गीत
ऋतु बसंत की मादक बेला
तुझ बिन सूनी ओ हरजाई
मन का दर्पण बिखरा-बिखरा
जैसे अम्बर की तन्हाई...

कंगन, पायल, झूमर, झांझर
सांझ सुहानी, नदी किनारा
आकुल, आतुर, विरह-व्यथित मन
पंथ प्रिय का देख के हारा
कल की यादें बांह में ले के
मुझको सता रही अमराई...

क्षण, रैना, दिन सब ही बीते
बीत गईं कितनी सदियां
नयन मिलन की आस लिए हैं
ले भूली-बिसरी सुधियां
अंग-अंग जल उठे विरह में
ऐसी मंद चली पुरवाई...
-फ़िरदौस ख़ान

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