Showing newest 36 of 221 posts from December 2009. Show older posts
Showing newest 36 of 221 posts from December 2009. Show older posts


नए साल की तैयारियां !
आटा गीला पड़ा हुआ है, चिढ़ा रहीं तरकारियां !!

होटलों में जश्न !
कैसे, किसके साथ, कब तलक, हैं बेकार पूछने प्रश्न !!

जापान !
खुद को कुछ भी माने लेकिन, बेवकूफ औरों को मान !!

युकियो हातोयामा !
परमाणु-संधि करने का, हमसे भी करवाएं ड्रामा !!

सीटीबीटी !
अच्छे-भले शब्द की ऐसे, रेढ़ बहुत इंग्लिश ने पीटी !!

हस्ताक्षर !
करने वाले की शैली पर, हंसता हुआ लगे हर अक्षर !!

सवालों के घेरे में !
वो जवाब तेरे अन्दर हैं, जो सवाल हैं मेरे में !!

बन्दर पकड़े !
नेताओं की नक़ल बनाकर, क्या वे नगर-निगम से अकड़े ??

स्वतन्त्रता-संग्राम !
ऐसा लगता है कि जैसे, सुना हुआ सा हो यह नाम !!

स्वतन्त्रता-सेनानी !
नेताओं ने इन लोगों की, कीमत अब चुनाव में जानी !!

हस्तियां !
कुछ दिन बाद चली जाती हैं, ऊपर लेकर मस्तियां !!
-अतुल मिश्र


नये साल का स्वागत करके, नूतन आस जगाने दो।
कल क्या होगा, कौन जानता, मन की प्यास बुझाने दो।।

क्या खोया, क्या पाया कल तक, अनुभव के संग ज्ञान यही।
इसी ज्ञान से कल हो रौशन, यह विश्वास बढ़ाने दो।।

जो न सोचा, हो जाता है, नहीं हारते वीर कभी।
सच्ची कोशिश, प्रतिफल अच्छा, बातें खास बताने दो।।

कल आएगा, बीता कल भी, नहीं किसी पर वश अपना।
अपने वश में वर्तमान बस, यह आभास कराने दो।।

जितने काँटे मिले सुमन को, बढ़ती है उतनी खुशबू।
खुद का परिचय संघर्षों से, यह एहसास कराने दो।।
-श्यामल सुमन



सरफ़राज़ ख़ान
विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में एक नहीं दो नहीं, बल्कि अनेक नववर्ष मनाए जाते हैं. यहां के अलग-अलग समुदायों के अपने-अपने नववर्ष हैं. अंग्रेजी कैलेंडर का नववर्ष एक जनवरी को शुरू होता है. इस दिन ईसा मसीह का नामकरण हुआ था. दुनियाभर में इसे धूमधाम से मनाया जाता है.
मोहर्रम महीने की पहली तारीख को मुसलमानों का नया साल हिजरी शुरू होता है. मुस्लिम देशों में इसका उत्साह देखने को मिलता है. इस्लामी या हिजरी कैलेंडर, एक चंद्र कैलेंडर है, जो न सिर्फ मुस्लिम देशों में इस्तेमाल होता है, बल्कि दुनियाभर के मुसलमान भी इस्लामिक धार्मिक पर्वों को मनाने का सही समय जानने के लिए इसी का इस्तेमाल करते हैं. यह चंद्र-कैलेंडर है, जिसमें एक वर्ष में बारह महीने, और 354 या 355 दिन होते हैं, क्योंकि यह सौर कैलेंडर से 11 दिन छोटा है इसलिए इस्लामी तारीखें, जो कि इस कैलेंडर के अनुसार स्थिर तिथियों पर होतीं हैं, लेकिन हर वर्ष पिछले सौर कैलेंडर से 11 दिन पीछे हो जाती हैं. इसे हिजरी इसलिए कहते हैं, क्योंकि इसका पहला साल वह वर्ष है जिसमें हज़रत मुहम्मद की मक्का शहर से मदीना की ओर हिज्ऱ या वापसी हुई थी. हिंदुओं का नववर्ष नव संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा में पहले नवरात्र से शुरू होता है. इस दिन ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी. जैन नववर्ष दीपावली से अगले दिन होता है. भगवान महावीर स्वामी की मोक्ष प्राप्ति के अगले दिन यह शुरू होता है. इसे वीर निर्वाण संवत कहते हैं. बहाई धर्म में नया वर्ष ‘नवरोज’ हर वर्ष 21 मार्च को शुरू होता है. बहाई समुदाय के ज्यादातर लोग नव वर्ष के आगमन पर 2 से 20 मार्च अर्थात् एक महीने तक व्रत रखते हैं. गुजराती 9 नवंबर को नववर्ष ‘बस्तु वरस’ मनाते हैं. अलग-अलग नववर्षों की तरह अंग्रेजी नववर्ष के 12 महीनों के नामकरण भी बेहद दिलचस्प है. जनवरी : रोमन देवता 'जेनस' के नाम पर वर्ष के पहले महीने जनवरी का नामकरण हुआ. मान्यता है कि जेनस के दो चेहरे हैं. एक से वह आगे और दूसरे से पीछे देखता है. इसी तरह जनवरी के भी दो चेहरे हैं. एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है और दूसरे से अगले वर्ष को. जेनस को लैटिन में जैनअरिस कहा गया. जेनस जो बाद में जेनुअरी बना जो हिन्दी में जनवरी हो गया.
फरवरी : इस महीने का संबंध लैटिन के फैबरा से है. इसका अर्थ है 'शुद्धि की दावत' . पहले इसी माह में 15 तारीख को लोग शुद्धि की दावत दिया करते थे. कुछ लोग फरवरी नाम का संबंध रोम की एक देवी फेबरुएरिया से भी मानते हैं. जो संतानोत्पत्ति की देवी मानी गई है इसलिए महिलाएं इस महीने इस देवी की पूजा करती थीं.
मार्च : रोमन देवता 'मार्स' के नाम पर मार्च महीने का नामकरण हुआ. रोमन वर्ष का प्रारंभ इसी महीने से होता था. मार्स मार्टिअस का अपभ्रंश है जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. सर्दियों का मौसम खत्म होने पर लोग शत्रु देश पर आक्रमण करते थे इसलिए इस महीने को मार्च रखा गया.
अप्रैल : इस महीने की उत्पत्ति लैटिन शब्द 'एस्पेरायर' से हुई. इसका अर्थ है खुलना. रोम में इसी माह बसंत का आगमन होता था इसलिए शुरू में इस महीने का नाम एप्रिलिस रखा गया. इसके बाद वर्ष के केवल दस माह होने के कारण यह बसंत से काफी दूर होता चला गया. वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के सही भ्रमण की जानकारी से दुनिया को अवगत कराया तब वर्ष में दो महीने और जोड़कर एप्रिलिस का नाम पुनः सार्थक किया गया.
मई : रोमन देवता मरकरी की माता 'मइया' के नाम पर मई नामकरण हुआ. मई का तात्पर्य 'बड़े-बुजुर्ग रईस' हैं. मई नाम की उत्पत्ति लैटिन के मेजोरेस से भी मानी जाती है.
जून : इस महीने लोग शादी करके घर बसाते थे. इसलिए परिवार के लिए उपयोग होने वाले लैटिन शब्द जेन्स के आधार पर जून का नामकरण हुआ. एक अन्य मान्यता के मुताबिक रोम में सबसे बड़े देवता जीयस की पत्नी जूनो के नाम पर जून का नामकरण हुआ.
जुलाई : राजा जूलियस सीजर का जन्म एवं मृत्यु दोनों जुलाई में हुई. इसलिए इस महीने का नाम जुलाई कर दिया गया.
अगस्त : जूलियस सीजर के भतीजे आगस्टस सीजर ने अपने नाम को अमर बनाने के लिए सेक्सटिलिस का नाम बदलकर अगस्टस कर दिया जो बाद में केवल अगस्त रह गया.
सितंबर : रोम में सितंबर सैप्टेंबर कहा जाता था. सेप्टैंबर में सेप्टै लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है सात और बर का अर्थ है वां यानी सेप्टैंबर का अर्थ सातवां, लेकिन बाद में यह नौवां महीना बन गया.
अक्टूबर : इसे लैटिन 'आक्ट' (आठ) के आधार पर अक्टूबर या आठवां कहते थे, लेकिन दसवां महीना होने पर भी इसका नाम अक्टूबर ही चलता रहा.
नवंबर : नवंबर को लैटिन में पहले 'नोवेम्बर' यानी नौवां कहा गया. ग्यारहवां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला एवं इसे नोवेम्बर से नवंबर कहा जाने लगा.
दिसंबर : इसी प्रकार लैटिन डेसेम के आधार पर दिसंबर महीने को डेसेंबर कहा गया. वर्ष का बारहवां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)



संतोष जैन पासी/ वंदना सभरवाल
स्तनपान शिशु के लिए प्राकृतिक और सम्पूर्ण आहार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सिफारिश करता है कि सभी शिशुओं को विशेष रूप से छह महीने की आयु तक स्तनपान कराना चाहिए और छह महीने के बाद पर्याप्त मात्रा में अनुपूरक आहार के साथ दो वर्ष का होने तक अथवा उससे भी अधिक समय तक स्तनपान जारी रखना चाहिए। ऐसे समय में जब शिशु के विकास की दर उच्चतम अवस्था में होती है, स्तनपान शिशु को प्राय: सभी पौष्टिक तत्वों की पर्याप्त और उचित मात्रा उपलब्ध कराता है।

मां के दूध में श्वेत रुधिर कणिकाएं (ल्यूकॅसाइट), मैक्रोफेज, और एपिथेलियल कोशिकाएं; लिपिड़ि्स (ट्राइएसिलगाइसरॉल्स, मुक्त वसा अम्ल, फास्फोलाइपिड्स, स्टेरॉल्स, हाइड्रोकार्बन्स और वसा में घुलनशील विटामिन); कार्बोहाइड्रेट्स (दुग्ध शर्करा, गैलेक्टोस, ग्लूकोस, ओलिगोसेकेराइड्स और ग्लाइकोप्रोटीन्स); प्रोटीन (केसीन, +- दुग्ध-एल्युमिन, लैक्टोफैरिन, इम्यूनोग्लोबिन्स जैसे SlgA और अन्य, लाइसोज़ाइम्स, एन्ज़ाइम्स, हार्मोन्स और वृध्दिकारक); नॉन-प्रोटीन नाइट्रोजेनस यौगिक (यूरिया, क्रिएटिन, क्रिएटिनिन, यूरिक अम्ल, ग्लूटामिन सहित एमिनो अम्ल, न्यूक्लिइक अम्ल, न्यूक्लियोटाइड्स और पोलियामाइन्स ); पानी में घुलनशील विटामिन, वृहत पोषक तत्व, अनुज्ञापक तत्व और विभिन्न अपौष्टिक यौगिक (एंटी-माइक्रोबायल कारक, पाचक एंज़ाइम्स और वृध्दि नियंत्रक) होते हैं जो शिशु के वर्धन और विकास को बढ़ावा देते हैं।

हर उम्र में रुग्णता और मृत्यु दर फार्मूला दूध या ऊपर का दूध पिलाने से संबंधित है। हाल ही में बाल उत्तरजीविता संबंधी आंकड़ों से पता चला है कि पहले छह महीनों के दौरान विशेष रूप से स्तनपान तथा 6-11 महीनों तक निरंतर स्तनपान को प्रोत्साहन देना एकमात्र ऐसा उपाय है जो 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर को 13-15 प्रतिशत कम करता है। एक अन्य अध्ययन में, यह पता चला है कि यदि सभी शिशुओं को जन्म के पहले दिन से स्तनपान कराया जाए तो 16 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मौत को रोका जा सकता है। यदि जन्म के पहले घंटे से ही स्तनपान शुरू कर दिया जाए तो 22 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मौत को रोका जा सकता है। स्तनपान अतिसार और श्वास संबंधी अनेक संक्रमणों से शिशु की सुरक्षा करता है। इसके अतिरिक्त यह उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हृदय रोग जैसी अनेक दीर्घकालिक समस्याओं से भी शिशु को सुरक्षा प्रदान करता है। अनुराग, प्यार और दुलार बढ़ाते हुए यह मां और बच्चे के बीच भावनात्मक रिश्ते को मजबूत करता है! इस प्रकार यह महज आहार ही नहीं बल्कि उससे कहीं बढ़कर है। मां का दूध स्वच्छ और जीवाणुमुक्त होता है। इसमें संक्रमण रोधी कारक होते हैं तथा शिशु के लिए यह हर समय सही तापमान पर उपलब्ध रहता है। इन सब विशेषताओं के साथ यह किफायती और मिलावट रहित है।
स्तनपान कराने से मां को भी स्वास्थ्य संबंधी अनेक फ़ायदे होते हैं। ऐसा करने से प्रसव के बाद रक्तस्राव में कमी होती है जिसके फ़लस्वरूप अरक्तता (अनीमिया) में कमी होती है। स्तनपान कराने वाली माताओं में मोटापा भी कम देखा जाता है क्योंकि स्तनपान से मां को फिर से अपना सामान्य आकार पाने में मदद मिलती है। यह छाती और अण्डाशयी कैंसर से भी संरक्षा प्रदान करता है। स्तनपान कराने के गर्भनिरोधक प्रभाव भी होते हैं। जहां तक शिशु के पालन-पोषण और उसके साथ व्यावहारिक तालमेल बिठाने की बात है, तो जो माताएं स्तनपान कराती हैं, वे अपने शिशुओं के साथ बेहतर तालमेल बिठा लेती हैं। स्तनपान समाज के लिए भी फ़ायदेमंद है क्योंकि यह बच्चों में बीमारी को कम करके स्वास्थ्य संबंधी देखेरेख की लागत में कमी करता है और इस प्रकार परिवार पर वित्तीय तनाव को कम करता है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि मां के दूध का उत्पादन मांग और आपूर्ति पर आधारित होता है। मां जितना अधिक स्तनपान कराती है दूध उतना ही अधिक उतरता है, इसका मतलब है कि मां को निश्चित समय सारिणी के बजाय शिशु के मांगने पर ही स्तनपान कराना चाहिए। शिशु वृध्दिशील भी होते हैं। इसलिए जिस शिशु को हर तीन घंटे में स्तनपान कराया जाता है वह अचानक हर घंटे में दूध पीने की मांग कर सकता है। यह इसलिए नहीं कि दूध की आपूर्ति कम है, बल्कि इसका मतलब है कि शिशु की वृध्दि तेजी से हो रही है।

