फ़िरदौस ख़ान
लोकतंत्र यानी जनतंत्र. जनतंत्र इसलिए क्योंकि इसे जनता चुनती है. लोकतंत्र में चुनाव का बहुत महत्व है. निष्पक्ष मतदान लोकतंत्र की बुनियाद है. यह बुनियाद जितनी मज़बूत होगी, लोकतंत्र भी उतना ही सशक्त और शक्तिशाली होगा. अगर यह बुनियाद हिल जाए, तो लोकतंत्र की दीवारों को दरकने में देर नहीं लगेगी. फिर लोकतंत्र, राजतंत्र में तब्दील होने लगेगा. नतीजतन, मुट्ठी भर लोग येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतकर लोकतंत्र पर हावी हो जाएंगे.

देश की आज़ादी के बाद निरंतर चुनाव सुधार किए गए. मसलन मतदाता की उम्र घटाकर कम की गई, जन मानस ख़ासकर युवाओं और महिलाओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया गया. इन सबसे बढ़कर मत-पत्र के इस्तेमाल की बजाय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) द्वारा मतदान कराया जाने लगा. इससे जहां वक़्त की बचत हुई, श्रम की बचत हुई, वहीं धन की भी बचत हुई. इतना ही नहीं, मत पेटियां लूटे जाने की घटनाओं से भी राहत मिली. सियासी दलों को मलाल है कि ईवीएम की वजह से चुनाव में धांधली कम होने की बजाय और बढ़ गई. चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. इस तरह की ख़बरें देखने-सुनने को मिल रही हैं कि बटन किसी एक पार्टी के पक्ष में दबाया जाता है और वोट किसी दूसरी पार्टी के खाते में चला जाता है. इसके अलावा जितने लोगों ने मतदान किया है, मशीन उससे कई गुना ज़्यादा वोट दिखा रही है.

कांग्रेस की अगुवाई में देश के सियासी दल ईवीएम के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं. तक़रीबन 16 बड़े सियासी दलों ने हाल के चुनावों में मतदान के लिए इस्तेमाल हुईं ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने की बढ़ती शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए इनके प्रति अपना अविश्वास ज़ाहिर किया है. उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की है कि आगामी चुनावों में मतदान के लिए ईवीएम की बजाय काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. उनका आरोप है कि केंद्र सरकार ईवीएम को फुलप्रूफ़ बनाने के लिए वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव आयोग को ज़रूरी रक़म मुहैया कराने में कोताही बरत रही है.
विपक्षी दलों की तरफ़ से चुनाव आयोग को दिए गए ज्ञापन में कहा गया है कि चुनाव कराने के तौर तरीक़ों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच एक राय है, लेकिन वे फ़िलहाल चुनाव के लिए ईवीएम का इस्तेमाल करने के ख़िलाफ़ हैं. वे चाहते हैं कि मतदान के लिए काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. इसलिए जब तक ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने और उसमें गड़बड़ी की समस्या का समाधान नहीं हो जाता और जब तक राजनीतिक दलों की संतुष्टि के लिहाज़ से यह तकनीकी तौर पक्का नहीं हो जाता कि ईवीएम बिना किसी दिक़्क़त के काम करेंगे और इसकी पुष्टि वैश्विक स्तर पर नहीं हो जाती, तब तक मतदान पुराने मतपत्र वाली व्यवस्था के हिसाब से ही हो. मतपत्रों के ज़रिये मतदान की व्यवस्था को दुनियाभर में मान्यता मिली हुई है. सेक्शन 61ए के तहत चुनाव आयोग के विवेक का इस्तेमाल तभी किया जाए, जब सभी राजनीतिक दलों की संतुष्टि के साथ उन दिक़्क़तों का दूर कर लिया जाए.

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि अगले चुनाव, भले ही गुजरात में हों या कहीं और, मतपत्र के साथ होने चाहिए और ईवीएम का इस्तेमाल बंद होना चाहिए. उनकी दलील है कि अगर बैंक ऒफ़ बांग्लादेश के खातों को हैक किया जा सकता है और आठ करोड़ डालर चुराए जा सकते हैं, रूसी बैंक से तीन करोड़ डॊलर निकाले जा सकते हैं, तो ईवीएम के साथ छेड़छाड़ क्यों नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि ईवीएम के मामले में वह आडवाणी से लेकर मायावती तथा केजरीवाल तक के साथ हैं. ग़ौरतलब है कि लालकृष्ण आडवाणी ने साल 2009 के आम चुनाव में ईवीएम को लेकर सवाल उठाए थे.

दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग को चुनौती दी है कि अगर ईवीएम मशीन उन्‍हें दे दी जाए, तो 72 घंटों के अंदर वह साबित कर देंगे कि इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ मुमकिन है. चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने चुनाव आयोग की इस दलील को नकार दिया कि ईवीएम में एक बार सॊफ़्टवेयर लगाने के बाद ना तो इसे पढ़ा जा सकता है और ना ही इस पर कुछ लिखा जा सकता है. उन्होंने मध्य प्रदेश के भिंड में गड़बड़ी वाले ईवीएम के सॊफ़्टवेयर से जुड़ा डाटा सार्वजनिक करने की मांग करते हुए कहा है कि अगर चुनाव आयोग के पास डाटा डीकोड करने का तंत्र उपलब्ध नहीं है, तो वह अपने विशेषज्ञों की टीम से गड़बड़ पाई गई मशीनों का सॊफ़्टवेयर 72 घंटे में डीकोड करके आयोग को इसकी रिपोर्ट दे सकते हैं.

बहुजन समाज पार्टी ईवीएम के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर आई है. पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बीते 11 अप्रैल को ईवीएम के ख़िलाफ़ काला दिवस मनाया और जगह-जगह धरने प्रदर्शन किए. उनका कहना है कि जब तक चुनाव मतपत्र से कराने की उनकी मांग नहीं मानी जाती, उनका आंदोलन जारी रहेगा. पार्टी अध्यक्ष मायावती ने भी राज्यसभा में ईवीएम से मतदान को बंद करने और इसके लिए जारी बजट सत्र में ही विधेयक लाने की मांग की है. उनका कहना है कि इसके लिए क़ानून बनना चाहिए और जारी सत्र में ही इससे संबंधित विधेयक आना चाहिए. पार्टी के महासचिव महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी का आरोप है कि 2017 की जीत बीजेपी की ईमानदारी की जीत नहीं है, ये 2019 को भी ऐसी ही मशीनों का इस्तेमाल कर जीतना चाहते हैं. इन्होंने 2014 के चुनावों में भी धोखा किया था, तब सत्ता में आए थे.
ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा चुनावों में ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अर्ज़ी दाख़िल की है. पार्टी ने अदालत से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग की है.समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक अताउर्रहमान ने भी ईवीएम से छेड़छाड़ की अर्ज़ी सर्वोच्च न्यायालय में दाख़िल की है. इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ईवीएम को लेकर दायर याचिका पर फ़ैसले के बाद भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ईवीएम के साथ वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल नहीं लगाने की बात कही गई है. उन्होंने ईवीएम में हर पांचवां वोट भारतीय जनता पार्टी को पड़ने और ईवीएम से छेड़छाड़ के सुबूत होने की बात कही है.

हालांकि चुनाव आयोग ईवीएम को सुरक्षित बता रहा है. इतना ही नहीं, विपक्ष में रहते ईवीएम मशीन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी अब ईवीएम पाक-साफ़ नज़र आ रही है.
बहरहाल, ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले सामने आने के बाद सियासी दलों में इनके प्रति अविश्वास पैदा हो गया है. इसके साथ-साथ जन मानस में भी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर भरोसा ख़त्म हुआ है. इतना ही नहीं, इस मामले में चुनाव आयोग जिस तरह का रवैया अख़्तियार किए हुए है, वह भी संतोषजनक नहीं है.

बहरहाल, ईवीएम के साथ छेड़छाड़ लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है. चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनाव निष्पक्ष हों. अगर सियासी दल मतपत्र से चुनाव की मांग कर रहे हैं, तो इसे मंज़ूर किया जाना चाहिए. अगर सरकार और चुनाव आयोग ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर लोकतांत्रिक प्रणाली का क्या महत्व रह जाता है.

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