स्टार न्यूज़ एजेंसी
पेरिस (फ्रांस). देश में एक बार फिर बुर्क़े को लेकर बहस का दौर शुरू हो गया है. आव्रजन मंत्री एरिक बेसन ने कहा है कि वे फ्रांस की सड़कों पर बुर्का नहीं देखना चाहते. साथ ही उन्होंने फ्रांसीसी राष्ट्रीय पहचान का ज़िक्र करते हुए बुर्क़े पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस कराने की पेशकश की है कि इसमें बुर्के को शामिल नहीं किया जाना चाहिए.
एक टीवी को दिए साक्षात्कार में एरिक बेसन ने कहा बुर्का फ्रांस के राष्ट्रीय मूल्यों के विपरीत है. उन्होंने कहा कि इस तरह के बुर्के महिलाओं के अधिकारों और समानता के प्रति फ्रांस की प्रतिबद्धता के खिलाफ़ हैं. उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को भी दूसरी महिलाओं की तरह जीने का हक़ है.
क़ाबिले-गौर है कि साल 2004 में फ़्रांस ने सरकारी स्कूलों और दफ़्तरों में हिजाब और अन्य धार्मिक चिन्हों के पहनने पर पाबंदी लगा दी थी. इस पर काफ़ी बवाल भी मचा था. फ्रांस के राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी ने कहा था कि फ्रांस में बुर्क़ा पहनना स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि बुर्क़ा पहनने वाली महिलाएं क़ैदी के समान हैं, जो आम सामाजिक जीवन जीने से महरूम रहती हैं और अपनी पहचान की मोहताज होती हैं. इसके कुछ वक़्त बाद ही फ़्रांस की महिला मुस्लिम मंत्री फ़देला अमारा ने फ्रांस में बुर्क़े पर पाबंदी का समर्थन करते हुए कहा था कि बुर्क़ा महिलाओं को क़ैदी की तरह बना देता है और फ़्रांस के मौलिक सिद्धांतों में से एक महिला-पुरुष के बीच समानता की अवहेलना करता है. बुर्क़ा एक पहनावा ही नहीं बल्कि एक धर्म के राजनीतिक दुरुपयोग का प्रतीक है. उनका कहना था कि बुर्क़े पर पाबंदी से महिलाओं का मनोबल बढ़ेगा.

फ्रांस में मुस्लिम आबादी अन्य सभी यूरोपीय देशों के मुक़ाबले ज़्यादा है और कुछ अरसा पहले बुर्क़े पर प्रतिबंध के मुद्दे पर यहां की संसद ने एक 32 सदस्यीय आयोग का गठन किया है.
गौरतलब यह भी है कि इसी माह मिस्र की राजधानी काहिरा स्थित अल अज़हर विश्वविद्यालय के इमाम शेख़ मोहम्मद सैयद तांतवई ने कक्षा में छात्राओं और शिक्षिकाओं के बुर्क़ा पहनने पर रोक लगाकर एक नया विवाद पैदा कर दिया था. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ कई इस्लामी सांसदों ने शेख़ तांतवई के इस्तीफ़े की मांग करते हुए इसे इस्लाम पर हमला क़रार दिया था. इमाम शेख़ मोहम्मद सैयद तांतवई ने क़ुरान का हवाला देते हुए कहा है कि नक़ाब इस्लाम में लाज़िमी (अनिवार्य) नहीं है, बल्कि यह एक रिवाज है.

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