इस विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान सभी स्वास्थ्य संगठन ”आपातकाल से पहले और बाद में जीवन रक्षक उपाय के रूप में स्तनपान पर विचार करने की आवश्यकता” पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। जिस अवधि में रोग (अर्थात महामारी या देशव्यापी बीमारी) फैलने की अधिक आशंका होती है, उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आपातकाल के रूप में वर्गीकृत किया है। इस साल स्वाइन फ्लू की घटनाओं के मद्देनज़र, स्तनपान का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। अत: मां के प्यार की तरह मां के दूध का भी कोई विकल्प नहीं है। (स्टार न्यूज़ एजेंसी)


स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. उपभोक्ता मामलों का विभाग उपभोक्ताओं की सुरक्षा और उनके कल्याण के लिए संरचनात्मक ढांचा सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता नीति तैयार कर रहा है। सरकार, वीसीओ, एनजीओ सहित सभी हितधारकों से गहन विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रीय उपभोक्ता नीति का मसौदा तैयार किया गया है। इस नीति की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं :
  •  राष्ट्रीय उपभोक्ता नीति उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के सिध्दांतों पर आधारित होगी। इससे ऐसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जा सकेगी जहां सिर्फ सरकार ही एकमात्र सेवा प्रदाता है।
  •  उपभोक्ता अधिकारों के प्रवर्तन के लिए कानून के इस्तेमाल से सभी निर्माताओं और सेवा प्रदाताओं के लिए आंतरिक विवाद समाधान तंत्र की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
  •  उपभोक्ताओं को वास्तविक चयन में समर्थ बनाने और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने तथा उपभोक्ता को सूचना उपलब्ध कराने के जरिए उपभोक्ता कल्याण से उपभोक्ता को सशक्त बनाया जाएगा।

 उपभोक्ताओं को खरीदी जाने वाली सेवाओं और उत्पादों के बारे में शिक्षित किया जाएगा। विभिन्न सरकारी विभागों में तैयार की जाने वाली नीतियों में उपभोक्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।

 
राष्ट्रीय उपभोक्ता नीति का मसौदा वेबसाइट www.fcamin.nic.in पर उपलब्ध है। उपभोक्ता और अन्य हितधारक अपने सुझावटिप्पणी उपभोक्ता मामले विभाग, कमरा सं. 365, कृषि भवन, नई दिल्ली या dspub-ca@nic.in पर 30.01.2010 तक मेल कर सकते हैं।

 



स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. चलते फिरते श्रमबल, तीसरे पक्ष विक्रेता और सहयोगी तथा अन्य हितधारकों के साथ साथ कारोबार की माहौल फैलने से सूचना परिसंपत्ति को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव आर चंद्रशेखर द्वारा आज यहां जारी डाटा सुरक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक सूचना प्रौद्योगिकीसूचना प्रौद्योगिकियों तथा वित्तीय सेवाएं सूचना खतरे और डाटा निजता चुनौती से निबटने के लिए पूरी तरह तैयार जान पड़ते हैं। ये दोनों प्रमुख क्षेत्र नये समाधान एवं पध्दतियां अपनाने के लिए अधिक रुचि लेते हैं जबकि विनिर्माण एवं सार्वजनिक उपक्रम इस मामले में बहुत पीछे हैं। रिपोर्ट का कहना है कि सूचना सुरक्षा नियंत्रण और भौतिक सुरक्षा नियंत्रण आपस में मिल रहे हैं और एप्लिकेशन सुरक्षा कामकाज में ज्यादा परिपक्वता दिखती है।

भारतीय डाटा सुरक्षा परिषद (डीएससीआई) के हाल के सर्वेक्षण पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सूचना सुरक्षा ने प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान ग्रहण कर लिया है। लोग मूलभूत सूचना सुरक्षा समाधान लागू करते हुए जान पड़ते हैं और वे प्रौद्योगिकीगत विकास को अपना रहे हैं जिससे डाटा सुरक्षित हो सकते हैं। यह अध्ययन डीएससीएआई ने सीईआरटी के साथ मिलकर केपीएमजी के माध्यम से साइबर सुरक्षा जागरूकता परियोजना के तहत किया है तथा इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, एमसीआईटी, भारत सरकार और नैसकाम ने वित्तपोषण किया। सर्वेक्षण के तहत बैंकिंग और वित्तीय सेवा, विनिर्माण, ई कामर्स, आईटी एवं आईटीईएस क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र की 153 कंपनियों का अध्ययन किया गया है।

सचिव ने भारत सुरक्षा पोर्टल जारी किया जिसे डीएससीआई ने उपयुक्त परियोजना के अंतर्गत ही तैयार किया है। यह पोर्टल उद्योग, सरकार, बैंक और वित्तीय संस्थान, प्रशासन, अकादमिक संस्थानों, महाविद्यालयों और स्कूलों के छात्रों में डाटा सुरक्षा के प्रति जागरुकता फैलाएगा और जरूरी उपाय सुझाएगा।



स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. उपसेनाध्यक्ष लेपिऊटनेंट जनरल पी सी भारद्वाज ने आज यहां सशस्त्र बलों के लिए रेल ई-टिकटिंग पायलट परियोजना का शुभारंभ किया। रक्षा लेखा महानियंत्रक (सीजीडीए) द्वारा लागू की जा रही इस परियोजना का फिलहाल देशभर में 20 स्थानों पर लाभ उठाया जा सकेगा। सशस्त्र बल के जवानों को अब टिकट खरीदने में सुविधा होगी और वे अपने यूनिट में ही आईआरसीटीसी की वेबसाईट से प्रिंट टिकट ले पाएंगे।

इस अवसर पर लेपिऊटनेंट जनरल भारद्वाज ने कहा कि नयी प्रणाली थकाऊ कागज संबंधी कार्य से मुक्ति दिलाएगी और सशस्त्र बलों को आसानी होगी। उन्होंने उम्मीद जतायी कि पीसीडीए यात्रा प्रणाली अब यात्री आरक्षण प्रणाली (पीआरएस) का स्थान ले लेगी। सीजीडीए बुलबुल घोष ने कहा कि पायलट परियोजना का धीरे धीरे देश में सेना, नौसेना और वायुसेना की 5000 इकाइयों तक विस्तार किया जाएगा।

सीजीडीए ने इस परियोजना के लिए आईआरसीटीसी के साथ समझौता किया है। अबतक रेलवे वारंट प्रणाली के तहत सशस्त्र बल कर्मियों को जो पीआरएस काउंटर पर जाकर जो ढेर सारे कागजात संबंधी कार्य कराने होते हैं, अब इस सुविधा के आ जाने से उन्हें उससे धीरे धीरे छुटकारा मिल जाएगा। सशस्त्र बलों को हर साल करीब 580 करोड़ रुपए के 60 लाख से अधिक वारंट वारंट जारी किए जाते हैं।


स्टार न्यूज़ एजेंसी 
नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने जनवरी महीने के लिए 16.39 लाख टन चीनी उपलब्ध कराई है, जिसमें लेवी चीनी की मात्रा 2.09 लाख टन है जबकि नॉन लेवी चीनी की मात्रा 14.30 लाख टन है। चीनी की यह मात्रा चीनी की घरेलू मांग की पूर्ति के लिए पर्याप्त है।

केंद्र सरकार ने चीनी का भंडार बनाए रखने के लिए गत 22 अगस्त की अधिसूचना के जरिए बड़े उपभोक्ताओं पर रोक लगा दी थी और यह अधिसूचना 19 दिसंबर को प्रभावी हो गई थी। गैर घरेलू उपभोक्ता, जिसमें बड़े उपभोक्ता शामिल हैं, 60 प्रतिशत से अधिक नॉन लेवी चीनी की खपत करते हैं। फिलहाल,जनवरी महीने के लिए घरेलू उपभोक्ताओं के लिए चीनी की उपलब्धता पर्याप्त समझी जा रही है।



स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. सरकार ने आज आंध्र प्रदेश के कुछ जिलों में बंद के शांतिपूर्वक संपन्न होने पर संतोष जताया है। तेलंगाना पर गत 23 दिसंबर को बयान के बाद, सरकार ने आंध्र प्रदेश में आठ राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक बुलाने का प्रस्ताव किया है। यह बैठक 5 जनवरी को नई दिल्ली में होगी। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने आंध्र प्रदेश के आठ राजनीतिक दलों को निमंत्रण पत्र भेजे हैं।



स्टार न्यूज़ एजेंसी
हावड़ा (पश्चिम बंगाल). देश में बेरोजगार युवकों के लिए पहली युवा रेलगाड़ी आज शुरू हो गई. रेल मंत्री ममता बनर्जी ने आज स्टेशन से पहली युवा रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। बेरोजगार युवकों के लिए चलाई गई 22492250 हावड़ा-नई दिल्ली युवा एक्सप्रेस (साप्ताहिक) आसनसोल, धनबाद, मुगलसराय, इलाहाबाद और कानपुर में रुकेगी। रेल बजट 2009-10 में रेल मंत्री की घोषणा के अनुरूप युवा रेलगाड़ियां मुख्य रूप से देश के बेरोजगार युवकों के लिए चलाई जाएंगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि युवा और निम्न आय वर्ग के लोग प्रमुख शहरों के बीच कम दरों पर यात्रा कर सके।

आरक्षण शुल्क, सुपरफास्ट ट्रेन प्रभार और विकास शुल्क जैसे सभी प्रभारों सहित युवा यात्रियों से 1500 किमी दूरी तक 299 रुपये और 1500 से 2500 किमी की दूरी के लिए 399 रुपये का टिकट लगेगा। युवा और अन्य यात्रियों से न्यूनतम 100 किमी का शुल्क लिया जाएगा। पांच साल और उससे अधिक मगर 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को आधा किराया देना होगा।

युवा रेलगाड़ियों का यह किराया 15 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के बेरोजगार व्यक्तियों पर लागू होगा जो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत जारी प्रमाण-पत्र और सरकारी रोजगार कार्यालयों से जारी वैध पंजीकरण कार्ड के आधार पर युवाओं की कसौटी पूरी करेंगे। उक्त में से किसी भी प्रमाण-पत्र के प्रस्तुत करने पर ही टिकट जारी किया जाएगा जिसकी प्रति साथ रखनी होगी। युवा रेलगाड़ियों पर तत्काल योजना लागू नहीं होगी। फिलहाल युवा श्रेणी में कुल कोचों की 60 प्रतिशत संख्या निर्धारित की जाएगी।


ग़ज़ल
हम इधर देखें कि उधर देखें,
लोग देखें कि हम जिधर देखें,

तुझको बस,देख के,ऐ पर्दानशीं
सोचते हैं कि अब किधर देखें ?

तेरी नज़रों की शोख़ियों के लिए
दिल यह करता है,ता उमर देखें !

नज़रे-मय उसकी आज पीकर हम
कैसे होता है, क्या असर देखें !

रात भर तेरी याद में जगकर
कैसी होती है फिर सहर देखें !

ये ज़रूरी है मौत से पहले
ज़िन्दगी का सही, सफ़र देखें !

कल तलक तो मरा नहीं था 'अतुल'
आज अखब़ार की ख़बर देखें !
-अतुल मिश्र


कुछ सीढ़ियों का है फ़ासला
वो मिल जाएगा
अपनी शुरुआत का एक सिरा
हाथों में थमा जायेगा
होंगी कुछ बातें हमारे बीच
हमारे आस-पास........
देखते-देखते
फिर होगा कुछ सीढ़ियों का फ़ासला
और वो मिल जाएगा


सिलसिला रुकेगा नहीं
बस हमें थोड़ा रुकना है
आंखों में विश्वास भरकर कहना है
'यह साल तुम्हें ढेरों खुशियां दे जाए'
-रश्मि प्रभा


भरोसेमंद स्रोत
कॉमर्स के प्रोफेसर ने अपने विद्यार्थी से पूछा - व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने का सबसे भरोसेमंद स्रोत कौन सा है ? विद्यार्थी - बीबी के पिताजी यानी ससुर साहब !!
-जौली

प्रेम अंधा होता है
एक प्रेमी जोड़े ने खुदकुशी करने का प्लान बनाया। ऊंचे टीले पर से लड़के ने पहले जंप लगा दी। अब बारी लड़की की थी , पर लड़की ने आंखें बंद कर लीं और पीछे हट गई। लड़की ने कहा, प्रेम अंधा होता है। इसके बाद लड़के ने हवा में पाराशूट खोल लिया और कहा प्रेम कभी मरता नहीं है।
-विजय अरोरा



سٹار نیوز ایجنسی
نیو یارک (امریکا) : امریکا کے شہرنیویارک میں ہزاروں افراد نے غزہ پراسرائیلی دہشت گردی کا ایک سال مکمل ہونے پراسرائیل مخالف احتجاجی جلوس نکالا۔غزہ پر اسرائیلی دہشت گردی کا ایک سال مکمل ہوا،آج امریکا کے شہر نیویارک کے علاقہ مینہیٹن میں ہزاروں افراد نے اہل غزہ کے حق میں اور اسرائیل کے خلاف احتجاجی جلوس نکالا۔ مظاہرین غزہ پر اسرائیل قبضے کے خلاف نعرے بلند کررہے تھے۔ جلوس کئی علاقوں سے گزرکراسرائیلی سفارتخانے کے سامنے پہنچا،مظاہرین پلے کارڈز اور بینرز اٹھائے ہوئے تھے۔ مظاہرے میں یہودی بھی شریک ہوئے،جن کا کہنا تھا کہ اسرائیل کی کارروائیاں تورات کی تعلیمات کے خلاف ہیں۔ستائیس دسمبر دو ہزار آٹھ کو اسرائیل نے غزہ پر جارحیت کی تھی،جس کے نتیجے میں دوہزارشہری شہید ہوئے تھے۔ بائیس روزہ جنگ میں اسرائیل نے فاسفورس بموں کا استعمال کیا،اسپتال تباہ کیے گئے۔



