फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं कि मुहब्बत और अक़ीदत का कोई मुल्क नहीं होता, कोई मज़हब नहीं होता. लेकिन जब बात सियासत की आ जाए, मुल्क की आ जाए, तो मुहब्बत और अक़ीदत के पाक जज़्बे पर सियासत ही भारी पड़ती है.  दरगाह आला हज़रत को लें. आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान साहब, जिन्होंने दुनिया को मुहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम दिया, अब उन्हीं की दरगाह पर उनके ज़ायरीनों को आने से रोका जा रहा है. दरअसल, भारत-पाक तनाव के मद्देनज़र बरेली में दरगाह आला हज़रत के प्रबंधन ने 24 नवंबर को शुरू हो रहे उर्स में पाकिस्तान के उलेमाओं को शामिल न करने का फ़ैसला किया है. हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए दरगाह प्रबंधन का यह फ़ैसला सही है.

बताया जा रहा है कि पाकिस्तान से छह उलेमाओं की जानिब से उर्स में शिरकत करने की गुज़ारिश आई है, लेकिन दरगाह प्रबंधन ने उन्हें उर्स में शामिल न करने का फ़ैसला किया है. पिछले साल दरगाह प्रबंधन ने पाकिस्तान के 12 उलेमाओं को बुलावा भेजा था, जिसमें से पांच उलेमाओं ने अपनी हाज़िरी दर्ज कराई थी. दरगाह आला हज़रत के उर्स प्रबंधन को ख़ौफ़ है कि अगर किसी ने उसके दावतनामे का ग़लत इस्तेमाल कर किसी कर वीज़ा हासिल कर लिया और देश में कोई वारदात कर दी, तो इससे जानमाल का नुक़सान तो होगा ही, साथ ही दरगाह की भी बदनामी होगी. वैसे भी पाकिस्तान लगातार संघर्षविराम का उल्लंघन कर रहा है, जिससे दोनों मुल्कों के बीच तनाव पैदा हो गया है. दरगाह प्रबंधन का यह भी मानना है कि देश में जब भी कोई आतंकी घटना होती है, तो यहां के मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जाता है. इन्हीं सब हालात को देखते हुए दरगाह प्रबंधन को पाकिस्तान के उलेमाओं का बहिष्कार करना पड़ा. ग़ौरतलब है कि तीन दिन तक चलने वाले इस विश्व प्रसिद्ध दरगाह के उर्स में दुनिया भर से ज़ायरीन आते हैं. इस बार भी मॉरीशस, ब्रिटेन, दुबई, ओमान, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, सऊदी अरब, नीदरलैंड, श्रीलंका, मलावी और जिम्बाब्वे से बड़ी तादाद में उलेमा शिरकत करने के लिए यहां आ रहे हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि बरेली के सौदागरन मोहल्ले में स्थित दरगाह-ए-आला-हज़रत पर साल भर ज़ायरीनों की भीड़ लगी रहती है. आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले का जन्म 4 जून, 1856 को बरेली में हुआ था और 28 अक्टूबर, 1921 को वे इस दुनिया से पर्दा कर गए. लोग उन्हें आला हज़रत के नाम से पुकारते थे. उनके पूर्वज कंधार के पठान थे, जो मुग़लों के शासनकाल में हिंदुस्तान आए थे. आला हज़रत बहुत बड़े मुफ़्ती, आलिम, क़ुरान हाफ़िज़, लेखक, शायर, उलेमा और कई भाषाओं के जानकार थे. उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनमें अद्दौलतुल मक्किया है जिसे उन्होंने महज़ आठ घंटों में हरम-ए-मक्का में लिखा था. इस्लामी क़ानून पर उनकी एक और बेहतरीन किताब फ़तावा रज़्विया है.  

बहरहाल, सरहद पर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का असर दोनों देशों की अवाम और उनके रिश्तों पर भी पड़ने लगा है. इससे जहां अवाम रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं, वहीं कारोबारियों को भी काफ़ी नुक़सान हो रहा है. शादी-ब्याह के लिए लोग अब पाकिस्तान में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को बुलावा नहीं भेज रहे हैं और न ही वहां से शादी-ब्याह के दावतनामे आ रहे हैं. इस तनाव की वजह से बहुत से लोग अपनों से नहीं मिल पा रहे हैं. बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के आफ़ताब की पत्नी शाहीना कराची में अपनी बेटी के साथ वापसी का इंतज़ार कर रही है. दिसंबर 2012 में आफ़ताब की शादी कराची की रहने वाली शाहीना कौसर से हुई थी. शाहीना 2013 में मुज़फ़्फ़रपुर आई और वीज़ा बढ़ाते रहने के साथ लांग टर्म वीज़ा के लिए आवेदन दिया. तभी उसकी मां की बीमार हो गई और वह 22 फ़रवरी 2016 को अपनी बेटी को लेकर कराची चली गई. उसने 10 जुलाई को वीज़ा के लिए पाकिस्तान के भारतीय दूतावास में आवेदन दिया था, लेकिन उसे यह कहकर वीज़ा देने ने मना कर दिया गया कि दोनों देशों के बीच रिश्ते ठीक नहीं चल रहे हैं.

भारत-पाक तनाव की वजह से पाकिस्तान से होने वाला कारोबार भी ठप हो गया है. पाकिस्तान के कारोबारी अब भारत से कपास की ख़रीद नहीं कर रहे हैं, जिससे देश के तक़रीबन 82.2 करोड़ डॉलर के कपास उद्योग पर असर पड़ा है. पाकिस्तान भारतीय कपास कारोबारियों के लिए एक बड़ी मंडी है. भारत से कपास का आयात रुकने से पाकिस्तान में कपास के दाम बढेंगे. इससे अमेरिका, ब्राज़ील और अफ़्रीकी देशों के कपास निर्यातकों को ख़ासा मुनाफ़ा होगा. मौजूदा हालात को देखते हुए दोनों ही देशों के व्यापारी नये कारोबारी सौदे भी नहीं कर रहे हैं. साल 2015-16 में पाकिस्तान से भारत को निर्यात घटकर 40 करोड़ डॉलर रह गया, जबकि उससे पहले साल 2014-15 में निर्यात 41.5 करोड़ डॉलर का था. हालांकि इसी अवधि में भारत का पाकिस्तान को निर्यात 27 फ़ीसद बढ़कर 1.8 अरब डॉलर पहुंच गया.

हालांकि अमेरिका व दुनिया के कई अन्य देश चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बाच तनाव ख़त्म हो और हालात सामान्य हो जाएं. अलबत्ता, नफ़रत से किसी का भला नहीं होता. यह बात पाकिस्तान को भी समझनी होगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि फिर से दोनों देशों के रिश्ते बेहतर होंगे,  मुहब्बत और अक़ीदत की जीत होगी.

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