प्रो. एन राजेन्द्रन
काप्पालोत्तिया तमिलन (तमिलों के कर्णधार) और सेक्किजुट्ठा सेम्माल (तेल के कोल्हू पर यातनाएं झेलने वाले विद्वान) के नाम से विख्यात वलिनायगम ओल्गानाथन चिदंबरम पिल्लई (वीओसी), असाधारण रूप से प्रतिभाशाली आयोजक एवं प्रचारक थे तथा वे एक ऐसी शख्सियत थे, जो राष्ट्रवादी ध्येय के लिए जनता को उद्देलित करने हेतु सभी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करने में विश्वास रखते थे. जब तक वी.ओ. चिदम्बरम (वीओसी) का तूतीकोरिन में आगमन नहीं हुआ, तब तक तिरूनेलवेली में स्वदेशी आंदोलन को ताकत और गति न मिल सकी.
वी.ओ. चिदम्बरम (वीओसी) का जन्म 05 सितम्बर, 1872 को तमिलनाडु के तिरूनेलवेली जिले के ओत्तापिदरम में प्रख्यात वकील वुलागानाथन पिल्लई और परामयी अम्माई के घर हुआ. वी.ओ.सी. ने काल्डवेल कॉलेज, तूतीकोरिन से स्नातक की पढ़ाई की. कानून की पढ़ाई शुरू करने से पूर्व उन्होंने कुछ समय तक तालुका कार्यालय में क्लर्क के रूप के रूप में कार्य किया. न्यायाधीश के साथ टकराव ने 1990 में उन्हें तूतीकोरिन में नयी शुरूआत करने के लिए बाध्य होना पड़ा. 1905 तक, उनकी ज्यादातर ऊर्जा व्यवसायिक एवं पत्रकारिता से जुड़ी गतिविधियों में खर्च हुई.
वी.ओ.सी. ने बंगाल के विभाजन के बाद 1905 में राजनीति में कदम रखा. 1905 के अंत तक वी.ओ.सी. ने मद्रास का दौरा किया और बाल गंगाधर तिलक एवं लाला लाजपत राय द्वारा प्रारंभ किए गए स्वदेशी आंदोलन से उनकी नजदीकी बढ़ती गयी. वी.ओ.सी. रामकृष्ण मिशन के प्रति आकर्षित हुए और सुब्रमण्यम भारती तथा मंडायम परिवार के सम्पर्क में आए. यहीं से वे तेजी से स्वदेशी आंदोलन के साथ जुड़ते चले गये. 1906 तक, उन्हें स्वदेशी मर्चेंट शिपिंग ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना के विचार के लिए तूतीकोरिन और तिरूनेलवेली के व्यापारियों और उद्योगपतियों का समर्थन प्राप्त हो गया.
स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी (एसएसएनसीओ) उन्हीं का मौलिक विचार था. अपनी अनुभवहीन कंपनी को सरकारी  विद्वेश और झगड़ालु व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए, वी.ओ.सी. ने स्वदेशीवाद के उद्देश्यों का अनुसरण किया और असाधारण उत्साह के साथ बहिष्कार किया. इस प्रक्रिया में, उन्होंने ब्रिटिश हुक्मरानों को निराश और क्रुद्ध करते हुए तूतीकोरिन जिले को राष्ट्रवादी गहन राजनीति के केंद्र के रूप में परिवर्तित कर दिया.
ऐतिहासिक रूप से, तूतीकोरिन, तमिलनाडु के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों में से एक रहा है, आधुनिक दौर में मद्रास के बाद संभवत: दूसरा. जहां एक ओर तूतीकोरिन के व्यापारी सिलोन के साथ व्यापार में संलग्न थे, यात्री नौवहन, साथ ही साथ मालवाहक सेवाओं पर ब्रिटिश इंडियन स्टीम नेविगेशन कम्पनी लिमिटेड (बीआईएसएनसीओ) जैसी यूरोपीय शिपिंग कम्पनियों का एकाधिकार स्थापित हो गया. भारतीय व्यापारियों को कोलम्बो जाने वाले सारे माल को बीआईएसएनसीओ के माध्यम से भेजने को बाध्य होना पड़ा, यही एकमात्र कम्पनी थी, जो तूतीकोरिन और कोलम्बो के बीच नियमित स्टीमर सेवाएं संचालित करती थी.