स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा 2009 का परिणाम घोषित कर दिया है। उम्मीदवार परीक्षा परिणाम से संबंधित कोई भी जानकारी किसी भी कार्यदिवस पर सुबह 10 बजे से सायं पांच बजे तक आयोग के सुविधा काऊंटर पर व्यक्तिगत रूप से या फोन नंबर 233811252338527123098543 पर ले सकते हैं। परिणाम आयोग की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। हालांकि वेबसाइट पर अंक तालिका परीक्षा परिणाम की घोषणा की तिथि के 15 दिन बाद उपलब्ध होगी।

यदि कोई उम्मीवार उपर्युक्त परीक्षा की अंकतालिका की प्रिंटेड हार्ड प्रति लेना चाहते हैं तो वे परिणाम के प्रकाशन के 30 दिनों के अंदर डाक टिकट लगे स्वपत्ते वाले लिफाफे के साथ अनुरोध आयोग को भेज दें।




स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. अनुसूचित जाति एव अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकार को मान्यता) कानून, 2006 को लागू कर रहा है। विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वन भूमि पर अधिकार के लिए 25 लाख से अधिक दावे दर्ज किए गए हैं और पांच लाख 70 हजार अधिकार पत्र प्रदान किए गए। मंत्रालय ने इस अधिनियम के क्रियान्वयन की स्थिति का आकलन करने के लिए नवंबर में मुख्यमंत्रियों और संबंधित मंत्रियों की बैठक भी बुलायी। प्रधानमंत्री ने राज्यों से इसे पूरी शिद्दत से लागू करने की अपील की।

मंत्रालय ने जलवायु परिवर्तन पर जनजातियों के अनुकूलन ज्ञान को और प्रभावी बनाने के लिए कदम उठाए। उसने उन क्षेत्रों की पहचान के लिए भी कदम उठाए जहां पर्यावरण की दृष्टि से हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उसने जनजातीय क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण नामक स्कीम की समीक्षा भी की तथा जनजातियों की यात्रा, उनके उत्सव के आयोजन, राष्ट्रीय जनजातीय पुरस्कार आदि से संबंधित दिशानिर्देश को भी अंतिम रूप दिया गया। इसके अलावा भी मंत्रालय ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।



स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने डीटीएच सेवाओं के लिए टैरिफ से संबंधित मुद्दों पर 24 दिसंबर ,2009 को पूरक परामर्श पत्र जारी किया है। इस परामर्श पत्र में डीटीएच सेवाओं के मामले में बेसिक और एड ऑन पैकेजों के टैरिफ पर विचार किया गया है।

यह पत्र 06 मार्च, 2009 के न्न संदर्भित टैरिफ विनियमन एवं अन्य मुद्दों से जुड़े डीटीएच मसले न्न पर परामर्श पत्र की अगली कड़ी है। इस पूरक पत्र में उठाये गए मुद्दों पर हितधारकों से लिखित टिप्पणियां आमंत्रित की गयी हैं। उन्हें 18 जनवरी, 2009 तक अपनी टिप्पिणियां भेजनी है। जो हितधारक पिछले परामर्श पर अपनी टिप्पणियां भेज चुके हैं वे भी अपनी संशोधित टिप्पणियां भेज सकते हैं या उसमें कुछ जोड़ सकते हैं।

टिप्पणियां इस ईमेल आईडी: bcs@trai.gov.in या traicable@yahoo.co.in पर भेजी जा सकती हैं। प्राप्त टिप्पणियां को ट्राई की वेबसाईट पर डाला जाएगा। परामर्श पत्र का पूरा पाठ ट्राई की वेबसाईट www.trai.gov.in पर उपलब्ध है।





सुधा एस नम्बूदरी
दो दिसम्बर 2009 को लुई क्रूज के जहाज एम वी एक्वामैरीन के अपने घरेलू बंदरगाह से कोच्चि से मालदीव की पहली यात्रा पर निकलने के साथ ही केरल विश्व के समुद्री पर्यटन मानचित्र पर आ गया है। यह पहला पर्यटन जलयान है जो भारत से अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह की ओर रवाना हुआ है। अब भारतीय पर्यटकों को हिंद महासागर पर यात्रा करते वक्त विश्वस्तरीय सुविधायें प्राप्त हुआ करेंगी। कोच्चि कुछ वर्षों से अनेक पर्यटन यानों की मेजबानी करता आ रहा है। पिछले वर्ष वोल्वो ओशन रेस के इस बंदरगाह पर रुकने के बाद से कोच्चि ने वैश्विक नौकायन में भी मानचित्र पर अपनी जगह बना ली है ।

कोच्चि में 2 दिसम्बर 2009 को समुद्री पर्यटन का शुभारंभ करते हुए केन्द्रीय पर्यटन, आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री कुमारी सैलजा ने कहा कि इससे देश में समुद्री पर्यटन के क्षेत्र में नए युग की शुरूआत होगी और भारतीय तथा अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को उत्कृष्ट स्तर की भारतीय और यूरोपीय शैली की सत्कार सेवा मिलेगी। उन्होंने कहा कि समुद्री पर्यटन के क्षेत्र में विकास की प्रचुर संभावनायें हैं और यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत अब तक पिछड़ रहा था। कोच्चि को समुद्री पर्यटन का प्रमुख बंदरगाह बनाने के लिए पर्यटन मंत्रालय उसी प्रकार की मदद करेगा जैसी उसने वोल्वो ओशन रेस के समय की थी।

एम वी ऐक्वामैरीन लुई क्रूज़ेज़ की सहायक कंपनी लुई क्रूज़ेज़ इंडिया का जहाज है। लुई क्रूज़ेज़ विश्व का पांचवा सबसे बड़ा क्रूज आपरेटर यानी समुद्री पर्यटन का प्रचालक है। यह जहाज दिसम्बर 09 से अप्रैल 2010 तक कोच्चि बंदरगाह पर ही रहेगा और यहीं से सप्ताह में तीन दिन मालदीव और कोलंबो के त्रिकोणीय पर्यटन पर आना-जाना करेगा। केरल के पर्यटन विभाग ने कोच्चि से समुद्री पर्यटन को बढावा देने के लिये इस कंपनी के साथ अनुबंध किया है। अनुमान है कि इस मौसम में करीब 60 हजार भारतीय पर्यटक इस जहाज से पर्यटन का आनंद लेंगे। जहाज में 1200 यात्रियों को ले जाने की क्षमता है । जहाज के यात्रा कार्यक्रम में कोच्चि-मालदीव-कोच्चि और कोच्चि-कोलंबो-कोच्चि के मार्ग पर पर्यटन के अलावा एक रात खुले सागर में नौकायन कार्यक्रम भी शामिल है। तीन रातों की यात्रा के पैकेज के लिये पांच हजार रुपये प्रति यात्री प्रतिदिन के हिसाब से किराया लिया जाता है। जहाज में 525 आरामदेह कमरों और सूट्स के अलावा अनेक रेस्तरां, स्वीमिंग पूल, फिटनेस सेंटर, मसाज सॉना सुविधायें , कसीनो, और कर मुक्त शापिंग की सुविधायें उपलब्ध हैं। कमरे सभी समुद्र की सतह से ऊपर हैं । जहाज में एक क्रिकेट पिच भी बनाई गई है ताकि भारतीय पर्यटक खुले समुद्र में क्रिकेट खेलने का अनोखा अनुभव प्राप्त कर सकें। जहाज पर जो भोजन और मनोरंजन परोसा जाता है, उसमें भी भारतीय स्वाद रुचि का ध्यान रखा गया है । सात डेक वाले इस जहाज की लंबाई 531 फिट है। तिरासी फिट चौड़े इस जहाज में चार एलीवेटर्स लगे हुए हैं। कुल 25 हजार 611 टन वजनी यह क्रूज़यान 17 नॉट्स की गति से हिंद महासागर पर तैरेगा।

लुई ग्रुप के अधिशासी निदेशक के अनुसार भारत में अपने कारोबार के विस्तार का कंपनी का निर्णय बढते भारतीय पर्यटन बाजार का लाभ उठाने के उद्देश्य से लिया गया है। इसका लक्ष्य परिवारों, हनीमून पर जाने वाले युवा दम्पत्तियों और कार्पोरेट क्षेत्र के लोगों सहित भारत के विशाल पर्यटक जगत को अपनी ओर आकर्षित करना है और उन्हें समुद्री पर्यटन की सुविधा उपलब्ध कराना है। विश्वव्यापी समुद्री पर्यटन गतिविधियों पर संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 में समुद्री पर्यटन की मांग बढक़र लगभग एक करोड़ ट्रिप्स(यात्राओं) तक पहुंच गई थी। विश्वभर में समुद्री पर्यटन की जो मांग उठी थी उसमें से दो तिहाई उत्तरी अमेरिका की यात्रा के लिये थी। इससे इस बात का पता चलता है कि समुद्री पर्यटन के विकास और विस्तार की प्रचुर संभावनायें हैं। पर्यटन मंत्रालय ने क्रिसिल इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐडवाइजरी को समुद्री पर्यटन की संभावनाओं और रणनीति का अध्ययन करने को कहा जिसकी रिपोर्ट दिसम्बर 2005 में जारी की गई। भारत में समुद्री पर्यटन की संभावना नाम की यह रिपोर्ट इस बुनियादी तथ्य के इर्द-गिर्द घूमती है कि विदेशों के आकर्षक, मोहक, ऐतिहासिक और सुन्दर स्थानों की यात्रा का यह एक नया अंदाज है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वोल्वो ओशन रेस के बाद कोच्चि को एम वी एक्वामैरीन के आदर्श गृह बंदरगाह के रूप में चुना गया है। पूर्व-पश्चिम के महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित यह बंदगाह आस्ट्रेलिया, सुदूर पूर्व और यूरोप के मुख्य समुद्री मार्ग से केवल 10 समुद्री मील (नॉटिकल माइल्स) की दूरी पर है और इन देशों के अलावा अन्य स्थानों से अनेक जहाज यहां आते रहते हैं। कोच्चि पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष के अनुसार कोच्चि बंदरगाह देश का पहला बंदरगाह है जिसने समुद्री पर्यटकों और जहाजों की व्यापक आवश्यकताओं को जुटाने के लिए साहसिक प्रयास किये हैं। बंदरगाह (कोच्चि) समुद्री पर्यटन वाले जहाजों के लिये अनेकों सुविधायें-यथा लंगर डालने, रियासती शुल्क और सीमा शुल्क, आव्रजन और पोर्ट स्वास्थ्य की अनुमति देने के लिये एकल खिड़की सेवा मुहैया कराई है। उद्देश्य यह है कि यूरोप से आस्ट्रेलिया के बीच पूर्व-पश्चिम व्यापार मार्ग पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधायें देने वाला यह पोर्ट समुद्री पर्यटन का प्रमुख केन्द्र बन सके।

यदि घरेलू यात्रियों और विदेशी पर्यटकों को समुद्री पर्यटन का चस्का लग गया तो वह दिन दूर नहीं जब तूतीकोरिन, गोवा और मुंबई जैसे अन्य भारतीय बंदरगाह भी होम पोर्ट बन सकेंगे, परन्तु वह तो बाद की बात है। अभी तो कोच्चि को ही लुई के 12 जहाजों के बेड़े का पहला गैर यूरोपीय आधार बनने का गौरव मिला है। पर्यटन मौसम जैसे-जैसे जोर पकड़ रहा है, आशायें बढती ज़ा रही हैं कि अधिक से अधिक पर्यटक विश्व स्तरीय समुद्री पर्यटन का आनंद लेने के लिये पानी में उतरेंगे।

औद्योगिक क्षेत्रों का पर्यावरण संबंधी आकलन
गंभीर रूप से प्रदूषित औद्योगिक क्षेप न कवेल पर्यावरण की दृष्टि से चुनौती हैं बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। भारत में 85 प्रतिशत बड़े औद्योगिक क्षेत्र स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं क्योंकि वहां के वायु, जल और भूमि प्रदूषण स्तर मानवीय बस्तियों के लिए उपयुक्त नहीं है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने देश के 88 औद्योगिक क्षेत्रों को श्रेणीबध्द करते हुए समग्र पर्यावरण आकलन मानदंड अध्ययन जारी किए हैं। इस अध्ययन के तहत जल, भूमि और वायु प्रदूषण के आधार पर समग्र पर्यावरण प्रदूषण सूचकांक तैयार किया गया। इस तरह के अध्ययन साल में दो बार किए जाते हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली और सीपीसीबी द्वारा संयुक्त रुप से किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि 10 प्रमुख औद्योगिक स्थानों पर पर्यावरण प्रदूषण गंभीर स्तर तक पहुंच गया है। ये स्थान हैं- गुजरात में अंकलेश्वर एवं वापी, उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद और सिंगरौली, छत्तीसगढ में क़ोरबा, महाराष्ट्र में चंद्रपुर, पंजाब में लुधियाना, तमिलनाडु में वेल्लोर, राजस्थान में भिवाड़ी और उड़ीसा में अंगुल तलचर। सीपीसीबी ने पहले 24 गंभीर प्रदूषित क्षेत्रों की पहचान की थी। इसके अलावा उसने 36 और ऐसे ही क्षेत्रों की पहचान की है जहां बहुत अधिक आद्योगिक गतिविधियां थीं और साथ ही पर्यावरण प्रदूषण की समस्याएं है।

वायु गुणवत्ता सूचकांक, जल गुणवत्ता सूचकांक और भूमि गुणवत्ता सूचकांक रिकार्ड किया जा सकता है लेकिन उसमें हमेशा प्रविधि संबंधी त्रुटियों की गुजाइंश बनी रहती है। ऐसे में इस समस्या का पश्चिमी देशों की तरह ईपीआई सूचकांक बेहतर उपाय है जहां साक्षरता, जीवन प्रत्याशा और प्रति व्यक्ति आय को शामिल किया जाता है।

अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों की समस्या बहुत गंभीर है क्योंकि वहां रात उद्योगों से रातों कचरे विसर्जित कर दिये जाते हैं। गुजरात में वापी और अंकलेश्वर के प्रदूषित क्षेत्रों के गांवों में पानी काफी समय से पीने योग्य नहीं है। लोगों में अस्थमा, आखों में खुजली जैसी समस्याएं आम हैं।

