संजय सिन्हा
पिछले कई सालों से फ़र्ज़ी और चिटफंड कंपनियों का केंद्र रहा है पश्चिम बंगाल.दूसरे राज्यों से ज़्यादा, चिटफंड कंपनियों ने बंगाल को अपना आशियाना बनाया और परवान चढ़ने के साथ-साथ जनता को लूटने का काम किया.पश्चिम बंगाल में फ़र्ज़ी कंपनियों की शुरुआत वास्तव में वामफ्रंट के शासन काल में हुई.वामफ्रंट सरकार के ढीले रवैये के कारण ज़्यादातर  चिटफंड   कंपनियों ने यहां अपना डेरा जमाया और लालच देकर जनता को लूटने का काम शुरू कर दिया.यहां की जनता को एक के बाद एक सब्ज़बाग दिखाए गए और उनकी जेबें खाली  कर दी गईं.ये चिटफंड कंपनियां अभी परवान चढ़ ही रही थीं कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो गया.चिटफंड कंपनियां पशोपेस में थीं कि नई सरकार के आने से कहीं उनका धंधा न मंदा पड़ जाए,लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ,बल्कि चिटफंड कंपनियों का धंधा और भी चोखा हो  उठा.फिर तो तमाम चिटफंड कंपनियों के पांचों उंगली घी में सन गए.तृणमूल कांग्रेस की नई सरकार ने उन्हें रोकने की बजाय उनका हौसला बढ़ाया.परिणामस्वरूप चिटफंड कंपनियों का कारोबार इतना तेज़ी से बढ़ा ,जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.दरअसल सत्तासीन पार्टी के नेताओं और मंत्रियों ने चिटफंड कंपनियों के कार्यक्रमों में धड़ल्ले से जाना  शुरू कर दिया,लिहाज़ा फ़र्ज़ी और चिटफंड कंपनियों का सीना इतना चौड़ा हो गया कि पूछिए मत!इन कंपनियों के लोग दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगे.साथ ही सत्तासीन पार्टी के मंत्रियों और नेताओं को को भी भरपूर फायदा होने लगा.पार्टी फंड गुलज़ार रहने लगा.उधर प्रदेश की भोली-भाली जनता का विश्वास भी इन कंपनियों पर तेजी से बढ़ने लगा,क्योंकि उनके जनप्रतिनिधि भी चिटफंड कंपनियों के कार्यक्रमों में खुलेआम जाने लगे.यहां तक कि प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इन कंपनियों के समारोहों में जाने लगीं.इसके बाद तो जनता का भरोसा और भी दृढ़ हो गया.बंगाल की जनता को लगने लगा कि जब उनकी मुख्यमंत्री तक चिटफंड कंपनियों के साथ हैं,तो उनका पैसा बिलकुल सुरक्षित है,मगर उन्हें ये नहीं पता  था कि ये तमाम चिटफंड कंपनियां उन्हें धोखा दे रहीं हैं.सच तो ये है कि ममता बनर्जी के शासन काल में बंगाल फ़र्ज़ी कंपनियों का एक बड़ा केंद्र बन गया.ममता बनर्जी ने भले ही इन कंपनियों का बहुत ज़्यादा फायदा नहीं उठाया हो मगर उनके सिपहसालारों ने तो अति ही कर दी.जांच के बाद अब एक के बाद एक परत उघड़ रहे हैं.कई चेहरे बेनक़ाब हुए.अभी और भी चेहरे बेनक़ाब होने बाकी हैं.अफ़सोस की बात ये भी है कि जब तक इन चिटफंड कंपनियों का चेहरा सामने आया,तब तक जनता पूरी तरह लुट चुकी थी.करोड़ों रूपये बाजार से उठा लिए गए थे.हाय रे किस्मत....लोग करें भी तो क्या करें.चिटफंड कंपनियों के दफ्तरों के बाहर लटके ताले बुरी तरह उनका मुंह चिढ़ा रहे थे.कंपनियों के एजेंट और अधिकारी तक फरार.बंद पड़े दफ्तरों के सामने महज़ शोर -शराबा करके लौट आने के सिवा और कोई रास्ता भी तो नहीं बचा था लुटे-पिटे लोगों के पास.पुलिस को रिपोर्ट देकर भी कोई फायदा नहीं और सत्तासीन पार्टी के वे नेता और मंत्री भी ऐसे पल्ला झाड़ने  लगे मानों उन कंपनियों से उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं था.
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का कहना है कि -'तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों ने चिटफंड कंपनियों से जमकर फायदा लिया.छोटे -छोटे कार्यक्रमों के लिए बड़े डोनेशन लिए गए.ममता सरकार ने इन कंपनियों को शह दिया.इसी का नतीजा है कि आज लोगों के करोड़ों रूपये डूब गए.पाई-पाई जोड़कर लोगों ने हज़ारों-लाखों रूपये जमा किए लेकिन मिला कुछ भी नहीं.'गौरतलब है कि शारदा घोटाले के बाद ममता सरकार ने लोगों को उनके पैसे लौटने का वादा भी किया.मज़े की बात तो ये है कि प्रदेश के कुछ हिस्सों में टीएमसी के नेताओं और मंत्रियों ने लोगों में चेक भी बांटे,मगर अफ़सोस तक़रीबन सारे चेक बाउंस हो गए.इसके बाद भी बेशुमार वादे और दावे किए गए मगर सभी बेकार साबित हुए.आज भी यहां के लोग उस मनहूस घडी को कोस रहे हैं जब ज़्यादा पाने के लालच में उन्होंने अपने जीवन की गाढ़ी कमाई तक चिटफंड कंपनियों को दे दिए.आखिर मिला कुछ भी नहीं.
