प्रभुनाथ शुक्ल 
सर्वोच्च अदालत की तरफ़ से अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिनियम पर एक फैसला आया है। लेकिन फैसले पर राजनीति शुरु हो गई है। आखिर क्यों ? फैसले में बुराई क्या है । लेकिन कथित दलित हिमायती और राजनेताओं को अपच होने लगी है। उन्हें ऊना तो दिखता है लेकिन भीमा कोरेगाँव नहीँ। दलितों और आदिवासियों को समाज की अगड़ी और समर्थ जातियों के प्रकोप से बचाने के लिए आज से लगभग तीस साल पहले यह क़ानून बनाया गया था। दलितों और आदिवासियों को सार्वजनिक अपमान और मारपीट से बचाने के लिए 1989 में यह कानून बनाया गया।  सुप्रीम कोर्ट का ये ताज़ा फ़ैसला डॉक्टर सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य और एएनआर मामले में आया है। मामला महाराष्ट्र का है जहां अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ इस क़ानून के अंतर्गत मामला दर्ज कराया था।

हमारे समाज में दलित और आरक्षण बेहद संवेदशील मसला है। इस पर जुबान खुली नहीँ की सियासतदां राजनीतिक रोटिया सेंकनी शुरु कर देते हैं और पूरी कोशिश रहती है की आग लगा किसी तरह समाज को बांट सत्ता हथियायी जाय। यानी आरक्षण और दलित आंदोलन एक तरह से सत्ता की चाबी भी है। ऐसा लगता है की दलितों और आदिवासियों की चिंता सिर्फ राजनीतिक दलों और राजनेताओं को है बाकि समाज इस पर मौन है। राजनीति के लिए दलित विमर्श बेहद खास है, लेकिन यह खोखला और बनावटी है। स्थिति यहाँ तक है कि आरक्षण और दलित जैसे विषयों पर चर्चा करना भी गुनाह है। दलितों की सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा के साथ संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए तमाम कानून बने और बनाए गए। इसके अलावा आजादी के बाद संविधान में कई संशोधन कर अनगिनत कड़े कानून भी बनाए गए हैं।  लेकिन वह कितने असर कारक हैं कहना मुश्किल है। इस तरह के कानून में दलितों को सामाजिक सुरक्षा और समानता का अधिकार उन्हें भले न दिला पाए हों लेकिन लोगों में कानूनी भय पैदा करने में सफल रहे हैं। हालांकि इसका व्यापक दुरपयोग भी हुआ है और सियासी लाभ के लिए इसे हथियार के रुप में इस्तेमाल किया गया। हालांकि दलितों के हितरक्षा वाले इन कानूनों का खुला दुरपयोग हो रहा है, जिसकी वजह से समाज में खाई बढ़ रही है। यहीं वजह है की सुप्रीमकोर्ट को समाज की वर्तमान ज़रूरत
को देखते हुए फ़ैसला सुनना पड़ा है।

काँग्रेस और दूसरे दल इस पर राजनीति शुरु कर दिए हैं। ऐसा लगने लगा है कि इस कानून के बाद दलित अब देश में रह नहीँ पाएंगे। उनका उत्पीड़न और तीखा हो जाएगा। अफसोस अदालत अगर एससी और एसटी एक्ट पर फांसी की सजा मुकर्रर करती तो भी इस पर राजनीति होती। क्योंकि सवाल राजनीति का है। अब तक जितने भी कानून बने हैं क्या वे अपराध रोकने में सक्षम हैं । क्या तमाम कानूनों के बाद विभिन्न जाति - धर्म , सम्प्रदाय के खिलाफ अपराध कम हुए हैं। देश के कई राज्यों में बलात्कार के खिलाफ फांसी की सजा का कानून है फ़िर भी  क्या इस तरह की घटनाएं रुक गई हैं। अनूसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम अर्से से बना है फ़िर ऊना जैसी घटनाएं क्यों होती हैं ? सिर्फ कानून और संविधान से किसी के अधिकारों की रक्षा नहीँ हो सकती जब तक लोगों में सामाजिक जागरूकता नहीँ आएगी। दलित हों या पिछड़ा, ब्राह्मण  अथवा आम नागरिक सभी के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। संविधान के दायरे में समाजिक सुरक्षा , रीति रिवाज़ और परम्परा के साथ जीने की पूरी आजादी है। लेकिन समाजिक सुरक्षा और कानूनी आड़ में किसी कानून का गलत उपयोग किया जाय तो यह गलत है। अदालत ने फैसले में यह तो नहीँ कहा है कि इस अधिनियम को ही ख़त्म कर दिया जाय या फ़िर दलित उत्पीड़न के केस ही ना दर्ज़ किए जाएं । उसने तो इस कानून के गलत उपयोग पर चिंता जताते हुए फैसला सुनाया है। अदालत ने जो आदेश दिया है वह सांविधानिक अधिकारों के तहत है। यह व्यक्ति के हितों की रक्षा करने वाला है । इससे दलितों को भला क्या नुकसान होगा।

जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने कहा कि दलित उत्पीड़न का केस दर्ज़ होने के बाद सात दिनों के भीतर शुरुआती जांच ज़रूर पूरी हो जानी चाहिए। यह भी साफ किया है कि आरोपी की गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं है। आरोपी अगर  सरकारी कर्मचारी है तो उसकी गिरफ़्तारी के लिए उसे नियुक्त करने वाले अधिकारी की सहमति ज़रूरी होगी। दूसरी बात सरकारी कर्मचारी नहीं है तो गिरफ़्तारी के लिए सक्षम अधिकारी एसएसपी की सहमति ज़रूरी होगी। हालांकि अभी तक इस कानून में अग्रिम जमानत की सुविधा नहीँ थी,  लेकिन अदालत ने अपने आदेश में अग्रिम ज़मानत की इजाज़त दे दी है।  अदालत ने कहा कि पहली नज़र में अगर ऐसा लगता है कि कोई मामला नहीं है या जहां न्यायिक समीक्षा के बाद लगता है कि क़ानून के अंतर्गत शिकायत में बदनीयती की भावना है, वहां अग्रिम ज़मानत पर कोई रोक नहीं है। फैसले में अदालत ने एक बड़ी बात कहीं है जिसमें कहा है कि एससी और एसटी क़ानून का यह  मतलब नहीं कि जाति व्यवस्था जारी रहे क्योंकि ऐसा होने पर समाज में सभी को एक साथ लाने में और संवैधानिक मूल्यों पर असर पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि संविधान बिना जाति या धर्म के भेदभाव के सभी की बराबरी की बात करता है। यह संविधान में निहित भावना के साथ अन्याय होगा। ऐसी व्यवस्था में समाजिक एवं जातीय असमानता और बढ़ेगी। उस स्थिति में कानून  और संविधान का कोई मतलब नहीँ रह जाता ।

एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 में एसी- एसटी एक्ट में 15-16 प्रतिशत मामलों में पुलिस ने जांच के बाद क्लोज़र रिपोर्ट फ़ाइल कर दी। इसके अलावा अदालत में गए 75 प्रतिशत मामलों को या तो ख़त्म कर दिया गया, या उनमें अभियुक्त बरी हो गए। फ़िर इस तरह के आरोपों में कितनी सच्चाई है। अनुसूचित जाति-जनजाति क़ानून को और मज़बूत करने की माँग के लिए बनाए गए दलित संगठनों के एक राष्ट्रीय गठबंधन का कहना है कि देश में औसतन हर 15 मिनट में चार दलितों और आदिवासियों के साथ ज़्यादती की जाती है। रोज़ाना तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है, 11 दलितों की पिटाई होती है। हर हफ़्ते 13 दलितों की हत्या की जाती है और पाँच दलित घरों को आग लगा दी जाती है। जबकि छह दलितों का अपहरण कर लिया जाता है। संगठन के मुताबिक़ पिछले 15 बरसों में दलितों के ख़िलाफ़ ज़्यादती के साढ़े पाँच लाख से ज़्यादा मामले दर्ज किए गए। इस तरह देखें तो डेढ़ करोड़ दलित और आदिवासी प्रभावित हुए हैं। 2013 में दलितों पर ज़्यादती के 39,346 मुक़द्दमे दर्ज हुए थे। अगले साल ये आँकड़ा बढ़कर 40,300 तक पहुँचा।  फिर 2015 में दलितों के ख़िलाफ़ ज़्यादती के 38,000 से ज़्यादा मुक़दमे दर्ज हुए। दलितों के एक निकाय ने केंद्र से अपील की है कि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अधिनियम को लागू करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे। संगठन ने कहा कि कोर्ट के इस फैसले का सामाजिक न्याय की अवधारणा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जबकि बीजेपी सांसदों ने भी कोर्ट के फैसले को लेकर केंद्रीय सामजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत से मुलाकात की है। सांसदों ने गहलोत से इस मामले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रखने को कहा है। अन्याय किसी के साथ नहीँ होना नहीँ चाहिए। सभी के  हितों की कानूनी रक्षा होनी चाहिए। तभी हम समता मूलक समाज की स्थापना में अपनी सामजिक भूमिका निभा सकते हैं । संविधान पीठ को स्वतंत्र रुप से अपना कार्य करने दिया जाए। अदालती फैसलों पर राजनीति नहीँ होनी चाहिए।

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