सीपीसीबी ने ठोस कदम उठाने के लिए प्रदूषण की दृष्टि से समस्याग्रस्त क्षेत्रों की पहचान के लिए और राष्ट्रीय स्तर पर वायु, पानी की गुणवत्ता में सुधार एवं पारिस्थितिकीय नुकसान को दूर करने के लिए एक कार्यक्रम शुरु किया है। सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के अध्यक्षों और सदस्य सचिवों की मई 1989 में बैठक हुई थी और पानी तथा वायु की गुणवत्ता में सुधार के लिए 10 अति प्रदूषित क्षेत्रों की पहचान की गयी थी। बाद में इस सूची में 14 और क्षेत्र जोड़ दिए गए। अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र में चिह्नित क्षेत्रों के लिए कार्ययोजना तैयार की जाएगी जिससे प्रदूषण के रोकथाम के उपाय तथा पर्यावरण की गुणवत्ता कायम करने में मदद मिलेगी।



سٹار نیوز ایجنسی
لندن (برطانیہ) : :بینظیر بھٹو کی دوسری برسی پر انہیں خراج عقیدت پیش کرنے کے لئے برطانیہ کے مختلف شہروں میں جلسے اور قرآن خوانی کا اہتمام کیا گیا، اس سلسلے میں ایک تقریب پاکستانی ہائی کمیشن میں ہوئی ۔تقریب کا اہتمام پیپلز پارٹی گریٹر لندن نے کیا تھا، تقریب میں مسلم لیگ ن اور ایم کیو ایم کے رہنماؤں نے بھی شرکت کی، بریڈ فورڈاورالفورڈ لین میں بھی تقاریب ہوئیں-ہائی کمیشن کی تقریب میں انصار برنی نے بھی شرکت کر کے بینظیر بھٹو کو خراج عقیدت پیش کیا۔



विजय अरोरा
अगर आपको प्रमोशन चाहिए या बॉस की नजरों में चढ़ना है तो इन नुस्खों को जरूर अपनाएं और गारंटी के साथ फायदा उठाएं।

1. हमेशा आपके हाथ में काम से संबंधित कागज होने चाहिएं-
वह कर्मचारी जिसके हाथ में सदैव काम के कागज या फाइलें होती हैं, तो वह बहुत ही मेहनती माना जाता है ( हालांकि वह मेहनती होता नहीं है)। इसलिए ऑफिस में खाम-ख्चाह घूमते हुए आपके हाथ में हमेशा कोई कागज होना चाहिए। यदि आपके हाथ में कुछ नहीं है तो लोग समझेंगे कि आप कैंटीन जा रहे हैं और यदि आपके हाथ में अखबार है तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप टॉयलेट जा रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शाम को ऑफिस से जाते समय कुछ फाइलें घर जरूर ले जाएं, ताकि यह भ्रम बना रहे कि आप ऑफिस का काम घर पर भी करते हैं।

2. व्यस्त दिखने के लिए कंप्यूटर का उपयोग करें-
जब भी आप कंप्यूटर का उपयोग करते हैं तो लोगों को आप बहुत व्यस्त प्रतीत होते हैं। हालांकि मॉनिटर का मुंह ऐसी तरफ रखें, जहां से कोई यह न देख सके कि आप चैटिंग कर रहे हैं और गेम खेल रहे हैं। कंप्यूटर क्रांति के इस अनोखे सामाजिक उपयोग से आप बॉस की निगाह में चढ ज़ाएंगे। यदि भगवान करे आप पकड़े जाएं (और यह तो कभी न कभी होकर रहेगा ही) तो आप बहाना बना सकते हैं कि मैं इस सॉफ्टवेयर को देखकर इससे सीख रहा था, जिससे कंपनी का ट्रेनिंग का पैसा बच सके।

3. काम करने की टेबल हमेशा भरी हुई होनी चाहिए-
आपके काम करने की जगह हमेशा भरी हुई और अस्त-व्यस्त होनी चाहिए। टेबल पर ढेर सारे कागज और फाइलें इधर-उधर बिखरे होने चाहिए। कुछ सीडी, कुछ आधे-अधूरे प्रिंट आउट भी बिखरे हों तो सोने पे सुहागा। जब आपको मालूम हो कि किसी व्यक्ति को आपसे किसी फाइल का काम है, तो उस खास फाइल को एक बड़े ढेर में छपा दीजिए और उसके सामने ही ढूंढिए। हो सके तो कंप्यूटर से संबंधित मोटी-मोटी किताबें कहीं से इकट्ठा कर लें (पढ़ने के लिए नहीं) उससे आपकी इमेज विशिष्ट बनेगी। एक बात याद रखें कि पढ़ने वाले को प्रमोशन नहीं मिलता, झांकी जमाने वाले को मिलता है।

4. वाइस आंसरिंग का अधिकाधिक उपयोग करें-
संचार तकनीक के एक और वरदान आंसरिंग मशीन का अधिक से अधिक उपयोग करें। जब आपका बॉस या कोई सहकर्मी आपको फोन करे तो जरूरी नहीं कि वह काम आवश्यक ही हो। इसलिए भले ही आप फोन के लिए सिर पर बैठे हों, कभी सीधे जवाब न दें, बल्कि यह काम आंसरिंग मशीन को करने दें। फिर थोडी देर बाद सभी संदेशों को सुनें। उसमें से मुख्य और आवश्यक को छांटकर ठीक से लंच टाइम में सामने वाले को फोन करें, ताकि उसे लगे कि आप लंच टाइम में भी ऑफिस वर्क भूलते नहीं हैं।

5. हमेशा असंतुष्ट और तनावग्रस्त दिखें-
काम करते समय हमेशा असंतुष्ट और तनावग्रस्त दिखें। जब भी कोई सहकर्मी आपसे कुछ पूछे तो सबसे पहले एक गहरी सांस लें, ताकि उसे लगे कि आप काम के बोझ से बेहद दबे हुए हैं। साथ ही अपने जूनियर को हमेशा सीख देते रहें और उससे हमेशा असंतुष्ट रहें। जूनियर के चार कामों से तीन में जरूर मीन-मेख निकालें औए एक में -हां ठीक है, कहें।

6. ऑफिस से हमेशा सबसे देर से निकलें-
ऑफिस से हमेशा आपको देर से घर के लिए निकलना चाहिए। खासकर तब जब आपका बॉस ऑफिस में हो। आराम से मैगजीन और किताबें पढ़ते रहें, जब तक कि जाने का समय न हो जाए। ऑफिस टाइम के बाद कोशिश करें कि बॉस के कमरे के सामने से कम से कम दो-तीन बार गुजरें। यदि बॉस की गाड़ी खराब हो जाए और आप उसे उसके घर तक ड्रॉप कर सकें। इससे अधिक पुण्य आपके लिए और कुछ नहीं है। इसलिए हो सके तो साल में तीन बार कुछ ऐसा करें कि बॉस आपकी गाड़ी में लिफ्ट ले। जितनी महत्वपूर्ण ई-मेल हो, उसे हमेशा विषम समय पर ही भेजें, जैसे रात के साढ़ नौ बजे या सुबह सात बजे। बॉस की निगाह जरूर ई-मेल में पड़े समय पर पड़ेगी और वह बेहद इम्प्रेस हो जाएगा।

7. अपना भाषा ज्ञान और व्याकरण बढ़ाएं-
आपको अंग्रेजी के कुछ मुहावरे और लच्छेदार भाषा कंठस्थ करनी होगी। कंप्यूटर और मैनेजमेंट से संबंधित कुछ भारी-भरकम शब्द और वाक्य रचना यदि आप रट सकें तो बेहतर रहेगा और जब भी बॉस के साथ बात करें इन शब्दों का भरपूर उपयोग करें। इस अंदाज में कि बॉस को लगना चाहिए कि यदि यह बात नहीं मानी गई तो कंपनी में प्रलय आ जाएगा।

8. हमेशा दो कोट या जैकेट, जो भी पहनते हों रखें-
यदि आप किसी बड़े ऑफिस में काम करते हैं तो आपको हमेशा दो कोट रखने चाहिएं। एक पहनें और दूसरा आपकी कुर्सी पर टंगा होना चाहिए। इससे एक तो आप आराम से घूम-फिर सकते हैं और दूसरे लोग समझेंगे कि आप आस-पास ही कहीं हैं, या आते ही होंगे। अगर देर हो भी जाए तो आप कह सकते हैं कि जरूरी मीटिंग थी।

तो साहेबान, इन नुस्खों को आज से ही लागू कर दीजिए। फिर देखिए, आपका बॉस तो आपसे खुश रहेगा ही। आपके सहकर्मी भी आपके प्रमोशन को देख-देख जलेंगे। (स्टार न्यूंज एजेंसी)


दिवाकर कुमार
प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर झारखंड राज्य के दस साल पूरे होने को हैं। बिहार से अलग कर बनाए गए इस राज्य में विकास की असीम और अपार संभावनाएं हैं, लेकिन नक्सली गतिविधियों और राजनीतिक अस्थिरताओं के चलते राज्य के विकास पर काफी असर पड़ा है।

वन संपदा और खदानों के इस राज्य में हाल में संपन्न विधानसभा चुनाव जनता की ओर से नक्सिलयों को करारा जवाब है। राज्य में विधानसभा की कुल 81 सीटें हैं, जिनमें से 9 सीटें अनुसूचित जाति और 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। राज्य में कुल 1 करोड़ 80 लाख 27 हज़ार 476 मतदाता हैं। कुल 24 में से 22 जिले नक्सलियों की चपेट में हैं और आए दिन यहां नक्सलियों का तांडव दिखता रहता है। विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा होते ही सीपीआई ( माओवादी ) और अन्य उग्रवादी संगठनों ने इसके बहिष्कार का एलान कर दिया। साथ ही चुनाव के दौरान घर से बाहर निकलने वाले मतदाताओं को भी अंजाम भुगतने की धमकी दे डाली, लेकिन राज्य की जागरूक जनता ने इन धमकियों को नजरअंदाज करते हुए जमकर चुनाव में भागीदारी दिखाई और वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों पर काफी संख्या में पहुंचे।

राज्य में विधानसभा चुनाव कुल पांच चरणों में कराए गए, इस दौरान नक्सलियों ने कई जगह हिंसक कार्रवाई कर जनता को डराने और प्रशासन को नुकसान पहुंचाने की काफी कोशिश की, पर जनता ने मतकेंद्रों तक पहुंचकर नक्सलियों को करारा जवाब दिया और लोकतंत्र में पूरी आस्था प्रकट की। इसी का परिणाम है कि राज्य में कुल 58 प्रतिशत से ज्यादा वोट डाले गए। सभी लोग, चाहे वे युवा हों, महिलाएं हों या फिर बुजुर्ग, मतदान केंद्रों में काफी संख्या में पहुंचे।

नक्सलियों की धमकी और वोट लुटेरों से जनता न डरे और शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव हो, इसके लिए चुनाव आयोग ने भी अपनी तरफ से काफी कोशिशें कीं और सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए। इस छोटे से राज्य में चुनाव पांच चरणों में कराए गए। चुनाव आयोग की तरफ से कुल 78 फीसदी मतदाताओं को फोटो पहचान पत्र दिए गए। कहीं किसी तरह की चुनावी धांधली न हो, इसकी रोक के लिए सभी जिलों में वीडियो रिकॉर्डिंग भी करवाई गई। चुनाव आयोग की पूरी टीम राज्य में हर हिस्से में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने की कोशिश में जुटी रही और जिस तरह से भारी मतदान हुआ उससे ये समझा जा सकता है कि चुनाव आयोग अपनी कोशिशों में सफल भी रहा।

झारखंड नक्सलियों का गढ माना जाता है और इसके पड़ोसी राज्य भी नक्सल प्रभावित हैं। यहां आए दिन नक्सली अपना तांडव दिखाते रहते हैं। नक्सली हिंसा और उनकी धमकियों के बाद हर किसी की नजर यहां के चुनाव पर टिकी थी। खासकर यहां गृह मंत्रालय की पैनी नजर थी। केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने नक्सलियों से हिंसा और असहयोग की राह छोड़कर मुख्यधारा में लौटने और जनता से काफी संख्या में मतदान केंद्रों पर पहुंचने की अपील की। सरकार ने जनता को भरोसा दिलाया कि उन्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं है और वो बिना डर के मतदान केंद्रों तक पहुंचें। सरकार की इस अपील का असर जनता पर पड़ा और वो काफी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचें। इस पर गृह मंत्री पी चिदंबरम ने खासकर खुशी जताई और जनता को धन्यवाद दिया।

राज्य में छिटपुट हिंसा को छोड़कर मतदान शांतिपूर्ण रहा। चुनाव के दौरान हिंसा में 12 पुलिसकर्मी शहीद हुए, जिसमें से केंद्रीय अर्ध-सैनिक बलों के 6 जवान, झारखंड राज्य के 5 पुलिसकर्मी और बिहार पुलिस का 1 जवान शहीद हुए। इन शहीद जवानों के परिवार वालों को गृह मंत्री ने जल्द से जल्द मुआवजा देने के आदेश दिए हैं। साथ ही इसके अनुपालन की रिपोर्ट भी 15 जनवरी 2010 तक प्रस्तुत करने को कहा है।

 नक्सलवादी जिस तरीके से अपना विस्तार करते जा रहे हैं उससे पूरा सरकारी तंत्र चिंतित है... यहां तक कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इन नक्सलवादियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील कर चुके हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया है कि आदिवासी इलाकों का जितना विकास होना चाहिए था वो नहीं हुआ है और सरकार इस कोशिश में जुटी है कि इन्हें इनका वाजिव हक दिलाया जाए ताकि अब तक विकास की राह में पीछे रहे इन इलाकों में विकास की नई कहानी लिखी जाए और इनकी प्राकृतिक धरोहरों को बचा कर इन्हें नई दुनिया से जोड़ा जाए।

झारखंड में चुनाव पांच चरणों में कराने पर पहले तो सवाल उठे कि इस छोटे से राज्य में इतने लंबे चरणों में चुनाव कराने की क्या जरूरत है। पर जब चुनाव शांतिपूर्वक और निष्पक्ष तरीके से निपट गए तो चुनाव आयोग का ये निर्णय सही लगने लगा। चुनाव की रपऊतार पहले चरण में थोड़ी धीमी जरूर रही पर आखिरी यानि पांचवें चरण तक आते-आते चरम पर पहुंच गई। चुनाव आयोग की तरफ से जारी किए गए आकड़ों पर नजर डालते हैं तो हर चरण में कितने वोट पड़े ये साफ हो जाता है। पहले चरण में 30 सीटों के लिए करीब 53.1 प्रतिशत वोट पड़े। दूसरे चरण में 15 सीटों के लिए 58.8 प्रतिशत वोट, तीसरे चरण में 7 सीटों पर मतदान हुआ और 57.2 प्रतिशत वोट पड़े, चौथे चरण में 14 सीटों पर करीब 64.3 प्रतिशत वोट पड़े और पांचवें व आखिरी चरण में कुल बची 15 सीटों पर मतदान हुआ और 58.12 प्रतिशत जनता ने अपने वोट का इस्तेमाल किया।

