजली की दर पहले 5.96 रुपये प्रति यूनिट थी, जो अब बढ़कर 8.40 रुपये हो गई है, जो 42 फ़ीसद ज़्यादा है. अगर उपभोक्ता 500 यूनिट ख़र्च करेगा, तो उसका बिल 3608.40 रुपए आएगा. एक यूनिट ज़्यादा ख़र्च  करने पर यही बिल 4309.34 रुपये हो जाता है, यानी एक यूनिट बिजली ज़्यादा ख़र्च करने पर 601 रुपये चुकाने होंगे.

पूर्व बिजली मंत्री संपत सिंह के मुताबिक़ व्यावसायिक और औद्योगिक बिलों में फ़िक्सड चार्जेज और दरें बढ़ाकर उपभोक्ताओं को दोहरा लूटा जा रहा है. बिजली निगमों की बक़ाया वसूली तक़रीबन छह हज़ार करोड़ रुपये है. उन पर 42 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ है. उत्तरी हरियाणा बिजली निगम में  40 और दक्षिण हरियाणा बिजली निगम में 32 फ़ीसद एटीएंडसी लोस है.  इसी साल 7 मई को बढ़ाई गई बिजली की दरें 1 अप्रैल 2015 से लागू की दी गईं, जबकि बिजली के बिल सितंबर माह में बढ़े हुए बक़ाया बिलों के साथ कई तरह के चार्जिज जोड़ दिए गए हैं.

उत्तरी हरियाणा बिजली वितरण निगम के प्रबंध निदेशक नितिन यादव का कहना है कि बिजली कंपनियों ने अपनी मर्ज़ी से बिजली के दाम नहीं बढ़ाए हैं. इसके लिए बाक़ायदा  हरियाणा विद्युत नियामक आयोग ने अनुमति दे है. बिजली के बढ़े हुए दाम और वसूल किए जाने वाले सभी बिलों का सरकारी एजेंसी से ऒडिट होता है. इसलिए कोई भी पैसा बिजली कंपनियों की जेब में नहीं जाता. यानी बढ़े हुए बिलों की रक़म सरकारी ख़ज़ाने में जा रही है. दरअसल, सरकार ने अपनी जेब भरने के लिए जनता पर बिजली बिलों का बोझ डाल दिया है.

हरियाणा में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो), सीपीआईएम के कार्यकर्ता महंगी बिजली दरों के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आए हैं. इनेलो कार्यकर्ताओं ने ज़िला मुख्यालयों पर धरना देकर सरकार के ख़िलाफ़ जमकर नारेबाज़ी की. इससे पहले आम आदमी पार्टी ने ज़िला स्तर पर बिजली के बिलों को जलाकर विरोध किया था. पार्टी के नेता प्रदेश में लगातार जनसभाओं का आयोजन भी कर रहे हैं. विपक्षी दर बिजली की बढ़ी दरें वापस लेने, फ़्यूल सरचार्ज ख़त्म करने और पहले की स्लैब प्रणाली बहाल करने की मांग कर रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है कि उन्होंने सरकार को एक साल का वक़्त दिया था. तब उन्हें यह मालूम नहीं था कि उन्हें दो महीने के भीतर ही सरकार के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि सरकार जनता की जेब पर डाका डाल रही है. हुड्डा ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ पंचकूला में धरना दिया. उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के पास हमारे सवालों का कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है, इसलिए वह झूठा प्रचार कर रही है कि बिलों की बढ़ोतरी का फ़ैसला पिछली सरकार ने 2013 में ले लिया था, जबकि हक़ीक़त यह है कि वह वित्त विभाग का एक प्रस्ताव था, जिसे 2014 अक्टूबर, जब तक उनकी सरकार रही, तो उन्होंने बिजली के बिलों में बढ़ोतरी के किसी भी फ़ैसले को लागू नहीं होने दिया. अगर दि पिछली सरकार के फ़ैसलों को भाजपा सरकार इतना ही सम्मान देती है, तो सरकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट की उम्र 58 साल की बजाय 60 साल करने, बुढ़ापा पेंशन 1500 रुपये महीना करने और सरकारी कर्मचारियों को पंजाब के समान वेतनमान देने आदि जैसे पिछली सरकार के जनहितकारी फ़ैसलों को क्यों पलट दिया ? हुड्डा ने कहा कि उन्होंने अपनी सियासी ज़िन्दगी में बिजली की दरों में ऐसी ग़ैर ज़रूरी और अंधाधुंध बढ़ोतरी कभी नहीं देखी थी. बिजली कंपनियां उपभोक्ताओं अनाप-शनाप बिल भेज रही हैं. कुछ उपभोक्ताओं को तो मकान की क़ीमत से ज़्यादा बिजली का बिल भेजा गया है. उन्होंने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि हरियाणा की जनता इस सरकारी अत्याचार को किसी भी हाल में सहन नहीं करेगी और इसका मुंहतोड़ जवाब देगी. सरकार या तो बढ़ी हुई दरों को वापस ले, वरना इसके गंभीर नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहे.

