डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
विविधताओं में एकता की परिभाषा से अलंकृत राष्ट्र यदि कोई हैं तो भारत के सिवा दूसरा नहीं | यक़ीनन इस बात में उतना ही दम हैं जितना भारत के विश्वगुरु होने के तथ्य को स्वीकार करने में हैं | भारत संस्कृतिप्रधान और विभिन्न जाति, धर्मों, भाषाओं, परिवेश व बोलियों को साथ लेकर एक पूर्ण गणतांत्रिक राष्ट्र बना | इसकी परिकल्पना में ही सभी धर्म, पंथ, जाति और भाषाओं का समावेश हैं |
जिस राष्ट्र के पास अपनी २२ संवैधानिक व अधिकारिक भाषाएँ हों, जहां पर कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदलने की बात कही जाती है, जहां लगभग १७९ भाषाओं ५४४ बोलिया हैं बावजूद इसके राष्ट्र का राजकाज एक विदेशी भाषा के अधिकनस्थ और गुलामी की मानसिकता के साथ हो रहा हो यह तो ताज्जुब का विषय हैं | स्वभाषाओं के उत्थान हेतु न कोई दिशा हैं न ही संकल्पशक्ति | भारतीय भाषाएं अभी भी विदेशी भाषाओं के वर्चस्व के कारण दम तोड़ रही रही हैं | एक समय आएगा जब देश की एक भाषा हिन्दी तो दूर बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं की भी हत्या हो चुकी होगी | इसलिए राष्ट्र के तमाम भाषा हितैषियों को भारतीय भाषाओं में समन्वय बना कर हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाना होगा और अंतर्राज्यीय कार्यों को स्थानीय भाषाओं में करना होगा | अँग्रेजियत की गुलाम मानसिकता से जब तक किनारा नहीं किया जाता भारतीय भाषाओं की मृत्यु तय हैं| और हिन्दी को इसके वास्तविक स्थान पर स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि इसकी स्वीकार्यता जनभाषा के रूप में हो | यह स्वीकार्यता आंदोलनों या क्रांतियों से नही आने वाली है | इसके लिए हिन्दी को रोजगारपरक भाषा के रूप में विकसित करना होगा क्योंकि भारत विश्व का दूसरा बड़ा बाजार हैं और बाजारमूलक भाषा की स्वीकार्यता सभी जगह आसानी से हो सकती हैं | साथ ही अनुवादों और मानकीकरण के जरिए इसे और समृद्धता और परिपुष्टता की ओर ले जाना होगा |
हमारे राष्ट्र को सृजन की ऐसी आधारशिला की आवश्यकता हैं जिससे हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओँ के उत्थान के लिए एक ऐसा सृजनात्मक द्दष्टिकोण विकसित हो जो न सिर्फ हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओँ को पुष्ट करेगा बल्कि उन भाषाओ को एक दूसरे का पूरक भी बनाएगा| इससे भाषा की गुणवता तो बढ़ेगी ही उसकी गरिमा फिर से स्थापित होगी| आज के दौर में हिन्दी को लेकर जो नकारात्मकता चल रही है उसे सकारात्मक मूल्यों के साथ संवर्धन हेतु प्रयास करना होगा|
भारतीय राज्यों में समन्वय होने के साथ-साथ प्रत्येक भाषा को बोलने वाले लोगो के मन में दूसरी भाषा के प्रति भरे हुए गुस्से को समाप्त करना होगा | जैसे द्रविड़ भाषाओं का आर्यभाषा,नाग और कोल भाषाओं से समन्वय स्थापित नहीं हो पाया, उसका कारण भी राजनीति की कलुषित चाल रही, अपने वोटबैंक को सहेजने के चक्कर में नेताओं ने भाषाओं और बोलियों के साथ-साथ लोगो को भी आपस में मिलने नहीं दिया | इतना बैर दिमाग़ में भर दिया कि