झारखंड में लोकतंत्र का महापर्व यानि मध्यावधि चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो गया। राज्य के आधे से ज्यादा लोगों ने इस महापर्व में अपनी आस्था बढ-चढक़र दिखाई है। ऐसे में लोकतंत्र का मजाक बनाने वाले सीपीआई (माओवादी ) और दूसरे उग्रवादी संगठनों को इस तरह के सफल चुनावों से सबक लेना चाहिए और सोचना चाहिए कि आखिरकार सरकारी संपत्तियों और जनता की जान को नुकसान पहुंचाकर वो क्या हासिल करना चाहते हैं ? आखिर इन चुनावों ने ये साफ कर दिया है कि जनता नक्सलियों के डर से न तो घबराती है और न ही उनके अलगाववाद और हिंसा के रास्ते का समर्थन करती है। तो सवाल अब नक्सलियों के सामने है कि वो कौन-सा रास्ता अपनाएं -- लोकतंत्र में विश्वास का या फिर हिंसा का।

झारखंड के सफल चुनाव नक्सलियों के लिए एक सबक साबित हो सकते हैं और दूसरे राज्य जो नक्सल प्रभावित हैं उनके लिए प्रेरणास्रोत। सरकार के बार-बार अपील करने के बावजूद नक्सल हिंसा की राह पर आगे ही बढ़ते जा रहे हैं। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। ऐसे में नक्सली अगर अपनी मांग को हिंसा की रणनीति से अलग कर सरकार के साथ बैठकर सुलझाएं तो शायद नक्सलियों का भी भला हो और देश की जनता का भी.... जो जाने - अनजाने में गलत रास्ते पर भटक गए हैं.... और उन्हें वही रास्ता सही लगता है। नक्सली अपने हक की लड़ाई लड़ने की बात करते हैं पर ये कैसी हक की लड़ाई है, जो जनता की जान लेकर लड़ी जा रही है। जिसमें हर किसी का नुकसान ही नुकसान है। तो फिर क्यों न हिंसा का रास्ता छोड़ लोकतंत्र में आस्था जताई जाए!

भारत की जनता का लोकतंत्र में पूरा विश्वास है और झारखंड के सफल चुनाव से ये विश्वास और पक्का और मजबूत होता है। अब नई सरकार की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो जनता के इस फैसले पर खरी उतरे और लोकतंत्र में जनता के विश्वास को और मजबूती दे। (स्टार न्यूज़ एजेंसी)



शिरीष खरे
नई दिल्ली.क्राई के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात कर बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 में व्याप्त कमियों पर चर्चा की। इस प्रतिनिधिमंडल ने भारत के सभी बच्चों को शिक्षा के अधिकार से जोड़ने के लिए अधिनियम में जरूरी संशोधन किए जाने की वकालत भी की।

इस दौरान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को वह चार्टर भी सौंपा गया जिसमें देशभर से करीब 8 लाख नागरिकों ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम में जरूरी संशोधन किए जाने की मांग का समर्थन किया था। क्राई का मानना है कि बच्चों को उनके मूलभूत अधिकारों से जोड़ने और उनके बीच की असमानताओं को घटाने के लिए अधिनियम में कुछ बातों को शामिल करना होगा। अगर अधिनियम और उसके प्रावधानों में यह संशोधन नहीं हुए तो भारत के बहुत सारे बच्चे शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार से बेदखल होते रहेंगे।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से लेते हुए यह माना कि "शिक्षा तो मानवीय विकास की बुनियाद है और हर भारतीय बच्चे तक बेहतर शिक्षा पहुंचनी ही चाहिए।" क्राई की डायरेक्टर पूजा मारवाह के मुताबिक ‘‘हमने राष्ट्रपति के साथ 'सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान' से जुड़ी बहुत सारी बातों को साझा किया। हमने उन्हें बताया कि इस अभियान को देशभर में 18 राज्यों के करीब 8 लाख ऐसे नागरिकों का समर्थन मिला है जो चाहते हैं कि सभी भारतीय बच्चों के बीच एक समान और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा व्यवस्था कायम हो। अब हमारी कोशिश यह है कि सरकार हमारी मांगों को माने, जिससे शिक्षा का अधिकार महज कागजी शेर बनकर न रह जाए और यह जमीनी स्तर पर भी अपना असर दिखा पाए।’’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘भारतीय बच्चों के नजरिए से शिक्षा के अधिकार का यह अधिनियम मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इस अधिनियम में छिपी संभावनाओं को व्यापक स्तर पर देखा और समझा जाए तो।’’

क्राई के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के सामने शिक्षा के अधिकार अधिनियम में जिन मांगों को शामिल किए जाने पर जोर दिया है , उनमें खास हैं : (एक) 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी मुख्य प्रावधान में लाया जाए। (दो) हर बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर योग्य शिक्षक और सुविधायुक्त स्कूल हों। (तीन) सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च हो।


अतुल मिश्र
"कोई शेर उस सिचुऐशन पर सुनाएं कि जब किसी की महबूबा ने किसी से मिलने का वायदा तो किया हो, मगर वह आती दिखाई ना दी हो." आधुनिक मजनूं ने अपनी कलाई घड़ी में वह टाइम देखने की कोशिश की, जिसे बीते आधा घंटा हो चुका था और जिससे दुखी होकर यह प्रस्ताव किसी ऐसे गुमनाम शायर से किया गया, जिसके 'दीवान' सिगरेट की डिब्बियों पर मौजूद खाली जगहों पर दर्ज़ होकर ही अपना दम तोड़ देते हैं.
"अर्ज़ किया है....."
"क्या किया है ?" मन ही मन महबूबा के बाप-भाइयों को कोस रहे महबूब ने उनका बुरा हश्र करने की बाबत कुछ सोचते हुए पूछा.
"अर्ज़...... यानि अर्ज़ किया है......" शायर ने क्लीयर करने की कोशिश की.
"अच्छा, अर्ज़ किया है ?"
"हाँ, वही तो......"
"क्या अर्ज़ किया है ?"
"अर्ज़ किया है कि 'वो आये वज़्म में, इतना तो सभी ने देखा, फिर उसके बाद चिरागों में रोशनी ना रही." कैसा है यह शेर ?"
"यह शेर आपने कहा है ?"
"आपको फिलहाल, शेर से मतलब है या शायर से ?"
"मेरा इन दोनों में से किसी से कोई मतलब नहीं है. बस, मन कर रहा था कि ना आने वाली महबूबा की शान में कुछ हो जाए."
"शेर कैसा लगा आपको ?" मुशायरों में आये श्रोताओं से यह कहकर कि 'शेर अच्छा लगे तो तालियाँ पीटकर मेरी हौंसला अफज़ाई करें', अपनी तारीफ़ कराने वाले शायर ने अपेक्षापूर्ण सवाल किया.
"अच्छा लगा, मगर 'इतना तो सभी ने देखा' की जगह 'इतना तो मीर ने देखा', कह देते तो कोई आफत थी ?"
"महबूबा जब वज़्म में आ रही है तो मीर साहब के अलावा और लोग भी तो वहां मौजूद रहे होंगे, जिन्होंने देखा होगा कि चिरागों की रोशनी का आलम क्या रहा ?"
"यह बात भी सही है, मगर शेर में से मीर का नाम हटाने की क्या ज़रुरत थी कि उन्होंने देखा ?" ताउम्र महबूबा का इंतज़ार करने के हौंसलों से परिपूर्ण महबूब ने टाइम पास करने के लिहाज़ से पूछा.
"काहे का देखा ? जब वो वज़्म में आये और चिरागों में रोशनी ही नहीं तो मीर साहब ने अँधेरा ही तो देखा होगा, जिसमें सुनते हैं कि हाथ को हाथ ही नहीं सुझाई देता तो फिर महबूबा की तो बात ही अलग है."
"लो, आ गयी वो." महबूब ऐसे चीखा, जैसे मीर की 'वो' के आने पर पूरी वज़्म के लोग भी नहीं चीखे होंगे. बताते हैं कि इस चीख से घबराकर बिजली का एक तार टूटकर कहीं नीचे गिर पड़ा और उसके बाद बिजली के खम्बों ने आगे की सप्लाई बंद कर दी यानि चिरागों में रोशनी ना रही.

फ़िरदौस ख़ान
औद्योगीकरण ने जहां विकास का मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं मानव समाज के लिए कई तरह के संकट भी पैदा किए हैं। औद्योगीकरण के बढ़ोतरी के साथ पारंपरिक खेती को बेहद नुकसान पहुंचा है। इतना ही नहीं इससे जहां एक वर्ग को और अमीर बनाया है, वहीं एक बड़े तबके को बंधुआ मजदूर जैसी स्थिति में जीने को मजबूर कर दिया है।

गौरतलब है कि भारत में हर साल काम के दौरान हजारों मजदूरों की मौत हो जाती है। सरकारी, अर्ध सरकारी या इसी तरह के अन्य संस्थानों में काम करते समय दुर्घटनाग्रस्त हुए लोगों या उनके आश्रितों को देर सवेर कुछ न कुछ मुआवजा तो मिल ही जाता है, लेकिन सबसे दयनीय हालत है दिहाडी मजदूरों की। पहले तो इन्हें काम ही मुश्किल से मिलता है और अगर मिलता भी है तो काफी कम दिन। अगर काम के दौरान मजदूर दुर्घटनाग्रस्त हो जाएं तो इन्हें मुआवजा भी नहीं मिल पाता। देश में कितने ही ऐसे परिवार हैं, जिनके कमाऊ सदस्य दुर्घटनाग्रस्त होकर विकलांग हो गए हैं या फिर मौत का शिकार हो चुके हैं, लेकिन उनके आश्रितों को मुआवजे के रूप में एक नया पैसा तक नसीब नहीं हो पाता। कई बार दुर्भाग्यपूर्ण और दुख की बात यह भी रहती है कि मरने वाले मजदूरों के अंतिम संस्कार के लिए उनके परिजनों के पास पैसे तक नहीं होते। ऐसे कितने ही मामले सामने आ चुके हैं। औद्योगीकरण ने ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया है, जिससे मजदूरों की और ज्यादा दुर्दशा हुई है। ठेकेदार मजदूरों से महीनों काम कराने के बावजूद उन्हें उनकी मेहनत के पैसे तक नहीं देते।

हरियाणा के हिसार जिले को ही लीजिए, हिसार के लघु सचिवालय स्थित श्रम उपायुक्त कार्यालय के बाहर इंसाफ की गुहार लेकर आए मजदूरों की भीड़ लगी रहती है। मजदूरों का कहना है कि ठेकेदार उनसे काम करा लेता है और फिर उन्हें उनका मेहनताना नहीं देता। एक ठेकेदार रमेश मेहता से जब इस बारे में बात की गई तो उसने कहा कि नहीं देता पैसा कोई मेरा क्या बिगाड़ लेगा। नीचे से ऊपर तक हर अधिकारी को उसका हिस्सा (रिश्वत) दे रहा हूं।

मजदूरों की स्थिति के बारे में जब हिसार के श्रम उपायुक्त आर.के. सैनी से बात की गई तो उसका कहना था कि हमारे यहां तो सारा दिन मजदूरों की भीड़ लगी रहती है। हम कम से कम उनकी शिकायत की अर्जी तो ले लेते हैं, वरना मजदूरों की कौन सुनता है। श्रम उपायुक्त यह भी कहना था कि ठेकेदार तो होते ही ऐसे हैं, हम क्या कर सकते हैं। हैरत की बात तो यह है कि जिस व्यक्ति को प्रशासन से सिर्फ इसलिए नियुक्त किया है कि वह गरीब पीड़ित मजदूरों को न्याय दिलाएगा, वही ठेकेदार की वकालत कर रहा है। ज्यादा जोर देने पर श्रम उपायुक्त मजदूरों से पूछता है कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि तुमने ठेकेदार के पास काम किया है। यह जगजाहिर है कि कोई भी ठेकेदार मजदूरों को काम पर लगाते समय कोई लिखा-पढ़ी नहीं करता। यह बात श्रम उपायुक्त भी जानता है। इसके बावजूद कार्य स्थल पर जाकर निरीक्षण नहीं किया जाता, वजह वही नजराना है जो ठेकेदारों द्वारा उनके घर पहुंचा दिया जाता है।

सरकार के तमाम दावों के बावजूद दिहाड़ीदार मजदूर बदहाली में जीने को मजबूर हैं। दिसंबर 2005 में दिहाड़ीदार मजदूरों के संबंध में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से इस बात की जरूरत महसूस होने लगी है कि इन मजदूरों के लिए भी अलग से एक कानून बनाया जाए, ताकि किसी अनहोनी के घटने पर उनके आश्रितों को भूखे न मरना पड़े। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि श्रमिक मुआवजा कानून-1923 के तहत दिहाडीदार मजदूर 'श्रमिक' की परिभाषा के तहत नहीं आते, इसलिए वे इस कानून के अंतर्गत मुआवजा पाने के हकदार नहीं हैं। गौरतलब है कि 1986 में रामू पासी नामक मजदूर को काम के दौरान अंगुली में चोट लग गई थी। इस पर उसने धनबाद की श्रम अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां से उसे 4001 रुपये का मुआवजा मिला। इस मुआवजे को कम बताते हुए उसने पटना उच्च न्यायालय में अपनी याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने श्रम अदालत के फैसले को सही ठहराया। इस पर उसने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई, जहां न्यायालय ने उसे मुआवजे का हकदार नहीं माना।

