फ़िरदौस ख़ान
ॐ पूर्णभदः पूर्णामिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
यानी हम प्रकृति से उतना ही ग्रहण करें, जितना हमारे लिए ज़रूरी हो, ताकि प्रकृति की पूर्णता को क्षति न पहुंचे. यह सीख भारतीय धर्म ग्रंथों में दी गई है. लेकिन अफ़सोस और शर्म की बात तो यह है कि हमने अपने पुरखों की नसीहतों को नकार कर प्रकृति का दोहन करने की बजाय उसका दमन शुरू कर दिया. नतीजतन, पर्यावरण पर प्रदूषण का संकट छा गया है. क़ाबिले-गौर है कि दुनिया के सभी मज़हबों में पर्यावरण संरक्षण की सीख दी गई है. क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है- जल और थल में बिगाड़ फैल गया ख़ुद लोगों के ही हाथों की कमाई के कारण, ताकि वह उन्हें उनकी कुछ करतूतों का मज़ा चखाए, शायद वे बाज़ आ जाएं. इसी तरह पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया- अगर क़यामत आ रही हो और तुम में से किसी के हाथ में कोई पौधा हो, तो उसे लगा ही दो और परिणाम की चिंता मत करो. जिसने अपनी ज़रूरत से ज़्यादा पानी को रोका और दूसरे लोगों को पानी से वंचित रखा, तो अल्लाह फ़ैसले वाले दिन उस व्यक्ति से अपना फ़ज़लो-करम रोक लेगा. जो व्यक्ति कोई पौधा लगाता है या खेतीबाड़ी करता है. फिर उसमें से कोई परिंदा, इंसान या अन्य कोई प्राणी खाता है, तो यह सब पौधा लगाने वाले की नेकी में गिना जाएगा. जो भी व्यक्ति खजूर का पेड़ लगाएगा, उस खजूर से जितने फल निकलेंगे, अल्लाह उसे उतनी ही नेकी देगा. जिस घर में खजूर का पेड़ हो, वह भुखमरी से परेशान नहीं हो सकता. इसी तरह वेद में प्रार्थना की गई है-
'यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु।
मां ते मर्म विमृग्वरी या ते हृदयमर्पितम्॥'
यानी हे भूमि माता! मैं जो तुम्हें हानि पहुंचाता हूं, शीघ्र ही उसकी क्षतिपूर्ति हो जाए. मतलब यह है कि हम भूमि की ज़्यादा गहराई तक खुदाई करने में सावधानी बरतें. लेकिन धन के लालच में व्यक्ति ने न सिर्फ़ ज़मीन को गहराई तक खोद डाला, बल्कि पहाड़ों में भी अत्यधिक खनन करके उन्हें नुक़सान पहुंचाया. वनों के काटने से वन्य प्राणियों की आश्रय स्थली ख़त्म होने लगी और वे हिंसक होकर आबादी की तरफ़ भागने लगे. हालत यह है कि कई राज्यों में हाथियों के झुंड फ़सलों पर हमला कर देते हैं. इसकी वजह से जहां किसानों की ख़ून-पसीने से पैदा की गई फ़सल बर्बाद हो जाती हैं, वहीं कई बार उन्हें जान से भी हाथ धोना पड़ता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तबाही के लिए इंसान ख़ुद ही ज़िम्मेदार है.  मसलन खेती की ज़मीन को ही लें.  सूखा, बाढ़, लवणीयता, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल और अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर में गिरावट आने से सोना उगलने वाली उपजाऊ ज़मीन अब मरुस्थल बनती जा रही है. दुनिया की कुल ज़मीन का सिर्फ़ 11 फ़ीसद हिस्सा ही उपजाऊ है. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक अनुमान के मुताबिक़, देश में कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर ज़मीन में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हज़ार हेक्टेयर भूमि बंजर है. ग़ौरतलब है कि देश में हर साल 600 करोड़ टन मिट्टी कटाव की वजह से बह जाती है. उपजाऊ मिट्टी की बर्बादी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर साल 84 लाख टन पोषक तत्व बाढ़ आदि की वजह से बह जाते हैं. इसके अलावा कीटनाशकों की वजह से हर साल एक करोड़ चार लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की उपजाऊ शक्ति ख़त्म हो रही है. बाढ़, लवणीयता और क्षारपन आदि की वजह से हर साल 270 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का बंजर होना भी नुक़सानदेह है.

