पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद
किस मक़तल से गुजरा होगा
ऐसा सहमा-सहमा चांद
यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तनहा चांद
मेरे मुंह हो किस हैरत से
देख रहा है भोला चांद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चांद
इतने रोशन चेहरे पर भी
सूरज का है साया चांद
जब पानी में चेहरा देखा
तूने किसको सोचा चांद
बरगद की एक शाख हटाकर
जाने किसको झांका चांद
रात के शाने पर सर रखे
देख रहा है सपना चांद
सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद
रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चांद
-परवीन शाकिर
मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की
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*फ़िरदौस ख़ान*
भौतिकवादी संस्कृति ने जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है,
वहीं मनुष्य का स्वास्थ्य भी इससे न अछूता रहा हो तो इसमें हैरानी की को...

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