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से हर साल करीब 22 लाख मजदूर मारे जाते हैं। इनमें करीब 40 हजार मौतें अकेले भारत में होती हैं, लेकिन भारत की रिपोर्ट में यह आंकड़ा प्रति वर्ष केवल 222 मौतों का ही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया में हर साल हादसों और बीमारियों से मरने वालों की तादाद 22 लाख से अधिक हो सकती है, क्योंकि बहुत से विकासशील देशों में सतही अध्ययन के कारण इसका सही-सही अंदाजा नहीं लग पाता। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक के मुताबिक कार्य स्थलों पर समुचित सुरक्षा प्रबंधों के लक्ष्य से हम काफी दूर हैं। आज भी हर दिन कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से दुनियाभर में पांच हजार स्त्री-पुरुष मारे जाते हैं। औद्योगिक देशों खासकर एशियाई देशों में यह संख्या ज्यादा है। रिपोर्ट में अच्छे और सुरक्षित काम की सलाह के साथ-साथ यह भी जानकारी दी गई है कि विकासशील देशों में कार्य स्थलों पर संक्र्रामक बीमारियों के अलावा मलेरिया और कैंसर जैसी बीमारियां जानलेवा साबित हो रही हैं। अमूमन कार्य स्थलों पर प्राथमिक चिकित्सा, पीने के पानी और शौचालय जैसी सुविधाओं का घोर अभाव होता है, जिसका मजदूरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

हमारे कार्य स्थल कितने सुरक्षित हैं यह बताने की जरूरत नहीं है। ऊंची इमारतों पर चढ़कर काम कर रहे मजदूरों को सुरक्षा बैल्ट तक मुहैया नहीं कराई जाती। पटाखा फैक्ट्रियों, रसायन कारखानों और जहाज तोडने जैसे कामों में लगे मजदूर सुरक्षा साधनों की कमी के कारण हुए हादसों में अपनी जान गंवा बैठते हैं। भवन निर्माण के दौरान मजदूरों के मरने की खबरें आए दिन अखबारों में छपती रहती हैं। इस सबके बावजूद मजदूरों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। अगर मामला मीडिया ने उछाल दिया तो प्रशासन और राजनेताओं की नींद टूट जरूर जाती है, लेकिन कुछ वक्त बाद फिर वही 'ढाक के तीन पात' वाली व्यवस्था बादस्तूर जारी रहती है।

दरअसल देशी मंडी में भारी मात्रा में उपलब्ध सस्ता श्रम विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार में पैसा लगाने के लिए आकर्षित करता है। साथ ही श्रम कानूनों के लचीलेपन के कारण भी वे मजदूरों का शोषण करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरना चाहते हैं। अर्थशास्त्री रिकार्डो के मुताबिक मजदूरी और उनको दी जाने वाली सुविधाएं बढ़ती हैं तो उद्योगपतियों को मिलने वाले फायदे का हिस्सा कम होगा। हमारे देश के उद्योगपति और ठेकेदार ठीक इसी नीति पर चल रहे हैं।

फिक्की द्वारा कराए गए एक सौ से ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के अध्ययन के मुताबिक उदारीकरण से पहले पांच सालों में कंपनियों के शुद्ध मुनाफे में 3.12 फीसदी का इजाफा हुआ था, लेकिन मजदूरी इससे आधी यानी 15.8 फीसदी ही बढ़ पाई। यह कहना कतई गलत न होगा कि ज्यों-ज्यों आर्थिक सुधार की रफ्तार बढ़ती गई त्यों-त्यों मजदूरों की हालत भी बदतर होती गई।

आजादी के इतने सालों बाद भी हमारे देश में दिहाड़ी मजदूरों की हालत बेहद दयनीय है। शिक्षित और जागरूक न होने के कारण इस तबके की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। जब तक मजदूर भला चंगा होता है तो वह जैसे-तैसे मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पाल लेता है, लेकिन दुर्घटनाग्रस्त होकर या बीमार होकर वे काम करने योग्य नहीं रहता तो उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। सरकार को चाहिए कि वह दिहाड़ी मजदूरों को साल के निश्चित दिन रोजगार मुहैया कराए और उनका मुफ्त बीमा करे। साथ ही उनके इलाज का सारा खर्च भी वहन करे। जब तक देश का मजदूर खुशहाल नहीं होगा तब तक देश की खुशहाली की कल्पना करना भी बेमानी है।


नारायण दत्त तिवारी !
हम पर जो आरोप लगे हैं, क्या वैसी है उमर हमारी ??

सत्ता की भूख !
इसके लालच में कब्रों के, मुर्दे तलक गए हैं सूख !!

कब्रिस्तान-विवाद !
मुर्दे बोले,"चैन नहीं है, हमको मरने के भी बाद !! "

चाकू मारा !
चाकू ने अपराध स्वयं का, थाने में जाकर स्वीकारा ??

हरित प्रदेश !
'शुष्क प्रदेश' की मांगें इसके, फ़ौरन बाद करेंगे पेश !!

मुद्दा गरमाया !
तापमान कितना है उसका, मुद्दे ने रोकर समझाया ??

गृहमंत्रालय !
समस्याओं का बना हिमालय !!

पी. चिदंबरम !
बीस नए मंत्रालय अपने, मंत्रालय से बनवाएं हम !!

चौटाला !
आरोपों का जूस निकाला ??

आलोचना !
बाहूबालियों की करने से, पहले भी कुछ सोचना !!

सर्दी !
जाड़ों में ही क्यों करती है, शुरू स्वयं की गुंडागर्दी ??
-अतुल मिश्र



अतुल मिश्र
मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश). पीतल की कलाकृतियों के निर्यात के लिए दुनियाभर में मशहूर मुरादाबाद का नाम अब बाल-श्रमिकों के शोषण के लिए भी मशहूर हो रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस महानगर में आज भी सैकड़ों बाल-मज़दूर चोरी-छिपे अनेक पीतल-निर्यातकों के लिए काम कर रहे हैं. श्रम-विभाग और प्रशासन की मिलीभगत के चलते इन बाल-मज़दूरों को केमिकल-संबंधी और अन्य ख़तरनाक किस्म के ऐसे कामों में लगाया जा रहा है, जो इन बच्चों के जीवन के लिए बहुत ही घातक हैं.

इस बारे में अधिक जानकारियां करने पर कुछ ऐसे तथ्य उभर कर सामने आए, जिनसे बाल श्रम अधिनियम की धज्जियां उड़ती नज़र आती हैं. आज भी अनेक दैनिक बाल-मज़दूर आसपास के गांवों-कस्बों से यहां रोज आते देखे जा सकते हैं. यही नहीं, अनेक दुकानों पर बच्चों को मजदूरी करते आज भी देखा जा सकता है. धनाड्य वर्ग भी तेजी से बाल-मज़दूरों को अपनी कोठियों पर घरेलू काम-काज के लिए रख रहे हैं. इनमें कम उम्र की बच्चियों को भी शारीरिक शोषण करने के लिहाज़ से रखने का चलन अब आम हो गया है.

कई मर्तबा अनेक सामाजिक संगठनों ने इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज़ भी बुलंद की है, मगर शासन-प्रशासन अपने कानों में तेल डाले बैठा है. एक अनुमान के अनुसार, क़रीब डेढ़ हज़ार बाल-मज़दूर इस समय नियमित तौर पर इस महानगर में कार्यरत हैं. ग़रीब और पिछड़े वर्ग के उत्थान के दावे करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार भी इन बाल-मज़दूरों के बारे में कोई सख्त कदम नहीं उठा पा रही है. ऐसे हालत में बाल श्रम अधिनियम सिर्फ कागज़ी औपचारिकता ही बनकर रह गया है.



चांदनी
हुस्ने-क़त्ल असल में मर्गे-यज़ीद है,
इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद...
इस्लामी कैलेंडर यानि हिजरी सन् का पहला महीना मुहर्रम है. हिजरी सन् का आगाज़ इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है. अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस माह को अल्लाह का महीना कहा है. साथ ही इस माह में रोज़ा रखने की खास अहमियत बयान की गई है. 10 मुहर्रम को यौमे आशूरा कहा जाता है. इस दिन अल्लाह के नबी हज़रत नूह (अ.) की किश्ती को किनारा मिला था.

कर्बला के इतिहास मुताबिक़ सन 60 हिजरी को यजीद इस्लाम धर्म का खलीफा बन बैठा. सन् 61 हिजरी से उसके जनता पर उसके ज़ुल्म बढ़ने लगे. उसने हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन से अपने कुशासन के लिए समर्थन मांगा और जब हज़रत इमाम हुसैन ने इससे इनकार कर दिया तो उसने इमाम हुसैन को क़त्ल करने का फ़रमान जारी कर दिया. इमाम हुसैन मदीना से सपरिवार कुफा के लिए निकल पडे़, जिनमें उनके खानदान के 123 सदस्य यानी 72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे शामिल थे. यज़ीद सेना (40,000 ) ने उन्हें कर्बला के मैदान में ही रोक लिया. सेनापति ने उन्हें यज़ीद की बात मानने के लिए उन पर दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने अत्याचारी यज़ीद का समर्थन करने से साफ़ इनकार कर दिया. हज़रत इमाम हुसैन सत्य और अहिंसा के पक्षधर थे. हज़रत इमाम हुसैन ने इस्लाम धर्म के उसूल, न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, सदाचार और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था को अपने जीवन का आदर्श माना था और वे उन्हीं आदर्शों के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार थे. यज़ीद ने हज़रत इमाम हुसैन और उनके खानदान के लोगों को तीन दिनों तक भूखा- प्यास रखने के बाद अपनी फौज से शहीद करा दिया. इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की तादाद 72 थी.

पूरी दुनिया में कर्बला के इन्हीं शहीदों की याद में मुहर्रम मनाया जाता है. मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। 10 मुहर्रम को यौमे आशूरा कहा जाता है। उसके बाद से यह दिन कर्बला के शहीदों की यादगार मनाने का दिन बन गया और इसी शोक पर्व को भारत में मुहर्रम के नाम से जाना जाता है. इस दिन भारत के अधिकतर शहरों में ताज़िये का जुलूस निकलता है. ताजिया हज़रत इमाम हुसैन के कर्बला (इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा) स्थित रौज़े जैसा होता है. लोग अपनी अपनी आस्था और हैसियत के हिसाब से ताज़िये बनाते हैं और उसे कर्बला नामक स्थान पर ले जाते हैं. जुलूस में शिया मुसलमान काले कपडे़ पहनते हैं, नंगे पैर चलते हैं और अपने सीने पर हाथ मारते हैं, जिसे मातम कहा जाता है. मातम के साथ वे हाय हुसैन की सदा लगाते हैं और साथ ही कुछ नौहा (शोक गीत) भी पढ़ते हैं. पहले ताज़िये के साथ अलम भी होता है, जिसे हज़रत इमाम हुसैन के छोटे भाई हज़रत अब्बास की याद में निकाला जाता है.

मुहर्रम का महीना शुरू होते ही मजलिसों (शोक सभाओं) का सिलसिला शुरू हो जाता है. इमामबाड़ा सजाया जाता है. मुहर्रम के दिन जगह- जगह पानी के प्याऊ और शरबत की शबील लगाई जाती है. भारत में ताज़िये के जुलूस में शिया मुसलमानों के अलावा दूसरे मज़हबों के लोग भी शामिल होते हैं.

विभिन्न हदीसों, यानी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के कथन व अमल (कर्म) से मुहर्रम की पवित्रता और इसकी अहमियत का पता चलता है. ऐसे ही हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बार मुहर्रम का ज़िक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना कहा है. इसे जिन चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि रमज़ान के अलावा सबसे उत्तम रोज़े (व्रत) वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं. यह फ़रमाते वक़्त नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बात और जोड़ी कि जिस तरह अनिवार्य नमाज़ों के बाद सबसे अहम नमाज़ तहज्जुद की है, उसी तरह रमज़ान के रोज़ों के बाद सबसे उत्तम रोज़े मुहर्रम के हैं.

मुहर्रम की 9 तारीख को जाने वाली इबादत का भी बहुत सवाब बताया गया है. सहाबी इब्ने अब्बास के मुताबिक़ हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख का रोज़ा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं और मुहर्रम के एक रोज़े का सवाब 30 रोज़ों के बराबर मिलता है.
मुहर्रम हमें सच्चाई, नेकी और ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)


प्रेमी को मिलने नहीं देती, अजब है जग की रीत।
सजन से कैसे होगी प्रीत?

वह घटना होती अद्भुत-सी, प्यार जिसे कहते हैं।
सच्चा प्यार हुआ हो उसके, साथ कहाँ रहते हैं?
जीवन तो बस इक समझौता, हार कहूँ या जीत।
सजन से कैसे होगी प्रीत?

जाति-धरम की दीवारों संग, और कई उलझन है।
संग जिसके दिन-रात है जीना, उससे क्यों अनबन है।
नैन मिले प्रियतम से वह पल, बन जाये संगीत।
सजन से कैसे होगी प्रीत?

सच प्रायः सबको जीवन में, रहता शेष मलाल।
परम्परा के व्यूह में फँसकर, होते लोग हलाल।
कहते हो रक्षक है काँटा, नहीं सुमन का मीत।
सजन से कैसे होगी प्रीत?
-श्यामल सुमन


यूं तिरे नाम से घबराता हूं,
कि सरे-शाम से घबराता हूं,

तेरी यादों में, ख़ुदकुशी कर लूं,
सिर्फ अंज़ाम से घबराता हूं !

जिसमें मगरूर मैं कहा जाऊं,
सिर्फ उस काम से घबराता हूं !

मुझको मजबूर ना करो, साक़ी,
इन दिनों ज़ाम से घबराता हूं !

अपने आंसू की कसम कहता हूं,
दर्दे-पैग़ाम से घबराता हूं !

मुझको दर्दे-सुकूं मिले कैसे ?
मैं तो आराम से घबराता हूं !

अपने ईमां की बता दो कीमत,
मैं कहां दाम से घबराता हूं ??

तू किसी रास्ते मिले ना मिले,
मैं सरे-आम से घबराता हूं !
-अतुल मिश्र

फ़िरदौस ख़ान
आज परवीन शाकिर की बरसी है...परवीन शाकिर ने बहुत कम अरसे में शायरी में वो मुकाम हासिल किया, जो बहुत कम लोगों को ही मिल पाता है. कराची (पाकिस्तान) में 24 नवंबर 1952 को जन्म लेने वाली परवीन शाकिर की ज़िन्दगी 26 दिसंबर 1995 को इस्लामाबाद के कब्रस्तान की होने तक किस-किस दौर से गुज़री...ये सब उनकी चार किताबों खुशबू, खुद कलामी, इनकार और माह तमाम की सूरत में हमारे सामने है...माह तमाम उनकी आखिरी यादगार है...

