नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट ने पुरुषवादी समाज की सत्ता को चुनौती देते हुए एक अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा है कि जिस घर में बड़ी बेटी होगी, वही घर की कर्ता धर्ता होगी. सामाजिक बदलाव का फ़ैसला सुनाते वक़्त जस्टिस वजीरी ने कहा कि क़ानून के मुताबिक़ सभी को समान अधिकार हासिल हैं. फिर न जाने अब तक महिलाओं को 'कर्ता' बनने लायक़ क्यों नहीं समझा गया? आजकल की महिलाएं हर क्षेत्र में क़दम से क़दम मिलाकर चल रही हैं और आत्मनिर्भता की मिसाल हैं. ऐसी कोई वजह नहीं है कि महिलाओं को घर की मुखिया बनने से रोका जाए. 1956 का पुराना क़ानून 2005 में ही बदल चुका है. अब जब क़ानून बराबरी का हक़ देता है, तो अदालतों को भी ऐसे मामलों में सतर्कता बरतते हुए फ़ैसला करना चाहिए.

अदालतने यह फ़ैसला दिल्ली के एक कारोबारी परिवार की बड़ी बेटी की ओर से दाख़िल याचिका पर सुनाया है. उसने पिता और तीन चाचाओं की मौत के बाद केस दायर कर दावा किया था कि वह घर की बड़ी बेटी है. इस लिहाज़ से मुखिया वही हो. उसने याचिका में अपने बड़े चचेरे भाई के दावे को चुनौती दी थी, जिसने ख़ुद को कर्ता घोषित कर दिया था.

माना जा रहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट के इस फ़ैसले से पूरे देश में पुरुषवादी सोच में बड़ा बदलाव लाएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि यदि पहले पैदा होने पर कोई पुरुष मुखिया के कामकाज संभाल सकता है, तो ठीक ऐसा ही औरत भी कर सकती है. हिंदू संयुक्त परिवार की किसी महिला को ऐसा करने से रोकने वाला कोई क़ानून भी नहीं है. ग़ौरतलब है कि 2005 में हिंदू सक्सेशन एक्ट में संशोधन कर धारा 6 जोड़ी गई थी, जिसमें महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबर का हक़ दिया गया था. यह फ़ैसला उसी फ़ैसले को आगे ले जाता है और उसका तार्किक हल भी है. यह फ़ैसला इस परंपरा को तोड़ने वाला है. इस फ़ैसले से समाज में अच्छा संदेश जाएगा और लोग लड़कियों के प्रति अपना नज़रिया भी बदलेंगे.

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