ख़ुशनुमा बात यह है कि किसान बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जागरूक हो रहे हैं. किसान अब पारंपरिक खेती अपना रहे हैं, ताकि उपजाऊ ज़मीन को बंजर होने से बचाया जा सके. वे खेतीबाड़ी में जहां आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं पौधों के पोषण के मामले में जैविक खाद को तरजीह दे रहे है. जैविक खेती के लिए केंचुआ खाद की ज़रूरत होती है. बहुत से किसान जैविक खेती करने के साथ जैविक खाद बनाकर बाज़ार में बेच रहे हैं, जिससे उन्हें ख़ासी आमदनी हो रही है. जैविक खेती करने वाले किसान अब अपनी कंपनी भी बना रहे हैं. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले के किसान रतिराम शंभुनाथ और लुदरू ने जैविक खाद बनाने वाली कंपनी भूगदामी के हिस्सेदार हैं. इस कंपनी के जैविक उत्पाद का नाम आदिम है. आदिम चावल की तरह की वैरायटी हैं. इसकी ख़ासियत यह है कि इसमें मेहेर और गुड़मा जैसी चावल की परंपरागत क़िस्म है है. इनमें आयरन सामान्य चावल से ज़्यादा है. यहां के लोग इसे औषधीय चावल के तौर पर ख़ूब इस्तेमाल करते हैं. जिन लोगों में ख़ून की कमी है, उनके लिए यह चावल बहुत फ़ायदेमंद है. इसके अलावा हरदी घाटी, राखी, टूटी सफ़री, सुगंधा बासमती, लोकटी, कोटो कुटकी आदि क़िस्मों के चावल भी हैं. कंपनी इन चावलों को पोहा और आटा भी मुहैया कराएगी. किसानों का कहना है पहले उनके उत्पाद शॊपिंग मॊल तक में बिक रहे हैं. उत्तर भारत के अलावा दक्षिण भारत तक से उनके पास ख़रीदार आ रहे हैं. इन क़िस्मों के चावल का रक़बा बहुत कम है. इन किसानों को उम्मीद है कि जैसे-जैसे इन क़िस्मों के चावल की मांग बढ़ेगी, वैसे ही इनका उत्पादन भी बढ़ेगा. ग़ौरतलब है कि भूमगादी बस्तर इलाक़े में स्थानीय परंपरा है. इसके तहत अच्छी फ़सल के बाद किसान पैदावार को एक जगह एकत्रित करके उत्सव मनाते हैं. दंतेवाड़ा में जैविक खेती कर रहे समूहों ने प्रशासन की मदद से इसका निर्माण किया. फ़िलहाल 102 जैविक समूहों के 1200 से ज़्यादा किसान इस कंपनी के सदस्य और हिस्सेदार हैं.

ग़ौरतलब है कि जैविक खेती के  बेहतर नतीजे सामने आ रहे हैं. देश में जैविक खेती योग्य क्षेत्र पिछले एक दशक में तक़रीबन 17 गुना बढ़ गया है. यह क्षेत्र साल 2003-04 में 42 हज़ार हेक्टेयर था, जो साल 2013-14 में बढ़कर 7.23 लाख हेक्टेयर हो गया. जैविक खेती अपनाने वाले किसानों का कहना है कि कीटनाशकों और रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जहां कृषि भूमि के बंजर होने का ख़तरा पैदा हो गया है, वहीं कृषि उत्पाद भी ज़हरीले हो रहे हैं. अनाज ही नहीं, दलहन, फल और सब्ज़ियों में भी रसायनों के विषैले तत्व पाए गए हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं. जैविक खेती के ज़रिये पैदा हुआ अनाज सेहत के लिए बेहद फ़ायदेमंद है. इसका बाज़ार भाव भी अन्य खाद्यान्न के मुक़ाबले ज़्यादा है. जैविक खाद की वजह से खेत की मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार आया है. इसके अलावा कम अंतराल पर सिंचाई नहीं करनी पड़ती है.
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी में आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है. मिट्टी के ज़हरीला होने से सर्वाधिक असर केंचुओं की तादाद पर पड़ता है. इससे भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण हो जाती है और फ़सलों की उत्पादकता भी प्रभावित होती है. साथ ही मिट्टी में कीटनाशकों के अवशेषों की मौजूदगी का असर जैविक प्रक्रियाओं पर भी पड़ता है. यूरिया खाद को पौधे सीधे तौर पर अवशोषित कर सकते हैं. इसके लिए यूरिया को नाइट्रेट में बदलने का कार्य विशेष प्रकार के बैक्टीरिया द्वारा किया जाता है. अगर भूमि ज़हरीली हो गई, तो बैक्टीरिया की तादाद पर प्रभावित होगी. जैविक खेती से भूमि की उपजाऊ शक्ति बरकरार रहती है.