बीआईएसएनसीओ अपने भारतीय संरक्षकों के साथ अन्यायपूर्ण और अपमानजनक व्यवहार करते थे. इससे छुटकारा पाने के तूतीकोरिन के कारोबारियों ने अपनी नेविगेशन कम्पनी शुरू करने का फैसला किया. 16 अक्टूबर, 1906 को स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी (एसएसएनसीओ) का औपचारिक जन्म काफी हद तक वी.ओ.सी. की व्यक्तिगत उपलब्धियों का ही भाग था. इस बीच, वी.ओ.सी. ने स्वदेशी शिपिंग कम्पनी को मजबूती प्रदान करने के लिए तिरूनेलवेली, मदुरई और तमिलनाडु के अन्य केंद्रों की प्रमुख व्यवसायिक हस्तियों को एकजुट कर दिया.
एसएसएनसीओ ने जल्द ही व्यापक संरक्षण प्राप्त कर लिया जिसकी वजह से ब्रिटिश कम्पनी प्रतिकार की कार्रवाई के लिए तत्पर होती गयी. वी.ओ.सी. और अन्य स्वदेशी नेताओं के लिए, एसएसएनसीओ को बनाए रखने और बीआईएसएनसीओ के बहुत अधिक संसाधनों और साम्राज्य संबंधी समर्थन से मुकाबला करने का एकमात्र तरीका जनता का समर्थन प्राप्त करना था. वी.ओ.सी. को एक अन्य तमिल वक्ता सुब्रमण्यम शिवा से सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ. वी.ओ.सी. और शिवा को अपनी प्रयासों में तिरूनेलवेली के वकीलों से सहायता मिली, जिन्होंने ‘स्वदेशी संगम’ या ‘नेशनल वॉल्टीयर्स’ नामक संगठन का गठन किया.
तूतीकोरिन कोरल मिल्स की हड़ताल के साथ ही राष्ट्रवादी आंदोलन की भूमिका निम्न  हो गयी. इससे तमिलनाडु में राष्ट्रवादी आंदोलन की वर्ग सम्बन्धी विशेषता के बारे में महत्वपूर्ण समझ प्राप्त होती है. इन मिलों में कामकाज की स्थितियां बेहद खराब थीं. 1908 में कुल 1695 कामगारों में से 59 प्रतिशत 14-16 आयुवर्ग के थे, जो कोरल मिलों में काम करते थे, जिनके मालिक ब्रिटिश थे. उनका दिन सुबह करीब 5 बजे से प्रारंभ होता था और वे शाम सात बजे तक परिश्रम करते थे. 27 फरवरी, 1908 को कोरल मिलों के मजदूरों ने हड़ताल पर जाने का फैसला किया. उनकी मांगों में काम के घंटों में कमी लाना और वेतन बढ़ाने की मांग शामिल थी. उसके बाद कामगारों के हक की आवाज वी.ओ.सी. ने उठायी, जो लम्बे अर्से से श्रमिकों के कल्याण में दिलचस्पी रखते आए थे और उसके बाद हड़ताली कामगारों को जल्द ही तूतीकोरिन की हमदर्दी और समर्थन प्राप्त हो गया. और तो और गांधीजी के चम्पारन सत्याग्रह से पहले, वी.ओ.सी. ने तमिलनाडु में कामगारों के हक की आवाज़ उठायी और इस प्रकार, इस संदर्भ में वह गांधीजी से अग्रवर्ती थे.
मार्च, 1908 के प्रथम सप्ताह में, वी.ओ.सी., शिवा और पद्मनाभ अयंगर ने उद्देलित करने वाले भाषणों की श्रृंखला ने तूतीकोरिन की जनता को उत्तेजित कर दिया. 7 मार्च को, राष्ट्रवादी नेताओं ने बी.सी. पाल की जेल से रिहाई का जश्न मनाने और स्वराज का ध्वज फहराने के लिए तूतीकोरिन की जनता के जबरदस्त समर्थन के साथ, 9 मार्च, सोमवार, को सुबह विशाल जुलूस निकालने का संकल्प लिया.  कलेक्टर विन्च ने मद्रास सरकार को चेतावनी दी कि ‘स्वदेशियों को बहुत ज्यादा लोगों का समर्थन प्राप्त हो गया है और वह सोमवार को एक ओर बैठक करने वाले हैं, जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए.’ 12 मार्च को वी.ओ.सी. , शिवा और पद्मनाथ अयंगर को रिमांड पर डिस्ट्रिक्ट जेल भेज दिया गया. कानून को तोड़-मरोड़ कर नेताओं को हिरासत में लिए जाने से क्रुद्ध, तिरूनेलवेली की जनता बेकाबू हो उठी और जिले में दंगे भड़क उठे.