एक सर्वेक्षण के मुताबिक,पश्चिम बंगाल में बीसियों चिटफंड कंपनियों ने अपने पैर जमाए और यहां की जनता को खूब सब्ज़बाग दिखाए.कमाल की बात है कि  मां-माटी-मानुष का नारा देने वाली ममता सरकार ने चिटफंड कंपनियों को इतना शह दे दिया कि उनके प्रदेश के 'मानुष' कंगाल हो गए.लोगों ने बेटियों की शादी तक के लिए रखे रुपये  चिटफंड कंपनियों में लगा दिए ताकि उन्हें मोटी रकम मिल सके,मगर हाय रे क़िस्मत! कंपनियों ने उन्हें लूट ही लिया.टीएमसी के शासन में औद्योगिक विकास की दिशा में कोई सार्थक निवेश तो नहीं हुआ,फ़र्ज़ी कंपनियां कुकुरमुत्ते की तरह ज़रूर बढ़ीं.एक दौर था जब इन फ़र्ज़ी कंपनियों का इतना बोलबाला था कि लोग बैंक और पोस्टऑफिस तक जाना भूल गए थे.याद था तो बस चिटफंड कंपनियों का दफ्तर.दरअसल लोगों को इतने ऊंचे-ऊंचे सपने इन फ़र्ज़ी कंपनियों ने दिखा दिए कि उनकी आंखों पर लालच का मोटा पर्दा पड गया.ऊपर से  सत्तासीन पार्टी के नेताओं ने उनके कार्यक्रमों में जा-जा कर उनके परदे को और मोटा कर दिया.मज़े की बात तो ये है क़ि करोड़ों-अरबों रुपये बाजार से उठाने वाली इन कंपनियों के पास आज लौटाने को कुछ भी नहीं है.सरकार के पास लोगों ने लगातार शिकायतें भी कीं लेकिन हुआ कुछ भी नहीं.बस जांच चल रही है.आपको बताता चलूं क़ि यहां ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी भर की कमाई लगा दी.उनका रुपया मिल पाएगा या नहीं,इसका जवाब किसी के पास नहीं.
हालांकि हाल ही में विमुद्रीकरण के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से  एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया गया.टास्क फ़ोर्स ने इन चिटफंड कंपनियों पर लगाम लगाते हुए कार्रवाई शुरू की.टास्क फोर्स के मुताबिक,नवम्बर-दिसंबर '2016 के दौरान ऐसी कंपनियों की ओर से 1 ,238  करोड़ रूपये बैंकों में जमा हुए हैं.इसमें कुछ एक्सपर्ट्स की मदद ली गई है.लगभग 54 सौ करोड़ रुपये ठिकाने लगाए गए.इस मामले में ईडी कोलकाता नब्बे फ़र्ज़ी कंपनियों की जांच-पड़ताल में जुटी हुई है.सूत्र बताते हैं कि इसमें टीएमसी के कुछ नेताओं की भी मिली भगत है.सीबीआई इस मांमले को लेकर काफी सक्रिय है और जल्दी ही जांच की कार्रवाई में और भी तीव्रता आने की आशा है.सीबीआई पूर्ण जांच करके मुकदमा दायर करने वाला है.
मिली जानकारी के मुताबिक,पश्चिम बंगाल में 2011 से 2015 के बीच 17000 चिटफंड कंपनियों का रजिस्ट्रेशन हुआ..दरअसल भारत में कुल पंद्रह लाख कंपनियां रजिस्टर्ड हैं,जिनमे से लगभग छह लाख कंपनियां ही नियमित आय का रिटर्न  फाइल करतीं हैं.इनमें से लाखों कंपनियां महज़ कागज़ों पर ही है,जिन्हें फ़र्ज़ी कंपनी कहा जाता है.गौरतलब है की चिटफंड कंपनियों की तरह ही फ़र्ज़ी कंपनियां भी सबसे ज़्यादा पश्चिम बंगाल में हैं.इनका इस्तेमाल काली कमाई को सफ़ेद ,और सफ़ेद को काला करने के लिए किया जाता है.पश्चिम बंगाल में पनप रहीं फ़र्ज़ी कंपनियों की चर्चा एसआईटी ने भी की है.एसआईटी की नज़र काले धन पर रहती है.एसआईटी ने इसका खुलासा तो किया है,मगर इसपर उचित कार्रवाई भी होनी चाहिए. हालांकि सेबी के रडार पर दर्जनों चिटफंड कंपनियां हैं.
बंगाल में ही क्यों पनपती हैं फ़र्ज़ी कंपनियां?
पश्चिम बंगाल,विशेषकर कोलकाता और आसपास के शहरों में चिटफंड से सम्बंधित काम करने वाले प्रोफेशनल्स और एक्सपर्ट्स काफी हैं.दरअसल पश्चिम बंगाल में व्यापारिक एवं औद्योगिक विकास का ग्राफ बहुत कम हो गया है,यही कारण है की सीए तथा एकाउंट्स एक्सपर्ट्स व   प्रोफेशनल्स के पास काम नहीं है और वे काफी सस्ते में उपलब्ध हो जाते हैं.एक करोड़ रुपये पर चौबीस प्रतिशत टैक्स देने के हिसाब से चौबीस लाख रुपये लगते हैं,लेकिन कोलकाता में किसी भी शेल कंपनी के ऑपरेटर को पचास से सत्तर हज़ार रुपये दीजिये,वह आपके टैक्स के 24 लाख रुपये बचा देता है.एक सर्वेक्षण के अनुसार,कोलकाता में ऐसी हज़ारों कंपनियां हैं,जिनके लिए 6000 से ज़्यादा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स गैरकानूनी तरीके से काम करते हैं.

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