एक भाषाई दूसरे भाषाई को अपना निजी शत्रु मानने लग गया, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था| हर भारतवंशीय को स्वभाषा का महत्व समझा कर देश की एक केंद्रीय संपर्क भाषा के लिए तैयार करना होगा. क्योंकि विश्व पटल पर भारत की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं हैं, विविधताओं के बावजूद भी भारत की साख में केवल राष्ट्रभाषा न होना भी एक रोड़ा हैं| हर भारतीय को चाहना होगा एक संपर्क भाषा वरना दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर रोटी खा जाएगा, मतलब साफ है कि यदि हमारी भारतीय भाषाओं के बीच हो लड़ाई चलती रही तो स्वभाविक तौर पर अँग्रेज़ी उस स्थान को भरेगी और आनेवाले समय में एक अदने से देश में बोली जाने वाली भाषा जिसे विश्व में भी कुल ७ प्रतिशत से ज़्यादा लोग नहीं बोलते भारत की राष्ट्रभाषा बन जाएगी |
स्वभाषाओं के बीच समन्वय का सबसे बेहतर विकल्प हैं- अंतर्राज्यीय भाषा सम्मेलन व परिचर्चा | भारत के प्रत्येक वर्चस्वशील भाषाओं के बीच में साहित्यिक समन्वय से शुरुआत की जा सकती हैं | जैसे एक कवि सम्मेलन में तमिल, तेलगु, मलयाली भाषा के कवियों को आमंत्रित किया जाए और साथ में एक-एक हिन्दी अनुवादक लाए जाए जो तमिल की रचना को हिन्दी में सुनाए और हिन्दी की रचना को तमिल आदि भाषा में | साथ में भाषाओं के बोलने वालों के बीच समन्वय हेतु चर्चाओं का दौर शुरू हो, एक-दूसरे को स्वभाषा का सम्मान  बताया जाए, कमियाँ न गिना कर समन्वय की स्थापना की जाए | जब यह कार्य वृहद स्तर पर होने लगेगा तो निश्चित तौर पर हिन्दी राष्ट्र की जनभाषा का दर्जा पुन: प्राप्त कर लेगी और राष्ट्रभाषा बनने की कठिनाई भी दूर होगी|
साथ-साथ जनता में भाषा को लेकर राजनैतिक दूषिता को भी दूर करना होगा | एक भाषा की स्वीकार्यता के लिए सभी स्वभाषाओं का सम्मान करना सबसे आवश्यक कदम है | देश के २९ राज्यों और ७ केंद्रशासित राज्यों में भाषा की एकरूपता और स्वीकार्यता बहुत आवश्यक हैं | जनभाषा बनने के लिए हिन्दी भाषियों को भी विशाल हृदय का परिचय देते हुए अन्य भाषी समाज को स्वीकारना होगा तो अन्य भाषाओं के लोगों को हिन्दी भाषियों के साथ भी समन्वय रखना होगा| इसमे शासकीय भूमिका और मंशा भी महत्वपूर्ण कड़ी है | अन्यथा जनता की स्वीकारता को सरकार कमजोर भी कर सकती है यदि उनकी मंशा नहीं हैं तो | फिर भी जनतंत्र में जनता से बड़ी कोई इकाई नहीं हैं | जहाँ जनमत चाहेगा की एक भाषा हो, हिन्दी हमारी राष्ट्र की प्रतिनिधि भाषा हो तब सरकार को भी झुकना होगा | 'एक साधे-सब सधे' के सूत्र से राष्ट्र में भाषा क्रांति का सूत्रनाद संभव हैं, अन्यथा ढाक के तीन पात|
राजनीति से बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि इन्हीं राजनैतिक छल-प्रपंचों ने हिन्दी को अभी तक स्वाभिमान नहीं दिलाया | इन्ही पर किसी शायर का एक शेर है –
'गर चिरागों की हिफ़ाज़त फिर इन्हें सौंपी गई,
तो रोशनी के शहर में बस अंधेरा ही रह जाएगा…’
(लेखक डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं)

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