हुड्डा ने सरकार से दो सवाल करते हुए पूछा कि बिजली की दरों में बढ़ोतरी क्यों की गई, दूसरा जनता बढ़ी हुई दरों के भारी-भरकम बिजली बिलों का भुगतान कैसे करेगी ?
उन्होंने कहा कि जहां तक बिजली बिलों में बढ़ोतरी का सवाल है, न तो सरकार ने कोई नया थर्मल प्लांट लगाया है जैसा कि उनके कार्यकाल में चार नये थर्मल प्लांट लगे थे, जिसकी वजह से हरियाणा बिजली में आत्मनिर्भर हुआ था. न ही भाजपा सरकार ने बिजली का कोई बिल माफ़ किया है, जैसा कि उन्होंने सरकार बनते ही 1600 करोड़ रुपये के बिजली के बिल माफ़ किए थे. उन्होंने कहा कि जनता इन भारी-भरकम बिलों का भुगतान करेगी कैसे ? किसानों को फ़सल मंडियों में लूटा जा रहा है. मुनाफ़ा तो दूर उसे लागत भी नहीं मिल रही है. कांग्रेस शासन में 6000 रुपये क्विंटल तक बिकने वाला धान 1200 रुपये में बिक रहा है.गन्ने की क़ीमत तक का भुगतान नहीं हुआ है. कारोबार चौपट हो गया है. सरकारी कर्मचारियों को उनकी सरकार ने जो पंजाब स्केल दिया था, उसे वापस ले लिया गया है. 25 हज़ार अस्थाई कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है. वृद्ध अवस्था सम्मान भत्ता और विधवा पेंशन 1500 रुपये से घटा कर 1200 रुपये कर दिया है. ग़रीब आदमी का भोजन दाल 200 रुपये किलो तक हो गई है. सरकार ने डीज़ल पर वैट 8 फ़ीसद से बढ़ाकर 17 फ़ीसद कर दिया है. सरकार ने हरियाणा में कोई तबक़ा ऐसा नहीं छोड़ा, जिस पर आर्थिक चोट न मारी हो.


ग़ौरतलब है कि हरियाणा में बिजली और सत्ता परिवर्तन का चोली-दामन का साथ रहा है. बिजली ने पूर्व की बंसीलाल सरकार को मुश्किल में डाल दिया था. इंडियन नेशनल लोकदल की सरकार भी इसका सामना कर चुकी है. लेकिन कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने अपने दस साल के कार्यकाल में अवाम को बिजली संकट से बचाया था. साथ ही उन्हें पर्याप्त बिजली देने की भी पूरी कोशिश की. इसलिए महंगाई से परेशान जनता को अब कांग्रेस शासन के अच्छे दिन याद आने लगे हैं. लोगों का कहना है कि जब से केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार आई है, तब से उनकी मुश्किलें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं. लगातार बढ़ती महंगाई की वजह से उनका ख़र्च बढ़ गया है, लेकिन आमदनी सीमित है. ऐसे में मोटे बिजली के बिल आ रहे हैं. वे बिजली के बिल भरें, या अपने जीने का सामान करें.

बहरहाल, अगर जनता को चैन से जीना है, तो इस नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी ही होगी. अवाम के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले लोगों का साथ देना होगा.
ऐ ख़ाक नशीनों उठ बैठो, वह वक़्त क़रीब आ पहुंचा है
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