पारंपरिक खेती के साथ-साथ बाग़वानी भी पर्यावरण के लिए उपयोगी साबित हो रही है. इससे जहां किसानों की आमदनी पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बढ़ी है, वहीं वातावरण भी हराभरा हुआ है. बाग़वानी से फलों के अलावा इमारती लकड़ी भी मिलती है, जिसकी बाज़ार में अच्छी ख़ासी मांग है. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ ज़िले के गांव विधिपुर के किसान पारंपरिक अनाज की खेती के साथ ही बाग़वानी भी कर रहे हैं. वह गेंहू, धान और बाजरे की फ़सल के अलावा, अमरूद, नींबू, करौंदा और बेल (बेलगिरी या बेलपत्र) भी उगा रहे हैं. उनका कहना है कि बाग़वानी से जहां हरियाली बढ़ी है, वहीं उनकी आमदनी में भी ख़ासी बढ़ोतरी हुई है. तक़रीबन नौ साल पहले वह बाग़वानी विभाग के संपर्क में आए और यहीं से उन्हें बाग़वानी की सभी ज़रूरी जानकारी मिली. उन्होंने राष्ट्रीय बाग़वानी मिशन व अन्य योजनाओं की भी जानकारी ली और उन योजनायों का फ़ायदा लिया. उस वक़्त सरकार बाग़वानी के लिए मुफ़्त पौधे देने के साथ ही खुदाई का ख़र्च भी ख़ुद ही उठा रही थी. उन्होंने अमरूद, नींबू, करौंदा और बेल (बेलगिरी या बेलपत्र) के पौधे रोपे. कुछ वक़्त बाद पौधे पेड़ बने और फलों से लद गए. उनका कहना है कि उन्हें अपनी पैदावार को बेचने के लिए मंडी नहीं जाना पड़ता. फल कारोबारी उनके बाग़ से ही फल ले जाते हैं. उनके पास दिल्ली तक से व्यापारी आते हैं. उनकी देखादेखी विधिपुर और इसके आसपास के गांवों के किसानों ने भी बाग़वानी शुरू कर दी.

किसान कृषि वानिकी को अपनाकर कुछ हद तक पर्यावरण संतुलन को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. ग़ौरतलब है कि फ़सलों के साथ वृक्ष लगाने को कृषि वानिकी कहा जाता है. वृक्ष जीवन का आधार हैं. इनसे जीवनदायिनी ऒक्सीज़न मिलती है. फल-फूल मिलते हैं, औषधियां मिलती हैं, छाया मिलती, लकड़ी मिलती है. इस सबके बावजूद बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वृक्षो को काटा जा रहा है.  देश में वन क्षेत्रफल 19.2 फ़ीसद है. जंगल ख़त्म हो रहे हैं. इससे पर्यावरण के सामने संकट खड़ा हो गया है. इसलिए वन क्षेत्र को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है. घटते वन क्षेत्र को राष्ट्रीय लक्ष्य 33.3 फ़ीसद के स्तर पर लाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा वृक्ष लगाने होंगे.

खेतों की मेढ़ों के अलावा गांव की शामिलात भूमि, परती भूमि और ऐसी भूमि, जिस पर कृषि नहीं की जा रही हैं, वहां भी उपयोगी वृक्ष लगाकर पर्यावरण को हरा-भरा बनाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों ओर भी वृक्ष लगाए जा सकते हैं. कृषि वानिकी के तहत ऐसे वृक्ष लगाने चाहिए, जो ईंधन के लिए लकड़ी और खाने के लिए फल दे सकें. जिनसे पशुओं के लिए चारा और खेती के औज़ारों के लिए अच्छी लकड़ी भी मिल सके. इस बात का भी ख़्याल रखना चाहिए कि वृक्ष ऐसे हों, जल्दी उगें और उनका झाड़ भी अच्छा बन सके. बबूल, शीशम, नीम,  रोहिड़ा, ढाक, बांस, महुआ, जामुन, कटहल, इमली, शहतूत, अर्जुन, खेजड़ी, अशोक, पोपलर, सागौन और देसी फलों आदि के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. कृषि वानिकी योजना के तहत खेतों की मेढ़ों पर पेड़ लगाने के लिए किसानों को अनुदान भी दिया जाता है.

दरअसल, बढ़ती आबादी की रिहायशी और अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पिछले पांच दशकों में हरित वनीय क्षेत्र और पेड़-पौधों को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया गया है. वन्य इलाक़ों में वृक्षों को काटकर वहां बस्तियां बसा ली गईं. फ़र्नीचर और ईंधन आदि के लिए हरे-भरे पेड़ों को काट डाला गया. इंसान की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन किया गया. नतीजतन, प्राकृतिक चीज़ें, मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित होने लगीं. इसका सीधा असर इंसान की सेहत पर भी पड़ा है. बहरहाल, धरती के मरुस्थलीकरण और मिट्टी की ऊपरी परत के क्षरण को रोकने के कई तरीक़े हैं, जैसे पौधारोपण और बेहतर जल प्रबंधन. पौधारोपण के ज़रिए मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है, वहीं बेहतर जल प्रबंधन करके अत्यधिक भू-जल दोहन पर रोक लगाई जा सकती है. इसके अलावा यह कोशिश भी करनी चाहिए कि कृषि योग्य भूमि को किसी अन्य काम में इस्तेमाल न किया जाए. कीटनाशकों का समुचित इस्तेमाल करके मृदा, जल और वायु प्रदूषण से बचा जा सकता है. 

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