26 दिसंबर 1995 को इस्लामाबाद में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी. जिस दिन परवीन शाकिर को कब्रस्तान में दफ़नाया गया, उस रात बारिश भी बहुत हुई, लगा आसमान भी रो पड़ा हो...सैयद शाकिर के घराने का ये रौशन चराग इस्लामाबाद के कब्रस्तान की ख़ाक में मिल गया हो, लेकिन उसकी रौशनी और खुशबू अदब की दुनिया में रहती दुनिया तक कायम रहेगी...
परवीन शाकिर की एक ग़ज़ल

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा
इस जख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा

इस बार जिसे चाट गई धूप की ख्वाहिश
फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा

यक लख्त गिरा है तो जड़े तक निकल आईं
जिस पेड़ को आंधी में भी हिलते नहीं देखा

कांटों में घिरे फूल को चूम आएगी तितली
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा...



अतुल मिश्र
मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश). अखिल भारतीय साहित्य कला मंच के तत्वावधान में कल आर.एस.डी. अकादमी में लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया. इस समारोह में गीतकार वीरेन्द्र सिंह 'ब्रजवासी' की काव्य-कृति'अंकुर मन के' का लोकार्पण किया गया.

समारोह में स्थानीय साहित्यकारों ने ब्रजवासी जी की इस पुस्तक पर अपने विचार प्रस्तुत रखे. समारोह की अध्यक्षता डा. जी. कुमार ने की और संचालन अम्बरीश कुमार ने किया. इस मौके पर शहर के अनेक गणमान्य लोग भी मौजूद थे.


मन करता है
मैं परिन्दा बन
अम्बर को छू लूं
तेज़ हवा के संग
उड़ जाऊं
और
किसी फल से भरे-भरे
पेड़ पे बैठकर एक-एक
करके अनेक फल का
मजा चख
उड़ जाऊं ची चूं का शोर

मचाऊं और
परिन्दों को इकट्ठा कर
तोता ढोलक बजाता है
का गीत सूना सब
परिन्दों को पेड़ पर बुला के
मन चाही बातें कर अम्बर की
सैर पर जाएं चलो आओ
हम पंख लहराएं
अम्बर की ओर उड़ जाएं
-सरफ़राज़ ख़ान


श्यामल सुमन
शेर की शादी में चूहे को देखकर हाथी ने पूछा - "भाई तुम इस शादी में किस हैसियत से आये हो?" चूहा बोला, " जिस शेर की शादी हो रही है, वह मेरा छोटा भाई है।" हाथी का मुंह खुला का खुला रह गया, बोला, "शेर और तुम्हारा छोटा भाई?" चूहा - "क्या कहूं? शादी के पहले मैं भी शेर ही था।" यह तो हुई मजाक की बात, लेकिन पुराने समय से ही दुनिया का मोह छोड़कर, सच की तलाश में भटकने वाले भगोडों को सही रास्ते पर लाने के लिए, शादी कराने का रिवाज हमारे समाज में रहा है। कई बिगडैल कुंवारों को इसी पद्धति से आज भी रास्ते पर लाया जाता है। हम सबने कई बार देखा-सुना है कि तथाकथित सत्य की तलाश में भटकने को तत्पर आत्मा, शादी के बाद पत्नी को प्रसन्न करने के लिए लगातार भटकती रहती है। कहते भी हैं कि "शादी वह संस्था है जिसमें मर्द अपनी 'बैचलर डिग्री' खो देता है और स्त्री 'मास्टर डिग्री' हासिल कर लेती है।"

प्रायः शादी के पहले की जिंदगी पत्नी को पाने के लिए होती है और शादी के बाद की जिंदगी पत्नी को खुश रखने के लिए। तकरीबन हर पति के लिए पत्नी को खुश रखना एक अहम और ज्वलंत समस्या होती है और यह समस्या चूंकि सर्वव्यापी है, अतः इसे हम चाहें तो राष्ट्रीय (या अंतर्राष्ट्रीय) समस्या भी कह सकते हैं। लगभग प्रत्येक पति दिन-रात इसी समस्या के समाधान में लगा रहता है, पर कामयाबी बिरलों के भाग्य में ही होती है। सच तो यह है कि आदमी की पूरी जिंदगी पत्नी को ही समर्पित रहती है और पत्नी है कि खुश होने का नाम ही नहीं लेती। अगर खुश हो जाएगी तो उसका बीवीपन खत्म हो जाएगा, फिर उसके आगे-पीछे कौन घूमेगा? किसी ने ठीक ही तो कहा है कि "शादी और प्याज में कोई खास अन्तर नहीं - आनन्द और आंसू साथ-साथ नसीब होते हैं।"

पत्नी को खुश रखना इस सभ्यता की संभवतः सबसे प्राचीन समस्या है। सभी कालखंडों में पति अपनी पत्नी को खुश रखने के आधुनिकतम तरीकों का इस्तेमाल करता रहा है और दूसरी ओर पत्नी भी नाराज होने की नई-नई तरकीबों का ईजाद करती रहती है। एक बार एक कामयाब और संतुष्ट-से दिखाई देनेवाले पति से मैंने पूछा-'क्यों भाई पत्नी को खुश रखने का उपाय क्या है?' वह नाराज होकर बोला- 'यह प्रश्न ही गलत है। यह सवाल यूँ होना चाहिए था कि पत्नी को भी कोई खुश रख सकता है क्या?' उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि "शादी और युद्ध में सिर्फ एक अन्तर है कि शादी के बाद आप दुश्मन के बगल में सो सकते हैं।"

जिस पत्नी को सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध हों, वह इस बात को लेकर नाराज रहती है कि उसका पति उसे समय ही नहीं देता। अब बेचारा पति करे तो क्या करे? सुख-सुविधाएं जुटाए या पत्नी को समय दे? इसके बरअक्स कई पत्नियों को यह शिकायत रहती है कि मेरे पति आफिस के बाद हमेशा घर में ही डटे रहते हैं। इसी प्रकार के आदर्श-पतिनुमा एक इंसान (?) से जब मैंने पूछा कि 'पत्नी को खुश रखने का क्या उपाय है?' तो उसने तपाक से उत्तर दिया-'तलाक।' मुझे लगा कि कहीं यह आदमी मेरी ही बात तो नहीं कह रहा है? मैं सोचने लगा " 'विवाह' और 'विवाद' में केवल एक अक्षर का अन्तर है शायद इसलिए दोनों में इतना भावनात्मक साहचर्य और अपनापन है।"

पतिव्रता नारियों का युग अब प्रायः समाप्ति की ओर है और पत्नीव्रत पुरुषों की संख्या, प्रभुत्व और वर्चस्व लगातार बढत की ओर है। यदि इसका सर्वेक्षण कराया जाय तो प्रायः हर दूसरा पति आपको पत्नीव्रत मिलेगा। मैंने सोचा क्यों न किसी अनुभवी पत्नीव्रत पति से मुलाकात करके पत्नी को खुश रखने का सूत्र सीखा जाए। सौभाग्य से इस प्रकार के एक महामानव से मुलाकात हो ही गई, जो इस क्षेत्र में पर्याप्त तजुर्बेकार थे। मैंने अपनी जिज्ञासा जाहिर की तो उन्होंने जो भी बताया, उसे अक्षरशः नीचे लिखने जा रहा हूँ, ताकि हर उस पति का कल्याण हो सके, जो पत्नी-प्रताडना से परेशान हैं -

1. ब्रह्ममुहुर्त में उठकर पूरे मनोयोग से चाय बनाकर पत्नी के लिए 'बेड टी' का प्रबंध करें। इससे आपकी पत्नी का 'मूड नार्मल' रहेगा और बात-बात पर पूरे दिन आपको उनकी झिडकियों से निजात मिलेगी। वैसे भी, किसी भी पत्नी के लिए पति से अच्छा और विश्वासपात्र नौकर मिलना मुश्किल है, इसलिए इसे बोझस्वरूप न लें, बल्कि सहजता से युगधर्म की तरह स्वीकार करें। कहा भी गया है कि "सर्कस की तरह विवाह में भी तीन रिंग होते हैं - एंगेजमेंट रिंग, वेडिंग रिंग और सफरिंग।"

2. अगर आपका वास्ता किसी तेज-तर्रार किस्म की पत्नी से है तो उनके तेज में अपना तेज (अगर अबतक बचा हो तो) सहर्ष मिलाकर स्वयं निस्तेज हो जाएँ। क्योंकि कोई भी पत्नी तेज-तर्रार पति की वनिस्पत ढुलमुल पति को ही ज्यादा पसन्द करती है। इसका यह फायदा होगा कि आप पत्नी से गैरजरूरी टकराव से बच जाएँगे, अब तो जो भी कहना होगा, पत्नी कहेगी। आपको तो बस आत्मसमर्पण की मुद्रा अपनानी है।

3. आपकी पत्नी कितनी ही बदसूरत क्यों न हो, आप प्रयास करके, मीठी-मीठी बातों से यह यकीन दिलाएं कि विश्व-सुन्दरी उनसे उन्नीस पडती है। पत्नी द्वारा बनाया गया भोजन (हलाँकि यह सौभाग्य कम ही पतियों को प्राप्त है) चाहे कितना ही बेस्वाद क्यों न हो, उसे पाकशास्त्र की खास उपलब्धि बताते हुए पानी पी-पीकर निवाले को गले के नीचे उतारें। ध्यान रहे, ऐसा करते समय चेहरे पर शिकायत के भाव उभारना वर्जित है, क्योंकि "विवाह वह प्रणाली है, जो अकेलापन महसूस किए बिना अकेले जीने की सामर्थ्य प्रदान करती है।"

4. पत्नी के मायकेवाले यदि रावण की तरह भी दिखाई दे तो भी अपने वाकचातुर्य और प्रत्यक्ष क्रियाकलाप से उन्हें 'रामावतार' सिद्ध करने की कोशिश में सतत सचेष्ट रहना चाहिए।

5 . आप जो कुछ कमाएं, उसे चुपचाप 'नेकी कर दरिया में डाल' की नीति के अनुसार बिल्कुल सहज समर्पित भाव से अपनी पत्नी के करकमलों में अर्पित कर दें और प्रतिदिन आफिस जाते समय बच्चों की तरह गिडगिडाकर दो-चार रुपयों की मांग करें। पत्नी समझेगी कि मेरा पति कितना बकलोल है कि कमाता खुद है और रूपये-दो रूपयों के लिए रोज मेरी खुशामद करता रहता है। एक हालिया सर्वे के अनुसार लगभग पचहत्तर प्रतिशत पति इसी श्रेणी में आते हैं। मैं अपील करता हूँ कि शेष पच्चीस प्रतिशत भी इस विधि को अपनाकर राष्ट्र की मुख्यधारा में सम्मिलित हो जाएं और सुरक्षित जीवन-यापन करें।

अंत में उस अनुभवी महामानव ने अपने इस प्रवचन के सार-संक्षेप के रूप में यह बताया कि उक्त विधियों को अपनाकर आप भले दुखी हो जाएं, लेकिन आपकी पत्नी प्रसन्न रहेगी और उनकी मेहरबानी के फूल आप पर बरसते रहेंगे। किसी ने बिलकुल ठीक कहा है कि "प्यार अंधा होता है और शादी आंखें खोल देती है।" मेरी भी आंखें खुल गई। कलम घिसने का रोग जबसे लगा, साहित्यिक मित्रों की आवाजाही घर पर बढ़ गई। चाय-पानी के चक्कर में जब पत्नी मुझे पूतना की तरह देखती तो मेरी रूह कांप जाती थी। मैंने इससे निजात पाने का रास्ता ढूंढ ही लिया।

आपने फूल कई रंगों के देखे होंगे, लेकिन सांवले या काले रंग के फूल प्रायः नहीं दिखते। मैंने अपने नाम 'श्यामल' के आगे पत्नी का नाम 'सुमन' जोड लिया। हमारे साहित्यिक मित्र मुझे 'सुमनजी-सुमनजी' कहकर बुलाते हुए घर आते। धीरे-धीरे नम्रतापूर्वक मैंने अपनी पत्नी को विश्वास दिलाने में आश्चर्यजनक रूप से सफलता पाई कि मेरे उक्त क्रियाकलाप से आखिर उनका ही नाम तो यशस्वी होता है। अब मेरे घर में ऐसे मित्रों भले ही स्वागत-सत्कार कम होता हो, पर मैं निश्चिन्त हूँ कि अब उनका अपमान नहीं होगा। किसी ने ठीक ही कहा है कि "विवाह वह साहसिक-कार्य है जो कोई बुजदिल पुरुष ही कर सकता है।" (स्टार न्यूज़ एजेंसी)



स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. कई प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं व सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए अनगिनत कार्यक्रमों को आयोजित कर चुकी जागृति आर्ट इनिशियेटिव ने हाल ही में ललित कला अकादमी में 60 चित्रकारों व मूर्तिकारों की निर्मित मेटाफोरिक शिफ्ट्स व न्यू इमेजरी कला प्रदर्शनी आयोजित की।

इस प्रदर्शनी का उदघाटन बालीवुड के जाने माने कलाकार इरफान खान, भारत में अरब रिपब्लिक ऑफ इजिप्त के राजदूत माननीय डा. मोहम्मद हिगाजे व ललित कला अकादमी के सचिव डा. सुधाकर शर्मा ने किया। जागृति आर्ट के निदेशक गौरांग जलान ने बताया कि अप्रैल 2006 से शुरू हुआ जागृति आर्ट कला व संस्कृति को बढ़ावा देने व समाज सेवा के कार्यों में सलंग्न है। यहां पर समकालीन व आधुनिक कला का संगम, प्रदर्शन व विक्रय होता है। इन कार्यक्रमों के द्वारा प्रख्यात व उभरते हुए कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर का एक मंच मिलता है। भारत व विदेश में कई प्रदर्शनी आयोजित कर चुका जागृति आर्ट का मुख्य उद्देश्य आर्ट विद हार्ट है इसलिए समाज के उत्थान के लिए यह समय समय पर अपने प्रयास जारी रखता है। वातावरण व पिछड़ी जातियों, गुणवान छात्रों के लिए छात्रवृत्ति का प्रबंध, महिलाओं व बच्चों का कल्याण, पोलियों जैसी बीमारी को जड़ से खत्म करने जैसे विषयों पर जागृति आर्ट ने पूरा सहयोग दिया है और इस प्रदर्शनी से जमा की गई राशि लिटरेसी इंडिया नामक मिशन को दी जाएगी।