सत्र न्यायालय के न्यायाधीश पिन्हें ने शिवा को 10 साल तक देश निकाले की सजा सुनाई, जबकि  वी.ओ.सी.  को आजीवन देश निकाले की सजा सुनायी गयी. अकेले वी.ओ.सी. पर मूलभूत ‘राजद्रोह’ के अपराध से संबंधित सत्र प्रकरण संख्या 2 में, आजीवन देश निकाले की दूसरी सजा सुनायी गयी, जो पहली सजा के साथ-साथ चलने वाली थी. हालांकि, उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय से सजा में कमी किए जाने की अपील की. वी.ओ.सी. की साथ-साथ चलने वाली आजीवन देश निकाले की सजा को कम करते हुए छह साल और चार साल कर दिया गया. ये दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं. वी.ओ.सी. और शिवा ने कठोर कारावार की सजा पूरी की. भारत में ब्रिटिश राज के दौरान कैदियों के साथ बर्बरता आम बात थी, राजनीतिक कैदियों के साथ भी बर्बरऔर अमानवीय व्यवहार किया गया.  वी.ओ.सी. को जल्द ही पाल्यामकोट्टई जेल से कोयम्बट्टूर सेंट्रल जेल भेज दिया गया और उन्हें जेलरों, विशेषतौर पर ‘कोनायियान’ नाम से चर्चित वार्डर के हाथों बहुत यातनाएं भोगनी पड़ीं. कोनायियान ने पहले वी.ओ.सी. को जूट क्लीनिंग मशीन पर लगाया, जिसे सिर्फ हाथों से चलाया जाता था, जल्द ही वी.ओ.सी. के दोनों हथेलियां छिल गयीं और उनकी हथेलियों से खून बहने लगा. जब यह बात जेल के ध्यान में लायी गयी, तो उन्होंने वी.ओ. सी. को तपती धूप में तेल के कोल्हू पर बैल की जगह काम करने का जिम्मा सौंप दिया. प्रमुख वकील और राष्ट्रवादी नेता को अब अपने हाथों और पांवों में बेडि़यों के साथ पशु के समान कोल्हू चलाना पड़ा . हालांकि मद्रास उच्च न्यायालय ने उनकी सजा घटा दी और वे 24 दिसम्बर 1912 को रिहा हो गये.
गरीबी वी.ओ.सी. को राष्ट्रवादी उद्देश्यों का अनुसरण करने से नहीं रोक सकी, देश के लिए उनका प्रेम उनकी दरिद्रता पर हावी रहा. 1915-16 के दौरान गांधीजी और वी.ओ.सी. के बीच हुआ पत्र व्यवहार,  वी.ओ.सी. द्वारा प्रदर्शित अदम्य राष्ट्र भक्ति का प्रमाण है.
वी.ओ.सी. ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष (1930 का दशक) कोविलपट्टी में भारी कर्ज के बोझ तले बिताए. यहां तक कि उन्हें अपने रोजमर्रा के खर्चे पूरे करने के लिए अपनी कानून की पुस्तकें तक बेचनी पड़ीं. वी.ओ.सी. का 18 नवम्बर, 1936 को तूतीकोरिन में इंडियन नेशनल कांग्रेस के कार्यालय में निधन हो गया. उनकी आखिरी इच्छा भी यही थी.
वी.ओ.सी. बहुत प्रकांड विद्वान भी थे. तमिल छंद में उनकी आत्मकथा 1912 में उनकी जेल से रिहायी के दौरान पूर्ण हुई. उन्होंने तिरूकुराल पर कमेंट्री भी लिखी और प्राचीन तमिल व्याकरण तोल्काप्पियाम का भी संकलन किया.  उन्होंने अपने कार्यों मेय्याराम और मेय्याराइवू  में चतुराई प्रदर्शित की, उनकी सहज शैली को सराहा गया. उन्होंने जेम्स एलेन की पुस्तकों का अनुवाद कर निर्विवाद ख्याति प्राप्त की. उन्होंने कुछ उपन्यासों की भी रचना की.
उपनिवेशवादी ब्रिटेन के विरूद्ध वी.ओ.सी. का निरंतर संघर्ष कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा किए गए इस अतिरंजित सामान्यीकरण को निरस्त करता है कि तमिलनाडु ‘पिछड़ा’ था यानी राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राजनीतिक रूप से निष्क्रिय बना रहा था. वी.ओ.सी. और उनके प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों द्वारा पीछे छोड़ी गयी संघर्ष और राष्ट्रीय दृढ़ता की छवियां आने वाली पीढि़यों को सदैव प्रेरित करती रहेंगी.
(लेखक प्रोफेसर एन. राजेन्द्रन भारतीदसन यूनिवर्सिटी, तिरूचिरापल्ली (तमिलनाडु) में इतिहास विभाग में पूर्व प्रोफेसर एवं प्रमुख हैं)

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