फिल्म कलाकार इरफान खान ने कहा कि मुझे देखने का शौक है, लेकिन मैंने आजतक उलटी सीधी लाइन ही डाली है यह पेंटिग लाजवाब व खूबसूरत है। इस अवसर पर पंहुचे मुख्य अतिथियों में प्रो. संदीप मारवाह भी उपस्थित हुए जिन्होनें पेंटिग करते हुए जागृति आर्ट इनिशियेटिव के इस प्रयास की सराहना की और कहा कि ऐसे प्रयास न केवल कला व संस्कृति द्वारा लोगों का मनोरंजन करते है बल्कि समाज का भी उत्थान करते हैं। इस प्रदर्शनी में जाने माने चित्रकार व मूर्तिकार जैसे एम.एफ. हुसैन, सतीश गुजराल, बिजॉन चौधरी, जयश्री चक्रवर्ती, प्रसनजीत सेनगुप्ता, बिकाश भट्टाचार्य आदि की कलाकृतियों को शामिल किया गया।


सरफ़राज़ ख़ान
क्रिसमस ईसाइयों का प्रमुख त्यौहार है. यह पर्व ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. इसे बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है. 'क्रिसमस' शब्द 'क्राइस्ट्स और मास' दो शब्दों के मेल से बना है, जो मध्य काल के अंगेजी शब्द 'क्रिस्टेमसे' और पुरानी अंगेजी शब्द 'क्रिस्टेसमैसे' से नकल किया गया है. 1038 ई. से इसे 'क्रिसमस' कहा जाने लगा. इसमें 'क्रिस' का अर्थ ईसा मसीह और 'मस' का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या 'मास' है. 16वीं शताब्दी के मध्य से 'क्राइस्ट' शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है. भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसंबर को मनाया जाता है, लेकिन रूस, जार्जिया, मिस्त्र, अरमेनिया, युक्रेन और सर्बिया आदि देशों में 7 जनवरी को लोग क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलंडर का 25 दिसंबर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलंडर और रोमन कैलंडर के मुताबिक 7 जनवरी को आता है. हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परंपरा आखिर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म, 7 से 2 ई.पू. के बीच हुआ था. 25 दिसंबर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है.शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की निश्चित तिथि के बारे में पता लगाना काफी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ई. में 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ई. में मिस्त्र में पुराने जुलियन कैलंडर के मुताबिक 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरे संसार में जहां भी ईसाइयों की संख्या अधिक थी, यह त्योहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के अंत तक इंग्लैंड में यह एक परंपरा का रूप ले चुका था.
क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज की कहानी के साथ कोई संबंध नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से अत्यंत प्रेम था और वे गरीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफे दिया करते थे.
पुरानी कैथलिक परंपरा के मुताबिक क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह से पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाजा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत खुश हुआ. वास्तव में वह लड़का एक फरिश्ता था और लकडहारे की परीक्षा लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फर के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकडहारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल अकरने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री शुरुआत जर्मनी में हुई. उस समय एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फर के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं शताब्दी में फर का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. 19वीं शताब्दी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौके पर अन्य त्योहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने व क्रिसमस के नाम से तोहफे देने की परंपरा भी काफी पुरानी है। इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाले की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फरिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो दो हजार वर्ष पुरानी ईसा मसीह के जन्म की घटना की याद दिलाती हैं.

दिसंबर का महीना शुरू होते ही क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य धर्मों के लोग भी क्रिसमस के उत्सव में शामिल होते हैं. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)



शिरीष खरे
यह दृश्य बार-बार घटने से अब साधारण लगता है- मुंबई के मशहूर लियोपोर्ड की संगीतभरी रातों के सामने भीख मांगते 10 से 12 साल के 12 से 15 बच्चे खड़े मिलते हैं। ये उन शोषित बच्चों के समूह से हैं जो शहर के फुटपाथों पर जूते या कार चमकाते हैं, फूल, चाकलेट या फिर कई बार अपने आप को बेच देते हैं। ना जाने ये बच्चे इधर से किधर और कितनी बार बिकने वाले हैं। इनकी जिंदगी में वह दिन कभी न आए जब यह अपने परिवार वालों को देखने के लिए भी तरस जाएं। वैसे एक साल के भीतर इसी मुंबई से करीब 8 हजार बच्चे लापता हुए हैं। देखा जाए तो एक दशक से देश और दुनिया की ऐसी ज्ञात घटनाओं या संख्याओं को जोड़ना अब असाधारण हो चुका है। भूमण्डलीकरण के जमाने में बच्चों की तस्करी को नए-नए पंख जो लग गए हैं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के एक आंकलन के हवाले से 2002 में दुनियाभर से करीब 12 लाख बच्चों की तस्करी हुई। वहीं युनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट आफ स्टेट के आकड़ों (2004) का दावा है कि दुनिया में तस्करी के शिकार कुल लोगों में से आधे बच्चे हैं। अकेले बच्चों की तस्करी से हर साल 10 अरब डालर के मुनाफे का अनुमान है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी से जुड़े आकड़ों (2000) का अनुमान है कि सेक्स इंडस्ट्री में 18 लाख बच्चों का शोषण हो रहा है। इनमें भी खासतौर से लड़कियों की तस्करी विभिन्न यौन गतिविधियों के लिए हो रही है। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का यह भी अनुमान है कि घरेलू मजदूरी में भी लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। ऐसे बच्चों की तस्करी करने के लिए इनके परिवार वालों को अच्छी पढ़ाई-लिखाई या नौकरी का झांसा दिया जाता है। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रंस फंड, फेक्ट शीट (2005) का अनुमान है कि दुनिया के 30 से ज्यादा सशस्त्र संघर्षों में बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ बच्चों को गरीबी तो कुछ को जबरन उठाकर सेना में भर्ती किया जाता है। 1990 से 2005 के बीच सशस्त्र संघर्षों में 20 लाख से ज्यादा बच्चे मारे गए। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रंस फंड, फेक्ट शीट (2005) ने यह भी कहा है कि अक्सर पिछड़े, अनाथ, विस्थापित, विकलांग या युद्ध क्षेत्र में रहने वाले बच्चों को सैन्य गतिविधियों में लगा दिया जाता है।

प्राकृतिक आपदाओं की ऊहापोह में बच्चों की तस्करी करने वाले गिरोहों की सक्रियता भी बढ रही है। इस दौरान यह गिरोह अपने परिवार वालों से बिछुड़े और गरीब परिवार के बच्चों को निशाना बनाते हैं। इसके अलावा गरीबी के चलते कई मां-बाप अपनी बेटी को आर्थिक संकट से उभरने का उपाय मानते हैं और पैसों की खातिर उसकी शादी किसी भी आदमी के साथ कर देते हैं। इन दिनों अधेड़ या बूढ़े आदमियों के लिए नाबालिग लड़कियों की मांग बढ़ती जा रही है। उन बच्चों के बीच तस्करी की आशंका बढ़ जाती है जिनके जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स फंड, बर्थ रजिस्ट्रेशन के मुताबिक 2000 में 41 प्रतिशत बच्चों के जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। बच्चों की कानूनी पहचान न होने से उनकी तस्करी करने में आसानी हो जाती है। ऐसे में लापता बच्चों का पता-ठिकाना ढ़ूढ़ना मुश्किल हो जाता है। तस्करी और लापता बच्चों के बीच गहरे रिश्ते का खुलासा एनएचआरसी की रिसर्च रिपोर्ट (2004) भी करती है जिसमें कहा गया है कि भारत में एक साल 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज होते हैं, इनमें से एक-तिहाई का पता नहीं चलता है। तस्करी के बाद ज्यादातर बच्चों का इस्तेमाल खदानों, बगानों, रसायनिक और कीटनाशक कारखानों से लेकर खतरनाक मशीनों को चलाने के लिए किया जाता है। कई बार बच्चों को बंधुआ मजदूरी पर रखने के लिए उनके परिवार वालों को एडवांस पैसा दिया जाता है। इसके बाद ब्याज का पैसा जिस तेजी से बढ़ता है उसके हिसाब से बच्चों को वापिस खरीदना मुश्किल हो जाता है। इसके साथ-साथ अंग निकालने, भीख मांगने और नाजायज तौर से गोद लेने के लिए भी बच्चों की तस्करी के मामले बढ़ रहे हैं।

बाल तस्करी की हर अवस्था में हिंसा की सिलसिला जारी रहता है और ऐसे बच्चे आखिरी तक गुलामी का जीवन ढ़ोने को मजबूर रहते हैं। ऐसे बच्चे भरोसेमंद आदमियों के धोखा दिए जाने चलते खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यह भी अजीब विडंबना है कि ऐसे बच्चे अपनी सुरक्षा, भोजन और आवास के लिए शोषण करने वालों के भरोसे रहते हैं। यह बच्चे तस्करी करने वाले से लेकर काम करवाने वाले, दलाल और ग्राहकों के हाथों शोषण सहते हैं। ऐसे बहुत सारी परेशानियों के चलते उनमें हताशा, बुरे सपने आने या नींद नहीं आने जैसे विकार पैदा होते हैं। तब कुछ बच्चे नशे की लत में पड़ जाते हैं और कुछ आत्महत्या की कोशिश तक करते हैं।

बाल तस्करी से जुडे़ सही और पर्याप्त आकड़े जमा कर पाना बहुत मुश्किल है। ऐसा इसलिए क्योंकि तस्करी के तार अंतर्राष्ट्रीय और संगठित अपराध की बहुत बड़ी दुनिया से जुड़े हैं। यह इतनी भयानक, विकराल और अदृश्य दुनिया है कि इसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना आसान नहीं है। यह शारारिक और यौन शोषण के घने जालों से जकड़ी एक ऐसी दुनिया है जिसको लेकर सटीक नतीजे तक पहुंच पाना भी मुश्किल है। कई बार आकड़ों में से ऐसे लोग छूट जाते हैं जिनकी तस्करी देश के भीतर हो रही है। फिर यह भी है कि कई जगहों पर तस्करी के शिकार लोगों की आयु या लिंग का जिक्र नहीं मिलता।

दुनिया भर में बच्चों की तस्करी सबसे फायदेमंद और तेजी से उभरता काला धंधा है। क्योंकि एक तो इसमें न के बराबर लागत है और फिर नशा या हथियारों की तस्करी के मुकाबले खतरा भी कम है। इस धंधे में बच्चे कीमती सामानों में बदलते हैं और मांग-पूर्ति के सिद्धांत के हिसाब से देश-विदेश के बाजारों में बिकते हैं। तस्करी में ऐसा जरूरी नहीं है कि बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय सीमा के बाहर ही ले जाया जाए। एक बड़ी संख्या में बच्चों की तस्करी गांवों से शहरों में भी होती है। इसके अलावा पर्यटन से जुड़ी मांग और मौसमी पलायन के चलते भी तस्करी को बढ़ावा मिलता है। देश के भीतर या बाहर, दोनों ही प्रकार से बच्चों की तस्करी भयावह अपराध है। इसलिए बच्चों की तस्करी रोकने के लिए सार्वभौमिक न्याय का अधिकार देने वाले कानून की सख्त जरूरत है। फौजदारी कानूनों को न सिर्फ मजबूत बनाने होंगे बल्कि उन्हें कारगर ढ़ंग से इस्तेमाल भी करने होंगे। बच्चों की तस्करी से जुड़ी सभी गतिविधियों, लोगों और एंजेसियों पर फौजदारी कानून के तहत कार्रवाई हो। इसके अलावा शोषण से संरक्षण देने वाले ऐसे कानून और नीतियां हो जो बच्चों की तस्करी रोकने के लिए सीधे असर सकें। इनमें पलायन, बाल मजदूरी, बाल दुरुपयोग और पारिवारिक हिंसा से जुड़े कानून आते हैं। यहां एक और बात स्पष्ट है कि बच्चों की तस्करी रोकने के कानूनी उपाय तब तक बेमतलब रहेंगे जब तक कानूनों को इस्तेमाल करने और उनकी निगरीनी करने की उचित व्यवस्था नहीं रहेगी। साथ ही साथ तस्करी के शिकार बच्चों को तेजी से पहचानने के लिए कारगर तरीके बनाने और उन्हें अपनाने की भी जरुरत है।

तस्करी को पालेर्मो प्रोटोकाल (2000) के अनुच्छेद 3 और 5 में दी गई परिभाषा के मुताबिक : ‘‘व्यक्तियों की तस्करी का अर्थ धमकी या जबरन या अपहरण जालसाजी, धोखे, सत्ता के गलत इस्तेमाल, असहायता की स्थिति, किसी दूसरे व्यक्ति पर नियंत्रण रखने वाले व्यक्ति की सहमति पाने के लिए पैसे, लाभ के लेन-देन के लिए व्यक्तियों की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, शरण या प्राप्ति है।’’

मौसम

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

आज का दिन

आज का दिन
22 रबी अल-अव्वल, हिजरी सन् 1431, 10 मार्च 2010 बुधवार. तिथि संवत : चैत्र कृष्ण दशमी, संवत् 2066, शाके- 1931, रवि उत्तरायने, वसंत ऋतु. सूर्योदय कालीन नक्षत्र : पूर्वाषाढ़ा अपराह्न् 4.12 तक, पश्चात उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, वरियान योग तथा विष्टि करण. ग्रह विचार : सूर्य, बुध, गुरु-कुंभ, शुक्र-मीन, केतु-मिथुन, मंगल-कर्क, शनि-कन्या तथा चंद्र, राहु-धनु में. चौघड़िया मुहूर्त : प्रात: 6.40 से 8.09 तक लाभ, प्रात: 08.09 से 9.39 तक अमृत, प्रात: 11.08 से 12.37 तक शुभ, अपराह्न् 3.35 से 5.04 तक चंचल, सायं 5.04 से 6.34 तक लाभ, रात्रि 9.35 से 11.06 तक अमृत. राहुकाल : दोपहर 12.37 से 2.06 तक. शुभ अंक- 9, शुभ रंग- गुलाबी

कैमरे की नज़र से...

इरफ़ान का कार्टून कोना

इरफ़ान का कार्टून कोना
To visit more irfan's cartoons click on the cartoon

बजट-2010-2011

ई-अख़बार

Blog

किस तरह की ख़बरें चाहते हैं

Search